Krishna Singh May 4, 2019

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Krishna Singh Mar 18, 2019

आज हम आपको माता दुर्गा के पांच रहस्य बतायेगें,जानकर आप रह जाएंगे हैरान!!!!! या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। हिन्दू धर्म में माता रानी का देवियों में सर्वोच्च स्थान है। उन्हें अम्बे, जगदम्बे, शेरावाली, पहाड़ावाली आदि नामों से पुकारा जाता है। संपूर्ण भारत भूमि पर उनके सैंकड़ों मंदिर है। ज्योतिर्लिंग से ज्यादा शक्तिपीठ है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ये त्रिदेव की पत्नियां हैं। इनकी कथा के बारे में पुराणों में भिन्न भिन्न जानकारियां मिलती है। पुराणों में देवी पुराण देवी में देवी के रहस्य के बारे में खुलासा होता है। आखिर उन अम्बा, जगदम्बा, सर्वेश्वरी आदि के बारे में क्या रहस्य है? यह जानना भी जरूरी है। माता रानी के बारे में संपूर्ण जानकारी रखने वाले ही उनका सच्चा भक्त होता है। हालांकि यह भी सच है कि यहां इस लेख में उनके बारे में संपूर्ण जानकारी नहीं दी जा सकती, लेकिन हम इतना तो बता ही सकते हैं कि आपको क्या क्या जानना चाहिए? माता रानी कौन है? 1.अम्बिका :शिवपुराण के अनुसार उस अविनाशी परब्रह्म (काल) ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की। उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ। तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है। परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह (शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है। वह शक्ति अम्बिका (पार्वती या सती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेव जननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं। सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। पराशक्ति जगतजननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है। एकांकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। उस कालरूप सदाशिव की अर्द्धांगिनी हैं यह शक्ति जिसे जगदम्बा भी कहते हैं। 2.देवी दुर्गा :हिरण्याक्ष के वंश में उत्पन्न एक महा शक्तिशाली दैत्य हुआ, जो रुरु का पुत्र था जिसका नाम दुर्गमासुर था। दुर्गमासुर से सभी देवता त्रस्त हो चले थे। उसने इंद्र की नगरी अमरावती को घेर लिया था। देवता शक्ति से हीन हो गए थे, फलस्वरूप उन्होंने स्वर्ग से भाग जाना ही श्रेष्ठ समझा। भागकर वे पर्वतों की कंदरा और गुफाओं में जाकर छिप गए और सहायता हेतु आदि शक्ति अम्बिका की आराधना करने लगे। देवी ने प्रकट होकर देवताओं को निर्भिक हो जाने का आशीर्वाद दिया। एक दूत ने दुर्गमासुर को यह सभी गाथा बताई और देवताओं की रक्षक के अवतार लेने की बात कहीं। तक्षण ही दुर्गमासुर क्रोधित होकर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्र और अपनी सेना को साथ ले युद्ध के लिए चल पड़ा। घोर युद्ध हुआ और देवी ने दुर्गमासुर सहित उसकी समस्त सेना को नष्ट कर दिया। तभी से यह देवी दुर्गा कहलाने लगी। 3.माता सती :भगवान शंकर को महेश और महादेव भी कहते हैं। उन्हीं शंकर ने सर्वप्रथम दक्ष राजा की पुत्री दक्षायनी से विवाह किया था। इन दक्षायनी को ही सती कहा जाता है। अपने पति शंकर का अपमान होने के कारण सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में कूदकर अपनी देहलीला समाप्त कर ली थी। माता सती की देह को लेकर ही भगवान शंकर जगह-जगह घूमते रहे। जहां-जहां देवी सती के अंग और आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित होते गए। इसके बाद माता सती ने पार्वती के रूप में हिमालयराज के यहां जन्म लेकर भगवान शिव की घोर तपस्या की और फिर से शिव को प्राप्त कर पार्वती के रूप में जगत में विख्यात हुईं। 4.माता पार्वती :माता पार्वती शंकर की दूसरी पत्नीं थीं जो पूर्वजन्म में सती थी। देवी पार्वती के पिता का नाम हिमवान और माता का नाम रानी मैनावती था। माता पार्वती को ही गौरी, महागौरी, पहाड़ोंवाली और शेरावाली कहा जाता है। माता पार्वती को भी दुर्गा स्वरूपा माना गया है, लेकिन वे दुर्गा नहीं है। इन्हीं माता पार्वती के दो पुत्र प्रमुख रूप से माने गए हैं एक श्रीगणेश और दूसरे कार्तिकेय। 5.कैटभा :पद्मपुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में मधु और कैटभ नाम के दोनों भाई हिरण्याक्ष की ओर थे। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार उमा ने कैटभ को मारा था, जिससे वे 'कैटभा' कहलाईं। दुर्गा सप्तसती अनुसार अम्बिका की शक्ति महामाया ने अपने योग बल से दोनों का वध किया था। 6.काली :पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली सती जिसने यज्ञ में कूद कर अपनी जान दे दी थी। यही सती दूसरे जन्म में पार्वती बनकर आई, जिनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं। फिर शिव की एक तीसरी फिर शिव की एक तीसरी पत्नी थीं जिन्हें उमा कहा जाता था। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा गया है। उत्तराखंड में इनका एकमात्र मंदिर है। भगवान शिव की चौथी पत्नी मां काली है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था। काली माता ने ही असुर रक्तबीज का वध किया था। इन्हें दस महाविद्याओं में से प्रमुख माना जाता है। काली भी देवी अम्बा की पुत्री थीं। 7.महिषासुर मर्दिनी: नवदुर्गा में से एक कात्यायन ऋषि की कन्या ने ही रम्भासुर के पुत्र महिषासुर का वध किया था। उसे ब्रह्मा का वरदान था कि वह स्त्री के हाथों ही मारा जाएगा। उसका वध करने के बाद माता महिषसुर मर्दिनी कहलाई। एक अन्य कथा के अनुसार जब सभी देवता उससे युद्ध करने के बाद भी नहीं जीत पाए तो भगवान विष्णु ने कहा ने सभी देवताओं के साथ मिलकर सबकी आदि कारण भगवती महाशक्ति की आराधना की जाए। सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। हिमवान ने भगवती की सवारी के लिए सिंह दिया तथा सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र महामाया की सेवा में प्रस्तुत किए। भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करने का आश्वासन दिया और भयंकर युद्ध के बाद उसका वध कर दिया। 8. तुलजा भवानी और चामुण्डा माता :देशभर में कई जगह पर माता तुलजा भवानी और चामुण्डा माता की पूजा का प्रचलन है। खासकर यह महाराष्ट्र में अधिक है। दरअसल माता अम्बिका ही चंड और मुंड नामक असुरों का वध करने के कारण चामुंडा कहलाई। तुलजा भवानी माता को महिषसुर मर्दिनी भी कहा जाता है। महिषसुर मर्दिनी के बारे में हम ऊपर पहले ही लिख आए हैं। 9.दस महाविद्याएं :दस महाविद्याओं में से कुछ देवी अम्बा है तो कुछ सती या पार्वती हैं तो कुछ राजा दक्ष की अन्य पुत्री। हालांकि सभी को माता काली से जोड़कर देखा जाता है। दस महाविद्याओं ने नाम निम्नलिखित हैं। काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुरभैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला। कहीं कहीं इनके नाम इस क्रम में मिलते हैं:-1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला। नवरात्रि :वर्ष में दो बार नवरात्रि उत्सव का आयोजन होता है। पहले को चैत्र नवरात्रि और दूसरे को आश्विन माह की शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। इस तरह पूरे वर्ष में 18 दिन ही दुर्गा के होते हैं जिसमें से शारदीय नवरात्रि के नौ दिन ही उत्सव मनाया जाता है, जिसे दुर्गोत्सव कहा जाता है। माना जाता है कि चैत्र नवरात्रि शैव तांत्रिकों के लिए होती है। इसके अंतर्गत तांत्रिक अनुष्ठान और कठिन साधनाएं की जाती है तथा दूसी शारदीय नवरात्रि सात्विक लोगों के लिए होती है जो सिर्फ मां की भक्ति तथा उत्सव हेतु है। नौ दुर्गा के नौ मंत्र :- 1. मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्मांडायै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कात्यायनायै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:।' मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्यै नम:।' नवरात्रि व्रत :नवरात्रि में पूरे नौ दिनों के लिए शराब, मांस और सहवास के साथ की अन्न का त्याग कर दिया जाता है। उक्त नौ दिनों में यदि कोई व्यक्ति किसी भी तरह से माता का जाने या अंजाने अपमान करता है तो उसे कड़ी सजा भुगतना होती है। कई लोगों को गरबा उत्सव के नाम पर डिस्को और फिल्मी गीतों पर नाचते देखा गया है। यह माता का घोर अपमान ही है। नवदुर्गा रहस्य :ये नवदुर्गा हैं- 1.शैलपुत्री 2.ब्रह्मचारिणी 3.चंद्रघंटा 4.कुष्मांडा 5.स्कंदमाता 6.कात्यायनी 7.कालरात्रि 8.महागौरी 9.सिद्धिदात्री। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण पार्वती माता को शैलपुत्री भी कहा जाता है। ब्रह्मचारिणी अर्थात जब उन्होंने तपश्चर्या द्वारा शिव को पाया था। चंद्रघंटा अर्थात जिनके मस्तक पर चंद्र के आकार का तिलक है। ब्रह्मांड को उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करने के बाद उन्हें कुष्मांडा कहा जाने लगा। उदर से अंड तक वे अपने भीतर ब्रह्मांड को समेटे हुए हैं, इसीलिए कुष्मांडा कहलाती हैं। कुछ लोगों अनुसार कुष्मांडा नाम के एक समाज द्वारा पूजीत होने के कारण कुष्मांड कहलाई। पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का नाम स्कंद भी है इसीलिए वे स्कंद की माता कहलाती हैं। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्होंने उनके यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था इसीलिए वे कात्यायनी भी कहलाती हैं। उल्लेखनीय है जिस तरह विष्णु के अवतार होते हैं उसी तरह माता के भी। कात्यायन ऋषि की कन्या ने ही महिषासुर का वध किया था। उसका वध करने के बाद वे महिषसुर मर्दिनी कहलाई। कत नमक एक विख्यात महर्षि थे, उनके पुत्र कात्य हुए तथा इन्हीं कात्य के गोत्र में प्रसिद्ध ऋषि कात्यायन उत्पन्न हुए। मां पार्वती देवी काल अर्थात हर तरह के संकट का नाश करने वाली हैं, इसीलिए कालरात्रि कहलाती हैं। माता का वर्ण पूर्णत: गौर अर्थात गौरा (श्वेत) है इसीलिए वे महागौरी कहलाती हैं। हालांकि कुछ पुराणों अनुसार कठोरतप करने के कारण जब उनका वर्ण काला पड़ गया तब शिव ने प्रसंन्न होकर इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से मलकर धोया तब वह विद्युत प्रभा के समान अत्यंत कांतिमान-गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। जो भक्त पूर्णत: उन्हीं के प्रति समर्पित रहता है उसे वे हर प्रकार की सिद्धि दे देती हैं इसीलिए उन्हें सिद्धिदात्री कहा जाता है। सिंह और शेर :प्रत्येक देवी का वाहन अलग अलग है। देवी दुर्गा सिंह पर सवार हैं तो माता पार्वती शेर पर। पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का नाम स्कंद भी है इसीलिए वे स्कंद की माता कहलाती हैं उन्हें सिंह पर सवार दिखाया गया है। कात्यायनी देवी को भी सिंह पर सवार दिखाया गया है। देवी कुष्मांडा शेर पर सवार है। माता चंद्रघंटा भी शेर पर सवार है। जिनकी प्रतिपद और जिनकी अष्टमी को पूजा होती है वे शैलपुत्री और महागौरी वृषभ पर सवारी करती है। माता कालरात्रि की सवारी गधा है तो सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान है। एक कथा अनुसार शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने हजारों वर्ष तक तपस्या की। तपस्या से देवी सांवली हो गई। भगवान शिव से विवाह के बाद एक दिन जब शिव पार्वती साथ बैठे थे तब भगवान शिव ने पार्वती से मजाक करते हुए काली कह दिया। देवी पार्वती को शिव की यह बात चुभ गई और कैलाश छोड़कर वापस तपस्या करने में लीन हो गई। इस बीच एक भूखा शेर देवी को खाने की इच्छा से वहां पहुंचा। लेकिन तपस्या में लीन देवी को देखकर वह चुपचाप बैठ गया। शेर सोचने लगा कि देवी कब तपस्या से उठे और वह उन्हें अपना आहार बना ले। इस बीच कई साल बीत गए लेकिन शेर अपनी जगह डटा रहा। इस बीच देवी पार्वती की तपस्या पूरी होने पर भगवान शिव प्रकट हुए और पार्वती गौरवर्ण यानी गोरी होने का वरदान दिया। इस बाद देवी पार्वती ने गंगा स्नान किया और उनके शरीर से एक सांवली देवी प्रकट हुई जो कौशिकी कहलायी और गौरवर्ण हो जाने के कारण देवी पार्वती गौरी कहलाने लगी। देवी पार्वती ने उस सिंह को अपना वाहन बना लिया जो उन्हें खाने के लिए बैठा था। इसका कारण यह था कि सिंह ने देवी को खाने की प्रतिक्षा में उन पर नजर टिकाए रखकर वर्षो तक उनका ध्यान किया था। देवी ने इसे सिंह की तपस्या मान लिया और अपनी सेवा में ले लिया। इसलिए देवी पार्वती के सिंह और वृष दोनों वाहन माने जाते हैं। देवी का सम्प्रदाय :अम्बे या अम्बिका से संबंधित सभी देवियां का धर्म शाक्त है। हिंदुओं के पांच सम्प्रदाय हैं- वैदिक, वैष्णव, शैव, वैष्णव और स्मार्त। नाथ संप्रदाय को शैव संप्रदाय का उप संप्रदाय माना जाता है। शाक्त सम्प्रदाय को देवी का सम्प्रदाय माना जाता है। सिन्धु घाटी की सभ्यता में भी मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिलते हैं। शाक्त संप्रदाय प्राचीन संप्रदाय है। गुप्तकाल में यह उत्तर-पूर्वी भारत, कम्बोडिया, जावा, बोर्निया और मलाया प्राय:द्वीपों के देशों में लोकप्रिय था। बौद्ध धर्म के प्रचलन के बाद इसका प्रभाव कम हुआ। शाक्त संप्रदाय को शैव संप्रदाय के अंतर्गत माना जाता है। शाक्तों का मानना है कि दुनिया की सर्वोच्च शक्ति स्त्रेण है इसीलिए वे देवी दुर्गा को ही ईश्वर रूप में पूजते हैं। दुनिया के सभी धर्मों में ईश्वर की जो कल्पना की गई है वह पुरुष के समान की गई है। अर्थात ईश्वर पुरुष जैसा हो सकता है किंतु शाक्त धर्म दुनिया का एकमात्र धर्म है जो सृष्टि रचनाकार को जननी या स्त्रेण मानता है। सही मायने में यही एकमात्र धर्म स्त्रियों का धर्म है। शिव तो शव है शक्ति परम प्रकाश है। हालाँकि शाक्त दर्शन की सांख्य समान ही है। शाक्त धर्म का उद्देश्य :सभी का उद्देश्य मोक्ष है फिर भी शक्ति का संचय करो। शक्ति की उपासना करो। शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की हम सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। तभी तो नाथ और शाक्त संप्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियां प्राप्त करते रहते हैं। शक्ति का तीर्थ :माता के सभी मंदिर चमत्कारिक हैं। माता हिंगलाज, नैनादेवी, ज्वालादेवी आदि के चमत्कार के बारे में सभी लोग जानते ही है। 51 या 52 शक्ति पीठों के अलावा माँ दुर्गा के सैंकड़ों प्राचीन मंदिर है। माँ के प्रसिद्ध मंदिरों में कोल्हापुर का तुलजा भवानी मंदिर, गुजरात की पावागढ़ वाली माँ का शक्तिपीठ, विंध्यवासिनी धाम, पाटन देवी, देवास की तुलजा और चामुंडा माता, मेहर की माँ शरदा, कोलकाता की काली माता, जम्मू की वैष्णो देवी, उत्तरांचल की मनसा देवी, नयना देवी, आदि। शाक्त धर्म ग्रंथ :शाक्त सम्प्रदाय में दुर्गा के संबंध में 'श्रीदुर्गा भागवत पुराण' एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें 108 देवीपीठों का वर्णन किया गया है। उनमें से भी 51-52 शक्तिपीठों का खास महत्व है। इसी में दुर्गा सप्तशति है।

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Krishna Singh Mar 15, 2019

56 (छप्पन) भोग क्यों लगाते है... 🔸🔸🔹🔸🔸🔸🔸🔹🔸🔸 भगवान को लगाए जाने वाले भोग की बड़ी महिमा है | इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है | यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी,पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है | अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं | ऐसा भी कहा जाता है कि यशोदाजी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी | अर्थात्...बालकृष्ण आठ बार भोजन करते थे | जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया | आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा, तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ. भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बालकृष्ण को लगाया | गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग... श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कुलदेवी जगदम्बा कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों | श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी | व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया |छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां...ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं |उस कमल की तीन परतें होती हैं... प्रथम परत में "आठ",दूसरी में "सोलह"और तीसरी में "बत्तीस पंखुड़िया" होती हैं | प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं |इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है | 56 संख्या का यही अर्थ है | छप्पन भोग इस प्रकार है 1. भक्त (भात), 2. सूप्पिका (दाल), 3. प्रलेह (चटनी), 4. सदिका (कढ़ी), 5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी), 6. सिखरिणी (श्रीखंड), 7. अवलेह (चटनिया ), 8. बालका (बाटी), 9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा), 10. त्रिकोण (शरक्करपारा), 11. बटक (बड़ा), 12. मधु शीर्षक (मख्खन बडा), 13. फेणिका (फेनी), 14. परिष्टïश्च (पूरी), 15. शतपत्र (खाजा), 16. सधिद्रक (घेवर), 17. चक्राम (मालपुआ), 18. चिल्डिका (चिलडे ), 19. सुधाकुंडलिका (जलेबी), 20. धृतपूर (मेसूर पाक ), 21. वायुपूर (रसगुल्ला), 22. चन्द्रकला (चांदी की बरक वाली मिठाई ), 23. दधि (महारायता), 24. स्थूली (थूली), 25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी), 26. खंड मंडल (खुरमा), 27. गोधूम (दलिया), 28. परिखा, ( रोट ) 29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त), 30. दधिरूप (फलो से बना रायता ), 31. मोदक (लड्डू), 32. शाक (साग), 33. सौधान (अधानौ अचार), 34. मंडका (मोठ), 35. पायस (खीर) 36. दधि (दही), 37. गोघृत, 38. हैयंगपीनम (मक्खन), 39. मंडूरी (मलाई), 40. कूपिका (रबड़ी) 41. पर्पट (पापड़), 42. शक्तिका (बादाम का सीरा), 43. लसिका (लस्सी), 44. सुवत,( शरबत) 45. संघाय (मोहन), 46. सुफला (सुपारी), 47. सिता (इलायची), 48. फल, 49. तांबूल, (पान) 50. मोहन भोग, (मूंग दाल की चक्कि) 51. लवण, (नमकीन व्यंजन) 🌼मुखवास🌼 52. कषाय, (आंवला ) 53. मधुर, ( गुलुकंद) 54. तिक्त, (अदरक ) 55. कटु, (मैथी दाना ) 56. अम्ल ( निम्बू ) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Krishna Singh Mar 9, 2019

महाभारत में छुपा है ये सबसे अद्भुत रहस्य!!!!! महाभारत में कई घटनाएं, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्न, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध ने भारत का इतिहास और भविष्य बदलकर रख दिया। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं। आओ जानते हैं कि महाभारत में ऐसा कौन सा रहस्य छुपा है जिसे आप नहीं जानते हैं। इससे पहले यह जान लें कि महाभारत में क्या-क्या और भी रहस्य छुपे हैं? महाभारत के सभी प्रमुख योद्धा किसी न किसी के अवतार थे। हर योद्धा विचित्र शक्तियों से संपन्न था। महाभारत की महिलाएं भी कम विचित्र नहीं थीं। महाभारत के कुछ ऐसे भी योद्धा हैं, जो आज भी जीवित हैं। कौरवों का जन्म एक रहस्य था। कौरव और पांडव न तो धृतराष्ट्र की संतानें थीं और न पांडु की। महाभारत काल में विमान और परमाणु अस्त्र का प्रयोग हुआ था। महान योद्धा बर्बरीक और घटोत्कच के रहस्य को सभी जानते हैं। महाभारत में रिश्ते एक-दूसरे से उलझे हुए थे। जैसे द्रौपदी के पति, पुत्र, पिता और कृष्ण के भाई-बंधु और पत्नियों का रिलेशन कौरवों से भी था। महाभारत के युद्ध कुरुक्षेत्र में ही लड़े जाने का बहुत बड़ा कारण था। महाभारत में बहुत सी घटनाएं किसी न किसी के श्राप के चलते ही घटी थीं। महाभारत के युद्ध के विचित्र नियम थे लेकिन जब कौरव पक्ष की ओर से अभिमन्यु को मारकर नियम तोड़े गए तो युद्ध की दशा और दिशा बदल गई। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद मौसुल का युद्ध हुआ जिसमें कृष्ण कुल के लोगों का नाश हो गया। अंत में एक रात के लिए जी उठे थे सभी योद्धा। अब जानते हैं सबसे बड़ा और अद्भुत रहस्य : सबसे बड़ा रहस्य : सबसे बड़ा रहस्य लाखों लोगों के शव को लेकर आज भी बरकरार है। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध में कुरुक्षेत्र में इतना खून बहा था कि वहां की मिट्टी का रंग आज भी लाल है। लेकिन अब सोचने वाली बात है कि उन लाखों योद्धाओं के शव का क्या हुआ? कहा जाता है कि जिस दिन जितने भी योद्धा मर जाते थे उनमें से अधिकतर के शव उनके परिजनों को सौंप दिए जाते थे और बाकी शव वहीं पड़े रहते थे। युद्ध के अंत के बाद कहते हैं कि युधिष्ठिर की आज्ञा से कुरुक्षेत्र की भूमि को जला दिया गया था ताकि किसी भी योद्धा का शव न बचे। दूसरा रहस्य यह कि प्रतिदिन लाखों लोगों के लिए युद्ध भूमि के पास ही लगे एक शिविर में भोजन बनता था। युद्ध की शुरुआत के पूर्व के दिन लगभग 45 लाख से अधिक लोगों का भोजन बना। इसके बाद प्रतिदिन जितने योद्धा मर जाते थे उतना भोजन कम कर दिया जाता था, लेकिन यह पता कैसे चलता था कि आज कितने योद्धाओं का भोजन बनाना है? इसके लिए भोजन व्यवस्था देखने वाले उडुपी के राजा हर दिन शाम को जब श्रीकृष्ण को भोजन कराते थे तब श्रीकृष्ण के भोजन करते वक्त उन्हें पता चल जाता था कि कल कितने लोग मरने वाले हैं और कितने बचेंगे। कहते हैं कि इसके लिए श्रीकृष्ण प्रतिदिन उबली हुई मूंगफली या चावल खाते थे। उसी से राजा को पता चलता था कि कल कितने लोग मरेंगे तो मुझे शाम को कितने लोगों का भोजन बनाना है। इस तरह श्रीकृष्ण के कारण हर द‌िन सैन‌िकों को पूरा भोजन म‌िल जाता था और अन्न का एक दाना भी व्यर्थ नहीं जाता था। 1. बगैर रुके लिखा गया महाभारत : - महाभारत ग्रंथ की रचना महर्षि वेदव्यास ने की थी लेकिन इसका लेखन भगवान श्री गणेश ने किया था। भगवान श्री गणेश ने इस शर्त पर महाभारत का लेखन किया था कि महर्षि वेदव्यास बिना रुके ही लगातार इस ग्रंथ के श्लोक बोलते रहेंगे। तब महर्षि वेदव्यास ने भी एक शर्त रखी कि मैं भले ही बिना सोचे-समझे बोलूं लेकिन आप किसी भी श्लोक को बिना समझे लिखे नहीं। बीच-बीच में महर्षि वेदव्यास ने कुछ ऐसे श्लोक बोले जिन्हें समझने में श्री गणेश को थोड़ा समय लगा और इस दौरान महर्षि वेदव्यास अन्य श्लोकों की रचना कर लेते थे। इसके बाद महाभारत ग्रंथ का वाचन सबसे पहले महर्षि वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन ने राजा जन्मेजय की सभा में किया था। राजा जन्मेजय अभिमन्यु के पौत्र तथा परीक्षित के पुत्र थे। इन्होंने ही अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करवाया था। 2. बाद में 3 चरणों में संग्रहीत किए गए श्लोक : - कहते हैं कि कालांतर में इस महाभारत को 3 चरणों में संग्रहीत किया गया। पहले चरण में 8,800 श्लोक, दूसरे चरण में 24,000 और तीसरे चरण में 1 लाख श्लोक। वेदव्यास की महाभारत के अलावा भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे की संस्कृत महाभारत सबसे प्रामाणिक मानी जाती है। अंग्रेजी में संपूर्ण महाभारत 2 बार अनूदित की गई थी। पहला अनुवाद 1883-1896 के बीच किसारी मोहन गांगुली ने किया था और दूसरा मनमंथनाथ दत्त ने 1895 से 1905 के बीच। 100 साल बाद डॉ. देबरॉय तीसरी बार संपूर्ण महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद कर रहे हैं। 3. 28वें वेदव्यास ने लिखी महाभारत :- ज्यादातर लोग यह जानते हैं कि महाभारत को वेदव्यास ने लिखा है लेकिन यह अधूरा सच है। वेदव्यास कोई नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों का ज्ञान रखने वाले लोगों को दी जाती थी। कृष्णद्वैपायन से पहले 27 वेदव्यास हो चुके थे, जबकि वे खुद 28वें वेदव्यास थे। उनका नाम कृष्णद्वैपायन इसलिए रखा गया, क्योंकि उनका रंग सांवला (कृष्ण) था और वे एक द्वीप पर जन्मे थे। 4. 18 के अंक का रहस्य : - महाभारत युद्ध में 18 की संख्या का बहुत महत्व है। महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिनों तक अर्जुन को ज्ञान दिया। कृष्ण के कुल के 18 समुदायों ने ही मथुरा से पलायन किया था। 18 दिन तक ही युद्ध चला। गीता में भी 18 अध्याय हैं। कौरवों और पांडवों की सेना में भी कुल 18 अक्षोहिनी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिनी सेना थी। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार 18 ही थे। 5. प्रमुख सूत्रधार और बच गए योद्धा 18 थे : - धृतराष्ट्र, दुर्योधन, दुशासन, कर्ण, शकुनि, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी एवं विदुर। महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे जिनके नाम हैं- कौरव के : कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा, जबकि पांडवों की ओर से युयुत्सु, युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, कृष्ण, सात्यकि आदि। लाखों लोगों के मारे जाने के बाद लगभग 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गए थे। माना जाता है कि महाभारत युद्ध में एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु था। 6. महाभारत के प्रमुख श्राप : जैसे पूर्व जन्म में राजा शांतनु महाभिष थे। ब्रह्मा की सेवा में वे उपस्थित थे तब वे गंगा पर मोहित होकर उसे एकटक देखने लगे। तब ब्रह्मा ने उन्हें मनुष्य योनि में दु:ख झेलने का श्राप दे दिया। इसके बाद वशिष्ठ ऋषि ने आठों वसुओं को मनुष्य योनि में जाने का शाप दिया था जिसमें से एक गंगा पुत्र देवव्रत अर्थात भीष्म पितामह भी थे। अम्बा के शाप ने भीष्म को उनके अंत का शाप दिया था। पांडु को ऋषि किंदम ने सहवास के दौरान मर जाने का श्राप दिया था इसलिए पांडु के कोई पुत्र नहीं हुआ। सभी पांडव देवताओं के पुत्र हैं। कर्ण को परशुराम ने श्राप दिया था। अर्जुन को उर्वशी ने श्राप दिया था। कृष्ण को गांधारी ने श्राप दिया था। अश्वत्थामा को श्रीकृष्ण ने श्राप दिया था। महर्षि मैत्रेय ने दुर्योधन को श्राप दिया था। द्रौपदी ने घटोत्कच को श्राप दिया था। दुर्वासा ऋषि ने कृष्ण के पुत्र साम्ब को श्राप दिया था। युधिष्ठिर ने दिया था सभी स्त्रियों को यह श्राप की उनके पेट में कोई बात नहीं टिकेगी, व्यासजी ने काशी नगरी को दिया श्राप। माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप। द्रौपदी ने कुत्तों को दिया श्राप। अंत में राजा परीक्षित को शमीक ऋषि ने श्राप दिया था। अंत में श्रीकृष्ण की बातें : - श्रीकृष्ण और 8 का अंक : भविष्यवाणी के अनुसार विष्णु को देवकी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लेना था, तो उन्होंने अपने 8वें अवतार के रूप में 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के 7 मुहूर्त निकल गए और 8वां उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5126 वर्ष पूर्व) को हुआ हुआ। ज्योतिषियों के अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था। श्रीकृष्ण के 8 पन्नियां थीं। उनके जीवन में 8 नगरों का महत्व ज्यादा रहा। मथुरा, गोकुल, गोवर्धन, वृंदावन, अवंतिका, हस्तिनापुर, द्वारिका और प्रभाष क्षेत्र। युद्ध को सिर्फ कृष्ण ने ही संचालित किया था : - महाभारत की प्रत्येक घटना को श्रीकृष्ण ही संचालित करते हुए नजर आते हैं। दुर्योधन को माता के समक्ष नग्न जाने से रोकना, कर्ण के कवच कुंडलों को इन्द्र द्वारा दान में मांग लेना, बर्बरीक से दान में उसका शीश मांग लेना और युक्तिपूर्वक कर्ण, द्रोण और भीष्म को युद्ध में मरवा देना- ये सभी श्रीकृष्ण की नीति से ही संभव होता है। श्रीकृष्ण के कारण ही यह युद्ध हुआ और उन्हीं ने इस युद्ध को पांडवों के पक्ष में विजित किया।

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Krishna Singh Mar 8, 2019

देवी विंध्यवासिनी और कृष्ण के बीच क्या था संबंध???? भगवान शंकर प्रथम तो भगवान श्रीकृष्ण अंतिम हैं। संपूर्ण हिन्दू धर्म इन दोनों के ही इर्द-गिर्द घुमता है। भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। अर्थात जो हर तरह से पूर्ण हैं और जो पूर्णत: विष्णु ही है। भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में सैंकड़ों रहस्य है लेकिन बहुत कम लोग ही उन सभी रहस्यों को जानते होंगे। एक रहस्य यह भी है कि माता विंध्यवासिनी भगवान श्रीकृष्ण की क्या लगती थीं? भगवान् श्रीकृष्ण की परदादी मारिषा एवं सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) दोनों ही नाग जनजाति की थीं। भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था। भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है। इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं। इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी। श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया था तथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई। कहते हैं कि योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे। हालांकि गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे। श्रीमद्भागवत पुरा में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है जबकि शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है। भारत में विंध्यवासिनी देवी का चमत्कारिक मंदिर विंध्याचल की पहाड़ी श्रृंखला के मध्य (मिर्जापुर, उत्तर) पतित पावनी गंगा के कंठ पर बसा हुआ है। प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां मां विंध्यवासिनी निवास करती हैं। यह तीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा तट पर स्थित है। यहां तीन किलोमीटर के दायरे में अन्य दो प्रमुख देवियां भी विराजमान हैं। निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। हालांकि कुछ विद्वान इस 51 शक्तिपीठों में शामिल नहीं करते हैं लेकिन 108 शक्तिपीठों में जरूर इनका नाम मिलता है। शिव पुराण अनुसार मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं, लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है। मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने आते हैं जहां संकल्प मात्र से साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है। मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं।

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Krishna Singh Mar 4, 2019

शिव सहस्त्रनामावली 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 ऊँ स्थिराय नमः, ऊँ स्थाणवे नमः, ऊँ प्रभवे नमः, ऊँ भीमाय नमः, ऊँ प्रवराय नमः, ऊँ वरदाय नमः, ऊँ वराय नमः, ऊँ सर्वात्मने नमः, ऊँ सर्वविख्याताय नमः, ऊँ सर्वस्मै नमः ऊँ सर्वकाराय नमः, ऊँ भवाय नमः, ऊँ जटिने नमः, ऊँ चर्मिणे नमः,ऊँ शिखण्डिने नमः, ऊँ सर्वांङ्गाय नमः, ऊँ सर्वभावाय नमः, ऊँ हराय नमः, ऊँ हरिणाक्षाय नमः, ऊँ सर्वभूतहराय नमः ऊँ प्रभवे नमः, ऊँ प्रवृत्तये नमः, ऊँ निवृत्तये नमः, ऊँ नियताय नमः, ऊँ शाश्वताय नमः, ऊँ ध्रुवाय नमः, ऊँ श्मशानवासिने नमः, ऊँ भगवते नमः, ऊँ खेचराय नमः, ऊँ गोचराय नमः ऊँ अर्दनाय नमः, ऊँ अभिवाद्याय नमः, ऊँ महाकर्मणे नमः, ऊँ तपस्विने नमः, ऊँ भूतभावनाय नमः, ऊँ उन्मत्तवेषप्रच्छन्नाय नमः, ऊँ सर्वलोकप्रजापतये नमः, ऊँ महारूपाय नमः, ऊँ महाकायाय नमः, ऊँ वृषरूपाय नमः ऊँ महायशसे नमः, ऊँ महात्मने नमः, ऊँ सर्वभूतात्मने नमः, ऊँ विश्वरूपाय नमः, ऊँ महाहनवे नमः, ऊँ लोकपालाय नमः, ऊँ अंतर्हितात्मने नमः, ऊँ प्रसादाय नमः, ऊँ हयगर्दभाय नमः, ऊँ पवित्राय नमः(५०) ऊँ महते नमः, ऊँ नियमाय नमः, ऊँ नियमाश्रिताय नमः, ऊँ सर्वकर्मणे नमः, ऊँ स्वयंभूताय नमः, ऊँ आदये नमः, ऊँ आदिकराय नमः, ऊँ निधये नमः, ऊँ सहस्राक्षाय नमः, ऊँ विशालाक्षाय नमः, ऊँ सोमाय नमः, ऊँ नक्षत्रसाधकाय नमः, ऊँ चंद्राय नमः, ऊँ सूर्याय नमः, ऊँ शनये नमः, ऊँ केतवे नमः, ऊँ ग्रहाय नमः, ऊँ ग्रहपतये नमः, ऊँ वराय नमः, ऊँ अत्रये नमः, ऊँ अत्र्यानमस्कर्त्रे नमः, ऊँ मृगबाणार्पणाय नमः, ऊँ अनघाय नमः,ऊँ महातपसे नमः, ऊँ घोरतपसे नमः, ऊँ अदीनाय नमः, ऊँ दीनसाधककराय नमः, ऊँ संवत्सरकराय नमः, ऊँ मंत्राय नमः, ऊँ प्रमाणाय नमः, ऊँ परमन्तपाय नमः, ऊँ योगिने नमः, ऊँ योज्याय नमः, ऊँ महाबीजाय नमः, ऊँ महारेतसे नमः, ऊँ महाबलाय नमः, ऊँ सुवर्णरेतसे नमः, ऊँ सर्वज्ञाय नमः, ऊँ सुबीजाय नमः, ऊँ बीजवाहनाय नमः, ऊँ दशबाहवे नमः, ऊँ अनिमिषाय नमः, ऊँ नीलकण्ठाय नमः, ऊँ उमापतये नमः, ऊँ विश्वरूपाय नमः, ऊँ स्वयंश्रेष्ठाय नमः, ऊँ बलवीराय नमः, ऊँ अबलोगणाय नमः, ऊँ गणकर्त्रे नमः, ऊँ गणपतये नमः (१००) ऊँ दिग्वाससे नमः, ऊँ कामाय नमः, ऊँ मंत्रविदे नमः, ऊँ परममन्त्राय नमः, ऊँ सर्वभावकराय नमः, ऊँ हराय नमः, ऊँ कमण्डलुधराय नमः, ऊँ धन्विते नमः, ऊँ बाणहस्ताय नमः, ऊँ कपालवते नमः, ऊँ अशनिने नमः, ऊँ शतघ्निने नमः, ऊँ खड्गिने नमः, ऊँ पट्टिशिने नमः, ऊँ आयुधिने नमः, ऊँ महते नमः, ऊँ स्रुवहस्ताय नमः, ऊँ सुरूपाय नमः, ऊँ तेजसे नमः, ऊँ तेजस्करनिधये नमः ऊँ उष्णीषिणे नमः, ऊँ सुवक्त्राय नमः, ऊँ उदग्राय नमः, ऊँ विनताय नमः, ऊँ दीर्घाय नमः, ऊँ हरिकेशाय नमः, ऊँ सुतीर्थाय नमः, ऊँ कृष्णाय नमः, ऊँ श्रृगालरूपाय नमः,ऊँ सिद्धार्थाय नमः ऊँ मुण्डाय नमः, ऊँ सर्वशुभंकराय नमः, ऊँ अजाय नमः, ऊँ बहुरूपाय नमः, ऊँ गन्धधारिणे नमः, ऊँ कपर्दिने नमः, ऊँ उर्ध्वरेतसे नमः, ऊँ उर्ध्वलिंगाय नमः, ऊँ उर्ध्वशायिने नमः, ऊँ नभस्थलाय नमः, ऊँ त्रिजटाय नमः, ऊँ चीरवाससे नमः,ऊँ रूद्राय नमः, ऊँ सेनापतये नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ अहश्चराय नमः, ऊँ नक्तंचराय नमः, ऊँ तिग्ममन्यवे नमः, ऊँ सुवर्चसाय नमः, ऊँ गजघ्ने नमः (१५०) ऊँ दैत्यघ्ने नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ लोकधात्रे नमः, ऊँ गुणाकराय नमः, ऊँ सिंहसार्दूलरूपाय नमः, ऊँ आर्द्रचर्माम्बराय नमः, ऊँ कालयोगिने नमः, ऊँ महानादाय नमः, ऊँ सर्वकामाय नमः, ऊँ चतुष्पथाय नमः, ऊँ निशाचराय नमः, ऊँ प्रेतचारिणे नमः, ऊँ भूतचारिणे नमः, ऊँ महेश्वराय नमः, ऊँ बहुभूताय नमः,ऊँ बहुधराय नमः, ऊँ स्वर्भानवे नमः, ऊँ अमिताय नमः, ऊँ गतये नमः, ऊँ नृत्यप्रियाय नमः, ऊँ नृत्यनर्ताय नमः, ऊँ नर्तकाय नमः, ऊँ सर्वलालसाय नमः, ऊँ घोराय नमः, ऊँ महातपसे नमः,ऊँ पाशाय नमः, ऊँ नित्याय नमः, ऊँ गिरिरूहाय नमः, ऊँ नभसे नमः, ऊँ सहस्रहस्ताय नमः, ऊँ विजयाय नमः, ऊँ व्यवसायाय नमः, ऊँ अतन्द्रियाय नमः, ऊँ अधर्षणाय नमः, ऊँ धर्षणात्मने नमः, ऊँ यज्ञघ्ने नमः, ऊँ कामनाशकाय नमः, ऊँ दक्षयागापहारिणे नमः, ऊँ सुसहाय नमः, ऊँ मध्यमाय नमः, ऊँ तेजोपहारिणे नमः, ऊँ बलघ्ने नमः, ऊँ मुदिताय नमः, ऊँ अर्थाय नमः, ऊँ अजिताय नमः, ऊँ अवराय नमः, ऊँ गम्भीरघोषाय नमः, ऊँ गम्भीराय नमः, ऊँ गंभीरबलवाहनाय नमः, ऊँ न्यग्रोधरूपाय नमः (२००) ऊँ न्यग्रोधाय नमः, ऊँ वृक्षकर्णस्थितये नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ सुतीक्ष्णदशनाय नमः, ऊँ महाकायाय नमः, ऊँ महाननाय नमः,ऊँ विश्वकसेनाय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ यज्ञाय नमः, ऊँ संयुगापीडवाहनाय नमः, ऊँ तीक्ष्णतापाय नमः, ऊँ हर्यश्वाय नमः, ऊँ सहायाय नमः, ऊँ कर्मकालविदे नमः, ऊँ विष्णुप्रसादिताय नमः, ऊँ यज्ञाय नमः, ऊँ समुद्राय नमः, ऊँ वडमुखाय नमः, ऊँ हुताशनसहायाय नमः, ऊँ प्रशान्तात्मने नमः,ऊँ हुताशनाय नमः, ऊँ उग्रतेजसे नमः, ऊँ महातेजसे नमः, ऊँ जन्याय नमः, ऊँ विजयकालविदे नमः, ऊँ ज्योतिषामयनाय नमः, ऊँ सिद्धये नमः, ऊँ सर्वविग्रहाय नमः, ऊँ शिखिने नमः, ऊँ मुण्डिने नमः, ऊँ जटिने नमः, ऊँ ज्वालिने नमः, ऊँ मूर्तिजाय नमः, ऊँ मूर्ध्दगाय नमः, ऊँ बलिने नमः, ऊँ वेणविने नमः, ऊँ पणविने नमः, ऊँ तालिने नमः, ऊँ खलिने नमः, ऊँ कालकंटकाय नमः, ऊँ नक्षत्रविग्रहमतये नमः, ऊँ गुणबुद्धये नमः, ऊँ लयाय नमः, ऊँ अगमाय नमः, ऊँ प्रजापतये नमः, ऊँ विश्वबाहवे नमः,ऊँ विभागाय नमः, ऊँ सर्वगाय नमः, ऊँ अमुखाय नमः, ऊँ विमोचनाय नमः (२५०) ऊँ सुसरणाय नमः, ऊँ हिरण्यकवचोद्भाय नमः, ऊँ मेढ्रजाय नमः,ऊँ बलचारिणे नमः, ऊँ महीचारिणे नमः, ऊँ स्रुत्याय नमः, ऊँ सर्वतूर्यनिनादिने नमः, ऊँ सर्वतोद्यपरिग्रहाय नमः, ऊँ व्यालरूपाय नमः, ऊँ गुहावासिने नमः, ऊँ गुहाय नमः, ऊँ मालिने नमः, ऊँ तरंगविदे नमः, ऊँ त्रिदशाय नमः, ऊँ त्रिकालधृगे नमः,ऊँ कर्मसर्वबन्ध–विमोचनाय नमः, ऊँ असुरेन्द्राणां बन्धनाय नमः, ऊँ युधि शत्रुवानाशिने नमः, ऊँ सांख्यप्रसादाय नमः, ऊँ दुर्वाससे नमः, ऊँ सर्वसाधुनिषेविताय नमः, ऊँ प्रस्कन्दनाय नमः, ऊँ विभागज्ञाय नमः, ऊँ अतुल्याय नमः, ऊँ यज्ञविभागविदे नमः, ऊँ सर्वचारिणे नमः, ऊँ सर्ववासाय नमः, ऊँ दुर्वाससे नमः,ऊँ वासवाय नमः, ऊँ अमराय नमः, ऊँ हैमाय नमः, ऊँ हेमकराय नमः, ऊँ अयज्ञसर्वधारिणे नमः, ऊँ धरोत्तमाय नमः, ऊँ लोहिताक्षाय नमः, ऊँ महाक्षाय नमः, ऊँ विजयाक्षाय नमः, ऊँ विशारदाय नमः, ऊँ संग्रहाय नमः, ऊँ निग्रहाय नमः, ऊँ कर्त्रे नमः, ऊँ सर्पचीरनिवसनाय नमः, ऊँ मुख्याय नमः, ऊँ अमुख्याय नमः, ऊँ देहाय नमः, ऊँ काहलये नमः, ऊँ सर्वकामदाय नमः, ऊँ सर्वकालप्रसादाय नमः, ऊँ सुबलाय नमः, ऊँ बलरूपधृगे नमः(३००) ऊँ सर्वकामवराय नमः, ऊँ सर्वदाय नमः, ऊँ सर्वतोमुखाय नमः,ऊँ आकाशनिर्विरूपाय नमः, ऊँ निपातिने नमः, ऊँ अवशाय नमः,ऊँ खगाय नमः, ऊँ रौद्ररूपाय नमः, ऊँ अंशवे नमः, ऊँ आदित्याय नमः, ऊँ बहुरश्मये नमः, ऊँ सुवर्चसिने नमः, ऊँ वसुवेगाय नमः,ऊँ महावेगाय नमः, ऊँ मनोवेगाय नमः, ऊँ निशाचराय नमः, ऊँ सर्ववासिने नमः, ऊँ श्रियावासिने नमः, ऊँ उपदेशकराय नमः, ऊँ अकराय नमः, ऊँ मुनये नमः, ऊँ आत्मनिरालोकाय नमः, ऊँ संभग्नाय नमः, ऊँ सहस्रदाय नमः, ऊँ पक्षिणे नमः, ऊँ पक्षरूपाय नमः, ऊँ अतिदीप्ताय नमः, ऊँ विशाम्पतये नमः, ऊँ उन्मादाय नमः, ऊँ मदनाय नमः, ऊँ कामाय नमः, ऊँ अश्वत्थाय नमः, ऊँ अर्थकराय नमः, ऊँ यशसे नमः, ऊँ वामदेवाय नमः, ऊँ वामाय नमः, ऊँ प्राचे नमः, ऊँ दक्षिणाय नमः, ऊँ वामनाय नमः, ऊँ सिद्धयोगिने नमः, ऊँ महर्षये नमः, ऊँ सिद्धार्थाय नमः, ऊँ सिद्धसाधकाय नमः, ऊँ भिक्षवे नमः, ऊँ भिक्षुरूपाय नमः, ऊँ विपणाय नमः, ऊँ मृदवे नमः, ऊँ अव्ययाय नमः, ऊँ महासेनाय नमः, ऊँ विशाखाय नमः (३५०) ऊँ षष्टिभागाय नमः, ऊँ गवाम्पतये नमः, ऊँ वज्रहस्ताय नमः,ऊँ विष्कम्भिने नमः, ऊँ चमुस्तंभनाय नमः, ऊँ वृत्तावृत्तकराय नमः, ऊँ तालाय नमः, ऊँ मधवे नमः, ऊँ मधुकलोचनाय नमः, ऊँ वाचस्पतये नमः, ऊँ वाजसनाय नमः, ऊँ नित्यमाश्रमपूजिताय नमः, ऊँ ब्रह्मचारिणे नमः, ऊँ लोकचारिणे नमः, ऊँ सर्वचारिणे नमः, ऊँ विचारविदे नमः, ऊँ ईशानाय नमः, ऊँ ईश्वराय नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ निशाचारिणे नमः, ऊँ पिनाकधृगे नमः, ऊँ निमितस्थाय नमः, ऊँ निमित्ताय नमः, ऊँ नन्दये नमः, ऊँ नन्दिकराय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ नन्दीश्वराय नमः, ऊँ नन्दिने नमः, ऊँ नन्दनाय नमः, ऊँ नंन्दीवर्धनाय नमः, ऊँ भगहारिणे नमः, ऊँ निहन्त्रे नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ ब्रह्मणे नमः, ऊँ पितामहाय नमः, ऊँ चतुर्मुखाय नमः, ऊँ महालिंगाय नमः, ऊँ चारूलिंगाय नमः, ऊँ लिंगाध्यक्षाय नमः, ऊँ सुराध्यक्षाय नमः,ऊँ योगाध्यक्षाय नमः, ऊँ युगावहाय नमः, ऊँ बीजाध्यक्षाय नमः,ऊँ बीजकर्त्रे नमः, ऊँ अध्यात्मानुगताय नमः, ऊँ बलाय नमः, ऊँ इतिहासाय नमः, ऊँ सकल्पाय नमः, ऊँ गौतमाय नमः, ऊँ निशाकराय नमः (४००) ऊँ दम्भाय नमः, ऊँ अदम्भाय नमः, ऊँ वैदम्भाय नमः, ऊँ वश्याय नमः, ऊँ वशकराय नमः, ऊँ कलये नमः, ऊँ लोककर्त्रे नमः, ऊँ पशुपतये नमः, ऊँ महाकर्त्रे नमः, ऊँ अनौषधाय नमः, ऊँ अक्षराय नमः, ऊँ परब्रह्मणे नमः, ऊँ बलवते नमः, ऊँ शक्राय नमः, ऊँ नीतये नमः, ऊँ अनीतये नमः, ऊँ शुद्धात्मने नमः, ऊँ मान्याय नमः, ऊँ शुद्धाय नमः, ऊँ गतागताय नमः, ऊँ बहुप्रसादाय नमः, ऊँ सुस्पप्नाय नमः, ऊँ दर्पणाय नमः,ऊँ अमित्रजिते नमः, ऊँ वेदकराय नमः, ऊँ मंत्रकराय नमः, ऊँ विदुषे नमः, ऊँ समरमर्दनाय नमः, ऊँ महामेघनिवासिने नमः, ऊँ महाघोराय नमः, ऊँ वशिने नमः, ऊँ कराय नमः, ऊँ अग्निज्वालाय नमः, ऊँ महाज्वालाय नमः, ऊँ अतिधूम्राय नमः,ऊँ हुताय नमः, ऊँ हविषे नमः, ऊँ वृषणाय नमः, ऊँ शंकराय नमः,ऊँ नित्यंवर्चस्विने नमः, ऊँ धूमकेताय नमः, ऊँ नीलाय नमः, ऊँ अंगलुब्धाय नमः, ऊँ शोभनाय नमः, ऊँ निरवग्रहाय नमः, ऊँ स्वस्तिदायकाय नमः, ऊँ स्वस्तिभावाय नमः, ऊँ भागिने नमः,ऊँ भागकराय नमः, ऊँ लघवे नमः(४५०) ऊँ उत्संगाय नमः, ऊँ महांगाय नमः, ऊँ महागर्भपरायणाय नमः, ऊँ कृष्णवर्णाय नमः,ऊँ सुवर्णाय नमः, ऊँ सर्वदेहिनामिनिन्द्राय नमः, ऊँ महापादाय नमः, ऊँ महाहस्ताय नमः, ऊँ महाकायाय नमः, ऊँ महायशसे नमः, ऊँ महामूर्धने नमः, ऊँ महामात्राय नमः, ऊँ महानेत्राय नमः, ऊँ निशालयाय नमः, ऊँ महान्तकाय नमः, ऊँ महाकर्णाय नमः, ऊँ महोष्ठाय नमः, ऊँ महाहनवे नमः, ऊँ महानासाय नमः,ऊँ महाकम्बवे नमः, ऊँ महाग्रीवाय नमः, ऊँ श्मशानभाजे नमः,ऊँ महावक्षसे नमः, ऊँ महोरस्काय नमः, ऊँ अंतरात्मने नमः, ऊँ मृगालयाय नमः, ऊँ लंबनाय नमः, ऊँ लम्बितोष्ठाय नमः, ऊँ महामायाय नमः, ऊँ पयोनिधये नमः, ऊँ महादन्ताय नमः, ऊँ महाद्रष्टाय नमः, ऊँ महाजिह्वाय नमः, ऊँ महामुखाय नमः, ऊँ महारोम्णे नमः, ऊँ महाकोशाय नमः, ऊँ महाजटाय नमः, ऊँ प्रसन्नाय नमः, ऊँ प्रसादाय नमः, ऊँ प्रत्ययाय नमः, ऊँ गिरिसाधनाय नमः, ऊँ स्नेहनाय नमः, ऊँ अस्नेहनाय नमः, ऊँ अजिताय नमः, ऊँ महामुनये नमः, ऊँ वृक्षाकाराय नमः, ऊँ वृक्षकेतवे नमः, ऊँ अनलाय नमः, ऊँ वायुवाहनाय नमः (५००) ऊँ गण्डलिने नमः, ऊँ मेरूधाम्ने नमः, ऊँ देवाधिपतये नमः, ऊँ अथर्वशीर्षाय नमः, ऊँ सामास्या नमः, ऊँ ऋक्सहस्रामितेक्षणाय नमः, ऊँ यजुः पादभुजाय नमः, ऊँ गुह्याय नमः, ऊँ प्रकाशाय नमः, ऊँ जंगमाय नमः, ऊँ अमोघार्थाय नमः, ऊँ प्रसादाय नमः, ऊँ अभिगम्याय नमः, ऊँ सुदर्शनाय नमः, ऊँ उपकाराय नमः, ऊँ प्रियाय नमः, ऊँ सर्वाय नमः, ऊँ कनकाय नमः, ऊँ काञ्चनवच्छये नमः, ऊँ नाभये नमः, ऊँ नन्दिकराय नमः, ऊँ भावाय नमः, ऊँ पुष्करथपतये नमः, ऊँ स्थिराय नमः, ऊँ द्वादशाय नमः, ऊँ त्रासनाय नमः, ऊँ आद्याय नमः, ऊँ यज्ञाय नमः, ऊँ यज्ञसमाहिताय नमः, ऊँ नक्तंस्वरूपाय नमः, ऊँ कलये नमः, ऊँ कालाय नमः, ऊँ मकराय नमः, ऊँ कालपूजिताय नमः, ऊँ सगणाय नमः, ऊँ गणकराय नमः, ऊँ भूतवाहनसारथये नमः, ऊँ भस्मशयाय नमः, ऊँ भस्मगोप्त्रे नमः, ऊँ भस्मभूताय नमः, ऊँ तरवे नमः, ऊँ गणाय नमः, ऊँ लोकपालाय नमः, ऊँ आलोकाय नमः, ऊँ महात्मने नमः, ऊँ सर्वपूजिताय नमः, ऊँ शुक्लाय नमः, ऊँ त्रिशुक्लाय नमः, ऊँ संपन्नाय नमः, ऊँ शुचये नमः (५५०) ऊँ भूतनिशेविताय नमः, ऊँ आश्रमस्थाय नमः, ऊँ क्रियावस्थाय नमः, ऊँ विश्वकर्ममतये नमः, ऊँ वराय नमः, ऊँ विशालशाखाय नमः, ऊँ ताम्रोष्ठाय नमः, ऊँ अम्बुजालाय नमः, ऊँ सुनिश्चलाय नमः, ऊँ कपिलाय नमः, ऊँ कपिशाय नमः, ऊँ शुक्लाय नमः, ऊँ आयुषे नमः, ऊँ पराय नमः, ऊँ अपराय नमः, ऊँ गंधर्वाय नमः, ऊँ अदितये नमः, ऊँ ताक्ष्याय नमः, ऊँ सुविज्ञेयाय नमः, ऊँ सुशारदाय नमः, ऊँ परश्वधायुधाय नमः, ऊँ देवाय नमः, ऊँ अनुकारिणे नमः, ऊँ सुबान्धवाय नमः, ऊँ तुम्बवीणाय नमः, ऊँ महाक्रोधाय नमः, ऊँ ऊर्ध्वरेतसे नमः, ऊँ जलेशयाय नमः, ऊँ उग्राय नमः, ऊँ वंशकराय नमः, ऊँ वंशाय नमः, ऊँ वंशानादाय नमः, ऊँ अनिन्दिताय नमः, ऊँ सर्वांगरूपाय नमः, ऊँ मायाविने नमः, ऊँ सुहृदे नमः, ऊँ अनिलाय नमः, ऊँ अनलाय नमः, ऊँ बन्धनाय नमः, ऊँ बन्धकर्त्रे नमः, ऊँ सुवन्धनविमोचनाय नमः, ऊँ सयज्ञयारये नमः, ऊँ सकामारये नमः, ऊँ महाद्रष्टाय नमः, ऊँ महायुधाय नमः, ऊँ बहुधानिन्दिताय नमः, ऊँ शर्वाय नमः, ऊँ शंकराय नमः, ऊँ शं कराय नमः, ऊँ अधनाय नमः (६००) ऊँ अमरेशाय नमः, ऊँ महादेवाय नमः, ऊँ विश्वदेवाय नमः, ऊँ सुरारिघ्ने नमः, ऊँ अहिर्बुद्धिन्याय नमः, ऊँ अनिलाभाय नमः, ऊँ चेकितानाय नमः, ऊँ हविषे नमः, ऊँ अजैकपादे नमः, ऊँ कापालिने नमः, ऊँ त्रिशंकवे नमः, ऊँ अजिताय नमः, ऊँ शिवाय नमः, ऊँ धन्वन्तरये नमः, ऊँ धूमकेतवे नमः, ऊँ स्कन्दाय नमः, ऊँ वैश्रवणाय नमः, ऊँ धात्रे नमः, ऊँ शक्राय नमः, ऊँ विष्णवे नमः, ऊँ मित्राय नमः, ऊँ त्वष्ट्रे नमः, ऊँ ध्रुवाय नमः, ऊँ धराय नमः, ऊँ प्रभावाय नमः, ऊँ सर्वगोवायवे नमः, ऊँ अर्यम्णे नमः, ऊँ सवित्रे नमः, ऊँ रवये नमः, ऊँ उषंगवे नमः, ऊँ विधात्रे नमः, ऊँ मानधात्रे नमः, ऊँ भूतवाहनाय नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ वर्णविभाविने नमः, ऊँ सर्वकामगुणवाहनाय नमः, ऊँ पद्मनाभाय नमः, ऊँ महागर्भाय नमः, चन्द्रवक्त्राय नमः, ऊँ अनिलाय नमः, ऊँ अनलाय नमः, ऊँ बलवते नमः, ऊँ उपशान्ताय नमः, ऊँ पुराणाय नमः, ऊँ पुण्यचञ्चवे नमः, ऊँ ईरूपाय नमः, ऊँ कुरूकर्त्रे नमः, ऊँ कुरूवासिने नमः, ऊँ कुरूभूताय नमः, ऊँ गुणौषधाय नमः (६५०) ऊँ सर्वाशयाय नमः, ऊँ दर्भचारिणे नमः, ऊँ सर्वप्राणिपतये नमः, ऊँ देवदेवाय नमः, ऊँ सुखासक्ताय नमः, ऊँ सत स्वरूपाय नमः, ऊँ असत् रूपाय नमः, ऊँ सर्वरत्नविदे नमः, ऊँ कैलाशगिरिवासने नमः, ऊँ हिमवद्गिरिसंश्रयाय नमः, ऊँ कूलहारिणे नमः, ऊँ कुलकर्त्रे नमः, ऊँ बहुविद्याय नमः, ऊँ बहुप्रदाय नमः, ऊँ वणिजाय नमः, ऊँ वर्धकिने नमः, ऊँ वृक्षाय नमः, ऊँ बकुलाय नमः, ऊँ चंदनाय नमः, ऊँ छदाय नमः, ऊँ सारग्रीवाय नमः, ऊँ महाजत्रवे नमः, ऊँ अलोलाय नमः, ऊँ महौषधाय नमः, ऊँ सिद्धार्थकारिणे नमः, ऊँ छन्दोव्याकरणोत्तर-सिद्धार्थाय नमः, ऊँ सिंहनादाय नमः, ऊँ सिंहद्रंष्टाय नमः, ऊँ सिंहगाय नमः, ऊँ सिंहवाहनाय नमः, ऊँ प्रभावात्मने नमः, ऊँ जगतकालस्थालाय नमः, ऊँ लोकहिताय नमः, ऊँ तरवे नमः, ऊँ सारंगाय नमः, ऊँ नवचक्रांगाय नमः, ऊँ केतुमालिने नमः, ऊँ सभावनाय नमः, ऊँ भूतालयाय नमः, ऊँ भूतपतये नमः, ऊँ अहोरात्राय नमः, ऊँ अनिन्दिताय नमः, ऊँ सर्वभूतवाहित्रे नमः, ऊँ सर्वभूतनिलयाय नमः, ऊँ विभवे नमः, ऊँ भवाय नमः, ऊँ अमोघाय नमः, ऊँ संयताय नमः, ऊँ अश्वाय नमः, ऊँ भोजनाय नमः, (७००) ऊँ प्राणधारणाय नमः, ऊँ धृतिमते नमः, ऊँ मतिमते नमः, ऊँ दक्षाय नमःऊँ सत्कृयाय नमः, ऊँ युगाधिपाय नमः, ऊँ गोपाल्यै नमः, ऊँ गोपतये नमः, ऊँ ग्रामाय नमः, ऊँ गोचर्मवसनाय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ हिरण्यबाहवे नमः, ऊँ प्रवेशिनांगुहापालाय नमः, ऊँ प्रकृष्टारये नमः, ऊँ महाहर्षाय नमः, ऊँ जितकामाय नमः, ऊँ जितेन्द्रियाय नमः, ऊँ गांधाराय नमः, ऊँ सुवासाय नमः, ऊँ तपःसक्ताय नमः, ऊँ रतये नमः, ऊँ नराय नमः, ऊँ महागीताय नमः, ऊँ महानृत्याय नमः, ऊँ अप्सरोगणसेविताय नमः, ऊँ महाकेतवे नमः, ऊँ महाधातवे नमः, ऊँ नैकसानुचराय नमः, ऊँ चलाय नमः, ऊँ आवेदनीयाय नमः, ऊँ आदेशाय नमः, ऊँ सर्वगंधसुखावहाय नमः, ऊँ तोरणाय नमः, ऊँ तारणाय नमः, ऊँ वाताय नमः, ऊँ परिधये नमः, ऊँ पतिखेचराय नमः, ऊँ संयोगवर्धनाय नमः, ऊँ वृद्धाय नमः, ऊँ गुणाधिकाय नमः, ऊँ अतिवृद्धाय नमः, ऊँ नित्यात्मसहायाय नमः, ऊँ देवासुरपतये नमः, ऊँ पत्ये नमः, ऊँ युक्ताय नमः, ऊँ युक्तबाहवे नमः, ऊँ दिविसुपर्वदेवाय नमः, ऊँ आषाढाय नमः, ऊँ सुषाढ़ाय नमः, ऊँ ध्रुवाय नमः (७५०) ऊँ हरिणाय नमः, ऊँ हराय नमः, ऊँ आवर्तमानवपुषे नमः, ऊँ वसुश्रेष्ठाय नमः, ऊँ महापथाय नमः, ऊँ विमर्षशिरोहारिणे नमः, ऊँ सर्वलक्षणलक्षिताय नमः, ऊँ अक्षरथयोगिने नमः, ऊँ सर्वयोगिने नमः, ऊँ महाबलाय नमः, ऊँ समाम्नायाय नमः, ऊँ असाम्नायाय नमः, ऊँ तीर्थदेवाय नमः, ऊँ महारथाय नमः, ऊँ निर्जीवाय नमः, ऊँ जीवनाय नमः, ऊँ मंत्राय नमः, ऊँ शुभाक्षाय नमः, ऊँ बहुकर्कशाय नमः, ऊँ रत्नप्रभूताय नमः, ऊँ रत्नांगाय नमः, ऊँ महार्णवनिपानविदे नमः, ऊँ मूलाय नमः, ऊँ विशालाय नमः, ऊँ अमृताय नमः, ऊँ व्यक्ताव्यवक्ताय नमः, ऊँ तपोनिधये नमः, ऊँ आरोहणाय नमः, ऊँ अधिरोहाय नमः, ऊँ शीलधारिणे नमः, ऊँ महायशसे नमः, ऊँ सेनाकल्पाय नमः, ऊँ महाकल्पाय नमः, ऊँ योगाय नमः, ऊँ युगकराय नमः, ऊँ हरये नमः, ऊँ युगरूपाय नमः, ऊँ महारूपाय नमः, ऊँ महानागहतकाय नमः, ऊँ अवधाय नमः, ऊँ न्यायनिर्वपणाय नमः, ऊँ पादाय नमः, ऊँ पण्डिताय नमः, ऊँ अचलोपमाय नमः, ऊँ बहुमालाय नमः, ऊँ महामालाय नमः, ऊँ शशिहरसुलोचनाय नमः, ऊँ विस्तारलवणकूपाय नमः, ऊँ त्रिगुणाय नमः, ऊँ सफलोदयाय नमः (८००) ऊँ त्रिलोचनाय नमः, ऊँ विषण्डागाय नमः, ऊँ मणिविद्धाय नमः, ऊँ जटाधराय नमः, ऊँ बिन्दवे नमः, ऊँ विसर्गाय नमः, ऊँ सुमुखाय नमः, ऊँ शराय नमः, ऊँ सर्वायुधाय नमः, ऊँ सहाय नमः, ऊँ सहाय नमः, ऊँ निवेदनाय नमः, ऊँ सुखाजाताय नमः, ऊँ सुगन्धराय नमः, ऊँ महाधनुषे नमः, ऊँ गंधपालिभगवते नमः, ऊँ सर्वकर्मोत्थानाय नमः, ऊँ मन्थानबहुलवायवे नमः, ऊँ सकलाय नमः, ऊँ सर्वलोचनाय नमः, ऊँ तलस्तालाय नमः, ऊँ करस्थालिने नमः, ऊँ ऊर्ध्वसंहननाय नमः, ऊँ महते नमः, ऊँ छात्राय नमः, ऊँ सुच्छत्राय नमः, ऊँ विख्यातलोकाय नमः, ऊँ सर्वाश्रयक्रमाय नमः, ऊँ मुण्डाय नमः, ऊँ विरूपाय नमः, ऊँ विकृताय नमः, ऊँ दण्डिने नमः, ऊँ कुदण्डिने नमः, ऊँ विकुर्वणाय नमः, ऊँ हर्यक्षाय नमः, ऊँ ककुभाय नमः, ऊँ वज्रिणे नमः, ऊँ शतजिह्वाय नमः, ऊँ सहस्रपदे नमः, ऊँ देवेन्द्राय नमः, ऊँ सर्वदेवमयाय नमः, ऊँ गुरवे नमः, ऊँ सहस्रबाहवे नमः, ऊँ सर्वांगाय नमः, ऊँ शरण्याय नमः, ऊँ सर्वलोककृते नमः, ऊँ पवित्राय नमः, ऊँ त्रिककुन्मंत्राय नमः, ऊँ कनिष्ठाय नमः, ऊँ कृष्णपिंगलाय नमः (८५०) ऊँ ब्रह्मदण्डविनिर्मात्रे नमः, ऊँ शतघ्नीपाशशक्तिमते नमः, ऊँ पद्मगर्भाय नमः, ऊँ महागर्भाय नमः, ऊँ ब्रह्मगर्भाय नमः, ऊँ जलोद्भावाय नमः, ऊँ गभस्तये नमः, ऊँ ब्रह्मकृते नमः, ऊँ ब्रह्मिणे नमः, ऊँ ब्रह्मविदे नमः, ऊँ ब्राह्मणाय नमः, ऊँ गतये नमः, ऊँ अनंतरूपाय नमः, ऊँ नैकात्मने नमः, ऊँ स्वयंभुवतिग्मतेजसे नमः, ऊँ उर्ध्वगात्मने नमः, ऊँ पशुपतये नमः, ऊँ वातरंहसे नमः, ऊँ मनोजवाय नमः, ऊँ चंदनिने नमः, ऊँ पद्मनालाग्राय नमः, ऊँ सुरभ्युत्तारणाय नमः, ऊँ नराय नमः, ऊँ कर्णिकारमहास्रग्विणमे नमः, ऊँ नीलमौलये नमः, ऊँ पिनाकधृषे नमः, ऊँ उमापतये नमः, ऊँ उमाकान्ताय नमः, ऊँ जाह्नवीधृषे नमः, ऊँ उमादवाय नमः, ऊँ वरवराहाय नमः, ऊँ वरदाय नमः, ऊँ वरेण्याय नमः, ऊँ सुमहास्वनाय नमः, ऊँ महाप्रसादाय नमः, ऊँ दमनाय नमः, ऊँ शत्रुघ्ने नमः, ऊँ श्वेतपिंगलाय नमः, ऊँ पीतात्मने नमः, ऊँ परमात्मने नमः, ऊँ प्रयतात्मने नमः, ऊँ प्रधानधृषे नमः, ऊँ सर्वपार्श्वमुखाय नमः, ऊँ त्रक्षाय नमः, ऊँ धर्मसाधारणवराय नमः, ऊँ चराचरात्मने नमः, ऊँ सूक्ष्मात्मने नमः, ऊँ अमृतगोवृषेश्वराय नमः, ऊँ साध्यर्षये नमः, ऊँ आदित्यवसवे नमः (९००) ऊँ विवस्वत्सवित्रमृताय नमः, ऊँ व्यासाय नमः, ऊँ सर्गसुसंक्षेपविस्तराय नमः, ऊँ पर्ययोनराय नमः, ऊँ ऋतवे नमः, ऊँ संवत्सराय नमः, ऊँ मासाय नमः, ऊँ पक्षाय नमः, ऊँ संख्यासमापनाय नमः, ऊँ कलायै नमः, ऊँ काष्ठायै नमः, ऊँ लवेभ्यो नमः, ऊँ मात्रेभ्यो नमः, ऊँ मुहूर्ताहःक्षपाभ्यो नमः, ऊँ क्षणेभ्यो नमः, ऊँ विश्वक्षेत्राय नमः, ऊँ प्रजाबीजाय नमः, ऊँ लिंगाय नमः, ऊँ आद्यनिर्गमाय नमः, ऊँ सत् स्वरूपाय नमः, ऊँ असत् रूपाय नमः, ऊँ व्यक्ताय नमः, ऊँ अव्यक्ताय नमः, ऊँ पित्रे नमः, ऊँ मात्रे नमः, ऊँ पितामहाय नमः, ऊँ स्वर्गद्वाराय नमः, ऊँ प्रजाद्वाराय नमः, ऊँ मोक्षद्वाराय नमः, ऊँ त्रिविष्टपाय नमः, ऊँ निर्वाणाय नमः, ऊँ ह्लादनाय नमः, ऊँ ब्रह्मलोकाय नमः, ऊँ परागतये नमः, ऊँ देवासुरविनिर्मात्रे नमः, ऊँ देवासुरपरायणाय नमः, ऊँ देवासुरगुरूवे नमः, ऊँ देवाय नमः, ऊँ देवासुरनमस्कृताय नमः, ऊँ देवासुरमहामात्राय नमः, ऊँ देवासुरमहामात्राय नमः, ऊँ देवासुरगणाश्रयाय नमः, ऊँ देवासुरगणाध्यक्षाय नमः, ऊँ देवासुरगणाग्रण्ये नमः, ऊँ देवातिदेवाय नमः, ऊँ देवर्षये नमः, ऊँ देवासुरवरप्रदाय नमः, ऊँ विश्वाय नमः, ऊँ देवासुरमहेश्वराय नमः, ऊँ सर्वदेवमयाय नमः(९५०) ऊँ अचिंत्याय नमः, ऊँ देवात्मने नमः, ऊँ आत्मसंबवाय नमः, ऊँ उद्भिदे नमः, ऊँ त्रिविक्रमाय नमः, ऊँ वैद्याय नमः, ऊँ विरजाय नमः, ऊँ नीरजाय नमः, ऊँ अमराय नमः, ऊँ इड्याय नमः, ऊँ हस्तीश्वराय नमः, ऊँ व्याघ्राय नमः, ऊँ देवसिंहाय नमः, ऊँ नरर्षभाय नमः, ऊँ विभुदाय नमः, ऊँ अग्रवराय नमः, ऊँ सूक्ष्माय नमः, ऊँ सर्वदेवाय नमः, ऊँ तपोमयाय नमः, ऊँ सुयुक्ताय नमः, ऊँ शोभनाय नमः, ऊँ वज्रिणे नमः, ऊँ प्रासानाम्प्रभवाय नमः, ऊँ अव्ययाय नमः, ऊँ गुहाय नमः, ऊँ कान्ताय नमः, ऊँ निजसर्गाय नमः, ऊँ पवित्राय नमः, ऊँ सर्वपावनाय नमः, ऊँ श्रृंगिणे नमः, ऊँ श्रृंगप्रियाय नमः, ऊँ बभ्रवे नमः, ऊँ राजराजाय नमः, ऊँ निरामयाय नमः, ऊँ अभिरामाय नमः, ऊँ सुरगणाय नमः, ऊँ विरामाय नमः, ऊँ सर्वसाधनाय नमः, ऊँ ललाटाक्षाय नमः, ऊँ विश्वदेवाय नमः, ऊँ हरिणाय नमः, ऊँ ब्रह्मवर्चसे नमः, ऊँ स्थावरपतये नमः, ऊँ नियमेन्द्रियवर्धनाय नमः, ऊँ सिद्धार्थाय नमः, ऊँ सिद्धभूतार्थाय नमः, ऊँ अचिन्ताय नमः, ऊँ सत्यव्रताय नमः, ऊँ शुचये नमः, ऊँ व्रताधिपाय नमः, ऊँ पराय नमः, ऊँ ब्रह्मणे नमः, ऊँ भक्तानांपरमागतये नमः, ऊँ विमुक्ताय नमः, ऊँ मुक्ततेजसे नमः, ऊँ श्रीमते नमः, ऊँ श्रीवर्धनाय नमः, ऊँ श्री जगते नमः (१००८) ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।। ऊँ शांतिः शांतिः शांतिः 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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