🙏*केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’?*🙏 💐🙇🏻💐🙇🏻💐🙇🏻💐🙇🏻💐🙇🏻💐🙇🏻💐🙇🏻💐🌳 💐*एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला।पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं,वह पैदल ही निकल पड़ा।रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता।मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता।चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है।वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे।पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है।पंडित जी से प्रार्थना की-कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये* *लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद।नियम तो नियम होता है।वह बहुत रोया।बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो।वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी।*🌺 💐*पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा।रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया।लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी।उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है।वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया।पूछा-बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी।बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया।और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी।वह बोले, बेटा मुझे लगता है,सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा।तुम दर्शन जरुर करोगे*🌺 💐*बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा,किन्तु वह कहीं नहीं थे।इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ।उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला-कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा?और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ,लेकिन आप तो सुबह ही आ गये।पंडित जी ने उसे गौर से देखा,पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे।6 महीने होते ही वापस आ गए !उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही,मैं कहीं नहीं गया।कल ही तो आप मिले थे,रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया।पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था।*🌺 💐*उन्होंने कहा-लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो?पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी।इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है।तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी।कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था,बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले,हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके,सच्चे भक्त तो तुम हो।तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है।उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया।यह सब तुम्हारे पवित्र मन,तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है।आपकी भक्ति को प्रणाम*🌺 *हर हर महादेव*🚩🚩🚩🚩 *कुमार रौनक कश्यप *🙏🏻

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हिमालये केदारनाथम्.. एकादश ज्योतिर्लिंगम्.. 🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿 सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। :उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥ परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। :सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। :हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये॥3॥ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:। :सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥ #केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के #रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह #ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्‍य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्‍थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण #पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। जून २०१३ के दौरान भारत के उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र रहा। मंदिर की दीवारें गिर गई और बाढ़ में बह गयी। इस ऐतिहासिक मन्दिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहे लेकिन मन्दिर का प्रवेश द्वार और उसके आस-पास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया। केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है। इस मन्दिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार ये १२-१३वीं शताब्दी का है। ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो १०७६-९९ काल के थे। एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर ८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है, जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है। मतानुसार शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं। १८८२ के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियाँ हैं। “पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है। मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पण्डों के पक्के मकान है। जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं। श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये।” यहाँ के भैरव नाथ जी मन्दिर एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मन्दिर में मुख्य भाग मण्डप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हाँ ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिण्ड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं। पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं। चौरीबारी हिमनद के कुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में, कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित, विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था। साथ ही यह भी प्रचलित है कि मंदिर का जीर्णोद्धार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने करवाया था। मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य जी की समाधि है। राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस मंदिर का निर्माणकाल १०वीं व १२वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है। केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं। केदारनाथ के निकट ही गाँधी सरोवर व वासुकीताल हैं। केदारनाथ पहुँचने के लिए, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, २० किलोमीटर आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और १४ किलोमीटर की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुज़रनेवाले, पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है। मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घारे अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। शिवलिंग स्वयंभू है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान को घृत अर्पित कर बाँह भरकर मिलते हैं, मूर्ति चार हाथ लम्बी और डेढ़ हाथ मोटी है। मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जा सकता है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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अंगदेश से अंगकोरवाट कंबोडिया तक.. मैं #अंगदेश बोल रहा हूं। अंगराज कर्ण का अंगदेश और आज का #भागलपुर शहर। गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है। लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि मेरा अस्तित्व विश्व सबसे पुराने शहरों में से एक है। एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं। महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का तेज हमेशा मेरे हिस्से में रहा, पर मेरी असली पहचान हमेशा एक व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही। वस्त्रों में सबसे अनुपम #रेशम के उत्पादन के लिये मेरा नाम चांदो सौदागर के जमाने से पूरी दुनिया में फैला है और उसी के साथ फैली है #विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ख्याति, #कर्ण की दानवीरता की कहानियां, जदार्लू आम और कतरनी चावल की खुशबू, जैन तीर्थंकर वासुपूज्य की ख्याति, महर्षि मेहीं का अध्यात्म और ऐसी ही सैकड़ों चीजें. हजारों साल का वृद्ध मैं भागलपुर आज अपनी कहानी लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ। पुण्य देश के राजा थे #भागदत्त, जिन्होंने मुझे अपना नाम दिया। पहले मुझे भागदत्तपुरम पुकारा जाता था। बाद में बदलकर यह भागलपुर हो गया। पहले मेरा अस्तित्व एक उपनगर के रूप में था जो अंगदेश की राजधानी चंपा से सटा था। समय का फेर देखिये अब चंपा ही उपनगर बनकर चंपानगर हो गयी है और मैं भागलपुर ही नगर का मुख्यकेंद्र बन चुका हूँ। चंपा का नाम अंगराज चंपा के नाम पर उनके पिता ने रखा था, पहले उस नगरी का नाम मालिनी था। फूल से दो नामों वाले उस शहर की भी क्या रौनक थी। जहां राजा बलि के सबसे बड़े पुत्र अंग का राज्य चलता था, जिन्हें पृथ्वीपति की उपाधि मिली थी, उसी वंश में आगे चलकर चित्ररथ नामक न्यायप्रिय सम्राट हुए जिनके राज्य में लक्ष्मी और सरस्वती अपनी श्रेष्ठता का फैसला कराने पहुंची थीं। राजा रोमपाद जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे और उनका एक नाम भी दशरथ ही था। अयोध्या नरेश दशरथ की पुत्री शांता रोमपाद के ही महल में उनकी दत्तक पुत्री के रूप में रहती थीं, जिनका विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ हुआ और उसी श्रृंगी ऋषि द्वारा कराये गये अनुष्ठान से दशरथ को राम जैसे पुत्र मिले। राजा कर्ण की वीरता और दानशीलता की कहानी जगजाहिर है. वे इसी चंपा शहर में वास करते थे, उनका महल कर्णगढ़ कहलाता था। जहां आजकल पुलिस प्रशिक्षण अकादमी संचालित हो रही है। उनका विवाह भागदत्त की एक पुत्री से हुआ था, जबकि दूसरी पुत्री का विवाह उनके मित्र दुर्योधन से हुआ था। फिर इस शहर पर जगत प्रसिद्ध चांदो सौदागर का राज हुआ, जिसकी बहू बिहुला ने अपने तप से अपने मृत पति और पांच जेठों को फिर से जिलाने में सफलता प्राप्त की और मनसा पूजा की शुरुआत की। अविश्वसनीय सी लगने वाली ये तमाम कहानियां पुराण के पन्नों में दर्ज हैं। और यह भी कि #कंबोडिया कभी भागलपुर का सांस्कृतिक उपनिवेश हुआ करता था और वहां का #अंकोरवाट मंदिर वस्तुत: अंगकोरवाट मंदिर है। हालांकि इस तथ्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी सहमत नजर आते हैं और राष्ट्र कवि दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में भी इस तथ्य का उल्लेख किया है। बहरहाल इसके बाद की ऐतिहासिक कथा भी कम गौरवशाली नहीं। खास तौर पर पाल राजाओं का जमाना, जब मेरे शहर के पड़ोस में एक गांव अंतीचक में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय खुला, जिसे विक्रमशिला महाविहार का नाम दिया गया। उस तंत्र शिक्षण केंद्र में दुनिया भर से छात्र आते थे। इसी विश्वविद्यालय का कमाल था कि मेरे इलाके से आर्यभट्ट और अतिश दीपंकर जैसे विद्वान पैदा हुए। आर्यभट्ट की कीर्ति तो दुनिया जानती ही है पर सबौर वासी अतिश दीपंकर का योगदान भी कम नहीं है, जिन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया और लामा संप्रदाय की शुरुआत की। बहरहाल काल के कपाल में चंपा, मालिनी, कर्णगढ़ तो समा ही गये और विक्रमशिला महाविहार भी जमींदोज हो गया और उसके साथ ही मिटने लगी यहां पैदा हुई तंत्र साधना व सिद्ध और नाथ संप्रदाय की परंपराएं। पहले अंग देश मगध का हिस्सा बना फिर बंगाल का। बंगाल से पाल और सेन वंश मिटे और तुर्क-अफगानों और मुगलों का शासन हुआ। फिर अंग देश से राज्य और राज्य से क्षेत्र बनकर रह गया। सम्राट मिटे, राजा आये और राजा मिटे तो शासक और फिर महज जमींदार। मगर इसके बावजूद इस क्षेत्र की महत्ता कभी कम नहीं हुई। यह उसी दौर की बात है जब शहर का केंद्र चंपानगर और नाथनगर से हटकर भागलपुर में मेरे आगोश में समाने लगा था। पाल वंश के बाद सेन वंश के राजाओं ने बंगाल पर शासन करना शुरू किया, मगर उसका एक राजा लक्ष्मण सेन इतना कायर निकला कि वह मोहम्मद गोरी को आता देख गद्दी छोड़ भाग खड़ा हुआ। इस तरह बंग के अधीन अंग के इलाकों तुर्क-अफगानों और फिर मुगलों का आधिपत्य कायम हुआ। इसके बाद मेरे इलाकों में रोशन खयाल और कला प्रेमी मुसलमानों की आबादी ने ठिकाना बनाना शुरू किया। मेरे इन बाशिंदों ने पूरे शहर में जगह-जगह इमारतें, मसजिदें और मकबरे खड़े किये जो आज भी मेरी धरोहरों की श्रृंखला में चार चांद लगाते हैं। उनकी हुनरमंदी इमारतों के कंगूरों से उतर कर रेशम के डिजाइनों तक में जा पहुंची। इसकी जौहर का नमूना था कि लोग मुझे सिल्क सिटी या रेशम नगरी कह कर पुकारने लगे हैं। फिर शायरी के तरानों का क्या कहना कि बीड़ी बनाने वाला एक मजदूर कौस भी अपने शेरों से मीर और मोमिन को टक्कर देता रहा। वैसे तो मोहम्मद गोरी के आगमन से लेकर मीर कासिम के पतन तक इस शहर पर मुसलमानों की ही हुकूमत चली पर कई दौर ऐसे आये जब यह दिल्ली की सल्तनत से आजाद अस्तित्व बनाने में सफल रही। यही वजह है कि दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक उठा पटक में मात खाने वाले कई शहजादे गुप्त रूप से भागलपुर में अपना ठिकाना बनाकर रहने लगे। शहर के लोग कई गुमनाम मकबरों के बारे में बताते हैं कि फलां मुहम्मद शाह का मकबरा है तो फलां अहमद शाह का। इसके अलावा कई पीर-फकीरों ने भी मुझे अपना आशियाना बनाये। इनमें से कइयों के मजार आज भी कायम हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मेरा नाम भागलपुर इसलिये पड़ा क्योंकि यहां दूसरे इलाकों से भागकर आये लोगों ने अपना ठिकाना बनाया है। यह भाग कर आये लोगों की नगरी है इसलिये भागलपुर है। पता नहीं भागदत्त वाली कथा सही है या यह, मगर इस बात में सच्चाई जरूर है कि मेरे शहर के आगोश में कई दूर दराज के वाशिंदों ने पनाह ली है। चाहे वह सरयूपारी ब्राह्मण हों या बंग भाषी या दरभंगा-मधुबनी के मैथिल या राजस्थान से पहुंचे माड़वाड़ी समुदाय के लोग। पता नहीं मेरी आबोहवा में क्या आकर्षण था कि इन सारे लोगों ने रहने के लिये मुझे ही चुना। मगर मेरे मिजाज को तय करने में इन लोगों का बड़ा योगदान है, खास तौर पर बंग भाषियों का जिन्होंने इस शहर के लोगों को कविता-कहानी लिखने और जात्रा-नाटक करने का चस्का लगाया। मेरे शहर में बसे मुहल्ले आदमपुर की गलियों में मशहूर कथाकार शरतचंद्र को #देवदास उपन्यास की कथा मिली तो टील्हा कोठी के एकांत में रविन्द्रनाथ टैगोर के #गीतांजलि की प्रथम कड़ियों ने आकार लिया। यह उन्हीं लोगों की रोशन खयाली का नतीजा था कि इस शहर की एक बेटी कादंबिनी गांगुली को ग्रेजुएट होने वाली देश की पहली महिला बनने का सौभाग्य हासिल हुआ और अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे जमींदार खानदान के नवासे फिल्मी दुनिया के सतरंगी परदे पर अपनी हुकूमत कायम करने में कामयाब रहे। प्रीतीश नंदी ने साहित्य और मनोरंजन की दुनिया को एक नई पहचान दी। इसी आजाद ख्याली का नतीजा था कि यह शहर अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत में भी अगुआ साबित हुआ। पहाड़िया विद्रोही तिलकामांझी ने जब विद्रोह की लौ सुलगाई थी तब दुनिया अंग्रेजी जुल्म की हकीकत का आंकलन भी नहीं कर पाये थे। गांधी जी के सत्याग्रह के मौके पर शहर में आंदोलनकारियों का हुजूम उमड़ता था। 1934 में जब मुंगेर में भीषण भूकंप आया और जबरदस्त तबाही मची तो इन्हीं सेनानियों ने बाना बदला और रिलीफ के काम में जुट गये। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई जगह प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजी फौज की गोलियों का सामना बहादुरी के साथ किया। देश आजाद हुआ तो नेहरूजी प्रधानमंत्री बने। इसके बाद वे जब पहली बार भागलपुर आये तो लोगों ने सैंडिस कंपाउंड में चांदी कुर्सी उन्हें बैठने के लिये दी। मगर उस जननायक ने चांदी की कुर्सी यह कहते हुए फेंक दी कि जनता जमीन पर और नेता सिंहासन पर यह नहीं चलेगा। आजादी की लड़ाई में इस शहर ने जितनी कुर्बानियां दीं आजादी के बाद उसका हासिल हमारे हिस्से में बहुत कम आया। शहर धीरे-धीरे ढहता रहा और लोगों में निराशा बढ़ती रही। उस निराशा का विस्फोट तब हुआ जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। एक बार फिर मैं व्यवस्था की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वालों का केंद्र बन गया। भागलपुर जेल में ही उस दौरान इमरजेंसी की खिलाफत करने वाले बंदियों को रखा गया था और जेल की चाहरदीवारी के अंदर से विरोध के स्वर फूटते रहे। कुछ ही सालों बाद शहर में ऐसी वारदातें हुईं जो आज भी मेरे चरित्र पर बदनुमा दाग बनकर कायम है। अपराध नियंत्रण में नाकामयाब होकर पुलिस कर्मियों ने ३३ युवकों की आंखों में तेजाब डाल दिया। खुद फैसला करने की इस पुलिसिया मनोवृत्ति ने एक गलत काम के कारण पूरी दुनिया में मुझे चर्चा का केंद्र बना दिया। दस साल बाद फिर पुलिसिया करतूत के कारण शहर की फिजा बिगड़ी और हजारों लोग सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गये। पहली घटना ने तो शहर के चरित्र का हनन किया था दूसरी ने शहर की आबोहवा में जहर घोल दिया। इस कारोबारी शहर के कारोबारी रिश्ते तक गड़बड़ाने लगे। खैर यह बुनकर-व्यवसायी का ही रिश्ता था कि शहर के अमन-चैन को पटरी पर आ गया। खैर उसके बाद से शहर का अमन-चैन बरकरार है। लोग जात-धर्म के बदले कारोबार की बातें करते हैं। सन २००१ में विक्रमशिला सेतु बना तो उत्तर बिहार के कई जिले भागलपुर के संपर्क में आ गये। इसके बाद यहां के कारोबार ने तो जैसे उड़ान पकड़ लिया। डल चादर के लिये मशहूर यह शहर तो पहले डल स्वभाव का था अब महानगरों की तेज रफ्तार जिंदगी से कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है। धड़ाधड़ अपार्टमेंट बन रहे हैं, शोरूम खुल रहे हैं। लक्ज़री कारों से शहर की सड़कें अटी रहती हैं। इसके बावजूद शहर के शोर में अंगिका की खनक कायम है। बिहुला विषहरी के बोल अब भी गूंजते हैं, गंगा घाटों पर अब भी स्नानार्थियों का मेला लगता है। कतरनी की खुशबू और जरदालू आम की गमक अब भी सैलानियों को मेरे पास खींच लाती है। मैं आज भी आपका ही शहर हूं, वही भागलपुर। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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#पुण्ड्रवर्धन का उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखों में हुआ है। इन अभिलेखों से सूचित होता है कि गुप्त साम्राज्य में 'पुण्ड्रवर्धन' नाम की एक 'भुक्ति' थी, जो 'पुंड्र देश' के अंतर्गत आती थी। इसमें कोटिवर्ष आदि अनेक वर्ष सम्मलित थे। इन ताम्रपट्ट लेखों से सूचित होता है कि लगभग समग्र उत्तरी बंगाल या पुंड्र देश, पुंड्रवर्धन भुक्ति में सम्मलित था और यह ४४३ ई. से ५४३ ई. तक गुप्त साम्राज्य का अविछिन्न अंग था। यहाँ के शासक 'उपरिक महाराज' की उपाधि धारण करते थे और इन्हें गुप्त नरेश नियुक्त करते थे। कुमारगुप्त प्रथम के समय में उपरिक चिरातदत्त को पुण्ड्रवर्धन का शासक नियुक्त किया गया था और बुधगुप्त के समय में यहाँ का शासक ब्रह्मदत्त था। संभवत: पुण्ड्रवर्धन भुक्ति का प्रधान नगर वर्तमान रंगपुर के निकट रहा होगा। भारत के बिहार राज्य के #पूर्णिया ज़िले में मौर्य सम्राट अशोक के स्तूप हैं। पूर्व में बंगाल तक मौर्य साम्राज्य के विस्तृत होने की पुष्टि 'महास्थान शिलालेख' से होती है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है और मौर्य काल का माना जाता है। महावंश के अनुसार अशोक अपने पुत्र को विदा करने के लिए ताम्रलिप्ति तक आया था। ह्वेनसांग को भी ताम्रलिप्ति, कर्णसुवर्ण, समतट, पूर्वी बंगाल तथा पुण्ड्रवर्धन में अशोक के स्तूप देखने को मिले थे। महाभारत काल में आज का बिहार राज्य का नेपाल देश की सीमाओं से सटा जिला पूर्णियाँ भी #पौन्ड्रिया क्षत्रियों की गढ मानी जाती थी। जिन्होंने कुरुक्षेत्र महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। इसके दक्षिण में गंगा नदी के उस पार कुंती पुत्र अंगराज #कर्ण का अंग देश का विस्तृत भूभाग, जिसकी सीमाएं कभी आज के #भागलपुर मुंगेर से बढकर बर्मा #अंगकोरवाट की सीमाओं से जा लगती थी। आधिपत्य के कालखण्ड बदलते गए और एक विस्तृत आधिपत्य भूभाग अपने बदलते नामों के साथ सिमटते चले गए। #महाभारत काल का ये जंगलों या अरण्यों का वृहत क्षेत्र ही था जिसके पेड़ों की ओट में पांडव अपने अस्त्र शस्त्रों व वस्त्रों को छिपाकर #नेपाल विराट देश को अज्ञातवास के दौरान गए थे, और फिर इन्हीं भूभागीय पूर्ण अरण्य क्षेत्र के कारण आज का पूर्णियाँ नाम भी सार्थक जान पड़ता है। यहाँ के इन्हीं अरण्य संपदा के मध्य कितने ही वृहत जलाशयों का भंडार भी मौजूद था। कहते हैं #वैदिककाल में यहाँ के जलाशयों से कमल फूल के पत्ते देवलोक व स्वर्गलोक यक्षों, गंधर्वों व अप्सराओं के माध्यम से जाते थे, और इन पत्तों पे भोजन करना ही श्रेष्ठ व उत्तम माना जाता था। कमल फूल के इन पत्तों को #पुरैन कहा जाता है और फिर इसी पुरैन नाम से पूर्णियाँ का पुराना नाम पुरैनियाँ भी सिद्ध जान पड़ता है। कमल के फूल व पत्तों से भरे ऐसे जलाशय अब भले ही कम पड़ गए हों लेकिन इनके बदले स्वरुप में इस क्षेत्र में होने वाली #मखाना की खेती आज विश्व प्रसिद्ध है, जिसके आरंभिक फल कमल फूल के पत्ते से दिखने वाले इन्हीं तरह के बड़े बड़े पत्तों के उपर ही अंकुरित होती है। हिन्दू मान्यतानुसार पूजा पाठों व पर्वों में बहुलता से प्रयोग होने वाले इस मखाना फल को अमृत फल या देव फल की संज्ञा दी गई है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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