jasbir Singh nain Feb 17, 2019

श्री पार्वती चालीसा ॥ दोह॥ जय गिरी तनये दक्षजे शम्भू प्रिये गुणखानि। गणपति जननी पार्वती अम्बे ! शक्ति ! भवानि॥ ॥ चौपाई ॥ ब्रह्मा भेद न तुम्हरे पावे , पंच बदन नित तुमको ध्यावे । षड्मुख कहि न सकत यश तेरो , सहसबदन श्रम करत घनेरो ।। तेरो पार न पावत माता, स्थित रक्षा लय हित सजाता। अधर प्रवाल सदृश अरुणारे , अति कमनीय नयन कजरारे ।। ललित लालट विलेपित केशर कुंकुंम अक्षत शोभा मनोहर। कनक बसन कञ्चुकि सजाये, कटी मेखला दिव्य लहराए ।। कंठ मदार हार की शोभा , जाहि देखि सहजहि मन लोभ। बालारुण अनंत छवि धारी , आभूषण की शोभा प्यारी ।। नाना रत्न जड़ित सिंहासन , तापर राजित हरी चतुरानन। इन्द्रादिक परिवार पूजित , जग मृग नाग यक्ष रव कूजित ।। गिर कैलाश निवासिनी जय जय , कोटिकप्रभा विकासिनी जय जय । त्रिभुवन सकल , कुटुंब तिहारी , अणु -अणु महं तुम्हारी उजियारी।। हैं महेश प्राणेश ! तुम्हारे, त्रिभुवन के जो नित रखवारे । उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब, सुकृत पुरातन उदित भए तब।। बुढा बैल सवारी जिनकी, महिमा का गावे कोउ तिनकी। सदा श्मशान विहरी शंकर, आभूषण हैं भुजंग भयंकर।। कंठ हलाहल को छवि छायी , नीलकंठ की पदवी पायी । देव मगन के हित अस किन्हों , विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो।। ताकी , तुम पत्नी छवि धारिणी , दुरित विदारिणी मंगल कारिणी । देखि परम सौंदर्य तिहारो , त्रिभुवन चकित बनावन हारो।। भय भीता सो माता गंगा , लज्जा मय है सलिल तरंगा । सौत सामान शम्भू पहआयी , विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी ।। तेहिकों कमल बदन मुर्झायो , लखी सत्वर शिव शीश चढायो । नित्यानंद करी वरदायिनी , अभय भक्त कर नित अनपायिनी।। अखिल पाप त्रय्ताप निकन्दनी , माहेश्वरी ,हिमालय नन्दिनी। काशी पूरी सदा मन भायी, सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायीं।। भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री , कृपा प्रमोद सनेह विधात्री । रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे , वाचा सिद्ध करी अवलम्बे।। गौरी उमा शंकरी काली , अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली । सब जन की ईश्वरी भगवती , पतप्राणा परमेश्वरी सती।। तुमने कठिन तपस्या किणी , नारद सो जब शिक्षा लीनी। अन्न न नीर न वायु अहारा , अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा।। पत्र घास को खाद्या न भायउ , उमा नाम तब तुमने पायउ । तप बिलोकी ऋषि सात पधारे, लगे डिगावन डिगी न हारे।। तव तव जय जय जयउच्चारेउ , सप्तऋषि , निज गेह सिद्धारेउ । सुर विधि विष्णु पास तब आए , वर देने के वचन सुनाए।। मांगे उमा वर पति तुम तिनसो, चाहत जग त्रिभुवन निधि, जिनसों । एवमस्तु कही ते दोऊ गए , सुफल मनोरथ तुमने लए।। करि विवाह शिव सों हे भामा , पुनः कहाई हर की बामा। जो पढ़िहै जन यह चालीसा , धन जनसुख देइहै तेहि ईसा।। ॥ दोहा ॥ कूट चन्द्रिका सुभग शिर जयति सुख खानी पार्वती निज भक्त हित रहहु सदा वरदानी। ॥ इति श्री पार्वती चालीसा ॥ शुभ प्रभात जी हर महादेव जी

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jasbir Singh nain Feb 17, 2019

प्रदोष व्रत जानें प्रदोष व्रत करने का महत्व, पूजा विधि और व्रत कथा शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत करने से व्यक्ति के जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं. इस व्रत को करने से भगवान शिव की कृपा सदैव आप पर बनी रहती है. प्रदोष व्रत में भगवान शिव की उपासना की जाती है. यह व्रत हिंदू धर्म के सबसे शुभ व महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है. हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार प्रदोष व्रत चंद्र मास के 13 वें दिन (त्रयोदशी) पर रखा जाता है. माना जाता है कि प्रदोष के दिन भगवान शिव की पूजा करने से व्यक्ति के पाप धूल जाते हैं और उसे मोक्ष प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत की महिमा शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है. प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि ‘एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी. व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यों को अधिक करेगा. उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस परशिव कृ्पा होगी.इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है. व्रत कथा स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया। कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया। एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त अंशुमती नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह हेतु राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया। इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती। प्रदोष व्रत से मिलने वाले फल अलग- अलग वारों के अनुसार प्रदोष व्रत के लाभ प्राप्त होते है. – रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है. – सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है. – मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है. – बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की सभी कामनाओं की पूर्ति होती है. – गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है. – शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है. – संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए. अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है. प्रदोष व्रत की विधि – प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए. – नित्यकर्मों से निवृ्त होकर, भगवान श्री भोले नाथ का स्मरण करें. – इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है. – पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान आदि कर श्वेत वस्त्र धारण किए जाते है. – पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार किया जाता है. – अब इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनाई जाती है. – प्रदोष व्रत कि आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है. – इस प्रकार पूजन की तैयारियां करके उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए. – पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए. प्रदोष व्रत का उद्यापन इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए. – व्रत का उद्यापन त्रयोदशी तिथि पर ही करना चाहिए. – उद्यापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है. – प्रात: जल्दी उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों और रंगोली से सजाकर तैयार किया जाता है. – ‘ऊँ उमा सहित शिवाय नम:’ मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है. – हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग किया जाता है. – हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है. – अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है. शुभ प्रभात जी राधे जी

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jasbir Singh nain Feb 14, 2019

शुभ प्रभात जी राधे राधे जी 🌻🌻 *एक दिन नयी सोच* 🌻🌻 एक नदी के किनारे दो पेड़ थे..... उस रास्ते एक छोटी सी चिड़िया गुजरी और..... पहले पेड़ से पूछा.. बारिश होने वाला है, क्या मैं और मेरे बच्चे तुम्हारे टहनी में घोसला बनाकर रह सकते हैं.. लेकिन वो पेड़ ने मना कर दिया.... चिड़िया फिर दूसरे पेड़ के पास गई और वही सवाल पूछा दूसरा पेड़ मान गया, चिड़िया अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी दूसरे पेड़ में घोसला बना कर रहने लगी, एक दिन इतनी अधिक बारिश हुई कि इसी दौरान पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी मे बह गया. जब चिड़िया ने उस पेड़ को बहते हुए देखा तो कहा... जब तुमसे मैं और मेरे बच्चे शरण के लिये आई तब तुमने मना कर दिया था, *अब देखो तुम्हारे उसी* *रूखी बर्ताव की सजा* *तुम्हे मिल रही है* जिसका उत्तर पेड़ ने मुस्कुराते हुए दिया *मैं जानता था मेरी जड़ें कमजोर है* और इस बारिश में टिक नहीं पाऊंगा, मैं तुम्हारी और बच्चे की जान खतरे में नहीं डालना चाहता था, मना करने के लिए मुझे क्षमा कर दो, और ये कहते-कहते पेड़ बह गया.. *किसी के इंकार को हमेशा उनकी कठोरता न समझे* क्या पता उसके उसी इंकार से आप का भला हो, कौन किस परिस्थिति में है शायद हम नहीं समझ पाए, इसलिए किसी के चरित्र और शैली को उनके वर्तमान ब्यवहार से ना तौले

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