Jitendre Sep 26, 2020

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🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻 *पुरुषोत्तम मास माहात्म्य* *अध्याय - 12* *नारदजी बोले:-* 'जब भगवान् शंकर चले गये तब हे प्रभो! उस बाला ने शोककर क्या किया! सो मुझ विनीत को धर्मसिद्धि के लिए कहिये। श्रीनारायण बोले, 'इसी प्रकार राजा युधिष्ठिर ने भगवान् कृष्ण से पूछा था सो भगवान् ने राजा के प्रति जो कहा सो हम तुमसे कहते हैं सुनो। श्रीकृष्ण बोले, 'हे राजन! इस प्रकार जब शिवजी चले गये तब वह बाला प्रभावित हो गयी और लम्बे श्वास लेती हुई, बड़ी डरी और वह कृशोदरी अश्रुपातपूर्वक रोने लगी। हृदयाग्नि से उठी हुई ज्वाला से जलते हुए अंगवाली वह तपस्विनी कन्या वनाग्नि से जले हुए पत्ते वाली लता की तरह हो गयी। दुःख और ईर्ष्या को प्राप्त उस कन्या का बहुत समय व्यतीत हो गया। जिस प्रकार चूहे के बिल में घुसकर आक्रमण करके सर्प उसे वश में कर लेता है उसी प्रकार उपर्युक्त शोचनीय अवस्था को प्राप्त उस तपस्विनी बाला पर उस प्रभु काल ने आक्रमण कर उसे वश में कर लिया। वर्षा ऋतु में मेघ से घिरे हुए आकाश में बिजली चमक कर जैसे नष्ट हो जाती है उसी प्रकार तपस्या से जले हुए पापवाली वह कन्या अपने आश्रम में मर गयी। उसी समय धर्मिष्ठ यज्ञसेन नामक राजा ने बड़ी सामग्रियों से युक्त उत्तम यज्ञ किया। उस यज्ञकुण्ड से सुवर्ण के समान कान्ति वाली एक लड़की उत्पन्न हुई । वही कुमारी द्रुपदराज की कन्या के नाम से संसार में विख्यात हुई। पहले जो मेधावी ऋषि की कन्या थी वही सब लोकों में द्रौपदी नाम से प्रसिद्ध हुई । उसी को स्वयंवर में मछली को वेधकर भीष्म कर्ण आदि बहुत से राजाओं को तृण के समान कर क्षुभित रजमण्डदल में अर्जुन ने पांचाली को पाया। हे मुने! वही द्रौपदी दुष्ट दुःशासन द्वारा बाल पकड़ कर खींची गयी और उसे हृदय विदीर्ण करने वाले वचन सुनाये गये। पुरुषोत्तम की अवहेलना करने के कारण मैंने भी उसकी उपेक्षा की। जब वह मेरे में स्नेह करके मेरा नाम बराबर लेने लगी। हे दामोदर! हे दयासिन्धो! हे कृष्ण! हे जगत्पते! हे नाथ रमानाथ! हे केशव! हे क्लेशनाशन! मेरे माता, पिता, भ्रातृवर्ग, सहेलियें, बहिन, भाञ्जे, बन्धु, इष्ट, पति आदि कोई भी नहीं है। हे हृषीकेश! मेरे तो आप ही सब कुछ हैं। हे गोविन्द! हे गोपिकानाथ! दीनबन्धो! दयानिधे! दुःशासन से आक्रमण की गई मुझे क्या आप नहीं जानते। यद्यपि पहली पुकार में मैंने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया था, पर जब दुःशासन से पराभूत होकर उसने मेरा पुनः स्मरण किया, तब गरुड़ पर चढ़ शीघ्र वहाँ पहुँच कर मैंने हे राजन्‌! उसे बहुत से वस्त्रों से परिपूर्ण कर दिया। सदा मेरे में स्नेह करने वाली, मैं ही हूँ प्राण जिसके ऐसी, सदा मेरे भजन में परायण, मेरी अत्यन्त प्रिया, सती, सखी, मुझको प्राणों के समान होने पर भी पुरुषोत्तम की अवहेलना करने के कारण उसकी उपेक्षा करनी पड़ी। पुरुषोत्तम का तिरस्कार करने वाले का मैं पतन कर देता हूँ। यह पुरुषोत्तम मुनियों और देवताओं से भी सेव्य है, फिर समस्त कामनाओं को देने वाला यह पुरुषोत्तम मनुष्यों द्वारा तो सेवनीय है ही। अतः आगामी पुरुषोत्तम की आराधना करो। चौदह वर्ष के सम्पूर्ण होने पर तुम्हारा कल्याण होगा। हे पाण्डुनन्दन! जिन पुरुषों ने द्रौपदी के बालों को खींचते हुए देखा है, हे महाराज! उनकी स्त्रियों की अलकों को मैं क्रोध से काटूँगा। दुर्योधन आदि राजाओं को यमराज के भवन को पहुँचाऊँगा, बाद तुम समस्त शत्रुओं का नाश कर राजा होंगे। न मेरे को लक्ष्मी प्रिय, न मेरे को बलभद्र जी प्रिय और न वैसे मेरे को देवी देवकी, न प्रद्युम्न, न सात्यकि प्रिय हैं, जैसे मेरे को भक्त प्रिय हैं वैसा कोई प्रिय नहीं है। जिसने मेरे भक्तों को पीड़ित किया उससे मैं सदा पीड़ित रहता हूँ। हे पाण्डव! उसके समान मेरा अन्य कोई शत्रु नहीं है, उसके अपराध का फल देने वाला यमराज है क्योंकि वह दुष्ट दण्ड देने के लिए भी मेरे से देखने के योग्य नहीं है। श्रीनारायण बोले, 'श्रीकृष्ण ने उन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरादिकों को और द्रौपदी को समझा कर द्वारका जाने की इच्छा से कहा, हे राजन्‌! वियोग से व्याकुल द्वारका पुरी को आज जाऊँगा जहाँ पर महाभाग वसुदेव जी, हमारे बड़े भाई बलदेवजी, हमारी माता देवी देवकी तथा गद, साम्ब आदि और आहुक आदि यादव, रुक्मिणी आदि जो स्त्रियाँ हैं, दर्शन की उत्कण्ठा वाले वे सब हमारे आगमन की कामना से टकटकी लगाकर हमारा ही चिन्तन करते होंगे। श्रीनारायण बोले, 'इस प्रकार कहते हुए देवेश श्रीकृष्ण के गमन को जानकर पाण्डु-पुत्र किस प्रकार गद्‌गद कण्ठ से बोले, जिस प्रकार जल में रहने वालों का जीवन जल है उसी तरह हम लोगों के जीवन तो आप ही हैं। हे जनार्दन! थोड़े ही दिनों के बाद फिर दर्शन हों, पाण्डवों के नाथ हरि हैं और तीनों लोको में दूसरा कोई नहीं है, इस प्रकार सामने ही सब लोग कहते हैं अतः हम लोगों की हमेशा रक्षा करें। हे जगदीश्वर! हम लोग आप के हैं, भूलियेगा नहीं। हम लोगों के चित्तरूपी भ्रमरों का जीवन आपका चरण कमल ही है। आप ही हमारे आधार हैं, इसलिए बारम्बार हम सब प्रार्थना करते हैं। इन पाण्डुपुत्रों के निरन्तर इस तरह कहते रहने पर श्रीकृष्णचन्द्र प्रेमानन्द में मग्न होकर धीरे-धीरे रथ पर सवार होकर पीछे चलने वाले पाण्डुपुत्रों को लौटाकर द्वारका पुरी को गये। श्रीनारायण बोले, 'इसके बाद श्रीद्वारकानाथ श्रीकृष्णचन्द्र के द्वारका पुरी जाने पर, राजा युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयों के साथ तप करते हुए तीर्थों मे भ्रमण को गये। हे ब्रह्मन्‌! नारद! भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तम मास में मन लगाकर और श्रीकृष्णचन्द्र के वचनों का स्मरण करते हुए, अपने छोटे भाइयों से तथा द्रौपदी से राजा युधिष्ठिर बोले, 'अहो! पुरुषोत्तम मास में होने वाले अत्यन्त उग्र पुरुषोत्तम का माहात्म्य सुना है, पुरुषोत्तम भगवान्‌ के पूजन किये बिना सुख किस तरह मिलेगा? इस भारतवर्ष में वह धन्य है, वह पूज्य है, वही श्रेष्ठ है, जो अनेक प्रकार के नियमों से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पूजनार्चन किया करता है। इस तरह समस्त तीर्थों में भ्रमण करते हुए पाण्डुपुत्र पुरुषोत्तम मास के आने पर विधिपूर्वक व्रत करने लगे। हे मुने! नारद! व्रत के अन्त में चौदह वर्ष के पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण भगवान्‌ की कृपा से अतुल निष्कण्टक राज्य को प्राप्त किये। पूर्वकाल में सूर्यवंश में होने वाला दृढ़धन्वा नाम का राजा पुरुषोत्तम मास के सेवन से बड़ी लक्ष्मी पुत्र पौत्र का सुख और अनेक प्रकार के भोगों को भोगकर, योगियों को भी दुर्लभ जो भगवान्‌ का वैकुण्ठ लोक है वहाँ गया। हे मुनिश्रेष्ठ! नारद! इस पुरुषोत्तम मास के अतुल माहात्य को करोड़ों कल्प समय मिलने पर भी मैं कहने को समर्थ नहीं हूँ। सूतजी बोले, 'हे विप्र लोग! पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य कृष्णद्वैपायन (व्यास जी) से मैंने सुना है तथापि कहने को मैं समर्थ नहीं हूँ। इस पुरुषोत्तम मास के अखिल माहात्म्य को स्वयं नारायण जानते हैं या साक्षात्‌ वैकुण्ठवासी हरि भगवान्‌ जानते हैं। परन्तु ब्रह्मादि देवताओं से नमस्कार किये जाने वाले हैं चरणपीठ जिनके, ऐसे गोलोकनाथ श्रीकृष्णचन्द्र भी अपनाये हुए पुरुषोत्तम मास का सम्पूर्ण माहात्म्य नहीं जानते हैं तो मनुष्य कहाँ से जान सकता है? इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥ *🚩जय श्रीराधे कृष्णा🚩* 🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻

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Jitendre Sep 26, 2020

🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻 *पुरुषोत्तम मास माहात्म्य* *अध्याय - 11* *नारदजी बोले:-* 'सब मुनियों को भी जो दुष्कर कर्म है ऐसा बड़ा भारी तप जो इस कुमारी ने किया वह हे महामुने! हमसे सुनाइये। श्रीनारायण बोले, 'अनन्तर ऋषि-कन्या ने भगवान्‌ शिव, शान्त, पंचमुख, सनातन महादेव को चिन्तन करके परम दारुण तप आरम्भ किया। सर्पों का आभूषण पहिने, देव, नन्दी-भृंगी आदि गणों से सेवित, चौबीस तत्त्वों और तीनों गुणों से युक्त, अष्ट महासिद्धियों तथा प्रकृति और पुरुष से युक्त, अर्धचन्द्र से सुशोभित मस्तकवाले, जटा-जूट से विराजित भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ उस बाला ने परम तप आरम्भ किया। ग्रीष्म ऋतु के सूर्य होने पर पंचाग्नि के बीच में बैठकर, हेमन्त और शिशिर ऋतुओं में ठण्डे जल में बैठकर, खुले हुए मुखवाली जल में खिले हुए कमल की तरह शोभित होने लगी। सिर के नीचे फैली हुई काली और नीली अलकों से ढँकी हुई वह जल में ऐसी मालूम होने लगी जैसे कीचड़ की लता सेवारों के समूह से घिरी हुई हो। शीत के कारण नासिका से निकलती हुई शोभित धूम्‌राशि इस तरह दिखाई देने लगी जैसे कमल से मकरन्द पार करके भ्रमरपंक्ति जा रही हो। वर्षाकाल में आसन से युक्त चौतरे पर बिना छाया के सोती थी और वह सुन्दर अंगवाली प्रातः-सायं धूमपान करके रहती थी। उस कन्या के इस प्रकार के कठिन तप को सुन कर इन्द्र बहुत चिन्तित हो गये। सब देवताओं से दुधुर्षा और ऋषियों से स्पृहणीया। उस ऋषि-कन्या के तप में लगे रहने पर हे नृपनन्दन! हे क्षत्रिय भूषण! नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गये। उस बाला के तप से भगवान्‌ शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अपना इन्द्रियातीत निज स्वरूप दिखलाया। भगवान्‌ शंकर को देखकर देह में जैसे प्राण आ जाय वैसे सहसा खड़ी हो गई और तप से दुर्बल होने पर भी वह बाला उस समय हृष्टपुष्ट हो गयी। बहुत वायु और घाम से क्लेश पाई हुई वह शंकर को बहुत अच्छी लगी और उस कन्या ने झुककर पार्वतीपति शंकरजी को प्रणाम किया। उन विश्वोवन्दित भगवान्‌ का मानसिक उपचारों से पूजन करके और भक्तियुक्त चित्त से जगत्‌ के नाथ की स्तुति करने लगी। कन्या बोली, 'हे पार्वतीप्रिय! हे प्राणनाथ! हे प्रभो! हे भर्ग! हे भूतेश! हे गौरीश! हे शम्भो! हे सोमसूर्याग्निनेत्र! हे तमः! हे मेरे आधार! मुण्डास्थिमालिन्‌! आपको प्रणाम है। अनेक तापों से व्याप्त है अंगों में पीड़ा जिसके ऐसा, तथा परम घोर संसाररूपी समुद्र में डूबा हुआ, दुष्ट सर्पों तथा काल के तीक्ष्ण दांतों से डँसा हुआ मनुष्य भी यदि आपकी शरण में आ जाए तो मुक्त हो जाता है। हे विभो! जिन आपने बाणासुर को अपनाया और मरी हुई अलर्क राजा की पत्नी को जिलाया ऐसे आप हे दयानाथ! भूतेश! चण्डीिश! भव्य! भवत्राण! मृत्युञ्जय! प्राणनाथ! हे दक्षप्रजापति के मख को ध्वंस करने वाले! हे समस्त शत्रुओं के नाशक! हे सदा भक्तों को संसार से छुड़ाने वाले! हे जन्म के हर्ता, हे प्रथम सृष्टि के कर्ता! हे प्राणनाथ! हे पाप के नाश करने वाले! आप को नमस्कार है। अपने सेवकों की रक्षा कीजिये। हे नृप! बड़ी भाग्यवती मेधावी की तपस्विनी कन्या इस प्रकार मन से और वाणी से शंकर की स्तुति करके चुप हो गयी। श्रीकृष्ण बोले, 'कन्या द्वारा की हुई स्तुति सुनकर और उसके किये हुए उग्रतप से प्रसन्न मुखकमल सदाशिव कन्या से बोले, 'हे तपस्विनि! तेरा कल्याण हो, तेरे मन में जो अभीष्ट हो वह वर तू माँग, हे महाभागे! मैं प्रसन्न हूँ, तू खेद मत कर।' ऐसा भगवान्‌ शंकर का वचन सुन वह कुमारी अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुई और हे राजन्‌! प्रसन्न हुए सदाशिव से बोली। कन्या बोली, 'हे दीनानाथ! हे दयासिन्धो! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो हे प्रभो! मेरी कामना पूर्ण करने में देर न करें। हे महादेव! मुझको पति दीजिये, पति दीजिये, पति दीजिये, मैं पति चाहती हूँ, पति दीजिये, मैंने हृदय में और कुछ नहीं सोचा है।' वह ऋषिकन्या इस प्रकार महादेव से कह कर चुप हो गयी तब यह सुन कर महादेव जी उससे बोले। शिव बोले, 'हे मुनिकन्यके! तूने जैसा अपने मुख से कहा है वैसा ही होगा क्योंकि तूने पाँच बार पति माँगा है, अतः हे सुन्दरी! तेरे पाँच पति होंगे और वे पाँचों वीर, सर्वधर्मवेत्ता, सज्जन, सत्यपराक्रमी, यज्ञ करनेवाले, अपने गुणों से प्रसिद्ध, सत्य प्रसिद्ध जितेन्द्रिय, तेरा मुख देखने वाले, सभी क्षत्रीय और गुणवान्‌ होंगे।' श्रीकृष्ण बोले, 'न तो अधिक प्रिय, न तो अधिक अप्रिय ऐसे महादेव के वचन को सुनकर, बोलने में चतुरा कन्या झुककर बोली। बाला बोली, 'हे गिरिजाकान्त! सदाशिव! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है, अतः पाँच पति का वर देकर, लोक में मेरी हँसी न कराइये। एक स्त्री पाँच पतिवाली न देखी गयी है और न सुनी गयी है। हाँ, एक पुरुष की पाँच स्त्रियाँ तो हो सकती हैं। हे शम्भो हे कृपानिधे! आपकी सेविका मैं पाँच पतियों वाली कैसे हो सकती हूँ आपको मेरे लिये ऐसा कहना उचित नहीं है। आपकी सेविका होने के कारण जो लज्जा मुझे हो रही है, वह आप अपने को ही समझिये।' कन्या का यह वचन सुनकर शंकरजी पुनः उससे बोले। शंकरजी बोले, 'हे भीरु! इस जन्म में तुझे पति सुख नहीं मिलेगा, दूसरे जन्म में जब तू तपोबल से बिना योनि के उत्पन्न होगी। तब पति सुख को भोग कर अनन्तर परमपद को प्राप्त होगी क्योंकि मेरी प्रिय मूर्ति दुर्वासा का तूने पहले अपमान किया है। हे सुभ्रु! वह दुर्वासा यदि क्रोध करें तो तीनों भुवनों को जला सकते हैं सो तूने अभिमान वश ब्रह्मतेज का मर्दन किया है। जिस अधिमास को भगवान्‌ कृष्ण ने अपना ऐश्वर्य दे दिया उस भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तममास का व्रत तूने नहीं किया। मैं ब्रह्मा आदि से लेकर सब देवता, नारद आदि से लेकर सब तपस्वी, जिसकी आज्ञा सदा मानते चले आये हैं, हे बाले! उसकी आज्ञा का कौन उलंघन करता है? लोकपूजित पुरुषोत्तम मास की दुर्वासा की आज्ञा से तूने पूजा नहीं की हे मूढ़े! द्विजात्मजे! इसी लिये तेरे पाँच पति होंगे। हे बाले! पुरुषोत्तम के अनादर करने से अब अन्यथा नहीं हो सकता है। जो उस पुरुषोत्तम की निन्दा करता है वह रौरव नरक का भागी होता है। पुरुषोत्तम का अपमान करने वाले को विपरीत ही फल होता है, यह बात कभी अन्यथा नहीं हो सकती है। पुरुषोत्तम के जो भक्त हैं वे पुत्र, पौत्र और धनवाले होते हैं, और वे इस लोक को तथा परलोक की सिद्धि को प्राप्त हुए हैं, प्राप्त होंगे और प्राप्त हो रहे हैं। और हम सब देवता लोग भी पुरुषोत्तम की सेवा करने वाले हैं। जिस पुरुषोत्तम मास में व्रतादिक से पुरुषोत्तम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं उस सेवा करने योग्य मास को हे सुमध्यमे! हम लोग कैसे न भजें? उचित और अनुचित विचार की चर्चा करने वाले अतएव अनुकरणीय जो मुनि हैं उन अति उत्कट श्रेष्ठ तपस्वी पुरुषों का वचन कैसे मिथ्या हो सकता है? कहो इस प्रकार कथन करते हुए भगवान्‌ नीलकण्ठ शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये और वह बाला यूथ से भ्रष्ट मृगी की तरह चकित सी हो गयी। सूतजी बोले, 'हे मुनीश! रेखासदृश चन्द्रमा से युक्त मस्तकवाले सदाशिव जब उत्तर दिशा के प्रति चले गये तब वृत्रासुर को मारकर जैसे इन्द्र को चिन्ता हुई थी उसी प्रकार मुनिराज की कन्या को चिन्ता बाधा करने लगी। इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये एकादशोऽध्यायः ॥११॥ *🚩जय श्रीराधे कृष्णा🚩* 🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹

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Jitendre Sep 26, 2020

🌻🌺🌻🌺🌻🌺🌻🌺🌻🌺🌻 *पुरुषोत्तम मास माहात्म्य* *अध्याय - 10* *नारद जी बोले:-* 'हे तपोनिधे! परम क्रोधीदुर्वासा मुनि ने विचार करके उस कन्या से क्या उपदेश दिया। सो आप मुझसे कहिये। सूतजी बोले, 'हे द्विजों! नारद का वचन सुनकर, समस्त प्राणियों का हितकर दुर्वासा का गुह्य वचन बदरीनारायण बोले। श्रीनारायण बोले, 'हे नारद! मेघावी ऋषि की कन्या के दुख को दूर करने के लिये दुर्वासा ऋषि ने जो कहा वह सुनो। दुर्वासा ऋषि बोले, 'हे सुन्दरि! गुप्त से भी गुप्त उपाय मैं तुझसे कहता हूँ। यह विषय किसी से भी कहने योग्य नहीं है, तथापि तेरे लिये तो मैंने ये विचार ही लिया है। मैं विस्तार पूर्वक न कहकर तुझसे संक्षेप में कहता हूँ। हे सुभगे! इस मास से तीसरा मास जो आवेगा वह पुरुषोत्तम मास है। इस मास में तीर्थ में स्नान कर मनुष्य भ्रूणहत्या से छूट जाता है। हे सुन्दरि! कार्तिक आदि बारह मासों में इस पुरुषोत्तम मास के बराबर कोई मास नहीं है। जितने मास तथा पक्ष और पर्व हैं वे सब पुरुषोत्तम मास की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। वेदोक्त साधन और जो परमपद प्राप्ति के साधन हैं वे भी इस मास की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं। बारह हजार वर्ष गंगा स्नान करने से जो फल मिलता है और सिंहस्थ गुरु में गोदावरी पर एक बार स्नान करने से जो फल मिलता है, हे सुन्दरि! वही फल पुरुषोत्तम मास में किसी भी तीर्थ पर एक बार स्नान करने मात्र से मिल जाता है। हे बाले! यह मास श्रीकृष्ण का अत्यन्त प्यारा है और नाम से ही यह भगवान् का स्मारक है। इस मास में पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा, पूजा करने से समस्त कामनायें सिद्ध होती हैं। अतः इस पुरुषोत्तम मास का तू शीघ्र व्रत कर। पुरुषोत्तम भगवान् की तरह प्रसन्नता पूर्वक मैंने भी इस मास की सेवा की है। एक समय क्रोध में मैंने अम्बरीष राजा को भस्म करने के लिये अर्थ कृत्या भेजी थी, सो हे बाले! तब हरि ने जलता हुआ सुदर्शन चक्र मुझको ही भस्म करने के लियै उसी समय मेरे पास भेजा। तब पुरुषोत्तम मास के प्रभाव से ही वह चक्र हट गया। हे सुन्दरि! वह चक्र त्रैलोक्य को भस्म करने का सामर्थ्य रखने वाला जब मेरे पास आकर खाली चला गया तब मुझे बड़ा विस्मय हुआ। इसलिये हे सुभगे! तू श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत कर।' इस प्रकार मुनि की कन्या को कहकर दुर्वासा ऋषि ने विराम लिया। श्रीकृष्णजी बोले, 'हे राजन! दुर्वासा का वचन सुन भावों की प्रबलता के कारण असूया से प्रेरित वह कन्या मूर्खतावश दुर्वासा से बोली। बाला बोली, 'हे ब्रह्मन्! हे मुने! आपने जो कहा वह मुझे रुचता नहीं है। माघादि मास कैसे कुछ भी फल देनेवाले नहीं हैं ? कार्तिक मास कम है ? ऐसा आप कैसे कहते हैं ? सो कहिये। वैशाख मास सेवित हुआ क्या इच्छित कामों को नहीं देता है ? सदाशिव आदि से लेकर सब देवता सेवा करने पर क्या फल नहीं देते हैं ? अथवा पृथ्वी पर प्रत्यक्ष देव सूर्य और जगत् की माता देवी क्या सब कामनाओं को देने वाली नहीं हैं ? श्रीगणेश क्या सेवा पाकर इच्छित वर नहीं देते हैं ? व्यतिपात आदि योगों को और शर्व आदि देवताओं को भी, सबको उलंघन करके पुरुषोत्तम मास की प्रशंसा करते क्या आपको लज्जा नहीं आती है ? यह मास त़ बड़ा मलिन और सब कामों में निन्दित है। हे मुने! इस रवि की संक्रांति से रहित मास को आप श्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं ? सब दुःखों को छुड़ाने वाले परम श्रीहरि को मैं जानती हूँ। हे देव! दिन-रात श्रीहरि का चिन्तन करती मैं जानकीपति राम और पार्वतीपति शंकर के सिवाय और किसी को नहीं देखती हूँ। हे विपेन्द्र! अन्य कोई भी देवता ऐसा नहीं है जो मेरे इस दुःख को दूर करे। अतः हे मुने! इन सब फलदाताओं को छोड़कर कैसे इस मलमास की स्तुति आप कर रहे हो ? इस प्रकार ब्राह्मण कन्या का कहा हुआ सुनकर दुर्वासा मुनि शरीर से एकदम जाज्वल्यमान हो गये और नेत्र क्रोध से लाल हो गये। इस प्रकार क्रोध आने पर भी कृपा करके मित्र की कन्या को श्राप नहीं दिया और सोचने लगे कि यह मूर्खा है हित-अहित को नहीं जानती है। अभी बुद्धि इसकी पूर्ण नहीं है। पुरुषोत्तम मास के माहात्म्य का विद्वानों को भी पता नहीं है तो थोड़ी बुद्धि वाले पुरूष और विशेष करके कुमारियों को तो हो ही कहाँ से सकता है। यह कुमारी कन्या माता-पिता से रहित दु:खाग्नि से जली हुई है अतः अति उग्र मेरे श्राप को कैसे सहन कर सकती है ? इस प्रकार सोचकर कृपा से मन में उठे क्रोध को शान्त किया और स्वस्थ होकर दुर्वासा मुनि, उस अति विह्वल कन्या से बोले। दुर्वासा बोले, 'हे मित्र पुत्रि! तेरे ऊपर मेरा कुछ भी क्रोध नहीं है, हे निर्भाग्ये! जो तेरे मन में आवे बैसा ही कर। हे बाले! और कुछ भविष्य कहता हूँ सुन। पुरुषोत्तम मास का जो तूने अनादर किया है उसका फल तुझे अवश्य मिलेगा। इस जन्म में मिले अथवा दूसरे जन्म में मिले। अब मैं नर-नारायण के आश्रम में जाऊँगा। तेरा पिता मेरा मित्र था इसलिये मैंने शाप नहीं दिया है, तू बाल भाव के कारण अपने शुभाशुभ तथा हिताहित को नहीं जानती है। शुभाशुभ भविष्य की कोई टाल नहीं सकता है। अच्छा हमारा बहुत समय व्यतीत हो गया, अब हम जाते हैं, तेरा कल्याण हो।' श्रीकृष्ण बोले, 'ऐसा कहकर महाक्रोधी दुर्वासा मुनि शीघ्र चले गये। दुर्वासा ऋषि के जाते ही पुरुषोत्तम की उपेक्षा करने के कारण कन्या निष्प्रभा हो गयी। तदनन्तर बहुत देर तक कन्या ने सोच विचार कर यह निश्चय किया कि देवताओं के भी देवता, तत्काल फल देने वाले, पार्वतीपति शिव की तप द्वारा आराधना करूँगी। हे नृप! मेधावी ऋषि की कन्या ने मन से इस प्रकार निश्चय करके अपने आश्रम में ही रहकर भगवान् शंकर के कठिन तप करने को तत्पर हो गयी। सूतजी बोले, 'बहुत फलों के दाता लक्ष्मीपति को और बैसे ही सावित्रीपति ब्रह्म को छोड़कर एवं दुर्वासा के प्रबल वचन की निन्दा कर वह ऋषि कन्या अपने आश्रम में ही अन्धक को मारने वाले शंकर की सेवा के लिये तत्पर हो गयी। इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये दशमोऽध्यायः॥१०॥ *🚩जय श्रीराधे कृष्णा🚩* 🌻🌺🌻🌺🌻🌺🌻🌺🌻🌺🌻

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Jitendre Sep 26, 2020

🌻🌺🌻🌺🌻🌻🌻🌺🌻🌺🌻 *पुरुषोत्तम मास माहात्म्य* *अध्याय - 09* सूतजी बोले, 'तदनन्तर विस्मय से युक्त नारद मुनि ने मेधावी ऋषि की कन्या का अद्‌भुत वृत्तान्त पूछा। नारदजी बोले, 'हे मुने! उस तपोवन में मेधावी की कन्या ने बाद में क्या किया? और किस मुनिश्रेष्ठ ने उसके साथ विवाह किया? श्रीनारायण बोले, 'अपने पिता को स्मरण करते-करते और बराबर शोक करते-करते उस घर में कुछ काल उस कन्या का व्यतीत हुआ। यूथ से भ्रष्ट हुई हरिणी की तरह घबड़ाई, शून्य घर में रहनेवाली, दुःखरूप अग्नि से उठी हुई भाफ द्वारा बहते हुए अश्रुनेत्र वाली, जलते हुए हृत् कमल वाली, दुःख से प्रतिक्षण गरम श्वास लेनेवाली, अतिदीना, घिरी हुई सर्पिणी की तरह अपने घर में संरुद्ध, अपने दुःख को सोचती और दुःख से मुक्त होने के उपाय को न देखती हुई उस कृशोदरी को उसके शुभ भविष्य की प्रेरणा से सान्त्वना देने के लिए उस वन में अपनी इच्छा से ही परक्रोधी, 'जिनको देखने से ही इन्द्र भयभीत होते हैं, 'ऐसे, जटा से व्याप्त, साक्षात्‌ शंकर के समान भगवान्‌ दुर्वासा ऋषि आये। हे नारद! भगवान्‌ कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से कहा कि हे राजेन्द्र! वह दुर्वासा आये जिसको कि आपकी माता कुन्ती ने बालापन में प्रसन्न किया था। तब उन सुपूजित महर्षि ने देवताओं को आकर्षण करने वाली विद्या उन्हें दी और हे भूपाल! जिन्होंने सब देवताओं से नमस्कार किए जाने वाले मुझको भी रुक्मिणी के साथ रथ में बैलों की जगह जोता। दुर्वासा को बैठाकर रथ खींचते हुए जब हम दोनों मार्ग चलने लगे तब चलते-चलते मार्ग में अति तीव्र प्यास से सूख गये थे तालु और ओष्ठ जिस रुक्मिणी के ऐसी जल चाहने वाली रुक्मिणी ने जब मुझे सूचित किया तब कन्धे पर रथ की जोत को रखे हुए चलते-चलते ही पाँव के अग्रभाग से पृथ्वी को दबा कर रुक्मिणी के प्रेम के वशीभूत मैंने भोगवती नाम की नदी को उत्पन्न किया। तब वही भोगवती ऊपर से बहने लगी। अनन्तर उसी के जल से, हे महाराज! रुक्मिणी की प्यास को मैंने बुझाया। इस प्रकार रुक्मिणी की प्यास का बुझना देख उसी क्षण अग्नि की तरह दुर्वासा क्रोध से जलने लगे और प्रलय की अग्नि के समान उठकर दुर्वासा ने शाप दिया। बोले, 'बड़ा आश्चर्य है, हे श्रीकृष्ण! रुक्मिणी तुमको सदा अत्यन्त प्रिय है, अतः स्त्री के प्रेम से युक्त तुमने मेरी अवज्ञा कर अपना महत्व दिखलाते हुए इस प्रकार से उसे पानी पिलाया। अतः तुम दोनों का वियोग होगा, इस प्रकार उन्होंने शाप दिया था। हे युधिष्ठिर! वही यह दुर्वासा मुनि हैं। साक्षात्‌ रुद्र के अंश से उत्पन्न, दूसरे कालरुद्र की तरह, महर्षि अत्रि के उग्र तपरूप कल्पवृक्ष के दिव्य फल। पतिव्रताओं के सिर के रत्न, अनुसूया भगवती के गर्भ से उत्पन्न, अत्यन्त मेधायुक्त दुर्वासा नाम के ऋषि। अनेक तीर्थों के जल से भींगी हुई जटा से भूषित सिर वाले, साक्षात्‌ तपोमूर्ति दुर्वासा ऋषि को आते देखकर कन्या ने शोकसागर से निकल कर धैर्य से मुनि के चरणों में प्रार्थना की। प्रार्थना करने के बाद जैसे बाल्मीकि ऋषि को जानकी अपने आश्रम में लाई थीं वैसे ही यह भी दुर्वासा को अपने घर में लाकर अर्ध्य, पाद्य और विविध प्रकार के जंगली फलों और पुष्पों से स्वागत के लिए आज्ञा लेकर आदरपूर्वक पूजन कर तदनन्तर हे राजन्‌! यह बाला बोली। कन्या बोली, 'हे महाभाग! हे अत्रि कुल के सूर्य! आपको प्रणाम है। हे साधो! मेरी अभाग्या के घर में आज आपका शुभागमन कैसे हुआ? हे मुने! आपके आगमन से आज मेरा भाग्योदय हुआ है अथवा मेरे पिता के पुण्य के प्रवाह से प्रेरित मुझे सान्त्वना देने के लिये ही आप मुनिसत्तम आये हैं। आप जैसे महात्माओं के पाँव की धूल जो है वह तीर्थरूप है उस धूल का स्पर्श करने वाली मैं अपना जन्म आज सफल कर सकी हूँ, आज मेरा व्रत भी सफल है। आप जैसे पुण्यात्मा के जो मुझे आज दर्शन हुए। अतः आज मेरा उत्पन्न होना और मेरा पुण्य सफल है।' ऐसा कहकर वह कन्या दुर्वासा के सामने चुपचाप खड़ी हो गयी। तब भगवान्‌ शंकर के अंश से उत्पन्न दुर्वासा मुनि मन्द हास्य युक्त बोले। दुर्वासा बोले, 'हे द्विजसुते! तू बड़ी अच्छी है तूने अपने पिता के कुल को तार दिया। यह मेधावी ऋषि के तप का फल है। जो उन्हें तेरी ऐसी कन्या उत्पन्न हुई। तेरी धर्म में तत्परता जान कैलास से मैं यहाँ आया और तेरे घर आकर तेरे द्वारा मेरा पूजन हुआ। हे वरारोहे! मैं शीघ्र ही बदरिकाश्रम में मुनीश्वर सनातन, नारायण, देव के दर्शन के लिये जाऊँगा जो प्राणियों के हित के लिए अत्यन्त उग्र तप कर रहे हैं।' कन्या बोली, 'हे ऋषे! आपके दर्शन से ही मेरा शोकसमुद्र सूख गया। अब इसके बाद मेरा भविष्य उज्ज्वल है; क्योंकि आपने मुझे सान्त्वना दी, हे मुने! मेरी उस प्रादुर्भूत बड़ी भारी ज्वाला युक्त दुःख रूप अग्नि को क्या आप नहीं जानते हैं? हे दयासिन्धो! हे शंकर! उस दुःखाग्नि को शान्त कीजिये। मेरे विचार से हर्ष का कारण मुझे कुछ भी दिखलाई नहीं देता। न मुझे माता है, न पिता, न तो भाई है, जो धैर्य प्रदान करता, अतः दुःख समुद्र से पीड़ित मैं कैसे जीवित रह सकती हूँ? जिस-जिस दिशा में मैं देखती हूँ वह-वह दिशा मुझे शून्य ही प्रतीत होती है, इसलिये हे तपोनिधे! मेरे दुःख का निस्तार आप शीघ्र करें। मेरे साथ विवाह करने के लिए कोई भी नहीं तैयार होता है। इस समय मेरा विवाह न हुआ तो मैं फिर वृषली शूद्रा हो जाऊँगी यह मुझे बड़ा भय है। इसी भय से न मुझे निद्रा आती है और न भोजन में मेरी रुचि होती है, हे ब्रह्मन्‌! अब मैं शीघ्र ही मरने वाली हूँ, यह मेरा इस समय निश्चय है।' ऐसा कहकर आँसू बहाती हुई कन्या दुर्वासा के सामने चुप हो गयी तब दुर्वासा कन्या का दुःख दूर करने का उपाय सोचने लगे। श्रीनारायण बोले, 'इस प्रकार मुनि कन्या के वचन सुनकर और इसका अभिप्राय समझ कर बड़े क्रोधी मुनिराज दुर्वासा ने उस कन्या का कुछ हित विचार पूर्ण कृपा से उसे देखकर सारभूत उपाय बतलाया। इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये नवमोऽध्यायः ॥९॥ *🚩जय श्रीराधे कृष्णा🚩* 🌻🌺🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌺

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