*🔶🔹माता वैष्णो देवी की अमर कथा 🔹🔶* 🔸🔸🔹🔸🔸🔸🔹🔸🔸 वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं। माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा!!!!! मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। माता वैष्णो देवी की अन्य कथा!!!!! हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कई सालों से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुटा नाम दिया, परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण वैष्णवी नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ है भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी। जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे। तब समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतु कलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो। जब श्री राम ने रावण के विरुद्ध विजय प्राप्त किया तब मां ने नवरात्रमनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,,, 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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*🌸🔹देवी विंध्यवासिनी और कृष्ण के बीच रिश्ता 🔹🌸🙏* भगवान शंकर प्रथम तो भगवान श्रीकृष्ण अंतिम हैं। संपूर्ण हिन्दू धर्म इन दोनों के ही इर्द-गिर्द घुमता है। भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। अर्थात जो हर तरह से पूर्ण हैं और जो पूर्णत: विष्णु ही है। भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में सैंकड़ों रहस्य है लेकिन बहुत कम लोग ही उन सभी रहस्यों को जानते होंगे। एक रहस्य यह भी है कि माता विंध्यवासिनी भगवान श्रीकृष्ण की क्या लगती थीं? देवी विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण का नाता : भगवान् श्रीकृष्ण की परदादी मारिषा एवं सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) दोनों ही नाग जनजाति की थीं। भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था। भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है। इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं। इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी। श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई। कहते हैं कि योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे। हालांकि गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे। श्रीमद्भागवत पुरा में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है जबकि शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है। भारत में विंध्यवासिनी देवी का चमत्कारिक मंदिर विंध्याचल की पहाड़ी श्रृंखला के मध्य (मिर्जापुर, उत्तर) पतित पावनी गंगा के कंठ पर बसा हुआ है। प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां मां विंध्यवासिनी निवास करती हैं। यह तीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा तट पर स्थित है। यहां तीन किलोमीटर के दायरे में अन्य दो प्रमुख देवियां भी विराजमान हैं। निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। हालांकि कुछ विद्वान इस 51 शक्तिपीठों में शामिल नहीं करते हैं लेकिन 108 शक्तिपीठों में जरूर इनका नाम मिलता है। शिव पुराण अनुसार मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने आते हैं जहां संकल्प मात्र से साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है। मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं। *जय श्री कृष्ण 🙏🙏* *कुमार रौनक कश्यप 🙏🙏*

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. प्रभु से संवाद एक बेटी ने एक सन्त से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, उनके लिए प्रार्थना करें। बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते हैं। जब सन्त घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे। एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी। सन्त ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहाँ पहले से ही रख दी गई है। सन्त ने पूछा- मुझे लगता है कि आप मेरी ही उम्मीद कर रहे थे। पिता ने कहा- नहीं, आप कौन हैं ? सन्त ने अपना परिचय दिया और फिर कहा- मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था। पिता-ओह ये बात, खाली कुर्सी आपके लिए नहीं है, आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे ! सन्त को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया। पिता- दरअसल इस खाली कुर्सी का राज मैंने किसी को नहीं बताया, अपनी बेटी को भी नहीं। पूरी जिन्दगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है। मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता, वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते, कुछ पल्ले नहीं पड़ता था। मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया। लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला, उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है। उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो, फिर विश्वास करो कि वहाँ भगवान खुद ही विराजमान हैं, अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो। मैंने ऐसा करके देखा, मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर तो मैं रोज दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा। लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले। अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती। ये सब सुनकर सन्त ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की, सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा। सन्त को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था,इसलिए विदा लेकर चले गए। दो दिन बाद बेटी का सन्त को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे। सन्त ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई ? बेटी ने जवाब दिया-नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया, मेरा माथा प्यार से चूमा, ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे। लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी, वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो। सन्त जी, वो क्या था ? ये सुनकर सन्त की आँखों से आँसू बह निकले, बड़ी मुश्किल से बोल पाए काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊँ तो ऐसे ही जाऊँ। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 180 स्कन्ध - 08 अध्याय - 21 इस अध्याय में:- बलि का बाँधा जाना श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! भगवान का चरणकमल सत्यलोक में पहुँच गया। उनके नखचन्द्र की छटा से सत्यलोक की आभा फीकी पड़ गयी। स्वयं ब्रह्मा भी उसके प्रकाश में डूब-से गये। उन्होंने मरीचि आदि ऋषियों, सनन्दन आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारियों एवं बड़े-बड़े योगियों के साथ भगवान के चरणकमल की अगवानी की। वेद, उपवेद, नियम, यम, तर्क, इतिहास, वेदांग और पुराण-सहिंताएँ-जो ब्रह्मलोक में मूर्तिमान होकर निवास करते हैं-तथा जिन लोगों ने योगरूप वायु से ज्ञानाग्नि को प्रज्वलित करके कर्ममल को भस्म कर डाला है, वे महात्मा, सबने भगवान के चरण की वन्दना की। इसी चरणकमल के स्मरण की महिमा से ये सब कर्म के द्वारा प्राप्त न होने योग्य ब्रह्मा जी के धाम में पहुँचे हैं। भगवान ब्रह्मा की कीर्ति बड़ी पवित्र है। वे विष्णु भगवान के नाभिकमल से उत्पन्न हुए हैं। अगवानी करने के बाद उन्होंने स्वयं विश्वरूप भगवान के ऊपर उठे हुए चरण का अर्घ्यपाद्य से पूजन किया, प्रक्षालन किया। पूजा करके बड़े प्रेम और भक्ति से उन्होंने भगवान की स्तुति की। परीक्षित! ब्रह्मा के कमण्डलु का वही जल विश्वरूप भगवान के पाँव पखारने से पवित्र होने के कारण उन गंगाजी के रूप में परिणत हो गया, जो आकाशमार्ग से पृथ्वी पर गिरकर तीनों लोकों को पवित्र करती हैं। ये गंगाजी क्या हैं, भगवान की मूर्तिमान् उज्ज्वल कीर्ति। जब भगवान ने अपने स्वरूप को कुछ छोटा कर लिया, अपनी विभूतियों को कुछ समेट लिया, तब ब्रह्मा आदि लोकपालों ने अपने अनुचरों के साथ बड़े आदर भाव से अपने स्वामी भगवान को अनेकों प्रकार की भेंटें समर्पित कीं। उन लोगों ने जल-उपहार, माला, दिव्य गन्धों से भरे अंगराग, सुगन्धित धूप, दीप, खील, अक्षत, फल, अंकुर, भगवान की महिमा और प्रभाव से युक्त स्तोत्र, जयघोष, नृत्य, बाजे-गाजे, गान एवं शंख आदि दुन्दुभि के शब्दों से भगवान की आराधना की। उस समय ऋक्षराज जाम्बवान मन के समान वेग से दौड़कर सब दिशाओं में भेरी बजा-बजाकर भगवान की मंगलमय विजय की घोषणा कर आये। दैत्यों ने देखा कि वामन जी ने तीन पग पृथ्वी माँगने के बहाने सारी पृथ्वी ही छीन ली। तब वे सोचने लगे कि हमारे स्वामी बलि इस समय यज्ञ में दीक्षित हैं, वे तो कुछ कहेंगे नहीं। इसलिये बहुत चिढ़कर वे आपस में कहने लगे- ‘अरे, यह ब्राह्मण नहीं है। यह सबसे बड़ा मायावी विष्णु है। ब्राह्मण के रूप में छिपकर यह देवताओं का काम बनाना चाहता है। जब हमारे स्वामी यज्ञ में दीक्षित होकर किसी को किसी प्रकार का दण्ड देने के लिये उपरत हो गये हैं, तब इस शत्रु ने ब्रह्मचारी का वेष बनाकर पहले तो याचना की और पीछे हमारा सर्वस्व हरण कर लिया। यों तो हमारे स्वामी सदा ही सत्यनिष्ठ हैं, परन्तु यज्ञ में दीक्षित होने पर वे इस बात का विशेष ध्यान रखते हैं। वे ब्राह्मणों के बड़े भक्त हैं तथा उनके हृदय में दया भी बहुत है। इसलिये वे कभी झूठ नहीं बोल सकते। ऐसी अवस्था में हम लोगों का यह धर्म है कि इस शत्रु को मार डालें। इससे हमारे स्वामी बलि की सेवा भी होती है।’ यों सोचकर राजा बलि के अनुचर असुरों ने अपने-अपने हथियार उठा लिये। परीक्षित! राजा बलि की इच्छा न होने पर भी वे सब बड़े क्रोध से शूल, पट्टिश आदि ले-लेकर वामन भगवान को मारने के लिये टूट पड़े। परीक्षित! जब विष्णु भगवान के पार्षदों ने देखा कि दैत्यों के सेनापति आक्रमण करने के लिये दौड़े आ रहे हैं, तब उन्होंने हँसकर अपने-अपने शस्त्र उठा लिये और उन्हें रोक दिया। नन्द, सुनन्द, जय, विजय, प्रबल, बल, कुमुद, कुमुदाक्ष, विष्वक्सेन, गरुड़, जयन्त, श्रुतदेव, पुष्पदन्त और सात्वत- ये सभी भगवान के पार्षद दस-दस हजार हाथियों का बल रखते हैं। वे असुरों की सेना का संहार करने लगे। जब राजा बलि ने देखा कि भगवान के पार्षद मेरे सैनिकों को मार रहे हैं और वे भी क्रोध में भरकर उनसे लड़ने के लिये तैयार हो रहे हैं, तो उन्होंने शुक्राचार्य के शाप का स्मरण करके उन्हें युद्ध करने से रोक दिया। उन्होंने विप्रचित्ति, राहु, नेमि आदि दैत्यों को सम्बोधित करके कहा- ‘भाइयों! मेरी बात सुनो। लड़ो मत, वापस लौट आओ। यह समय हमारे कार्य के अनुकूल नहीं है। दैत्यों! जो काल समस्त प्राणियों को सुख और दुःख देने की सामर्थ्य रखता है-उसे यदि कोई पुरुष चाहे कि मैं अपने प्रयत्नों से दबा दूँ, तो यह उसकी शक्ति से बाहर है। जो पहले हमारी उन्नति और देवताओं की अवनति के कारण हुए थे, वही काल भगवान अब उनकी उन्नति और हमारी अवनति के कारण हो रहे हैं। बल, मन्त्री, बुद्धि, दुर्ग, मन्त्र, ओषधि और सामादि उपाय-इनमें से किसी भी साधन के द्वारा अथवा सबके द्वारा मनुष्य काल पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता। जब दैव तुम लोगों के अनुकूल था, तब तुम लोगों ने भगवान के इन पार्षदों को कई बार जीत लिया था। पर देखो, आज वे ही युद्ध में हम पर विजय प्राप्त करके सिंहनाद कर रहे हैं। यदि दैव हमारे अनुकूल हो जायेगा, तो हम भी इन्हें जीत लेंगे। इसलिये उस समय की प्रतीक्षा करो, जो हमारी कार्य-सिद्धि के लिये अनुकूल हो’। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अपने स्वामी बलि की बात सुनकर भगवान के पार्षदों से हारे हुए दानव और दैत्य सेनापति रसातल में चले गये। उनके जाने के बाद भगवान के हृदय की बात जानकर पक्षिराज गरुड़ ने वरुण के पाशों से बलि को बाँध दिया। उस दिन उनके अश्वमेध यज्ञ में सोमपान होने वाला था। जब सर्वशक्तिमान भगवान् विष्णु ने बलि को इस प्रकार बँधवा दिया, तब पृथ्वी, आकाश और समस्त दिशाओं में लोग ‘हाय-हाय!’ करने लगे। यद्यपि बलि वरुण के पाशों से बँधे हुए थे, उनकी सम्पत्ति भी उनके हाथों से निकल गयी थी-फिर भी उनकी बुद्धि निश्चयात्मक थी और सब लोग उनके उदार यश का गान कर रहे थे। परीक्षित! उस समय भगवान् ने बलि से कहा- ‘असुर! तुमने मुझे पृथ्वी के तीन पग दिये थे; दो पग में तो मैंने सारी त्रिलोकी नाप ली, अब तीसरा पग पूरा करो। जहाँ तक सूर्य की गरमी पहुँचती है, जहाँ तक नक्षत्रों और चन्द्रमा की किरणें पहुँचती हैं और जहाँ तक बादल जाकर बरसते हैं-वहाँ तक की सारी पृथ्वी तुम्हारे अधिकार में थी। तुम्हारे देखते-ही-देखते मैंने अपने एक पैर से भूर्लोक, शरीर से आकाश और दिशाएँ एवं दूसरे पैर से स्वर्लोक नाप लिया है। इस प्रकार तुम्हारा सब कुछ मेरा हो चुका है। फिर भी तुमने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे पूरा न कर सकने के कारण अब तुम्हें नरक में रहना पड़ेगा। तुम्हारे गुरु की तो इस विषय में सम्मति है ही; अब जाओ, तुम नरक में प्रवेश करो। जो याचक को देने की प्रतिज्ञा करके मुकर जाता है और इस प्रकार उसे धोखा देता है, उसके सारे मनोरथ व्यर्थ होते हैं। स्वर्ग की बात तो दूर रही, उसे नरक में गिरना पड़ता है। तुम्हें इस बात का बड़ा घमंड था कि मैं बड़ा धनी हूँ। तुमने मुझसे ‘दूँगा’-ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर धोखा दे दिया। अब तुम कुछ वर्षों तक इस झूठ का फल नरक में भोगो’। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 153 श्री शिवानन्द सेन की सहनशीलता न भवति भवति च न चिरं भवति चिरं चेत् फले विसंवादी। कोपः सत्पुरुषाणां तुल्यः स्नेहेन नीचानाम्॥ पहले तो महापुरुषों को क्रोध होता ही नहीं है यदि किसी विशेष कारणवश क्रोध हो भी जाय तो वह स्थायी नहीं रहता, क्षण भर में ही शान्त हो जाता है। यदि कोई ऐसा ही भारी कारण आ उपस्थित हुआ और महापुरुषों का कोप कुछ काल तक बना रहा तो उसका परिणाम सुखकारी ही होता है। महापुरुषों को बड़ा भारी कोप और नीच पुरुषों का अत्यधिक स्नेह दोनों बराबर ही हैं। बल्कि कुपुरुषों के प्रेम से सत्पुरुषों का क्रोध लाख दर्जे अच्छा है, किन्तु सत्पुरुषों के क्रोध को सहन करने की शक्ति सब किसी में नहीं होती है। कोई परम भाग्यवान क्षमाशील भगवद्भक्त ही महापुरुषों के क्रोध को बिना मन में विकार लाये सहन करने में समर्थ होते हैं और इसीलिये वे संसार में सुयश के भागी बनते हैं। क्योंकि शास्त्रों में मनुष्य का भूषण सुन्दर रूप बताया गया है, सुन्दर रूप भी तभी शोभा पाता है, जब उसके साथ सदगुण भी हों। सदगुणों का भूषण ज्ञान है और ज्ञान का भूषण क्षमा है।[2]चाहे मनुष्य कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो, उसमें कितने ही सदगुण क्यों न हों, उसका रूप कितना ही सुन्दर क्यों न हो, यदि उसमें क्षमा नहीं है, यदि वह लोगों के द्वारा कही हुई कड़वी बातों को प्रसन्नतापूर्वक सहन नहीं कर सकता तो उसका रूप, ज्ञान और सभी प्रकार के सदगुण व्यर्थ ही हैं। क्षमावान तो कोई शिवानन्द जी सेन के समान लाखों-करोड़ों में एक आध ही मिलेंगे। महात्मा शिवानन्द जी तो क्षमा के अवतार ही थे- इसे पाठक नीचे की घटना से समझ सकेंगे। पाठकों को यह तो पता ही है कि गौड़ीय भक्त रथ यात्रा को उपलक्ष्य बनाकर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ के अन्त में अपने स्त्री-बच्चों के सहित श्री जगन्नाथ पुरी में आते थे और बरसात के चार मास बिताकर अन्त में अपने-अपने घरों को लौट जाते थे। उन सबके लाने का, मार्ग में सभी प्रकार के प्रबन्ध करने का भार प्रभु ने शिवानन्द जी को ही सौंप दिया था। वे भी प्रतिवर्ष अपने पास से हजारों रुपये व्यय करके बड़ी सावधानी के साथ भक्तों को अपने साथ लाते थे। सबसे अधिक कठिनाई घाटों पर उतरने की थी। एक एक, दो-दो रुपये उतराई लेने पर भी घाट वाले यात्रियों को ठीक समय पर नहीं उतारते थे। यद्यपि महाप्रभु के देशव्यापी प्रभाव के कारण गौर भक्तों को इतनी अधिक असुविधा नहीं होती थी, फिर भी कोई कोई खोटी बुद्धि वाला घटवारिया इनसे कुछ-न-कुछ अड़ंगा लगा ही देता था। ये बड़े सरल थे, सम्पूर्ण भक्तों का भार इन्हीं के ऊपर था, इसलिये घटवारिया, पहले-पहल इन्हें ही पकड़ते थे। एक बार नीलाचंल आते समय पुरी के पास ही किसी घटवारिया ने शिवानन्द सेनजी को रोक रखा। वे भक्तों के ठहरने और खाने पीने का कुछ भी प्रबन्ध न कर सके। क्योंकि घटवारियों ने उन्हें वहीं बैठा लिया था। इससे नित्यानन्द जी को उनके ऊपर बड़ा क्रोध आया। एक तो वे दिन भर भूखे थे, दूसरे रास्ता चलकर आये थे, तीसरे भक्तों को निराश्रय भटकते देखने से उनका क्रोध उभड़ पड़ा। वे सेन महाशय करे भली बूरी बातें सुनाने लगे, उसी क्रोध के आवेश में आकर उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि- ‘इस शिवानन्द के तीनों पुत्र मर जाये, इसकी धन सम्पत्ति का नाश हो जाय, इसने हमारे तथा भक्तों के रहने और खाने पीने का कुछ भी प्रबन्ध नहीं किया।’ नित्यानन्द जी के क्रोध में दिये हुए ऐसे अभिशाप को सुनकर सेन महाशय की पत्नी को अत्यन्त ही दुःख हुआ, वे फूट फूट कर रोने लगीं। जब बहुत रात्रि बीतने पर घाटवालों से जैसे-तैसे पिण्ड छुड़ाकर शिवानन्द जी अपने बाल-बच्चों के समीप आये तब उनकी धर्मपत्नी ने रोते रोते कहा- 'गुसाईं ने क्रुद्ध होकर हमें ऐसा भयंकर शाप दे दिया है। हमने उनका ऐसा क्या बिगाड़ा था? अब भी वे क्रुद्ध हो रहे हैं, आप उनके पास न जायँ।’ शिवानन्द जी ने दृढ़ता के साथ पत्नी की बात की अवहेलना करते हुए कहा- ‘पगली कहीं की ! तू उन महापुरुष की महिमा क्या जाने? तेरे तीनों पुत्र चाहे अभी मर जायँ और धन सम्पत्ति की तो मुझे कुछ परवा नहीं। वह तो सब गुसाईं की ही है, वे चाहें तो आज ही सबको छीन लें। मैं अभी उनके पास जाऊँगा और उनके चरण पकड़कर उन्हें शान्त करूँगा।’ यह कहते हुए वे नित्यानन्द जी के समीप चले। उस समय भी नित्यानन्द जी का क्रोध शान्त नहीं हुआ था। वृद्ध शिवानन्द जी को अपनी ओर आते देखकर उनकी पीठ में उठकर जोरों से एक लात मारी। सेन महाशय ने कुछ भी नहीं कहा। उसी समय उनके ठहरने और खाने पीने की समुचित व्यवस्था करके हाथ जोड़े हुए कहने लगे- ‘प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हुआ, जिन चरणों की रज के लिये इन्द्रादि देवता भी तरसते हैं वही चरण आपने मेंरी पीठ से छुआये। मैं सचमुच कृतार्थ हो गया। गुसाईं ! अज्ञान के कारण मेरा जो अपराध हुआ हो, उसे क्षमा करें। मैं अपनी मूर्खतावश आपको क्रुद्ध करने का कारण बना- इस अपराध के लिये मैं लज्जित हूँ। प्रभो ! मुझे अपना सेवक समझकर मेरे समसत अपराधों को क्षमा करें और मुझ पर प्रसन्न हों।’ शिवानन्द जी की इतनी सहनयशीलता, ऐसी क्षमा और ऐसी एकान्तनिष्ठा को देखकर नित्यानन्द जी का हृदय भर आया। उन्होंने जल्दी से उठकर शिवानन्द जी को गले से लगाया और उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहने लगे-‘शिवानन्द ! तुम्हीं सचमुच प्रभु के परम कृपापात्र बनने योग्य हो। जिसमें इतनी अधिक क्षमा है वह प्रभु का अवश्य ही अन्तरंग भक्त बन सकता है।’ सचमुच नित्यानन्द जी का यह आशीर्वाद फलीभूत हुआ और प्रभु ने सेन महाशय के ऊपर अपार कृपा प्रदर्शित की। प्रभु ने अपने अच्छिष्ट महाप्रसाद को शिवानन्द जी के सम्पूर्ण परिवार के लिये भिजवाने की गोविन्द को स्वयं आशा दी। इनकी ऐसी ही तपस्या के परिणामस्वरूप तो कवि कर्णपूर-जैसे परम प्रतिभावान महाकवि और भक्त इनके यहाँ पुत्ररूप में उत्पन्न हुए। नित्यानन्द जी का ऐसा बर्ताव शिवानन्द जी सेन के भगिनी-पुत्र श्री कान्त को बहुत ही अरुचिकर प्रतीत हुआ। वह युवक था, शरीर में युवावस्था का नूतन रक्त प्रवाहित हो रहा था, इस बात से उसने अपने मामा का घोर अपमान समझा और इसकी शिकायत करने के निमित्त वह सभी भक्तों से अलग होकर सबसे पहले प्रभु के समीप पहुँचा। बिना वस्त्र उतारे ही वह प्रभु को प्रणाम करने लगा। इस पर गोविन्द ने कहा- श्री कान्त ! तुम यह शिष्टाचार के विरुद्ध बर्ताव क्यों कर रहे हो? अंगरखे को उतारकर तब साष्टांग प्रणाम किया जाता है। पहले वस्त्रों को उतार लो, रास्ते की थकान मिटा लो, हाथ-मुँह धो लो, तब प्रभु के सम्मुख प्रणाम करने जाना।’ किन्तु उसने गोविन्द की बात नहीं सुनी। प्रभु भी समझ गये अवश्य ही कुछ दाल में काला है, इसलिये उन्होंने गोविन्द से कह दिया- ‘श्री कान्त के लिये क्या शिष्टाचार और नियम, वह जो करता है ठीक ही है, इसे तुम मत रोका। इसी दशा में इसे बातें करने दो।’ इतना कहकर प्रभु उससे भक्तों के सम्बन्ध में बहुत सी बातें पूछने लगे। पुराने भक्तों की बात पूछकर प्रभु ने नवीन भक्तों के सम्बन्ध में पूछा कि अबके बाल भक्तों में से कौन-कौन आया है? प्रभु के पीछे जो बच्चे उत्पन्न हुए थे, वे सभी अबके अपनी अपनी माताओं के साथ प्रभु के दर्शनों की उत्कण्ठा से आ रहे थे। श्रीकान्त ने सभी बच्चों का परिचय देते हुए शिवानन्द जी के पुत्र परमानन्द दास का परिचय दिया और उसकी प्रखर प्रतिभा तथा प्रभु दर्शनों की उत्कण्ठा की भी प्रशंसा की। प्रभु उस बच्चे को देखने के लिये लालायित से प्रतीत होने लगे। इन सभी बातों में श्री कान्त नित्यानन्द जी की शिकायत करना भूल गये। इतने में ही सभी भक्त आ उपस्थित हुए। प्रभु ने सदा की भाँति सबका स्वागत-सत्कार किया और उन्हें रहने के लिये यथायोग्य स्थान दिलाकर सभी के प्रसाद की व्यवस्था करायी। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. "जीवन की ठक-ठक" एक आदमी घोड़े पर कहीं जा रहा था, घोड़े को जोर की प्यास लगी थी। कुछ दूर कुएँ पर एक किसान बैलों से "रहट" चलाकर खेतों में पानी लगा रहा था। मुसाफिर कुएँ पर आया और घोड़े को "रहट" में से पानी पिलाने लगा। पर जैसे ही घोड़ा झुककर पानी पीने की कोशिश करता, "रहट" की ठक-ठक की आवाज से डर कर पीछे हट जाता। फिर आगे बढ़कर पानी पीने की कोशिश करता और फिर "रहट" की ठक-ठक से डरकर हट जाता। मुसाफिर कुछ क्षण तो यह देखता रहा, फिर उसने किसान से कहा कि थोड़ी देर के लिए अपने बैलों को रोक ले ताकि रहट की ठक-ठक बन्द हो और घोड़ा पानी पी सके। किसान ने कहा कि जैसे ही बैल रूकेंगे कुएँ में से पानी आना बन्द हो जायेगा, इसलिए पानी तो इसे ठक-ठक में ही पीना पड़ेगा। ठीक ऐसे ही यदि हम सोचें कि जीवन की ठक-ठक (हलचल) बन्द हो तभी हम भजन, सन्ध्या, वन्दना आदि करेंगे तो यह हमारी भूल है। हमें भी जीवन की इस ठक-ठक (हलचल) में से ही समय निकालना होगा, तभी हम अपने मन की तृप्ति कर सकेंगे, वरना उस घोड़े की तरह हमेशा प्यासा ही रहना होगा। सब काम करते हुए, सब दायित्व निभाते हुए प्रभु सुमिरन में भी लगे रहना होगा, जीवन में ठक-ठक तो चलती ही रहेगी। ----------:::×:::--------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 179 स्कन्ध - 08 अध्याय - 20 इस अध्याय में:- भगवान वामन जी का विराट् रूप होकर दो ही पग से पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लेना श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन! जब कुलगुरु शुक्राचार्य ने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलि ने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानी से शुक्राचार्य जी के प्रति यों कहा। राजा बलि ने कहा- भगवन! आपका कहना सत्य है। गृहस्थाश्रम में रहने वालों के लिये वही धर्म है जिससे अर्थ, काम, यश और आजीविका में कभी किसी प्रकार बाधा न पड़े। परन्तु गुरुदेव! मैं प्रह्लाद जी का पौत्र हूँ और एक बार देने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अतः अब मैं धन लोभ से ठग की भाँति इस ब्राह्मण से कैसे कहूँ कि ‘मैं तुम्हें नहीं दूँगा’। इस पृथ्वी ने कहा है कि ‘असत्य से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है। मैं सब कुछ सहने में समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्य का भार मुझसे नहीं सहा जाता’। मैं नरक से, दरिद्रता से, दुःख के समुद्र से, अपने राज्य के नाश से और मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मण से प्रतिज्ञा करके उसे धोखा देने से डरता हूँ। इस संसार में मर जाने के बाद धन आदि जो-जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदि से ब्राह्मणों को भी संतुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्याग का लाभ ही क्या रहा? दधीचि, शिबि आदि महापुरुषों ने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणों का दान करके भी प्राणियों की भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओं को देने में सोच-विचार करने की क्या आवश्यकता है? ब्रह्मन! पहले युग में बड़े-बड़े दैत्यराजों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया है। पृथ्वी में उनका सामना करने वाला कोई नहीं था। उनके लोक और परलोक को तो काल खा गया, परन्तु उनका यश अभी पृथ्वी पर ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। गुरुदेव! ऐसे लोग संसार में बहुत हैं, जो युद्ध में पीठ न दिखाकर अपने प्राणों की बलि चढ़ा देते हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं, जो सत्पात्र के प्राप्त होने पर श्रद्धा के साथ धन का दान करें। गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचक की कामना पूर्ण करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभा की बात होती है। फिर आप-जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को दान करने से दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है। इसलिये मैं इस ब्रह्मचारी की अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा। महर्षे! वेदविधि के जानने वाले आप लोग बड़े आदर से यज्ञ-यागादि के द्वारा जिनकी आराधना करते हैं-वे वरदानी विष्णु ही इस रूप में हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छा के अनुसार इन्हें पृथ्वी का दान करूँगा। यदि मेरे अपराध न करने पर भी ये अधर्म से मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होने पर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मण का शरीर धारण किया है। यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। मुझे युद्ध में मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित ये कोई दूसरा ही हैं, तो मेरे बाणों की चोट से सदा के लिये रणभूमि में सो जायेंगे। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब शुक्राचार्य जी ने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरु के प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है, तब दैव की प्रेरणा से उन्होंने राजा बलि को शाप दे दिया-यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होने के कारण शाप के पात्र नहीं थे। शुक्राचार्य जी ने कहा- ‘मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानता है। तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है। तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा’। राजा बलि बड़े महात्मा थे। अपने गुरुदेव के शाप देने पर भी वे सत्य से नहीं डिगे। उन्होंने वामन भगवान् की विधिपूर्वक पूजा की और हाथ में जल लेकर तीन पग भूमि का संकल्प कर दिया। उसी समय राजा बलि की पत्नी विन्ध्यावली, जो मोतियों के गहनों से सुसज्जित थी, वहाँ आयी। उसने अपने हाथों वामन भगवान के चरण पखारने के लिये जल से भरा सोने का कलश लाकर दिया। बलि ने स्वयं बड़े आनन्द से उनके सुन्दर-सुन्दर युगल चरणों को धोया और उनके चरणों का वह विश्व पावन जल अपने सिर पर चढ़ाया। उस समय आकाश में स्थित देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण-सभी लोग राजा बलि के इस अलौकिक कार्य तथा सरलता की प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्द से उनके ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। एक साथ ही हजारों दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं। गन्धर्व, किम्पुरुष और किन्नर गान करने लगे- ‘अहो धन्य है! इन उदारशिरोमणि बलि ने ऐसा काम कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। देखो तो सही, इन्होंने जान-बूझकर अपने शत्रु को तीनों लोकों का दान कर दिया’। इसी समय एक बड़ी अद्भुत घटना घट गयी। अनन्त भगवान् का वह त्रिगुणात्मक वामन रूप बढ़ने लगा। वह यहाँ तक बढ़ा कि पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषि- सब-के-सब उसी में समा गये। ऋत्विज, आचार्य और सदस्यों के साथ बलि ने समस्त ऐश्वर्यों के एकमात्र स्वामी भगवान् के उस त्रिगुणात्मक शरीर में पंचभूत, इन्द्रिय, उनके विषय, अन्तःकरण और जीवों के साथ वह सम्पूर्ण त्रिगुणमय जगत् देखा। राजा बलि ने विश्वरूप भगवान के चरणतल में रसातल, चरणों में पृथ्वी, पिंडलियों में पर्वत, घुटनों में पक्षी और जाँघों में मरुद्गण को देखा। इसी प्रकार भगवान् के वस्त्रों में सन्ध्या, गुह्य-स्थानों में प्रजापतिगण, जघनस्थल में अपने सहित समस्त असुरगण, नाभि में आकाश, कोख में सातों समुद्र और वक्षःस्थल में नक्षत्र समूह देखे। उन लोगों को भगवान् के हृदय में धर्म, स्तनों में ऋत (मधुर) और सत्य वचन, मन में चन्द्रमा, वक्षःस्थल पर हाथों में कमल लिये लक्ष्मी जी, कण्ठ में सामवेद और सम्पूर्ण शब्दसमूह उन्हें दीखे। बाहुओं में इन्द्रादि समस्त देवगण, कानों में दिशाएँ, मस्तक में स्वर्ग, केशों में मेघमाला, नासिका में वायु, नेत्रों में सूर्य और मुख में अग्नि दिखायी पड़े। वाणी में वेद, रसना में वरुण, भौंहों में विधि और निषेध, पलकों में दिन और रात। विश्वरूप के ललाट में क्रोध और नीचे के ओठ में लोभ के दर्शन हुए। परीक्षित! उनके स्पर्श में काम, वीर्य में जल, पीठ में अधर्म, पदविन्यास में यज्ञ, छाया में मृत्यु, हँसी में माया और शरीर के रोमों में सब प्रकार की ओषधियाँ थीं। उनकी नाड़ियों में नदियाँ, नखों में शिलाएँ और बुद्धि में ब्रह्मा, देवता एवं ऋषिगण दीख पड़े। इस प्रकार वीरवर बलि ने भगवान् की इन्द्रियों और शरीर में सभी चराचर प्राणियों का दर्शन किया। परीक्षित! सर्वात्मा भगवान् में यह सम्पूर्ण जगत देखकर सब-के-सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये। इसी समय भगवान् के पास असह्य तेज वाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए मेघ के समान भयंकर टंकार करने वाला शारंग धनुष, बादल की तरह गम्भीर शब्द करने वाला पांचजन्य शंख, विष्णु भगवान् की अत्यन्त वेगवती कौमुदकी गदा, सौ चन्द्राकार चिह्नों वाली ढाल और विद्याधर नाम की तलवार, अक्षय बाणों से भरे दो तरकश तथा लोकपालों के सहित भगवान् के सुनन्द आदि पार्षदगण सेवा करने के लिये उपस्थित हो गये। उस समय भगवान की बड़ी शोभा हुई। मस्तक पर मुकुट, बाहुओं में बाजूबंद, कानों में मकराकृत कुण्डल, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न, गले में कौस्तुभ मणि, कमर में मेखला और कंधे पर पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। वे पाँच प्रकार के पुष्पों की बनी वनमाला धारण किये हुए थे, जिस पर मधुलोभी भौंरे गुंजार कर रहे थे। उन्होंने अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएँ घेर लीं; दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिये बलि की तनिक-सी भी कोई वस्तु न बची। भगवान का वह दूसरा पग ही ऊपर की ओर जाता हुआ महर्लोक, जनलोक और तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक में पहुँच गया। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 152 गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:। तीव्रेण भक्ति योगेन यजेत पुरुषं परम्॥ पाठकवृन्द राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी को तो भूले ही न होंगे। उनके राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक और वाणीनाथ आदि पाँच पुत्र थे, जिन्हें प्रभु पाँच पाण्डवों की उपमा दिया करते थे और भवानन्द जी का पाण्डु कहकर सम्मान और सत्कार किया करते थे। वाणीनाथ तो सदा प्रभु की सेवा में रहते थे। राय रामानन्द पहले विद्यानगर के शासक थे, पीछे से उस काम को छोड़कर वे सदा पुरी में ही प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट निवास किया करते थे और महाप्रभु को निरन्तर श्रीकृष्ण-कथा-श्रवण कराते रहते। उनके छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक ‘माल जाठ्या दण्डपाट’ नामक उड़ीसा राज्यान्तर्गत एक प्रान्त के शासक थे। ये बडत्रे शौकीन थे, इनका रहन सहन, ठाट बाट, सब राजसी ढंग का ही था। धन पारक जिस प्रकार प्रायः लोग विषयी बन जाते हैं, उसी प्रकार के ये विषयी बने हुए थे। विषयी लोगों की इच्छा सर्वभुक अग्नि के समान होती है, उसमें धनरूपी ईंधन कितना भी क्यों न डाल दिया जाय उसकरी तृप्ति नहीं होती। तभी तो विषयी पुरुषों को शास्त्रकारों ने अविश्वासी कहा है। विषयी लोगों के वचनों का कभी विश्वास न करना चाहिये। उनके पास कोई धरोहर की चीज रखकर फिर उसे प्राप्त करने की आशा व्यर्थ है। विषय होता ही तब है जब हृदय में अविवेक होता है और अविवेक में अपने-पराये या हानि-लाभ का ध्यान नहीं रहता। इसलिये विषयी पुरुष अपने को तो आपत्ति के जाल में फंसाता ही है, साथ ही अपने संसर्गियों को भी सदा क्लेश पहुँचाता रहता है। विषयियों का संसर्ग होने से किसे क्लेश नहीं हुआ है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है- दुर्वतसंगातिरनर्थपरम्पाराया हेतू: सतां भावति किं वचनीयमत्र। लंकेश्वरो हरति दाशरथे: कलत्रं प्राप्नोति बंधनमसौ किल सिंधुराज:॥ ‘इसमें विशेष कहने सुनने की बात ही क्या है ? यह तो सनातन की रीति चली आयी है कि विषयी पुरुषों से संसर्ग रचाने से अच्छे पुरुषों को भी क्लेश होता ही है। देखो, उस विषयी रावण ने तो जनकनन्दिनी सीता जी का हरण किया और बन्धन में पड़ा बेचारा समुद्र।’ साथियों के दुःख सुख का उपभोग सभी को करना होता है। वह सम्बन्धी नहीं जो सुख में सम्मिलित रहता है और दुःख में दूर हो जाता है। किन्तु एक बात है, यदि खोटे पुरुषों का सौभाग्यवश किसी महापुरुष से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। साधु पुरुष तो सदा विषयी पुरुषों से दूर ही रहते हैं, किन्तु विषयी किसी भी प्रकार से उनके शरणापन्न हो जाय, तो फिर उसका बेड़ा पार ही समझना चाहिये। महापुरुषों को यदि किसी के दुःख को देखकर दुःख भी होता है तो फिर वह उस दुःख से छूट ही जाता है, जब संसारी दुःख महापुरुषों की तनिक सी इच्छा से छूट जाते हैं, तब शुद्ध हृदय से और श्रद्धाभक्ति पूर्वक जो उसकी शरण में जाता है उसका कल्याण तो होगा ही- इसमें कहना ही क्या? राजा भवानन्द जी शुद्ध हृदय से प्रभु के भक्त थे। उनके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक महान विषयी थे। पिता का महाप्रभु के साथ सम्बन्ध था। इसी सम्बंध से उनका प्रभु के साथ थोड़ा-बहुत सम्बन्ध था। इस सम्बन्धी के सम्बन्ध संसर्ग के ही कारण वे सूली पर चढ़े हुए भी बच गये। महापुरुषों की महिमा ऐसी ही है। गोपीनाथ एक प्रदेश के शासक थे। सम्पूर्ण प्रान्त की आय उन्हीं के पास आती थी। वे उसमें से अपना नियत वेतन रखकर शेष रुपयों को राजदरबार में भेज देते थे। किन्तु विषयियों में इतना संयम कहाँ कि वे दूसरे के द्रव्य की परवा करें। हम बता ही चुके हैं कि अविवेक के कारण विषयी पुरुषों को बपने पराये का ज्ञान नहीं रहता। गोपीनाथ पट्टनायक भी राजकोष में भेजने वाले द्रव्य को अपने ही खर्च में व्यय कर देते। इस प्रकार उड़ीसा के महाराज के दो लाख रूपये उनकी ओर हो गये। महाराज ने इनसे अपने रुपये माँगे, किन्तु इनके पास रुपये कहाँ? उन्हें तो वेश्या और कलारों ने अपना बना लिया। गोपीनाथ ने महाराज से प्रार्थना की कि ‘मेरे पास नकद रूपये तो हैं नहीं। मेरे पास दस बीस घोड़े हैं कुछ और भी सामान है, इसे जितने में समझें ले लें, शेष रुपये मैं धीरे-धीेरे देता रहूँगा।’ महाराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और घोड़ों की कीमत निश्चय करने के निमित्त अपने एक लड़के को भेजा। वह राजकुमार बड़ा बुद्धिमान था, उसे घोड़ों की खूब परख थी, वह अपने दस-बीस नौकरों के साथ घोड़े की कीमत निश्चय करने वहाँ गया। राजकुमार का स्वभाव था कि वह ऊपर को सिर करके बार-बार इधर-उधर मुँह फिरा फिराकर बातें किया करता था। राजपुत्र था, उसे अपने राजपाट और अधिकार का अभिमान था, इसलिये कोई उसके सामने बोलता तक नहीं था। उसने चारों ओर घोड़ों को देख-भालकर मूल्य निश्चय करना आरम्भ किया। जिन्हें गोपीनाथ दो चार हजार के मूल्य का समझते थे, उनका उसने बहुत ही थोड़ा मूल्य बताया। महाराज गोपीनाथ को भवानन्द जी के सम्बन्ध से पुत्र की भाँति मानते थे, इसलिये वे बड़े ढ़ीठ हो गये थे। राजपुत्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे। जब राजपुत्र ने दो चार घोड़ों का ही इतना कम मूल्य लगाया तब गोपीनाथ से न रहा गया। उन्होंने कहा- ‘श्रीमान ! यह तो आप बहुत ही कम मूल्य लगा रहे हैं।’ राजपुत्र ने कुछ रोष के साथ कहा- ‘तुम क्या चाहते हो, दो लाख रुपये इन घोड़ों में ही बेबाक कर दें? जितने के होंगे उतने ही तो लगावेंगे।’ गोपीनाथ ने अपने रोष को रोकते हुए कहा- ‘श्रीमान ! घोड़े बहुत बढि़या नस्ल के हैं। इनता मूल्य तो इनके लिये बहुत ही कम है।’ इस बात पर कुपित होकर राजपुत्र ने कहा- ‘दुनिया भर के रद्दी घोड़े इकट्ठे कर रखे हैं और चाहते हैं इन्हें ही देकर दो लाख रूपयों से बेबाक हो जायँ। यह नहीं होने का। घोड़े जितने के होंगे, उतने के ही लगाये जायँगे।’ राजप्रसाद प्राप्त मानी गोपीनाथ अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके। उन्होंने राजपुत्र की उपेक्षा करते हुए धीरे से व्यंग्य के स्वर में कहा- ‘कम से कम मेरे ये घोड़े तुम्हारी तरह ऊपर मुँह उठाकर इधर उधर तो नहीं देखते।’ उनका भाव था कि तुम्हारी अपेक्षा घोड़ों का मूल्य अधिक है। आत्मसम्मानी राजपुत्र इस अपमान को सहन नहीं कर सका। वह क्रोध के कारण जलने लगा। उस समय तो उसने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि यहाँ हम कुछ कहें तो बात बढ़ जाय और महाराज न जाने उसका क्या अर्थ लगावें। शासन में अभी हम स्वतन्त्र नहीं हैं, यही सोचकर वह वहाँ से चुपचाप महाराज के पास चला गया। वहाँ जाकर उसने गोपीनाथ की बहुत सी शिकायतें करते हुए कहा- ‘पिताजी ! वह तो महाविषयी है, एक भी पैदा देना नहीं चाहता। उलटे उसने मेरा घोर अपमान किया है। उसने मेरे लिये ऐसी बुरी बात कही है, जिसे आपके सामने कहने में मुझे लज्जा आती है। सब लोगों के सामने वह मेरी एक सी निन्दा कर जाय? नौकर होकर उसका ऐसा भारी साहस? यह सब आपकी ही ढील का कारण है। उसे जब तक चाँग पर न चढ़ाया जायेगा तब तक रुपये वसूल नहीं होंगे, आप निश्चय समझिये।’ महाराज ने सोचा- ‘हमें तो रुपये मिलने चाहिये। सचमुच जब तक उसे भारी भय न दिखाया जायगा, तब तक वह रुपये नहीं देने का। एक बार उसे चाँग पर चढ़ाने की आज्ञा दे दें। सम्भव है इस भय से रुपये दे दे। नहीं तो पीछे उसे अपनी विशेष आज्ञा से छोड़ देंगे। भवानन्द के पुत्र को भला हम दो लाख रुपयों के पीछे चाँग पर थोड़े ही चढ़वा सकते हैं। अभी कह दें, इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायगा और रुपये भी सम्भवतया मिल ही जायँगे। यह सोचकर महाराज ने कह दिया- ‘अच्छा भाई, वही काम करो, जिससे उससे रुपये मिलें। चढ़वा दो उसे चाँग पर।’ बस, फिर क्या था। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को यहाँ बाँधकर लाया जाय। क्षण भर में उसकी आज्ञा पालन की गयी। गोपीनाथ बाँधकर चाँग के समीप खड़े किये गये। अब पाठकों को चाँग का परिचय दें कि यह चाँग क्या बला है। असल में चाँग एक प्रकार से सूली का ही नाम है। सूली में और चाँग में इतना ही अन्तर है कि सूली गुदा में होकर डाली जाती है और सिर में होकर पार निकाल ली जाती है। इससे जल्दी प्राण नहीं निकलते- बहुत देर में तड़प तड़प कर प्राण निकलते हैं। चाँग उससे कुछ सुखकर प्राण नाशक क्रिया है। एक बड़ा सा मंच होता है। उस मंच के नीचे भाग में तीक्ष्ण धार वाला एक बहुत बड़ा खड्ग लगा रहता है। उस मंच पर से अपराधी को इस ढंग से फेंकते हैं कि जिससे उस पर गिरते ही उसके प्राणों का अन्त हो जाये। इसी का नाम ‘चाँग चढ़ाना’ है। बड़े बड़े अपराधियों को ही चाँग पर चढ़ाया जाता है। ‘गोपीनाथ पट्टनायक चाँग पर चढ़ाये जायँगे’ -इस बात का हल्ला चारों ओर फैल गया। सभी लोगों को इस बात से महान आश्चर्य हुआ। महाराज जिन राजा भवानन्द को अपने पिता के समान मानते थे, उनके पुत्र को वे चाँग पर चढ़ा देंगे, सचमुच इन राजाओं के चित्त की बात समझी नहीं जाती, ये क्षण भर में प्रसन्न हो सकते हैं और पल भर में क्रुद्ध। इनका कोई अपना नहीं। ये सब कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार भाँति-भाँति की बातें कहते हुए सैंकड़ों पुरुष महाप्रभु के शरणापन्न हुए और सभी हाल सुनाकर प्रभु से उनके अपराध क्षमा करा देने की प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं कर ही क्या सकता हूँ, राजा की आज्ञा को टाल ही कौन सकता है? ठीक ही है, विषयी लोगों को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिये। जब वह राद्रव्य को भी अपने विषय-भोग में उड़ा देता है तो राजा को उससे क्या लाभ? दो लाख रुपये कुछ कम तो होते ही नहीं। जैसा उसने किया, उसका फल भोगा। मैं क्या करूँ?’ भवानन्द जी के सगे-सम्बन्धी और स्नेही प्रभु से भाँति-भाँति की अनुनय-विनय करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं तो भिक्षुक हूँ, यदि मेरे पास दो लाख रुपये होते तो देकर उसे छुड़ा लाता, किन्तु मेरे पास तो दो कौड़ी भी नहीं। मैं उसे छुड़ाऊँ कैसे? तुम लोग जगन्नाथ जी से जाकर प्रार्थना करो, वे दीनानाथ हैं, सबकी प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देंगे।’ इतने में ही बहुत से पुरुष प्रभु के समीप और भागते हुए आये। उन्होंने संवाद किया कि- ‘भवानन्द, वाणीनाथ आदि सभी परिवार के लोगों को राजकर्मचारी बाँधकर लिये जा रहे हैं।’ सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। भवानन्द जी के बन्धन का समाचार सुनकर तो प्रभु के सभी विरक्त और अंतरंग भक्त तिलमिला उठे। स्वरूप दामोदर जी ने अधीरता के साथ कहा- ‘प्रभु ! भवानन्द तो सपरिवार आपके चरणों के सेवक हैं। उनको इतना दुःख क्यों? आपके कृपापात्र होते हुए भी वे वृद्धावस्था में इतना क्लेश सहें, यह उचित प्रतीत नहीं होता। इससे आपकी भक्त वत्सलता की निन्दा होगी।’ महाप्रभु ने प्रेम युक्त रोष के स्वर में कहा- ‘स्वरूप ! तुम इतने समझदार होकर भी ऐसी बच्चों की सी बातें कर रहे हो? तुम्हारी इच्छा है कि मैं राजदरबार में जाकर भवानन्द के लिये राजा से प्रार्थना करूँ कि वे इन्हें मुक्त कर दें? अच्छा, मान लो मैं जाऊँ भी और कहूँ भी और राजा ने कह दिया कि आप ही दो लाख रुपये दे जाइये तब मैं क्या उत्तर दूँगा? राजदरबार में साधु ब्राह्मणों को तो कोई घास फूस की तरह भी नहीं पूछता।’ स्वरूपगोस्वामी ने कहा- ‘आपसे राजदरबार में जाने के लिये कहता ही कौन है? आप तो अपनी इच्छा मात्र से ही इस विश्व ब्रह्माण्ड को उलट-पुलट कर सकते हैं। फिर भवानन्द को सपरिवार इस दुःख से बचाना तो साधारण-सी बात है। आपको बचाना ही पड़ेगा, न बचावें तो आपकी भक्त वत्सलता ही झूठी हो जायगी, वह झूठी है नहीं। भवानन्द आपके भक्त हैं और आप भक्तवत्सल हैं, इस बात में किसी को सन्देह ही नहीं।’ राजदरबार में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। सभी के मुखों पर गोपीनाथ के चाँग पर चढ़ने की बात थी। सभी इस असम्भव और अद्भुत घटना के कारण भयभीत-से प्रतीत होते थे। समाचार पाकर महाराज के प्रधान मन्त्री चन्दनेश्वर महापात्र महाराज के समीप पहुँचे और अत्यन्त ही विस्मय प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘श्रीमन ! यह आपने कैसी आज्ञा दे दी ? भवानन्द के पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके भाई के समान हैं। उन्हें आप प्राणदण्ड दिला रहे हैं, सो भी दो लाख रुपयों के ऊपर? वे यदि देने से इन्कार करें तो भी वैसा करना उचित था? किन्तु वे तो देने को तैयार हैं। उनके घोड़े आदि उचित मूल्य पर ले लिये जायँ, जो शेष रहेगा, उसे वे धीरे धीरे देते रहेंगे।’ महाराज की स्वयं की इच्छा नहीं थी। महामन्त्री की बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है। मुझे इस बात का क्या पता? यदि वे रुपये देना चाहते हैं, तो उन्हें छोड़ दो। मुझे तो रुपयों से काम है उनके प्राण लेने से मुझे क्या लाभ?’ महाराज की ऐसी आज्ञा मिलते ही उन्होंने दरबार मे जाकर गोपीनाथ जी को सपरिवार मुक्त करने की आज्ञा लोंगों को सुना दी। इस आज्ञा को सुनते ही लोगों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। क्षणभर में बहुत से मनुष्य इस सुखद संवाद को सुनाने के निमित्त प्रभु के पास पहुँचे और सभी एक स्वर में कहने लगे- ‘प्रभु ने गोपीनाथ को चाँग से उतरवा दिया।’ प्रभु ने कहा- ‘यह सब उनके पिता की भक्ति का ही फल है। जगन्नाथ जी ने ही उन्हें इस विपत्ति से बचाया है।’ लोगों ने कहा- ‘भवानन्द जी तो आपको ही सर्वस्व समझते हैं और वे ही कह भी रहे हैं कि महाप्रभु की ही कृपा से हम इस विपत्ति से बच सके हैं।’ प्रभु ने लोगों से पूछा- ‘चाँग के समीप खड़े हुए भवानन्द जी का उस समय क्या हाल था?’ लोगों ने कहा- ‘प्रभो ! उनकी बात कुछ न पूछिये। अपने पुत्र को चाँग पर चढ़े देखकर भी न उन्हें हर्ष था न विषाद। वे आनन्द के सहित प्रेम में गद्गद होकर- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ -इस मन्त्र का जप कर रहे थे। दोनों हाथों की उँगलियों के पोरों से वे इस मन्त्र की संख्या को गिनते जाते थे। उन्हें आपके ऊपर दृढ़ विश्वास था।’ प्रभु ने कहा- ‘सब पुरुषोत्तम भगवान की कृपा है। उनकी भगवत-भक्ति का ही फल है कि इतनी भयंकर विपत्ति से सहज में ही छुटकारा मिल गया, नहीं तो राजाओं का क्रोध कभी निष्फल नहीं जाता।’ इतने में ही भवानन्द जी अपने पाँचों पुत्रों को साथ लिये हुए प्रभु के दर्शनों के लिये आ पहुँचे। उन्होंने पुत्रों के सहित प्रभु के पापद्मों में साष्टांग प्रणाम किया अैर गद्गद कण्ठ से दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे दयालो ! हे भक्तवत्सल !! आपने ही हमारा इस भयंकर विपत्ति से उद्धार किया है। प्रभो ! आपकी असीम कृपा के बिना ऐसा असम्भव कार्य कभी नहीं हो सकता कि चाँग पर चढ़ा हुआ मनुष्य फिर जीवित ही उतर आवे !' प्रभु उनकी भगवद्भक्ति की प्रशंसा करते हुए कहने लगे- ‘इसे समझा दो, अब कभी ऐसा काम न करे। राजा के पैसे को कभी भी अपने खर्च में न लावे।’ इस प्रकार समझा बुझाकर प्रभु नेे उन सब पिता-पुत्रों को विदा किया। उसी समय काशी मिश्र भी आ पहुँचे। प्रभु को प्रणाम करके उन्होंने कहा- ‘प्रभो आज आपकी कृपा से ये पिता पुत्र तो खूब विपत्ति से बचे।’ प्रभु ने कुछ खिन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘मिश्र जी क्या बताऊँ? मैं तो इन विषयी लोगों के संसर्ग से बड़ा दुखी हूँ। मैं चाहता हूँ, इनकी कोई बात मेरे कानों में न पड़े। किन्तु जब यहाँ रहता हूँ, तब लोग मुझसे आकर कह ही देते हैं। सुनकर मुझे क्लेश होता ही है, इसलिये पुरी छोड़कर अब मैं अलालनाथ मेे जाकर रहूँगा। वहाँ न इन विषयी लोगों का संसर्ग होगा और न ये बातें सुनने में आवेंगी।’ मिश्र जी ने कहा- ‘आपको इन बातों से क्या? यह तो संसार है। इसमें तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं। आप किस-किसका शोक करेंगे? आपसे क्या, कोई कुछ भी करे ! आपके भक्त तो सभी विषयत्यागी वैरागी हैं। रघुनाथदास जी को देखिये सब कुद छोड़ छाड़कर क्षेत्र के टुकड़ों पर निर्वाह करते हैं। रामानन्द तो पूरे संन्यासी हैं ही।’ प्रभु ने कहा- ‘चाहे कैसा भी क्यों न हो, अपना कुछ सम्बन्ध रहने से दुःख सुख प्रतीत होता ही है। ये विषयी ठहरे, बिना रुपया चुराये मानेंगे नहीं, महाराज कफर इन्हें चाँग पर चढ़ावेंगे। आज बच गये तो एक न एक दिन फिर यही होना है।’ मिश्र जी ने कहा- ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा। महाराज भवानन्द जी को बहुत प्यार करते हैं।’ इसके अनन्तर और भी बहुत-सी बातें होती रहीं। अन्त में काशी मिश्र प्रभु की आज्ञा लेकर चले गये। महाराज प्रतापरुद्र जी अपने कुलगुरु श्री काशी मिश्र के अनन्य भक्त थे। पुरी में जब भी वे रहते, तभी रोज उनके घर आकर पैर दबाते थे। मिश्र जी भी उनसे अत्यधिक स्नेह मानते थे। एक दिन रात्रि में महाराज आकर मिश्र जी के पैर दबाने लगे। बातों ही बातों में मिश्र जी ने प्रसंग छेड़ दिया कि महाप्रभु तो पुरी छोड़कर अब अलालनाथ जाना चाहते हैं। पैरों को पकड़े हुए सम्भ्रम के साथ महाराज ने कहा- ‘क्यों, क्यों ! उन्हें यहाँ क्या कष्ट है? जो भी कोई कष्ट हो उसे दूर कीजिये। ! मैं आपका सेवक सब प्रकार से स्वयं उनकी सेवा करने को उपस्थित हूँ।’ मिश्र जी ने कहा- ‘उन्हें गोपीनाथ वाली घटना से बड़ा कष्ट हुआ है। वे कहते हैं, विषयियों के संसर्ग में रहना ठीक नहीं है।’ महाराज ने कहा- ‘श्रीमहाराज ! मैंने तो तुम्हें धमकाने के लिये ऐसा किया था। वैसे भवानन्द जी के प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है। इस छोटी सी बात के पीछे प्रभु पुरी को क्यों परित्याग कर रहे हैं। दो लाख रुपयों की कौन सी बात है? मैं रुपयों को छोड़ दूँगा। आप जैसे भी बने तैसे प्रभु को यहीं रखिये।’ मिश्र जी ने कहा- ‘रुपये छोड़ने को वे नहीं कहते। रुपयों की बात सुनकर तो उन्हें और अधिक दुःख होगा। वैसे ही वे इस झंझट से दूर रहना चाहते हैं। कहते हैं- रोज रोज यही झगड़ा चला रहेगा। गोपीनाथ फिर ऐसा ही करेगा।’ महाराज ने कहा- ‘आप उन्हें रुपयो की बात कहें ही नहीं। गोपीनाथ तो अपनी ही आदमी है। अब झगड़ा क्यों होगा? मैं उसे समझा दूँगा, आप महाप्रभु को जाने न दें। जैसे भी रख सकें अनुनय-विनय और प्रार्थना करके उन्हें यहीं रखें।’ महाराज के चले जाने पर दूसरे दिन मिश्र जी ने सभी बातें आकर प्रभु से कहीं ! सब बातों को सुनकर प्रभु कहने लगे- ‘यह आपने क्या किया? यह तो दो लाख रुपये आपने मुझे ही दिलवा दिये। इस राज प्रतिग्रह को लेकर मैं उलटा पाप का भागी बना।’ मिश्र जी ने सभी बातें प्रभु को समझा दीं। महाराज के शील, स्वभाव, नम्रता और सदगुणों की प्रशंसा की। प्रभु उनके भक्ति भाव की बातें सुनकर सन्तुष्ट हुए और उन्होंने अलालनाथ जाने का विचार परित्याग कर दिया। इधर महाराज ने आकर गोपीनाथ जी को बुलाया और उन्हें पुत्र की भाँति समझाते हुए कहने लगे- ‘देखो इस प्रकार व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिये। तुमने बिना पूछे इतने रुपये खर्च कर दिये इसलिये हमें क्रोध आ गया। जाओ, वे रुपये माफ किये। अब फिर ऐसा काम कभी भी न करना। यदि इतने वेतन से तुम्हारा कान नहीं चलता है तो हमसे कहना चाहिये था। तब तक तुमने यह बात हमसे कभी नहीं कही। आज से हमने तुम्हारा वेतन भी दुगुना कर दिया।’ इस प्रकार दो लाख रुपये माफ हो जाने पर और वेतन भी दुगुना हो जाने से गोपीनाथ जी को परम प्रसन्नता हुई। उसी समय वे आकर प्रभु के पैरों में पड़ गये और रोते-रोते कहने लगे- ‘प्रभो ! मुझे अब अपने चरणों की शरण में लीजिये, अब मुझे इस विषय जंजाल से छुड़ाइये।' प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और फिर कभी ऐसा काम न करने के लिये कहकर विदा किया। जब महापुरुषों की तनिक सी कृपा होने पर गोपीनाथ सपरिवार सूली से बच गये, दो लाख रुपये माफ हो गये, वेतन दुगुना हो गया और पहले से भी अधिक राजा के प्रीतिभाजन बन गये, तब जो अनन्यभाव से महापुरुषों के चरणों ही सेवा करते हैं और उनके ऊपर जो महापुरुषों की कृपा होती है, उस कृपा के फल का तो कहना ही क्या? उस कृपा से तो फिर मनुष्य का इस संसार से ही सम्बन्ध छूट जाता है। वह तो फिर सर्वतोभावेन प्रभु का ही हो जाता है। धन्य है ऐसी कृपालुता को ! श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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