गुरु नानक जयंती 2020 कार्तिक पूर्णिमा के दिन #गुरुनानक जी का जन्मदिन मनाया जाता है| 15 अप्रैल 1469 को पंजाब के तलवंडी जो कि अब पाकिस्तान में हैं और जिसे ननकाना साहिब के नाम से भी जाना जाता है, में गुरु नानक ने माता तृप्ता व कृषक पिता कल्याणचंद के घर जन्म लिया| गुरू नानक जी की जयंती गुरुपूरब या गुरु पर्व सिख समुदाय में मनाया जाने वाला सबसे सम्मानित और महत्त्वपूर्ण दिन है| गुरू नानक जयंती के अवसर पर गुरु नानक जी के जन्म को स्मरण करते हैं| नानक सिखों के प्रथम (आदि गुरु) हैं| इनके अनुयायी इन्हें नानक, नानक देव जी, बाबा #नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं | लद्दाख व तिब्बत में इन्हें नानक लामा भी कहा जाता है| नानक दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - अनेक गुण अपने आप में समेटे हुए थे| "अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बन्दे एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे" सभी इंसान उस ईश्वर के नूर से ही जन्मे हैं, इसलिये कोई बड़ा छोटा नहीं है कोई आम या खास नहीं है | सब बराबर हैं| छुटपन में ही गुरूजी में प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे| लड़कपन में ही ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहने लगे| इनका पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था| महज 7-8 साल की उम्र में स्कूल छूट गया, क्योंकि भगवत प्राप्ति के संबंध में इनके प्रश्नों के आगे अध्यापक हार मान गए तथा वे इन्हें ससम्मान घर छोड़ आये| जिसके बाद अधिक समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे| बचपन में कई चमत्कारिक घटनाएं घटी जिन्हें देखकर गाँव वाले इन्हें दिव्य आत्मा मानने लगे| नानकजी में सर्व प्रथम श्रद्धा रखने वाले उनके गांव के शासक राय बुलार और उनकी बहन नानकी थीं| गुरु नानक देव जी ने भक्ति के अमृत भक्ति रस के बारे में बात की| गुरुजी भक्ति योग में पूरी तरह से विसर्जित एक भक्त थे| गुरु नानक देव जी ने कहा, “सांसारिक मामलों में इतने भी मत उलझों कि आप ईश्वर के नाम को भूल जाओ| उन्होंने सनातन मत की मूर्तिपूजा के विपरीत परमात्मा की उपासना का एक अलग मार्ग प्रसस्त किया| नानकजी ने हिंदू धर्म मे फैली कुरीतियों का सदैव विरोध किया| उनके दर्शन सूफियों जैसे थे| साथ ही उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक स्थितियों पर भी नज़र डाली| संत साहित्य में नानक उन संतों की श्रेणी में हैं जिन्होंने नारी को बड़प्पन दिया है| गुरूजी के उपदेश का सार यही है कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू तथा मुसलमान दोनों के लिये है| गुरुजी की दस शिक्षाएं - 1 - परम पिता परमेश्वर एक हैं| 2 - सदैव एक ही ईश्वर की आराधना करो| 3 - ईश्वर सब जगह और हर प्राणी में विद्यमान हैं| 4 - ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भी भय नहीं रहता| 5 - ईमानदारी और मेहनत से पेट भरना चाहिए| 6 - बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न ही किसी को सताएं| 7 – हमेशा खुश रहना चाहिए, ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा याचना करें| 8 - मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से जरूरत मंद की सहायता करें| 9 - सभी को समान नज़रिए से देखें, स्त्री-पुरुष समान हैं| 10 - भोजन शरीर को जीवित रखने के लिए आवश्यक है| परंतु लोभ-लालच के लिए संग्रह करने की आदत बुरी है| गुरु नानक जयंती पर्व तिथि व मुहूर्त 2020 30 नवंबर 2020 जयंती तिथि - सोमवार, 30 नवंबर 2020 पूर्णिमा तिथि प्रारंभ - 12:47 बजे (29 नवंबर 2020) से पूर्णिमा तिथि समाप्त - 14:58 बजे (30 नवंबर 2020) तक

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श्री रामचरित मानस के ऐसे सिद्ध मन्त्र जो शाबर और अन्य दूसरे मंत्रों से करोडो गुना ज्यादा शक्तिशाली है :: मानस के दोहे चौपाईयों को सिद्ध करने का विधान यह है कि किसी भी शुभ दिन की रात्रि को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा मन्त्र सिद्ध करना चाहिये। फिर जिस कार्य के लिये मन्त्र जप की आवश्यकता हो उसके लिये नित्य जप करना चाहिये। वाराणसी में भगवान् शंकरजी ने मानस की चौपाइयों को मन्त्र शक्ति प्रदान की है-इसलिये वाराणसी की ओर मुख करके शंकरजी को साक्षी बनाकर श्रद्धा से जप करना चाहिये। अष्टांग हवन सामग्री 1 चन्दन का बुरादा 2 तिल 3 शुद्ध घी4 चीनी 5 अगर 6 तगर, 7 कपूर 8 शुद्ध केसर 9 नागरमोथा 10 पञ्चमेवा,11 जौ और 12 चावल। जानने की बातें जिस उद्देश्य के लिये जो चौपाई, दोहा या सोरठा जप करना बताया गया है उसको सिद्ध करने के लिये एक दिन हवन की सामग्री से उसके द्वारा (चौपाई, दोहा या सोरठा) 108 बार हवन करना चाहिये। यह हवन केवल एक दिन करना है। मामूली शुद्ध मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर अग्नि रखकर उसमें आहुति दे देनी चाहिये। प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अन्त में ‘स्वाहा’ बोल देना चाहिये। प्रत्येक आहुति लगभग पौन तोले की (सब चीजें मिलाकर) होनी चाहिये। इस हिसाब से 108 आहुति के लिये एक सेर (80 तोला) सामग्री बना लेनी चाहिये। कोई चीज कम ज्यादा हो तो कोई आपत्ति नहीं। पञ्चमेवा में पिश्ता, बादाम किशमिश (द्राक्षा) अखरोट और काजू ले सकते हैं। इनमें से कोई चीज न मिले तो उसके बदले नौजा या मिश्री मिला सकते हैं। केसर शुद्ध 4 आने भर ही डालने से काम चल जायेगा हवन करते समय माला रखने की आवश्यकता 108 की संख्या गिनने के लिये है। बैठने के लिये आसन ऊन का या कुश का होना चाहिये। सूती कपड़े का हो तो वह धोया हुआ पवित्र होना चाहिये। मन्त्र सिद्ध करने के लिये यदि लंकाकाण्ड की चौपाई या दोहा हो तो उसे शनिवार को हवन करके करना चाहिये। दूसरे काण्डों के चौपाई-दोहे किसी भी दिन हवन करके सिद्ध किये जा सकते हैं। सिद्ध की हुई रक्षा-रेखा की चौपाई एक बार बोलकर जहाँ बैठे हों वहाँ अपने आसन के चारों ओर चौकोर रेखा जल या कोयले से खींच लेनी चाहिये। फिर उस चौपाई को भी ऊपर लिखे अनुसार 108 आहुतियाँ देकर सिद्ध करना चाहिये। रक्षा-रेखा न भी खींची जाये तो भी आपत्ति नहीं है। दूसरे काम के लिये दूसरा मन्त्र सिद्ध करना हो तो उसके लिये अलग हवन करके करना होगा। एक दिन हवन करने से वह मन्त्र सिद्ध हो गया। इसके बाद जब तक कार्य सफल न हो तब तक उस मन्त्र (चौपाई, दोहा) आदि का प्रतिदिन कम-से-कम 108 बार प्रातःकाल या रात्रि को जब सुविधा हो जप करते रहना चाहिये। कोई दो-तीन कार्यों के लिये दो-तीन चौपाइयों का अनुष्ठान एक साथ करना चाहें तो कर सकते हैं। पर उन चौपाइयों को पहले अलग अलग हवन करके सिद्ध कर लेना चाहिये। 1 विपत्ति नाश के लिये राजिव नयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुखदायक। 2 संकट-नाश के लिये जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी। दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी। 3 कठिन क्लेश नाश के लिये हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू 4 विघ्न शांति के लिये सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही 5 खेद नाश के लिये जब तें राम ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए 6 चिन्ता की समाप्ति के लिये जय रघुवंश बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृशानू 7 विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिये दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा 8 मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिये हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे 9 विष नाश के लिये नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को। 10 अकाल मृत्यु निवारण के लिये नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट। लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट 11 सभी तरह की आपत्ति के विनाश के लिये भूत भगाने के लिये प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन। जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर 12 नजर झाड़ने के लिये स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी। 13 खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने के लिए गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। 14 जीविका प्राप्ति केलिये बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई। 15 दरिद्रता मिटाने के लिये अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।। 16 लक्ष्मी प्राप्ति के लिये जिमि सरिता सागर महुँ जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।। तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ। 17 पुत्र प्राप्ति के लिये प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान। सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान। 18 सम्पत्ति की प्राप्ति के लिये जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि। 19 ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिये साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ। 20 सर्वबसुख प्राप्ति के लिये सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।। 21 मनोरथ सिद्धि के लिये भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि। 22 कुशल क्षेम के लिये भुवन चारिदस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू। 23 मुकदमा जीतने के लिये पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना। 24 शत्रु के सामने जाने के लिये कर सारंग साजि कटि भाथा। अरिदल दलन चले रघुनाथा॥ 25 शत्रु को मित्र बनाने के लिये गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई। 26 शत्रुतानाश के लिये बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई 27 वार्तालाप में सफ़लता के लिये तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा 28 विवाह के लिये तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै 29 यात्रा सफ़ल होने के लिये प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा 30 परीक्षा शिक्षा की सफ़लता के लिये जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती 31 आकर्षण के लिये जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू 32 स्नान से पुण्य-लाभ के लिये सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग। लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग। 33 निन्दा की निवृत्ति के लिये राम कृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी। 34 विद्या प्राप्ति के लिये गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल विद्या सब आई 35 उत्सव होने के लिये सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु। 36 यज्ञोपवीत धारण करके उसे सुरक्षित रखने के लिये जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग। 37 प्रेम बढाने के लिये सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती 38 कातर की रक्षा के लिये मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहिं अवसर सहाय सोइ होऊ। 39 भगवत्स्मरण करते हुए आराम से मरने के लिये रामचरन दृढ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग । सुमन माल जिमि कंठ तें गिरत न जानइ नाग 40 विचार शुद्ध करने के लिय ताके जुग पद कमल मनाउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ। 41 संशय-निवृत्ति के लिये राम कथा सुंदर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी। 42 ईश्वर से अपराध क्षमा कराने के लिये अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता।। 43 विरक्ति के लिये भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं। सीय राम पद प्रेमु अवसि होइ भव रस बिरति।। 44 ज्ञान-प्राप्ति के लिये छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।। 45 भक्ति की प्राप्ति के लिये भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम।। 46 श्रीहनुमान् जी को प्रसन्न करने के लिये सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।। 47 मोक्षप्राप्ति के लिये सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। काल सर्प जनु चले सपच्छा।। 48 श्री सीताराम के दर्शन के लिये नील सरोरुह नील मनि नील नीलधर श्याम । लाजहि तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥ 49 श्रीजानकीजी के दर्शन के लिये जनकसुता जगजननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की।। 50श्रीरामचन्द्रजी को वश में करने के लिये केहरि कटि पट पीतधर सुषमा सील निधान। देखि भानुकुल भूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।। 51 सहज स्वरुप दर्शन के लिये । भगत बछल प्रभु कृपा निधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।। ✍️ ज्योतिष दरबार

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काम बिगाड़ते नहीं बल्कि भाग्य चमकाते भी हैं वक्री ग्रह #वक्रीग्रह को लेकर आमतौर पर लोगों के मन में यह धारणा रहती है कि ग्रह वक्री हुआ मतलब जीवन में परेशानियां शुरू। कई अधकचरे ज्ञान वाले ज्योतिषी भी ऐसा ही मानते हैं, लेकिन हकीकत वैसी नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। कुछ ग्रहों का वक्री होना जीवन में न सिर्फ खुशियां लाता हैं बल्कि व्यक्ति को आर्थिक रूप से मजबूत करता है और उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है। पाश्चात्य देशों के ज्योतिषियों में भी वक्री ग्रह को लेकर कुछ इसी तरह की धारणाएं हैं। ग्रहों का वक्री होना क्या होता है? ग्रहों के वक्री होने से तात्पर्य उनका उल्टा चलने से लगाया जाता है लेकिन यह सही नहीं है। कोई भी ग्रह अपने परिभ्रमण पथ पर कभी उल्टा या पीछे की ओर नहीं चलता। हम सभी जानते हैं सूर्य के चारों ओर प्रत्येक ग्रह अपने ऑर्बिट या कक्षा में अंडाकार पथ पर घूमता रहता है। सभी ग्रहों की एक निश्चित गति भी होती है। वे उसी के अनुसार पथ पर चलते रहते हैं। यह प्राकृतिक नियम है कि कोई भी ग्रह जब सूर्य या पृथ्वी से तुलनात्मक निकट आ जाता है तो उसकी गति तेज हो जाती है और जब दूर रहता है तो उसकी गति धीमी हो जाती है। ग्रंथों के अनुसार जब कोई ग्रह अपनी तेज गति के कारण किसी अन्य ग्रह को पीछे छोड़ देता है तो उसे अतिचारी कहा जाता है। जब कोई ग्रह अपनी धीमी गति के कारण पीछे की ओर खिसकता प्रतीत होता है तो उसे वक्री कहते हैं। और जब वह ग्रह वापस आगे बढ़ता हुआ प्रतीत होने लगता है तो उसे मार्गी कहा जाता है। कभी-कभी कोई ग्रह कुछ समय के लिए स्थिर प्रतीत होता है तो उसे अस्त कहा जाता है। सूर्य और चंद्र कभी वक्री नहीं होते। भास्कराचार्य ने ग्रहों की आठ प्रकार की गतियां मानी हैं। सूर्यसिद्धांत के द्वितीय अध्याय में उन्होंने लिखा है- वक्रानुवक्रा कुटिला मंदा मंदतरा समा। तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गति।। तत्रातिशीघ्र शीघ््राारंय मंदा मंदतरा समा। ऋज्वीति पंचधाज्ञेया या वक्रा सानुवक्रगा।। अर्थात्- वक्र, अनुवक्र, कुटिल, मंद, मंदतरा, सम, शीघ्र, शीघ्रतर। इनमें प्रथम तीन वक्री कहे जाते हैं क्योंकि इनमें ग्रह उल्टा चलता दिखाई देता है जबकि अन्य में सीधा चलता दिखाई पड़ता है। अब समझते हैं कौन-सा वक्री ग्रह लाभ देगा और कौन नुकसान भारतीय ज्योतिष में वक्री ग्रह पर अनेक ग्रंथ रचे गए हैं, लेकिन विदेशों में भी वक्री ग्रहों पर कुछ कम शोध नहीं हुए। अनेक विदेशी विद्वानों ने वक्री ग्रहों पर शोध करने के बाद भारतीय विद्वानों के मत से सहमति जताई है। विदेशों में वक्री ग्रहों के साथ गोचर में चल रहे ग्रहों को जोड़कर सटीक भविष्य कथन किया जाता है। Retrograde Mars effect मंगल का वक्री होना व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, यौन सुख पर सबसे अधिक असर डालता है। चूंकि मंगल पुरुषत्व का प्रतिनिधि ग्रह है इसलिए यह व्यक्ति के ताकत, शक्ति, उत्साह, स्त्रियों के प्रति आकर्षण, झुकाव, संभोग की शक्ति एवं विवाह के प्रति रूझान के बारे में कथन देता है। जब मंगल वक्री होता है तब पुरुष सगाई, विवाह या अपने जीवनसाथी के प्रति गलत निर्णय ले बैठते हैं बाद में जीवनभर पछताते रहते हैं। यदि किसी स्त्री की कुंडली में मंगल वक्री है तथा गोचर में भी वह वक्री हो तो उस स्त्री की विवाह के प्रति, यौन संबंधों के प्रति इच्छाएं पूरी तरह खत्म हो जाती है। वह इन सब चीजों को बकवास मानने लगती है। यहां तक देखा गया है कि वक्री मंगल की स्थिति में महिलाएं विवाह की पूर्व रात्रि में ही भाग जाती हैं। वक्री मंगल के प्रभाव से व्यक्ति झूठे मुकदमों, पारिवारिक कलह में उलझ जाता है। Retrograde Mercury effect बुध का संबंध बौद्धिक क्षमता, विचार, निर्णय लेने की क्षमता, लेखन, व्यापार आदि से होता है। इसलिए बुध जब वक्री हो तो व्यक्ति को शांति से काम लेना चाहिए। इस दौरान अति उत्साह में आकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। क्योंकि वक्री बुध अक्सर गलत निर्णय करवा बैठता है। इसलिए जो काम जैसा चल रहा होता है, उसे चलने देना चाहिए। वक्री बुध के समय में कोई नया कार्य प्रारंभ न करें। अनुबंध या ठेकेदारी में नए कार्य हाथ में न लें, वरना घाटा उठाना पड़ता है। स्त्रियों के गोचर में वक्री बुध होने से वे परिवार, समाज, कार्यस्थल पर अपमान का सामना करती हैं। उनके सभी निर्णय गलत साबित होते हैं। इस कारण उनकी तरक्की भी बाधित हो जाती है। यदि कुंडली में बुध अत्यंत उच्च स्थिति में हो तो वक्री बुध लाभ भी देता है। इस ग्रह योग वालों को अचानक कहीं से धन प्राप्ति के योग बनते हैं। Retrograde Jupiter effect बृहस्पति का वक्री होना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे व्यक्ति का भाग्य चमकता है। बृहस्पति जिस भाव में वक्री होता है उस भाव के फलादेश में अनुकूल परिवर्तन आते हैं। इस दौरान व्यक्ति अपने परिवार, देश, संतान, जिम्मेदारियों और धर्म के प्रति अधिक संवेदनशील और चिंतित होकर शुभ कार्यों में प्रवृत्त हो जाता है। जब व्यक्ति कुंडली के द्वितीय भाव में आकर वक्री होता है तो अपार धन-संपदा प्रदान करता है। सिर से कर्ज का बोझ उतर जाता है। धन संचय होने लगता है। डूबा हुआ पैसा वापस मिल जाता है। नौकरीपेशा व्यक्तियों को प्रमोशन और वेतनवृद्धि मिलती है। नवम भाव में वक्री होने पर भाग्योदय होता है। द्वादश स्थान में वक्री होने पर व्यक्ति अपने जन्म स्थान की ओर बढ़ता है और संपत्ति प्राप्त करता है। स्त्रियों की कुंडली में वक्री बृहस्पति हो तो उन्हें विवाह सुख की प्राप्ति होती है। आर्थिक तरक्की होती है। Retrograde Venus effect शुक्र ग्रह का सीधा संबंध भोग-विलास, यौन सुख से होता है। शुक्र के वक्री होने पर स्त्रियों के मन में दबी भावनाएं बाहर आने लगती हैं। उनमें कामुकता बढ़ जाती है और उनमें यौन संबंध बनाने भावना तीव्र हो जाती है। उस समय वे अपने पति या प्रेमी से अधिक प्यार पाना चाहती हैं। और यदि उन्हें प्यार न मिले तो वे पुरुषों को त्यागने में जरा भी संकोच नहीं करती। पुरुषों की कुंडली में शुक्र वक्री हो और गोचर में वक्री हो तो उनमें भी यौन इच्छाएं तीव्र हो जाती हैं। इस दौरान यदि पुरुषों को पत्नी से सुख-संतोष प्राप्त न हो तो वे अन्य स्त्रियों के साथ संसर्ग करने लग जाते हैं। इस दौरान पुरुष शराब का सेवन भी अधिक करने लगते हैं। शुक्र जब वक्री के बाद मार्गी होता है तो पति-पत्नी के बीच के मतभेद तुरंत मिट जाते हैं। कोर्ट-कचहरी के मुकदमों का निपटारा हो जाता है और टूटे संबंध पुनः जुड़ जाते हैं। Retrograde Saturn effect शनि के वक्रत्व को लेकर भारतीय और विदेशी ज्योतिषियों में कुछ बातों पर मतभेद है। कुछ भारतीय ज्योतिषियों का मत है कि शनि का वक्री होना दुर्घटनाएं, धन हानि करवाता है। जबकि इससे उलट विदेशी विद्वान मानते है। कि शनि के वक्री होने पर व्यक्ति को परेशानियों से राहत मिलती है। वक्री शनि तनाव व संघर्षों में राहत देता है। ऐसे समय में व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति बढ़ जाती है और वह अपने अच्छे-बुरे कार्यों का स्वयं विश्लेषण करता है। साथ ही विद्वानों का यह भी मानना है कि शनि सिंह व धनु राशि में प्रतिकूल प्रभाव देता है।

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