🙏सतनाम श्री वाहेगुरु🙏 गुरु नानक देव जी के जीवन की एक कहानी 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 बात उन दिनों की है, जब गुरु नानक अपने शिष्य बाला और मरदाना के साथ पैदल ही हर जगह यात्रा किया करते थे। एक बार वो किसी गाँव से गुजर रहे थे, रास्ते में मरदाना को बहुत तेज प्यास लगी, धूप बहुत तेज थी और वो लोग काफी देर से पैदल ही चल रहे थे, इस वजह से गुरु नानक को भी बहुत प्यास लगी थी। लेकिन दूर- दूर तक कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ,चलते चलते उन्हें एक पहाड़ी दिखाई दी, जिसकी चोटी पर एक कुआं दिख रहा था। मरदाना को लगा कि चलो यहाँ पानी मिल ही जायेगा। उस कुएं का मालिक एक लालची और धनी व्यक्ति था, जो भी इंसान कुएं पर पानी पीने, नहाने या कपड़े धोने आता वो उससे पानी के बदले धन लिया करता था। Guru Nanak Dev Ji गुरु नानक ने मरदाना को थोड़ा पानी लाने के लिए भेजा। मरदाना गर्मी से बेहाल पहाड़ी के शिखर पर गया और कुएं के मालिक से बोला- मैं बहुत प्यासा हूँ, क्या आप मुझे थोड़ा पानी देंगे? आदमी बोला- आपको पानी के बदले धन देना पड़ेगा, मरदाना- मित्र हमांरे पास धन नहीं है, बस थोड़ा पानी चाहिए जिससे मेरी और गुरूजी की प्यास बुझ जाये। आदमी- नहीं अगर आपके पास धन नहीं है तो आपको पानी नहीं मिल सकता। मरदाना वापस लौटकर गुरूजी के पास आ गया और सारी बात बताई, गुरु नानक ने फिर से जाने को कहा। मरदाना फिर से गया, लेकिन आदमी ने फिर से मना कर दिया। गुरु नानक ने कहा कि मैं इस आदमी को 3 मौके देता हूँ, तुम फिर से जाओ; लेकिन इस बार वह आदमी मरदाना को डाँटते हुए बोला- धन दे सकते हो तो बताओ मेरा समय बर्बाद मत करो। भीषण गर्मी में गुरु नानक, और शिष्य बाला और मरदाना अभी तक प्यासे थे। गुरु जी बोले- ईश्वर हमारी मदद जरूर करेंगे और ऐसा कहकर नानक देव जी ने एक छोटी लकड़ी उठाई और मिट्टी में गड्ढा करने लगे, फिर जो हुआ उसे देखकर सबने दातों तले उँगलियाँ दबा ली| छोटे गड्ढे से ही पानी निकल आया वो भी एकदम शुद्ध और साफ। गुरूजी और शिष्यों ने पानी पीकर प्यास बुझाई, यह देखकर बाकि गाँव वाले भी आ गए और वो भी शीतल पानी का आनंद लेने लगे। उस लालची आदमी ने पहाड़ी के ऊपर यह सब देखा तो आश्चर्य से अपने कुएँ में झाँककर देखा तो ये क्या? एक तरफ गुरूजी के पास पानी की धारा फूट पढ़ी थी वही दूसरी तरफ उसके कुएं का पानी लगातार सूखता जा रहा था। उसे समझ नहीं आया कि अचानक ये क्या चमत्कार हो रहा है? उसने गुस्से में अपनी पूरी ताकत जुताई और एक बड़ा सा पत्थर गुरु नानक की ओर धकेला। पत्थर पूरी तेजी से नानक जी की ओर आ रहा था, ये देखकर सारे गाँव वाले घबरा गए लेकिन नानक देव जी ध्यान में बेखबर बैठे थे, पत्थर को देखकर मरदाना चिल्लाया कि गुरु जी आप हट जाइये लेकिन जैसे ही पत्थर पास आया, गुरूजी ने अपना बाँया हाथ आगे किया और विशाल पत्थर हाथ से टकराकर वहीँ के वहीँ रुक गया। ये सब जब उस लालची आदमी ने देखा उसकी आँखे फटी की फटी रह गयी। ईश्वर का यह चमत्कार उसने पहली बार देखा था, वह भाग कर आया और नानक जी के चरणों में गिर पड़ा उसे अपनी गलती का अहसास गया था। नानक जी ने समझाया- जिसका कोई नहीं होता उसका ईश्वर होता है, जो हमें जन्म दे सकता है वो पाल भी सकता है। किस बात का गुरुर? किस बात का घमंड? तुम्हारा कुछ नहीं है सब कुछ यहीं रह जायेगा, तुम खाली हाथ आये थे खाली हाथ ही जाओगे। अगर तुम दुनियाँ के लिए कुछ करके जाओगे तो मरकर भी लोगों के दिलों में जिन्दा रहोगे। 🙏🙏सतनाम श्री वाहेगुरु🙏

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🕉🕉सूर्या देवाय नमः 🙏🙏 🕉🕉साईं राम🌹🌹 🌹🌹बहुत सुन्दर कहानी🌹🌹 🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱 बिजली और तूफान की कहानी 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 बहुत समय पहले बिजली और तूफान धरती पर मनुष्यों के बीच रहा करते थे। राजा ने उन्हें मनुष्यों की बस्ती से दूर रखा था। बिजली तूफान की बेटी थी। जब कभी किसी बात पर बिजली नाराज हो उठती, वह तड़प कर किसी के घर पर गिरती और उसे जला देती या किसी पेड़ को राख कर देती, या खेत की फसल नष्ट कर देती। मनुष्य को भी वह अपनी आग से जला देती थी। जब-जब बिजली ऐसा करती, उसके पिता तूफान गरज-गरजकर उसे रोकने की चेष्टा करते। किंतु बिजली बड़ी ढीठ थी। वह पिता का कहना बिलकुल नहीं मानती थी। यहाँ तक कि तूफान का लगातार गरजना मनुष्यों के लिए सिरदर्द हो उठा। उसने जाकर राजा से इसकी शिकायत की। राजा को उसकी शिकायत वाजिब लगी। उन्होंने तूफान और उसकी बेटी बिजली को तुरंत शहर छोड़ देने की आज्ञा दी और बहुत दूर जंगलों में जाकर रहने को कहा। किंतु इससे भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। बिजली जब नाराज होती, जंगल के पेड़ जला डालती। कभी-कभी पास के खेतों का भी नुकसान कर डालती। मनुष्य को यह भी सहन न हुआ। उसने फिर राजा से शिकायत की। राजा बेहद नाराज हो उठा। उसने तूफान और बिजली को धरती से निकाल दिया और उन्हें आकाश में रहने की आज्ञा दी, जहाँ से वे मनुष्य का उतना नुकसान नहीं कर सकते थे जितना की धरती पर रहकर करते थे। क्रोध का फल बुरा होता है।

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🕉🕉साईं राम 🌹🌹🙏🙏 – जानिये क्यों होती है हनुमान जी की मूरत केसरी रंग की। 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 आपने हनुमान जी की केसरी रंग की मूरत मंदिरों में ज़रूर देखि होगी लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि उनकी ये मूरत केसरी रंग की क्यों होती है. बच्चे ये सवाल अक्सर करते है और इस हनुमान कहानी को पढ़कर आपको भी जवाब मिल जाएगा और आप अपने बच्चो को भी अच्छे से समझा सकेंगे. एक बार हनुमान जी ने सीता मईया को सिन्दूर से अपनी मांग भरते देख लिया. उनसे रहा ना गया और उन्होंने तुरंत सीता माता से जाकर पुछा “हे देवी, ये सिन्दूर से मांग भरने का क्या महत्त्व है, कृपया मेरी दुविधा दूर करे” सीता माता ने इसका हनुमान जी को बहुत सुन्दर जवाब दिया “हनुमान…स्त्रियां अपनी मांग में सिन्दूर इसलिए लगाती है ताकि वो जग ज़ाहिर कर सके कि उनके लिए पति की अहमियत सबसे ज़्यादा है. सिन्दूर पति की लम्बी आयु के लिए लगाया जाता है और जो कोई भी स्त्री सिन्दूर लगाती है माता पार्वती उसके पति की रक्षा आवश्य करती है” 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ये सुन कर हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिन्दूर लगा लिया क्यूंकि वे भी अपने श्री राम की लम्बी आयु की कामना करते थे. तब से हनुमान जी रोज़ अपने पूरे शरीर पर सिन्दूर ग्रहण करने लगे और इसीलिए मंदिरो में हनुमान जी की मूरत सिन्दूरी रंग की होती है. हनुमान जी की मूरत पर सिन्दूर क्यों लगाया/चढ़ाया जाता है? जब भगवान् राम ने देखा कि हनुमान ने अपने पूरे शरीर पर सिन्दूर लगाया हुआ तो इसका कारण पुछा. इसके जवाब में हनुमान जी ने कहा “हे भगवन, सीता माता ने कहा था कि ज़रा सा सिन्दूर सिर पर लगाने से आपकी आयु लम्बी हो जायेगी. अगर ज़रा सा सिन्दूर लगाने से आपकी आयु लम्बी हो सकती है तो अगर मैं अपने पूरे शरीर पर सिन्दूर लगा लू तो अवश्य ही इसका बहुत अच्छा प्रभाव होगा.” श्री राम हनुमान की श्रद्धा से बहुत प्रसन्न हुए और ये वरदान दिया कि जो भी भक्त हनुमान को सिन्दूर लगाएगा या हनुमान की सिन्दूर के साथ पूजा करेगा उसे लम्बी आयु, यश और खुशहाली मिलेगी. और तब से भक्त जन हनुमान जी की मूरत पर सिन्दूर लगाते और चढ़ाते है।

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🚩🚩जय माता दी 🚩🚩 Beautiful story 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 एक घर मे *पांच दिए* जल रहे थे। एक दिन पहले एक दिए ने कहा - इतना जलकर भी *मेरी रोशनी की* लोगो को *कोई कदर* नही है... तो बेहतर यही होगा कि मैं बुझ जाऊं। वह दिया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया । जानते है वह दिया कौन था ? वह दिया था *उत्साह* का प्रतीक यह देख दूसरा दिया जो *शांति* का प्रतीक था, कहने लगा - मुझे भी बुझ जाना चाहिए। निरंतर *शांति की रोशनी* देने के बावजूद भी *लोग हिंसा कर* रहे है। और *शांति* का दिया बुझ गया। *उत्साह* और *शांति* के दिये के बुझने के बाद, जो तीसरा दिया *हिम्मत* का था, वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया। *उत्साह*, *शांति* और अब *हिम्मत* के न रहने पर चौथे दिए ने बुझना ही उचित समझा। *चौथा* दिया *समृद्धि* का प्रतीक था। सभी दिए बुझने के बाद केवल *पांचवां दिया* *अकेला ही जल* रहा था। हालांकि पांचवां दिया सबसे छोटा था मगर फिर भी वह *निरंतर जल रहा* था। तब उस घर मे एक *लड़के* ने प्रवेश किया। उसने देखा कि उस घर मे सिर्फ *एक ही दिया* जल रहा है। वह खुशी से झूम उठा। चार दिए बुझने की वजह से वह दुखी नही हुआ बल्कि खुश हुआ। यह सोचकर कि *कम से कम* एक दिया तो जल रहा है। उसने तुरंत *पांचवां दिया उठाया* और बाकी के चार दिए *फिर से* जला दिए । जानते है वह *पांचवां अनोखा दिया* कौन सा था ? वह था *उम्मीद* का दिया... इसलिए *अपने घर में* अपने *मन में* हमेशा उम्मीद का दिया जलाए रखिये । चाहे *सब दिए बुझ जाए* लेकिन *उम्मीद का दिया* नही बुझना चाहिए । ये एक ही दिया *काफी* है बाकी *सब दियों* को जलाने के लिए ....🙏

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||Sabka Malik Ek|| ||Shraddha Saburi| 🌹🌹OM SAI SHUBH SAVERA 🌹🙏🌹 🙏🙏 ॐ साई राम 🙏🙏 🌹🌹🌹 मेरे साई 🌹🌹🌹 दया की चादर तन पे डाले, सांई तुम भगवान हो, दीन दुखी के मालिक तुम हो, धरती पर वरदान हो, दर्श दिखा के अब सुख देदो, तुम जीवन हो प्राण हो... दया की चादर तन पे डाले, सांई तुम भगवान हो, दीन दुखी के मालिक तुम हो, धरती पर वरदान हो, दर्श दिखा के अब सुख देदो, तुम जीवन हो प्राण हो... सांई तुम्हरा नाम मन्त्र है, रिद्दि सिद्दि है दोनो साथ, नहीं जगत में जिसका कोई, उसके स्वामी उसके नाथ... अंधकार में तुम दीपक हो, अंधकार में तुम दीपक हो, गीत का तुम ञान हो... दया की चादर तन पे डाले, सांई तुम भगवान हो, दीन दुखी के मालिक तुम हो, धरती पर वरदान हो, दर्श दिखा के अब सुख देदो, तुम जीवन हो प्राण हो... 🌹🌹अल्लाह मालिक 🌹🌹 🙏🏻ॐ साई राम🙏🏻 💖💖जय जय साई नाथाये नमः💖💖 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

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🕉🕉साईं राम🌹🌹🙏🙏 🕉🕉गणपतये नमः🌹🌹 #ॐ साई राम तुम्हें ढेर सारी खुशियाँ मालिक देता है तब तुम धन्यवाद के गीत नही गाते,जब तुम परेशान होते हो और तुम्हारी इच्छा की तुम्हारे अनुकूल पूर्ति नही होती तब तुम ये कहते हो कि मालिक है ही नही और साथ ही ये भी कहने लगते हो कि सब झूठ है,तुम कृतघ्न बनकर मालिक की सत्ता को ही नकारने लगते हो,क्यूँ तुम ऐसा करते हो,इसका जवाब तुम खुद से ही पूछो ,तुम्हें जवाब मिल जाएगा,तुम्हारी आस्था ही कमजोर है मालिक के प्रति तभी तुम मालिक को दोषी ठहराते हो,क्या तुमने मालिक को केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए एक जरिया माना है??जब तुम मालिक की शरण में आत्मसर्मपण करोगे तब तुम किसी भी परिस्थिति में मालिक पर अपना गुस्सा नही निकालोगे,बल्कि मालिक की कृपारूपी छत की अनुभूति करते हुए मालिक की महिमा का गान करने लगोगे*☝ *सबका मालिक एक*

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