Neha Sharma Nov 25, 2021

*सुविचार...*सत्य, विनय, शास्त्रज्ञान, विद्या, कुलीनता, शील, बल, धन, शूरता और वाक्पटुता ये दस लक्षण स्वर्ग के कारण हैं।*जय श्री राधेकृष्णा*🙏 *शुभ रात्रि नमन*🙏 *एक औरत को आखिर क्या चाहिए होता है?..... *एक बार जरुर पढें ये छोटी सी कहानी.....✍️ *राजा हर्षवर्धन युद्ध में हार गए। *हथकड़ियों में जीते हुए पड़ोसी राजा के सम्मुख पेश किए गए। पड़ोसी देश का राजा अपनी जीत से प्रसन्न था और उसने हर्षवर्धन के सम्मुख एक प्रस्ताव रखा... *यदि तुम एक प्रश्न का जवाब हमें लाकर दे दोगे तो हम तुम्हारा राज्य लौटा देंगे, अन्यथा उम्र कैद के लिए तैयार रहें। *प्रश्न है.. एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? *इसके लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय है हर्षवर्धन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.. *वे जगह जगह जाकर विदुषियों, विद्वानों और तमाम घरेलू स्त्रियों से लेकर नृत्यांगनाओं, वेश्याओं, दासियों और रानियों, साध्वी सब से मिले और जानना चाहा कि एक स्त्री को सचमुच क्या चाहिए होता है ? किसी ने सोना, किसी ने चाँदी, किसी ने हीरे जवाहरात, किसी ने प्रेम-प्यार, किसी ने बेटा-पति-पिता और परिवार तो किसी ने राजपाट और संन्यास की बातें कीं, मगर हर्षवर्धन को सन्तोष न हुआ। *महीना बीतने को आया और हर्षवर्धन को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला.. *किसी ने सुझाया कि दूर देश में एक जादूगरनी रहती है, उसके पास हर चीज का जवाब होता है शायद उसके पास इस प्रश्न का भी जवाब हो.. *हर्षवर्धन अपने मित्र सिद्धराज के साथ जादूगरनी के पास गए और अपना प्रश्न दोहराया। *जादूगरनी ने हर्षवर्धन के मित्र की ओर देखते हुए कहा.. मैं आपको सही उत्तर बताऊंगी परंतु इसके एवज में आपके मित्र को मुझसे शादी करनी होगी । *जादूगरनी बुढ़िया तो थी ही, बेहद बदसूरत थी, उसके बदबूदार पोपले मुंह से एक सड़ा दाँत झलका जब उसने अपनी कुटिल मुस्कुराहट हर्षवर्धन की ओर फेंकी । *हर्षवर्धन ने अपने मित्र को परेशानी में नहीं डालने की खातिर मना कर दिया, सिद्धराज ने एक बात नहीं सुनी और अपने मित्र के जीवन की खातिर जादूगरनी से विवाह को तैयार हो गया *तब जादूगरनी ने उत्तर बताया.. "स्त्रियाँ, स्वयं निर्णय लेने में आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं | " *यह उत्तर हर्षवर्धन को कुछ जमा, पड़ोसी राज्य के राजा ने भी इसे स्वीकार कर लिया और उसने हर्षवर्धन को उसका राज्य लौटा दिया *इधर जादूगरनी से सिद्धराज का विवाह हो गया, जादूगरनी ने मधुरात्रि को अपने पति से कहा.. *चूंकि तुम्हारा हृदय पवित्र है और अपने मित्र के लिए तुमने कुरबानी दी है अतः मैं चौबीस घंटों में बारह घंटे तो रूपसी के रूप में रहूंगी और बाकी के बारह घंटे अपने सही रूप में, बताओ तुम्हें क्या पसंद है ? *सिद्धराज ने कहा.. प्रिये, यह निर्णय तुम्हें ही करना है, मैंने तुम्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया है, और तुम्हारा हर रूप मुझे पसंद है । *जादूगरनी यह सुनते ही रूपसी बन गई, उसने कहा.. चूंकि तुमने निर्णय मुझ पर छोड़ दिया है तो मैं अब हमेशा इसी रूप में रहूंगी, दरअसल मेरा असली रूप ही यही है। *बदसूरत बुढ़िया का रूप तो मैंने अपने आसपास से दुनिया के कुटिल लोगों को दूर करने के लिए धरा हुआ था । *अर्थात्, सामाजिक व्यवस्था ने औरत को परतंत्र बना दिया है, पर मानसिक रूप से कोई भी महिला परतंत्र नहीं है। *इसीलिए जो लोग पत्नी को घर की मालकिन बना देते हैं, वे अक्सर सुखी देखे जाते हैं। आप उसे मालकिन भले ही न बनाएं, पर उसकी ज़िन्दगी के एक हिस्से को मुक्त कर दें। उसे उस हिस्से से जुड़े निर्णय स्वयं लेने दें।

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Neha Sharma Nov 25, 2021

‼️ *❣️*मीरा चरित्र*❣️‼️* *🔆🔆💢*पोष्ट-1️⃣8️⃣💢 🔆🔆* ๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑๑۩๑۩๑๑۩ *क्रमशः से आगे ............✍🏻 *श्रावण की मंगल फुहार ने प्रियतम के आगमन की सुगन्ध चारों दिशाओं में व्यापक कर दी ।मीरा को क्षण क्षण प्राणनाथ के आने का आभास होता - वह प्रत्येक आहट पर चौंक उठती ।वह गिरधर के समक्ष बैठे फिर गाने लगी ....... 🌿 सुनो हो मैं हरि आवन की अवाज। महल चढ़ चढ़ जोऊँ मेरी सजनी, कब आवै महाराज । 🌿 सुनो हो मैं हरि आवन की अवाज॥ दादर मोर पपइया बोलै , कोयल मधुरे साज । उमँग्यो इंद्र चहूँ दिसि बरसै, दामणि छोड़ी लाज ॥ 🌿 धरती रूप नवा-नवा धरिया, इंद्र मिलण के काज । मीरा के प्रभु हरि अबिनासी, बेग मिलो सिरताज॥🌿 भजन पूरा करके मीरा ने जैसे ही आँखें उघाड़ी , वह हर्ष से बावली हो उठी ।सम्मुख चौकी पर श्यामसुन्दर बैठे उसकी ओर देखते हुये मंद मंद मुस्कुरा रहे थे ।मीरा की पलकें जैसे झपकना भूल गई ।कुछ क्षण के लिए देह भी जड़ हो गई ।फिर हाथ बढ़ा कर चरण पर रखा यह जानने के लिए कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं ? उसके हाथ पर एक अरूण करतल आ गया । उस स्पर्श ....... में मीरा जगत को ही भूल गई । " बाईसा हुकम !"मंगला ने एकदम प्रवेश किया तो स्वामिनी को यूँ किसी से बात करते ठिठक गई । मीरा ने पलकें उठाकर उसकी ओर देखा ।" मंगला ! आज प्रभु पधारे है ।जीमण (भोजन ) की तैयारी कर ।चौसर भी यही ले आ ।तू महाराज कुमार को भी निवेदन कर आ ।" मीरा की हर्ष-विह्वल दशा देखकर मंगला प्रसन्न भी हुई और चकित भी ।उसने शीघ्रता से दासियों में संदेश प्रसारित कर दिया ।घड़ी भर में तो मीरा के महल में गाने - बजाने की धूम मच गई ।चौक में दासियों को नाचते देख भोजराज को आश्चर्य हुआ ।मंगला से पूछने पर वह बोली ," कुंवरसा ! आज प्रभु पधारे है ।" भोजराज चकित से गिरधर गोपाल के कक्ष की ओर मुड़ गये ।वहां द्वार से ही मीरा की प्रेम-हर्ष-विह्वल दशा दर्शन कर वह स्तम्भित से हो गये ।मीरा किसी से हँसते हुये बात कर रही थी - " बड़ी कृपा ........की प्रभु .....आप पधारे .....मेरी तो आँखें ......पथरा गई थी...... प्रतीक्षा में ।" भोजराज सोच रहे थे ," प्रभु आये है, अहोभाग्य ! पर हाय! मुझे क्यों नहीं दर्शन नहीं हो रहे ?" मीरा की दृष्टि उनपर पड़ी ।" पधारिये महाराजकुमार ! देखिए , मेरे स्वामी आये है ।ये है द्वारिकाधीश , मेरे पति ।और स्वामी , यह है चित्तौड़गढ़ के महाराजकुमार ,भोजराज , मेरे सखा ।" " मुझे तो यहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा ।" भोजराज ने सकुचाते हुए कहा । मीरा फिर हँसते हुये बोली "आप पधारे ! ये फरमा रहे है कि आपको अभी दर्शन होने में समय है ।" भोजराज असमंजस में कुछ क्षण खड़े रहे फिर अपने शयनकक्ष में चले गये ।मीरा गाने लगी - 🌿आज तो राठौड़ीजी महलाँ रंग छायो। 🌿आज तो मेड़तणीजी के महलाँ रंग छायो। कोटिक भानु हुवौ प्रकाश जाणे के गिरधर आया॥ 🌿सुर नर मुनिजन ध्यान धरत हैं वेद पुराणन गाया मीरा के प्रभु गिरधर नागर घर बैठयौं पिय पाया॥ आज मीरा की प्रसन्नता की सीमा नहीं है ।आज उसके घर भवसागर के तारणहार पधारे है उसकी साधना - उसका जीवन सफल करने । श्यामसुन्दर का हाथ पकड़ कर वह उठ खड़ी हुई - "झूले पर पधारेगें आप ? आज तीज है ।" दोनों ने हिंडोला झूला और फिर महल में लौट कर भोजन लिया । मीरा बार बार श्यामसुन्दर की छवि निहार बलिहारी हो जाती ।आज रँगीले राजपूत के वेश मे हैं प्रभु, केसरिया साफा , केसरिया अंगरखा, लाल किनारी की केसरिया धोती और वैसा ही दुपट्टा ।शिरोभूषण में लगा मोरपंख , कानों में हीरे के कुण्डल ,गले के कंठे में जड़ा पदमराग कौस्तुभ, मुक्ता और वैजयन्ती माल, रत्न जटित कमरबन्द , हाथों में गजमुख कंगन और सुन्दर भुजबन्द, चरणों में लंगर और हाथों में हीरे - पन्ने की अँगूठियाँ । और इन सबसे ऊपर वह रूप , कैसे उसका कोई वर्णन करें ! असीम को अक्षरों में कैसे बाँधे? बड़ी से बड़ी उपमा भी जहाँ छोटी पड़ जाती है । श्रुतियाँ नेति नेति कहकर चुप्पी साध लेती है,कल्पना के पंख समीप पहुँचने से पूर्व ही थककर ढीले पड़ जाते है , वह तो अपनी उपमा स्वयं ही है, इसलिए तो उनके रूप को अतुलनीय कहा है । वह रूप इतना मधुर ..........प्रियातिप्रिय.........सुवासित..... नयनाभिराम है कि क्या कहा जाये ? मीरा भी केवल इतना ही कह पाई........ 🌿थाँरी छवि प्यारी लागे , राज राधावर महाराज । रतन जटित सिर पेंच कलंगी, केशरिया सब साज ॥ 🌿मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल , रसिकौं रा सरताज । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, म्हाँने मिल गया ब्रजराज ॥🌿 क्रमशः ....................✍🏻 ◆ ▬▬▬▬▬❴✪❵▬▬▬▬▬ ◆ *🔲🔮🔲🔮🔲🔮🔲🔮🔲*🔮

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Neha Sharma Nov 25, 2021

🌸🦋🌹 श्याम सखियां -० ७- 🌹🦋🌸 🦚i.▭▬▭▬▭▬--▭▬▭▬▭▬▭.🦚li नातो नेह को मानियत “जे कहा कर रही है री ?” छोटी-सी घाघरी पहने, ऊपरसे खुले शरीर-बिखरे केश लिये पाँचेक वर्षकी बालिका वर्षासे गीली हुई मिट्टीमें पाँव डालकर घरौंदा बनाने का प्रयत्न कर रही थी। उसकी छोटी-सी छींटकी औढ़नी थोड़ी दूर घासपर पड़ी थी। गौरवर्ण तन स्थान-स्थानसे धूलि धूसरित हो गया था। गोल मुख, बड़ी आँखें और मोटे होठ उसके भील कन्या होनेकी घोषणा कर रहे थे। बालिका जैसे ही पाँवपर मिट्टी थापकर संतुष्ट होकर धीरेसे पाँव खाँचती, घरौंदा किसी सुरापीके अवश तन-सा ही ढह पड़ता। वह एक बार झुंझलाती, मिट्टीको पीटती-बिखेरती और पुनः जुट पड़ती। सम्भवतः उसे जिद्द चढ़ आयी थी कि बिना किसीकी सहायताके स्वयं अपना घरौंदा बनायेगी वह ऐसा करके अपने साथी-संगियोंको दिखाना चाहती थी कि वे जो उसे चिढ़ाते थे, अब देख लें कि वह उनसे छोटी होते हुए भी समर्थ है। किंतु घरौंदा भी शायद उसीकी भाँति जिद्दी था कि दूसरेका हाथ लगे बिना बनेगा ही नहीं! उपर्युक्त वाक्य सुनकर समझी, उसका ही कोई साथी उसे चिढ़ाने आया है। तुनककर बोली- ‘तेरो सिर! कहा काज है तो कू मो सौं ? जो मेरो मन होय सो करूँ; तो कू कहा ?” ‘मैं बना दूँ तेरा घरौंदा ?’ ‘भागेगो कि मारूँ?’– उसने हाथमें मिट्टी उठायी उसपर फेंकने को। हाथके साथ नेत्र ऊपर उठे और वह जैसे स्थिर हो गयी। सम्मुख पीत वस्त्र और रत्नभूषणोंसे सजा सांवला सलोना उसीकी वयका अपरिचित बालक मुस्कराता खड़ा था ‘क्यों री! ऐसे क्या देख रही है?’ – दाँत मोती की लड़ियोंसे चमक उठे।तो उसने हँसकर कहा,,, ‘मार रही थी मुझे! मैंने क्या बिगाड़ा है री तेरा ? ला, मैं बना दूँ। – वह समीप आकर बैठ गया। उसके तनकी गंध – अहा कैसी मन भावनी! मिट्टी फेंकनेको उठा हाथ नीचे हो गया, किंतु आंखें यथावत अपलक उसे निहार रही थीं। ‘नाम क्या है तेरा ?’ – बालक जमकर बैठ गया था। उसने एक पाँव मिट्टीमें डालकर हाथोंसे थपथापाते हुए पूछा- ‘बोलेगी नाय मो सों? अभी तो खूब बोल रही थी। क्या नाम है तेरा ?’ ‘उजरी।’– उसने धीरेसे कहा। फिर पूछा- ‘तेरो ? ‘ ‘मेरो ? मेरो नाम कन्हाई!’ कहकर वह खुलकर हँस पड़ा। ‘तेरा नाम मुझे अच्छे लगा, जैसा नाम है वैसी है ही तू उजरी! मैं तो काला हूँ, इसीसे नाम भी कृष्ण मिला। मैया बाबा और सखाओंने बिगाड़कर लाड़से कन्हाई कर दिया। तुझे कैसा लगा मेरा नाम ?’ बालिकाने मुस्कराकर डबडबाई आँखोंसे बालककी ओर देखा, फिर नेत्र नीचेकर लिये ‘बता न ?’ बालकने अपने धूलि भरे हाथसे उसका चिबुक उठाकर निहोरा किया। ‘कन्हाई!’– बालिकाने लजाकर कहा और फिर दोनों हँस पड़े। ‘देख! कैसा बना है? – कन्हाईने पैर धीरे से बाहर खींच लिया और बोला। घरौंदा देखकर उजरी प्रसन्नतासे ताली बजाकर हँसने लगी। कन्हाईने घरौँदेके चारों ओर मेड़ बनायी उसके एक ओर दरवाजा बनाया और बोला ,,, ‘चल उपवनमें लगानेको फूल-पत्ते बीन लायें।’ कन्हाई भी हाथ, पैर और मुखपर मिट्टी लगा चुका था। पटुका और कछनी भी गीली मिट्टीका स्वाद ले चुके थे। पटुका अवश्य कार्यमें बाधक जान दूर रख दिया गया था, उसे उठाकर गलेमें डाल उजरीका हाथ पकड़ बोला- ‘चल।’ वह भी अपनी डेढ़-दो हाथकी ओढ़नी लेकर पैरोंमें पीतलके पैंजने छनकाती चली। उन पैंजनियोंके संग श्यामके स्वर्ण-नुपूरोंकी छम-छम बड़ी अटपटी! मानों वीणाके साथ भोंपू बज रहा हो, ऐसी लग रही थी। ‘तेरा घर कहा है री ?’– कन्हाईने हाथके पुष्प भूमिपर बिछे पटुके पर धरते हुए पूछा। उधर, भीलपल्लीमें।’- उजरीका ध्यान पुष्प पत्र चयनमें कम और अपने नवीन सहचरकी ओर अधिक था। “कितने बहिन-भाई हैं तेरे ?”” ‘एक भी नहीं! तू बनेगा मेरा भाई ?’ हो ,,,,,,, । तू लड़ेगी तो नहीं मुझसे ? मैया कहती है मैं बड़ा भोला हूँ; अरे, यह तू क्या कर रही है, फूल-पत्ते सब सूत-सूतकर डाल रही है। एक भी कामका नहीं रहा। देख ऐसे तोड़ना चाहिये!’ दोनों फूल-पत्ते लेकर लौटे, श्यामने बहुत सुन्दर उपवन बनाया। मेडके साथ-साथ कुछ बड़ी टहनियाँ रोपकर छाया वाले वृक्ष बनाये। द्वारपर लाठी लिये पहरेदार भी खड़ा किया। छोटेसे सरोवरमें समीपके डाबरसे लाकर पानी भर दिया। यह सब देख उजरी प्रसन्नताके सागरमें मानो डूब रही थी। इतनी कारीगरी की तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। किंतु सखाओंको दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेकी बात वह सम्भवतः भूल गयी थी। बस वह एकटक अपने कन्हाईको देखे जा रही थी। ‘आ! अब मैं तुझे सजा दूँ।’- और बचे हुए पुष्प-पत्र लेकर वह उसके सम्मुख आ बैठा। उजरीके भूरे उलझे बिखरे केशोंमें पुष्पों को लगाया; माला गजरे बनाकर उसे पहनाया। ‘अब तू मुझे सजा!’– उसने कहा उजरीने आज्ञा मानकर अपने छोटे छोटे अनाड़ी हाथों से उसका अधपटा-सा शृङ्गार किया और दोनों हाथ पकड़कर उठ खड़े हुए उस डाबरमें अपना प्रतिबिम्ब देखने। ‘चल उजरी, अब खेलें।’ “कैसे ?” ‘तू छिप जा, मैं तुझे ढूँढू और मेरे छिपने पर तू मुझे ढूँढ़ना !’ ‘अच्छा! किंतु तू ही मुझे ढूँढ़ना। मुझसे यह न होगा, तू कहीं खो जाय तो! ‘– उजरीने व्याकुल स्वरमें कहा। ‘अच्छा आ तू ही छिप जा! मैं अपनी आँखें मूँद कर खड़ा हूँ। – कन्हाईने छोटी-छोटी हथेलियोंसे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें ढाँप लीं। उजरी अनमने मनसे छिपने चली। वह समीपकी एक झाड़ीमें ही बैठ गयी। कुछ समय बाद श्यामसुंदरने आँखें खोली और ढूँढ़ने चले। सामनेकी कुंजोंमें झाँकते हुए वे आगे बढ़े। उजरी अपने स्थानसे उन्हें देख रही थी। उसे दूर जाते देख वह व्याकुल हो उठी। कितना सुन्दर भाई मिला है उसे! यदि वह साथ चलना चाहे तो, घर ले जाकर बाबा मैयाको दिखायेगी। इतनी देरमें वह ऐसी हिल-मिल गयी थी, मानो जन्मसे ही उसके साथ खेलती रही हो । अचानक चौंक पड़ी वह ‘कहाँ गया कन्हाई?’ अपने स्थान से निकल वह आकुल पुकार उठी- ‘कन्हाई रे कन्हाई’ कभी इस कुंज और कभी उस झाड़ीमें उसका रूँधा कंठ-स्वर गूँजता – ‘कन्हाई रे कन्हाई।’ तभी किसीने पीछेसे उसकी आँखें मूँद ली। झँझलाकर उसने हाथ हटा दिये, घूमकर देखते ही वह उससे लिपट गयी। नन्ही शुक्तियां मुक्ता वर्षण करने लगीं। ‘क्या हुआ उजरी? मैं तो तुझे ढूँढ़ रहा था। तू क्यों रो रही है ?’ ‘मैं तो पास ही उस झाड़ीमें थी तू क्यों दूर ढूँढ़ने गया मुझे ?’ – वह हिल्कियोंके मध्य बोली। ‘तू मुझे क्यों ढूंढ़ रही थी ?’- मैं तो तेरी पीठ पीछे ही खड़ा था। तू पुकार रही थी और मैं संग-संग चलता मुस्करा रहा था। ‘हाँ ऊजरी, सच!’ तूने ऐसा क्यों किया ? ‘मैं तुझे अच्छा लगता हूँ कि नहीं, यह देखनेके लिये।’ ‘कन्हाई!’– उजरीके होंठ मुस्करा दिये, जल भरी आँखें श्यामके मुखपर टिकाकर वह बोली। ‘उजरी!’– श्याम भी उसी प्रकार पुकार उठे और दूसरे ही क्षण दोनों एक दूसरेकी भुजाओंमें आबद्ध हो हँस पड़े। ‘अब मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूँगी! कहीं फिर खो जाय तो ?’ ‘मैं तुझे छोड़ कहीं जाऊँगा ही नहीं!’ ‘सच ?’ ‘सच!’ सच ही तो है, एक बार आँखों में समाकर यह निकलता ही कहाँ है। जय जय श्री राधेश्याम 🦚i.▭▬▭▬▭▬--▭▬▭▬▭▬▭.🦚li 🌺🌹🙏🏻*राधे राधेय्ययययय*🙏🏻🌹🌺 🙇🌺*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇 🦚i.▭▬▭▬▭▬--▭▬▭▬▭▬▭.🦚li

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Neha Sharma Nov 24, 2021

*मंत्रमुग्ध कर देने वाला भजन- आज कृपा बरसा दो श्याम रंग अपना चढ़ा दो एक बार अवश्य सुनें बाबा श्री चित्र विचित्र जी महाराज जी की मधुर वाणी में....👍🌺 🙇🌺*जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇 🔴 अकेलापन स्वभाव है; *स्वतंत्रता स्वभाव है, , प्रेम स्वभाव है; आनंद स्वभाव है।🔴 🔥मुक्ति के केवल दो ही मार्ग हैं ।इसको समझो! ध्यान मार्ग और भक्ति मार्ग ।🔥 🛑1 ध्यान मार्ग :_🛑 (१) अकेलापन स्वभाव है, मतलब यह मार्ग ध्यान का हैं । अकेलापन यानी ध्यान। अकेले रह गए। असंबंधित। असंग। कोई दूसरे की धारणा न रखी। पर को भूल गए, परमात्मा को भी भूल गए, क्योंकि वह भी पर, वह भी दूसरा; अकेले रह गए, बिलकुल एकात में रह गए। जैन, बौद्ध इस तरह चलते हैं। अकेंले रह गए। इसलिए उनके मोक्ष का नाम कैवल्य है। बिलकुल अकेले रह गए। केवल चेतना मात्र बची। अकेलापन स्वभाव है।🔥 ♦️(२) जो अकेला हो गया, तो दूसरी बात उसमें से निकलेगी—स्वतंत्रता। ये भी स्वभाव है। जब तुम अकेले रह गए तो तुम स्वतंत्र हो गए। अब तुम्हें कोई परतंत्रता न रही, क्योंकि कोई पर ही न रहा। दूसरे पर निर्भरता न रही। तुम मुक्त हो गए, तुम स्वतंत्र हो गए। तुम्हारा अपना स्वछंद तुम्हें उपलब्ध हो गया। तुम अपना गीत गुनगुनाने लगे। अब तुम उधार गीत नहीं गाते, अब तुम दूसरे की छाया की तरह नहीं डोलते, अब तुम किसी के पीछे नहीं चलते, अब तुम अपने भीतर से, अपने केंद्र से अपने जीवन का रस बहाने लगे। तो स्वतंत्र हुए।♦️ 💢(३)फिर तीसरी बात " प्रेम स्वभाव है।" जो स्वतंत्र हो गया और अकेला हो गया, वही प्रेम देने में सफल हो पाता है। क्योंकि उसी के पास प्रेम देने को होता है। तुम तो प्रेम दोगे कैसे? तुम तो मांग रहे हो, दोगे कैसे? तुम तो चाहते हो, कोई तुम्हें दे दे, तुम्हारे पास ही होता तो तुम मांगते ही क्यों? तुम्हारे पास नहीं है, इसीलिए तो मांगते हो। हम वही तो मांगते हैं जो हमारे पास नहीं है। और जो स्वतंत्र हो गया, एकात में डूब गया, अपनी मस्ती में खो गया, उसके पास प्रेम होगा। वह प्रेम बांटेगा। लेकिन उसका प्रेम तुम्हारे जैसा प्रेम नहीं होगा वह देगा—बेशर्त। वह किसी को भी देगा, वह यह भी नहीं कहेगा, किसको दूं, किसको न दूं; उसकी कोई सीमा न होगी। वह बांटेगा, वह उलीचेगा, जैसे एकात में खिला हुआ फूल अपनी सुगंध को हवाओं में बिखेर देता है—किसी को मिल जाए, ठीक, न मिले, ठीक। किसी के प्रयोजन से नहीं बिखेरता। सुगंध में किसी का पता नहीं लिखा होता कि फलाने के घर जाना है, कि मेरी प्रेयसी वहां रहती है, सुगंध, वहां जाना। कि मेरा प्रिय वहां रहता है, वहा जाना। बिखेर देता है, जिसको मिल जाए। फूल खिल गया, अब उसको क्या प्रयोजन। जो व्यक्ति स्वतंत्र हो गया, उसका प्रेम खिल जाता है, उसका फूल खिल जाता है। 💓(४)चौथी बात—आनंद स्वभाव है। जिसका फूल खिल गया, वह आनंदित है। बिना भीतर के फूल के खिले, कब कोई आनंदित हुआ है । तो अकेलापन स्वभाव है, स्वतंत्रता स्वभाव है, प्रेम स्वभाव है, आनंद स्वभाव है, ये सारी एक मार्ग की बात है। वह मार्ग है—ध्यान का मार्ग। उसमें अकेलापन पहले आता, फिर स्वतंत्रता आती, फिर प्रेम आता, फिर आनंद आता।💓 🌍2 दूसरा मार्ग है भक्ति मार्ग। 🌍 💢भक्ति के मार्ग में प्रेम पहले आता है, प्रेम स्वभाव है। परमात्मा के प्रति इतने अनन्य प्रेम से भर जाना है कि तुम्हारा मैं— भाव समाप्त हो जाए, तुम्हारा मैं समर्पित हो जाए। और जिसके जीवन में प्रेम आ गया, परमात्मा के प्रति ऐसा समर्पण आ गया, ऐसी प्रार्थना आ गयी कि अपने अहंकार को उसने सब भांति समर्पित कर दिया, उसके जीवन में अनिवार्यरूपेण आनंद आ जाएगा। जो रहा ही नहीं, मैं ही न बचा, वहां दुख कहां?💢 👍अहंकार दुख है। अहंकार दुख की तरह सालता है, शूल है, जहर है। जहां अहंकार गिर गया भक्त का, वहीं आनंद आ गया। और जहां आनंद आ जाता है, वहा दूसरे की कोई जरूरत नहीं रही।👍 ❗दूसरे की जरूरत तो दुख में रहती है। तुम जब दुखी होते हो तब तुम दूसरे को तलाशते हो, कोई मिल जाए तो दुख बंटा ले। दूसरे की जरूरत ही दुख में पड़ती है। जब तुम आनंदित हो, तब क्या दूसरे की जरूरत है! तो जो व्यक्ति प्रेम को उपलब्ध हुआ, आनंद को उपलब्ध हुआ, वह अकेलेपन को उपलब्ध हो जाता है। उसको कोई जरूरत नही दूसरे की। और जो अकेला है, वही स्वतंत्र है, वही स्वच्छंद है।❗ 🕉️तो यह दूसरा सूत्र भक्ति का—प्रेम स्वभाव है। प्रेम से पैदा होता आनंद। आनंद स्वभाव है, आनंद से पैदा होता एकाकीपन, अकेलापन, एकांत, तो अकेलापन स्वभाव है। और अकेलापन यानी स्वतंत्रता, स्वच्छंदता।🕉️ 🛐किसी भी मार्ग से चलो। दो ही मार्ग हैं। या तो शुद्धरूप से अकेले बचो, तो तुम पहुंच जाओगे। या अपने को बिलकुल गंवा दो, खो दो, तो तुम पहुंच जाओगे। या तो मिट जाओ, तो पहुंच जाओगे, शून्य हो जाओ, तो पहुंच जाओगे। या पूर्ण हो जाओ, तो पहुंच जाओगे।🌺 💥जैन और बौद्ध चलते हैं ध्यान से—अकेले हो गए। मैं को शुद्ध करते हैं, शुद्ध करते हैं, परिपूर्णता पर लाते हैं। हिंदू मुसलमान, ईसाई चलते हैं प्रेम सें—अपने को समर्पित करते हैं।💥 🕉️समर्पण में अहंकार धीरे— धीरे खो जाता है, रेखा भी नहीं बचती। जिस दिन अहंकार खो जाता है, उसी दिन परमात्मा प्रगट हो जाता है। *॥ श्री राधेकृष्णाय समर्पणं ॥* 🌿🌷*श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी। *हे नाथ नारायण वासुदेव।।💐🍃 🍀🌺*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। *हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।🌸☘️ __वसुदेव: ईश्वर: श्रीराधेकृष्ण: नमामी: शरणम मम: युगे: युगे:💐👏💖 *जय-जय श्रीराधेकृष्णा*🌷🙏💗

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Neha Sharma Nov 22, 2021

*ये मेरी अर्जी है मैं वो बन जाऊ जो तेरी मर्जी है...👌भजन.... 🙇🌺*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇 🙏🌺*शुभ संध्या नमन*🌺🙏 *#शरीर #कुछ #राख #से #बढ़कर #कुछ #नही* *एक बार स्वामी रामतीर्थ जी रास्ते में जा रहे थे उसी रास्ते से कुछ महिलाएं पानी की मटकी लिए आ रही थी। स्वामी रामतीर्थ जी उन महिलाओं को ध्यान से देखने लगे। महिलाओं ने देखा तो उन्होंने कहा-- *"तन पर तो भगवा वस्त्र है लेकिन देख रहे हो जैसे सांसारिक व्यक्ति कामना में डूबा हो।"* *स्वामी रामतीर्थ जी--* हे माता ! हम् जरूर आपको देख रहे है लेकिन हम् यह सोच रहे है कि जब आप सब इतने सुंदर है जिसे देखकर मन मोह जाता है तो जरा सोचिए जिसने आपको बनाया है अगर उसे देख ले तो हमारी क्या हालत होगी❓ यह सुनकर सभी महिलाएं स्वामी रामतीर्थ जी के चरणों मे गिर गई। यह पंचतत्व से निर्मित शरीर के पीछे हम् इस तरह पड़ जाते है जैसे यह नष्ट नही होगा। लेकिन इस पंचतत्व शरीर के भीतर जो परमात्मा है हम् उसको भूल जाते है। यह भूल जाते है जब तक हमारे भीतर परमात्मा है तभी तक यह बाहरी शरीर काम कर रहा है जिस क्षण हमारे भीतर से वो परमात्मा नाम की शक्ति निकल जाएगी फिर इस शरीर को कोई नही पूछेगा। *यह जिस्म एक राख है जो जलकर नदी में प्रवाहित हो जाएगा आज है कल नही रहेगी जिस जवानी पर इतना गुरुर है वो एक दिन ढल जाएगा अभी तो भँवरे (जिस्म के दीवाने) उड़ रहे है आस-पास बुढापा होते ही भँवरे उड़ जाएंगे हमेशा के लिए।* इसलिए उससे (परमात्मा) जुड़ जिसके लिए यह पंचतत्व का शरीर मिला है नही तो जीवन व्यर्थ चला जाएगा। 🙇🌺*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇

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Neha Sharma Nov 13, 2021

🙇🌺*:::::::::हरी बोल::::::::*🌺🙇 *'''जब वाणी मौन होती है*…...*तब मन बोलता है''''''* *::'::::जब मन मौन होता है**""तब बुद्धि बोलती है''''* *जब बुद्धि मौन होती है**,,,,,तब आत्मा बोलती है* *और जब आत्मा मौन होती है* *'',,,तब परमात्मा से,,,,'''* *साक्षात्कार होता है::::🌺🙏 🙇🌺*जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇 *Ek Sant ke Aadhyatmik avm sateek sabak jo hum sabki samjh se baahar hain...*Must read...✍️ *एक फकीर मरने को था। किसी ने उससे पूछा मरते वक्त कि तुमने किससे सीखा ज्ञान? *उसने कहा, बड़ा कठिन है। किस-किस के नाम लूं? जीवन में एक भी क्षण ऐसा नहीं बीता जब मैंने किसी से कुछ न सीखा हो। *एक बार रास्ते से निकलता था, एक छोटा सा बच्चा हाथ में दीया जलाए हुए कहीं जा रहा था। मैंने उस बच्चे से पूछा कि क्या बेटे तुम बता सकते हो कि दीये में जो ज्योति है यह कहां से आई है? *मैंने सोचा था कि छोटा बच्चा है, चकित होकर रह जाएगा, उत्तर न दे पाएगा। लेकिन उस बच्चे ने क्या किया? उसने फूंक मार दी और दीये को बुझा दिया और मुझसे कहा कि अब तुम ही बताओ कि ज्योति कहां चली गई है? मैंने उस बच्चे के पैर पड़ लिए, मुझे एक गुरु मिल गया था। और मैंने जाना कि छोटे से बच्चे के प्रति भी यह भाव लेना कि वह छोटा है, गलत है। वहां भी कुछ रहस्यपूर्ण मौजूद हुआ है, वहां भी कुछ जन्मा है। केवल उम्र में पीछे होने से उसे छोटा मान लेना भूल है। मेरे पास कोई उत्तर न था। तब मैंने जाना कि जो मैंने पूछा था वह बड़ा अज्ञानपूर्ण था। और तब मैंने जाना कि जहां तक उस प्रश्न के उत्तर का संबंध है, मैं भी उतना ही बच्चा हूं जितना वह बच्चा है। मेरे बुजुर्ग होने का भ्रम टूट गया। और यह भ्रम टूट जाना एक अदभुत शिक्षा थी जो एक छोटे से बच्चे ने मुझे दी थी, वह मेरा गुरु हो गया था। और एक बार, उस फकीर ने कहा कि मैं एक गांव में ठहरा हुआ था। और एक औरत भागी हुई आई, उसके कपड़े अस्तव्यस्त थे, उसने न कुछ ओढ़ रखा था। उसने आकर मुझसे पूछा कि क्या आपने किसी आदमी को यहां से निकलते देखा है? तो मैंने उससे कहा कि बदतमीज औरत, पहले अपने कपड़े ठीक कर और फिर मुझसे कुछ पूछ। उस स्त्री ने कहा, माफ करें, मैं तो समझी कि आप परमात्मा के दीवाने और प्यारे हैं। मेरा प्रेमी इस रास्ते से निकलने वाला है, मैं उसे खोजने निकली हूं, वर्षों के बाद इधर से वह आने को है। तो मैं तो उसके प्रेम में इतनी दीवानी हो गई कि वस्त्रों की कौन कहे, मुझे अपनी देह की भी कोई सुध नहीं! लेकिन तुम परमात्मा के प्रेम में इतने भी दीवाने न हो सके कि दूसरे के वस्त्र तुम्हें दिखाई न पड़ें! उस फकीर ने कहा, मैंने उसके पैर पड़ लिए और मैंने कहा, तेरा प्रेम मुझसे ज्यादा गहरा है। और मैं सोचता था कि मैं परमात्मा का प्रेमी हूं, तूने बता दिया कि नहीं हूं। जिसे अभी दूसरों के वस्त्र भी दिखाई पड़ते हैं, वह क्या परमात्मा का प्रेमी होगा? जो प्रेम में इतना भी नहीं, इतना भी नहीं डूब पाया जितना कि एक सामान्य स्त्री अपने प्रेमी के खयाल में डूब जाती है! तो वह स्त्री मेरी गुरु हो गई। उस फकीर ने कहा, एक बार एक गांव में मैं आधी रात भटका हुआ पहुंचा। गांव के सारे लोग सो गए थे, सिर्फ एक आदमी एक मकान के पास, दीवाल के पास बैठा हुआ मुझे मिला। मेरे मन में खयाल हुआ कि हो न हो यह कोई चोर होना चाहिए। इतनी रात किसी दूसरे के मकान की दीवाल से यह कौन टिका है? मेरे मन में यही खयाल उठा कि कोई चोर होना चाहिए। लेकिन उस आदमी ने मुझसे पूछा, राहगीर, भटक गए हो? चलो, कृपा करो, मेरे घर में ठहर जाओ, अब तो रात बहुत गहरी हो गई और सरायों के दरवाजे भी बंद हो चुके हैं। वह मुझे अपने घर ले गया और मुझे सुला कर उसने कहा कि मैं जाऊं, रात्रि में ही मेरा व्यवसाय चलता है। तो मैंने पूछा, क्या है तुम्हारा व्यवसाय? उसने कहा कि परमात्मा के एक फकीर से झूठ न बोल सकूंगा, मैं एक गरीब चोर हूं। वह चोर चला गया। और उस फकीर ने कहा कि मैं बहुत हैरान रह गया, इतनी सचाई तो मैं भी नहीं बोल सकता था। मेरे मन में भी कितनी बार चोरी के खयाल नहीं उठे! और मेरे मन में भी कौन-कौन सी बुराइयां नहीं पाली हैं! लेकिन मैंने कभी किसी को नहीं कहीं। इतना सरल तो मैं भी न था जितना वह चोर था। और रात जब पूरी बीत गई तो वह चोर वापस लौटा, धीरे-धीरे कदमों से घर के भीतर प्रवेश किया ताकि मेरी नींद न खुल जाए। मैंने उससे पूछा, कुछ मिला? कुछ लाए? उस चोर ने कहा, नहीं, आज तो नहीं, लेकिन कल फिर कोशिश करेंगे। वह खुश था, निराश नहीं था। फिर तीस दिन मैं उसके घर में मेहमान रहा और वह तीस दिन ही घर के बाहर रोज रात को गया और हर रोज खाली हाथ लौटा और सुबह जब मैंने उससे पूछा कि कुछ मिला? तो उसने कहा, नहीं, आज तो नहीं, लेकिन कल जरूर मिलेगा, कल फिर कोशिश करेंगे। फिर महीने भर के बाद मैं चला आया। और जब मैं परमात्मा की खोज में गहरा डूबने लगा और परमात्मा का मुझे कोई कोर-किनारा न मिलता था और मैं थक जाता था और हताश हो जाता था और सोचने लगता था कि छोड़ दूं इस दौड़ को, खोज को, तब मुझे उस चोर का खयाल आता था जो रोज खाली हाथ लौटा, लेकिन कभी निराश न हुआ और उसने कहा कि कल फिर कोशिश करेंगे। और उसी चोर के बार-बार खयाल ने मुझे निराश होने से बचाया। जिस दिन, जिस दिन मुझे परमात्मा की ज्योति मिली, उस दिन मैंने अपने हाथ जोड़े और उस चोर के लिए प्रणाम किया, अगर वह उस रात मुझे न मिला होता तो शायद मैं कभी का निराश हो गया था। ऐसे उस फकीर ने बहुत सी बातें कहीं जिनसे उसने सीखा। जिंदगी चारों तरफ बहुत बड़ी शिक्षा है। जिंदगी चारों तरफ बहुत बड़ा सत्य है। जिंदगी चारों तरफ रोज-रोज खड़ी है द्वार पर। हमारी आंखें बंद हैं और हम पूछते हैं: सत्संग करने कहां जाएं? और हम पूछते हैं: किसके चरण पकड़ें, किसको गुरु बनाएं? और जिंदगी चारों तरफ खड़ी है सब कुछ लुटा देने को, सब कुछ खोल देने को और उसके प्रति हमारी आंखें एवं हृदय बंद है। तो मैं नहीं कहता कि सत्संग करने कहीं जाएं। वैसा हृदय बनाएं अपना कि चौबीस घंटे सत्संग हो जाए। जिंदगी में सब कुछ ऐसा है कि जिससे सीखा जा सके, पाया जा सके, जाना जा सके। *कोई दृष्टि खुल जाए, कोई अंतर्दृष्टि खुल जाए।* 🙇🌺*जय-जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇

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Neha Sharma Nov 11, 2021

”उस ज्ञान का कोई लाभ नहीं, *जो समाज के हित में ना हो। “ *जय जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇 *शुभ रात्रि नमन*🙏🌺🌺 *बहुत समय पहले की बात हैं मुल्तान ( पंजाब ) का रहने वाला एक ब्राह्मण उत्तर भारत में आकर बस गया।* . *जिस घर में वह रहता था उसकी ऊपरी मंजिल में कोई मुग़ल-दरबारी रहता था।* . *प्रातः नित्य ऐसा संयोग बन जाता की जिस समय ब्राह्मण नीचे गीतगोविन्द के पद गाया करता उसी समय मुग़ल ऊपर से उतरकर दरबार को जाया करता था।* *ब्राह्मण के मधुर स्वर तथा गीतगोविन्द की ललित आभा से आकृष्ट होकर वह सीढ़ियों में ही कुछ देर रुककर सुना करता था।* . *जब ब्राह्मण को इस बात का पता चला तो उसने उस मुग़ल से पूछा की - "सरकार ! आप इन पदों को सुनते हैं पर कुछ समझ में भी आता है ?* . *मुग़ल, समझ में तो एक लफ्ज (अक्षर) भी नही आता पर न जाने क्यों उन्हें सुनकर मेरा दिल गिरफ्त हो जाता है। तबियत होती है की खड़े खड़े इन्हें ही सुनता रहूं* . *आखिर किस किताब में से आप इन्हें गाया करते है ?* . *ब्राह्मण, सरकार ! "गीतगोविन्द" के पद है ये, यदि आप पढ़ना चाहे तो मैं आपको पढ़ा दूंगा।* . *इस प्रस्ताब को मुग़ल ने स्वीकार कर लिया और कुछ ही दिन में उन्हें सीखकर स्वयं उन्हें गाने लग गया।* . *एक दिन ब्राह्मण ने उन्हें कहा, आप गाते तो है लेकिन हर किसी जगह इन पदों को नही गाना चाहिये,* . *आप इन अद्भुत अष्टापदियो के रहस्य को नही जानते।* . *क्योकि जहाँ कहीं ये गाये जाते है भगवान श्रीकृष्ण वहाँ स्वयं उपस्थित रहते है।* *इसलिए आप एक काम करिये। जब कभी भी आप इन्हें गाये तो श्याम सुन्दर के लिए एक अलग आसान बिछा दिया करे।* . *मुग़ल ने कहा - वह तो बहुत मुश्किल है, बात ये है की हम लोग दूसरे के नौकर है, और अक्सर ऐसा होता है की दरबार से वक्त वेवक्त बुलावा आ जाता है, और हमको जाना पड़ता है।* . *ब्राह्मण - तो ऐसा करिये जब आपका सरकारी काम ख़त्म हो जाया करे तब आप इन्हें एकांत में गाया करिये।* *मुग़ल - यह भी नही हो सकता आदत जो पड़ गयी है ! और रही घर बैठकर गाने की बात सो कभी तो ऐसा होता है की दो दो - तीन तीन दिन और रात भी हमें घोड़े की पीठ पर बैठकर गुजारनी पड़ती है।* . *ब्राह्मण - अच्छा तो फिर ऐसा किया जा सकता हैं कि घोड़े की जीन के आगे एक बिछौना श्यामसुंदर के विराजने के लिए बिछा लिया करे।* . *और यह भावना मन में रख ले की आपके पद सुनने के लिए श्यामसुंदर वहाँ आकर बैठे हुए *मुग़ल ने स्वीकार कर यहीं नियम बना लिया और घर पर न रहने की हालात में घोड़े पर चलता हुआ ही गीतगोविन्द के पद गुनगुनाया करता।* . *एक दिन अपने अफसर के हुकुम से उसे जैसा खड़ा था उसी हालात में घोड़े पर सवार होकर कहीं जाना पड़ा, वह घोड़े की जीन के आगे बिछाने के लिए बिछौना भी साथ नही ले जा सका।* . *रास्ते में चलते चलते वह आदत के अनुसार पदों का गायन करने लगा।* . *गायन करते करते अचानक उसे लगा की घोड़े के पीछे पीछे घुंघरुओं ( नूपुर ) की झनकार आ रही है।* . *पहले तो वह समझा कि वहम हुआ है, लेकिन जब उस झंकार में लय का आभास हुआ तो घोड़ा रोक लिया और उतर कर देखने लगा।* . *तत्क्षण श्यामसुंदर ने प्रकट होकर पूछा - 'सरदार' ! आप घोड़े से क्यों उतर पड़े ? और आपने इतना सुन्दर गायन बीच में ही क्यों बंद कर दिया ?* . *मुग़ल तो हक्का -बक्का होकर सामने खड़ा देखता ही रह गया।* . *भगवान की रूपमाधुरी को देखकर वह इतना भावविहल हो गया की मुँह से आवाज ही नही निकलती थी।* . *आखिर बोला - आप संसार के मालिक होकर भी मुझ मुग़ल के घोड़े के पीछे पीछे क्यों भाग रहे थे ?* . *भगवान् ने मुस्कुराते हुए कहा - भाग नहीं रहा। मैं तो आपके पीछे पीछे नाचता हुआ आ रहा हूँ ।* . *क्या तुम जानते नहीं हो की जिन पदों को तुम गा रहे थे वो कोई साधारण काव्य नहीं है।* . *तुम आज मेरे लिए घोड़े पे गद्दी बिछाना भूल गए तो क्या मैं भी नाचना भूल जाऊँ क्या ?* . *मुग़ल को अब मालूम हुआ की मुझसे अब कितना भारी अपराध बन गया है। यह सब इसलिए हुआ की वह पराधीन था।* . *दूसरे दिन प्रातः ही उसने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और वैराग्य लेकर श्यामसुंदर के भजन में लग गया।* . *सही है एक बार उन महाप्रभु की रूप माधुरी को देख लेने के बाद संसार में ओर क्या शेष रह जाता है।* . *यहीं मुग़ल भक्त बाद में प्रभु कृपा से ' मीर माधव ' नाम से विख्यात हुए।* ******************************************* *विचारणीय लेख,:* 🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔🤔 *पश्चिमी दुनिया में फैमिली सिस्टम समाप्त* *हिन्दू परिवार परम्परा का भी पतन प्रारम्भ।* *इस्लाम का मज़बूत फैमिली सिस्टम उसे जिलाये रखने में सक्षम* *डेविड सेलबॉर्न पश्चिमी दुनिया का मशहूर लेखक है।* *उसने एक किताब लिखी है "The losing battle with islam"* *इस किताब में उसने लिखा है कि पश्चिमी दुनिया इस्लाम से हार रही है।* *उसने हार के कई कारण गिनाए हैं,* *जिसमें इस्लाम के मज़बूत फैमिली सिस्टम को एक कारण बताया है।* *पश्चिमी दुनिया मे फैमिली सिस्टम तबाह हो चुका है।* *लोग शादी करना पसंद नहीं करते।* *समलैंगिकता, अवैध संबंध, लिव इन रिलेशन जैसी कुरीतियों के आम होने से फैमिली सिस्टम टूटता जा रहा है।* *दिन ब दिन ऐसे बच्चों की तादाद बढ़ती जा रही है जिन्हें मालूम नही होता कि उनके पिता कौन हैं।* *बूढ़े मां -बाप को घर में रखने को कोई तैयार नही है।* *ओल्ड ऐज होम में उनका बुढापा गुज़रता है।* *पश्चिमी समाज में कुछ ऐसे समाजिक परिवर्तन आ चुके हैं जिससे पूरा पश्चिमी समाज तबाह होने के कगार पर पहुंच चुका है।* *राजनीतिक दल परिवार को बचाने का वादा अपने चुनाव घोषणा पत्र में करने लगे हैं।* *ऑस्ट्रेलिया में तो 'फैमिली फर्स्ट' नाम से एक पोलिटिकल पार्टी तक बना ली गयी है।* *फैमिली सिस्टम को बचाना वेस्टर्न वर्ल्ड का सबसे बड़ा मुद्दा है,* *क्योंकि फैमिली नही बची तो समाज को भी देर सवेर ध्वस्त होते देर नहीं लगनी है।* *यही वजह है डेविड सेलबॉर्न और बिल वार्नर जैसे लेखक यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं कि इस्लाम के मज़बूत फैमिली सिस्टम की वजह से पश्चिम देर सवेर इस्लाम से हार जाएगा।* *भारत में भी हिन्दू परिवार परम्परा का पतन होना प्रारम्भ हो चुका है।* *रक्त के 5 रिश्ते समाप्त होने की कगार पर है।* *ताऊ, चाचा, बुआ, मामा, मौसी जैसे रिश्ते आने वाले समय में देखने सुनने को नहीं मिलने वाले हैं !* *इसे इस तरह समझा जा सकता है-* *पुत्र* *पुत्री* *बचे* *रिश्ते** *2 2 5* *2 1 4 (मौसी X)* *1 2 3 (चाचा, ताऊ X)* *1 1 2 (चाचा, ताऊ, मौसी X)* *1 0 X* *0 1 X* *परिणाम* *0 0* *सिंगल चाइल्ड फैमिली को उनका निर्णय तीसरी पीढ़ी याने जिनके आप- दादा- दादी होंगे बुरी तरह प्रभावित करेगा।* *जिस दादा को मूल से अधिक ब्याज प्यारा होता है,* *उसका मूलधन भी समाप्त हो जाएगा।* *इसके लिए वह स्वयं उत्तरदायी है।* **इसलिए दम्पत्ति को सिंगल चाइल्ड के निर्णय पर गंभीरता से विचार करना होगा।* *यह घटती आबादी के आंकड़ें बोल रहे हैं।* *यह विश्लेषण सरकारी आँकड़ों के अध्ययन से आ रहा है।* *आपका पौत्र या प्रपौत्र इस संसार में अकेला खड़ा होगा।* *उसे अपने रक्त के रिश्ते की आवश्यकता होगी तो इस पूरे ब्रह्मांड में उसका अपना कोई नहीं होगा।* *यह अत्यंत सोचनीय विषय है।* *ये न केवल हमारे बच्चों को एकाकी जीवन जीने को मजबूर करेगा बल्कि हमारी हिंदू परिवार सभ्यता को ही नष्ट कर देगा।* *हम जो हिन्दू एकता की बात करते हैं ये तो सभ्यता ही समाप्त हो जाएगी।* *और इन सबके लिए हमारी वर्तमान पीढ़ी उत्तरदायी होगी।* *अगर आप इस विषय को गंभीर समझते हैं तो इस पोस्ट को शेयर करें,* *घर परिवार में, पति पत्नी के बीच, रिश्तेदारों में, दोस्तो में एवं विभिन्न बैठकों एवं आयोजनों में इस विषय पर मंत्रणा करे।* *अपनी सभ्यता, संस्कार औऱ पीढ़ियों को बचाये।* 🙏🙏🙏🙏🙏

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Neha Sharma Nov 11, 2021

*जो आपके अनकहे...शब्दों को भी सुन सकता है...हाँ, वो केवल मेरे राधामाधव ही हो सकते हैं*....💗🌿🙏 🙇🌺जय श्री राधेकृष्णा*🙏* शुभ संध्या नमन*🌺🙇 🌴*महापुरुषों के उपदेश…..🌹धर्म की रक्षा और अधर्म का उन्मूलन करना ही अवतार और उसके अनुयायियों का कर्तब्य है। इसमें चाहे निजी हानि कितनी ही होती हो, कठिनाई कितनी ही झेलनी पड़ती हो !! 🌱अवतार व्यक्ति के रूप में नहीं, आदर्शवादी प्रवाह के रूप में होते हैं और हर जीवन्त आत्मा को युगधर्म निबाहने के लिए बाधित करते हैं !! 🍒शरीर और मन की प्रसन्नता के लिए जिसने आत्म-प्रयोजन का बलिदान कर दिया, उससे बढ़कर अभागा एवं दुर्बुद्धि और कौन हो सकता है !! 🌾जीवन के आनन्द गौरव के साथ, सम्मान के साथ और स्वाभिमान के साथ जीने में है !! 💐आचारनिष्ठ उपदेशक ही परिवर्तन लाने में सफल हो सकते हैं। अनधिकारी धर्मोपदेशक खोटे सिक्के की तरह मात्र विक्षोभ और अविश्वास ही भड़काते हैं !! 🌴इन दिनों जाग्रत्‌ आत्मा मूक दर्शक बनकर न रहे। बिना किसी के समर्थन, विरोध की परवाह किए आत्म-प्रेरणा के सहारे स्वयंमेव अपनी दिशाधारा का निर्माण-निर्धारण करें !! 🌿जौ भौतिक महत्त्वाकांक्षियों की बेतरह कटौती करते हुए समय की पुकार पूरी करने के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करने और जिसमेंं महान्‌ परम्परा छोड़ जाने की ललक उफनती रहे, यही है-प्रज्ञापुत्र शब्द का अर्थ !! 🌺दैवी शक्तियों के अवतरण के लिए पहली शर्त है- साधक की पात्रता, पवित्रता और प्रामाणिकता !! 🌵आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाइयाँ ही खोजता है !! 🥀चरित्रवान्‌ व्यक्ति ही किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा है !! 🍂व्यक्तिगत स्वार्थों का उत्सर्ग सामाजिक प्रगति के लिए करने की परम्परा जब तक प्रचलित न होगी, तब तक कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों मेंं सामर्थ्यवान्‌ नहीं बन सकता है !! 🌳युग निर्माण योजना का लक्ष्य है-शुचिता, पवित्रता, सच्चरित्रता, समता, उदारता, सहकारिता उत्पन्न करना !! 🌸भुजायें साक्षात्‌ हनुमान हैं और मस्तिष्क गणेश, इनके निरन्तर साथ रहते हुए किसी को दरिद्र रहने की आवश्यकता नहीं !! 🍄विद्या की आकांक्षा यदि सच्ची हो, गहरी हो तो उसके रहते कोई व्यक्ति कदापि मूर्ख, अशिक्षित नहीं रह सकता !! 🍇मनुष्य दु:खी, निराशा, चिंतित, उदिग्न बैठा रहता हो तो समझना चाहिए सही सोचने की विधि से अपरिचित होने का ही यह परिणाम है !! 🍏धर्म अंत:करण को प्रभावित और प्रशासित करता है, उसमें उत्कृष्टता अपनाने, आदर्शों को कार्यान्वित करने की उमंग उत्पन्न करता है !! 🥀जीवन साधना का अर्थ है- अपने समय, श्रम ओर साधनों का कण-कण उपयोगी दिशा में नियोजित किये रहना !! 🌼निकृष्ट चिंतन एवं घृणित कर्तब्य हमारी गौरव गरिमा पर लगा हुआ कलंक है !! 💐आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है !! 🌾हम कोई ऐसा काम न करें, जिसमें अपनी अंतरात्मा ही अपने को धिक्कारे !! 🍒अपनी दुष्कृताएँ दूसरों से छिपाकर रखी जा सकती हैं, पर अपने आप से कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता !! 🌲किसी महान्‌ उद्देश्य का न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से पीछे हट जाना !! 🌱महानता का गुण न तो किसी के लिए सुरक्षित है और न प्रतिबंधित। जो चाहे अपनी शुभेच्छाओं से उसे प्राप्त कर सकता है !! 🌹*सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहींं जाता !! 🙇🌺*जय जय श्री राधेकृष्णा*🌺🙇

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