. "व्रज के भक्त-02" श्रीगोपालदास बाबाजी 'उत्सवी' (वृन्दावन) गङ्गा-तटपर एक निर्जन स्थान में श्रीमद्भागवत की कथा बैठी है। वक्ता हैं एक महात्मा, जिनके शरीर पर एक लंगोटी के सिवा और कुछ नहीं है। श्रोता हैं स्वयं गङ्गा महारानी। महात्मा तन्मय हो गङ्गा माता को लक्ष्य कर उच्च स्वर से कथा कह रहे हैं। गङ्गा कल-कल करती हुँकारें भर रही हैं। और कोई श्रोता वहाँ नहीं है। किसीको निमन्त्रण भी नहीं है। पर भ्रमर निमन्त्रण की प्रतीक्षा कब करता है ? जहाँ भी पुष्प खिलता है, वहाँ पहुँच जाता है। पुष्प के सौरभ को पवन दिक्-विदिक् ले जाता है। उसी को भ्रमर निमन्त्रण मान लेता है। श्रीमद्भागवत की कथा में भी कुछ ऐसा ही दिव्य आकर्षण है। कथा की स्वर-लहरी से स्पन्दित आकाश के अणु-परमाणुओं ने जाकर स्पर्श किया कहीं दूर ध्यानमग्न बैठे परमहंस वृत्ति के एक महात्मा को। वे वहाँ आ विराजे कथा के दूसरे श्रोता के रूप में। तीसरे श्रोता स्वयं श्रीनन्दनन्दन तो अलक्षित रूप से वहाँ रहे होंगे ही। उन्होंने कहा जो है-'मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद-हे नारद ! मेरे भक्त जहाँ मेरा गुणगान करते हैं, मेरी लीला-कथा कहते हैं, वहाँ मैं जा बैठता हूँ।' उन्हीं को लक्ष्य कर परमहंसजी ने कहा-'जिनकी कथा हो रही है, उनके लिए कुछ भोग तो रखा नहीं। उन्हें माखन-मिश्री बहुत प्रिय हैं। उसी समय शुभ्र वस्त्र धारण किये एक वृद्धा माखन-मिश्री लेकर वहाँ लायीं। नन्दनन्दन को माखन-मिश्री का भोग लगाया गया। कथा के पश्चात् दोनों महात्माओं ने उसका सेवन किया। उसके अलौकिक स्वाद और गंध से दोनों चमत्कृत हो गये। उसे ग्रहण करने के पश्चात् सात दिन तक उन्हें भूख नही लगी। एक दिव्य मस्ती बराबर छायी रही। दोनों ने समझ लिया कि माखन-मिश्री लाने वाली वृद्धा स्वयं गङ्गा महारानी ही थीं, अन्य कोई नहीं। गङ्गा महारानी में इतनी निष्ठा रखने वाले और उन्हें श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने वाले यह महात्मा थे निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीमत् स्वभू-रामदेवाचार्य की परम्परा में जूनागढ़ के गोदाबाव स्थान के महन्त श्रीमत-सेवादासजी महाराज के शिष्य श्रीगोपालदासजी। टीकमगढ़के निकट किसी ग्राम में गौड़ ब्राह्मण कुल में सम्वत् १८६८ में उनका प्रादुर्भाव हुआ। बाल्यकाल में ही जूनागढ़ के श्रीसेवादासजी महाराज से दीक्षा ले वे चारों धाम की यात्रा को निकल पड़े। यात्रा समाप्त कर व्रज के अन्तर्गत कामवन में रहने लगे। परसरामद्वारे के पण्डित रघुवरदासजी से श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों का अध्ययन किया। भगवत्कथादि में आसक्ति के साथ-साथ उनका वैराग्य दिन-पर-दिन बढ़ता गया। कुछ दिन बाद वे केवल एक लंगोटी लगाये, बगल में श्रीमद्भागवत दबाये गंगा-तट पर चले गये। गङ्गा के किनारे-किनारे जहाँ-तहाँ विचरते रहे और गङ्गाजी को श्रीमद्भागवत सुनाते रहे। गंगा महारानी का आशीर्वाद ले व्रज लौट आये और वृन्दावन में रहने लगे। वृन्दावनमें वे उदरपूर्ति मधुकरी द्वारा करते और आत्मपूर्ति भगवान् कघ लीला-कथाओं द्वारा। राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं के मनन और कीर्तन में ही उनका सारा समय व्यतीत होता। उनकी श्रीमद्भागवत की कथा वृन्दावन में कहीं-न-कहीं होती रहती। कथा बड़ी रसमय होती। शुक सम्प्रदाय के रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरीजी भी कथा में आया करते। वैष्णव सेवा में उनकी बड़ी निष्ठा थी। कथाओं में जो भेंट आती, उससे महावन के निकट दाऊजी के मन्दिर में जाकर वैष्णव-सेवा कर दिया करते एक बार दाऊजी ने स्वप्न में वृन्दावन में ही वैष्णव-सेवा करते रहने का आदेश दिया। तब से वे वृन्दावन में सेवा करने लगे। उन्हें प्रेरणा हुई श्रीनिम्बार्काचार्य का जन्मोत्सव मनाने की। उन्होंने इस उत्सव की प्रथा डाली, जो आज तक चली आ रही है। प्रतिवर्ष वे श्रीनिम्बार्काचार्य की जन्म-तिथि पर विशाल शोभायात्रा, श्रीमद्भागवत-सप्ताह, रास-लीला, समाज-गान और ब्राह्मण-वैष्णव-भोजन आदि की व्यवस्था करते। बड़ी धूमधाम से सारा उत्सव मनाते। उसके लिए उनके प्रभाव से धन भी पर्याप्त मात्रा में आ जाता। उसका एक-एक पाई खर्च कर अन्त में अपने लंगोटी और करुआ ले किनारे हो जाते। संचय एक पैसा भी न करते। एक बार इस उत्सव के अवसर पर उन्होंने २०० ब्राह्मणों द्वारा श्रीमद्भागवत-पाठ की व्यवस्था की। पर उन्हें ज्वर हो आया। अतः धन की समुचित व्यवस्था न हो सकी। पाठ आरम्भ हो गया। वे चिन्ता में पड़ गये कि ब्राह्मणों को दक्षिणा कहाँ से दी जायगी। तब प्रियाजी ने स्वप्न में दर्शन दे ढाढ़स बंधाया। दूसरे दिन एक परदेसी साहूकार आया। उसने उत्सव का सारा भार अपने ऊपर ले लिया। कई दिन तक कथा-कीर्तन, रास और वैष्णव-भोजनादि का दौर आनन्दपूर्वक चलता रहा। अन्त में साहूकार ने मोहरों की दक्षिणा दे ब्राह्मणों को तृप्त किया। इन उत्सवों के कारण ही गोपालदासजी का नाम ‘उत्सवीजी' पड़ गया। गोपालदासजी भक्तमाल की कथा भी बहुत सुन्दर कहते। जिस शैली में भक्तमाल की कथा का आज प्रचलन है, उसका सूत्रपात्र उन्हीं से हुआ। उन्ही से प्रसिद्ध भक्तमाली टोपीकुञ्ज के श्रीमाधवदास बाबाजी ने भत्तमाल का अध्ययन किया। उनकी जैसी कथनी थी, वैसी ही करनी थी। इसलिए उनकी वाणी में ओज था। उसका लोगों पर स्थायी और गंभीर प्रभाव पड़ता था। बहुत-से लोगों में उससे चमत्कारी परिवर्तन हुआ। बहुत-से उनसे मन्त्र-दीक्षा ग्रहण कर भक्ति-पथ के पथिक बने। उनके शिष्यों में प्रधान थे बाबा हंसदासजी, बाबा श्यामदासजी, बाबा कारे कृष्णदासजी, बाबा किशोरीदासजी, बाबा राधिकादासजी, राजा भवानीसिंहजी और श्रीमती गोपाली बाई। इनके अतिरिक्त श्रीसुदर्शनदासजी (ललित प्रियाजी) जैसे बहुत-से रसिक महानुभावों ने उनसे भजन-प्रणाली- की शिक्षा ग्रहण की। सम्वत् १९५२ में उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

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. "मीरा चरित" (पोस्ट-017) मीरा श्याम कुन्ज में अपने गिरधर के समक्ष बैठी उन्हें अश्रुसिक्त नेत्रों से निहोरा कर रही थी। "बाईसा ! बाईसा हुकम !" केसर दौड़ी हुई आयी। उसका मुख प्रसन्नता से खिला हुआ था। "बाईसा जिन्होंने आपको गिरधरलाल बख्शे थे न, वे संत नगर मन्दिर में पधारे हैं।" एक ही सांस में केसर ने सब बतलाया। "ठाकुर ने बड़ी कृपा की जो इस समय संत दर्शन का सुयोग बनाया।" मीरा ने प्रसन्नतापूर्वक कहा। "जा केसर उन्हें राजमन्दिर में बुला ला ! मैं तेरा अहसान मानूँगी।" "अहसान क्या बाईसा हुकम ! मैं तो आपकी चरण रज हूँ। मैं तो अपने घर से आ रही थी तो वे मुझे रास्ते में मिले, उन्होंने मुझसे सब बात कहकर यह प्रसादी तुलसी दी और कहा कि मुझे एक बार मेरे ठाकुर जी के दर्शन करा दो। अपने ठाकुर जी का नाम लेते ही उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। बाईसा ! उनका नाम भी गिरधरदास है।" मीरा शीघ्रता से उठकर महल में भाई जयमल के पास गई और उनसे सारी बात कही। "उन संत को आप कृपया कर श्याम कुन्ज ले पधारिये भाई।" "जीजा ! किसी को ज्ञात हुआ तो गजब हो जायेगा। आजकल तो राजपुरोहित जी नगर के मन्दिर से ही आने वाले संतो का सत्कार कर विदा कर देते हैं। सब कहते हैं, इन संत बाबाओं ने ही मीरा को बिगाड़ा है।" "म्हूँ आप रे पगाँ पड़ू भाई ! मीरा रो पड़ी।" भगवान आपरो भलो करेला।" "आप पधारो जीजा ! मैं उन्हें लेकर आता हूँ। किन्तु किसी को ज्ञात न हो। पर जीजा, मैंने तो सुना है कि आप जीमण (खाना) नहीं आरोगती, आभूषण नहीं धारण नहीं करती। ऐसे में मैं अगर साधु ले आऊँ और आप गाने-रोने लग गई तो सब मुझ पर ही बरस पड़ेगें।" "नहीं भाई ! मैं अभी जाकर अच्छे वस्त्र आभूषण पहन लेती हूँ। और गिरधर का प्रसाद भी रखा है। संत को जीमा कर मैं भी पा लूँगी। और आप जो भी कहें, मैं करने को तैयार हूँ।" "और कुछ नहीं जीजा ! बस विवाह के सब रीति रिवाज सहज से कर लीजिएगा। आपको पता है जीजा आपके किसी हठ की वजह से बात युद्ध तक भी पहुँच सकती है। आपका विवाह और विदाई सब निर्विघ्न हो जाये- इसकी चिन्ता महल में सबको हो रही है।" "बहन-बेटी इतनी भारी होती है भाई ? मीरा ने भरे मन से कहा।" "नहीं जीजा !" जयमल केवल इतना ही बोल पाये। "आप उन संत को ले आईये भाई ! मैं वचन देती हूँ कि ऐसा कुछ न करूँगी, जिससे मेरी मातृभूमि पर कोई संकट आये अथवा मेरे परिजनों का मुख नीचा हो। आप सबकी प्रसन्नता पर मीरा न्यौछावर है। बस अब तो आप संत दर्शन करा दीजिये भाई !" गिरधरदास जी ने जब श्याम कुन्ज में प्रवेश किया तो वहाँ का दृश्य देखकर वे चित्रवत रह गये। चार वर्ष की मीरा अब पन्द्रह वर्ष की होने वाली थी। सुन्दर वस्त्र आभूषणों से सज्जित उसका रूप खिल उठा था। सुन्दर साड़ी के अन्दर काले केशों की मोटी नागिन सी चोटी लटक रही थी। अधरों पर मुस्कान और प्रेममद से छके नयनों में विलक्षण तेज था। श्याम कुन्ज देवागंना जैसे उसके रूप से प्रभासित था। गिरधर दास उसे देखकर ठाकुर जी के दर्शन करना भूल गये। संत को प्रणाम करने जैसे ही मीरा आगे बढ़ी, उसके नूपुरों की झंकार से वे सचेत हुये। वर रूप में सजे गिरधर गोपाल के दर्शन कर उन्हें लगा - मानों वह वृन्दावन की किसी निभृत निकुन्ज में आ खड़े हुये हैं। उन्हें देखकर जैसे एकाएक श्याम सुन्दर ने मूर्ति का रूप धारण कर लिया और कोई ब्रजवनिता अचकचाकर वैसे ही खड़ी रह गई हो। उनकी आँखों में आँसू भर आये। श्याम कुन्ज का वैभव और उस दिव्यांगना प्रेम पुजारिन को देख कर उन्होंने ठाकुर जी से कहा -"इस रमते साधु के पास सूखे टिकड़ और प्रेमहीन ह्रदयकी सेवा ही तो मिलती थी तुम्हें ! अब यहाँ आपका सुख देखकर जी सुखी हुआ। किन्तु लालजी ! इस प्रेम वैभव में इस दास को भुला मत देना।" अपने गिरधर के, ह्रदय नेत्र भर दर्शन कर लेने के पश्चात बाबा वस्त्र-खंड से आँसू पौंछते हुये बोले, "बेटी ! तुम्हारी प्रेम सेवा देख मन गदगद हुआ। मैं तो प्रभु के आदेश से द्वारिका जा रहा हूँ। यदि कभी द्वारिका आओगी तो भेंट होगी अन्यथा ...। लालजी के दर्शन की अभिलाषा थी, सो मन तृप्त हुआ।" "गिरधर गोपाल की बड़ी कृपा है महाराज ! आशीर्वाद दीजिये कि सदा ऐसी ही कृपा बनाए रखें। ये मुझे मिले या न मिले, मैं इनसे मिली रहूँ। आप बिराजे महाराज !" उसने केसर से प्रसाद लाने को कहा और स्वयं तानपुरा लेकर गाने लगी - साँवरा................... , साँवरा, म्हाँरी प्रीत निभाज्यो जी। मीरा ने सदा की तरह गीत के माध्यम से अपने भाव गिरधर के समक्ष प्रस्तुत किये... साँवरा ................, साँवरा म्हाँरी प्रीत निभाज्यो जी। थें छो म्हाँरा गुण रा सागर, औगण म्हाँरा मति जाज्यो जी। लोकन धीजै म्हाँरो मन न पतीजै, मुखड़ा रा सबद सुणाज्यो जी॥ म्हें तो दासी जनम जनम की, म्हाँरे आँगण रमता आज्यो जी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बेड़ा पार लगाजयो जी॥ भजन की मधुरता और प्रेम भरे भावों से गिरधरदास जी तन्मय हो गये। कुछ देर बाद आँखें खोलकर उन्होंने सजल नेत्रों से मीरा की ओर देखा। उसके सिर पर हाथ रखकर अन्तस्थल से मौन आशीर्वाद दिया। केसर द्वारा लाया गया प्रसाद ग्रहण किया और चलने को प्रस्तुत हुये। जाने से पहले एक बार फिर मन भर कर अपने ठाकुर जी की छवि को अपने नेत्रों में भर लिया। प्रणाम करके वे बाहर आये। मीरा ने झुककर उनके चरणों में मस्तक रखा तो दो बूँद अश्रु संत के नेत्रों से निकल उसके मस्तक पर टपक पड़े। "अहा ! संतों के दर्शन और सत्संग से कितनी शांति -सुख मिलता है ? यह मैं इन लोगों को कैसे समझाऊँ ? वे कहते है कि हम भी तो प्रवचन सुनते ही है पर हमें तो कथा में रोना-हँसना कुछ भी नहीं आता। अरे, कभी खाली होकर बैठें, तब तो कुछ ह्रदय में भीतर जायें। बड़ी कृपा की प्रभु ! जो आपने संत दर्शन कराये। और जो हो, सो हो, जीवन जिस भी दिशा में मुड़े, बस आप अपने प्रियजनों-निजजनों-संतों-प्रेमियों का संग देना प्रभु ! उनके अनुभव, उनके मुख से झरती तुम्हारे रूप, गुण, माधुरी की चर्चा प्राणों में फिर से जीने का उत्साह भर देती है, प्राणों में नई तरंग की हिल्लोर उठा देती है। जगत के ताप से तप्त मन-प्राण तुम्हारी कथा से शीतल हो जाते है। "मैं तो तुम्हारी हूँ। तुम जैसा चाहो, वैसे ही रखो। बस मैनें तो अपनी अभिलाषा आपके चरणों में अर्पण कर दी है।" - पुस्तक- "मीरा चरित" लेखिका:- आदरणीय सौभाग्य कुँवरी राणावत ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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. "व्रज के भक्त-01" श्रीसखीचरणदास बाबाजी (राधाकुण्ड) मणिपुर प्रान्त के लोगों का व्रज से विशेष सम्बन्ध रहा है। राधाकुण्ड में बहुत दिनों तक मणिपुरिया महात्माओं की ही प्रधानता रही है। आज भी यहाँ बहुत-से भजन-निष्ठ मणिपुरिया महात्मा भजन करते हैं। इसका एक इतिहास है। श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के समय से मणिपुर के राजा और प्रजा श्रीमन्महाप्रभु के सम्प्रदाय की नरोत्तम ठाकुर महाशय की शाखा के अनुगत रहे हैं। अंग्रेज जब भारत में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहे थे, उस समय श्रीकुलचन्द्र महाराज मणिपुर के राजा थे। वे भी गौड़ीय भक्त थे। वे बड़े पराक्रमी थे। आक्रमणकारी अंग्रेज सेनाओं को उनके सामने कई बार मुँह की खानी पड़ी थी। अन्त में उन्हें पराजित करने के लिए उन्हें एक चाल चलनी पड़ी थी। वे जानते थे कि राजा गो-भक्त हैं। किसी परिस्थिति में भी गो-हत्या करना उनके लिए सम्भव नहीं। इसलिए उन्होंने अन्तिम बार गाय-बछड़ों के समूह को आगे कर उनके ऊपर आक्रमण किया। उन्होंने गो-हत्या करने के बजाय पराजय स्वीकार की। अंग्रेज उन्हें और उनके कर्मचारियों को बन्दी बनाकर दिल्ली ले गये। राजा से अंग्रेजों ने पूछा-'आप कहाँ रहना पसन्द करेंगे ?' उन्होंने राधाकुण्ड में रहने की इच्छा प्रकट की। तभी अंग्रेजों ने राधाकुण्ड में गोपकुआँ के पास राजा के रहने के उपयुक्त एक मकान और मन्दिर का निर्माण कर दिया। राजा अपने कुछ कर्मचारियों के साथ वहाँ रहने लगे। तभी से राधाकुण्ड मणिपुरी भक्तों के लिए भजन का प्रमुख स्थान बन गया। मणिपुरके बहुत से परिवारों में अब भी यह प्रथा है कि १०-१२ वर्ष की अवस्था में ही वे अपने बालकों को श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के परिवार में दीक्षित करा देते हैं। श्रीसखीचरण बाबा के साथ भी ऐसा ही हुआ। वि० संवत् १९४२ फाल्गुनी कृष्णा त्रयोदशी को उनका जन्म हुआ। जब वे १०-१२ वर्ष के थे, उनके माता-पिता ने उन्हें श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के परिवार के किसी व्यक्ति से दीक्षित करवा दिया। पर उनके साथ यह घटना एक लौकिक रीति के रूप में ही घटकर नहीं रह गयी। उन्होंने तभी घर-द्वार छोड़ वृन्दावन जाकर भजन करने का निश्चय कर लिया। तभी से उन्हें उसके लिए उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में श्रीनरोत्तम ठाकुर का यह पद बार-बार गाते सुना जाने लगा-- आर की ए मन दशा हब, सब छाड़ि वृन्दावन जाब॥ आर कबे श्रीरासमण्डले। गड़ागड़ि दिब कुतूहले॥ आर कबे गोवर्धन गिरि। देखिब नयनयुग भरि॥ श्यामकुण्डे राधाकुण्डे स्नान करि कबे जुड़ाब परान॥ आर कबे जमुना जले। मज्जनै हइब निरमले॥ साधु संगे वृन्दावन बास। नरोत्तमदास करे आश॥ 'हाय ! कब मेरी वह दशा होगी, जब मैं सब छोड़-छाड़ वृन्दावन जाऊँगा ? कब रासमण्डल में जाकर लोटा-पीटा करूँगा ? कब गिरि गोवर्धन नयन भर दर्शन करूँगा ? कब श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड में स्नानकर प्राणों को शीतल करूँगा ? कब यमुना में स्नानकर निर्मल होऊँगा ? कब साधु-जनों के साथ श्रीवृन्दावन-वास की मेरी आशा पूर्ण होगी ?' तभी से वे वृन्दावन में वैराग्याश्रम ग्रहणकर भजन करने के उद्देश्य से वैराग्य का अभ्यास भी करने लगे। अपना आहार दिन-पर-दिन कम करने लगे। ग्रन्थ-पाठ, सत्संग और कृष्ण-लीला-कीर्तनादि में अधिकांश समय व्यतीत करने लगे। लीला-कीर्तन-मण्डली के एक सुनिपुण नायक के रूप में चारो ओर लोग उनकी प्रशंसा करने लगे। शकाब्द १८४२ में ३५ वर्ष की अवस्था में वे गृह त्यागकर व्रज चले गये। राधाकुण्ड में श्रीजीवगोस्वामी के घेरे में रहकर भजन करने लगे। विरक्त-वेश ग्रहण करने के लिए उपयुक्त गुरु की खोज भी उन्होंने तत्काल प्रारम्भ कर दी। पर किसको गुरु रूप में वरण करें, यह वे बहुत दिनों तक निर्णय न कर सके। अन्त में उन्होंने राधारानी की शरण ली। दिन-रात उनसे प्रार्थना करते हुए उनके निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। बहुत दिनों तक उनकी ओर से भी किसी प्रकार का संकेत न मिला। उनकी धारणा थी कि वेशाश्रय के बिना भजन में तीव्र गति से अग्रसर होना सम्भव नहीं। भजन में प्रगति बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं। इसलिए जब राधारानी ने भी गुरु के सम्बन्ध में उन्हें कोई संकेत नहीं दिया, तब वे क्या करते ? उन्होंने अनशन द्वारा जीवन समाप्त करने का निश्चय किया। अन्न-जल सब त्याग दिया। सात दिन बिना अन्न-जल के व्यतीत हो गये। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। मानसिक स्थिति ऐसी हो गयी कि निद्रा और जागरण एक से प्रतीत होने लगे। उसी समय, कहना मुश्किल है कि स्वप्न में या जागरण में, राधारानी ने दर्शन देकर राधाकुण्ड में गोपीनाथजी के मन्दिर के सेवाध्यक्ष श्रीभगवानदास बाबाजी मे वेश ग्रहण करने का आदेश दिया। सखीचरण ने भगवानदास बाबाजी के चरणों में आत्म-समर्पण किया। वेश ग्रहण करने के पश्चात उनसे अष्टकालीन भजन-शिक्षा देने के लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा - 'मुझे मन्दिर के सेवा-कार्य तो अवकाश मिलता नहीं। तुम्हें भजन सिखाऊँ तो कैसे सिखाऊँ ? तुम ऐसा करो खदिरवन (खैरा) में थोलोकनाथ गोस्वामी की भजन-कुटीमें श्रीनरोत्तमदासजी महाराज और पिसाए की कदम्बखण्डी में श्रीराधिकादासजी महाराज रहते हैं। यह दोनों मणिपुर के उच्चकोटि के भजनशील व्यक्ति हैं। दोनों सिद्ध कृष्णदास बाबा की भजनशैली मे भजन करते हैं। दोनों जैसे एक प्राण, दो देह हैं। तुम इन दोनों से कृष्णदास बाबा की गुटिका के अनुसार भजन की पद्धति सीख लो।' सखीचरण बाबा ने ऐसा ही किया। पर उनसे भजन-पद्धति सीखने में उन्हें बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। वे रात दो बजे से उठकर भजन करते थे। राधाकुण्ड से अपना आसन छोड़कर रात में कहीं न जाने का उन्होंने संकल्प कर रखा था। यदि वे कहीं जाने भी तो रात होते-होते राधाकुण्ड अवश्य लौट आते। उस समय राधाकुण्ड से खदिरवन जाने के लिए गाँव-गाँव में होते हए १५-१६ मील का चक्कर लगाना पड़ता था। खदिरवन से कदम्बखण्डी और भी दो-तीन मील आगे थी। सखीचरण बाबा पैदल चलकर इतनी दूर जाते और रात होने से पहले लौट आते। कभी-कभी भजन करते-करते रात में २ या ३ बजे उन्हें कोई शंका होती, तो उसी समय उनके स्थान को चल पड़ते। उन्होंने सिद्ध बाबाकी गुटिका पूरी कण्ठ कर ली। पर उन्हें उससे सन्तोष न हुआ, क्योंकि श्रीनरोत्तमदासजी महाराज के पास जो गुटिका थी, वह बिलकुल शुद्ध नहीं थी। सखीचरण बाबा शुद्ध गुटिका की खोज में लग गये। किसी ने उनसे कहा कि काम्यवन में सिद्ध कृष्णदास बाबा के एक नाती चेला हैं। उनके पास बहुत-सी प्राचीन गुटिकाएँ हैं। उन्होंने राधाकुण्ड से २६ मील दूर जाकर उनसे एक अच्छी गुटिका देने की प्रार्थना की और उसकी नकलकर उसे शीघ्र लौटा देने को कहा। उन्होंने कहा- मैं ले जाने को नहीं दूँगा। तुम यहीं बैठकर नकल कर सकते हो।' बाबा ने कहा-'मेरा नियम है रात्रि में राधाकुण्ड छोड़कर अन्य किसी स्थान पर न रहने का। आप करुणामय हैं। जिससे मेरे नियम की रक्षा हो, ऐसा करने की कृपा करें। काम्यवन के बाबा ने कहा-'अच्छा दो-तीन दिन बाद आना। मैं निकाल रखूँगा।' दो-तीन दिन बाद फिर उन्होंने काम्यवन की लम्बी यात्रा की और गुटिका ले आये। पर उसमें भी सन्देह होने के कारण, उसे लौटा आये। उनसे अनुनय-विनयकर उससे अच्छी दूसरी गुटिका ले आये। उससे भी सन्तोष न हुआ, तो फिर जाकर उससे और अच्छी गुटिकाके लिए प्रार्थना की। काम्यवन के बाबा ने कहा-'अच्छा, तो तुम सबसे अच्छी प्रति चाहते हो! उसे मैं किसी को देता नहीं। तुम्हारी उत्कण्ठा देख तुम्हें दे रहा हूँ। १५ दिन भीतर लौटा अवश्य देना।' सखीचरण बाबा गुटिका ले आये। १२ दिन में उसकी नकलकर उसे लौटा आये। बाबाका वैराग्यमय शरीर बहुत कृश और दुर्बल था। उनका केवल सात घरों से मधुकरी माँगने का नियम था। व्रज की प्रथा के अनुसार प्रत्येक घर से रोटी का एक टूक ही मिलता था। किसी-किसी घर से वह भी नहीं। इतना स्वल्पाहार करते हुए, इतने दुर्बल शरीर से बाबा के लिए बार-बार खदिरवन और काम्यवनादि की लम्बी यात्रा कर उसी दिन लौट आना और फिर नित्य-नियमादि कर मधुकरी को जाना असम्भव था। साधारण रूप से इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनकी असाधारण भजन-निष्ठ और भक्ति की अचिंत्य शक्ति के कारण ही यह सम्भव हो सका। इतने कष्ट से अष्टकालीन-लीला की गुटिका का संग्रहकर बाबा बड़े उत्साह और लगन के साथ अष्टकालीन लीला-स्मरण में संलग्न रहने लगे राधा-कृष्ण की मानसिक-सेवा में संलग्न रहते हुए भी उन्होंने वाह्य सेवा की अवहेलना नहीं नी। मणिपुर के श्रीचूडाचांद ने राधाकुण्ड में एक नये मन्दिर का निर्माणकर सेवा-भार उनके ऊपर छोड़ रखा था। वे विधिवत् मन्दिर में ठाकुर-सेवा करते हुए मानसिक सेवा में तल्लीन रहते। बीच-बीच में अपने शिक्षा-गुरु श्रीनरोत्तमदास बाबा और श्रीराधिकादास बाबा का खदिरवन और कदम्बखण्डी जाकर सत्संग करते। इस प्रकार बाह्य और अन्तर साधन में एक साथ लगे रहकर बाबा भजनानन्द का पूर्णरूप से अनुभव कर रहे थे, उसी समय उनके ऊपर एक वज्राघात हुआ। १८५१ शकाब्द, भाद्र शुक्ला नवमी को उनके शिक्षागुरु श्रीनरोत्तमदासबाबा अचानक नित्य लीला में प्रवेश कर गये। उनके अभिन्न प्राण श्रीराधिकादास बाबाजी उनके देह से लिपटकर रो-रोकर कहने लगे-'हाय बन्धु ! तुम मुझे बिना बताये ही मुझे छोड़कर चले गये। तुम्हारे बिना मैं अब इस शरीर को लेकर क्या करूँगा ?' उन्होंने उनके विरह में अन्न-जल त्याग दिया और दो दिन बाद में वे भी नित्य-लीला में प्रवेश कर गये। दोनों शिक्षा-गुरुओं के सहसा अन्तर्धान के पश्चात् गुरु-विरह रूप महादावानल सखीचरण बाबा के हृदय को दग्ध करने लगा। वे भी उनके बिना जीना निरर्थक जान अन्न-जल त्यागकर राधारानी से प्रार्थना करने लगे-'स्वामिनी ! मेरे गुरुवर्ग को जब तुमने अपने चरणों में ले लिया, तो इस दीन पर भी कृपा करो। वे दोनों मुझे अपराधी जान छोड़कर चले गये हैं। मैं अब इस अपराधी शरीर को लेकर क्या करूँगा ? मुझे भी अपने चरणों में स्थान देने की कृपा करो, स्वामिनी।' वे एक मास तक नित्य केवल एक चम्मच गिरिधारी का चरणामृत लेकर स्वामिनी से इस प्रकार प्रार्थना करते रहे। उनका शरीर अति जीर्ण और शुष्क होकर मरणासन्न हो गया। संगी-साथी उनकी प्राण त्यागने की अन्तिम अवस्था जान कीर्तनादि की व्यवस्था करने लगे। उसी समय करुणामय स्वामिनी स्वर्ण के थाल में विभिन्न प्रकार के प्रसाद लेकर आयीं और बोलीं-'लो यह प्रसाद ग्रहण करो। उपवास छोड़ दो।' सखीचरण बाबा ने कहा-'स्वामिनी ! मैं अब इस अपराधी शरीर को नहीं रखना चाहता। मुझे अपने चरणों में लेने की कृपा करो।' 'नहीं, अभी नहीं। अभी भजन करो' स्वामिनी ने कहा, और उन्हें भोजन करा अन्तर्धान हो गयीं। स्वामिनी की आज्ञा से बाबा ने अनशन छोड़ दिया और पूर्ववत् भजन करने लगे। एक वर्ष पीछे शिक्षा-गुरुओं की विरह-तिथि पर उन्हें फिर गुरु-विरह-ताप ने जर्जरित किया। उससे निस्तार पाना उनके लिए असम्भव हो गया। उन्होंने फिर अनशन द्वारा प्राण त्यागकर उनके निकट जाने का दृढ़ संकल्प किया। अनशन करते एक मास बीत गया। मरणासन्न अवस्था प्राप्त होने पर उन्होंने सहसा देखा दिव्य वृन्दावन का रमणीय दृश्य और राधारानी को सोने के थाल में प्रसाद के साथ उनकी ओर मन्द, मनोहर गति से आते हुए। उन्होंने कहा-'बाबा लो, प्रसाद ग्रहण करो। अभी कुछ दिन और भजन करो, तब तुम्हें ले जाऊँगी।' बाबा ने कहा--'स्वामिनी ! मैं कितना अशक्त हो गया है। इस देह को लेकर रहना कितना मुश्किल हो गया है मेरे लिए। सेवक भी मेरे पास कोई नहीं है। कुएँ से जल तक मुझे स्वयं ही लाना पड़ता है। ऐसी दशा में मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता। मुझे अपने चरणों में अंगीकार कर लो। 'चिन्ता न करो। तुम्हें कोई असुविधा न होगी। एक सेवक तुम्हारे पास आ जायगा। एक कुआँ भी तुम अपनी कुटिया के सामने खुदवा लेना।' 'कुएँ के लिए मेरे पास पैसे कहाँ हैं ?' 'उसकी भी चिन्ता न करो। वह धूम्रराय करवा देगा।' इतना कह स्वामिनी ने बाबा को प्यार से भोजन कराया और अन्तर्धान हो गयीं। धूम्रराय सखीचरण बाबा के भानजे थे। वे रेलवे कमिश्नर थे। उन्होंने बहुत दिनों से मामा के दर्शन नहीं किये थे। उनके दर्शन की उत्कण्ठा ले वे वृन्दावन आये। बाबा को पानी का कष्ट देख उन्होंने एक कुआँ उनकी कुटिया के सामने खुदवा दिया। राधारानी की कृपा से कुएँ का जल भी मीठा निकला, जबकि आस-पास के कुओं को देखते हुए उसका जल मीठा निकलने की कोई सम्भावना ही न थी। एक सेवक भी इसी बीच बाबा के पास आ गया। अब उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न रही। उनका भजन-साधन सुचारु रूप से चलने लगा। पर भजनमें तृप्ति कहाँ ? साधक भजन में जितनी प्रगति करता है, उतनी ही उसकी उत्कण्ठा और बढ़ती जाती है उसका एक पल भी यदि भजन के बिना जाता है, तो उसे असह्य दुःख होता है। बाबा ने पहले ही अपना आहार और निद्रा बहुत कम कर रखे थे, जिससे वे अधिक-से-अधिक समय भजन कर सकें। वे केवल सात घरों से भिक्षा करते थे। उसी में जितने टूक रोटी के मिलते उन्हें खाकर पानी पी लेते थे। दिन-रात भजन करते थे। केवल रात ११ बजे से २ बजे तक का समय निद्रा में अतिवाहित करते थे। उन्होंने अब निद्रा का समय और भी कम करना चाहा। निद्रा और आहार में घना सम्बन्ध है। आहार जितना अधिक होता है, उतनी ही निद्रा अधिक होती है। इसलिए उन्होंने अब मधुकरी और भी कम कर दी। सात घरों के बजाय केवल पाँच में मधुकरी को जाने लगे। कुछ दिनों बाद मधुकरी और भी घटाकर केवल तीन घरों तक सीमित कर दी। तीन घरों में से भी कभी-कभी किसी घर से मधुकरी न मिलती, तो एक या दो घरों से प्राप्त रोटी के एक या दो टूक खाकर ही रह जाते। कभी ऐसा भी होता कि तीनों घरों से, जहाँ वे मधुकरी के लिए जाते, खाली लौटना पड़ता। तव राधाकुण्ड का जल पीकर ही रह जाते। जब ऐसा होता तब वे किसी प्रकार का दुःख न मानकर उलटे सुख ही मानते, क्योंकि जब वे केवल राधाकुण्ड का जल पीकर रह जाते, तब उन्हें भजन में और अधिक स्फूति होती। ऐसा वे अपने शिष्यों से पीछे कहा करते। एक दिन जब बाबा किसी ब्रजवासी के घर मधुकरी को गये, तो उसने कहा-'बाबा, आज रोटी अभी तक बनी नहीं है। थोड़ी देर में फिर आने की कृपा करें।' एक ही घर में दो बार मधुकरी के लिए जाने का बाबा का नियम नहीं था। वे उस घर में फिर नहीं गये। दूसरे घर में भी उन्हें मधुकरी नहीं मिली, क्योंकि वहाँ अशौच था। तीसरे घर में किसी महोत्सव का आयोजन चल रहा था। भोग अभी नहीं लगा था। ब्रजवासी ने कहा-'बाबा, आज मेरा अनुरोध मानना होगा। थोड़ी देर में भोजन करके जाना होगा।' 'तुम तो जानते हो।' मैं भोजन कहीं नहीं करता, बाबा ने कहा। 'तो बाबा प्रसाद ही लेकर जायें। अभी थोड़ी देर में भोग लग जायगा।' 'नहीं, मुझे विलम्ब हो रहा है। अभी मैंने मध्याह्न-नियम नहीं किया है। आज रहने दो। फिर किसी दिन मधुकरी ले जाऊँगा।' 'ऐसा नहीं हो सकता बाबा। इतनी-सी बात तो मेरी माननी ही होगी। मैं बिना प्रसाद लिये नहीं जाने दूँगा।' बाबा को उसका अनुरोध मानना पड़ा। प्रसाद लेकर जब वे कुटिया को लौटे, तब विलम्ब बहुत हो गया था। भूख बहुत लग आयी थी। पर प्रसाद ग्रहण करने के पूर्व मध्याह्न-नियम तो करना ही था। वे नियम करने बैठे, तब उनका मन प्रसादी पुओं के लिए चंचल हो उठा। मन का भजन की अपेक्षा पुओं में अभिनिवेश अधिक देख उन्हें उस पर क्रोध आया। उन्होंने पुए झोले से निकाल कुटिया के बाहर बन्दरों को डाल दिये। मन से बोले-'अब खा, क्या खायेगा ?' मन सीधा हो गया। उसकी चंचलता जाती रही। शान्त मन से मध्याह्न-भजन का नियम पूरा करने के पश्चात् वे राधाकुण्ड का जल पानकर तृप्त हुए। कुछ दिन बाद कार्तिक मास की नियम-सेवा के उद्देश्य से कलकत्ते के श्रीसत्यनारायण पाल का राधाकुण्ड आना हुआ। वे बाबा के दर्शन कर बहुत प्रभावित हुए। उन्हें बाबा का कृश शरीर और अति सूक्ष्म आहार देखकर चिन्ता हुई। उन्होंने सोचा कि वे केवल तीन घरों से मधुकरी का अपना नियम तो छोड़ेंगे नहीं। यदि मधुकरी के अतिरिक्त कुछ दूध भी ले लिया करें तो अच्छा हो। उन्होंने बाबा से दूध लेने का आग्रह किया और स्वयं दूध के लिए खर्चे की व्यवस्था कर देने का वचन दिया। बाबा ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। पर बाबा के सोचने की दिशा दूसरी थी। उन्होंने सोचा कि वे दूध लेना आरम्भ कर देंगे और मधुकरी को जाना बन्द कर देंगे। इस प्रकार उन्हें भजन के लिए और अधिक समय मिल जाया करेगा। पाल महाशय बाबा के लिए गाय के आधा सेर दूध की व्यवस्था कर कलकत्ते चले गये। बाबा का दुग्धपान आरम्भ हुआ। साथ ही मधुकरी को जाना बन्द हो गया। वे पाव भर दूध मध्याह्न भजन के पश्चात् दिन में लेते, पाव भर रात १० बजे। तीन-चार दिन में एक बार शौच को जाते। यह व्यवस्था उनके भजन के लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हुई और अन्त तक चलती रही। पर दूध में ग्वाला कभी-कभी पानी मिला देता, जिसके कारण उनके भजन में विघ्न पड़ता। उन्हें भजन करते-करते कई बार उठकर लघुशंका को जाना पड़ता। यह समस्या भी आसानी से हल हो गयी। कुछ ही दिन पूर्व श्रीमदनमोहनदास बाबा ने उनके चरणों में आत्म-समर्पण कर उनसे कुछ सेवा बताने का आग्रह किया था। बाबा ने उन्हें अपने सामने ग्याले के घर से दूध दुहा लाने की सेवा सौंप दी। इस प्रकार आहार और निद्रापर पूर्ण नियन्त्रण के साथ बाबा का अष्टकालीन लीला-स्मरण सुचारु रूप से चलने लगा। कालान्तर में उन्हें लीला-स्मरण में सिद्धि प्राप्त हुई। लोग उनके पास अष्टकालीन-लीला-स्मरण की शिक्षा-दीक्षा के लिए आने लगे। श्रीअच्युतदास बाबा, श्रीब्रजमोहनदास बाबा, श्रीमदनमोहनदास बाबा, पण्डित श्रीकृष्णचरण-दास बाबा और श्रीकृष्णदास बाबा उनके प्रधान शिष्य हुए। एक दिन बाबा ने मदनमोहनदास बाबा को पास बुलाकर कहा- 'तुमसे एक गोपनीय बात कहूँ, किसी से पहना नहीं। मैं अब शीघ्र स्वामिनी-के पास जाऊँगा। तुम दुःख न करना। तुम्हें भजन के विषय में सब कुछ बता दिया है। एकान्त चित्त से सुखपूर्वक भजन करना। गुटिका में जो त्रुटियाँ अब भी रह गयी हैं, उनका मेरे बताये अनुसार संशोधन कर लेना।' मदनमोहन बाबा के पैरों के नीचे से धरती खिसक गयी। एकाएक बाबा के मुख ने उनके प्रयाण की बात सुन उन्हें लगा कि जैसे उनके प्राण भी अब नहीं रहेंगे। शरविद्ध पक्षी की भांति उनके प्राण छटपट करने लगे। अश्रुविसर्जन करते हुए वे उनके चरणों में गिर पड़े और कातर स्वर से बोले- 'बाबा ! यदि इस समय मुझे छोड़कर चले जायेंगे, तो मेरी क्या गति होगी। मैंने तो अभी दीक्षा भर ली है। भजन-पद्धति की रूप-रेखा मात्र जानी है। भजन करते-करते अवश्य कुछ शंकाएँ उठेंगी। उनका समाधान कैसे होगा ? आप और कुछ दिन रहकर मुझे भजन-पद्धति में परिपक्व करने की कृपा करें।' 'स्वामिनी की कृपा से तुम्हारा सब समाधान हो जायेगा। चिन्ता न करो। मुझे स्वामिनी के निकट जाने दो।' बाबा ने आग्रह सहित कहा। मदनमोहन बाबा ने तब हाथ जोड़कर निवेदन किया-'यदि आप जायेंगे ही, तो मुझे यह बताने की कृपा करें कि आपके पीछे किनका संग करूँ, जिससे मेरे भजन में उन्नति हो ? शंकाएँ होने पर किनके पास जाकर उनका समाधान करूँ ?' कुछ देर चिन्ता कर बाबा बोले-'किसको बताऊँ ? कोई तो मनोमत दीखता नहीं।' 'तब तो बाबा आपको रहना ही होगा। नहीं तो यह दास भी आपका अनुसरण करेगा।' मदनमोहन बाबा ने व्याकुल भाव से आग्रह किया। 'अच्छा, तो मैं दो वर्ष और रहूँगा। इस बीच तुम सब समाधान कर लेना।' बाबा ने मदनमोहन बाबा को आश्वस्त करते हुए कहा। दो वर्ष सखीचरण बाबा ने राधारानी के विरह में जैसे-जैसे व्यतीत किये। उनकी विरह-ज्वाला निरन्तर बढ़ती गयी। लोगों से मिलना-जुलना उन्होंने बन्द कर दिया। कुटिया का ताला भीतर से बन्दकर रहने लगे, जिससे सेवक भी उसे खोल न सके। दो वर्ष व्यतीत होने पर उन्होंने मदनमोहन बाबा से कहा-'अब मैं जाऊँगा।' मदनमोहन बाबा ने कहा-'कुछ दिन और रुक जायें बाबा।' पर बाबा मौन रहे। दूसरे दिन से वे दूध की मात्रा कम करने लगे। एक महीने में सूखकर अस्थियों का पिंजर जैसे हो गये। बाह्यज्ञान-शून्य अवस्था में वे शय्या पर लेटे रहते। पर उनका भजन ठीक चलता रहता। उस समय उनके शिष्य श्रीगोपालदासजी डागा भी उनकी सेवा में थे। वे जब उनके कान में मुँह लगाकर पूछते-'बाबा, इस समय कौन-सी लीला चल रही है,' तो वे समयोचित लीला का ठीक संकेत कर देते। बीच-बीच में कहने लगते-'जले गेलौ, जले गेलौ,' अर्थात्, 'शरीर जला जा रहा है, जला जा रहा है, जिससे पता चलता कि उनका विरह-ताप कितना बढ़ता जा रहा है। एक दिन अन्त समय निकट जान लोगों ने उनके निकट नाम-कीर्तन आरम्भ कर दिया। उस समय मध्याह्न था। मध्याह्न-लीला में बाबा का विशेष आवेश रहा करता था। उस समय वे समाधिस्थ अवस्था में देख रहे थे कि सखियाँ उन्हें दिव्य राधाकुण्ड में ले जाने के लिए मंजरीरूप में सजा रही हैं। बाह्यज्ञान होने पर उन्होंने कीर्तनकारी भक्तो से कहा-'मुझे सखियाँ राधाकुण्ड ले जाने को सजा रही थीं। तुम लोगों ने शब्द करके मुझे यहाँ बुला लिया। तुम अभी कीर्तन न करो। अभी मेरा लीला-स्मरण ठीक चल रहा है। कीर्तन के शब्द से लीला-आवेश भंग हो जाता है। जब लीला-स्मरण बन्द हो जाय, तब नाम-कीर्तन आरम्भ करना। दूसरे दिन, सम्वत् २०२२, आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदा को प्रातःकाल उन्होंने कहा-'मुझे रज पर लिटा दो।' समाधिस्थ अवस्था में रजपर लेटे-लेटे कीर्तन-ध्वनि के बीच उन्होंने मध्याह्न १ बजे राधाकृष्ण की मध्याह्न-लीला में प्रवेश किया। ----------:::×:::---------- पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. दिनांक 14.05.2021 दिन शुक्रवार तदनुसार संवत् २०७८ के वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि को आने वाला पर्व है :- 👇🏻 “अक्षय तृतीया" जो कभी क्षय नहीं होती उसे अक्षय कहते हैं। अक्षय तृतीया (आखातीज) को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक कहा जाता है। वर्ष में साढ़े तीन अक्षय मुहूर्त है, उसमें प्रमुख स्थान अक्षय तृतीया का है। कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है, जिससे अक्षय पुण्य मिलता है। इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। क्योंकि शास्त्रों के अनुसार इस दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। समस्त शुभ कार्यों के अलावा प्रमुख रूप से शादी, स्वर्ण खरीदने, नया सामान, गृह प्रवेश, पदभार ग्रहण, वाहन क्रय, भूमि पूजन तथा नया व्यापार प्रारंभ कर सकते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सतयुग एवं त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही धरा पर आए। कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था। ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के पट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं। वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया को होते हैं। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. "मीरा चरित" (पोस्ट-016) विवाह के उत्सव घर में होने लगे- हर तरफ कोलाहल सुनाई देता था। मेड़ते में हर्ष समाता ही न था। मीरा तो जैसी थी, वैसी ही रही। विवाह की तैयारी में मीरा को पीठी (हल्दी) चढ़ी। उसके साथ ही दासियाँ गिरधरलाल को भी पीठी करने और गीत गाने लगी। मीरा को किसी भी बात का कोई उत्साह नहीं था। किसी भी रीति-रिवाज के लिए उसे श्याम कुन्ज से खींच कर लाना पड़ता था। जो करा लो, सो कर देती। न कराओ तो गिरधर लाल के वागे (पोशाकें), मुकुट, आभूषण संवारती, श्याम कुन्ज में अपने नित्य के कार्यक्रम में लगी रहती। खाना पीना, पहनना उसे कुछ भी नहीं सुहाता। श्याम कुन्ज अथवा अपने कक्ष का द्वार बंद करके वह पड़ी-पड़ी रोती रहती। मीरा का विरह बढ़ता जा रहा है। उसके विरह के पद जो भी सुनता, रोये बिना न रहता। किन्तु सुनने का, देखने का समय ही किसके पास है ? सब कह रहे है कि मेड़ता के तो भाग जगे हैं कि हिन्दुआ सूरज का युवराज इस द्वार पर तोरण वन्दन करने आयेगा। उसके स्वागत में ही सब बावले हुये जा रहे हैं। कौन देखे-सुने कि मीरा क्या कह रही है ? वह आत्महत्या की बात सोचती - ले कटारी कंठ चीरूँ कर लऊँ मैं अपघात। आवण आवण हो रह्या रे नहीं आवण की बात॥ किन्तु आशा मरने नहीं देती। जिया भी तो नहीं जाता, घड़ी भर भी चैन नहीं था। मीरा अपनी दासियों-सखियों से पूछती कि कोई संत प्रभु का संदेशा लेकर आये हैं ? उसकी आँखें सदा भरी-भरी रहतीं। मीरा का विरह बढ़ता जा रहा है। उसके विरह के पद जो भी सुनता, रोये बिना न रहता। कोई कहियो रे प्रभु आवन की,आवन की मनभावन की॥ आप न आवै लिख नहीं भेजे, बान पड़ी ललचावन की। ऐ दोऊ नैण कह्यो नहीं मानै,नदिया बहै जैसे सावन की॥ कहा करूँ कछु बस नहिं मेरो, पाँख नहीं उड़ जावन की। मीरा के प्रभु कबरे मिलोगे, चेरी भई तेरे दाँवन की॥ कोई कहियो रे प्रभु आवन की,आवन की मनभावन की॥ मीरा का विरह बढ़ता जा रहा था। इधर महल में, रनिवास में जो भी रीति रिवाज चल रहे थे, उन पर भी उसका कोई वश नहीं था। मीरा को एक घड़ी भी चैन नहीं था। ऐसे में न तो उसका ढंग से कुछ खाने को मन होता और न ही किसी ओर कार्य में रूचि। सारा दिन प्रतीक्षा में ही निकल जाता। शायद ठाकुर किसी संत को अपना संदेश दे भेजें या कोई संकेत कर मुझे कुछ आज्ञा दें, और रात्रि किसी घायल की तरह रो-रो कर निकलती। ऐसे में जो भी गीत मुखरित होता वह विरह के भाव से सिक्त होता। घड़ी एक नहीं आवड़े तुम दरसण बिन मोय। जो मैं ऐसी जाणती रे प्रीति कियाँ दुख होय। नगर ढिंढोरा फेरती रे प्रीति न कीजो कोय। पंथ निहारूँ डगर बुहारूँ ऊभी मारग जोय। मीरा के प्रभु कबरे मिलोगा तुम मिलियाँ सुख होय। (ऊभी अर्थात किसी स्थान पर रूक कर प्रतीक्षा करनी) कभी मीरा अन्तर्व्यथा से व्याकुल होकर अपने प्राणधन को पत्र लिखने बैठती। कौवे से कहती- "तू ले जायेगा मेरी पाती, ठहर मैं लिखती हूँ।" किन्तु एक अक्षर भी लिख नहीं पाती। आँखों से आँसुओं की झड़ी कागज को भिगो देती - पतियां मैं कैसे लिखूँ लिखी ही न जाई॥ कलम धरत मेरो कर काँपत हिय न धीर धराई॥ मुख सो मोहिं बात न आवै नैन रहे झराई॥ कौन विध चरण गहूँ मैं सबहिं अंग थिराई॥ मीरा के प्रभु आन मिलें तो सब ही दुख बिसराई॥ मीरा दिन पर दिन दुबली होती जा रही थी। देह का वर्ण फीका हो गया, मानों हिमदाह से मुरझाई कुमुदिनी हो। वीरकुवंरी जी ने पिता रतनसिंह को बताया तो उन्होंने वैद्य को भेजा। वैद्य जी ने निरीक्षण करके बताया - "बाईसा को कोई रोग नहीं, केवल दुर्बलता है।" वैद्य जी गये तो मीरा मन ही मन में कहने लगी - "यह वैद्य तो अनाड़ी है, इसको मेरे रोग का मर्म क्या समझ में आयेगा।" मीरा ने इकतारा लिया और अपने ह्रदय की सारी पीड़ा इस पद में उड़ेल दी - ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दरद न जाणे कोय। सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस विध होय। गगन मँडल पर सेज पिया की, किस विध मिलना होय॥ घायल की गति घायल जाणे, जो कोई घायल होय। जौहर की गति जौहरी जाणे, और न जाणे कोय॥ दरद की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिल्या नहीं कोय। मीरा की प्रभु पीर मिटै जब, वैद साँवरिया होय॥ - पुस्तक- "मीरा चरित" लेखिका:- आदरणीय सौभाग्य कुँवरी राणावत ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ। बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया। माता भी गरीब थी। इसलिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई। उन्हें मामा के पास भेज दिया गया। मामा तारापीठ के पास के गांव में रहते थे। जैसा कि आमतौर पर अनाथ बच्चों के साथ होता है दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। धीरे धीरे वामाचरण की रुचि बाबाओं की तरफ होने लगी। गांव के मशान में आने वाले बाबाओं की संगत में रहते रहते बामाचरण में भी देवी के प्रति रुझान बढ़ने लगा। अब वह तारा माई को बड़ी माँ कहते और अपनी मां को छोटी माँ। बामा चरण कभी श्मशान में जलती चिता के पास जाकर बैठ जाता कभी यूं ही हवा में बातें करता रहता। ऐसे ही वह युवावस्था तक पहुंच गया। उसकी हरकतों की वजह से उसका नाम बामाचरण से वामा खेपा पड़ चुका था। खेपा का मतलब होता है पागल। यानी गांव वाले उसको आधा पागल समझते थे। उसके नाम के साथ उन्होंने पागल उपनाम जोड़ दिया था। वे यह नहीं जानते थे कि वस्तुत: कितनी उच्च कोटि का महामानव उनके साथ है। वह भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। मंगलवार का दिन था। भगवती तारा की सिद्धि का परम सिद्ध मुहूर्त। रात का समय था। बामाखेपा जलती हुई चिता के बगल में श्मशान में बैठा हुआ था तभी नीले आकाश से ज्योति फूट पड़ी और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। उसी प्रकाश में वामाचरण को माँ तारा के दर्शन हुए। कमर में बाघ की खाल पहने हुए ,एक हाथ में कैंची लिए, एक हाथ में खोपड़ी लिए,एक हाथ में नीले कमल का पुष्प लिए, एक हाथ में खड्ग लिए हुए, महावर लगे सुंदर पैरो में पायल पहने हुए, खुले हुए कमर तक बिखरे केश से युक्त, परम ब्रह्मांड की स्वामिनी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति, नील वर्णी, मंद मंद मुसकाती माँ तारा, वामाखेपा के सामने खड़ी थी……. वामाखेपा उस भव्य और सुंदर देवी को देखकर खुशी से भर गए। माता ने उसके सर पर हाथ फेरा और बामाखेपा वही समाधिस्थ हो गए। 3 दिन और 3 रात उसी समाधि की अवस्था में वे श्मशान में रहे। 3 दिन के बाद उन्हें होश आया और होश आते ही वह मां मां चिल्लाते हुए इधर उधर दौडने लगे। अब गांव वालों को पूरा यकीन हो गया कि बामा पूरा पागल हो गया है। बामा की यह स्थिति महीने भर रही .... कुछ दिन बाद वहां की रानी जी को सपने में भगवती तारा ने दर्शन दिए और निर्देश दिया कि मसान के पास मेरे लिए मंदिर का निर्माण करो और बामा को पुजारी बनाओ। अगले दिन से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया। कुछ ही दिनों में मंदिर बनकर तैयार हो गया और बामा को मंदिर का पुजारी बना दिया गया। बामा बेहद खुश हो गए क्योंकि उनकी बड़ी मां अब उनके साथ थीं। रानी के द्वारा बनाया मंदिर अर्थात मोटे चढ़ावे की संभावना। अब ऐसे मंदिर में एक आधे पागल को पुजारी बनाना बहुत से पण्डों को रास नहीं आया। वे बामाखेपा को निपटाने का मार्ग खोजते रहते थे। बामाखेपा की हरकतें अजीब अजीब हुआ करती थी। कई बार वह दिन भर पूजा करता। कई बार 2-2, 3-3 दिन तक पूजा ही नहीं करता। कभी देवी को माला पहनाता कभी खुद पहन लेता। इनमें से कोई भी प्रक्रम पंडों के हिसाब से शास्त्रीय पूजन विधि से मैच नहीं खाता था। यह बात उनको खटक रही थी। फिर एक दिन ऐसा हुआ कि प्रसाद बना और प्रसाद बनने के बाद जब मंदिर में पहुंचा तो देवी को भोग लगाने से पहले वामा चरण के मन में विचार आया, कि इसे चख कर देख लो यह माता के खाने के लायक है भी कि नहीं? बस फिर क्या था उन्होंने प्रसाद की थाली में हाथ डाला और चखने के लिए अपने मुंह में डाल लिया। चखने के बाद जब सही लगा तो बाकी प्रसाद उन्होंने माई को अर्पित कर दिया। इतना बड़ा अवसर पंडे कहाँ छोड़ते। उन्होंने बवाल मचा दिया कि, देवी के प्रसाद को बामा ने खा लिया है। उसे जूठा कर दिया है। झूठा प्रसाद देवी को चढ़ा दिया है। अब देवी रुष्ट हो जाएगी, उसका प्रकोप सारे गांव को झेलना पड़ेगा। उसके बाद भीड़तंत्र का बोलबाला हुआ और गांव वालों ने मिलकर पंडों के साथ बामाचरण की कस कर पिटाई कर दी। उसे श्मशान में ले जाकर फेंक दिया। मंदिर पर पण्डों का कब्जा हो गया। उन्होंने शुद्धीकरण और तमाम प्रक्रियाएं की। उस दिन पूजन पण्डों के अनुसार संपन्न हुआ। उधर बामाखेपा को होश आया तो वह माई पर गुस्सा हो गया - मैंने गलत क्या किया जो तूने मुझे पिटवा दिया। तुझे देने से पहले खाना स्वादिष्ट है या नहीं देख रहा था। इसमें मेरी गलती क्या थी ? मैं तो तुम्हें स्वादिष्ट भोग लगाने का प्रयास कर रहा था और चाहता था कि तुझे अच्छे स्वाद का प्रसाद ही मिले। अगर स्वाद गड़बड़ होता तो उसे फेककर दूसरा बनवाता। लेकिन तूने बेवजह मुझे पिटवाया जा मैं अब तेरे पास नही आऊंगा। मसान घाट पर बैठकर बामाचरण ने मां को सारी बातें सुना दी और वहां से उठकर चला गया जंगल की ओर। जंगल में जाकर एक गुफा में बैठ गया। यह स्थिति बिलकुल वैसे ही थी जैसे अपनी मां से रूठ कर बच्चे किसी कोने में जाकर छुप जाते हैं। बामाचरण और तारा माई के बीच में मां और बेटे जैसा रिश्ता था। यह रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था जैसे एक अबोध शिशु और उसकी मां की बीच में होता है। अपने शिशु की व्यथा तारा माई को सहन नहीं हुई। उसी रात रानी के स्वप्न में माई प्रकट हुई। क्रोधित माई ने रानी को फटकार लगाई - तेरे पण्डों ने मेरे पुत्र को बुरी तरह से मारा है। मैं तेरा मंदिर छोड़ कर जा रही हूं। अब तुझे और तेरे राज्य को मेरा प्रकोप सहना पड़ेगा, अगर उससे बचना चाहती है तो कल के कल मेरे पुत्र को वापस लाकर मंदिर में पूजा का भार सौंप, वरना प्रतिफल भुगतने के लिए तैयार रह। एक तो तारा माई का रूप ऐसे ही भयानक है। क्रोधित अवस्था में तो सीधी सरल माता भी काली से कम नहीं दिखाई देती। क्रोधित माई का स्वरूप व्याख्या से परे था। रानी हड़बड़ा कर पलंग पर उठ बैठी। रानी के लिए रात बिताना भी मुश्किल हो गया। उसने सारी रात जागकर बिताई। अगले दिन अपने सेवकों को दौड़ाया और मामले का पता लगाने के लिए कहा। जैसे ही पूरी जानकारी प्राप्त हुई रानी अपने लाव लश्कर के साथ मंदिर पहुंच गई । सारे पण्डों को कसकर फटकार लगाई और मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया। अपने सेवकों को आदेश दिया कि जैसे भी हो बामाखेपा को पकड़कर लाओ। अब सारे सेवक चारों तरफ बामाखेपा की खोज में लग गए। एक सेवक को गुफा में बैठा हुआ बामाखेपा मिल गया। बड़ी मनोव्वल के बाद भी वह नहीं माना सेवक ने जाकर रानी को बात बताई। अंततः रानी खुद गुफा तक पहुंची। बामा ने उनपर भी अपना गुस्सा उतारा - आप के कहने पर मैं पूजा कर रहा था और मुझे देखो इन लोगों ने कितना मारा। उनकी बाल सुलभ सहजता को देखकर रानी का नारी हृदय भी ममत्व से भर गया। उनकी समझ में आ गया कि तारा माई का मातृत्व इस बामाखेपा के प्रति क्यों है?? उन्होंने फरमान जारी कर दिया - इस मंदिर का पुजारी बामाखेपा है। उसकी जैसी मर्जी हो जैसी विधि वह करना चाहे उस प्रकार से पूजा करने के लिए वह स्वतंत्र है। कोई भी उसके मार्ग में आएगा तो दंड का भागी होगा। यह मंदिर बामाखेपा का है और तारा माई भी बामाखेपा की है। वह जिस विधान को सही समझे, उस विधान से पूजा करेगा और वही विधान यहां पर सही माना जाएगा। बामाखेपा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई। मां और बेटे का मिलन हो चुका था। मंदिर व्यवस्था फिर से बामाखेपा के हिसाब से चलने लगी । ऐसा माना जाता है कि तारा माई खुद बामाखेपा के हाथ से प्रसाद ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत ढंग से बामाखेपा तारा माई के पूजन करते जिसका कोई नियम नहीं था । कभी सुबह 4 बजे पूजा चल रही है तो कभी दोपहर 12 बजे तक पूजा प्रारंभ नहीं होती। क़भी रात भर पूजा चल रही है तो कभी पूरे दिन भर मंदिर की ओर बामाखेपा के दर्शन ही नहीं होते थे। उनकी पूजन विधि लोगों को पसंद नहीं थी ,लेकिन उनके पास कोई उपाय नहीं था , क्योंकि रानी का फरमान था। बामाखेपा अपनी मस्ती में जीते थे और लोग उन्हें नीचा दिखाने का रास्ता खोजते। एक दिन बामाखेपा की मां का निधन हो गया। नदी में बाढ़ थी। नदी के उस पार गांव था। बामा जिद पर अड़ गए छोटी मां का दाह संस्कार बड़ी मां के पास वाले शमशान में किया जाएगा। गांव वाले बाढ़ वाली नदी को पार करने में जान का खतरा है यह जानते थे , लेकिन बामा को समझाना किसी के बस की बात नहीं। नाव वाले से बामा ने देह को नदी के पार पहुंचाने की बात की। नाव वाले ने साफ इंकार कर दिया। बामा ने नाव देने के लिए कहा। नाव वाला हाथ जोड़कर बोला - बामा यही मेरे जीवन का सहारा है अगर बाढ़ में यह बह गया तो मैं घर कैसे चलाउँगा ? बामा के चेहरे में रहस्यमई मुस्कान बिखर गई। जैसे उन्होंने कोई निर्णय ले लिया हो। उन्होंने अपनी माता के शव को उठाया और खुद नदी पर चलते हुए इस पार पहुंच गए। गांव वाले आंखें फाड़े उस दृश्य को देखते रह गए । बामा की इच्छा के अनुसार ही उन्होंने माई के मंदिर के पास वाले श्मशान में अपनी मां का दाह संस्कार संपन्न किया । मृत्यु भोज के लिए आसपास के सारे गांव में जितने लोग हैं, सभी को निमंत्रित करने के लिए बामाखेपा ने अपने घर के लोगों और आसपास के लोगों को कहा। सब इसे बामाखेपा का पागलपन समझकर शांत रहें। जिसके पास दो वक्त की रोटी का पता नहीं वह आसपास के 20 गांव को खाना कैसे खिलाएंगा यह उनके लिए कल्पना से भी परे की बात थी। जब कोई भी निमंत्रण देने जाने को तैयार नहीं हुआ तो बामाखेपा अकेले निकल पड़े । उन्होंने आसपास के 20 गांवों में हर किसी को मृत्यु भोज के लिए आमंत्रित कर लिया । सारे गांव वाले यह देखने के लिए तारापीठ पहुंचने लगे कि देखा जाए यह पगला किस प्रकार से इतने सारे लोगों को मृत्यु भोज कराता है। गांव वालों की आंखें उस समय फटी की फटी रह गई जब सुबह से बैल गाड़ियों में भर-भर कर अनाज सब्जी आदि तारापीठ प्रांगण में आने लगी। बैलगाड़ियों का पूरा एक काफिला मंदिर के पास पहुंच गया। अनाज और सब्जियों का ढेर लग गया। जो लोग आए थे उन्होंने खाना बनाना भी प्रारंभ कर दिया । दोपहर होते-होते सुस्वादु भोजन की गंध से पूरा इलाका महक रहा था । प्रकृति भी अपना परीक्षण कब छोड़ती है, आसमान में बादल छाने लगे। प्रकृति ने भी उग्र रूप धारण कर लिया। बिजली कड़कने लगी। हवाएं चलने लगी और जोरदार बारिश के आसार नजर आने लगे। बामाखेपा अपनी जगह से उठे और जिस जगह पर श्राद्ध भोज होना था , उस पूरे जगह को बांस के डंडे से एक घेरा बनाकर घेर दिया। घनघोर बारिश शुरू हो गई लेकिन घेरे के अंदर एक बूंद पानी भी नहीं गिरी। गांव वाले देख सकते थे कि वे जहां बैठकर भोजन कर रहे हैं वह पूरा हिस्सा सूखा हुआ है, और उस घेरे के बाहर पानी की मोटी मोटी बूंदें बरस रही है । जमीन से जल धाराएं बह रही हैं । वह पूरा इलाका जिसमें भोज का आयोजन था ,पूरी तरह से सूखा हुआ था। 20 गांव से आए हुए सभी लोगों ने छक कर भोजन किया । हर कोई तृप्त हो गया। अब बारी थी वापस अपने अपने गांव जाने की। घनघोर बारिश को देखते हुए वापस जाने के लिए दिक्कत आएगी यह सोचकर सभी चिंतित थे। बामाखेपा ने माई से अनुरोध किया और कुछ ही क्षणों में आसमान पूरी तरह से साफ हो गया। सारे लोग बड़ी सहजता से वापस अपने अपने गांव तक पहुंच गए। इस घटना के बाद बामाखेपा की अलौकिकता के बारे में लोगों में चर्चा शुरू हो गयी। धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बामाखेपा की तारा पीठ में बढ़ने लगी और सभी की मनोकामना तारापीठ में पूरी होने लगी। अल्पायु में ही वामाखेपा को अथाह सिद्धियाँ प्राप्त हुई और वे धरा पर पूज्य हुए। बामाखेपा कभी भी बिना चखे माई को भोजन नहीं कराते थे। माई स्वयं अपने हाथ से उनको भोजन खिलाती थी और उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत महामानव बामाखेपा अपने अंत समय में माई की प्रतिमा में ही लीन हो गए। ⚘᠂ ⚘ ˚ ⚘ ᠂ ⚘ ᠃जय माता दी᠃ ⚘᠂ ⚘ ˚ ⚘ ᠂ ⚘ 💖´ *•.¸♥¸.•**कुमार रौनक कश्यप**•.¸♥¸.•*´💖

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 207 स्कन्ध - 09 अध्याय - 24 (अन्तिम) इस अध्याय में:- विदर्भ के वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा विदर्भ की भोज्या नामक पत्नी से तीन पुत्र हुए- कुश, क्रथ और रोमपाद। रोमपाद विदर्भ वंश में बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए। रोमपाद का पुत्र बभ्रु, बभ्रु का कृति, कृति का उशिक और उशिक का चेदि। राजन! इस चेदि के वंश में ही दमघोष और शिशुपाल आदि हुए। क्रथ का पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्ति का धृष्टि, धृष्टि का निर्वृति, निर्वृति का दशार्ह और दशार्ह का व्योम। व्योम का जीमूत, जीमूत का विकृति, विकृति का भीमरथ, भीमरथ का नवरथ और नवरथ का दशरथ। दशरथ से शकुनि, शकुनि से करम्भि, करम्भि से देवरात, देवरात से देवक्षत्र, देवक्षत्र से मधु, मधु से कुरुवश और कुरुवश से अनु हुए। अनु से पुरुहोत्र, पुरुहोत्र से आयु और आयु से सात्वत का जन्म हुआ। परीक्षित! सात्वत के सात पुत्र हुए- भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमान की दो पत्नियाँ थीं, एक से तीन पुत्र हुए- निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्नी से भी तीन पुत्र हुए- शताजित, सहस्रजित् और अयुताजित। देवावृध के पुत्र का नाम था बभ्रु। देवावृध और बभ्रु के सम्बन्ध में यह बात कही जाती है- ‘हमने दूर से जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकट से देखते भी हैं। बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओं के समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृध से उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वत के पुत्रों में महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसी के वंश में भोजवंशी यादव हुए। परीक्षित! वृष्णि के दो पुत्र हुए- सुमित्र और युधाजित्। युधाजित् के शिनि और अनमित्र-ये दो पुत्र थे। अनमित्र से निम्न का जन्म हुआ। सत्रजित् और प्रसेन नाम से प्रसिद्ध यदुवंशी निम्न के ही पुत्र थे। अनमित्र का एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि। शिनि से ही सत्यक का जन्म हुआ। इसी सत्यक के पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकि के नाम से प्रसिद्ध हुए। सात्यकि का जय, जय का कुणि और कुणि का पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। वृष्णि के दो पुत्र हुए- श्वफल्क और चित्ररथ। श्वफल्क की पत्नी का नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर के अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्न हुए- आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूर के दो पुत्र थे- देववान् और उपदेव। श्वफल्क के भाई चित्ररथ के पृथु विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए-जो वृष्णिवंशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। सात्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुर का पुत्र वह्नि, वह्नि का विलोमा, विलोमा का कपोतरोमा और कपोतरोमा का अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्व के साथ अनु की बड़ी मित्रता थी। अनु का पुत्र अन्धक, अन्धक का दुन्दुभि, दुन्दुभि का अरिद्योत, अरिद्योत का पुनर्वसु और पुनर्वसु के आहुक नाम का एक पुत्र तथा आहुकी नाम की एक कन्या हुई। आहुक के दो पुत्र हुए- देवक और उग्रसेन। देवक के चार पुत्र हुए- देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं- धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेव जी ने इन सबके साथ विवाह किया था। उग्रसेन के नौ लड़के थे- कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान। उग्रसेन के पाँच कन्याएँ भी थीं- कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू और राष्ट्रपालिका। इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेव जी के छोटे भाइयों से हुआ था। चित्ररथ के पुत्र विदूरथ से शूर, शूर से भजमान, भजमान से शिनि, शिनि से स्वयम्भोज और स्वयम्भोज से हृदीक हुए। हृदीक से तीन पुत्र हुए- देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा। देवमीढ के पुत्र शूर की पत्नी का नाम था मारिषा। उन्होंने उसके गर्भ से दस निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये- वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेव जी के जन्म के समय देवताओं के नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनन्ददुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्ण के पिता हुए। वसुदेव आदि की पाँच बहनें भी थीं- पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेव के पिता शूरसेन के एक मित्र थे- कुन्तिभोज। कुन्तिभोज के कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेन ने उन्हें पृथा नाम की अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी। पृथा ने दुर्वासा ऋषि को प्रसन्न करके उनसे देवताओं को बुलाने की विद्या सीख ली। एक दिन उस विद्या के प्रभाव की परीक्षा लेने के लिये पृथा ने परम पवित्र भगवान् सूर्य का आवाहन किया। उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर कुन्ती का हृदय विस्मय से भर गया। उसने कहा- ‘भगवन! मुझे क्षमा कीजिये। मैंने तो परीक्षा करने के लिये ही इस विद्या का प्रयोग किया था। अब आप पधार सकते हैं’। सूर्यदेव ने कहा- ‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिय हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा।' यह कहकर भगवान सूर्य ने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुआ। वह देखने में दूसरे सूर्य के समान जान पड़ता था। पृथा लोकनिन्दा से डर गयी। इसलिये उसने बड़े दुःख से उस बालक को नदी के जल में छोड़ दिया। परीक्षित! उसी पृथा का विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डु से हुआ था, जो वास्तव में बड़े सच्चे वीर थे। परीक्षित! पृथा की छोटी बहिन श्रुतदेवा का विवाह करुष देश के अधिपति वृद्धशर्मा से हुआ था। उसके गर्भ से दन्तवक्त्र का जन्म हुआ। यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्व जन्म में सनकादि ऋषियों के शाप से हिरण्याक्ष हुआ था। कैकय देश के राजा धृष्टकेतु ने श्रुतकीर्ति से विवाह किया था। उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए। राजाधिदेवी का विवाह जयसेन से हुआ था। उसके दो पुत्र हुए- विन्द और अनुविन्द। वे दोनों ही अवन्ती के राजा हुए। चेदिराज दमघोष ने श्रुतश्रवा का पाणिग्रहण किया। उसका पुत्र था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले (सप्तम स्कन्ध में) कर चुका हूँ। वसुदेव जी के भाइयों में से देवभाग की पत्नी कंसा के गर्भ से दो पुत्र हुए- चित्रकेतु और बृहद्बल। देवश्रवा की पत्नी कंसवती से सुवीर और इषुमान नाम के दो पुत्र हुए। आनक की पत्नी कंका के गर्भ से भी दो पुत्र हुए- सत्यजित और पुरुजित। सृंजय ने अपनी पत्नी राष्ट्रपालिका के गर्भ से वृष और दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। इसी प्रकार श्यामक ने शूरभूमि (शूरभू) नाम की पत्नी से हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। मिश्रकेशी अप्सरा के गर्भ से वत्सक के भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृक ने दुर्वाक्षी के गर्भ से तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। शमीक की पत्नी सुदामिनी ने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि कई बालक उत्पन्न किये। कंक की पत्नी कर्णिका के गर्भ से दो पुत्र हुए- ऋतधाम और जय। आनकदुन्दुभि वसुदेव जी की पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत-सी पत्नियाँ थीं। रोहिणी के गर्भ से वसुदेव जी के बलराम, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे। पौरवी के गर्भ से उनके बारह पुत्र हुए- भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद और भद्र आदि। नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिरा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। कौसल्या ने एक ही वंश-उजागर पुत्र उत्पन्न किया था। उसका नाम था केशी। उसने रोचना से हस्त और हेमांगद आदि तथा इला से उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रों को जन्म दिया। परीक्षित! वसुदेव जी के धृतदेवा के गर्भ से विपृष्ठ नाम का एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवा से श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए। उपदेवा के पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवा के वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए। देवरक्षिता के गर्भ से गद आदि नौ पुत्र हुए तथा स्वयं धर्म ने आठ वसुओं को उत्पन्न किया था, वैसे ही वसुदेव जी ने सहदेवा के गर्भ से पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्न किये। परम उदार वसुदेव जी ने देवकी के गर्भ से भी आठ पुत्र उत्पन्न किये, जिसमें सात के नाम हैं- कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलराम जी। उन दोनों के आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे। परीक्षित! तुम्हारी परासौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकी जी की ही कन्या थीं। जब-जब संसार में धर्म का ह्रास और पाप की वृद्धि होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं। परीक्षित! भगवान् सब के द्रष्टा और वास्तव में असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमाया के अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्म का और कोई भी कारण नहीं है। उनकी माया का विलास ही जीव के जन्म, जीवन और मृत्यु का कारण है। और उनका अनुग्रह ही माया को अलग करके आत्मस्वरूप को प्राप्त करने वाला है। जब असुरों ने राजाओं का वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वी को रौंदने लगे, तब पृथ्वी का भार उतारने के लिये भगवान् मधुसूदन बलराम जी के साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्ध में बड़े-बड़े देवता मन से अनुमान भी नहीं कर सकते-शरीर से करने की बात तो अलग रही। पृथ्वी का भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुग में पैदा होने वाले भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये भगवान् ने ऐसे परम पवित्र यश का विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करने से ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जायेंगे। उनका यश क्या है, लोगों को पवित्र करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतों के कानों के लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कान की अंजलियों से उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्म की वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं। परीक्षित! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान की लीलाओं की आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे। उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था। उन्होंने उस मनोहर विग्रह से तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीला के द्वारा सारे मनुष्य लोक को आनन्द में सराबोर कर दिया था। भगवान् के मुखकमल की शोभा तो निराली ही थी। मकराकृति कुण्डलों से उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे। उनकी आभा से कपोलों का सौन्दर्य और भी खिल उठता था। जब वे विलास के साथ हँस देते, तो उनके मुख पर निरन्तर रहने वाले आनन्द में मानो बाढ़-सी आ जाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रों के प्यालों से उनके मुख की माधुरी का निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते। वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरने से उनके गिराने वाले निमि पर खीझते भी। लीला पुरुषोत्तम भगवान अवतीर्ण हुए मथुरा में वसुदेव जी के घर, परन्तु वहाँ वे रहे नहीं, वहाँ से गोकुल में नन्दबाबा के घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन-जो ग्वाल, गोपी और गौओं को सुखी करना था-पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रज में, मथुरा में तथा द्वारका में रहकर अनेकों शत्रुओं का संहार किया। बहुत-सी स्त्रियों से विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही लोगों में अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियों की मर्यादा स्थापित करने के लिये अनेक यज्ञों के द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया। कौरव और पाण्डवों के बीच उत्पन्न हुए आपस के कलह से उन्होंने पृथ्वी का बहुत-सा भार हलका कर दिया और युद्ध में अपनी दृष्टि से ही राजाओं की बहुत-सी अक्षौहिणियों को ध्वंस करके संसार में अर्जुन की जीत का डंका पिटवा दिया। फिर उद्धव को आत्मतत्त्व का उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधाम को सिधार गये। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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. "तीन प्रश्न" एक बार एक राजा था। एक दिन वह बड़ा प्रसन्न मुद्रा में था सो अपने मन्त्री के पास गया और कहा कि तुम्हारी जिंदगी की सबसे बड़ी इच्छा क्या है ? मन्त्री शरमा गया और आँखें नीचे करके बैठ गया। राजा ने कहा तुम घबराओ मत तुम अपनी सबसे बड़ी इच्छा बताओ। मन्त्री ने राजा से कहा सरकार आप इतनी बड़ी राज्य के मालिक हैं और जब भी मैं यह देखता हूँ तो मेरे दिल में ये चाह जाग्रत होती हैं कि काश मेरे पास इस राज्य का यदि दसवां हिस्सा होता तो मैं इस दुनिया का बड़ा खुशनसीब इंसान होता। ये कह कर मन्त्री खामोश हो गया। राजा ने कहा कि यदि मैं तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँ तो। मन्त्री घबरा गया और आँखें ऊपर करके राजा से कहा कि सरकार ये कैसे सम्भव है ? मैं इतना खुशनसीब इंसान कैसे हो सकता हूँ। राजा ने दरबार में आधे राज्य के कागज तैयार करने की घोषणा की और साथ के साथ मन्त्री की गर्दन धड़ से अलग करने का ऐलान भी करवाया। ये सुनकर मन्त्री बहुत घबरा गया। राजा ने मन्त्री की आँखों में आँखे डालकर कहा - "तुम्हारे पास तीस दिन हैं, इन तीस दिनों में तुम्हें मेरे तीन प्रश्नों का उत्तर देना है। यदि तुम सफल हो जाओगे तो मेरा आधा राज्य तुम्हारा हो जायेगा और यदि तुम मेरे तीन प्रश्नों के उत्तर तीस दिन के भीतर न दे पाये तो मेरे सिपाही तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देंगे।" मन्त्री और ज्यादा परेशान हो गया। राजा ने कहा - "मेरे तीनों प्रश्न लिख लो", मन्त्री ने लिखना शुरु किया। राजा ने कहा - 1. इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई क्या है ? 2. इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा क्या है ? 3. इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है ? राजा ने तीनों प्रश्न समाप्त करके कहा तुम्हारा समय अब शुरु होता हैं। मन्त्री अपने तीनों प्रश्नों वाला कागज लेकर दरबार से रवाना हुआ और हर संतो-महात्माओं-साधुओं के पास जाकर उन प्रश्नों के उत्तर पूछने लगा। मगर किसी के भी उत्तरों से वह संतुष्ट न हुआ। धीरे-धीरे दिन गुजरते हुए जा रहे थे। अब उसके दिन-रात उन तीन प्रश्नों को लिए हुए ही गुजर रहे थे। हर एक-एक गाँवों में जाने से उसके पहने लिबास फट चुके थे और जूते के तलवे भी फटने के कारण उसके पैर में छाले पड़ गये थे। अंत में शर्त का एक दिन शेष रहा, मन्त्री हार चुका था तथा वह जानता था कि कल दरबार में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया जायेगा और ये सोचता-सोचता वह एक छोटे से गांव में जा पहुँचा। वहाँ एक छोटी सी कुटिया में एक साधु अपनी मौज में बैठा हुआ था और उसका एक कुत्ता दूध के प्याले में रखा दूध बड़े ही चाव से जीभ से जोर-जोर से आवाज़ करके पी रहा था। मन्त्री ने झोपड़ी के अंदर झाँका तो देखा कि साधु अपनी मौज में बैठकर सुखी रोटी पानी में भिगोकर खा रहा था। जब साधु की नजर मन्त्री की फटी हालत पर पड़ी तो मन्त्री से कहा कि - "आप सही जगह पहुँच गये हैं और मैं आपके तीनों प्रश्नों के उत्तर भी दे सकता हूँ।" मन्त्री हैरान होकर पूछने लगा - "आपने कैसे अंदाजा लगाया कि मैं कौन हूँ और क्या हैं मेरे तीन प्रश्न ?" साधु ने सूखी रोटी कटोरे में रखी और अपना बिस्तरा उठा कर खड़ा हुआ और मन्त्री से कहा - "अब आप समझ जायेंगे।" मन्त्री ने झुक कर देखा कि उसके वस्त्र वैसा ही थे जैसा राजा उस मन्त्री को भेंट दिया करता था। साधु ने मन्त्री से कहा मैं भी उस राज्य का मन्त्री हुआ करता था और राजा से शर्त लगा कर गलती कर बैठा। अब इसका नतीजा तुम्हारे सामने हैं। साधु फिर से बैठा और सूखी रोटी पानी में डूबो कर खाने लगा। मन्त्री निराश मन से साधु से पूछने लगा क्या आप भी राजा के प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाये थे। साधु ने कहा कि नहीं, मैने राजा के प्रश्नों के उत्तर भी दिये और आधे राज्य के कागज को वहीं फाड़कर इस कुटिया में मेरे कुत्ते के साथ रहने लगा। मन्त्री और ज्यादा हैरान हो गया और पूछा क्या तुम मेरे प्रश्न के उत्तर दे सकते हो ? साधु ने हाँ में सिर हिलाया और कहा मैं आपके दो प्रश्नों के उत्तर मुफ्त में दूँगा मगर तीसरे प्रश्न के उत्तर में आपको उसकी कीमत अदा करनी पड़ेगी। अब मन्त्री ने सोचा यदि राजा के प्रश्नों के उत्तर न दिये तो राजा मेरे सिर को धड़ से अलग करा देगा इसलिए उसने बिना कुछ सोचे समझे साधु की शर्त मान ली। साधु ने कहा तुम्हारे पहले प्रश्न का उत्तर है, "मौत"। इंसान के जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई मौत हैं। मौत अटल हैं और ये अमीर-गरीब, राजा-साधु किसी को नहीं देखती है। मौत निश्चित है। अब तुम्हारे दूसरे प्रश्न का उत्तर है, "जिंदगी"। इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा हैं जिंदगी। इंसान जिंदगी में झूठ-फरेब और बुरे कर्मं करके इसके धोखे में आ जाता है। अब आगे साधु चुप हो गया। मन्त्री ने साधु से वचन के अनुसार शर्त पूछी, तो साधु ने मन्त्री से कहा कि तुम्हें मेरे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीना होगा। मन्त्री असमंजस में पड़ गया और कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीने से इंकार कर दिया। मगर फिर राजा द्वारा रखी शर्त के अनुसार सिर धड़ से अलग करने का सोचकर बिना कुछ सोचे समझे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध बिना रुके एक ही सांस में पी गया। साधु ने उत्तर दिया कि यही तुम्हारे तीसरे प्रश्न का उत्तर हैं। "मजबूरी" इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी है "मजबूरी"। मजबूरी इंसान को न चाहते हुए भी वह काम कराती है जो इंसान कभी नहीं करना चाहता है। जैसे तुम ! तुम भी अपनी मौत से बचने के लिए और तीसरे प्रश्न का उत्तर जानने के लिए एक कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पी गये। मजबूरी इंसान से सब कुछ करा देती हैं। मगर अब मन्त्री बहुत प्रसन्न था क्योंकि उसके तीनों प्रश्नों के उत्तर उसे मिल गये थे। मन्त्री ने साधु को धन्यवाद किया और महल की ओर चल पड़ा। उसके मन के भय के साथ-साथ उसकी राज्य पाने की लालसा भी समाप्त हो चुकी थी। महल पहुँचकर उसने राजा के सभी प्रश्नों का सविस्तार उत्तर देकर राजा की शर्त को पूर्ण किया तथा जब राजा ने उसके आगे आधे राज्य के कागजात रखे तो उन्हें वह भी उसी साधु की भाँति फाड़कर राजा से बोला - "महाराज अब मुझमें राज्य को पाने की लालसा नहीं रही है अतः आप अपना राज्य स्वयं ही संभालिये तथा मुझे इस पदभार से मुक्त कर दीजिये।" राजा ने मन्त्री पर प्रसन्न होकर उसे उसके पदभार से मुक्त कर दिया। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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