|| खुशवंत सिंह के लिखे ज़िंदगी के दस सूत्र । ||📚🕉️ इन दसों सूत्रों को पढ़ने के बाद पता चला कि सचमुच खुशहाल ज़िंदगी और शानदार मौत के लिए ये सूत्र बहुत ज़रूरी हैं। 1. अच्छा स्वास्थ्य- अगर आप पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं, तो आप कभी खुश नहीं रह सकते। बीमारी छोटी हो या बड़ी, ये आपकी खुशियां छीन लेती हैं। 2. ठीक ठाक बैंक बैलेंस - अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए बहुत अमीर होना ज़रूरी नहीं। पर इतना पैसा बैंक में हो कि आप आप जब चाहे बाहर खाना खा पाएं, सिनेमा देख पाएं, समंदर और पहाड़ घूमने जा पाएं, तो आप खुश रह सकते हैं। उधारी में जीना आदमी को खुद की निगाहों में गिरा देता है। 3. अपना मकान - मकान चाहे छोटा हो या बड़ा, वो आपका अपना होना चाहिए। अगर उसमें छोटा सा बगीचा हो तो आपकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल हो सकती है। 4. समझदार जीवन साथी - जिनकी ज़िंदगी में समझदार जीवन साथी होते हैं, जो एक-दूसरे को ठीक से समझते हैं, उनकी ज़िंदगी बेहद खुशहाल होती है, वर्ना ज़िंदगी में सबकुछ धरा का धरा रह जाता है, सारी खुशियां काफूर हो जाती हैं। हर वक्त कुढ़ते रहने से बेहतर है अपना अलग रास्ता चुन लेना। 5. दूसरों की उपलब्धियों से न जलना - कोई आपसे आगे निकल जाए, किसी के पास आपसे ज़्यादा पैसा हो जाए, तो उससे जले नहीं। दूसरों से खुद की तुलना करने से आपकी खुशियां खत्म होने लगती हैं। 6. गप से बचना - लोगों को गपशप के ज़रिए अपने पर हावी मत होने दीजिए। जब तक आप उनसे छुटकारा पाएंगे, आप बहुत थक चुके होंगे और दूसरों की चुगली-निंदा से आपके दिमाग में कहीं न कहीं ज़हर भर चुका होगा। 7. अच्छी आदत - कोई न कोई ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसे करने में आपको मज़ा आता हो, मसलन गार्डेनिंग, पढ़ना, लिखना। फालतू बातों में समय बर्बाद करना ज़िंदगी के साथ किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। कुछ न कुछ ऐसा करना चाहिए, जिससे आपको खुशी मिले और उसे आप अपनी आदत में शुमार करके नियमित रूप से करें। 8.ध्यान- रोज सुबह कम से कम दस मिनट ध्यान करना चाहिए। ये दस मिनट आपको अपने ऊपर खर्च करने चाहिए। इसी तरह शाम को भी कुछ वक्त अपने साथ गुजारें। इस तरह आप खुद को जान पाएंगे। 9. क्रोध से बचना - कभी अपना गुस्सा ज़ाहिर न करें। जब कभी आपको लगे कि आपका दोस्त आपके साथ तल्ख हो रहा है, तो आप उस वक्त उससे दूर हो जाएं, बजाय इसके कि वहीं उसका हिसाब-किताब करने पर आमदा हो जाएं। 10. अंतिम समय - जब यमराज दस्तक दें, तो बिना किसी दुख, शोक या अफसोस के साथ उनके साथ निकल पड़ना चाहिए अंतिम यात्रा पर, खुशी-खुशी। शोक, मोह के बंधन से मुक्त हो कर जो यहां से निकलता है, उसी का जीवन सफल होता है। हमे नहीं पता कि खुशवंत सिंह ने पीएचडी की थी या नहीं। पर इन्हें पढ़ने के बाद मुझे लगने लगा है कि ज़िंदगी के डॉक्टर भी होते हैं। ऐसे डॉक्टर ज़िंदगी बेहतर बनाने का फॉर्मूला देते हैं । ये ज़िंदगी के डॉक्टर की ओर से ज़िंदगी जीने के लिए दिए गए नुस्खे है। || ॐ हं हनुमंते नमः ||📚🕉️

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एक बार कागज का एक टुकड़ा हवा के वेग से उड़ा और पर्वत के शिखर पर जा पहुँचा। पर्वत ने उसका आत्मीय स्वागत किया और कहा-भाई ! आप यहाँ कैसे पधारे ? कागज.ने कहा-अपने दम पर।जैसे ही कागज ने अकड़ कर कहा अपने दम पर और तभी हवा का एक दूसरा झोंका आया और कागज को उड़ा ले गया| अगले ही पल वह कागज नाली में गिरकर गल-सड़ गया। सार📚🕉️ जो दशा एक कागज की है वही दशा हमारी है।पुण्य की अनुकूल वायु का वेग आता है तो हमें शिखर पर पहुँचा देता है और पाप का झोंका आता है तो रसातल पर पहुँचा देता है। किसका मान ? किसका गुमान ? सन्त कहते हैं कि जीवन की सच्चाई को समझो।संसार के सारे संयोग हमारे अधीन नहीं हैं।कर्म के अधीन हैं और कर्म कब कैसी करवट बदल ले , कोई भरोसा नहीं।इसलिए कर्मों के अधीन परिस्थितियों का.कैसा गुमान ?

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|| पिता सच में कितना महान होता है | ||📚🕉️ रोज का खाना बनाने वाली माँ हमें याद रहती है, लेकिन जीवन भर के खाने की व्यवस्था करने वाला बाप हम भूल जाते हैं । माँ रोती है, बाप नहीं रो सकता, खुद का पिता मर जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि छोटे भाईयों को संभालना है, माँ की मृत्यु हो जाये भी वह नहीं रोता क्योंकि बहनों को सहारा देना होता है, पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड जाये फ़िर भी नहीं रो सकता, क्योंकि बच्चों को सांत्वना देनी होती है । देवकी-यशोदा की तारीफ़ करना चाहिये, लेकिन बाढ में सिर पर टोकरा उठाये वासुदेव को नहीं भूलना चाहिये... राम भले ही कौशल्या का पुत्र हो लेकिन उनके वियोग में तड़प कर जान देने वाले दशरथ ही थे । पिता की एडी़ घिसी हुई चप्पल देखकर उनका प्रेम समझ मे आता है, उनकी छेदों वाली बनियान देखकर हमें महसूस होता है कि हमारे हिस्से के भाग्य के छेद उन्होंने ले लिये हैं... लड़की को गाऊन ला देंगे, बेटे को ट्रैक सूट ला देंगे, लेकिन खुद पुरानी पैंट पहनते रहेंगे । बेटा कटिंग पर पचास रुपये खर्च कर डालता है और बेटी ब्यूटी पार्लर में, लेकिन दाढी़ की क्रीम खत्म होने पर एकाध बार नहाने के साबुन से ही दाढी बनाने वाला पिता बहुतों ने देखा होगा... बाप बीमार नहीं पडता, बीमार हो भी जाये तो तुरन्त अस्पताल नहीं जाते, डॉक्टर ने एकाध महीने का आराम बता दिया तो उसके माथे की सिलवटें गहरी हो जाती हैं, क्योंकि लड़की की शादी करनी है, बेटे की शिक्षा अभी अधूरी है... आय ना होने के बावजूद बेटे-बेटी को मेडिकल / इंजीनियरिंग में प्रवेश करवाता है.. कैसे भी "ऎड्जस्ट" करके बेटे को हर महीने पैसे भिजवाता है.. (वही बेटा पैसा आने पर दोस्तों को पार्टी देता है) । किसी भी परीक्षा के परिणाम आने पर माँ हमें प्रिय लगती है, क्योंकि वह तारीफ़ करती है, पुचकारती है, हमारा गुणगान करती है, लेकिन चुपचाप जाकर मिठाई का पैकेट लाने वाला पिता अक्सर बैकग्राऊँड में चला जाता है... पहली-पहली बार माँ बनने पर स्त्री की खूब मिजाजपुर्सी होती है, खातिरदारी की जाती है (स्वाभाविक भी है..आखिर उसने कष्ट उठाये हैं), लेकिन अस्पताल के बरामदे में बेचैनी से घूमने वाला, ब्लड ग्रुप की मैचिंग के लिये अस्वस्थ, दवाईयों के लिये भागदौड करने वाले बेचारे बाप को सभी नजरअंदाज कर देते हैं... ठोकर लगे या हल्का सा जलने पर "ओ..माँ" शब्द ही बाहर निकलता है, लेकिन बिलकुल पास से एक ट्रक गुजर जाये तो "बाप..रे" ही मुँह से निकलता है । जाहिर है कि छोटी मुसीबतों के लिये माँ और बडे़ संकटों के लिये बाप याद आता है...। शादी-ब्याह आदि मंगल प्रसंगों पर सभी जाते हैं लेकिन मय्यत में बाप को ही जाना पड़ता है.. जवान बेटा रात को देर से घर आता है तो बाप ही दरवाजा खोलता है, बेटे की नौकरी के लिये ऐरे-गैरों के आगे गिड़गिडा़ता, घिघियाता, बेटी के विवाह के लिये पत्रिका लिये दर-दर घूमता हुआ, घर की बात बाहर ना आने पाये इसके लिये मानसिक तनाव सहता हुआ.. बाप.. सच में कितना महान होता है !

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|| गुरु की खोज ||📚🕉️ हम सब्ज़ी खरीदने भी बाज़ार जाते हैं तो दस बार परखते हैं, की ख़राब तो नहीं। फल ख़रीदने जाते हैं,देखते हैं कच्चा तो नहीं है ?कपड़े खरीदते हैं तो बेचारे दुकानदार की नाक में दम कर देते हैं। फिर गुरु चुनते हुए क्यूं नहीं देखते? कच्चा तो नहीं? गुरु बनने के लायक़ है भी की नही ? गुरुओं के सामने टीवी में भीड़ देख के सम्मोहित क्यूं हो जाते हैं? पड़ोसन ने कह दिया अच्छा है जा के कान में मन्त्र फुंकवा लिया।किसी रिश्तेदार ने कह दिया फलाने गुरु ने काम बना दिया, मनोकामना पूरी कर दी तो चले उनके चरण पकड़ने। अपनी कोई वैल्यू करते हैं तो बिना सच परखे क्यूं किसी के आगे सिर झुकाते हैं ? पता है ऐसा हम क्यों करते हैं? क्योंकि कोई मांग है,कोई इच्छा है,गुरु कोई मन्त्र दे दे तो काम बन जायें,सिर पे हाथ रख दे तो जीवन सफ़ल हो जाये। ऐसा नहीं कि सच्चे गुरु नहीं,ऐसा नहीं कि पवित्र गुरु नहीं ।ज़रूर हैं। सबसे पहले ये सोचिये कि गुरु क्यों चाहिए? बिज़नेस बढ़ाने के लिए? घर में सुख शांति लाने के लिए?क्यूं चाहिए गुरु? क्यूं किसी पर आश्रित होना चाहते हैं? क्योंकि हम कमज़ोर हैं। कमज़ोरी क्या है? क्यूं कि कुछ ना कुछ मांगने की आदत है। मंदिर जाएंगे तो झोली फैली है,गुरु के पास जायेंगे तो झोली फैली है। ये आत्मसम्मान है? सोचिये ज़रा? गुरु का अर्थ है जिसने कुछ पाया हो, मगर मज़ा ये है कि सच्चा गुरु बांटने के लिए बड़े बड़े आश्रम नहीं खोलता,वो कुटिया में भी बैठता है तो वो महल हो जाती है। किसी सच्चे गुरु ने ये नहीं कहा मेरी तस्वीर सामने रख के मेरी पूजा करो,गुरु का काम है परमात्मा का रास्ता बताना,रास्ते का पत्थर बनना नहीं। मान लो आपका कोई गुरु नहीं,कोई आपसे पूछे? कैसे है जी?आप कहेंगे भगवान की कृपा है,गुरु किया तो कहेंगे गुरू जी की कृपा है,अरे पहले कम से कम भगवान का ज़िक्र तो करते थे,अब इंसान खड़ा कर लिया सामने।गुरू ने मिलवाया या दूर कर दिया भगवान् से? थोड़ी समझ की ज़रूरत है थोड़ा सोच विचार करिये। समझदार हैं? तो सोचिये।आपकी ज़िंदगी है और आप पैसा दे के ज़िन्दगी जीने की आर्ट दूसरों से सीखने जा रहे हैं।आपको कैसे जीना है ये पैसा दे के सीखेंगे? फिर आपको गुरु की नहीं मनोवैज्ञानिक की ज़रूरत है।तंन्त्र मन्त्र की प्लेट पैसे दे के खरीदने से मनोकामना तो पूरी नहीं होगी,उस पैसे से झूठ का एक और आश्रम खड़ा हो जायेगा।और आप भी उससे पाप के हिस्सेदार बनेंगे।पैसा भी दिया,पाप भी कमाया। गुरु पर इल्ज़ाम हैं,दुराचार,पाप, भ्रष्टाचार ,क़त्ल।गुरु ने कह दिया भक्तों ये तो आपकी,गुरु की परीक्षा है।फिर जेलों के बाहर बैठ धरना दो।हद है नासमझी की। ये है अंधापन।झूठ का गुरू आँखों को अँधा करेगा,सच्चा गुरु रौशनी से जीवन भर देगा। झूठा गुरु कहेगा।व्यापार में झूठ तो बोलना पड़ता है।बोलो हर्ज़ नहीं,टैक्स चोरी करनी पड़ती है,चलता है।काला धन सरकार को देंगे तो कैसे चलेगा,आपकी कमाई है।उसके पास ही एजेंट मिल जायेंगे।जो पैसा वाइट कर देंगे। झूठ का धन फलेगा?अशांति लायेगा, बीमारियां लायेगा,दुःख लायेगा। कृपया अपने पैरों पे खड़े होइए, बैसाखियाँ फेंक दीजिये। उसे साबित करने दीजिये कि वो आपका गुरु बनने के लायक़ है।झूठा गुरु भगा देगा,सच्चा आपके पैर पकड़ के जाने नहीं देगा। जिस भी रूप में आप परमात्मा को मानते हैं।उससे प्रार्थना कीजिये वो आपको बुराई से बचाये। जो बोया सो काट रहे हैं। कोई गुरु आपके कर्मों विकर्मो के बीच नहीं आ सकता।हालात ठीक नहीं तो सोच ठीक रखिये।अच्छे कर्म करिये। यक़ीन कीजिये,परमात्मा ख़ुद आकार आपके सामने खड़े हो जायेंगे। अपने माँ-बाप बहन-भाइयों,बच्चों से मिलने के लिए किसी बिचोलिये की ज़रूरत पड़ती है।जब इंसान मिल जाते हैं,तो परमात्मा भी तो पिता हैं वो क्यूं नहीं मिलेंगे। वो अपना परिचय ख़ुद देने आएंगे क्यूँ की आपसे प्यार है न।बस इंतज़ार कीजिये कब कोई किस रूप में आकर उनका परिचय दे दे ।

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|| सुदामा जी को जीवन में गरीबी क्यों मिली ? ||📚🕉️ अगर अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो सुदामा जी बहुत धनवान थे।जितना धन उनके पास था किसी के पास नहीं था । लेकिन अगर भौतिक दृष्टि से देखा जाये तो सुदामाजी बहुत निर्धन थे । आखिर क्यों ? एक ब्राह्मणी थी जो बहुत निर्धन थी। भिक्षा माँग कर जीवन-यापन करती थी। एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नहीं मिली। वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी।छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले । कुटिया पे पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी। ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे नही खाऊँगी प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी । यह सोंचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपडे़ में बाँधकर रख दियाऔर वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी । देखिये समय का खेल कहते हैं पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान ।📚🕉️ ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये। इधर उधर बहुत ढूँढा, चोरों को वह चनों की बँधी पुटकी मिल गयी । चोरों ने समझा इसमें सोने के सिक्के हैं । इतने मे ब्राह्मणी जाग गयी और शोर मचाने लगी । गाँव के सारे लोग चोरों को पकडने के लिए दौडे़। चोर वह पुटकी लेकर भागे। पकडे़ जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये। ( संदीपन मुनि का आश्रम गाँव के निकट था जहाँ भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे ) गुरुमाता को लगा कि कोई आश्रम के अन्दर आया है। गुरुमाता देखने के लिए आगे बढीं तो चोर समझ गये कोई आ रहा है, चोर डर गये और आश्रम से भागे ! भागते समय चोरों से वह पुटकी वहीं छूट गयी।और सारे चोर भाग गये। इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब जाना ! कि उसकी चने की पुटकी चोर उठा ले गये । तो ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया कि " मुझ दीनहीन असहाय के जो भी चने खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा " । उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू़ लगाने लगीं तो झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पुटकी मिली । गुरु माता ने पुटकी खोल के देखी तो उसमे चने थे। सुदामा जी और कृष्ण भगवान जंगल से लकडी़ लाने जा रहे थे। (रोज की तरह ) गुरु माता ने वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी। और कहा बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनो लोग यह चने खा लेना । सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे। ज्यों ही चने की पुटकी सुदामा जी ने हाथ में लिया त्यों ही उन्हे सारा रहस्य मालुम हो गया । सुदामा जी ने सोचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनों लोग बराबर बाँट के खाना। लेकिन ये चने अगर मैंने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी सृष्टी दरिद्र हो जायेगी। नहीं-नहीं मैं ऐसा नही करुँगा। मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा ।मैं ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नहीं खाने दूँगा। और सुदामा जी ने सारे चने खुद खा लिए। दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया। चने खाकर।लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया ऐसे होते हैं मित्र | मित्रों ! आपसे निवेदन है कि अगर मित्रता करें तो सुदामा जी जैसी करें और कभी भी अपने मित्रों को जीवन मे धोखा ना दें |

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|| हमारी सोच ( मानसिक स्तिथि ) ही हमारे निकट भविष्य की रूप रेखा तय करती है | ||📚🕉️ एक बार की बात है किसी गांव में एक गरीब किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था। उसके पास एक गाय और थोड़ी सी खेती के लिए जमीन थी। वह दिन भर अपने खेतो में काम करता था तब कहीं जाकर उसे खाने के लिए अनाज उपलब्ध हो पाता था। इस तरह से किसान किसी तरह अपना जीवन गुजारा करता था। किसान की स्थिति को लेकर उसकी पत्नी हमेशा अपने भाग्य और भगवान को कोसती रहती थी कि ना जाने किस जन्म का पाप इस जन्म में भरना पड़ रहा है जो कि गरीबी में जीवन जीना पड़ रहा है। पत्नी की बातों को सुनकर किसान मन ही मन खुद को और अपने भाग्य को कोसता रहता था की न जाने कब उसके भाग्य बदलेगें। एक दिन की बात है दोपहर का समय था। किसान खेतों से आकर अपने घर पर अपनी पत्नी के साथ खाना खाने जा रहा था कि इतने में एक साधु महाराज भिक्षा मांगते हुए उसके दरवाजे पर पहुंचे। साधु की आवाज सुनते ही किसान घर के बाहर आया और बोला “महाराज हम सभी पहले से इतने गरीब हैं कि किसी तरह अपना जीवन गुजार रहे हैं। ऐसे में हम आपको कहां से दान दें, हमारा साथ तो ऊपर वाला भी छोड़ चुका है”। गरीब किसान की बात सुनकर साधु महाराज उसके स्थिति को समझ चुके थे और बोले “क्या तुम सच में अपने को गरीब मानते हो! ईश्वर पर से तुम्हारा विश्वास उठ गया है? किसान ने साधू की बातों को सुनकर हामी भर दी और बोला “हां महाराज हमारे साथ ऐसा ही है अब आप ही चाहो तो आपके आशीर्वाद से शायद हमारी किस्मत बदल जाए”। किसान की यह बात सुनकर साधु महाराज ने कहा “ठीक है जैसा हम कहते हैं ठीक वैसे ही करते जाओ। गरीब किसान बोला क्या करना होगा हमें, जिससे हमारे अच्छे दिन आ जाएं और हमारी गरीबी दूर हो जाए। साधु महाराज बोले “ठीक है आज से वह काम करना पड़ेगा जिससे ईश्वर तुमसे प्रसन्न हो, सबसे पहले अपनी गाय को बेच दो और गाय के बदले मिले पैसों से अनाज खरीद कर ले आना”। साधु की यह बात सुनकर किसान भौंचक्का रह गया, उसके पास अपनी खेत की जमीन और एक यही गाय तो सहारा है इसे भी बेच देगा तो फिर करेगा क्या? साधु उसे समझाते हुए बोले अगर मेरे बताए हुए रास्ते पर चलने से तुम्हारा कुछ भी नुकसान होता है तो उसकी भरपाई मैं कर दूंगा। अब जो कहता हूं वैसा करते जाओ। किसान आधे अधूरे मन से डरते डरते अपनी गाय को बेच आया और मिले पैसों से खाने पीने का राशन ले आया। फिर साधू के कहने पर किसान और उसकी पत्नी ने मिलकर भोजन तैयार किया। इसके बाद वे रास्ते पर चलते हुए लोगो को बुलाने लगे और भगवान के प्रसाद के रूप में भोजन करने का आग्रह करने लगे। अब जो भी उधर से गुजरता गरीब किसान उन्हें भरपेट भोजन कराता जिससे राहगीर काफी खुश होते और फिर उन्हें इस नेक कार्य के लिए ढेर सारा आशीर्वाद और अपनी इच्छानुसार धन भी देते जिससे वे फिर से मिले इन पैसों से लोगों को भोजन कराए। इस तरह साधु महाराज के कहने पर यह रोज का सिलसिला चलने लगा हर दिन गरीब किसान अब मिले पैसों से भोजन का प्रबंध करते जिससे राह चलते लोग प्रतिदिन उसके यहां भोजन करते और दान के रूप में किसान को कुछ ना कुछ धन जरुर देते थे। गरीब किसान के दान की बात धीरे-धीरे दूर-दूर तक फैलने लगी थी। धीरे-धीरे बड़े-बड़े नगरों के सेठ, साहूकार, व्यापारी, राजदरबारी जो कोई भी उस गांव से गुजरता उस किसान के यहां ही भोजन करते। बदले में किसान को इस महान कार्य के लिए ढेर सारा धन भी देकर जाते थे। धीरे-धीरे गरीब किसान मिले पैसों से अमीर होने लगा और अब उसने एक गाय के बदले कई गाएं खरीद लीं और अपने भोजन कार्य को भी बढ़ाने लगा। अब किसान मन ही मन खुश होने लगा था। उसे अपने बदलते किस्मत पर भी भरोसा होने लगा था। उसे देखकर साधु महाराज किसान का हाल पूछते हुए बोले “अब बताओ तुम अब भी वही गरीब किसान हो! अब भी दिन रात मेहनत करते हो और ईश्वर के बताए गए पुण्य के मार्ग पर चलते हुए लोगों को भोजन कराते हो जिससे ईश्वर भी तुमसे प्रसन्न हैं। पहले जहां खुद के लिए मेहनत करते थे और खुद के लिए ही सोचते थे लेकिन अब दूसरों की भलाई के बारे में सोचने लगे हो। इस वजह से अब ईश्वर भी तुम्हारे इस नेक कार्य में साथ देते हैं। सार📚🕉️ हम सभी ईश्वर को कोसते तो जरुर हैं लेकिन ईश्वर के बताए मार्ग पर चलते नहीं हैं। ईश्वर से पाने की इच्छा तो हर कोई रखता है लेकिन पहले उनका आशीर्वाद पाने के लिए खुद को वैसा बनाना पड़ता है। यानी हम जैसा करते हैं हमारे कर्मों के अनुसार ही हमारे भाग्य का निर्धारण होता है”। साधु की यह बात को सुनकर किसान को अब समझ में आ गया था कि अगर सच में जीवन में अमीर बनना है तो सबसे पहले हमें अपनी सोच बदलनी होगी। अपने लिए तो हर कोई जीता है यदि हम दूसरों के लिए जीना शुरू करते हैं तो ईश्वर भी हमारी सहायता जरुर करते है |

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|| ज़िस्म ||📚🕉️ यह जिस्म तो किराये का घर है एक दिन खाली करना पड़ेगा || सांसे हो जाएँगी जब हमारी पूरी यहाँ रूह को तन से अलविदा कहना पड़ेगा || वक्त नही है तो बच जायेगा गोली से भी समय आने पर ठोकर से मरना पड़ेगा || मौत कोई रिश्वत लेती नही कभी सारी दौलत को छोंड़ के जाना पड़ेगा || ना डर यूँ धूल के जरा से एहसास से तू एक दिन सबको मिट्टी में मिलना पड़ेगा || सब याद करे दुनिया से जाने के बाद दूसरों के लिए भी थोडा जीना पड़ेगा || मत कर गुरुर किसी भी बात का ए दोस्त तेरा क्या है क्या साथ लेके जाना पड़ेगा|| इन हाथो से करोड़ो कमा ले भले तू यहाँ खाली हाथ आया खाली हाथ जाना पड़ेगा || ना भर यूँ जेबें अपनी बेईमानी की दौलत से कफ़न को बगैर जेब के ही ओढ़ना पड़ेगा || यह ना सोच तेरे बगैर कुछ नहीं होगा यहाँ रोज़ यहाँ किसी को "आना"तो किसी को "जाना" पड़ेगा...|| शुभस्त शुभकामनाएं ||📚🕉️

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