Kamlesh Sep 19, 2021

अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 अनंत चतुर्दशी 2021 अनंत चतुर्दशी कब है, जानें क्यों अनंत चतुर्दशी को किया जाता है गणपति विसर्जन अनंत चतुर्दशी जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है कि यह चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। भाद्रमास के शुक्‍ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। इस बार अनंत चतुर्दशी 19 सितंबर को है। अनंत चतुर्दशी के दिन ही गणपति का विसर्जन किया जाता है। हिंदू धर्म की मान्‍यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीहर‍ि के अनंत रूप की पूजा होती है और उसके बाद लोग हाथ में अनंत बांधते हैं। आइए आपको इस त्‍योहार के बारे में विस्‍तार से बताते हैं और साथ में यह भी बताएंगे किस इस दिन गणपति विसर्जन क्‍यों किया जाता है। इस दिन रखा जाता है व्रत पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, इस दिन विष्‍णु भगवान के अनंत स्‍वरूप की पूजा होती है और व्रत किया जाता है। उसके बाद हाथों में अनंत सूत्र या अनंनता बांधा जाता है। महिलाएं अपने बाएं हाथ पर और पुरुष अपने दाएं हाथ पर अनंत बांधते हैं। यह अनंत सूत्र दीर्घ आयु और अनंत जीवन का प्रतीक माना जाता है अनंत चतुर्दशी का महत्‍व सनातन धर्म को मानने वाले अनंत चतुर्दशी के त्‍योहार को पूरी श्रद्धा और आस्‍था के साथ मनाते हैं। मान्‍यता है कि वह अनंत चतुर्दशी का ही दिन था जब भगवान विष्‍णु ने सृष्टि की रचना के लिए 14 लोकों का निर्माण किया था। ये 14 लोक तल, अतल, वितल, सुतल, सलातल, रसातल, पाताल, भू, भव:, स्व:, जन, तप, सत्य मह थे। इसलिए इन सभी लोकों की रक्षा करने के लिए भगवान विष्‍णु ने अनंत रूप धारण किया था। ऐसा होने की वजह से भगवान अनंत रूप में नजर आने लगे थे। विधि विधान से इस व्रत का पालन करने से मनुष्‍य के सभी कष्‍टों का निवारण होता है। इस दिन व्रत करने वाले व्‍यक्ति को विष्‍णु सहस्‍त्रनाम मंत्र का जप करना चाहिए। ऐसा करने वाले हर व्‍यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पौराणिक मान्‍यताएं बताती हैं कि इस व्रत की सबसे पहले शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसलिए अनंत चतुर्दशी को किया जाता है गणपति का विजर्सन गणेश चतुर्थी के दिन स्‍थापित किए गए गणपति का विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाता है। इसके पीछे पौराणिक कहानी यह है कि जिस दिन वेद व्‍यासजी ने महाभारत लिखने के लिए गणेशजी को महाभारत की कथा सुनानी शुरू की थी उस दिन भाद्रशुक्ल चतुर्थी तिथि थी। कथा सुनाते समय वेदव्‍यासजी ने आंखें बंद करली और गणेशजी को लगातार 10 दिनों तक कथा सुनाते रहे और गणेशजी लिखते रहे। 10 वें दिन जब वेदव्‍यासजी ने आंखें खोली तो देखा कि एक जगह बैठकर लगातार लिखते-लिखते गणेशजी के शरीर का तापमान काफी बढ़ गया है। ऐसे में वेदव्यासजी ने गणपति को ठंडक प्रदान करने के लिए ठंडे जल में डुबकी लगवाई। जहां पर वेदव्यासजी के कहने पर गणपति महाभारत लिख रहे थे वहां पास ही अलकनंदा और सरस्वती नदी का संगम है। जिस दिन सरस्वती और अलकनंदा के संगम में वेदव्यासजी को डुबकी लगवाई उस दिन अनंत चतुर्दशी का दिन था। यही वजह है कि चतुर्थी पर स्‍थापित होने के बाद गणेशजी का विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन किया जाता है। जबकि तांत्रिक विषयों पर आधारित ग्रंथ मंत्रमहार्णव और मंत्र महोदधि में ऐसे बताया गया है कि गणेशजी की स्थापना मनोकामना अनुसार करें और 10 दिनों तक साधना करने के बाद इनका विसर्जन कर दें।

+10 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 35 शेयर
Kamlesh Sep 19, 2021

अनंत चतुर्दशी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 अनंत चतुर्दशी 2021: अनंत चतुर्दशी पर बन रहा है बुधादित्य योग, जानिए शुभ मुहूर्त और भगवान विष्णु की पूजा विधि हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भादप्रद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चौदस या अनंत चतुर्दशी के रुप में मनाया जाता है। इस बार अनंत चौदस 19 सिंतबर 2021 पड़ रही है।जहां उस दिन गणपति बप्पा को विदा किया जाता है तो वहीं भगवान विष्णु की पूजा अर्चना के लिए भी ये दिन बहुत विशेष माना गया है। इस दिन लोग व्रत रखकर भगवान नारायण विष्णु की पूजा करते हैं। यह दिन बहुत ही मंगलकारी माना जाता है। इसके साथ ही इस बार की अनंत चौदस और भी ज्यादा शुभफलदायी है। इस बार अनंत चौदस पर बुधादित्य योग बन रहा है। जो भक्तों के लिए अत्यंत शुभफलदायी रहेगा। इस दिन भक्त भगवान विष्णु को अनंत सूत्र बांधते हैं और उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। जानए अनंत चौदस का महत्व, तिथि और व्रत की विधि... अनंत चौदस पर बन रहा है बुधादित्य योग इस बार की अनंत चौदस भक्तों के लिए और भी मंगलकारी रहेगी क्योंकि इस बार अनंत चौदस के दिन मंगल, बुध और सूर्य तीनों ही कन्या राशि में विराजमान रहेंगे। इस वजह से इस दिन बुधादित्य योग का निर्माण हो रहा है। इस योग में पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। अनंत चौदस का महत्व जैसा कि इस पर्व का नाम है इस दिन भगवान विष्णु को अनंत सूत्र बांधा जाता है। ये अनंत सूत्र कपड़े, सूत या रेशम का बनाया जाता है। पूजन के बाद या धागा अपने बाजू पर बांध लिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस सूत्र को बांधने से सभी बाधाओं से मुक्ति प्राप्त होती है। अनंत चौदस पूजा का मुहूर्त- भादप्रद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी आरंभ-19 सितंबर 2021 दिन रविवार प्रातः 05 बजकर 59 मिनट से भादप्रद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी समाप्त-  20 सितंबर 2021 दिन सोमवार प्रातः 05 बजकर 28 मिनट पर पूजा मुहूर्त- 19 सितंबर सुबह 06 बजकर 08 मिनट से लेकर अगली सुबह 05 बजकर 28 मिनट तक पूजा का समय रहेगा। अनंत चतुर्दशी पर पूजा विधि- अनंत चतुर्दशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करें। इसके बाद पूजा स्थल पर कलश स्थापित करें और कलश पर भगवान विष्णु की तस्वीर भी स्थापित करें। धागे पर कुमकुम, केसर और हल्दी से रंगकर उसमें चौदह गांठे बांधकर अनंत सूत्र बनाएं। अब इस अनंत सूत्र को भगवान विष्णु के समक्ष रखें और विष्णु जी के साथ सूत्र की भी पूजा करें। पूजा करते समय इस मंत्र का जाप करें।  'अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव।  अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते।।'  पूजन पूर्ण हो जाने के बाद अनंत सूत्र को अपने और परिवार में सबके बाजू पर बांध दें।

+37 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 99 शेयर
Kamlesh Sep 17, 2021

विश्वकर्मा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 विश्वकर्मा पूजा 2021 विश्वकर्मा पूजा आज जानें शुभ मुहूर्त और पूजन विधि विश्वकर्मा पूजा 2021 : शिल्प के देवता भगवान विश्वकर्मा की जयंती कल मनाई जाएगी। इस दिन विशेष तौर पर औजार, निर्माण कार्य से जुड़ी मशीनों, दुकानों, कारखानों, मोटर गैराज, वर्कशॉप, लेथ यूनिट, कुटीर एवं लघु इकाईयों आदि में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया जाएगा। मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा पहले वास्तुकार और इंजीनियर हैं। इन्होंने ही स्वर्ग लोक, पुष्पक विमान, द्वारिका नगरी, यमपुरी, कुबेरपुरी आदि का निर्माण किया था।  विश्वकर्मा पूजा का मुहूर्त- विश्वकर्मा दिवस, 17 सितंबर को एक घंटे 32 मिनट तक राहुकाल रहेगा। इस दौरान विश्वकर्मा पूजन की मनाही है। आदि शिल्पी की जयंती पर राहुकाल की शुरुआत पूर्वाह्न 10:43 बजे से होगी। दोपहर 12:15 बजे राहुकाल समाप्त होगा। विश्वकर्मा पूजन में सूर्य की कन्या राशि में संक्रांति का विशेष महत्व है। इस वर्ष सूर्य की कन्या राशि में संक्रांति 17 सितंबर को दोपहर 1: 29 बजे होगा ! औजारों, निर्माण से जुड़ी मशीनों, दुकानों, कल-कारखानों आदि में पूजन के लिए मध्याह्न 12:16 बजे से सूर्यास्त तक का समय उपयुक्त है। अच्छी बात यह है कि इस दिवस पर सर्वार्थसिद्धि योग भी बन रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योग की शुरुआत प्रात: 06:07 बजे से होगी जो अगले दिन 18 सितंबर को भोर में 03:36 मिनट तक रहेगा। इस योग में विश्वकर्मा का पूजन विशेष रूप से फलदायी होगा। कैसे करें पूजा इस दिन अपने कामकाज में उपयोग में आने वाली मशीनों को साफ करें। फिर स्नान करके भगवान विष्णु के साथ विश्वकर्माजी की प्रतिमा की विधिवत पूजा करनी चाहिए।  ऋतुफल, मिष्ठान्न, पंचमेवा, पंचामृत का भोग लगाएं। दीप-धूप आदि जलाकर दोनों देवताओं की आरती उतारें। कथाएं भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर शास्त्रों में अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। वराह पुराण के अनुसार ब्रह्माजी ने विश्वकर्मा को धरती पर उत्पन्न किया। वहीं विश्वकर्मा  पुराण के अनुसार, आदि नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्माजी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की। भगवान विश्वकर्मा के जन्म को देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से भी जोड़ा जाता है।  इस तरह भगवान विश्वकर्मा के जन्म को लेकर शास्त्रों में जो कथाएं मिलती हैं, उससे ज्ञात होता है कि विश्वकर्मा एक नहीं कई हुए हैं और समय-समय पर अपने कार्यों और ज्ञान से वो सृष्टि के विकास में सहायक हुए हैं। शास्त्रों में भगवान विश्वकर्मा के इस वर्णन से यह संकेत मिलता है कि विश्वकर्मा एक प्रकार का पद और उपाधि है, जो शिल्पशास्त्र का श्रेष्ठ ज्ञान रखने वाले को कहा जाता था। सबसे पहले हुए विराट विश्वकर्मा, उसके बाद धर्मवंशी विश्वकर्मा, अंगिरावंशी, तब सुधान्वा विश्वकर्मा हुए। फिर शुक्राचार्य के पौत्र भृगुवंशी विश्वकर्मा हुए। मान्यता है कि देवताओं की विनती पर विश्वकर्मा ने महर्षि दधीची की हड्डियों से स्वर्गाधिपति इंद्र के लिए एक शक्तिशाली वज्र बनाया था। प्राचीन काल में जितने भी सुप्रसिद्ध नगर और राजधानियां थीं, उनका सृजन भी विश्वकर्मा ने ही किया था, जैसे सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलियुग के हस्तिनापुर। महादेव का त्रिशूल, श्रीहरि का सुदर्शन चक्र, हनुमान जी की गदा, यमराज का कालदंड, कर्ण के कुंडल और  कुबेर के पुष्पक विमान का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था। वो शिल्पकला के इतने बड़े मर्मज्ञ थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊ बनाने की सामथ्र्य रखते थे।

+15 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 55 शेयर
Kamlesh Sep 17, 2021

परिवर्तित एकादशी व्रत की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 परिवर्तिनी एकादशी 2021: उदया तिथि में कब रखा जाएगा परिवर्तिनी एकादशी व्रत, जानिए इस दिन क्या करें और क्या नहीं भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी या पद्मा एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल परिवर्तिनी एकादशी 17 सितंबर 2021, शुक्रवार को है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत रखने से भगवान विष्णु के साथ माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है। घर में किसी प्रकार की कमी नहीं रहती है। पापों से मुक्ति दिलाती है एकादशी ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, भगवान विष्णु देवशयनी एकादशी से योग निद्रा में चले जाते हैं और परिवर्तनी एकादशी के दिन करवट बदलते हैं। करवट बदलने से भगवान विष्णु का स्थान परिवर्तन होता है। इसलिए इसे परिवर्तनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजन का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत रखे से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। परिवर्तनी एकादशी शुभ मुहूर्त- हिंदू पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 16 सितंबर, गुरुवार को सुबह 09 बजकर 39 मिनट से शुरू होगी, जो कि 17 सितंबर की सुबह 08 बजकर 08 मिनट तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि लग जाएगी। 16 सितंबर को एकादशी तिथि पूरे दिन रहेगी। उदया तिथि में व्रत रखने की मान्यता के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी व्रत 17 सितंबर, शुक्रवार को रखा जाएगा। एकादशी के दिन क्या करें और क्या न करें-  1. शास्त्रों में सभी 24 एकादशियों में चावल खाने को वर्जित माना गया है। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाने से इंसान रेंगने वाले जीव योनि में जन्म लेता है। इस दिन भूलकर भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। 2. एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने के साथ ही खान-पान, व्यवहार और सात्विकता का पालन करना चाहिए। 3. कहा जाता है कि एकादशी के पति-पत्नी को ब्रह्नाचार्य का पालन करना चाहिए। 4. मान्यता है कि एकादशी का लाभ पाने के लिए व्यक्ति को इस दिन कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके साथ ही लड़ाई-झगड़े से भी बचना चाहिए। 5. एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठना शुभ माना जाता है और शाम के समय नहीं सोना चाहिए। एकादशी के दिन करें ये काम- 1. एकादशी के दिन दान करना उत्तम माना जाता है। 2. एकादशी के दिन संभव हो तो गंगा स्नान करना चाहिए। 3. विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए एकादशी के दिन केसर, केला या हल्दी का दान करना चाहिए। 4. एकादशी का उपवास रखने से धन, मान-सम्मान और संतान सुख के साथ मनोवांछित फल की प्राप्ति होने की मान्यता है। 5. कहा जाता है कि एकादशी का व्रत रखने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

+82 प्रतिक्रिया 12 कॉमेंट्स • 236 शेयर
Kamlesh Sep 15, 2021

ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 तेजा दशमी 2021: क्यो और कैसे मनाई जाती है, जानिए इसके पीछे की लोक कथा तेजा दशमी: मध्यप्रदेश और राजस्थान के हर गांव में तेजा दशमी त्योहार की तरह मनाई जाती है. इस दिन तेजाजी के मंदिरों में मेले का भी आयोजन होता है. Teja Dashmi 2021 : इस दिन वीर तेजाजी के पूजन की परंपरा है और तेजाजी महाराज के मंदिरों में मेले का भी आयोजन होता है. भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन मध्यप्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में तेजा दशमी पर्व मनाने की परंपरा है. इस साल 16 सितंबर, गुरुवार को तेजा दशमी मनाई जाएगी. इस दिन वीर तेजाजी के पूजन की परंपरा है और तेजाजी महाराज के मंदिरों में मेले का भी आयोजन होता है. आइए जानते हैं क्या है तेजा दशमी, क्यों मनाई जाती है और क्या है इसके पीछे की कथा. तेजाजी महाराज कौन थे  वीर तेजाजी महाराज का जन्म नागौर जिले के खड़नाल गांव में ताहरजी (थिरराज) और रामकुंवरी के घर माघ शुक्ल चतुर्दशी संवत् 1130 यथा 29 जनवरी 1074 को जाट परिवार में हुआ था. बताया जाता है कि तेजाजी के माता-पिता को संतान नहीं हो रही थी तब उन्होंने शिव पार्वती की कठोर तपस्या की, जिसके बाद उनके घर तेजाजी का जन्म हुआ था. मान्यता है कि जब वे दुनिया में आए तब एक भविष्यवाणी में कहा गया था कि भगवान ने खुद आपके घर अवतार लिया है.  तेजा दशमी की कथा और मान्यताएं एक बड़ी ही प्रचलित लोक कथा के मुताबिक तेजाजी राजा बचपन से ही साहसी थे. एक बार वे बहन को लेने उसके ससुराल पहुंचे. वह दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी का था. बहन के ससुराल पहुंच कर तेजाजी को मालूम चला कि एक दस्यु उनकी बहन के ससुराल से सारे गोधन यानि कि सारी गायों को लूटकर ले गया है. ये खबर मिलते ही तेजाजी अपने एक साथी के साथ जंगल में उस डाकू से गायों को छुड़ाने के लिए निकल गए. रास्ते में एक सांप उनके घोड़े के सामने आ जाता है और तेजा को डसने की कोशिश करता है. तेजाजी उस सांप को वचन दे देते हैं कि अपनी बहन की गायों को छुड़ाकर वे वापस वहीं आएंगे, तब सांप उन्हें डस ले, ये सुनकर सांप उनका रास्ता छोड़ देता है. तेजाजी डाकू से अपनी बहन की गायों छुड़वाने में सफल रहते हैं. डाकुओं से हुए युद्ध के कारण वे घायल होकर लहू से सराबोर हो जाते हैं और ऐसी ही अवस्था में सांप के पास जाते हैं. तेजा को घायल हालत में देखकर नाग कहता है कि तुम्हारा तो पूरा ही तन खून से अपवित्र हो गया है. मैं डंक कहां मारूं? तब तेजाजी उसे अपनी जीभ पर डसने के लिए कहते हैं. मान्यता है कि उनकी इसी वचनबद्धता को देखकर नागदेव उन्हें ये आशीर्वाद देते हैं कि जो व्यक्ति सर्पदंश से पीड़ित है, वह तुम्हारे नाम का धागा बांधेगा तो उस पर जहर का असर नहीं होगा. इसी मान्यता के अनुसार हर साल भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजाजी की पूजा होती है. दशमी पर तेजाजी के मंदिरों में लोगों की भारी भीड़ रहती है, जिन लोगों ने सर्पदंश से बचने के लिए तेजाजी के नाम का धागा बांधा रहता है, वह जाकर धागा खोलते हैं. कैसे मनाई जाती है तेजा दशमी मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ और राजस्थान के कई इलाकों में तेजा दशमी की धूम होती है. तेजा दशमी के अवसर पर कई स्थानों में मेले आयोजित किए जाते हैं. इन मेले में तेजाजी महाराज की सवारी के रूप में शोभायात्रा निकाली जाती है. भोजन और प्रसादी के रूप में भंडारे का आयोजन किया जाता है. सैकडों की तादाद में श्रद्धालु इन मेलों और तेजाजी महाराज के मंदिरों में आते हैं. तेजा दशमी को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में उत्साह अधिक दिखाई देता है.

+74 प्रतिक्रिया 24 कॉमेंट्स • 241 शेयर
Kamlesh Sep 15, 2021

+10 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 12 शेयर
Kamlesh Sep 14, 2021

जय श्री राधे राधे 🌹🌹🌹🌹🌹 राधाअष्टमी पर विशेष: वो सोलह दिन जो आपके जीवन में चमत्कार कर सकते हैं इन सोलह रात्रियों का आग़ाज़ होता है भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से। यह अष्टमी राधाअष्टमी कहलाती हैं। राधाअष्टमी इस बार 14 सितंबर को है। राधाअष्टमी स्वयं में एक महापर्व  है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी के  प्राकट्य दिवस के रूप में मान्यता हासिल है।  यूँ तो भारतीय दर्शन में ऐसे ढेरों पर्व हैं जो आंतरिक और बाह्य दोनों उन्नति के वाहक हैं, और आपको आपके स्व से परिचित करा कर सिर्फ़ आपका भविष्य ही नहीं आपमें ब्रम्हाण्ड को बदलने की शक्ति से रूबरू कराने का माद्दा रखते हैं। लेकिन वर्ष में सोलह दिन ऐसे हैं जो आपको किसी महाशक्ति में रूपांतरित करने का दम रखते हैं।  उत्तर और पूर्व भारत का यह गुप्त महापर्व है सुरैया जो सोलह से बने सोहरैया  का अपभ्रंश है। ये पर्व आमजन में प्रचलित न होकर सिद्धों और साधकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ये सोलह दिन हैं तो बेहद प्रभावी और कभी बड़े प्रचलित भी थे। पर वक्त के थपेड़ों में वो गुम होकर कालांतर में गुप्त और लुप्त हो गए। आज भले ही वो अन्य पर्वों से कम प्रचलन में हैं पर आज भी इनकी कोई सानी नहीं है। ये भौतिक उन्नति और आत्मिक शक्ति के विकास के लिए बेहद तीव्र व महत्वपूर्ण हैं। इन सोलह रात्रियों का आग़ाज़ होता है भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से। यह अष्टमी राधाअष्टमी कहलाती हैं। राधाअष्टमी इस बार 14 सितंबर को है। अलग अलग पंथ, संप्रदाय  और मत के लोग इसे भिन्न भिन्न नामों से पुकारते हैं, पर कहते हैं कि  आत्मजागरण के इस पर्व का प्रयोग राम, परशुराम, दुर्वासा, विश्वामित्र, कृष्ण,  बुद्ध, महावीर से लेकर आचार्य चाणक्य तक ने किया। प्राचीन काल में  उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और नेपाल तक की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक समृद्धि के सूत्र इन षोडश दिवस में समाहित हैं। भारत के सोने की चिड़िया बनने की चाभी भी षोडश दिवस का यह काल अपने भीतर समेटे और लपेटे हुए है। यांत्रिक, तांत्रिक, वैज्ञानिक, आत्मिक यानी स्वजागरण से लेकर समृद्धि प्राप्ति तक के लिए बेहद असरदार और धारदार माना जाता है यह पवित्र काल खण्ड।  इसलिए आत्मबोध के प्यास की अनुभूति क्षीण होते ही आत्मजागृति के इस महापर्व को लक्ष्मी साधना का पर्व मान लिया गया। इसी वजह से देश के कई भागों में यह पर्व लक्ष्मी उपासना के रूप में ही जाना जाता है। ये सत्य है कि इन दिनों यक्षिणी और योगिनी साधना का अतिमहत्व है और आध्यात्मिक मान्यतायें यक्ष-यक्षिणी को स्थूल समृद्धि का नियंता मानती है।सनद रहे कि कुबेर यक्षराज और लक्ष्मी यक्षिणी हैं। इसलिए लक्ष्मी से संबंधित उपासना दिवाली नहीं, इन सोलह दिनों में महासिद्धि प्रदान करने वाली कही गयी है। लक्ष्मी के उपासकों  से लेकर आत्मजागृति के पैरोकार इन सोलह दिनों तक उपासना और उपवास में रमे होते हैं। सदगुरुश्री के अनुसार आत्मिक उत्थान चाहने वालों के लिए ये रात्रियां बेहद क़ीमती हैं।  राधाअष्टमी स्वयं में एक महापर्व  है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी के  प्राकट्य दिवस के रूप में मान्यता हासिल है। कहते हैं कि इसी दिन  राधा वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। राधा अष्टमी से अगली अष्टमी तक की षोडश रात्रियाँ मानव ही नहीं सम्पूर्ण सृष्टि को बदलने की महाक्षमता से ओतप्रोत हैं। आप जैसी अपनी सोच रखेंगे ये सोलह दिन आपको वैसे ही परिणाम प्रदान करेंगे। राधाअष्टमी अष्टमी से कृष्ण पक्ष की अष्टमी का काल सुरैया कहलाता है। सुरैया, यानि वो काल जो जीवन को सुर में ढाल दे। धनाकांक्षियों को इन षोडश दिनों में लक्ष्मी के साथ यक्ष-यक्षिणी की उपासना अवश्य करनी चाहिए। विद्या के लिए कण्ठ चक्र कर ध्यान करना चाहिए। बाहरी पदार्थों की प्राप्ति के लिए अंतःकरण के एक भाग चित्त को स्थिर करने का प्रयास करना चाहिए। चित्त को एक बिंदु कर किसी कामना के लिए रोकने के प्रयास और अभ्यास को ही मंत्र साधना कहा गया है।   इन दिनों में यक्ष, यक्षिणी, योगिनी व दैविक ऊर्जाओं के साथ ऐंकार, सौ:कार, श्रींकार, ह्रींकार, क्लींकार व अन्य बीज मंत्रों से अर्चना की समृद्ध  परंपरा प्राप्त होती है। आध्यात्म कहता है कि सुरतों यानी आत्माओं के महाबूंद की एक धारा निचले जगत में उतारी गयी। जिससे ये निर्जीव जगत चेतन हुआ, गतिशील हुआ। इस धारा के विपरीत अपने परम तत्व को प्राप्त कर लेने की अवधारणा ही मूल रूप से राधा है। स्वयं को राधा में परिवर्तित कर अपने परम तत्व अर्थात् सत्त को हासिल करने के लिए इन रात्रियों में ब्रह्मांडीय ध्वनियों का श्रवण यानी भजन और ध्यान के द्वारा स्वयं में उतरने का अभ्यास आमूल चूल रूप से पूरा जीवन और जीवन के बाद के जीवन को बदल कर रख देता है।

+5 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 5 शेयर