Krishna Singh Aug 17, 2019

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Krishna Singh Aug 14, 2019

रावण ने सीता से पहले कौशल्या का किया था हरण, इस भविष्यवाणी से डर गया था लंकापति रामायण में सीता हरण के प्रसंग के बारे में तो सभी जानते हैं कि कैसे अपनी बहन शूर्पणखा के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए रावण ने देवी सीता को छलपूर्वक हर लिया था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लंकापति रावण ने सीता के हरण से पहले प्रभु श्रीराम की मां कौशल्या का हरण किया था। वास्तव में वाल्मीकि रामायण के अनुसार कौशल्या का नाम सबसे पहले एक ऐसी रानी के तौर पर आता है जिसे पुत्र की इच्छा थी, जिसकी पूर्ति के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया गया था। महाराज सकौशल और अमृतप्रभा की पुत्री कौशल्या, कोशल प्रदेश (छत्तीसगढ़) की राजकुमारी थीं, जिनके स्वयंवर के लिए विभिन्न प्रदेशों के राजकुमारों को निमंत्रण भेजा गया लेकिन इस बीच एक और घटना घटित हुई। दशरथ और सकौशल दोनों दुश्मन थे, लेकिन इस दुश्मनी को समाप्त करने के लिए राजा दशरथ ने सकौशल के साथ शांति की पहल की, लेकिन सकौशल ने इस पहल को ठुकराकर युद्ध के लिए दशरथ को आमंत्रित किया, जिसमें सकौशल की पराजय हुई। दशरथ से हार के बाद मजबूरन सकौशल को उनके साथ मित्रता करनी पड़ी और जैसे-जैसे इन दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी सकौशल ने अपनी पुत्री कौशल्या का विवाह दशरथ के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात दशरथ ने कौशल्या को महारानी की पदवी प्रदान की। आनंद रामायण के अनुसार रावण ने न केवल सीता का अपहरण किया था बल्कि वह एक बार राम की मां कौशल्या का भी अपहरण कर चुका था क्योंकि एक भविष्यवाणी के अनुसार कौशल्या के पुत्र दवारा रावण की मृत्यु लिखी हुई थी। साथ ही ब्रह्मा ने रावण को पहले ही बता दिया था कि दशरथ और कौशल्या का पुत्र उसकी मौत का कारण बनेगा। अपनी मौत को टालने के लिए दशरथ और कैकेयी के विवाह के दिन ही रावण, कौशल्या को एक डब्बे में बंंद कर एक सुनसान द्वीप पर छोड़ आया था। नारद ने रावण की इस चाल और उस स्थान के बारे में दशरथ को बताया जहां कौशल्या को रखा गया था।दशरथ, रावण से युद्ध करने के लिए अपनी सेना लेकर द्वीप पर पहुंच गए। रावण की राक्षसी सेना के सामने दशरथ की सेना का विनाश हो गया, लेकिन दशरथ एक लकड़ी के तख्ते के सहारे समुद्र में तैरते रहे और उस बक्से तक पहुंच गए जिसमें कौशल्या को बंधक बनाकर रखा गया था। वहां जाकर दशरथ ने कौशल्या को बंधनमुक्त किया और सकुशल अपने महल में ले आए। इस तरह रावण ने श्रीराम के जन्म से पहले ही अपनी मौत को टालने का प्रयास किया था, जिसमें वो विफल रहा और भविष्य में श्रीराम ने रावण का अंत किया।

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Krishna Singh Jul 27, 2019

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Krishna Singh Jul 25, 2019

शूर्पणखा ने रावण को सर्वनाश का दिया था श्राप, वो घटना जिसके बाद लंकापति से नफरत करने लगी थी उसकी बहन रामायण में रावण का चरित्र नकारात्मक होते हुए भी वह ज्ञानी और पराक्रमी योद्धा कहलाता था। रावण के पराक्रम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने कई देवी-देवताओं को भी अपने वश में कर रखा था। उसने अपने जीवनकाल में कई युद्ध अकेले ही जीते थे। अक्सर हमारे मन में यह विचार आता है कि जब रावण इतना ही पराक्रमी था, तो उसका नाश क्यों हुआ? रावण का नाश होने में प्रभु राम की शक्ति तो थी ही, पर एक बात और भी थी जो रावण के विनाश का कारण बनी। वो था रावण की बहन शूर्पणखा का दिया हुआ श्राप, जिसकी वजह रावण ही नहीं बल्कि उसके पूरे कुल का नाश हो गया। अब ऐसे में मन में एक सवाल उठता है कि रावण तो अपनी बहन को बहुत प्यार करता था फिर उसने अपने ही भाई को श्राप क्यों दिया? आइए, जानते हैं इसके पीछे की कहानी- शूर्पणखा राजा कालकेय के सेनापति से करती थी प्रेम कहा जाता है कि विद्युतजिव्ह राजा कालकेय का सेनापति था। रावण हर राज्य को जीतकर अपने राज्य में मिलाना चाहता था, इस कारण रावण ने कालकेय के राज्य पर चढ़ाई कर दी थी। कालकेय का वध करने के बाद रावण ने विद्युतजिव्ह का भी वध कर दिया था। कहा जाता है कि रावण ये बात नहीं जानता था कि उसकी बहन कालकेय सेनापति विद्युतजिव्ह से प्रेम करती है, इस वजह से रावण ने उसका भी वध कर दिया, जबकि कई पौराणिक कहानियों में माना जाता है कि रावण जानता था कि उसकी बहन को विद्युतजिव्ह से प्रेम है इसी कारण उसने उस योद्धा की हत्या कर दी। शूर्पणखा ने दिया था श्राप शूर्पणखा को जब अपने भाई के इस कृत्य के बारे में पता चला, तो वो क्रोध और दुख के मारे विलाप करने लगी और उसने दुखी मन से रावण को श्राप दिया कि मेरे कारण ही तुम्हारा सर्वनाश होगा और जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सीता हरण में शूर्पणखा ने सबसे मुख्य भूमिका निभाई थी

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Krishna Singh Jul 17, 2019

क्‍या है ॐ के उच्‍चारण का सही तरीका और समय क्‍या आपको पता है कि ओम या ॐ शब्‍द का सही उच्‍चारण और उच्‍चारण करने का सही समय क्‍या है? ॐ, इस शब्‍द को हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र और धार्मिक माना गया है। हिंदू धर्म और शास्‍त्र में कुछ बिना ॐ शब्‍द के अधूरा माना गया है। पूजा किसी भी देवी या देवता की हो ॐ शब्‍द का उच्‍चारण सबसे पहले किया जाता है। हिंदू धर्म में हर पवित्र मंत्र में ॐ शब्‍द का प्रयोग जरूर किया गया है। शास्‍त्रों के अनुसार ॐ शब्‍द को भगवान शिव का अति प्रिय माना गया है। विज्ञान ने भी इस शब्‍द को मेडिकेटेड माना है। ओम शब्‍द के उच्‍चारण मात्र से निकलने वाली ध्‍वनि आपके मन को शांत करती है और आपको कई रोगों से मुक्‍त करती है। इस शब्‍द में बहुत शक्ति है। तो चलिए जानते हैं कि ओम शब्‍द का उच्‍चारण करने का सही तरीका क्‍या है? और इस शब्‍द को किस समय बोलने से इसका अच्‍छा असर होता है। कैसे करें ॐ का उच्‍चारण  सबसे पहले यह जान लें कि ॐ अपने आप में एक सम्‍पूर्ण मंत्र है। यह मंत्र छोटा और आसान नजर आता है उतना ही मुश्किल इसका उच्‍चारण होता है। अमूमन लोग ॐ का गलत उच्‍चारण करते हैं। गौरतलब है कि हिंदू धर्म (हिंदू धर्म में इस मंत्र का क्‍यों है महत्‍व)में किसी भी मंत्र का गलत उच्‍चारण करने से इसका बुरा असर पड़ता है। तो चलिए हम बाताते हैं कि आप जब ओम मंत्र का जाप करें तो इसका उच्‍चारण कैसे करें। ओम शब्‍द तीन अक्षरों से मिल कर बना है। यह अक्षर है अ, उ और म। इसमें अ का अर्थ है उत्‍पन्‍न करना, उ का मतलब है उठाना और म का अर्थ है मौन रहना। यानि जब यह तीनों शब्‍द मिलते हैं तो उसका आश्‍य होता है ब्रह्मलीन होजाना। इसलिए आप जब भी ॐ का उच्‍चारण करें तो इन तीन अक्षरों को ध्‍यान में रख कर करें।  ॐ शब्‍द का उच्‍चारण करते वक्‍त एक विशेष ध्‍वनि उत्‍पन्‍न होती है। जिससे शरीर के अलग-अलग भाग में कंपन होता है। जब आप उ बोलते हैं तो आपके शरीर के मध्‍य भाग में कंपन होता है। इससे आपके सीने , फेफड़ों और पेट पर बहुत अच्‍छा असर पड़ता है। वहीं जब आप म बोलते हैं तो इसकी ध्‍वनि से मस्तिस्‍क में कंपन होता है। इससे दिमाग की सारी नसे खुल जाती हैं। शरीर के महत्‍वपूर्ण ऑर्गेंस इन्‍हीं दोनों हिस्‍सों में होते हैं। ॐ के स्‍वर से जो कंपन होता है वह शरीर को अंदर से शुद्ध करता है। इतना ही नहीं यह आपकी स्‍मरण शक्ति और ध्‍यान लगाने की क्षमता को सुधारता है। ॐ के उच्‍चारण से आपको मानसिक शांति मिलती है। इस शब्‍द का स्‍वर इतना पवित्र होता है कि यदि आप तनव में हैं तो वह भी दूर हो जाता है। यह शब्‍द आपके सोचने समझने के तरीके को बदलता है और आपको छोटी-छोटी परेशानियों से बाहर निकलने का रास्‍ता बताता है। (इस मंत्र को बोलने से आप हो सकती हैं रोग मुक्‍त ) ॐ को बोलने का सही समय  हर चीज को करने का एक सही समय होता है। किसी भी मंत्र के उच्‍चारण का भी एक समय होता है। अगर आप किसी भी मंत्र को बेटाइम ही बोलना शुरू कर देंगे तो शायद इसका अच्‍छा नहीं बुरा असर पड़े। इसी तरह ॐ मंत्र को बोलने का एक सही समय होता है। अगर आप ॐ का उच्‍चारण करना चाहती हैं और इसके लाभ उठाना चाहती हैं तो आपको सुबह सूर्य उदय होने से पूर्व किसी शांत जगह पर सुखासन मूद्रा में बैठ कर ॐ का उच्‍चारण करना चाहिए। ध्‍यान रहे कि जब आप ॐ का उच्‍चारण करें तो इसकी संख्‍या 108 होनी चाहिए। (सेहत के लिए कैसे फायदेमंद है ॐ) जब आप ॐ शब्‍द का उच्‍चारण करें तो आपको केवल इस शब्‍द पर ही पूरा फोकस करना है। इस शब्‍द बालते वक्‍त आपको इसे अंदर से महसूस करना है। इस शब्‍द के उच्‍चारण के समय आपको ध्‍यान लगाने के साथ-साथ इस शब्‍द को देखना भी हैं मगर मन की आंखों से। इसके लिए आपको आंखें बंद कर के ॐ का उच्‍चारण करना चाहिए। इससे आप पूरे ध्‍यान और मन के साथ इस मंत्र का जाप कर पाएंगी।

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Krishna Singh Jul 16, 2019

*सुंदरकांड नाम क्यों रखा गया ?* हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी ! त्रिकुटाचल पर्व यानी यहां 3 पर्वत थे ! पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था ! दूसरा नील पर्वत, जहां राक्षसों कें महल बसे हुए थे ! और तीसरे पर्वत का नाम है सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका नीर्मित थी ! इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी ! इस काण्ड की यही सबसे प्रमुख घटना थी, इस लिए इसका नाम सुंदरकांड रखा गया है ! *शुभ अवसरों पर सुंदरकांड का पाठ क्यों ?* शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा रचित श्रीराम चरित मानस के सुंदरकांड का पाठ किया जाता हैं ! शुभ कार्यों की शुरूआत से पहले सुंदरकांड का पाठ करने का विशेष महत्व माना गया है ! जब किसी व्यक्ति कें जीवन में ज्यादा परेशानीयाँ हो, कोई काम नहीं बन पा रहा हो, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और समस्या हो, सुंदरकांड के पाठ से शुभ फल प्राप्त होने लग जाते हैं | कई ज्योतिषी या संत भी विपरीत परिस्थितियों में सुंदरकांड करने की सलाह देते हैं ! *जानिए सुंदरकांड का पाठ विषेश रूप सें क्यों किया जाता हैं ?* माना जाता हैं कि सुंदरकांड कें पाठ सें हनुमानजी प्रसन्न होते हैं ! सुंदरकांड के पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही जल्द प्राप्त हो जाती है ! जो लोग नियमित रूप से सुंदरकांड का पाठ करते हैं, उनके सभी दुख दूर हो जाते हैं | इस काण्ड में हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता की खोज की है ! इसी वजह से सुंदरकांड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है ! *सुंदरकांड से मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ ?* वास्तव में श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है, संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरूषार्थ को दर्शाती है, सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का कांड है ! मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला काण्ड है | सुंदरकांड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, किसी भी कार्य को पूर्ण करनें के लिए आत्मविश्वास मिलता है ! *सुंदरकांड से मिलता है धार्मिक लाभ ?* सुंदरकांड के पाठ से मिलता है धार्मिक लाभ | हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है, बजरंगबली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता हैं, शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं, इन्हीं उपायों में सें एक उपाय सुंदरकांड का पाठ करना है, सुंदरकांड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विषेश कृपा प्राप्त होती है ! किसी भी प्रकार की परेशानी हो सुंदरकांड के पाठ से दूर हो जाती है, यह एक श्रेष्ठ और सरल उपाय है, इसी वजह से काफी लोग सुंदरकांड का पाठ नियमित रूप से करते हैं, हनुमानजी जो कि वानर थे, वे समुद्र को लांघ कर लंका पहुंच गए | वहां सीता की खोज की, लंका को जलाया, सीता का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए, यह एक भक्त की जीत का काण्ड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है, सुंदरकांड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं, इसलिए पूरी रामायण में सुंदरकांड को सबसें श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ाता है, इसी वजह से सुंदरकांड का पाठ विषेश रूप से किया जाता है . 🙏जय श्री राम🙏

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Krishna Singh Jul 14, 2019

1,इसके अलावा कहते हैं कि कैलाश पर्वत का स्लोप (कोण) भी 65 डिग्री से ज्यादा है, जबकि माउंट एवरेस्ट में यह 40-60 तक है, जो इसकी चढ़ाई को और मुश्किल बनाता है। ये भी एक वजह है कि पर्वतारोही एवरेस्ट पर तो चढ़ जाते हैं, लेकिन कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाते। 2,मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक पर्वतारोही ने अपनी किताब में लिखा था कि उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन इस पर्वत पर रहना असंभव था, क्योंकि वहां शरीर के बाल और नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं। इसके अलावा कैलाश पर्वत बहुत ही ज्यादा रेडियोएक्टिव भी है। 3,रूस के एक पर्वतारोही, सरगे सिस्टियाकोव ने बताया कि, 'जब मैं कैलाश पर्वत के बिल्कुल पास पहुंच गया तो मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। मैं उस पर्वत के बिल्कुल सामने था, जिस पर आज तक कोई नहीं चढ़ सका, लेकिन अचानक मुझे बहुत कमजोरी महसूस होने लगी और मन में ये ख्याल आने लगा कि मुझे यहां और नहीं रुकना चाहिए। उसके बाद जैसे-जैसे मैं नीचे आते गया, मेरा मन हल्का होता गया।' 4,कैलाश पर्वत पर चढ़ने की आखिरी कोशिश लगभग 18 साल पहले यानी साल 2001 में की गई थी। जब चीन ने स्पेन की एक टीम को कैलाश पर्वत पर चढ़ने की अनुमति दी थी। फिलहाल कैलाश पर्वत की चढ़ाई पर पूरी तरह से रोक लगी हुई है, क्योंकि भारत और तिब्बत समेत दुनियाभर के लोगों का मानना है कि यह पर्वत एक पवित्र स्थान है, इसलिए इस पर किसी को भी चढ़ाई नहीं करने देना चाहिए। 5,हालांकि कहते हैं कि 92 साल पहले यानी साल 1928 में एक बौद्ध भिक्षु मिलारेपा ही कैलाश पर्वत की तलहटी में जाने और उस पर चढ़ने में सफल रहे थे। वह इस पवित्र और रहस्यमयी पर्वत पर जाकर जिंदा वापस लौटने वाले दुनिया के पहले इंसान थे। इसका उल्लेख पौराणिक साहियों में भी मिलता है।

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Krishna Singh Jul 13, 2019

बर्फ के शिवलिंग के अलावा अमरनाथ के पास ये जगह भी हैं बेहद रोचक अमरनाथ यात्रा के बारे में आपने कई बार सुना होगा। यहां बर्फ के शिवलिंग हैं यह बात तो सभी को पता है मगर यह बात बहुत कम लोग जानते हैं हिंदू धर्म में अमरनाथ यात्रा का बहुत महत्‍व है। यह यात्रा हर वर्ष ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा के‍दिन शुरू होती है और श्रवण पूर्णिमा के दिन इस यात्रा का अंत होता है। इस साल भी यह यात्रा 27 जून से आरंभ हो चुकी है। धर्मिक ग्रंथों में मौजूद कथाओं के अनुसर अमरनाथ वह जगह है जहां पर भगवान शिव माता पारवती जी को अमर हो जाने वाली कथा सुनाते हैं मगर वह यह कथा सुन नहीं पातीं मगर माता पार्वती की जगह यह कथा दो सफेद कबूतर सुन लेते हैं और हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। सफेद कबूतरों का यह जोड़ा आज भी इस गुफा के अंदर मौजूद है। इसके साथ ही अमरनाथ की गुफा में भगवान शिव बर्फ की शिवलिंग के रूप में मौजूद हैं। हर साल लाखों के संख्‍या में भगवान शिव के भक्‍त इस गुफा में शिवलिंग के दर्शन करने आते हैं। इस बार भी भक्‍तों की पहली टोली अमरनाथ यात्रा के लिए निकल चुकी है। अगर आप भी इस बार अमरनाथ यात्रा पर जा रही हैं या आगे जाने का प्‍लान है तो आज हम आपको बताएंगे कि बर्फ के शिवलिंग के अलावा अमरनाथ के आसपास कई रोचक जगह मौजूद हैं। 1यहां किया था चंद्रमा का त्याग अमरनाथ यात्रा के दौरान बीच में पहलगाम पड़ता है, इसके बाद अगला पड़ाव चंदनबाड़ी है। धार्मिक कथाओं के अनुसार यह वह स्‍थान है जहां पर भगवान शिव ने चंद्रमा का त्‍याग किया था। दरअसल जब भगवान शिव माता पार्वती को अमर कथा सुनाने के लिए गुफ में ले जा रहे थे तब उनहोंने हर उस चीज का त्‍याग कर दिया था जो कथा सुनने के बाद अमर हो सकती थी। भगवान शिव ने चंद्रमा को अपनी जटाओं में स्‍थान दिया है इसलिए जब वह गुफा में प्रवेश करने जा रहे थे तो उन्‍होनें चंद्रमा का त्‍याग कर दिया था। इसके बाद चंद्रमा ने शिव जी के वापिस लौटने का यही पर इंतजार किया था। 2राक्षसों के शव से बना पर्वत कहा जाता है कि जब भगवान शिव माता पार्वती को लेकर गुफा की ओर आगे बढ़े तो अमर होने वाली कथा सुनने के लिए राक्षसों का झुंड भी वहां पहुंच गया। तब देवताओं और राक्षसों के बीच जम कर लड़ाई हुई और देवताओं ने राक्षसों को मार कर उनका पहाड़ा बना दिया। तब से इस जगह को पिस्‍सू टॉप के नाम से जाना जाता है। 3शेषनाग गुफा के नजदीक पहुंचने पर भगवान शिव ने अपने सबसे प्रीय शेषनाग का भी त्‍याग किया था। यात्रा के दौरान एक स्‍थान शेषनाग भी पड़ता है जहां पर एक पर्वत बिलकुल शेषनाग के रूप में प्रतीत होता है। यहां पर एक नीले पानी की झील भी है, जो बेहद खूबसूरत दिखती है। 4महागुन माउंटेन माता पार्वती को जब भगवान शिव गुफा की ओर ले जा रहे थे तब उनके साथ पुत्र गणेश भी थे। पुत्र गणेश अपनी मां का साथ कभी नहीं छोड़ते थे। मगर जब भगवान शिव गुफा के नजदीक पहुंचे तो उन्‍होंने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया। तब से इस स्‍थान का नाम महागुन पर्वत पड़ गया। 5पंचतरणी यह महागुन माउंट से कुछ ही दूर है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने इस स्‍थान पर पृथ्‍वी, जल, वायु, अकाश और अग्नि का त्याग किया था इसी के साथ अपनी जटा से बहने वाली पांच नदियों का भी त्याग किया था इन पांच नदियों के संगम को यहाँ देख सकते हैं।

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