“भक्तवत्सला शीतला माता” एक बार देवर्षि नारद “नारायण! नारायण!” का जाप करते हुए तीनों लोकों की यात्रा पर निकले। सभी देवों के दर्शन करते हुए “शीतला माता” के धाम पहुँचे। ध्यान-मुद्रा में बैठी मातारानी को मुस्कुराते हुए देख विस्मित महर्षि ने अभिवादन के साथ ही कहा -“माँ! आज तो आपके मुख पर अद्वितीय तेज और प्रसन्नता झलक रही है। कौन है, जिसने आपके मुख पर प्रसन्नता बिखेर दी है?” माता ने उसी स्मित हास्य के साथ कहा – वत्स! एक निश्छल हृदय भक्त के अतिरिक्त और कौन हो सकता है?” तब महर्षि ने आश्चर्य से पूछा – “माता! आपके तो असंख्य भक्त हैं। फिर ऐसा कौन भक्तविशेष है जो आपके ह्रदय के इतने समीप है?” इसपर देवी ने कहा – “देवर्षि! कुण्डिनपुर में रहने वाली निर्मला ने अपनी सच्ची व निस्पृह भक्ति से मेरे हृदय को जीत लिया है।” तब देवर्षि ने मुस्कुराते हुए कहा – “अगर आज्ञा हो तो मैं भी आपकी इस विशेष भक्त से मिल आऊं।” तब देवी ने हँसते हुए कहा – “देवर्षि! मैं आपकी प्रकृति से अनभिज्ञ नहीं हूँ। मैं जानती हूँ कि आप निर्मला की परीक्षा लेना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो आप अवश्य अपने मन की करें।” भक्त निर्मला की प्रशंसा सुनकर और माता से आज्ञा लेकर महर्षि नारद ने बड़ी ही उत्सुकता के साथ पृथ्वीलोक की ओर प्रस्थान किया। कुण्डिनपुर पहुँच कर वे निर्मला के द्वार पहुँचे और वहाँ उन्होंने निर्मला को उसकी जेठानी सोनाक्षी के साथ शीतला माता की पूजा-अर्चना में रत देखा। निर्मला का रूप उसके नाम के अनुरूप ही निर्मल था और उससे भक्ति का तेज साफ़ नजर आता था। निर्मला का जन्म एक अत्यंत धनी परिवार में हुआ था किन्तु दैवयोग से उसका विवाह बहुत ही साधारण परिवार में हुआ। उसने इसे भाग्य का लेख समझ कर सहर्ष स्वीकार कर लिया और अपने गुणों से शीघ्र ही ससुराल में सभी का मन जीत लिया। वह माता की दृढ़ आस्था के साथ अपने सास-श्वसुर, जेठ-जेठानी, पति व दो छोटे बच्चों की सेवा-सुश्रुषा करते हुए अपना जीवन सुख पूर्वक व्यतीत कर रही थी। निर्मला जितने सरल स्वभाव की थी, सोनाक्षी उतनी ही कर्कशा। वो निर्धन परिवार की कन्या थी और दो पुत्रों और एक पुत्री की माता भी किन्तु अहर्निश सास-श्वसुर के मुख से निर्मला के गुणगान सुनकर शनैः शनैः उसके मन में निर्मला के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी जो समय के साथ बढ़ती ही जा रही थी। उधर देवर्षि ने सोचा कि निर्मला की भक्ति की परीक्षा कैसे ली जाये? फिर उन्हें लगा कि सुख में तो सभी भक्ति करते हैं किन्तु उनकी भक्ति की वास्तविक परीक्षा दुःख में ही होती है। उन्होंने अपनी लीला रची और निर्मला के घर में चेचक की महामारी ने प्रवेश किया। सभी हैरान-परेशान। नगर भर को छोड़ चेचक ने उनके घर में ही कैसे प्रवेश किया? प्रभाव बढ़ा और निर्मला के बच्चे भी रोगग्रस्त हो गए। नगर के श्रेष्ठतम वैद्य ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए। वो बेचारी रोग के समक्ष असहाय पड़ गई। उधर दूसरी ओर सोनाक्षी के बच्चे स्वस्थ थे उसपर भी वो मन ही मन मातारानी से प्रार्थना कर रही थी कि “हे माँ! इसके दोनों बच्चों को उठा लो। मैं तुम्हें धोती चढ़ाऊँगी।” दैवयोग से जब सोनाक्षी ये संकल्प कर रही थी, निर्मला ने सुन लिया। एक तो उसके बच्चे मृत्यु के मुख में, ऊपर से उसके जेठानी जिसे उसने सदैव अपनी बड़ी बहन का सम्मान दिया, उसका ये कुटिल रूप। अब वो क्या करे? कहाँ जाये? माँ के अतिरिक्त उसका और ठिकाना ही क्या था? आकण्ठ अश्रु लिए वह शीतला माता के पैरों में गिर पड़ी और बच्चों के स्वास्थ्य लाभ हेतु विनती करने लगी। देवर्षि को ये प्रहसन बहुत भा रहा था। वो प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब विपत्ति का वेग निर्मला की सहनशक्ति को पार करे और कब वो अपने भक्ति पथ से भटके। दिन बीते किन्तु ऐसा कोई भी दिन ना आया जब निर्मला की मातृभक्ति में किंचितमात्र भी कमी आयी हो। देवर्षि ने परीक्षा कठिन करने की ठानी। निर्मला के तीनों बच्चों का ताप बढ़ा। पहले उन्होंने भोजन त्यागा, फिर जल। श्वास कंठ में अवरुद्ध होने लगी और फिर लगा कि जैसे अंत निकट है। सोनाक्षी प्रसन्न हुई, निर्मला संतप्त। सास-ससुर और यहाँ तक कि उसके पति ने भी आशा छोड़ दी किन्तु जिसकी भक्ति ने स्वयं माता को झंझोड़ दिया हो वो कैसे आशा छोड़ती। बच्चों के पीछे निर्मला ने भी अन्न-जल त्यागा और माता की मूर्ति के समक्ष पहुँची। सिर्फ इतना ही कह पायी कि “माँ! रक्षा करो।” आगे कुछ बोल ना पायी, कंठ अवरुद्ध हो गया। शरीर साथ ना दे पाया और वहीँ माता की प्रतिमा के समक्ष निर्मला अचेत हो गयी। देवर्षि को अब आत्मग्लानि हुई। उनकी परीक्षा के कारण निर्मला और उसके बच्चों ने अथाह कष्ट पाया। इस अगाध कष्ट में भी निर्मला ने माता का ही आश्रय लिया। इससे बड़ी भक्ति का और क्या प्रमाण हो सकता था? मन ही मन उन्होंने माता से क्षमा माँगी किन्तु आगे का हाल जानने को वही रुक गए। जिज्ञासु जो ठहरे। उधर निर्मला को स्वप्न में माता ने दर्शन दिए। लगा जैसे वो निर्मला के मस्तक को सहला रही हो और कह रही हो – “उठ पुत्री। तेरी तपस्या पूर्ण हुई। तेरी संतानों को मेरा अभय है।” सुबह हुई, निर्मला का ह्रदय अनन्य आशा से भरा हुआ था। उसने शांत हृदय से मातारानी की अगाध श्रद्धा व विश्वास के साथ पूजा-अर्चना की। बच्चों को चन्दन का लेप लगाया। प्रतिदिन की ही भाँति सास-श्वसुर व समस्त परिवार की सेवा में सलग्न हो गई। सभी हैरान थे कि आज इसे हुआ क्या है? चेहरे पर किंचित भय नहीं। उन्हें क्या पता था कि जिसे माता का अभय प्राप्त हो उसे किस बात की चिंता? किस बात का भय? अनन्य भक्ति और सेवाभाव के परिणामस्वरूप उसके दोनों बच्चे शीघ्र ही स्वस्थ हो गए। उसकी भक्ति का गुणगान पहले परिवार करता था, अब पूरा नगर करने लगा। सोनाक्षी को घोर आश्चर्य और ईर्ष्या हुई। सोचा उसने भी तो सच्चे मन से उसके बच्चों का बुरा चाहा था? फिर माता ने निर्मला की ही क्यों सुनी? विनाशकाल था, बुद्धि विपरीत हुई। मुख से माता के लिए दुर्वचन निकल गया। अब शुभ कैसे होता? गाँव का एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया। उसने हड़बड़ाते हुए सूचित किया कि सोनाक्षी की पुत्री सुशीला को सर्प ने काट लिया। विषधर था, चेतना जाती रही। नदी तट पर अचेत पड़ी है, दोनों भाई बैठे रो रहे हैं। इतना सुनते ही सोनाक्षी अचेत हो वहीं बैठ गई। निर्मला ने उसे सम्भालते हुए कहा – “दीदी! मातारानी पर विश्वास रखिए। वो हमारे साथ इतना बड़ा अन्याय नहीं करेंगी।” निर्मला की बातों ने उसको अन्दर तक झकझोर दिया। वह पश्चाताप करते हुए उसके पैरों पर गिर पड़ी और गिड़गिड़ाते हुए बोली – “बहन! अन्याय मैंने तुम्हारे साथ किया है। मैंने सदा चाहा कि तुम्हारे बच्चे ठीक ना हो। और तो और माता को भी दुर्वचन कहे। उसी का ये परिणाम है कि मेरी बच्ची मृत्यु के मुख में है। निर्मला! तुम माता की प्रिय भक्त हो। मुझे क्षमा कर दो। मैंने जो पाप किया है उसके बाद माता कभी मेरी नहीं सुनेगी किन्तु तुम्हारी प्रार्थना वो नहीं ठुकरा सकती। मेरी सहायता करो मेरी बहन। जिस प्रकार तुमने अपने बच्चों को मृत्यु के मुख से निकला, मेरी बच्ची पर भी कृपा करो। मेरे कर्मों का फल वो क्यों भुगते? उसके प्राण बचा लो, बहन!” निर्मला ने पूर्ण विश्वास से कहा – “विलाप ना करो दीदी। सुशीला क्या मेरी बच्ची नहीं है। माता को उसके प्राण लौटने ही होंगे अन्यथा मुझे मेरे बच्चों का प्राणदान भी नहीं चाहिए।” देवर्षि अवाक् रह गए। ऐसी भक्ति? ऐसा विश्वास? ऐसे भक्त पर कोई विपत्ति कैसे आ सकती है? उन्होंने अंततः सभी को दर्शन दिए और बताया कि कैसे वे माता की आज्ञा से निर्मला की परीक्षा ले रहे थे। उन्होंने निर्मला की भक्ति को नमन किया और उसके उपहार स्वरुप सुशीला को प्राणदान दिया। इतने पर भी उनका जी नहीं भरा। उन्होंने निर्मला से वरदान माँगने को कहा। निर्मला ने शीतला माता की अनन्य भक्ति ही वरदान स्वरुप माँगी। देवर्षि ने कहा – “वाह पुत्री! जो तेरे पास पहले से है उसी को वरदान में माँग लिया। सत्य है, तू ही माता की अनन्य भक्त है।” सबों को आशीर्वाद देकर देवर्षि वापस अपने लोक चले। जाते-जाते उनके मुख से अनायास ही निकला – अनन्य भक्ति से मिलती मातारानी की कृपा अपार। आस्था व विश्वास से ही होता जीवन का उद्धार।।

+170 प्रतिक्रिया 34 कॉमेंट्स • 18 शेयर

कुरुक्षेत्र में हुआ था यह महापाप, इसी कारण श्रीकृष्ण ने इस स्थान को चुना युद्ध के लिए जब महाभारत के युद्ध की तैयारी शुरू की जाने लगी तब वासुदेव नें अपने दूतों को भारत में सभी स्थानों पर भेजा और कहा कि सभी को जो कुछ भी दिखाई दे वे आकर उन्हें बताएं | वापस लौटने पर लोगों ने अपने अपने स्थान का वर्णन किया लेकिन वासुदेव इन सभी से संतुष्ट नहीं हुए | जब उनका एक दूत कुरुक्षेत्र से वापस आया तो उसने कृष्ण को बताया कि वहाँ दो भाई खेती कर रहे थे | बड़े भाई ने छोटे भाई से कहा की वह मेढ़ का जल थोड़ी देर के लिए रोक दे | छोटे भाई ने अपने बड़े भाई को यह काम करने से इनकार कर दिया और कहा कि तुम स्वयं ही कर लो, मैं नहीं करूँगा और मुझे इस प्रकार आदेश मत दिया करो | यह सुनते ही बड़ा भाई गुस्से में आ गया और उसने अपने छोटे भाई का सिर चाकू से काट दिया | इसके बाद वह शव को मेढ़ की और घसीटते हुए ले गया और उसके शव को ही सामने रखकर जल को रोक दिया और वह दोबारा काम पर लग गया | उसे अपने छोटे भाई की हत्या का तनिक भी पछतावा न था | यह सुनते ही तुरंत भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र को महाभारत के लिए सबसे अच्छी जगह बताया और बोल जहां भाई ही आपस में एक दुसरे के प्राणों के दुश्मन हों और जिन्हें अपने भाई की हत्या के बाद भी ज़रा भी पछतावा न हो वह स्थान युद्ध के लिए सर्वोत्तम है |

+154 प्रतिक्रिया 51 कॉमेंट्स • 16 शेयर

प्राचीन भारत का ज्ञान कहाँ गए वो सूक्ष्मता से सोचने वाले ऋषि मुनि ? चिंतन और मनन करे - मकर संक्रांति अकेला ही पश्चिम और अरब के सभी पर्वों पर भारी है: सूर्य की गति पर आधारित यह उत्सव भारत के लाखों वर्षों से खगोल विज्ञान का ज्ञाता होने का प्रमाण है। (सबसे अंतिम पैराग्राफ में पढ़ें किस राज्य में किस नाम से मनाया जाता है यह उत्सव? और क्या क्या खाया जाता है इस मकर संक्रांति में?) मकर संक्रांति में मकर शब्द आकाश में स्थित तारामंडल का नाम है जिसके सामने सूर्य के आने के दिन ही पूरे दिवस मकर संक्रांति मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में लोहड़ी के नाम से यह उत्सव मनाया जाता है सूर्य के मकर राशी में प्रवेश से एक दिन पूर्व। यह उत्सव सूर्य का उत्तरायण में स्वागत का उत्सव है। उत्तरायण का अर्थ है पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के सापेक्ष में स्थित आकाश का भाग अर्थात उत्तरी अयन। जब सूर्य उत्तरायण में आता है तो इसकी किरणें पृथ्वी पर क्रमशः सीधी होने लगती है। जिससे धीरे धीरे गर्मी बढ़ने लगती है। यह सर्दी के ऋतु का अंतकाल माना जाता है। इसीलिए इस उत्सव में सर्दी की बिदाई का भाव भी है। यह समय फसलों से घर भर जाने का है। फसलों से आई समृद्धि को मनाने का उत्सव है यह। ऋतु परिवर्तन के समय मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है। इसीलिए उसके बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे में उस प्रकार के पदार्थों का सेवन किया जाता है जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि हो। भारत के बाहर झांके तो आपको दुनियाँ के किसी भी प्राचीन सभ्यता में ग्रहों, नक्षत्रों, राशियों, उपग्रहों का विस्तृत ज्ञान नहीं मिलेगा। हमारे सनातन धर्मियों को लाखों वर्षों से सूर्य संक्रांति का ज्ञान था। साथ ही सूर्य ग्रहण का ज्ञान भी था। हम सैकड़ों वर्ष पहले ही अपनी गणितीय क्षमता से जान लेते थे कि सूर्य ग्रहण कब, किस दिन, कितने घटी, कितने पल और कितने विपल पर होगा? कितने क्षण में ग्रहण का स्पर्श होगा और कितने निमेष पर ग्रहण का मोक्ष होगा? हमें चंद्र ग्रहण का ज्ञान भी था। चंद्र ग्रहण का विस्तृत ज्ञान हम बहुत समय पूर्व ही कर लिया करते थे। सूर्य की बारह महीनों में बारह संक्रांति होती है। उनको मेष संक्रांति, वृष संक्रांति, मकर संक्रांति, मीन संक्रांति इत्यादि नामों से जाना जाता है। सभी बारह राशियों में सूर्य कितने घटी कितने पल पर प्रवेश करेगा यह हमें ज्ञात था लाखों वर्षों से। सूर्य एक राशी के सामने एक महीना रहता है फिर दूसरे महीने दूसरी राशि के सामने चला जाता है। इस प्रकार पूरे एक वर्ष में बारह महीनों में बारह राशियों का भ्रमण करते हुए सूर्य अपना एक वर्ष पूर्ण कर लेता है। यूरोप वालों को बड़े लंबे प्रयोग के बाद, बड़ी लंबी साधना के बाद सूर्य की गति का बहुत थोड़ा ज्ञान हुआ तो उनलोगों ने अपने आठ महीने के ग्रेगोरियन कैलेंडर को ठीक करके पहले दस महीने का किया। बाद में दो महीने और जोड़कर बारह महीनों का किया। इतने लंबे समय तक कि पूरी यूरोपियन यात्रा में उनको इतना ही पता चल पाया कि सूर्य की पूरी परिक्रमा 365 दिनों की है। बहुत बाद में उनको पता चला कि 365 दिनों के अतिरिक्त भी 6 घंटे का और समय होता है एक सौर वर्ष में। तब उनको लिप ईयर की परिकल्पना हुआ। किन्तु हिंदुओं को तो लाखों वर्षों से यह ज्ञान था कि सूर्य 365 दिन साढ़े 15 घटी में अपना एक वर्ष पूर्ण करता है। इसमें एक घटी को आप घंटा मिनट में बदलेंगे तो एक घटी का अर्थ होगा 24 मिनट। अरब वालों को चांद के आगे का ज्ञान ही नहीं था। सूर्य का थोड़ा ज्ञान हुआ भी तो बड़ा भ्रमपूर्ण ज्ञान था। उन्होंने चंद्रमा की गति के आधार पर अपना कैलेंडर बनाया। यह इंदु अर्थात चंद्रमा की गति पर आश्रित था। इसी इंदु से इदु और इदु से शब्द इद्दत बना। किन्तु वो गिनती में गड़बड़ कर गए। और चंद्रमा की गति के आधार पर ईद देखकर अर्थात इंदु देखकर अर्थात चांद देखकर महीना गिनने लगे। बारह महीनों की बात भारत के व्यापारियों से उनको पता चली थी तो उन्होंने चांद के बारह महीने गिन लिए। अर्थात 28×12=336 दिनों का वर्ष बना लिया। परिणाम उनके वर्ष का तालमेल सूर्य से आज भी नहीं बैठ पाया। और हर सौर वर्ष में उनका त्योहार एक माह पीछे चला जाता है। क्योंकि उनका वर्ष है 336 दिनों का और सूर्य का वर्ष होता है 365 दिन 6 घंटों का। तो इस अनुसार उनका चांद्र वर्ष और पश्चिम के सौर वर्ष में 29 दिनों का अंतर आ जाता है। किन्तु भारत के ऋषियों ने दोनो ही प्रकार के काल गणना को बड़े गहराई से समझा। तभी समझ लिया जब ईसाईयत और इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था। उनके लाखों वर्ष पूर्व ही समझ लिया। और जब सनातनी ऋषियों ने अपना कैलेंडर अर्थात अपना पञ्चाङ्ग बनाया तो उनलोगों न तो सौर पञ्चाङ्ग बनाया और न ही चांद्र पञ्चाङ्ग बनाया। हमारे ऋषियों ने जो पञ्चाङ्ग बनाया वह सौर पञ्चाङ्ग और चांद्र पञ्चाङ्ग का सम्मिलित स्वरूप है। दोनो का समन्वित स्वरूप है। दोनो का तालमेल ऐसा बिठाया है भारत के ऋषियों ने कि हिन्दू पञ्चाङ्ग के एक एक महीने का संबंध ऋतुओं से पूर्व निर्धारित सा प्रतीत होता है। केवल पृथिवी पर घट रही घटनाओं का ही समन्वय नहीं है तो ब्रह्मांड में घट रही घटनाओं का भी समन्वय है इसमें। सूर्य मकर राशी में प्रवेश कर रहा है आकाश में किन्तु उसकी भी गणना है भारतीय पञ्चाङ्ग में। सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण हो रहा है आकाश में किन्तु उन सब की गणना है भारतीय पञ्चाङ्ग में। चांद्र पञ्चाङ्ग और सौर पञ्चाङ्ग का साम्य बिठाने के लिए पञ्चाङ्ग में प्रत्येक दो वर्षों के उपरांत पुरुषोत्तम माह का प्रावधान भी किया गया जिसे मलमास भी कहा जाता है। इस माह को बहुत पवित्र कहा जाता है। भारत में छः ऋतुओं की पूरी परिकल्पना आपको पञ्चाङ्ग में मिल जाएगा। तीन मौसम का ज्ञान तो पूरी दुनियाँ को हो गया है किंतु प्रकृति में घट रही एक एक घटना चाहे वो पृथिवी पर घटित हो या ब्रह्मांड में उन सब का विवरण मिलेगा आपको भारतीय पञ्चाङ्ग में। सूर्य के उत्सव अनेक हैं भारत में। चंद्रमा के उत्सव भी अनेक हैं भारत में। पूर्णिमा और अमावस्या का हिन्दू ज्ञान तो सर्वविदित है जो भारत के बाहर कहीं चर्चा भी नहीं होता। इसी आधार पर माह में दो पक्षों की बात भारतीय मनीषा ने कहा। और चंद्रमा की एक एक तिथि का व्रत आपको मिलेगा। एक एक दिन का राशिफल आपको मिलेगा। क्योंकि चंद्रमा एक नक्षत्र में एक ही दिन रहता है। और एक राशि में लगभग ढाई दिन। चंद्रमा की गति के आधार पर ही करवा चौथ होता है। चंद्रमा की गति के आधार पर ही तीज व्रत अर्थात हरितालिका व्रत होता है। चन्द्रायण व्रत तो बहुत कठिन साधना का अंग माना जाता है भारतीय पर्व परम्परा में। भारत के बहुत बड़े हिस्से में इसे मकर संक्रांति कहा जाता है। इस दिन लोग पवित्र नदियों, सरोवरों में स्नान करते हैं। दान करते हैं। अन्न दान भी और द्रव्य दान भी। तिल और गुड़ से बने विभिन्न मिष्ठान्न का सेवन करते हैं। इसे पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में यह उत्सव एक सप्ताह का मनाया जाता है। मायके से पति के घर उपहार लेकर आती हैं बहुएँ इस दिन। इसी को कहते हैं लोहड़ी का आना। आसाम में इसे बिहू कहा जाता है। आसाम के कुछ क्षेत्रों में इसे माघ बिहू भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे भोगाली बिहू भी कहा जाता है। दक्षिण में इसे पोंगल के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में यह उत्सव चार दिनों का होता है। प्रथम दिवस इसे भोगी पांडीगई कहते हैं। दूसरे दिन थाई पोंगल कहा जाता है। तिसरे दिन माट्टू पोंगल के नाम से जाना जाता है तो चौथे दिन कानम पोंगल के नाम से मनाया जाता है। यह आंध्र में तीन दिन का उत्सव होता है। कर्नाटक के किसानों का यह सुग्गी उत्सव है। कर्नाटक में इसे किछु हाईसुवुडडू के रूप में भी मनाया जाता है। हिमाचल प्रदेश में शिमला के आसपास इसे माघ साज्जि कहा जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में इस उत्सव को घुघुटिया के रूप में मनाया जाता है और कौआ बुलाने की प्राचीन पद्धति के अवशिष्ट रूप में काले कौआ के आवाहन के गीत गाये जाते हैं। उड़ीसा में इसे मकर बासीबा कहकर मनाया जाता है। बंगाल में इसे मागे सक्राति के रुप में मनाते हैं। इस दिन तिल का सेवन स्वास्थ्य वर्द्धक होता है इसीलिए इसे तिल संक्रात भी कहते हैं। केरल में सबरीमाला पर मकर ज्योति जलाकर मकराविलाक्कू मनाया जाता है। गोआ में हल्दी कुमकुम मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दूसरे दिन को मंक्रात के रूप में भी मनाया जाता है। कहीं तिल खाया जाता है तो कहीं खिंचड़ी खाने की प्रथा है। खिचड़ी के चार यार। दहि पापड़ घी अँचार। कई क्षेत्रों में तेहरी भी बनाया जाता है। कहीं गज्जक और रेवड़ी चखा जाता है तो कहीं पतंगबाजी का हुनर तरासा जाता है। कहीं गुड़ से बने अनेकानेक मिष्ठान्न खाये जाते हैं तो कहीं दहिं चूड़ा खाने की प्रथा है। तिल के लड्डू, तीसी के लड्डू, अलसी के लड्डू, धान का लावा तो कहीं जीनोर का लावा, मक्के का लावा, मूंगफली की पट्टी, बादाम की पट्टी, काजू की पट्टी, अखरोट की पट्टी खाया जाता है। अनेक क्षेत्रों में तिलकुट कूटा जाता है। खाने के अनेक व्यंजन विशेष रुप में इसी समय खाया जाता है। जितने भी प्रकार के व्यंजन इस समय बनाये जाते हैं उन सभी सामग्रियों का संबंध इस ऋतु विशेष में स्वास्थ्य रक्षा से है। कैसे इस समय में उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सके? इस आयुर्वेदिक चिंतन पर आधारित हैं ये सभी व्यंजन। इतना समग्र चिंतन केवल और केवल भारत में मिलता है। जिसमें फसल चक्र से लेकर अर्थ चक्र और स्वास्थ्य चक्र से लेकर आयुषचक्र तक का चिंतन भी समाहित है। इस सम्पूर्ण वांग्मय के समक्ष पूरा विश्व बौना है। और भारतीय मनीषा हिमालय से ऊँची ऊँचाई को स्पर्श करता हुआ प्रतीत होता है ।

+157 प्रतिक्रिया 41 कॉमेंट्स • 80 शेयर