J.JHA Aug 22, 2019

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J.JHA Aug 21, 2019

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J.JHA Aug 20, 2019

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J.JHA Aug 19, 2019

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J.JHA Aug 19, 2019

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J.JHA Aug 19, 2019

ॐ नमः शिवाय ॐ सिर्फ ध्यान, पूजा, मंत्रजप करना ही भक्ति नही है, मंदिर में जा कर अगरबत्ती प्रसाद लगाना भी भक्ति नही है । भक्ति तो सतत बहती निर्मल सरिता की तरह होती है,जो हर पल, हर क्षण, निरंतर अपनी मंज़िल की और अग्रसर रहती रहे । भक्ति तो प्रेम का सर्वश्रेष्ठ और उच्चतम स्वरूप है । जिस प्रकार छोटी सी सरल और निर्मल नदी अपने तीव्रतम बहाव पर आने के बाद, अपने साथ बड़े बड़े बृक्ष-पत्थर और मिट्टी को बहा ले जाती है, और अंत में जाकर अपने लक्ष्य सागर में समाहित हो जाती है । ठीक उसी प्रकार जब साधक का अपने इष्ट के प्रति प्रेम अपने तीव्रतम स्वरूप में आता है, तो हृदय के समस्त दोषों को विकृतियों को अवगुणों को बहा कर हृदय साफ कर देता है, और अंततः साधक को अपने इष्ट में ही समाहित कर देता है । इष्ट से मिलन भी तभी संभव है जब जन्मो-जन्मो तक प्रेम-भक्ति की सरिता हृदय में बहती रहे ।। पाप-पुण्य के फेर में जो पड़े तो वो कर्मानुसार स्वर्ग-नर्क मे फेरा लगाए । समर्पित-भक्ति हो जो इष्ट-चरण में तो वो जन्म-मरण से मुक्ति पाए ।।

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J.JHA Aug 18, 2019

ॐ नमः शिवाय ॐ जीवन-मृत्यु दोनो ही मानव के हाँथ में नही है । जन्म कब लेना है किस कुल-परिवार में लेना है, कितनी सांसे लिखी है ये सब विधाता जन्म लेने से पहले ही नियति में लिख देता है । उसके बाद मानव अपने कर्म द्वारा नए पाप-पुण्य अर्जित करता है,और पूर्व जन्मों के कर्मो का भोग करता है । जीवन अधिक है या कम, दुख मिलेगा या सुख ये हमारे हाँथ में नही । किन्तु जीवन कैसा जीना है ये ही हमारे हाँथ में है । सद्कर्मो द्वारा पूर्व संचित पाप कर्मों को कम किया जा सकता है, समाप्त नहीं । ये परम सत्य है जब तक श्रष्टि रहेगी आत्मा किसी ना रूप में कही ना कही उपस्थित रहेगी । आत्मा अमर है, अविनाशी है जो सदैव उपस्थित है । जाने वाले के लिए अश्रु उसकी मुक्ति में बाधा ही बनते है । इसलिए जाने वाले के निमित मुक्ति की प्रार्थना और वैदिक कर्म करके उसकी सदगती कराना चाहिए, ना कि उसको याद में अश्रु बहा कर उसकी मुक्ति में बाधा बना जाए । जीवात्मा के प्रति अत्यधिक मोह उसकी परम-यात्रा में बाधा ही बनता है । जीवन कम हो या ज्यादा ये महत्वपूर्ण नही होता है, 100 वर्ष के व्यर्थ जीवन से उत्तम है 40 वर्ष का सार्थक जीवन । जीवन जितना भी हो प्रेम और परोपकार से परिपूर्ण हो, देश-धर्म, गुरु-इष्ट की सेवा मे सदैव रहें।

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J.JHA Aug 18, 2019

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