Krishna Singh Nov 12, 2019

अगर शून्य की खोज अभी हुई तो कोरवों की गिनती कैसे की गई। आपको उत्तर देने से पहले मैं ये सुनिश्चित करा देना चाहते हैंकि आपको मेरे कुछ शब्द कटु लग सकतें हैं। अतः आप से विनती है कि जहां- जहां आपको शब्द कटु लगें वहां आप शब्दों को दो से तीन बार पढ़ के समझ के फिर आगे बढ़ियेगा आपको शब्द कटु प्रतीत नहीं होंगे। तो चलिए जिजीविषा शांत कीजिये- काफी तर्कसंगत प्रश्न है कि आखिर शून्य की खोज अभी बाद में हुई तो लोग 10 सिर वाले रावण, 100 कौरवों या अन्य संख्याओं की गणना कैसे संभव किये? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें इतिहास का अध्ययन करना होगा लेकिन इतिहास के सागर में डुबकी लगाने से पहले हमें अविष्कार (Invention) और खोज (discovery) के अंतर को समझना होगा। किसी नई विधि, रचना या प्रक्रिया के माध्यम से कुछ नया बनाना अविष्कार कहलाता है तथा खोज का अर्थ होता है किसी ऐसी चीज को समाज के सामने लाना जिसके विषय में समाज को जानकारी ना हो परन्तु वह हो। एक उदाहरण के माध्यम से समझिए कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त की खोज की अर्थात गुरुत्वाकर्षण न्यूटन के पहले भी था लेकिन समाज उसके विषय में जानता नहीं था। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को न्यूटन की खोज कहा जाएगा न कि अविष्कार। कथित तौर पर शून्य की खोज करने वाले आर्यभट्ट का जन्म 476 ईस्वी में तथा देहांत 550 ईस्वी में हुआ और रामायण तथा महाभारत का काल इससे बहुत पुराना है। वर्तमान में हिंदी भाषा का लेखन कार्य देवनागरी लिपि में होता है। इससे पहले की लिपि ब्राह्मी लिपि मानी जाती है। लगभग ई. 350 के बाद ब्राह्मी की दो शाखाएं हो गईं एक उत्तरी शैली तथा दूसरी दक्षिणी शैली। देवनागरी को नागरी लिपि के नाम से भी जाना जाता था। यह लिपि ब्राह्मी की उत्तरी शैली का विकसित रूप है। प्राचीन काल में भारत सहित विश्व के अन्य तमाम देशों में भी उनकी अपनी संख्या प्रणाली विकसित थी जैसे भारत में संस्कृत में और रोमन साम्राज्य में रोमन में इसी तरह अन्य साम्राज्य में अन्य संख्या प्रणाली विकसित थी। रोमन गिनती i, ii ,iii ,iv ,v........ क्रमशः 1,2,3,4,5.....हैं। आप जब बड़े हुए तो आपको कौन बताया कि आपका पिता यह है जो आपका पिता है अर्थात आप अपने जन्मदाता को कैसे पहचाने ? जाहिर सी बात है कि परिवार वालों ने या फिर विशेषकर माँ ने बताया कि ये आपके पिता हैं। बस ठीक उसी तरह शून्य की खोज के पहले हमारे ऋषियों, मनीषियों ने हमें बताया कि एकः अर्थात प्रथमा, द्वि अर्थात द्वितीया , त्रि अर्थात तृतीया.............. और बाद में जब शून्य की खोज हुई तो हम जान पाए प्रथमा=1,द्वितीया=2,तृतीया=3............... चूँकि संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है और विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है और तमाम हिंदू धर्म ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं और उसमें संख्याएं भी संस्कृत में लिखी हुई हैं इस प्रकार पहले हम संख्याओं को संस्कृत के रूप में जानते थे बाद में जब शून्य की खोज हुई तो हम संख्याओं को अंकों के रूप में जाने लगे। आप कोई भी प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथ देख सकते हैं जिसमें से लिखा होगा प्रथम अध्याय ,द्वितीय अध्याय ,तृतीय अध्याय, चतुर्थ अध्याय इसी तरह से अध्ययन की गणना की गई है जिनकी भी गणना की गई संस्कृत भाषा में की गई है रावण के 10 सिर अर्थात दशानन 10 को बताने के लिए दश को निर्धारित किया गया। बस ठीक इसी तरह कौरवों की गिनती के लिए शत अर्थात 100 को निर्धारित किया गया। आप पांडवों से क्या आशय लगाते हैं? पाण्डव अर्थात 5 भाई कुछ संस्कृत की गिनतियों के माध्यम से आप समझ सकतें हैं ० - शून्यम् १ - एकः (पुल्लिंग), एका (स्त्रीलिंग) , एकम्(नपुंसक लिंग) २ - द्वौ, द्वे, द्वे ३ - त्रयः,तिस्रः,त्रीणि ४ -चत्वारः चतस्रः, चत्वारि ५ - पंच ६ - षट् ७ - सप्त ८ - अष्ट: ९ - नव १० - दश ११ - एकादश १२ - द्वादश १३ - त्रयोदश १४ - चतुर्दश १५ - पंचदश १६ - षोडश १७ - सप्तदश १८ - अष्टादश १९ - नवदश/ऊनविंशतिः/एकोनविंशतिः २० - विंशतिः २१ - एकविंशतिः २२ - द्वाविंशतिः २३ - त्रिंविंशतिः २४ - चतुर्विंशतिः २५ - पंचविंशतिः २६ - षडविंशतिः २७ - सप्तविंशतिः २८ - अष्टविंशतिः २९ - नवविंशतिः/एकोनत्रिंशत्/ऊनत्रिंशत् ३० - त्रिंशत् ४० - चत्वारिंशत् ५० - पंचाशत् ६० - षष्टिः ७० - सप्ततिः ८० - अशीतिः ९० - नवतिः १०० - शतम् १००० - सहस्रम् १००००० - लक्षम् १००,००,००० - कोटि आधा - अर्धम् एक पाव - पादम्, अर्धार्धम् पूरा - पूर्णम् अनन्त - अनन्तम् कुछ मूड और जड़ बुद्धि लोग हैं जो संस्कृत भाषा को और हिंदू धर्म को गलत साबित करना चाहते हैं और उन्हें बदनाम करने के लिए अनेक कुतर्क भरे सवाल पूछते हैं जैसे आपने पूछा था की शून्य की खोज अभी हुई तो कौरवों की गिनती कैसे हुई? हालाँकि आपने अपनी जिजीविषा शांत करने के लिए सवाल पूछा था। शायद आपके मन को सन्तुष्टि मिले।

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Krishna Singh Nov 10, 2019

ऐसा कोनसा ग्रंथ है जो सीधा पढ़े तो राम ग्रंथ उल्टा पढ़े तो कृष्ण ग्रंथ ? एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे। इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए --- यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण कथा के रूप में होती है । जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।" उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ अर्थातः मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे। अब इस श्लोक का विलोमम्: इस प्रकार है सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः । यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥ अर्थातः मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है। " राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:- राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ विलोमम्: सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः । यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥ साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा । पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥ विलोमम्: वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः । राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥ कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका । सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥ विलोमम्: भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा । कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥ रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् । नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥ विलोमम्: यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः । तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥ यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ । तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥ विलोमम्: तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं । सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥ मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं । काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥ विलोमम्: तेन रातमवामास गोपालादमराविका । तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥ रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते । कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥ विलोमम्: मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका । तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥ सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया । साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥ विलोमम्: हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा । यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥ सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया । सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥ विलोमम्: सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा । यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥ तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा । यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥ विलोमम्: हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया । सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥ वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो । भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥ विलोमम्: सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः । होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥ यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे । सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥ विलोमम्: भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा । वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥ रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह । यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥ विलोमम्: नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया । हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥ यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् । सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥ विलोमम्: यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः । गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥ दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा । ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥ विलोमम्: नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः । हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥ सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् । तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥ विलोमम्: हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् । जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥ सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः । न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्: तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन । सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥ तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत । वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥ विलोमम्: केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः । ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥ गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया । सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥ विलोमम्: हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस । यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥ हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः । राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥ विलोमम्: घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः । धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥ ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः । हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥ विलोमम्: विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा । ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥ भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा । चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥ विलोमम्: ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा । हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥ हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः । तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥ विलोमम्: योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् । जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥ भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं । तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥ विलोमम्: विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं । तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥ हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि । राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥ विलोमम्: यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा । निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥ सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः । तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥ विलोमम्: जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं । हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥ वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः । तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥ विलोमम् नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः । सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥ हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः । चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥ विलोमम् हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा । सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥ नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका । रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥ विलोमम्: नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा । कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥ साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥ निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥ विलोमम्: भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥ ॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।। कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि यह दुनिया में कहीं भी ऐसा न पाया जाने वाला ग्रंथ है ।

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Krishna Singh Nov 9, 2019

वनवास के दौरान कैसा भोजन करते थे प्रभु श्री राम हिंदू धर्म मानने वाले लोगों के आस्था के प्रतीक हैं प्रभु श्रीराम. हर साल रामनवमी पर बड़ी संख्या में लोग राम भगवान की पूजा करते हैं. पूरे 9 दिन तक धूमधाम से रामनवमी का त्योहार मनया जाता है. इस दौरान लोग भगवान को उनके मनपसंद भोग-प्रसाद चढ़ाते हैं. पूरे चैत्र नवरात्रि में उपवास रखने वाले भक्त इस दिन बिना प्याज और लहसुन का बना सात्विक भोजन कर अपना व्रत खोलते हैं. खाने में राम नवमी पर भी पूरी, सूजी का हलवा और काले चने बनाए जाते हैं. वहीं कई लोगों के मन यह सवाल भी उठता है कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और सीता माता क्या खाते थे? इस सवाल का जवाब देने से पहले हम आपको यह बता रहे हैं कि भगवान श्री राम की पूजन में सफेद मिठाई और सफेद फल चढ़ाएं जाते हैं. इतना ही नहीं भगवान श्रीराम को केसर भात, खीर, धनिए का भोग का भोग लगाया जाता है. इसके अलावा उनको कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन का भोग भी प्रिय है. जैसा कि उनमें आस्था रखने वाले लोग चढ़ाते हैं. ऐसी मान्यता है कि तनाव और क्लेश को कम करने के लिए श्री राम को लड्डू का भोग चढ़ाना चाहिए. ऐसा करने से सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं और मन शांत होता है. भगवान श्रीराम के भक्त हनुमानजी को हलवा, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर-भात चढ़ाया जाता है. इसके अलावा हनुमानजी को कुछ भक्त इमरती भी अर्पित करते हैं. ऐसा माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति 5 मंगलवार कर हनुमानजी को चोला चढ़ाकर यह नैवेद्य लगाता है, तो उसके हर तरह के संकटों का अविलंब समाधान होता है. अब यहां जानिए कि प्रभु श्रीराम वनवास के दौरान क्या खाते थे. तो इसका सीधा-सा जवाब है कि प्रभु श्रीराम ने वन में बहुत ही सादगीभरा तपस्वी का जीवन बिताया. वे जहां भी जाते थे 3 लोगों के रहने के लिए झोपड़ी बनाते थे. वहीं भूमि पर सोते, रोज कंद-मूल लाकर खाते और प्रतिदिन साधना करते थे. उनके तन पर खुद के ही बनाए हुए वस्त्र होते थे. धनुष और बाण से वे जंगलों में राक्षसों और हिंसक पशुओं से सभी की रक्षा करते थे.

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Krishna Singh Nov 7, 2019

भंडारा क्यों नहीं खाना चाहिए ? Sudhakar Tiwari, पंचायत राज विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार में ग्राम पंचायत अधिकारी अक्सर हमने देखा है कि लोग किसी न किसी त्यौहार पर, किसी न किसी विशेष तिथि पर भंडारा करते हैं। अब सबसे रोचक बात आज मैं जो आपको बताने जा रहा हूँ वो ये है कि क्या हमें भंडारे का खाना खाना चाहिए या नहीं ! भंडारे में बना हुआ खाना कई प्रकार का होता है और सबसे विशेष बात इसमें यह है कि ये किस कारण से भंडारा किया जा रहा है ! अगर भंडारा किसी देवी, देवता को प्रसन्न करके, उनको भोग लगा कर किया जा रहा है या उनकी पूजा के प्रसाद के रूप में किया जा रहा है तो इसको खाने से आपको फायदा होगा, आपको भगवान की कृपा मिलेगी, उस देवी की कृपा मिलेगी जिसके भोग के बाद आपको ये प्रसाद रूपी भंडारा खाने को मिला है पर कभी-कभी ऐसे भंडारे भी किए जाते हैं जो अपनी परेशानी, अपने जीवन में आए हुए कष्ट और किसी भी किस्म की विपदा को उतारने के लिए किए हों। अक्सर लोग जब अपनी किसी भी जीवन की बड़ी विपदा, परेशानी, परिवार में किसी की बीमारी या किसी की मृत्यु के एवज में भोज करते हैं या भंडारा करते हैं तो ऐसे भोज या भंडारे खाना विशेष रूप से नुकसानदायक होता है। जब भी आप ऐसा खाना, ऐसा भोजन ग्रहण करेंगे, जो इंसान अपने दुख में आपको दे रहा है, किसी के प्रियजन की मृत्यु होने पर जो भंडारा तेरहवीं पे होता है, ऐसे खाने को खाने से इंसानों के, लोगों की शरीर की ऊर्जा कम हो जाती है क्योंकि ये भंडारा जिसके द्वारा किया जा रहा है, जो इसका मुख्य तिथि था वो वह अब नहीं रहा और जिसके लिए ये हो रहा है, वो भी अब इस दुनिया में नहीं है और सबसे महत्वपूर्ण बात जो है वो ये है कि दुख में किया जाने वाला एक किस्म का समागम है। इसमें कोई आपको खुशी नहीं दे रहा है। जो करने वाले हैं भंडारा, उनके द्वारा भी आपको किसी किस्म की पॉजिटिव एनर्जी नहीं मिलती, पॉजिटिव रेज नहीं आती। वो खुद अपने शोक और दुख में इतने ज्यादा विलीन होते हैं कि आप उनसे किसी भी तरीके की प्लस या पॉजिटिव रेज नहीं एक्सपेक्ट कर सकते। आपको जो मिलता है वह दुख और दर्द से भरा हुआ नेगेटिविटी से भरा हुआ से भरा हुआ, एक स्वागत मिलता है, जिसमें वो मजबूरी में आप को भोजन करा रहे हैं, अपनी उस प्रथा को निभाने के लिए। ऐसे भोजन को करने से आपके जीवन में परेशानी भी आएंगी, आपके कष्ट भी बढ़ेंगे। खासकर जो लोग अपने जीवन के कष्ट उतारने के लिए या किसी तांत्रिक द्वारा कहे जाने पर अपना कोई उतारा करके या अपने किसी किस्म की परेशानी का उतारा करके भंडारा करते हैं। ऐसे भंडारों में कृपया ना जाएं क्योंकि ये सिर्फ आपकी ऊर्जा को हीन करते हैं, उसे कम करते हैं, किसी भी तरीके का आपको शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक फायदा नहीं देते। सिर्फ उन्हीं भंडारों का भोज स्वीकार करें जो किसी भगवान या देवता या माता को प्रसन्न करके, उनकी पूजा या आराधना करके उनको भोग रूपी भंडारा हो। जिसमें उनको भोग कराया हो और उस देवी या भगवान को भोजन कराने के बाद जब वो भंडारा किया गया हो तो वो भंडारा प्रसाद बन जाता है पर अगर किसी भी भगवान या देवी या देवता को भोग नहीं कराया गया है और केवल कोई लोग भंडारा करने बैठ गए हैं तो आप जरूर इस बात का ध्यान रखें, उनसे जरूर ये सवाल करें कि ये भंडारा किस विषय में, किस वजह से वो करवा रहे हैं। ऐसा करने से आप काफी तरह की विपदाओं से बचेंगे और सही मायने में आपको ये भी ज्ञात हो जाएगा कि कौन भगवान का भंडारा कर रहा है और कौन अपने कष्ट उतारने के लिए अपना उतारा एक भंडारे के रूप में कर रहा है। यहां तक कि जब लोग एकादशी पर पानी पिलाते हैं या किसी भी तरीके के त्यौहार पर जो विशेष तिथियाँ हैं, जिसमें दान किये जाते हैं, उन तिथियों पर जब लोग भंडारा करते हैं तो वो भंडारे भी दान की श्रेणी में आते हैं, वो प्रसाद नहीं कहलाते। आप ऐसे भंडारे का भोज लेंगे तो आप एक मायने में उनके कष्ट के भागीदारी हो जाते हो, उनका कष्ट ले लेते हो, उस भोजन को ग्रहण करके। तो खासकर ध्यान रखें जब भी आपके आसपास कहीं भंडारा हो रहा है तो ये देखें की क्या वो स्थिति वो है, जिस दिन दान का महत्व बताया गया है। क्या वो एकादशी है, क्या कोई वो ऐसी स्थिति है जिसपे भंडारी किए जाते, जिसमें अपनी विपदाओं का उतारा किया जाता है, क्या वो कोई दान की तिथि है और ये भी ध्यान रखें कि किस भगवान, किस देवता, किसकी पूजा के फलस्वरुप ये भंडारा किया जा रहा है। ऐसा करने से आप बहुत सी विपदाओं से बचेंगे। मेरा मकसद किसी को भी ये कहना नहीं है कि आप भंडारा ना करें या भंडारा ना खाएं या मैं किसी भी भंडारा करने वाले की मंशा पर कोई सवाल नहीं उठा रहा। मैं बस यही चाहता हूं कि आप जब भंडारा करें या किसी भी तरीके का भोज करें तो लोगों के लिए करें, ना कि अपनी परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए करें। एक भोज होता है लोगों को खुश करने के लिए, इंसानियत के लिए और ज्यादा से ज्यादा लोगों का पेट भरने के लिए। जब ऐसे भंडारे किये जाते हैं जिसमें इंसानों की, लोगों की मंशा होती है कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों का कल्याण करें, ज्यादा से ज्यादा लोगों का पेट भरें, भंडारों के माध्यम से। तो ऐसे भंडारे दोनों को ही फल देते हैं, भोजन करने वाले को भी और भोजन देने वाले को भी और खासकर जहां भंडारे भगवान को भोग लगाकर, माता को भोग लगाकर किए जाते हैं तो वो प्रसाद बन जाते हैं पर जिन भंडारों में आप अपने विपदा का उतारा करने के लिए करते हो, उसमें आप एक तरीके से काल्पनिक तौर से ही एक ना दिखाए, ना बताए तौर से अपनी विपदा को भोजन के थ्रू किसी और के कंधों पर चढ़ाने की कोशिश करते हो। किसी भी बाबा या तांत्रिक के कहने में आ कर तब भंडारा ना करें जब आप परेशान हैं क्योंकि हम अक्सर ऐसे लोगों के कब्जे में आ जाते हैं और ये हमसे कहते हैं कि आप फलाना भंडारा कीजिए, ये उतारा कीजिए, इतने लोगों को ये दीजिए तो आपकी विपदा दूर होगी पर नहीं विपदा और परेशानियां-खुशियाँ, अप्स एन्ड डाउन सबकी जिंदगी में आते हैं। आप भंडारा खुश होकर करें। जब करें, जब आपके मन में लोगों के प्रति प्यार हो, इंसानियत हो, जब आप भूखों का पेट भरना चाहते हों, जब आप लोगों की मदद करना चाहते हों तब वो भंडारा वाकई में, भंडारा करने वाले को भी और भंडारा खाने वाले को ही फायदा देगा।

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Krishna Singh Nov 6, 2019

कैसे होता था अश्वमेध यज्ञ? जानिए ग्रंथों में लिखी ऐसी ही रोचक बातें उज्जैन। हिंदू धर्म साहित्य बहुत ही विस्तृत है। इसके अंतर्गत अनेक पुराण, वेद, धर्म ग्रंथ व उपनिषद आदि आते हैं। इन ग्रंथों को पढ़कर या सुनकर कुछ प्रश्न सहज रूप में मन आते हैं। इनमें से कुछ प्रश्नों का जवाब तो मिल जाता है, लेकिन कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं। आज हम आपको ग्रंथों में लिखे कुछ ऐसे ही रोचक प्रश्नों के उत्तर बता रहे हैं, जो आमजन जानना चाहते हैं। ये प्रश्न तथा इनके उत्तर इस प्रकार हैं- 1- पुराणों में वर्णित अश्वमेध यज्ञ क्या है? उत्तर- धर्म ग्रंथों में अनेक स्थान पर अश्वमेध यज्ञ का वर्णन आता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम व महाभारत के अनुसार युधिष्ठिर ने भी ये यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ के अंतर्गत एक घोड़ा छोड़ा जाता था। ये घोड़ा जहां तक जाता था, वहां तक की भूमि यज्ञ करने वाले की मानी जाती थी। यदि कोई इसका विरोध करता था, तो उसे यज्ञ करने वाले के साथ युद्ध करना पड़ता था। ये यज्ञ वसंत या ग्रीष्म ऋतु में किया जाता था और करीब एक वर्ष इसके प्रारंभिक अनुष्ठानों की पूर्णता में लग जाता था। 2- पुष्पक विमान क्या है?   उत्तर- पुष्पक विमान का सर्वप्रथम वर्णन वाल्मीकि रामायण में मिलता है। वैदिक साहित्य में देवताओं के विमानों की चर्चा है, लेकिन दैत्यों और मनुष्यों द्वारा उपयोग किया गया पहला विमान पुष्पक ही माना जाता है। पौराणिक संदर्भों में विज्ञान की खोज करने वालों की मान्यता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान आधुनिक विज्ञान की तुलना में अधिक संपन्न था। इस लिहाज से इस विमान के अस्तित्व व प्रामाणिकता को स्वीकारा जाता है। प्राचीन भारतीयों की वैज्ञानिक क्षमता में विश्वास करने वाले मानते हैं कि यह विमान तत्कालीन विज्ञान का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण था।  3-  12 ज्योतिर्लिंगों में से किसकी स्थापना चंद्रदेव ने की थी?   उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार चंद्रदेव ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। सोमनाथ भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर कि यह मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी।  4- जिस समय भगवान श्रीराम को वनवास दिया गया, उस समय उनकी आयु कितनी थी?   उत्तर- वाल्मीकि रामायण के अनुसार जिस समय भगवान श्रीराम को वनवास  दिया गया, उस समय उनकी आयु लगभग 27 वर्ष थी। राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ। 5- पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ था?   उत्तर- गुरु द्रोणाचार्य महर्षि भरद्वाज के पुत्र थे। एक बार जब महर्षि भरद्वाज  सुबह गंगा स्नान करने गए, वहां उन्होंने घृताची नामक अप्सरा को जल से निकलते देखा। यह देखकर उनके मन में विकार आ गया और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। यह देखकर उन्होंने अपने वीर्य को द्रोण नामक एक बर्तन में संग्रहित कर लिया। उसी में से द्रोणाचार्य का नाम हुआ था। 6- हिंदू धर्म में किस ग्रंथ को पांचवे वेद की संज्ञा दी गई है?   उत्तर- हिंदू धर्म में महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। इसके रचयिता महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस ग्रंथ के बारे में स्वयं कहा है- यन्नेहास्ति न कुत्रचित्। अर्थात जिस विषय की चर्चा इस ग्रंथ में नहीं की गई है, उसकी चर्चा अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है। श्रीमद्भागवतगीता जैसा अमूल्य रत्न भी इसी महासागर की देन है। इस ग्रंथ में कुल मिलाकर एक लाख श्लोक है, इसलिए इसे शतसाहस्त्री संहिता भी कहा जाता है।    प्रश्न 7- वाल्मीकि रामायण के अनुसार देवराज इंद्र के रथ के सारथी का नाम क्या है?   उत्तर- देवराज इंद्र के रथ के सारथि का नाम मातलि है। राम-रावण युद्ध के दौरान जब रावण अपने रथ में बैठकर और श्रीराम भूमि पर खड़े रहकर युद्ध कर रहे थे। उस समय इंद्र ने अपना रथ भगवान श्रीराम की सहायता के लिए भेजा था। उस समय भी मातलि ने ही रथ का संचालन बड़ी कुशलता के साथ किया था। 8- धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने किसे सृष्टि के अंत तक पृथ्वी पर भटकने का श्राप दिया था?   महाभारत के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को सृष्टि के अंत तक पृथ्वी पर भटकने का श्राप दिया था। गुरु द्रोणाचार्य का विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी से हुआ। कृपी के गर्भ से अश्वत्थामा का जन्म हुआ। उसने जन्म लेते ही अच्चै:श्रवा अश्व के समान शब्द किया, इसी कारण उसका नाम अश्वत्थामा हुआ। वह महादेव, यम, काल और क्रोध के सम्मिलित अंश से उत्पन्न हुआ था।  9- वाल्मीकि रामायण में कितने श्लोक, उपखंड व कांड हैं?   उत्तर- रामायण महाकाव्य की रचना महर्षि वाल्मीकि ने की है। इस महाकाव्य में 24 हजार श्लोक, पांच सौ उपखंड तथा उत्तर सहित सात कांड हैं। परमपिता ब्रह्माजी के कहने पर महर्षि वाल्मीकि ने इस ग्रंथ की रचना की थी। सर्वप्रथम लव-कुश ने भगवान श्रीराम के दरबार में इसे गाकर सुनाया था। 10- धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं का सेनापति कौन है?   उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार देवताओं के सेनापति भगवान शिव व माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय हैं। इनका वाहन मोर है। धार्मिक कथाओं के अनुसार ये मोर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय को दिया था। देवासुर संग्राम में कार्तिकेय ने ही देवताओं की सेना का प्रतिनिधित्व किया था। ये प्रचंड क्रोधी स्वभाव के हैं। दक्षिण भारत में इन्हें ही मुरुगन स्वामी के रूप में पूजा जाता है। 12- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार किस देवी की पूजा करने से नागों का भय नहीं रहता?   उत्तर- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार मनसादेवी का पूजन करने से नागों का भय नहीं रहता क्योंकि ये देवी नागों के राजा वासुकि की बहन हैं। मनसादेवी के गुरु स्वयं भगवान शिव बताए गए हैं। इन्हीं के पुत्र आस्तिक ने जन्मेजय के सर्प यज्ञ को बंद करवाया था। महर्षि आस्तिक का नाम लेने से भी नागों का भय नहीं रहता। 12- माता सीता की छाया द्वापर युग में किस रूप में प्रकट हुईं?   उत्तर- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार रावण ने माता सीता का नहीं उनकी छाया का हरण किया था। इन्हीं छाया रूपी सीता ने द्वापर युग में द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था। द्रौपदी पांडवों की पत्नी थी। इनका जन्म अग्नि कुंड से हुआ था। द्रौपदी के पिता का नाम द्रुपद था व इनके भाई का नाम धृष्टद्युम्न। धृष्टद्युम्न का जन्म भी यज्ञ के अग्नि कुंड से हुआ था। 13- धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान सूर्यदेव का रथ चलाने वाले सारथी का नाम क्या है?   उत्तर- भगवान सूर्यदेव का रथ चलाने वाले सारथी का नाम अरुण है। इनकी माता का नाम विनता और पिता का नाम महर्षि कश्यप है। भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ अरुण के छोटे भाई हैं। धर्म ग्रंथों में अरुण की दो संतानें बताई गई हैं- जटायु और संपाति। जटायु ने ही माता सीता का हरण कर रहे रावण से युद्ध किया था और संपाति ने वानरों को लंका का मार्ग बताया था। 14- रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने किस ऋषि से पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था?   उत्तर- राजा दशरथ द्वारा करवाए गए पुत्रेष्ठि यज्ञ को ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यश्रृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यश्रृंग का जन्म हुआ था। इस यज्ञ के फलस्वरूप ही भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न का जन्म हुआ था। 15- धर्म ग्रंथों के अनुसार चंद्रमा की कितनी पत्नियां है? उत्तर- धर्म ग्रंथों के अनुसार चंद्रमा की 27 पत्नियां हैं। इनमें से रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को विशेष प्रिय है। रोहिणी से विशेष प्रेम करने और अन्य के साथ भेद-भाव करने के कारण ही प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया था। चंद्रमा द्वारा भगवान शिव की उपासना करने से ही उन्हें इस श्राप से मुक्ति मिली थी। चंद्रमा की ये 27 पत्नियां वास्तव में 27 नक्षत्र हैं।

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Krishna Singh Nov 5, 2019

श्रीकृष्ण को 56 भोग में सबसे पहले कौन-सी चीज अर्पित की जाती है? कृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण को माखन मिश्री, धनिये की पंजीरी और दूध दही से बनने वाले भोग प्रसाद चढ़ाए जाते हैं. वहीं कई लोग और देश के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिरों में इस खास मौके पर 56 भोग चढ़ाया जाता है. इसमें लड्डू गोपाल के पसंदीदा चीजें चढ़ाई जाती हैं. पर क्या आप जानते हैं कि 56 भोग में सबसे पहले कौन-सी चीज बांके बिहारी को अर्पित की जाती है?अगर नहीं जानते हैं तो चलिए हम आपको बताते हैं रणछोड़ यानी कान्हा को 56 भोग चढ़ाने का महत्व, इसके पीछे की वजह और 56 भोग चढ़ाने की पूरी विधि के बारे में.छप्पन भोग में क्या-क्या होता है? माखन मिश्री और धनिये की पंजीरी तो बांके बिहारी को चढ़ती ही हैं. लेकिन 56 भोग की बात ही निराली है. इसमें मीठे, नमकीन, मेवे, कच्चा, पक्का सभी तरह के पकवान कान्हा को चढ़ाए जाते हैं. कई लोग 16 तरह की नमकीन, 20 प्रकार की मिठाइयां और 20 प्रकार के ड्राई फ्रूट्स चढ़ाते हैं. सामान्य तौर पर छप्पन भोग में माखन मिश्री, खीर और रसगुल्ला, जलेबी, जीरा लड्डू, रबड़ी, मठरी, मालपुआ, मोहनभोग, चटनी, मुरब्बा, साग, दही, चावल, दाल, कढ़ी, घेवर, चिला, पापड़, मूंग दाल का हलवा, पकौड़ा, खिचड़ी, बैंगन की सब्जी, लौकी की सब्जी, पूरी, बादाम का दूध, टिक्की, काजू, बादाम, पिस्ता और इलाइची होती है. इसके अलावा भगवान श्रीकृष्ण को धनिये की पंजीरी का प्रसाद भी चढ़ाया जाता है. छप्पन भोग में सबसे पहले क्या चढ़ाया जाता है? श्री कृष्ण के 56 भोग को पारंपरिक ढंग से अनुक्रम में चढ़ाया जाता है. सबसे पहले श्री बांके बिहारी को दूध चढ़ाया जाता है, इसके बाद बेसन आधारित और नमकीन खाना और अंत में मिठाई, ड्राई फ्रूट्स और इलाइची रखी जाती है. सबसे पहले भगवान को यह भोग चढ़ाया जाता है और बाद में इसे सभी भक्तों और पुजारियों में प्रसाद स्वरूप बांटा दिया जाता है. इसलिए चढ़ाई जाती है धनिये की पंजीरी भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के दौरान उन्हें धनिए की पंजीरी का भोग लगाया जाता है. कारण, रात्रि में त्रितत्व वात पित्त और कफ में वात और कफ के दोषों से बचने के लिए धनिए की पंजीरी का प्रसाद उन्हें चढ़ाया जाता है. धनिए के सेवन से वृत संकल्प भी सुरक्षित रहता है. इसीलिए भगवान को धनिये की पंजीरी का भोग लगाया जाता है. यह प्रसाद पूरे उत्तर भारत में श्रद्धालु अपने आराध्य देव यानी बांके बिहारी को चढ़ाते हैं.

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Krishna Singh Nov 1, 2019

जामवंत जी तो एक भालू थे, तो उनकी पुत्री जो कि श्री कृष्ण की पत्नी भी हुई जामवंती एक मनुष्य कैसे थी । पौराणिक काल मेँ हम नहीँँ कह सकते कि कौन क्या थे?हो सकता है वे रीछ जैसे मानव होँ ।हम केवल कल्पना मात्र कर सकते हैँँ।लेकिन नीचे दिए गए वर्णन को पढ़कर आपको अंदाजा हो जाएगा और आपके प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा ऐसा मेरा मानना है। जामवन्त को ऋक्षपति कहा जाता है। यह ऋक्ष बिगड़कर रीछ हो गया जिसका अर्थ होता है भालू अर्थात भालू के राजा। लेकिन क्या वे सचमुच भालू मानव थे? रामायण आदि ग्रंथों में तो उनका चित्रण ऐसा ही किया गया है। ऋक्ष शब्द संस्कृत के अंतरिक्ष शब्द से निकला है। दरअसल दुनियाभर की पौराणिक कथाओं में इस तरामंडल को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है, लेकिन सप्तऋषि तारामंडल मंडल को यूनान में बड़ा भालू कहा जाता है। इस तरामंडल के संबंध में प्राचीन भारत और यूनान में कई दंतकथाएं प्राचलित हैं। पुराणों के अध्ययन से पता चलता है कि वशिष्ठ, अत्रि, विश्वामित्र, दुर्वासा, अश्वत्थामा, राजा बलि, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम, मार्कण्डेय ऋषि, वेद व्यास और जामवन्त आदि कई ऋषि, मुनि और देवता सशरीर आज भी जीवित हैं। कहते हैं कि जामवन्तजी बहुत ही विद्वान् हैं। वेद उपनिषद् उन्हें कण्ठस्थ हैं। वह निरन्तर पढ़ा ही करते थे और इस स्वाध्यायशीलता के कारण ही उन्होंने लम्बा जीवन प्राप्त किया था। परशुराम और हनुमान के बाद जामवन्त ही एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके तीनों युग में होने का वर्णन मिलता है और कहा जाता है कि वे आज भी जिंदा हैं। लेकिन परशुराम और हनुमान से भी लंबी उम्र है जामवन्तजी कि क्योंकि उनका जन्म सतयुग में राजा बलि के काल में हुआ था। परशुराम से बड़े हैं जामवन्त और जामवन्त से बड़े हैं राजा बलि। रामायण काल में हमारे देश में तीन प्रकार की संस्कृतियों का अस्तित्व था। उत्तर भारत में आर्य संस्कृति जिसके प्रमुख राजा दशरथ थे, दक्षिण भारत में अनार्य संस्कृति जिसका प्रमुख रावण था और तीसरी संस्कृति देश के मध्य भारत में आरण्यक संस्कृति (जनजातीय और आदिवासी) के रूप में अस्तित्व में थी जिसके संरक्षक महर्षि अगस्त्य मुनि थे। अगस्त मुनि, वनवासियों के गुरु व मार्ग-दर्शक थे। ऋक्ष और वानर, बाली, सुग्रीव, जामवन्त, हनुमान, नल, नील आदि अस्त्य मुनि के शिष्य थे। कहा जाता है कि जामवन्त सतयुग और त्रेतायुग में भी थे और द्वापर में भी उनके होने का वर्णन मिलता है। जामवन्त एक रीछ थे या किसी देवता की संतान? आखिर जामवन्तजी इतने लंबे काल तक कैसे जिंदा रहे? यह सब हम जानेँगे:— पहला रहस्य अग्नि पुत्र जामवन्त : प्राचीन काल में इंद्र पुत्र, सूर्य पुत्र, चंद्र पुत्र, पवन पुत्र, वरुण पुत्र, ‍अग्नि पुत्र आदि देवताओं के पुत्रों का अधिक वर्णन मिलता है। उक्त देवताओं को स्वर्ग का निवासी कहा गया है। एक ओर जहां हनुमानजी और भीम को पवन पुत्र माना गया है, वहीं जामवन्तजी को अग्नि पुत्र कहा गया है। जामवन्त की माता एक गंधर्व कन्या थी। जब पिता देव और माता गंधर्व थीं तो वे कैसे रीछमानव हो सकते हैं? एक दूसरी मान्यता अनुसार भगवान ब्रह्मा ने एक ऐसा रीछ मानव बनाया था जो दो पैरों से चल सकता था और जो मानवों से संवाद कर सकता था। पुराणों अनुसार वानर और मानवों की तुलना में अधिक विकसित रीछ जनजाति का उल्लेख मिलता है। वानर और किंपुरुष के बीच की यह जनजाति अधिक विकसित थी। हालांक‍ि इस संबंध में अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है। दूसरा रहस्य जामवन्त का जन्म : माना जाता है कि देवासुर संग्राम में देवताओं की सहायता के लिए जामवन्त का जन्म ‍अग्नि के पुत्र के रूप में हुआ था। उनकी माता एक गंधर्व कन्या थीं। सृष्टि के आदि में प्रथम कल्प के सतयुग में जामवन्तजी उत्पन्न हुए थे। जामवन्त ने अपने सामने ही वामन अवतार को देखा था। वे राजा बलि के काल में भी थे। राजा बलि से तीन पग धरती मांग कर भगवान वामन ने बलि को चिरंजीवी होने का वरदान देकर पाताल लोक का राजा बना दिया था। वामन अवतार के समय जामवन्तजी अपनी युववस्था में थे। जामवन्त को चिरं‍जीवियों में शामिल किया गया है जो कलियुग के अंत तक रहेंगे। तीसरा रहस्य राम युग में जामवन्त : त्रेतायुग में भी जामवन्त बूढ़े हो चले थे। राम के काल में उन्होंने भगवान राम की सहायता की थी। कहते हैं कि जामवन्तजी समुद्र को लांघने में सक्षम थे लेकिन त्रेतायुग में वह बूढ़े हो चले थे। इसीलिए उन्होंने हनुमानजी से इसके लिए विनती थी कि आप ही समुद्र लांघिये। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में जामवन्त का नाम विशेष उल्लेखनीय है। जब हनुमानजी अपनी शक्ति को भूल जाते हैं तो जामवन्तजी ही उनको याद दिलाते हैं। रामायण अनुसार वानर सेना में अंगद, सुग्रीव, परपंजद पनस, सुषेण (तारा के पिता), कुमुद, गवाक्ष, केसरी, शतबली, द्विविद, मैंद, हनुमान, नील, नल, शरभ, गवय लोग शामिल थे। माना जाता है कि जामवन्तजी आकार-प्रकार में कुंभकर्ण से तनीक ही छोटे थे। जामवन्त को परम ज्ञानी और अनुभवी माना जाता था। उन्होंने ही हनुमानजी से हिमालय में प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का वर्णन किया था जिसमें से एक संजीविनी थी। विशल्यकरणी (शरीर में घुसे अस्त्र निकालने वाली), सन्धानी (घाव भरने वाली), सुवर्णकरणी (त्वचा का रंग ठीक रखने वाली) और मृतसंजीवनी (पुनर्जीवन देने वाली)। चौथा रहस्य जामवन्त का अहंकार : राम-रावण के युद्ध में जामवन्तजी रामसेना के सेनापति थे। युद्ध की समाप्त‌ि के बाद जब भगवान राम विदा होकर अयोध्या लौटने लगे तो जामवन्तजी ने उनसे कहा कि प्रभु इतना बड़ा युद्ध हुआ मगर मुझे पसीने की एक बूंद तक नहीं गिरी, तो उस समय प्रभु श्रीराम मुस्कुरा दिए और चुप रह गए। श्रीराम समझ गए कि जामवन्तजी के भीतर अहंकार प्रवेश कर गया है। जामवन्त ने कहा, प्रभु युद्ध में सबको लड़ने का अवसर मिला परंतु मुझे अपनी वीरता दिखाने का कोई अवसर नहीं मिला। मैं युद्ध में भाग नहीं ले सका और युद्ध करने की मेरी इच्छा मेरे मन में ही रह गई। उस समय भगवान ने जामवन्तजी से कहा, तुम्हारी ये इच्छा अवश्य पूर्ण होगी जब मैं अगला अवतार धारण करूंगा। तब तक तुम इसी स्‍थान पर रहकर तपस्या करो। पांचवां रहस्य द्वापर युग में जामवन्त : स्यमंतक मणि को इंद्रदेव धारण करते हैं। कहते हैं कि प्राचीनकाल में कोहिनूर को ही स्यमंतक मणि कहा जाता था। कई स्रोतों के अनुसार कोहिनूर हीरा लगभग 5,000 वर्ष पहले मिला था और यह प्राचीन संस्कृत इतिहास में लिखे अनुसार स्यमंतक मणि नाम से प्रसिद्ध रहा था। दुनिया के सभी हीरों का राजा है कोहिनूर हीरा। यह बहुत काल तक भारत के क्षत्रिय शासकों के पास रहा फिर यह मुगलों के हाथ लगा। इसके बाद अंग्रेजों ने इसे हासिल किया और अब यह हीरा ब्रिटेन के म्यूजियम में रखा है। हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है कि कोहिनूर हीरा ही स्यमंतक मणि है? यह शोध का विषय हो सकता है। यह एक चमत्कारिक मणि है। भगवान श्रीकृष्ण को इस मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। उन्होंने मणि के लिए नहीं बल्कि खुद पर लगे मणि चोरी के आरोप को असिद्ध करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था। दरअसल, यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी और उन्हें यह मणि भगवान सूर्य ने दी थी। सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी। वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रखी ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंतजी ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है। तब श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए जाम्बवंतजी से युद्ध करना पड़ा। बाद में जाम्बवंत जब युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने रामस्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने समर्पण कर अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें। जाम्बवती-कृष्ण के संयोग से महाप्रतापी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम साम्ब रखा गया। इस साम्ब के कारण ही कृष्ण कुल का नाश हो गया था। श्रीकृष्ण ने कहा कि कोई ब्रह्मचारी और संयमी व्यक्ति ही इस मणि को धरोहर के रूप में रखने का अधिकारी है अत: श्रीकृष्ण ने वह मणि अक्रूरजी को दे दी। उन्होंने कहा कि अक्रूर, इसे तुम ही अपने पास रखो। तुम जैसे पूर्ण संयमी के पास रहने में ही इस दिव्य मणि की शोभा है। श्रीकृष्ण की विनम्रता देखकर अक्रूर नतमस्तक हो उठे। छठा रहस्य यहां युद्ध हुआ था श्रीकृष्ण से : गुजरात के पोरबंदर से 17 किलोमीटर दूर राजकोट-पोरबंदर मार्ग पर एक गुफा पाई गई है जिसे जामवन्त की गुफा कहा जाता है। माना जाता है कि यह वही स्थान है जहां भगवान कृष्ण और जामवन्त के बीच युद्ध हुआ था। माना जाता है कि इस गुफा में दो सुरंग हैं। पहली सुरंग जानाघर जो जाती है और दूसरी द्वारिका के लिए। सातवां रहस्य जामथुन नगरी : माना जाता है कि जामथुन नामक नगरी जामवन्त ने बसाई थी। यह प्राचीन नगरी मध्यप्रदेश के रतलाम जिले में उत्तर-पूर्व में स्थित है। यहां एक गुफा मिली है जो जामवन्त का निवास स्थान माना जाता है। बरेली की गुफा : उत्तर प्रदेश के बरेली के पास जामगढ़ में भी एक प्राचीन गुफा है। माना जाता है कि जामवन्तजी यहां हजारों वर्ष रहे थे। बरेली से लगभग सोलह किलोमीटर दूर विंध्याचल की पहाड़ी पर पुराकाल से ही गणेश-जामवन्त की प्रतिमा स्थापित हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि जामवन्तजी द्वारा स्थापित यह प्रतिमा प्रतिवर्ष एक तिल के बराबर बढ़ती जा रही है। आठवां रहस्य जामवन्त तपोगुफा : जम्मू और कश्मीर के जम्मू नगर के पूर्वी छोर पर एक गुफा मंदिर बना हुआ है जिसे जामवन्त की तपोस्थली माना जाता है। इस गुफा में कई पीर-फकीरों और ऋषियों ने ज़्ह तपस्या की है इसलिए इसका नाम 'पीर खोह्' भी कहा जाता है। डोगरी भाषा में खोह् का अर्थ गुफा होता है। पीर खोह् तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु मुहल्ला पीर मिट्ठा के रास्ते गुफा तक जाते हैं। मंद‌िर की दीवारों पर देवी-देवताओं के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं। आंगन में श‌िव मंद‌िर के सामने पीर पूर्णनाथ और पीर स‌िंध‌िया की समाधिंया हैं। जामवन्त गुफा के साथ एक साधना कक्ष का निर्माण किया है जो तवी नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। समाप्त धन्यवाद 3.5 हज़ार बार देखा गया · अपवोट देने वालों को देखें ·

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Krishna Singh Nov 1, 2019

क्या आप श्री राम प्रभु के वंशज के नाम से अवगत हैं 1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए, 2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए, 3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे, 4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था, 5 - वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था, इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की। 6 - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए, 7 - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था 8 - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए, 9 - बाण के पुत्र अनरण्य हुए, 10- अनरण्य से पृथु हुए, 11- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ, 12- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए, 13- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था, 14- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए, 15- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ, 16- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित, 17- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए, 18- भरत के पुत्र असित हुए, 19- असित के पुत्र सगर हुए, 20- सगर के पुत्र का नाम असमंज था, 21- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए, 22- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए, 23- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए, भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था.भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे। 24- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए, रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया, तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है। 25- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए 26- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे, 27- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए, 28- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था, 29- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए, 30- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए, 31- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे, 32- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए, 33- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था, 34- नहुष के पुत्र ययाति हुए, 35- ययाति के पुत्र नाभाग हुए, 36- नाभाग के पुत्र का नाम अज था, 37- अज के पुत्र दशरथ हुए, 38- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए। इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी 39-पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ

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