Neha Sharma, Haryana May 10, 2021

*जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸 *भक्त शिरोमणि.....श्री किल्हदेव जी..... . जिस प्रकार गंगा जी के पुत्र श्री भीष्म पितामह को मृत्यु ने नष्ट नहीं किया, उसी प्रकार स्वामी किल्हदेव जी भी साधारण जीवों की तरह मृत्यु के वश मे नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपनी इच्छा से प्राणों का त्याग किया। . कारण कि आपकी चित्तवृत्ति दिन रात श्री रामचन्द्रजी के चरणारविन्दो का ध्यान करने में लगी रहती थी। . आप माया के षड्विकारों पर विजय प्राप्त करने वाले महान शूरवीर थे। सदा भगवद्भजन में आनन्द में मग्न रहते थे। . सभी प्राणी आपको देखते ही नतमस्तक हो जाते थे और आप सभी प्राणियो में अपने इष्टदेव को देखकर उन्हें सिर झुकाते थे। . सांख्यशास्त्र तथा योग का आपको सुदृढ ज्ञान था और योग की क्रियाओं का आपको इतना सुन्दर अनुभव था कि जैसे हाथ मे रखे आँवले का होता है। . ब्रह्मरन्ध के मार्ग से प्राणो को निकाल कर आपने शरीर का त्याग किया और अपने योगाभ्यास के बल से भगवद् रूप पार्षदत्व प्राप्त किया। . इस प्रकार श्री सुमेरुदेव जी के सुपुत्र श्री कील्हदेव जी ने अपने पवित्र यश को पृथ्वीपर फैलाया, आप विश्वविख्यात सन्त हुए। . श्री कील्हदेव जी महाराज श्री कृष्णदास पयहारी के प्रधान शिष्यो मे से एक थे। . श्रीपयहारीजी के परमधाम गमन के बाद गलतागादी ( जयपुर) के महन्त आप ही हुए। आप दिव्यदृष्टि संपन्न परम वैष्णव सिद्ध संत थे। . कहते हैं कि भक्तमाल ग्रन्थ के रचनाकार श्री नाभादास जी महाराज के नेत्र क्या, नेत्र के चिह्न भी नहीं थे, श्री कील्हदेवजी ने अपने कमण्डलु के जल से उनके नेत्र स्थान को धुला, जिससे उनके बाह्य चक्षु प्रकट हो गये। . कहते हैं कि एक बार श्री कील्हदेव जी मथुरापुरी आये हुए थे और श्री यमुना जी में स्नान कर एकान्त में समाधिस्थ होकर भगवान् का ध्यान करने लगे। . उसी समय बादशाह के दिल्ली से मथुरा आगमन की सुचना मिली। . सेना तुरंत व्यवस्था में लग गयी, रास्ता साफ किया जाने लगा, सब लोग तो हट गये, परंतु ध्यान अवस्था में होने के कारण श्री कील्हदेव जी महाराज को बाह्य जगत की कुछ खबर ही नहीं थी। वे समाधि में स्थिर होकर बैठे थे। . किसी सिपाही ने जाकर बादशाह को बताया कि हुजूर एक हिन्दू फकीर रास्ते में बैठा है और हमारे शोर मचाने पर भी नहीं उठ रहा है। . उसने फौरन हुक्म दिया कि उस काफिर के माथे में लोहे की कील ठोंक दो। हुक्म मिलते ही दुष्ट सिपाहियों ने लोहे की एक कोल लेकर श्री कील्हजी के माथे में ठोकना शुरू किया। . परंतु आश्चर्य.!! कील्हदेव जी तो वैसे ही शान्त, निर्विकार बने रहे, परंतु उनके माथे का स्पर्श करते ही वह लोहे की कील गलकर पानी हो गयी ! . यह आश्चर्य देख सिपाही भागकर बादशाह के पास गये। . बादशाह को भी यह विचित्र घटना सुनकर बडा आश्चर्य हुआ, उसे लगा कि मैंने बादशाहत के नशे में चूर होकर किसी सिद्ध सन्त का अपमान कर दिया है और इसका दण्ड भी भोगना पड़ सकता है, . अत: भागता हुआ जाकर श्री कील्हदेव जी महाराज के चरणों में गिर पड़ा और बार-बार क्षमा माँगने लगा। . थोड़ी देर बाद जब कील्हदेव जी की समाधि टूटी और वे अन्त:जगत से बाह्य ज़गत मे आये तो उन्हें इस घटना का ज्ञान हुआ। . श्री कील्हदेव जी महाराज तो परम सन्त थे, उनके मन में क्रोध के लिये कोई स्थान ही नहीं था, उन्होंने बादशाह को तुरंत क्षमा कर दिया। . बादशाह यद्यपि श्री कील्हदेव जी महाराज से प्रभावित तो बहुत हुआ, परंतु मुसलमान मुल्ला मौलवियो के निरन्तर संपर्क में रहने से उसने हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें मुसलमान बनाने का अभियान चला रखा था। . अब हिन्दुओं ने मिलकर श्री कील्हदेव जी की शरण ली और धर्मरक्षा करने की प्रार्थना करी। . श्री कील्हदेव जी ने सबको आश्वासन दिया और स्वयं बादशाह के दरबार मे गये। . बादशाह ने श्री कील्हदेव जी के चरणो में प्रणाम किया और आगे से ऐसा न करने की शपथ ली। . श्री कील्हदेव जी महाराज दिव्यदृष्टि सम्पन्न थे, जिस समय आपके पिता श्री सुमेरुदेव जी का भगवद्धामगमन हुआ, उस समय आप श्री मथुरा जी में विराजमान थे और आपके समीप ही राजा मानसिंह बैठे थे। . आपने जब आकाशमार्ग से विमान में पिता जी को भगवान् के धाम जाते देखा तो उठकर प्रणाम किया और पिताजी ने भी इन्हें आशीर्वाद दिया। . श्री किल्हदेवजी जी के अतिरिक्त अन्य किसी को उनके पिता नहीं दिखायी दिये, इसीलिये राजा मानसिंह को बहुत आश्चर्य हुआ। . उन्होंने श्री कील्हदेव जी से पूछा कि प्रभो ! आप क्यों उठे और हाथ जोड़कर किसे प्रणाम किया ? . श्री कील्हजी ने उन्हें पिता जी के परमधाम गमन की बात बतायी। . मानसिंह को बहुत आश्चर्य हुआ; क्योकि श्री कील्हदेव जी के पिता जी का शरीर छूटा था गुजरात में और श्री कील्हदेवजी थे मथुरा में, . ऐसे में श्री कील्हदेव जी को पिता का दर्शन कैसे हुआ, यह मानसिंह के लिये आश्चर्य की बात थी। . उन्होंने तुरंत ही अपने दूतों को गुजरात भेजकर सत्यता का पता लगाने को कहा। . श्री कील्हदेव जी की बात अक्षरश: सत्य प्रमाणित हुई, इससे राजा मानसिंह को श्री किल्हदेव जी पर बहुत ही श्रद्धा हो गयी। . इनके संतत्व की दूसरी घटना इस प्रकार है.. . एक बार की बात है, आप अपने आराध्य प्रभु श्री सीताराम जी की सेवा में लगे हुए थे। . आपने माला निकालने के लिए पिटारी में जैसे ही हाथ डाला वैसे ही उसमे बैठे एक विषधर सर्प ने आपके हाथ में काट लिया। . करुणाविग्रह आपने उस सर्प पर भी दया की और उसे भूखा जानकार पुनः अपना हाथ पिटारी में डाल दिया। . इस प्रकार आपने तीन बार पिटारी में हाथ डाला और सर्प ने तीनो बार काटा, . चौथी बार वह पिटारी से निकल कर भाग गया। इस प्रकार आपने सर्प को भी अतिथि मानकर उसका सत्कार किया और उसकी क्षुधापूर्ति की। . श्री रामकृपा से उस विषधर सर्प के विष का आप पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। . सत्य है जब भजन के बल से काल व्याल का विष नहीं व्यापता तो लौकिक व्याल का विष क्या व्यपेगा। . श्री किल्हादेव जी महाराज सिद्ध संत थे, भविष्य की बात जान लेने की उनमे सामर्थ्य थी। . जब उन्हें भगवान् के धाम पधारना था तब उन्होंने पहले से ही संतो के पास इस आशय का संदेश भेज दिया और संतो से संकीर्तन करने को कहा। . संकीर्तन सुनते हुए ही आपने ब्रह्मरंध से अपने प्राणों का उत्क्रमण किया। . ~~~~~~~~~~~~~~~~~ *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸 ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 199 स्कन्ध - 09 अध्याय - 16 इस अध्याय में:- परशुराम जी के द्वारा क्षत्रिय संहार और विश्वामित्र जी के वंश की कथा श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अपने पिता की यह शिक्षा भगवान परशुराम ने ‘जो आज्ञा’ कहकर स्वीकार की। इसके बाद वे एक वर्ष तक तीर्थ यात्रा करके अपने आश्रम पर लौट आये। एक दिन की बात है, परशुराम जी की माता रेणुका गंगा तट पर गयी हुई थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलों की माला पहने अप्सराओं के साथ विहार कर रहा है। वे जल लाने के लिये नदी तट पर गयी थीं, परन्तु वहाँ जलक्रीड़ा करते हुए गन्धर्व को देखने लगीं और पतिदेव के हवन का समय हो गया है-इस बात को भूल गयीं। उनका मन कुछ-कुछ चित्ररथ की ओर खिंच भी गया था। हवन का समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्नि के शाप से भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँ से आश्रम पर चली आयीं। वहाँ जल का कलश महर्षि के सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं। जमदग्नि मुनि ने अपनी पत्नी का मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा- ‘मेरे पुत्रों! इस पापिनी को मार डालो।’ परन्तु उनके किसी भी पुत्र ने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की। इसके बाद पिता की आज्ञा से परशुराम जी ने माता के साथ सब भाइयों को मार डाला। इसका कारण था। वे अपने पिताजी के योग और तपस्या का प्रभाव भलीभाँति जानते थे। परशुराम जी के इस काम से सत्यवतीनन्दन महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा- ‘बेटा! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो।’ परशुराम जी ने कहा- ‘पिताजी! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायें तथा उन्हें इस बात की याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था’। परशुराम जी के इस प्रकार कहते ही जैसे कोई सोकर उठे, सब-के-सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे। परशुराम जी ने अपने पिताजी का तपोबल जानकर ही तो अपने सुहृदों का वध किया था। परीक्षित! सहस्रबाहु अर्जुन के जो लड़के परशुराम जी से हारकर भाग गये थे, उन्हें अपने पिता के वध की याद निरन्तर बनी रहती थी। कहीं एक क्षण के लिये भी उन्हें चैन नहीं मिलता था। एक दिन की बात है, परशुराम जी अपने भाइयों के साथ आश्रम से बाहर वन की ओर गये हुए थे। यह अवसर पाकर वैर साधने के लिये सहस्रबाहु के लड़के वहाँ आ पहुँचे। उस समय महर्षि जमदग्नि अग्निशाला में बीते हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियों से पवित्रकीर्ति भगवान् के ही चिन्तन में मग्न हो रहे थे। उन्हें बाहर की कोई सुध न थी। उसी समय उन पापियों ने जमदग्नि ऋषि को मार डाला। उन्होंने पहले से ही ऐसा पापपूर्ण निश्चय कर रखा था। परशुराम की माता रेणुका बड़ी दीनता से उनसे प्रार्थना कर रही थीं, परन्तु उन सबों ने उनकी एक न सुनी। वे बलपूर्वक महर्षि जमदग्नि का सिर काटकर ले गये। परीक्षित! वास्तव में वे नीच क्षत्रिय अत्यन्त क्रूर थे। सती रेणुका दुःख और शोक से आतुर हो गयीं। वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट-पीटकर जोर-जोर से रोने लगीं- ‘परशुराम! बेटा परशुराम! शीघ्र आओ’। परशुराम जी ने बहुत दूर से माता का ‘हा राम!’ यह करुण-क्रन्दन सुन लिया। वे बड़ी शीघ्रता से आश्रम पर आये और वहाँ आकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं। परीक्षित! उस समय परशुराम जी को बड़ा दुःख हुआ। साथ ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीड़ा और शोक के वेग से वे अत्यन्त मोहित हो गये। ‘हाय पिता जी! आप तो बड़े महात्मा थे। पिता जी! आप तो धर्म के सच्चे पुजारी थे। आप हम लोगों को छोड़कर स्वर्ग चले गये’। इस प्रकार विलाप कर उन्होंने पिता का शरीर तो भाइयों को सौंप दिया और स्वयं हाथ से फरसा उठाकर क्षत्रियों को संहार कर डालने का निश्चय किया। परीक्षित! परशुराम जी ने माहिष्मती नगरी में जाकर सहस्रबाहु अर्जुन के पुत्रों के सिरों से नगर के बीचों-बीच एक बड़ा भारी पर्वत खड़ा कर दिया। उस नगर की शोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रियों के कारण ही नष्ट हो चुकी थी। उनके रक्त से एक बड़ी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियों का हृदय भय से काँप उठता था। भगवान् ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। इसलिये राजन! उन्होंने अपने पिता के वध को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियहीन कर दिया और कुरुक्षेत्र के समन्तपंचक में ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्त के जल से भरे हुए थे। परशुराम जी ने अपने पिता जी का सिर लाकर उनके धड़ से जोड़ दिया और यज्ञों द्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान् का यजन किया। यज्ञों में उन्होंने पूर्व दिशा होता को, दक्षिण दिशा ब्रह्मा को, पश्चिम दिशा अध्वर्यु को और उत्तर दिशा सामगान करने वाले उद्गाता को दे दी। इसी प्रकार अग्निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजों को दीं, कश्यप जी को मध्यभूमि दी, उपद्रष्टा को आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्यों को अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं। इसके बाद यज्ञान्त-स्नान करके वे समस्त पापों से मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वती के तट पर मेघरहित सूर्य के समान शोभायमान हुए। महर्षि जमदग्नि को स्मृतिरूप संकल्पमय शरीर की प्राप्ति हो गयी। परशुराम जी से सम्मानित होकर वे सप्तर्षियों के मण्डल में सातवें ऋषि हो गये। परीक्षित! कमललोचन जमदग्निनन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तर में सप्तर्षियों के मण्डल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे। वे आज भी किसी को किसी प्रकार का दण्ड न देते हुए शान्त चित्त से महेन्द्र पर्वत पर निवास करते हैं। वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्र का मधुर स्वर से गान करते रहते हैं। सर्वशक्तिमान् विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ने इस प्रकार भृगुवंशियों में अवतार ग्रहण करके पृथ्वी के भारभूत राजाओं का बहुत बार वध किया। महाराज गाधि के पुत्र हुए प्रज्वलित अग्नि के समान परमतेजस्वी विश्वामित्र। उन्होंने अपने तपोबल से क्षत्रियत्व का भी त्याग करके ब्रह्मतेज प्राप्त कर लिया। परीक्षित! विश्वामित्र जी के सौ पुत्र थे। उनमें बिचले पुत्र का नाम था मधुच्छन्दा। इसलिये सभी पुत्र ‘मधुच्छन्दा’ के ही नाम से विख्यात हुए। विश्वामित्र जी ने भृगुवंशी अजीगर्त के पुत्र अपने भानजे शुनःशेप को, जिसका एक नाम देवरात भी था, पुत्ररूप में स्वीकार कर लिया और अपने पुत्रों से कहा कि ‘तुम लोग इसे अपना बड़ा भाई मानो’। यह वही प्रसिद्ध भृगुवंशी शुनःशेप था, जो हरिश्चंद्र के यज्ञ में यज्ञपशु के रूप में मोल लेकर लाया गया था। विश्वामित्र जी ने प्रजापति वरुण आदि देवताओं की स्तुति करके उसे पाशबन्धन से छुड़ा लिया था। देवताओं के यज्ञ में यही शुनःशेप देवताओं द्वारा विश्वामित्र जी को दिया गया था; अतः ‘देवैः रातः’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार गाधिवंश में यह तपस्वी देवरात के नाम से विख्यात हुआ। विश्वामित्र जी के पुत्रों में जो बड़े थे, उन्हें शुनःशेप को बड़ा भाई मानने की बात अच्छी न लगी। इस पर विश्वामित्र जी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि ‘दुष्टों! तुम सब म्लेच्छ हो जाओ’। इस प्रकार जब उनचास भाई म्लेच्छ हो गये, तब विश्वामित्र जी के बिचले पुत्र मधुच्छन्दा ने अपने से छोटे पचासों भाइयों के साथ कहा- ‘पिताजी! आप हम लोगों को जो आज्ञा करते हैं, हम उसका पालन करने के लिये तैयार हैं’। यह कहकर मधुच्छन्दा ने मन्त्रद्रष्टा शुनःशेप को बड़ा भाई स्वीकार कर लिया और कहा कि ‘हम सब तुम्हारे अनुयायी-छोटे भाई हैं।’ तब विश्वामित्र जी ने अपने इन आज्ञाकारी पुत्रों से कहा- ‘तुम लोगों ने मेरी बात मानकर मेरे सम्मान की रक्षा की है, इसलिये तुम लोगों-जैसे सुपुत्र प्राप्त करके मैं धन्य हुआ। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम्हें भी सुपुत्र प्राप्त होंगे। मेरे प्यारे पुत्रों! यह देवरात शुनःशेप भी तुम्हारे ही गोत्र का है। तुम लोग इसकी आज्ञा में रहना।’ परीक्षित! विश्वामित्र जी के अष्टक, हारीत, जय और क्रतुमान आदि और भी पुत्र थे। इस प्रकार विश्वामित्र जी की सन्तानों से कौशिक गोत्र में कई भेद हो गये और देवरात को बड़ा भाई मानने के कारण उसका प्रवर ही दूसरा हो गया। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 198 स्कन्ध - 09 अध्याय - 15 इस अध्याय में:- ऋचीक, जमदग्नि और परशुराम जी का चरित्र श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! उर्वशी के गर्भ से पुरुरवा के छः पुत्र हुए- आयु, श्रुतायु, सत्यायु, रय, विजय और जय। श्रुतायु का पुत्र था वसुमान्, सत्यायु का श्रुतंजय, रय का एक और जय का अमित। विजय का भीम, भीम का कांचन, कांचन का होत्र और होत्र का पुत्र था जह्नु। ये जह्नु वही थे, जो गंगा जी को अपनी अंजलि में लेकर पी गये थे। जह्नु का पुत्र था पूरु, पूरु का बलाक और बलाक का अजक। अजक का कुश था। कुश के चार पुत्र थे- कुशाम्बु, तनय, वसु और कुशनाभ। इनमें से कुशाम्बु के पुत्र गाधि हुए। परीक्षित! गाधि की कन्या का नाम था सत्यवती। ऋचीक ऋषि ने गाधि से उनकी कन्या माँगी। गाधि ने यह समझकर कि ये कन्या के योग्य वर नहीं है, ऋचीक से कहा- ‘मुनिवर! हम लोग कुशिक वंश के हैं। हमारी कन्या मिलनी कठिन है। इसलिये आप एक हजार ऐसे घोड़े लाकर मुझे शुल्क रूप में दीजिये, जिनका सारा शरीर तो श्वेत हो, परन्तु एक-एक कान श्याम वर्ण का हो’। जब गाधि ने यह बात कही, तब ऋचीक मुनि उनका आशय समझ गये और वरुण के पास जाकर वैसे ही घोड़े ले आये तथा उन्हें देकर सुन्दरी सत्यवती से विवाह कर लिया। एक बार महर्षि ऋचीक से उनकी पत्नी और सास दोनों ने ही पुत्र प्राप्ति के लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीक ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनों के लिये अलग-अलग मन्त्रों से चरु पकाया और स्नान करने के लिये चले गये। सत्यवती की माँ ने यह समझकर कि ऋषि ने अपनी पत्नी के लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा, उससे वह चरु माँग लिया। इस पर सत्यवती ने अपना चरु तो माँ को दे दिया और माँ का चरु स्वयं खा गयी। जब ऋचीक मुनि को इस बात का पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती से कहा कि ‘तुमने बड़ा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगों को दण्ड देने वाला घोर प्रकृति का होगा और तुम्हारा भाई एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता’। सत्यवती ने ऋचीक मुनि को प्रसन्न किया और प्रार्थना की कि ‘स्वामी! ऐसा नहीं होना चाहिये।' तब उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है। पुत्र के बदले तुम्हारा पौत्र वैसा (घोर प्रकृति का) होगा।’ समय पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। सत्यवती समस्त लोकों को पवित्र करने वाली परमपुण्यमयी ‘कौशिकी’ नदी बन गयी। रेणु ऋषि की कन्या थी रेणुका। जमदग्नि ने उसका पाणिग्रहण किया। रेणुका के गर्भ से जमदग्नि ऋषि के वसुमान् आदि कई पुत्र हुए। उनमें से सबसे छोटे परशुराम जी थे। उनका यश सारे संसार में प्रसिद्ध है। कहते हैं कि हैहय वंश का अन्त करने के लिये स्वयं भगवान ने ही परशुराम के रूप में अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया। यद्यपि क्षत्रियों ने उनका थोडा-सा ही अपराध किया था-फिर भी वे लोग बड़े दुष्ट, ब्राह्मणों के अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारण था कि वे पृथ्वी के भार हो गये थे और इसी के फलस्वरूप भगवान परशुराम ने उनका नाश करके पृथ्वी का भार उतार दिया। राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन्! अवश्य ही उस समय के क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये थे; परन्तु उन्होंने परशुराम जी का ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया, जिसके कारण उन्होंने बार-बार क्षत्रियों के वंश का संहार किया? श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! उन दिनों हैहय वंश का अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकार की सेवा-शुश्रूषा करके भगवान नारायण के अंशावतार दत्तात्रेय जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई शत्रु यद्ध में पराजित न कर सके-यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियों का अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपा से प्राप्त कर लिये थे। वह योगेश्वर हो गया था। उसमें ऐसा ऐश्वर्य था कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, स्थूल-से-स्थूल रूप धारण कर लेता। सभी सिद्धियाँ उसे प्राप्त थीं। वह संसार में वायु की तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता। एक बार गले में वैजयन्ती माला पहने सहस्रबाहु अर्जुन बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियों के साथ नर्मदा नदी में जल-विहार कर रहा था। उस समय मदोन्मत्त सहस्रबाहु ने अपनी बाँहों से नदी का प्रवाह रोक दिया। दशमुख रावण का शिविर भी वहीं कहीं पास में था। नदी की धारा उलटी बहने लगी, जिससे उसका शिविर डूबने लगा। रावण अपने को बहुत बड़ा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्रार्जुन का यह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ। जब रावण सहस्राबाहु अर्जुन के पास जाकर बुरा-भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियों के सामने ही खेल-खेल में रावण को पकड़ लिया और अपनी राजधानी माहिष्मती में जाकर बंदर के समान कैद कर लिया। पीछे पुलस्त्य जी के कहने से सहस्राबाहु ने रावण को छोड़ दिया। एक दिन सहस्रबाहु अर्जुन शिकार खेलने के लिये बड़े घोर जंगल में निकल गया था। दैववश वह जमदग्नि मुनि के आश्रम पर जा पहुँचा। परम तपस्वी जमदग्नि मुनि के आश्रम में कामधेनु रहती थी। उसके प्रताप से उन्होंने सेना, मन्त्री और वाहनों के साथ हैहयाधिपति का खूब स्वागत-सत्कार किया। वीर हैहयाधिपति ने देखा कि जमदग्नि मुनि का ऐश्वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कार को कुछ भी आदर न देकर कामधेनु को ही ले लेना चाहा। उसने अभिमानवश जमदग्नि मुनि से माँगा भी नहीं, अपने सेवकों को आज्ञा दी कि कामधेनु को छीन ले चलो। उसकी आज्ञा से उसके सेवक बछड़े के साथ ‘बाँ-बाँ’ डकराती हुई कामधेनु को बलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये। जब वे सब चले गये, तब परशुराम जी आश्रम पर आये और उसकी दुष्टता का वृतान्त सुनकर चोट खाये हुए साँप की तरह क्रोध से तिलमिला उठे। वे अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े वेग से उसके पीछे दौड़े-जैसे कोई किसी से न दबने वाला सिंह हाथी पर टूट पड़े। सहस्राबाहु अर्जुन अभी अपने नगर में प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुराम जी महाराज बड़े वेग से उसी की ओर झपटे आ रहे हैं। उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी। वे हाथ में धनुष-बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीर पर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्य की किरणों के समान चमक रही थीं। उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग, बाण, ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधों से सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियों से युक्त अत्यन्त भयंकर सहस्र अक्षौहिणी सेना भेजी। भगवान् परशुराम ने बात-की-बात में अकेले ही उस सारी सेना को नष्ट कर दिया। भगवान् परशुराम जी की गति मन और वायु के समान थी। बस, वे शत्रु की सेना काटते ही जा रहे थे। जहाँ-जहाँ वे अपने फरसे का प्रहार करते, वहाँ-वहाँ सारथि और वाहनों के साथ बड़े-बड़े वीरों की बाँहें, जाँघें और कंधे कट-कटकर पृथ्वी पर गिरते जाते थे। हैहयाधिपति अर्जुन ने देखा कि मेरी सेना के सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल भगवान् परशुराम के फरसे और बाणों से कट-कटकर खून से लथपथ रणभूमि में गिर गये हैं, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़ने के लिये आ धमका। उसने एक साथ ही अपनी हजार भुजाओं से पाँच सौ धनुषों पर बाण चढ़ायें और परशुराम जी पर छोड़े। परन्तु परशुराम जी तो समस्त शस्त्रधारियों के शिरोमणि ठहरे। उन्होंने अपने एक धनुष पर छोड़े हुए बाणों से ही एक साथ सबको काट डाला। अब हैहयाधिपति अपने हाथों से पहाड़ और पेड़ उखाड़कर बड़े वेग से युद्धभूमि में परशुराम जी की ओर झपटा। परन्तु परशुराम जी ने अपनी तीखी धार वाले फरसे से बड़ी फुर्ती के साथ उसकी साँपों के समान भुजाओं को काट डाला। जब उसकी बाँहें कट गयीं, तब उन्होंने पहाड़ की चोटी की तरह उसका ऊँचा सिर धड़ से अलग कर दिया। पिता के मर जाने पर उसके दस हजार लड़के डरकर भाग गये। परीक्षित! विपक्षी वीरों के नाशक परशुराम जी ने बछड़े के साथ कामधेनु लौटा ली। वह बहुत ही दुःखी हो रही थी। उन्होंने उसे अपने आश्रम पर लाकर पिताजी को सौंप दिया और माहिष्मती में सहस्रबाहु ने तथा उन्होंने जो कुछ किया था, सब अपने पिताजी तथा भाइयों को कह सुनाया। सब कुछ सुनकर जमदग्नि मुनि ने कहा- ‘हाय, हाय, परशुराम! तुमने बड़ा पाप किया। राम, राम! तुम बड़े वीर हो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेव का तुमने व्यर्थ ही वध किया। बेटा! हम लोग ब्राह्मण हैं। क्षमा के प्रभाव से ही हम संसार में पूजनीय हुए हैं। और तो क्या, सबके दादा ब्रह्मा जी भी क्षमा के बल से ही ब्रह्मपद को प्राप्त हुए हैं। ब्राह्मणों की शोभा क्षमा के द्वारा ही सूर्य की प्रभा के समान चमक उठती है। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि भी क्षमावानों पर ही शीघ्र प्रसन्न होते हैं। बेटा! सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी बढ़कर है। जाओ, भगवान् का स्मरण करते हुए तीर्थों का सेवन करके अपने पापों को धो डालो’। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 197 स्कन्ध - 09 अध्याय - 14 इस अध्याय में:- चन्द्र वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अब मैं तुम्हें चन्द्रमा के पावन वंश का वर्णन सुनाता हूँ। इस वंश में पुरुरवा आदि बड़े-बड़े पवित्र कीर्ति राजाओं का कीर्तन किया जाता है। सहस्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि-सरोवर के कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र हुए अत्रि। वे अपने गुणों के कारण ब्रह्मा जी के समान ही थे। उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। उन्होंने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया। देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे कि उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानवों में घोर संग्राम छिड़ गया। शुक्राचार्य जी ने बृहस्पति जी के द्वेष से असुरों के साथ चन्द्रमा का पक्ष ले लिया और महादेव जी ने स्नेहवश समस्त भूतगणों के साथ अपने विद्यागुरु अंगिरा जी के पुत्र बृहस्पति का पक्ष लिया। देवराज इन्द्र ने भी समस्त देवताओं के साथ अपने गुरु बृहस्पति जी का ही पक्ष लिया। इस प्रकार तारा के निमित्त से देवता और असुरों का संहार करने वाला घोर संग्राम हुआ। तदनन्तर अंगिरा ऋषि ने ब्रह्मा जी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पति जी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पति जी को यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- ‘दुष्टे! मेरे क्षेत्र में यह तो किसी दूसरे का गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तान की कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही’। अपने पति की बात सुनकर तारा अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोने के समान चमकता हुआ बालक अपने गर्भ से अलग कर दिया। उस बालक को देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाये। अब वे एक-दूसरे से इस प्रकार जोर-जोर से झगड़ा करने लगे कि ‘यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।’ ऋषियों और देवताओं ने तारा से पूछा कि ‘यह किसका लड़का है।’ परन्तु तारा ने लज्जावश कोई उत्तर न दिया। बालक ने अपनी माता की झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा- ‘दुष्टे! तू बतलाती क्यों नहीं? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र-से-शीघ्र बतला दे’। उसी समय ब्रह्मा जी ने तारा को एकान्त में बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब तारा ने धीरे से कहा कि ‘चन्द्रमा का।’ इसलिये चन्द्रमा ने उस बालक को ले लिया। परीक्षित! ब्रह्मा जी ने उस बालक का नाम रखा ‘बुध’, क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमा को बहुत आनन्द हुआ। परीक्षित! बुध के द्वारा इला के गर्भ से पुरुरवा का जन्म हुआ। इसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। एक दिन इन्द्र की सभा में देवर्षि नारद जी पुरुरवा के रूप, गुण, उदारता, शील-स्वभाव, धन-सम्पत्ति और पराक्रम का गान कर रहे थे। उन्हें सुनकर उर्वशी के हृदय में कामभाव का उदय हो आया और उससे पीड़ित होकर वह देवांगना पुरुरवा के पास चली आयी। यद्यपि उर्वशी को मित्रावरुण के शाप से ही मृत्यु लोक में आना पड़ा था, फिर भी पुरुष शिरोमणि पुरुरवा मूर्तिमान् कामदेव के समान सुन्दर हैं-यह सुनकर सुर-सुन्दरी उर्वशी ने धैर्य धारण किया और वह उनके पास चली आयी। देवांगना उर्वशी को देखकर राजा पुरुरवा के नेत्र हर्ष से खिल उठे। उनके शरीर में रोमांच हो आया। उन्होंने बड़ी मीठी वाणी से कहा- राजा पुरुरवा ने कहा- 'सुन्दरी! तुम्हारा स्वागत है। बैठो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ? तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनों का यह विहार, अनन्त काल तक चलता रहे।' उर्वशी ने कहा- ‘राजन्! आप सौन्दर्य के मूर्तिमान् स्वरूप हैं। भला, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आप में आसक्त न हो जाये? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमण की इच्छा से अपना धैर्य खो बैठा है। राजन! जो पुरुष रूप-गुण आदि के कारण प्रशंसनीय होता है, वही स्त्रियों को अभीष्ट होता है। अतः मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी। परन्तु मेरे प्रेमी महाराज! मेरी एक शर्त है। मैं आपको धरोहर के रूप में भेंड़ के दो बच्चे सौंपती हूँ। आप इनकी रक्षा करना। वीरशिरोमणे! मैं केवल घी खाऊँगी और मैथुन के अतिरिक्त और किसी भी समय आपको वस्त्रहीन न देख सकूँगी।’ परममनस्वी पुरुरवा ने ‘ठीक है’-ऐसा कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली और फिर उर्वशी से कहा- ‘तुम्हारा यह सौन्दर्य अद्भुत है। तुम्हारा भाव अलौकिक है। यह तो सारी मनुष्य सृष्टि को मोहित करने वाला है। और देवि! कृपा करके तुम स्वयं यहाँ आयी हो। फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो तुम्हारा सेवन न करेगा?' परीक्षित! तब उर्वशी कामशास्त्रोक्त पद्धति से पुरुषश्रेष्ठ पुरुरवा के साथ विहार करने लगी। वे भी देवताओं की विहारस्थली चैत्ररथ, नन्दनवन आदि उपवनों में उसके साथ स्वच्छन्द विहार करने लगे। देवी उर्वशी के शरीर से कमल-केसर की-सी सुगन्ध निकला करती थी। उसके साथ राजा पुरुरवा ने बहुत वर्षों तक आनन्द-विहार किया। वे उसके मुख की सुरभि से अपनी सुध-बुध खो बैठते थे। इधर जब इन्द्र ने उर्वशी को नहीं देखा, तब उन्होंने गन्धर्वों को उसे लाने के लिये भेजा और कहा- ‘उर्वशी के बिना मुझे यह स्वर्ग फीका जान पड़ता है’। वे गन्धर्व आधी रात के समय घोर अन्धकार में वहाँ गये और उर्वशी के दोनों भेड़ों को, जिन्हें उसने राजा के पास धरोहर रखा था, चुराकर चलते बने। उर्वशी ने जब गन्धर्वों द्वारा ले जाये जाते हुए अपने पुत्र समान प्यारे भेड़ों की ‘बें-बें’ सुनी, तब वह कह उठी कि ‘अरे, इस कायर को अपना स्वामी बनाकर मैं तो मारी गयी। यह नपुंसक अपने को बड़ा वीर मानता है। यह मेरे भेड़ों को भी न बचा सका। इसी पर विश्वास करने के कारण लुटेरे मेरे बच्चों को लूटकर लिये जा रहे हैं। मैं तो मर गयी। देखो तो सही, यह दिन में तो मर्द बनता है, और रात में स्त्रियों की तरह डरकर सोया रहता है’। परीक्षित! जैसे कोई हाथी को अंकुश से बेध डाले, वैसे ही उर्वशी ने अपने वचन-बाणों से राजा को बींध दिया। राजा पुरुरवा को बड़ा क्रोध आया और हाथ में तलवार लेकर वस्त्रहीन अवस्था में ही वे उस ओर दौड़ पड़े। गन्धर्वों ने उनके झपटते ही भेड़ों को तो वहीं छोड़ दिया और स्वयं बिजली की तरह चमकने लगे। जब राजा पुरुरवा भेड़ों को लेकर लौटे, तब उर्वशी ने उस प्रकाश में उन्हें वस्त्रहीन अवस्था में देख लिया। (बस, वह उसी समय उन्हें छोड़कर चली गयी)। परीक्षित! राजा पुरुरवा ने जब अपने शयनागार में अपनी प्रियतमा उर्वशी को नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका चित्त उर्वशी में ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोक से विह्वल हो गये और उन्मत्त की भाँति पृथ्वी में इधर-उधर भटकने लगे। एक दिन कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर उन्होंने उर्वशी और उसकी पाँच प्रसन्नमुखी सखियों को देखा और बड़ी मीठी वाणी से कहा- ‘प्रिये! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो। निष्ठुरे! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहरो; आओ हम दोनों कुछ बातें तो कर लें। देवि! अब इस शरीर पर तुम्हारा कृपा-प्रसाद नहीं रहा, इसी से तुमने इसे दूर फेंक दिया है। अतः मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेड़िये और गीध खा जायेंगे’। उर्वशी ने कहा- राजन! तुम पुरुष हो। इस प्रकार मत मरो। देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जायें। स्त्रियों की किसी के साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियों का हृदय और भेड़ियों का हृदय बिलकुल एक-जैसा होता है। स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता तो उनमें स्वाभाविक ही रहती है। तनिक-सी बात में चिढ़ जाती हैं और अपने सुख के लिये बड़े-बड़े साहस के काम कर बैठती हैं, थोड़े-से स्वार्थ के लिये विश्वास दिलाकर अपने पति और भाई तक को मार डालती हैं। इनके हृदय में सौहार्द तो है ही नहीं। भोले-भाले लोगों को झूठ-मूठ का विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं और नये-नये पुरुष की चाट से कुलटा और स्वच्छन्दचारिणी बन जाती हैं तो फिर तुम धीरज धरो। तुम राजराजेश्वर हो। घबराओ मत। प्रति एक वर्ष के बाद एक रात तुम मेरे साथ रहोगे। तब तुम्हारे और भी सन्तानें होंगी। राजा पुरुरवा ने देखा कि उर्वशी गर्भवती है, इसलिये वे अपनी राजधानी लौट आये। एक वर्ष के बाद फिर वहाँ गये। तब तक उर्वशी एक वीर पुत्र की माता हो चुकी थी। उर्वशी के मिलने से पुरुरवा को बड़ा सुख मिला और वे एक रात उसी के साथ रहे। प्रातःकाल जब वे विदा होने लगे, तब विरह के दुःख से वे अत्यन्त दीन हो गये। उर्वशी ने उनसे कहा- ‘तुम इन गन्धर्वों की स्तुति करो, ये चाहें तो तुम्हें मुझे दे सकते हैं।' तब राजा पुरुरवा ने गन्धर्वों की स्तुति की। परीक्षित! राजा पुरुरवा की स्तुति से प्रसन्न होकर गन्धर्वों ने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्निस्थापन करने का पात्र) दी। राजा ने समझा यही उर्वशी है, इसलिये उसको हृदय से लगाकर वे एक वन से दूसरे वन में घूमते रहे। जब उन्हें होश आया, तब वे स्थाली को वन में छोड़कर अपने महल लौट आये एवं रात के समय उर्वशी का ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ, तब उनके हृदय में तीनों वेद प्रकट हुए। फिर वे उस स्थान पर गये, जहाँ उन्होंने वह अग्निस्थाली छोड़ी थी। अब उस स्थान पर शमीवृक्ष के गर्भ में एक पीपल का वृक्ष उग आया था, उसे देखकर उन्होंने उससे दो अरणियाँ (मन्थन काष्ठ) बनायीं। फिर उन्होंने उर्वशी लोक की कामना से नीचे की अरणि को उर्वशी, ऊपर की अरणि को पुरुरवा और बीच के काष्ठ को पुत्ररूप से चिन्तन करते हुए अग्नि प्रज्वलित करने वाले मन्त्रों से मन्थन किया। उनके मन्थन से ‘जातवेदा’ नाम की अग्नि प्रकट हुई। राजा पुरुरवा ने अग्नि देवता को त्रयीविद्या के द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि-इन तीनों भागों में विभक्त करके पुत्ररूप से स्वीकार कर लिया। फिर उर्वशी लोक की इच्छा से पुरुरवा ने उन तीनों अग्नियों द्वारा सर्वदेवस्वरूप इन्द्रियातीत यज्ञपति भगवान श्रीहरि का यजन किया। परीक्षित! त्रेता के पूर्व सत्ययुग में एकमात्र प्रणव (ॐकार) ही वेद था। सारे वेद-शास्त्र उसी के अन्तर्भूत थे। देवता थे एकमात्र नारायण; और कोई न था। अग्नि भी तीन नहीं, केवल एक था और वर्ण भी केवल एक ‘हंस’ ही था। परीक्षित! त्रेता के प्रारम्भ में पुरुरवा से ही वेदत्रयी और अग्नित्रयी का आविर्भाव हुआ। राजा पुरुरवा ने अग्नि को सन्तान रूप से स्वीकार करके गन्धर्व लोक की प्राप्ति की। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ************************************************

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 196 स्कन्ध - 09 अध्याय - 13 इस अध्याय में:- राजा निमि के वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इक्ष्वाकु के पुत्र थे निमि। उन्होंने यज्ञ आरम्भ करके महर्षि वसिष्ठ को ऋत्विज के रूप में वरण किया। वसिष्ठ जी ने कहा कि ‘राजन! इन्द्र अपने यज्ञ के लिये मुझे पहले ही वरण कर चुके हैं। उनका यज्ञ पूरा करके मैं तुम्हारे पास आऊँगा। तब तक तुम मेरी प्रतीक्षा करना।’ यह बात सुनकर राजा निमि चुप ही रहे और वसिष्ठ जी इन्द्र का यज्ञ कराने चले गये। विचारवान निमि ने यह सोचकर कि जीवन तो क्षणभंगुर है, विलम्ब करना उचित न समझा और यज्ञ प्रारम्भ कर दिया। जब तक गुरु वसिष्ठ जी न लौटें, तब तक के लिये उन्होंने दूसरे ऋत्विजों को वरण कर लिया। गुरु वसिष्ठ जी जब इन्द्र का यज्ञ सम्पन्न करके लौटे तो उन्होंने देखा कि उनके शिष्य निमि ने उनकी बात न मानकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया है। उस समय उन्होंने शाप दिया कि ‘निमि को अपनी विचारशीलता और पांडित्य का बड़ा घमंड है, इसलिये इसका शरीरपात हो जाये’। निमि की दृष्टि में गुरु वसिष्ठ का यह शाप धर्म के अनुकूल नहीं, प्रतिकूल था। इसलिये उन्होंने भी शाप दिया कि ‘आपने लोभवश अपने धर्म का आदर नहीं किया, इसलिये आपका शरीर भी गिर जाये’। यह कहकर आत्मविद्या में निपुण निमि ने अपने शरीर का त्याग कर दिया। परीक्षित! इधर हमारे वृद्ध पितामह वसिष्ठ जी ने भी अपना शरीर त्यागकर मित्रावरुण के द्वारा उर्वशी के गर्भ से जन्म ग्रहण किया। राजा निमि के यज्ञ में आये हुए श्रेष्ठ मुनियों ने राजा के शरीर को सुगन्धित वस्तुओं में रख दिया। जब सत्रयाग की समाप्ति हुई और देवता लोग आये, तब उन लोगों ने उनसे प्रार्थना की- ‘महानुभावों! आप लोग समर्थ हैं। यदि आप प्रसन्न हैं तो राजा निमि का यह शरीर पुनः जीवित हो उठे।’ देवताओं ने कहा- ‘ऐसा ही हो।’ उस समय निमि ने कहा- ‘मुझे देह का बन्धन नहीं चाहिये। विचारशील मुनिजन अपनी बुद्धि को पूर्ण रूप से श्रीभगवान् में ही लगा देते हैं और उन्हीं के चरणकमलों का भजन करते हैं। एक-न-एक दिन यह शरीर अवश्य ही छूटेगा-इस भय से भीत होने के कारण वे इस शरीर का कभी संयोग ही नहीं चाहते; वे तो मुक्त ही होना चाहते हैं। अतः मैं अब दुःख, शोक और भय के मूल कारण इस शरीर को धारण करना नहीं चाहता। जैसे जल में मछली के लिये सर्वत्र ही मृत्यु के अवसर हैं, वैसे ही इस शरीर के लिये भी सब कहीं मृत्यु-ही-मृत्यु है’। देवताओं ने कहा- ‘मुनियों! राजा निमि बिना शरीर के ही प्राणियों के नेत्रों में अपनी इच्छा के अनुसार निवास करें। वे वहाँ रहकर सूक्ष्म शरीर से भगवान का चिन्तन करते रहें। पलक उठने और गिरने पर उनके अस्तित्व का पता चलता रहेगा। इसके बाद महर्षियों ने यह सोचकर कि ‘राजा के न रहने पर लोगों में अराजकता फैल जायेगी’ निमि के शरीर का मन्थन किया। उस मन्थन से एक कुमार उत्पन्न हुआ। जन्म लेने के कारण उसका नाम हुआ जनक। विदेह से उत्पन्न होने के कारण ‘विदेह’ और मन्थन से उत्पन्न होने के कारण उसी बालक का नाम ‘मिथिल’ हुआ। उसी ने मिथिलापुरी बसायी। परीक्षित! जनक का उदावसु, उसका नन्दिवर्धन, नन्दिवर्धन का सुकेतु, उसका देवरात, देवरात का बृहद्रथ, बृहद्रथ का महावीर्य, महावीर्य का सुधृति, सुधृति का धृष्टकेतु, धृष्टकेतु का हर्यश्व और उसका मरु नामक पुत्र हुआ। मरु से प्रतीपक, प्रतीपक से कृतिरथ, कृतिरथ से देवमीढ, देवमीढ से विश्रुत और विश्रुत से महाधृति का जन्म हुआ। महाधृति का कृतिराज, कृतिराज का महारोमा, महारोमा का स्वर्णरोमा और स्वर्णरोमा का पुत्र हुआ ह्रस्वरोमा। इसी ह्रस्वरोमा के पुत्र महाराज सीरध्वज थे। वे जब यज्ञ के लिये धरती जोत रहे थे, तब उनके सीर (हल) के अग्रभाव (फाल) से सीता जी की उत्पत्ति हुई। इसी से उनका नाम ‘सीरध्वज’ पड़ा। सीरध्वज के कुशध्वज, कुशध्वज के धर्मध्वज और धर्मध्वज के दो पुत्र हुए-कृतध्वज और मितध्वज। कृतध्वज के केशिध्वज और मितध्वज के खाण्डिक्य हुए। परीक्षित! केशिध्व्ज आत्मविद्या में बड़ा प्रवीण था। खाण्डिक्य था कर्मकाण्ड का मर्मज्ञ। वह केशिध्वज से भयभीत होकर भाग गया। केशिध्वज का पुत्र भानुमान और भानुमान का शतद्युम्न था। शतद्युम्न से शुचि, शुचि से सनद्वाज, सनद्वाज से ऊर्ध्वकेतु, ऊर्ध्वकेतु से अज, अज से पुरुजित, पुरुजित् से अरिष्टनेमि, अरिष्टनेमि से श्रुतायु, श्रुतायु से सुपार्श्वक, सुपार्श्वक से चित्ररथ और चित्ररथ से मिथिलापति क्षेमधि का जन्म हुआ। क्षेमधि से समरथ, समरथ से सत्यरथ, सत्यरथ से उपगुरु और उपगुरु से उपगुप्त नामक पुत्र हुआ। यह अग्नि का अंश था। उपगुप्त का वस्वनन्त, वस्वनन्त का युयुध, युयुध का सुभाषण, सुभाषण का श्रुत, श्रुत का जय, जय का विजय और विजय का ऋत नामक पुत्र हुआ। ऋत का शुनक, शुनक का वीतहव्य, वीतहव्य का धृति, धृति का बहुलाश्व, बहुलाश्व का कृति और कृति का पुत्र हुआ महावशी। परीक्षित! ये मिथिल के वंश में उत्पन्न सभी नरपति ‘मैथिल’ कहलाते हैं। ये सब-के-सब आत्मज्ञान से सम्पन्न एवं गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से मुक्त थे। क्यों न हो, याज्ञवल्क्य आदि बड़े-बड़े योगेश्वरों की इन पर महान कृपा जो थी। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 172 महाप्रभु का अदर्शन अथवा लीलासंवरण अद्यैव हसिंतं गीतं पठितं यै: शरीरिभि:। अद्यैव ते न दृश्यन्ते कष्टं कालस्य चेष्टितम्॥ महाभारत में स्थान-स्थान पर क्षात्रधर्म की निन्दा की गयी है। युद्ध में खड़ग लेकर जो क्षत्रिय अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियों का बात की बात में वध कर सकता है, ऐसे कठोर धर्म को धर्मराज युधिष्ठिर ऐसे महात्मा ने पर निन्द्य बताकर भी उसमें प्रवृत्त होने के लिये अपनी विवशता बतलायी है। किन्तु क्षात्र धर्म से भी कठोर और क्रूर कर्म हम-जैसे क्षुद्र लेखकों का है, जिनके हाथ में वज्र के समान बलपूर्वक लोहे की लेखनी दे दी जाती है और कहा जाता है कि उस महापुरुष की अदर्शन-लीला लिखो ! हाय ! कितना कठोर कर्म है, हृदय को हिला देने वाले इस प्रसंग का वर्णन हमसे क्यों कराया जाता है? कल तक जिसके मुखकमल को देखकर असंख्य भावुक भक्त भक्ति भागीरथी के शीतल और सुखकर सलिलरूपी आनन्द में विभोर होकर अवगाहन कर रहे थे, उनके नेत्रों के सामने वह आनन्दमय दृश्य हटा दिया जाय, यह कितना गर्हणीय काम होगा। हाय रे विधाता ! तेरे सभी काम निर्दयतापूर्ण होते हैं ! निर्दयी ! दुनियाभर की निर्दयता का ठेका तैने ही ले लिया है। भला, जिनके मनोहर चन्द्रवदन को देखकर हमारा मनकुमुद खिल जाता है, उसे हमारी आँखों से ओझल करने में तुझे क्या मजा मिलता है? तेरा इसमें लाभ ही क्या है? क्यों नही तू सदा उसे हमारे पास ही रहने देता। किन्तु कोई दयावान हो उससे तो कुछ कहा- सुना भी जाय, जो पहले से ही निर्दयी है, उससे कहना मानो अरण्य में रोदन करना है। हाय रे विधाता ! सचमुच लीलासंवरण के वर्णन के अधिकारी तो व्यास, वाल्मीकि ही हैं। इनके अतिरिक्त जो नित्य महापुरुषों की लीलासंवरण का उल्लेख करते हैं, वह उनकी अनधिकार चेष्टा ही है। महाभारत में जब अर्जुन की त्रिभुवनविख्यात शूरता, वीरता और युद्ध चातुर्य की बातें पढ़ते हैं तो पढते-पढते रोंगटे खड हो जाते हैं। हमारी आँखों के सामने लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले गाण्डीवधारी अर्जुन की वह विशाल और भव्य मूर्ति प्रत्यक्ष होकर नृत्य करने लगती है। उसी को जब श्रीकृष्ण के अदर्शन के अनन्तर आभीर और भीलों द्वारा लुटते देखते हैं, तो यह सब दृश्य-प्रपंच स्वप्नवत प्रतीत होने लगता है। तब यह प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है कि यह सब उस खिलाडी श्रीकृष्ण की खिलवाड है, लीला-प्रिय श्याम की ललित लीला के सिवा कुछ नहीं है। पाण्डवों की सच्चरित्रता, कष्टसहिष्णुता, शूरता, कार्यदक्षता, पटुता, श्रीकृष्णप्रियता आदि गुणों को पढ़ते हैं तब रोंगटे खड़े हो जाते हैं, हृदय उनके लिये भर आता है, किन्तु उन्हें ही जब हिमालय में गलते हुए देखते हैं तो छाती फटने लगती है। सबसे पहले द्रौपदी बर्फ में गिर जाती है। उस कौमलांगी अबला को बर्फ में ही बिलबिलाती छोड़कर धर्मराज आगे बढ़ते हैं। वे मुड़कर भी उसकी ओर नहीं देखते। फिर प्यारे नकुल-सहदेव गिर पड़ते हैं। धर्मराज उसी प्रकार दृढ़तापूर्वक बर्फ पर चढ़ रहे हैं। हाय, गजब हुआ। जिस भीम के पराक्रम से यह सप्तद्वीपा वसुमती प्राप्त हुई थी। वह भी बर्फ में पैर फिसलने से गिर पड़ और तड़पने लगा। किन्तु युधिष्ठिर किसकी सुनते हैं, वे आगे बढे ही जा रहे हैं। अब वह हृदयविदारक दृश्य आया। जिसके नाम से मनुष्य तो क्या स्वर्ग के देवता थर-थर कांपते थे, वह गाण्डीव धुनषधारी अर्जुन मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और हा तात ! कहकर चीत्कार मारने लगा, किन्तु धर्मराज ने मुड़कर भी उनकी ओर नहीं देखा ! सचमुच स्वर्गारोहण पर्व को पढ़ते-पढ़ते रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कैसा भी वज्रहृदय क्यों न हो बिना रोये न रहेगा। जब मुझ-जैसे कठोर हृदय वाले की आँखों से भी अश्रुविन्द निकल पड़े तब फिर सहृदय पाठकों की तो बात ही क्या? इसी प्रकार जब वाल्मीकीय रामायण में, श्री राम की सुकुमारता, ब्राह्मणप्रियता, गुरुभक्ति, शूरता और पितृभक्ति की बातें पढ़ते तो हृदय भर आता है। सीता जी के प्रति उनका कैसा प्रगाढ़ प्रेम था। हाय ! जिस समय कामान्ध रावण जनकनन्दिनी को चुरा ले गया, तब उन मर्यादापुरुषोत्तम की भी मर्यादा टूट गयी। वे अकेली जानकी के पीछे विश्वब्रह्माण्ड को अपने अमोघ बाण के द्वारा भस्म करने को उद्यत हो गये। उस समय उनका प्रचण्ड क्रोध, दुर्धर्ष तेज और असहनीय रोष देखते ही बनता था। दूसरे ही क्षण वे साधारण कामियों की भाँति रो-रोकर लक्ष्मण से पूछने लगते– ‘भैया ! मैं कौन हूँ? तुम कौन हो, हम यहाँ क्यों फिर रहे हैं? सीता कौन है, हा सीते ! हा प्राणवल्लभे ! तू कहाँ चली गयी ?’ ऐसा कहते-कहते बेहोश होकर गिर पड़ते हैं। उनके अनुज ब्रह्मचारी लक्षमण जी बिना खाये-पीये और भूख-नींद का परित्याग किये छाया की तरह उनके पीछे-पीछे फिरते हैं और जहाँ श्रीराम का एक बूँद पसीना गिरता है, वहीं वे अपने कलेजे को काटकर उसका एक प्याला खून निकालकर उससे उसे स्वेद-विन्दु को धोते हैं। उन्हीं लक्ष्मण का जब श्री रामचन्द्र जी ने छद्मवेषधारी यमराज के कहने से परित्याग कर दिया और वे श्री राम के प्यारे भाई सुमित्रानन्दन महाराज दशरथ के प्रिय पुत्र सरयू नदी में निमग्न कर अपने प्राणों को खोते हैं तो हृदय फटने लगता है। उससे भी अधिक करुणापूर्ण तो यह दृश्य है कि जब श्री रामचन्द्र जी भी अपने भाइयों के साथ उसी प्रकार सरयू में शरीर को निमग्न कर अपने नित्यधाम को पधारते हैं। सचमुच इन दोनों महाकवियों ने इन करुणापूर्ण प्रसंग को लिखकर करुणा की एक अविच्छिन्न धारा बहा दी है, जो इन ग्रन्थों के पठन करने वालों के नेत्र-जल से सदा बढ़ती ही रहती है। महाभारत और रामायण के ये दो स्थल मुझे अत्यन्त प्रिय हैं, इन्हीं हृदयविदारक प्रकरणों को जब पढ़ता हूँ तभी कुछ हृदय पसीजता है और श्रीराम-कृष्ण की लीलाओं की कुछ-कुछ झलक सी दिखायी देने लगती है। यह हम-जैसे नीरस हृदय वालों के लिये है। जो भगवत्कृपा पात्र हैं, जिनके हृदय कोमल हैं, जो सरस हैं, भावुक है, प्रेमी हैं और श्रीराम-कृष्ण के अनन्य उपासक हैं, उन सबके लिये तो ये प्रकरण अत्यन्त ही असह्य हैं। उनके मत में तो श्रीराम-कृष्ण का कभी अदर्शन हुआ ही नहीं, वे नित्य हैं, शाश्वत हैं। आत्मा से नहीं, वे शरीर से भी अभी ज्यों-के-त्यों ही विराजमान हैं। इसीलिये श्रीमद्वाल्मीकीय के पारायण में उत्तरकाण्ड छोड़ दिया जाता है। वैष्णवगण राजगद्दी होने पर ही रामायण की समाप्ति समझते हैं और वही रामायण का नवाह समाप्त हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने तो इस प्रकरण को एकदम छोड़ ही दिया है। भला, वे अपनी कोमल और भक्तिभरी लेखनी से सीता माता का परित्याग, उनका पृथ्वी में समा जाना और गुप्तारघाट पर रामानुज लक्ष्मण का अन्तर्धान हो जाना इन हृदयविदारक प्रकरणों को कैसे लिख सकते थे। इसी प्रकार श्री चैतन्य चरित्र-लेखकों ने श्री श्रीचैतन्य की अन्तिम अदर्शन लीला का वर्णन नहीं किया है। सभी इस विषय में मौन ही रहे हैं। हाँ, ‘चैतन्यमंगल’ कार ने कुछ थोसा-सा वर्णन अवश्य किया है, सो अदर्शन की दृष्टि से नहीं। उसमें श्री चैतन्य देव के सम्बन्ध की सब करामाती, अलौकिक चमत्कारपूर्ण घटनाओं का ही वर्णन किया गया है। इसीलिये उनका शरीर साधारण लोगों की भाँति शान्त नहीं हुआ, इसी दृष्टि से अलौकिक घटना ही समझकर उसका वर्णन किया गया है। नहीं तो सभी वैष्णव इस दु:खदायी प्रसंग को सुनना नहीं चाहते। कोमल प्रकृति के वैष्णव भला इसे सुन ही कैसे सकते हैं? इसीलिये एक भौतिक घटनाओं को ही सत्य और इतिहास मानने वाले महानुभाव ने लिखा है कि ‘श्रीचैतन्यदेव के भक्तों की अन्धभक्ति ने श्री चैतन्य देव की मृत्यु के सम्बन्ध में एकदम पर्दा डाल दिया है।’ उन भोले भाई को यह पता नहीं कि चैतन्य तो नित्य हैं। भला चैतन्य की भी कभी मृत्यु हो सकती है। जिस प्रकार अग्नि कभी नहीं बुझती उसी प्रकार चैतन्य भी कभी नहीं मरते। अज्ञानी पुरुष ही इन्हें बुझा और मरा हुआ समझते हैं। अग्नि तो सर्वव्यापक है, विश्व उसी के ऊपर अवलम्बित है। संसार से अग्नितत्त्व निकाल दीजिये। उसी क्षण प्रलय हो जाय। शरीर के पेट की अग्नि को शान्त कर दीजिये उसी क्षण शरीर ठंडा हो जाय। सर्वव्यापक अग्नि के ही सहारे यह विश्व खड़ा है। वह हमें इन चर्म-चक्षुओं से सर्वत्र प्रत्यक्ष नहीं दीखती। दो लकडियों को घिसिये, अग्नि प्रत्यक्ष हो जायेगी। इसी प्रकार चैतन्य सर्वत्र व्यापक हैं। त्याग, वैराग्य और प्रेम का अवलम्बन कीजिये, चैतन्य प्रत्यक्ष होकर ऊपर को हाथ उठा-उठाकर नृत्य करने लगेंगे। जिसका जीवन अग्निमय हो, जो श्रीकृष्ण प्रेम में छटपटाता-सा दृष्टिगोचर होता हो, जिसके शरीर में त्याग, वैराग्य और प्रेम ने घर बना लिया हो, जो दूसरों की निन्दा और दोष-दर्शन से दूर रहता हो वहाँ समझ लो कि श्री चैतन्य यहाँ प्रत्यक्ष प्रकट हो गये हैं। यदि सचमुच चैतन्य के दर्शन करने के तुम उत्सुक हो तो इन्हीं स्थानों में चैतन्य के दर्शन हो सकेंगे। किन्तु ये सब बातें तो ज्ञान की हैं। भक्त को इतना अवकाश कहाँ कि वह इन ज्ञानगाथाओं को श्रवण करे। वह तो श्री चैतन्य–चरित्र ही सुनना चाहता है। उसमें इतना पुरुषार्थ कहाँ ? उसका पुरुषार्थ तो इतना ही है कि भक्तरूप में या भगवान रूप में श्रीकृष्ण ने जो-जो लीलाएं की हैं उन्हीं को बार-बार सुनना चाहता है। उसकी इच्छा नहीं कि सभी लीलाओं को सुन ले। श्रीकृष्ण की सभी लीलाओं का पार तो वे स्वयं ही नहीं जानते फिर दूसरा कोई तो जान ही क्या सकता है? भक्त तो चाहता है, चाहे कूप से ला दो या घड़े से हमारी तो एक लोटे की प्यास है, नदी से लाओगे तो भी एक ही लोटा पीवेंगे और घड़े से दोगे तो भी उतना ही। समुद्र में से लाओ तो सम्भव है, हमसे पिया भी न जाय। क्योंकि उसका पान तो कोई अगस्त्य-जैसे महापुरुष ही कर सकते हैं। इसलिये भावुक भक्त सद श्रीकृष्ण और उनके दूसरे स्वरूप श्रीकृष्ण-भक्तों की ही लीलाओं का श्रवण करते रहते हैं। उनका कोमल हृदय इन अप्रकट और अदर्शन लीलाओं का श्रवण नहीं कर सकता, क्योंकि शिरीषकुसुम के समान, छुई-मुई के पत्तों के समान उनका शीघ्र ही द्रवित हो जाने वाला हृदय होता है। यह बात भी परम भावुक भक्तों की है; किन्तु हम-जैसे वज्र के समान हृदय रखने वाले पुरुष क्या करें? भक्त का तो लक्षण ही यह है कि भगवन्नाम के श्रवणमात्र से चन्द्रकान्तमणि के समान उसके दोनों नेत्र बहने लगें। आंसू ही भक्त का आभूषण है, आंसू में ही श्रीकृष्ण छिपे रहते हैं। जिस आँख में आंसू नहीं वहाँ श्रीकृष्ण नहीं। तब हम कैसे करें, हमारी आँखों में तो आंसू आते ही नहीं। हां, ऐसे-ऐसे हृदयविदारक प्रकरणों को कभी पढ़ते हैं तो दो-चार बूँदें आप से आप ही निकल पड़ती हैं, इसलिये भक्तों को कष्ट देने के निमित्त नहीं, अपनी आँखों को पवित्र करने के निमित्त, अपने वज्र के समान हृदय को पिघलाने के निमित्त हम यहाँ अति संक्षेप में श्री चैतन्यदेव के अदर्शन का यत्किंचित वृत्तान्त लिखते हैं। चौबीस वर्ष नवद्वीप में रहकर गृहस्थाश्रम में और चौबीस वर्ष संन्यास लेकर पुरी आदि तीर्थों में प्रभु ने बिताये। संन्यास लेकर छ: वर्षों तक आप तीर्थों में भ्रमण करते रहे और अन्त में अठारह वर्षों तक अचल जगन्नाथजी के रूप में पुरी में रहे। बारह वर्षों तक निरन्तर दिव्योन्माद की दशा में रहे। उसका यत्किंचित आभास पाठकों को पिछले प्रकरणों में मिल चुका है। जिन्होंने प्रार्थना करके प्रभु को बुलाया था उन्होंने ही अब पहेली भेजकर गौरहाट उठाने की अनुमति दे दी। इधर स्नेहमयी शचीमाता भी इस संसार को त्यागकर परलोकवासिनी बन गयीं। चैतन्य महाप्रभु जिस कार्य के लिये अवतरित हुए थे, वह कार्य भी सुचारुरीति से सम्पन्न हो गया। अब उन्होंने लीलासंवरण करने का निश्चय कर लिया। उनके अन्तरंग भक्त तो प्रभु के रंग-ढंग को ही देखकर अनुमान लगा रहे थे कि प्रभु अब हमसे ओझल होना चाहते हैं। इसलिये वे सदा सचेष्ट ही बने रहते थे। शाके 1455 (संवत 1590, ई. सन 1533) का आषाढ़ महीना था। रथ यात्रा का उत्सव देखने के निमित्त गौड़ देश से कुछ भक्त आ गये थे। महाप्रभु आज अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यधिक गम्भीर थे। भक्तों ने इतनी अधिक गम्भीरता उनके जीवन में कभी नहीं देखी। उनके ललाट से एक अद्भुत तेज-सा निकल रहा था, अत्यन्त ही दत्तचित्त होकर प्रभु स्वरूप गोस्वामी के मुख से श्रीकृष्ण कथा श्रवण कर रहे थे। सहसा वे वैसे ही जल्दी से उठकर खडे हो गये और जल्दी से अकेले ही श्रीजगन्नाथजी के मन्दिर की ओर दौडने लगे। भक्तों को परम आश्चर्य हुआ। महाप्रभु इस प्रकार अकेले मन्दिर की ओर कभी नहीं जाते थे, इसलिये भक्त भी पीछे-पीछे प्रभु के पादपद्मों का अनुसण करते हुए दौड़ने लगे। आज महाप्रभु अपने नित्य के नियमित स्थान पर गरुडस्तम्भ के समीप नहीं रुके, वे सीधे मन्दिर के दरवाजे के समीप चले गये। सभी परम विस्मित-से हो गये। महाप्रभु ने एक बार द्वार पर से ही उछककर श्रीजगन्नाथ जी की ओर देखा और फिर जल्दी से आप मन्दिर में घुस गये। महान आश्चर्य ! अघटित घटना ! ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। मन्दिर के सभी कपाट अपने-आप बंद हो गये, महाप्रभु अकेले ही मन्दिर के भीतर थे। सभी भक्तगण चुपचाप दरवाजे पर खड़े इस अलौकिक दृश्य को उत्सुकता के साथ देख रहे थे। गुंजाभवन में एक पूजा करने वाले भाग्यवान पुजारी प्रभु की इस अन्तिम लीला को प्रत्यक्ष देख रहे थे। उन्होंने देखा, महाप्रभु जगन्नाथ जी के सम्मुख हाथ जोड़े खड़े हैं और गद्गदकण्ठ से प्रार्थना कर रहे हैं– ‘हे दीनवत्सल प्रभो! हे दयामय देव ! हे जगत्पिता जगन्नाथ देव ! सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि–इन चारों युगों में कलियुग का एकमात्र धर्म श्रीकृष्ण संकीर्तन ही है। हे नाथ! आप अब जीवों पर ऐसी दया कीजिये कि वे निरन्तर आपके सुमधुर नामों का सदा कीर्तन करते रहें। प्रभो ! अब घोर कलियुग आ गया है, इसमें जीवों को आपके चरणों के सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं। इन अनाश्रित जीवों पर कृपा करके अपने चरण कमलों का आश्रय प्रदान कीजिये।’ बस, इतना कहते-कहते प्रभु ने श्री जगन्नाथ जी के श्री विग्रह को आलिंगन किया और उसी क्षण आप उसमें लीन हो गये। पुजारी जल्दी से यह कहता हुआ– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं, दयालो ! यह आपकी कैसी लीला है, जल्दी से प्रभु को पकड़़ने के लिये दौड़़ा ! किन्तु प्रभु अब वहाँ कहाँ ! वे तो अपने असली स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये। पुजारी मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और ‘हा देव ! हे प्रभो ! हे दयालो ! कहकर जोरों से चीत्कार करने लगा। द्वार पर खड़े हुए भक्तों ने पुजारी का करुण क्रन्दन सुनकर जल्दी से किवाड़ खोलने को कहा, किन्तु पुजारी को होश कहाँ ! जैसे-तैसे बहुत कहने-सुनने पर पुजारी ने किवाड़ खोले। भक्तों ने मन्दिर में प्रवेश किया और प्रभु को वहाँ न देखकर अधीर होकर वे पूछने लगे– ‘प्रभु कहाँ हैं? पुजारी ने लड़खड़ती हुई वाणी में रुक-रुककर सारी कहानी कह सुनायी। सुनते ही भक्तों की जो दशा हुई, उसका वर्णन यह काले मुख की लेखनी भला कैसे कर सकती है ? भक्त पछाड़ खा-खाकर गिरने लगे, कोई दीवार से सिर रगड़ने लगा। कोई पत्थर से माथा फोड़ने लगा। कोई रोते-रोते धूलि में लोटने लगा। स्वरूप गोस्वामी तो प्रभु के बाहरी प्राण ही थी। वे प्रभु के वियोग को कैसे सह सकते थे। वे चुपचाप स्तम्भित भाव से खड़े रहे। उनके पैर लड़खड़ाने लगे। भक्तों ने देखा उनके मुंह से कुछ धुँआं-सा निकल रहा है। उसी समय फट से आज हुई। स्वरूप गोस्वामी का हृदय फट गया और उन्होंने भी उसी समय प्रभु के ही पथ का अनुसरण किया। भक्तों को जगन्नाथ पुरी अब उजड़ी हुई नगरी-सी मालूम हुई। किसी ने तो उसी समय समुद्र में कूदकर प्राण गँवा दिये। किसी ने कुछ किया और बहुत-से पुरी को छोड़कर विभिन्न स्थानों में चले गये। पुरी से अब गौराहट उठ गयी। वक्रेश्वर पण्डित ने फिर उसे जमाने की चेष्टा की, किन्तु उसका उल्लेख करना विषयान्तर हो जायगा। किसी के जमाने में हाट थोडे ही जमती है, लाखों मठ हैं और उनके लाखों ही पैर पुजाने वाले महन्त हैं, उनमें वह चैतन्यता कहाँ। साँप निकल गया, पीछे से लकीर को पीटते रहो। इससे क्या? इस प्रकार अड़तालीस वर्षों तक इस धराधाम पर प्रेमरूपी अमृत की वर्षा करने के पश्चात महाप्रभु अपने सत्वस्वरूप में जाकर अवस्थित हो गये। बोलो प्रेमावतार श्री चैतन्य देव की जय ! बोलो उनके सभी प्रियपार्षदों की जय ! बोलो भगवन्नाम प्रचारक श्री गौरचन्द्र की जय ! नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्। प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्।। ‘जिनके नाम का सुमधुर संकीर्तन सर्व पापों को नाश करने वाला है और जिनको प्रणाम करना सकल दु:खों को नाश करने वाला है उन सर्वोत्तम श्रीहरि के पादपद्मों में मैं प्रणाम करता हूँ।’ श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 171 समुद्रपतन और मृत्युदशा शरज्ज्योत्स्नासिन्धोरवकलनया जातयमुना भ्रमाद्धावन् योऽस्मिन् हरिविरहतापार्णव इव। निमग्नो मूर्च्छात: पयसि निवसन् रात्रिमखिलां प्रभाते प्राप्त: स्वैरवतु से शचीसुनुरिह न:॥ सर्वशास्त्रों में श्रीमद्भावगत श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत में भी दशम स्कन्ध सर्वश्रेष्ठ हैं, दशम स्कन्ध में भी पूर्वार्ध श्रेष्ठ है और पूर्वार्ध में भी रासपंचाध्यायी सर्वश्रेष्ठ है और रासपंचाध्यायी में भी ‘गोपी-गीत’ अतुलनीय है। उसकी तुलना किसी से की ही नहीं जा सकती, वह अनुपमेय है। उसे उपमा भी दे तो किसकी दें। उससे श्रेष्ठ या उसके समान संसार में कोई गीत है ही नहीं। महाप्रभु को भी रासपंचाध्यायी ही अत्यन्त प्रिय थी। वे सदा रासपंचाध्यायी के ही श्लोकों को सुना करते थे और भावावेश में उन्हीं भावों का अनुकरण भी किया करते थे। एक दिन राय रामानन्द जी ने श्रीमद्भागवत के तैंतीसवें अध्याय में से भगवान् की कालिन्दी कूल की जल-क्रीडा की कथा सुनायी। प्रभु के दिनभर वही लीला स्फुरण होती रही। दिन बीता, रात्रि आयी, प्रभु की विरहवेदना भी बढने लगी। वे आज अपने को संभालने में एकदम असमर्थ हो गये। पता नहीं किस प्रकार वे भक्तों की दृष्टि बचाकर समुद्र के किनारे-किनारे आईटोटा की ओर चले गये। वहाँ विशाल सागर की नीली-नीली तरंग उठकर संसार को हृदय की विशालता, संसार की अनित्यता और प्रेम की तन्मयता की शिक्षा दे रही थीं। प्रेमावतार, गौरांग के हृदय से एक सुमधुर संगीत स्वत: ही उठ रहा था। महाप्रभु उस संगीत के स्वर को श्रवण करते-करते पागल हुए बिना सोचे-विचारे ही समुद्र की ओर बढ़ रहे थे। अहा ! समुद्र के किनारे सुन्दर-सुन्दर वृक्ष अपनी शरत्कालीन शोभा से सागर की सुषमा को और भी अधिक शक्तिशालनी बना रहे थे। शरत् की सुहावनी शर्वरी थी, अपने प्रिय पुत्र चन्द्रमा की श्रीवृद्धि और पूर्ण ऐश्वर्य से प्रसन्न होकर पिता सागर आनन्द से उमड़ रहे थे। महाप्रभु उसमें कृष्णांग-स्पर्श से पुलकित और आनन्दित हुई कालिन्दी का दर्शन कर रहे थे। उन्हें समुद्र की एकदम विस्मृति हो गयी, वे कालिन्दी में गोपिकाओं के साथ क्रीडा करते हुए श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन करने लगे। बस, फिर क्या था, आप उस क्रीडासुख से क्यों वंचित रहते, जोरों से हुंकार करते हुए अथाह सागर के जल में कूद पड़े और अपने प्यारे के साथ जलविहार का आनन्द लेने लगे। इसी प्रकार जल में डूबते और उछलते हुए उनकी सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। इधर प्रभु को स्थान पर न देखकर भक्तों को सन्देह हुआ कि प्रभु कहाँ चले गये। स्वरूप गोस्वामी, गोविन्द, जगदानन्द, वक्रेश्वर, रघुनाथदास, शंकर आदि सभी भक्तों को साथ व्याकुलता के साथ प्रभु की खोज में चले। श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर में सिंहद्वार से लेकर उन्होंने तिल-तिलभर जगह को खोज डाला। सभी के साथ वे जगन्नाथवल्लभ नामक उद्यान में गये वहाँ भी प्रभु का कोई पता नहीं। वहाँ से निराश होकर वे गुण्टिचा मन्दिर में गये। सुन्दरचल में उन्होंने इन्द्रद्युम्नसरोवर, समीप के सभी बगीचे तथा मन्दिर खोज डाले। सभी को परम आश्चर्य हुआ कि प्रभु गये भी तो कहाँ गये। इस प्रकार उन्हें जब कहीं भी प्रभु का पता नहीं चला तब वे निराश होकर फिर पुरी में लौट आये। इस प्रकार प्रभु की खोज करते-करते उन्हें सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रात:काल के समय स्वरूप गोस्वामी ने कहा– ‘अब चलो, समुद्र के किनारे प्रभु की खोज करे, वहाँ प्रभु का अवश्य ही पता लग जायगा।’ यह कहकर वे भक्तों को साथ लेकर समुद्र के किनारे-किनारे चल पड़े। इधर महाप्रभु रात्रिभर जल में उछलते और डूबते रहे। उसी समय एक मल्लाह वहाँ जाल डालकर मछली मार रहा था, महाप्रभु का मृत्यु–अवस्था को प्राप्त वह विकृत शरीर उस मल्लाह के जाल में फँस गया। उसने बड़ा भारी मच्छ समझकर उसे किनारे पर खींच लिया। उसने जब देखा कि यह मच्छ नहीं कोई मुर्दा है, तो उठाकर प्रभु को किनारे पर फेंक दिया। बस, महाप्रभु के अंग का स्पर्श करना था कि वह मल्लाह आनन्द से उन्मत्त होकर नृत्य करने लगा। प्रभु के श्रीअंग के स्पर्शमात्र से ही उसके शरीर में सभी सात्त्विक भाव आप से आप ही उदित हो उठे। वह कभी तो प्रेम में विह्वल होकर हँसने लगता, कभी रोने लगता, कभी गाने लगता और कभी नाचने लगता। वह भयभीत हुआ वहाँ से दौडने लगा। उसे भ्रम हो गया कि मेरे शरीर में भूत ने प्रवेश किया है, इसी भय से वह भागता-भागता आ रहा था कि इतने में ये भक्त भी वहाँ पहुँच गये। उसकी ऐसी दशा देखकर स्वरूप गोस्वामी ने उससे पूछा– ‘क्यों भाई ! तुमन यहाँ किसी आदमी को देखा है, तुम इतने डर क्यों रहे हो? अपने भय का कारण तो हमें बताओ।’ भय से कांपते हुए उस मल्लाह ने कहा– ‘महाराज ! आदमी तों मैंने यहाँ कोई नहीं देखा। मैं सदा की भाँति मछली मार रहा था कि एक मुर्दा मेरे जाल में फँस आया। उसके अंग में भूत था, वही मेरे अंग में लिपट गया है। इसी भय से मैं भूत उतरवाने के लिये ओझा के पास जा रहा हूँ। आप लोग इधर न जायँ। वह बडा ही भयंकर मुर्दा है, ऐसा विचित्र मुर्दा तो मैंने आज तक देखा ही नहीं।’ उस समय महाप्रभु का मृत्युदशा में प्राप्त शरीर बड़ा ही भयानक बन गया था। कविराज गोस्वामी ने मल्लाह के मुख से प्रभु के शरीर का जो वर्णन कराया है, उसे उन्हीं के शब्दों में सुनिये – जालिया कहे–इहाँ एक मनुष्य ना देखिल। जाल बाहिते एक मृत मोर जाले आइल॥ बड़ मत्स्य बले, आमि उठाइलूँ यतने। मृतक देखिते मोर भय हैल मने॥ जाल खसाइते तार अंग-स्पर्श हइल। स्पर्शमात्रे सेइ भूत हृदये पशिल॥ भये कम्प हैल, मोर नेत्रे बहे जल। गद्गद वाणी मोर उठिल सकल॥ कि वा ब्रह्मदैत्य कि वा भूत कहने ना जाय। दर्शनमात्रे मनुष्येर पशे सेइ काय॥ शरीर दीघल तार-हाथ पांच सात। एक हस्त पद तार, तिन तिन हाथ॥ अस्थि-सन्धि छूटि चर्म कर नड-बड़े। ताहा देखि, प्राण कार नाहि रहे धरे॥ मड़ा रूप धरि, रहे उत्तान-नयन। कभू गों-गों करे, कभू देखि अचेतन॥ स्वरूप गोस्वामी के पूछने पर जालिया (मल्लाह) कहने लगा– मनुष्य तो मैंने यहाँ कोई देखा नहीं है। जाल डालते समय एक मृतक मनुष्य मेरे जाल आ गया। मैंने उसे बड़ा मत्स्य जानकर उठाया। जब मैंने देखा कि यह तो मुर्दा है, तब मेरे मन में भय हुआ। जाल से निकालते समय उसके अंग से मेरे अंग का स्पर्श हो गया। स्पर्शमात्र से ही वह भूत मेरे शरीर में प्रवेश कर गया। भय के कारण मेरे शरीर में कँपकँपी होने लगी, नेत्रों से जल बहने लगा और मेरी वाणी गद्गद हो गयी। या तो वह ब्रह्मदैत्य है या भूत है, इस बात को मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता। वह दर्शनमात्र से ही मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है। उसका शरीर पांच-सात हाथ लम्बा है। उसके एक-एक हाथ-पांव तीन-तीन हाथ लम्बे हैं। उसके हड्डियों की सन्धियाँ खुल गयी हैं। उसके शरीर के ऊपर का चर्म लुजु-बुजुर-सा करता है। उसे देखकर किसी के भी प्राण नही रह सकते। बड़ा ही विचित्र रूप धारण किये है, दोनों नेत्र चढ़े हुए हैं। कभी तो गों-गों शब्द करता है और कभी फिर अचेतन हो जाता है। इस बात को मल्लाह के मुख से सुनकर स्वरूप गोस्वामी सब कुद समझ गये कि वह महाप्रभु का ही शरीर होगा। उनके अंग-स्पर्श से ही इसकी ऐसी दशा हो गयी है। भय के कारण इसे पता नहीं कि यह प्रेम की अवस्था है। यह सोचकर वे कहने लगे– ‘तुम ओझा के पास क्यों जाते हो, हम बहुत अच्छी ओझाई जातने हैं। कैसा भी भूत क्यों न हो, हमने जहाँ मंत्र पढ़ा नहीं बस, वहीं उसी क्षण वह भूत भागता हुआ ही दिखायी देता है। फिर वह क्षणभर भी नहीं ठहरता।’ ऐसा कहकर स्वरूप गोस्वामी ने वैसे ही झूठ-मूँठ कुछ पढ़कर अपने हाथ को उसके मस्तक पर छुआया और जोरों से उसके गाल पर तीन तमाचे मारे। उसके ऊपर भूत थोड़े ही था। उसे भूत का भ्रम था, विश्वास के कारण वह भय दूर हो गया। तब स्वरूप गोस्वामी ने उससे कहा– ‘तू जिन्हें भूत समझ रहा है, वे महाप्रभु चैतन्यदेव हैं, प्रेम के कारण उनकी ऐसी दशा हो जाती है। तू उन्हें हमको बता कहाँ हैं। हम उन्हीं की खोज में तो आये हैं।’ इस बात को सुनकर वह मल्लाह प्रसन्न होकर सभी भक्तों को साथ लेकर प्रभु के पास पहुँचा। भक्तों ने देखा, सुवर्ण के समान प्रभु का शरीर चांदी के चूरे के समान समुद्र की बालुका में पड़ा हुआ है, आँखे ऊपर को चढ़ी हुई हैं, पेट फूला हुआ है, मुँह में से झाग निकल रहे हैं। बिना किसी प्रकार की चेष्टा किये हुए उनका शरीर गीली बालुका से सना हुआ निश्चेष्ट पड़ा हुआ है। सभी भक्त प्रभु को घेरकर बैठ गये। हम संसारी लोग तो मृत्यु को ही अन्तिम दशा समझते हैं, इसलिये संसारी दृष्टि से प्रभु के शरीर का यहीं अन्त हो गया। फिर उसे चैतन्यता प्राप्त नहीं हुई। किन्तु रागानुगामी भक्त तो मृत्यु के पश्चात भी विरहिणी को चैतन्यता लाभ कराते हैं। उनके मत में मृत्यु ही अन्तिम दशा नहीं है। इस प्रसंग में हम बंगला भाषा के प्रसिद्ध पदकर्ता श्री गोविन्ददास जी का एक पद उद्धृत करते हैं। इससे पाठकों को पता चल जायगा कि श्री कृष्ण नाम श्रवण से मृत्युदशा को प्राप्त हुई भी राधिका जी फिर चैतन्यता प्राप्त करके बातें कहने लगीं। कुंज भवने धीन। तुया गुण गणि गणि। अतिशय दुरबली भेल॥ दशमीक पहिल, दशा हेरि सहचरी। घरे संगे बाहिर केल॥ शुन माधव कि बलब तोय। गोकुल तरुणी, निचय मरण जानि। राइ राइ करि रोय॥ तहि एक सुचतुरी, ताक श्रवण भरि। पुन पुन कहे तुया नाम॥ बहु क्षणे सुन्दरी, पाइ परान कोरि। गद्गद कहे श्याम नाम॥ नामक आछू गुणे, शुनिले त्रिभुवने। मृतजने पुन कहे बात॥ गोविन्ददास कह, इह सब आन नह। याइ देखह मझ साथ॥ श्रीकृष्ण से एक सखी श्री राधिका जी की दशा का वर्णन कर रही है। सखी कहती है– ‘हे श्यामसुन्दर! राधिका जी कुंजभवन में तुम्हारे नामों को दिन-रात रटते-रटते अत्यन्त ही दुबली हो गयी हैं। जब उनकी मृत्यु के समीप की दशा मैंने देखी तब उन्हें उस कुंजकुटीर से बाहर कर लिया। प्यारे माधव ! अब तुमसे क्या कहूँ, बाहर आने पर उसकी मृत्यु हो गयी, सभी सखियाँ उसकी मृत्युदशा को देखकर रुदन करने लगीं। उनमें एक चतुर सखी थी, वह उसके कान में तुम्हारा नाम बार-बार कहने लगी। बहुत देर के अनन्तर उस सुन्दरी के शरीर में कुछ-कुछ प्राणों का संचार होने लगा। थोडी देर में वह गद्गद-कण्ठ से ‘श्याम’ ऐसा कहने लगी। तुम्हारे नाम का त्रिभुवन में ऐसा गुण सुना गया है कि मृत्यु-दशा को प्राप्त हुआ प्राणी भी पुन: बात कहने लगता है। सखी कहती है– ‘तुम इस बात को झूठ मत समझना। यदि तुम्हें इस बात का विश्वास न हो, तो मेरे साथ चलकर उसे देख आओ।’ यह पद गोविन्द दास कवि द्वारा कहा गया है।’ इसी प्रकार भक्तों ने भी प्रभु के कानों में हरिनाम सुनाकर उन्हें फिर जागृत किया। वे अर्धबाह्य दशा में आकर कालिन्दी में होने वाली जलकेलि का वर्णन करने लगे। ‘वह साँवला सभी सखियों को साथ लेकर यमुना जी के सुन्दर शीतल जल में घुसा। सखियों के साथ वह नाना भाँति की जलक्रीडा करने लगा। कभी किसी के शरीर को भिगोता, कभी दस-बीसों को साथ लेकर उनके साथ दिव्य-दिव्य लीलाओं का अभिनय करता। मैं भी उस प्यारे की क्रीडा में सम्मिलित हुई। वह क्रीडा बडी ही सुखकर थी।’ इस प्रकार कहते-कहते प्रभु चारों ओर देखकर स्वरूप गोस्वामी से पूछने लगे– ‘मैं यहाँ कहाँ आ गया? वृन्दावन से मुझे यहाँ कौन ले आया?’ तब स्वरूप गोस्वामी ने सभी समाचार सुनाये और वे उन्हें स्नान कराकर भक्तों के साथ वास स्थान पर ले गये श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 170 श्री अद्वैताचार्य जी की पहेली एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्म: पर: स्मृत:। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभि:॥ मातृभक्त श्रीगौरांग उन्मादावस्था में भी अपनी स्नेहमयी जननी को एकदम नहीं भूले थे। जब वे अन्तर्दशा से कभी-कभी बाह्य दशा में आ जाते तो अपने प्रिय भक्तों की और प्रेममयी माता की कुशल-क्षेम पूछते और उनके समाचार जानने के निमित्त जगदानन्द जी को प्रतिवर्ष गौड़ भेजते थे। जगदानन्द जी गौड़ में जाकर सभी भक्तों से मिलते, उनसे प्रभु की सभी बातें कहते, उनकी दशा बताते और सभी का कुशल-क्षेम लेकर लौट आते। शचीमाता के लिये प्रभु प्रतिवर्ष जगन्नाथ जी का प्रसाद भेजते और भाँति-भाँति के आश्वासनों द्वारा माता को प्रेम-सन्देश पठाते। प्रभु के सन्देश को कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– तोमार सेवा छांड़ि आमि करिनूँ संन्यास। ‘बाउल हय्या आमि कैलूँ ध र्म नाश॥ एइ अपराध तुमि ना लइह आमार। तोमार अधीन आमि-पुत्र से तोमार॥ नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते। यावत् जीव तावत् आमि नारिब छाड़िते॥ अर्थात हे माता ! मैंने तुम्हारी सेवा छोड़कर पागल होकर संन्यास धारण कर लिया है, यह मैंने धर्म के विरुद्ध आचरण किया है, मेरे इस अपराध को तुम चित्त में मत लाना। मैं अब भी तुम्हारे अधीन ही हूँ। निमाई अब भी तुम्हारा पुराना ही पुत्र है। नीलाचल में मैं तुम्हारी ही आज्ञा से रह रहा हूँ और जब तक जीऊँगा तब तक नीलाचल को नहीं छोड़ूँगा। इस प्रकार प्रतिवर्ष प्रेम-सन्देश और प्रसाद भेजते। एक बार जगदानन्द पण्डित प्रभु की आज्ञा से नवद्वीप गये। वहाँ जाकर उन्होंने शचीमाता को प्रसाद दिया, प्रभु का कुशल-समाचार बताया और उनका प्रेम-सन्देश भी कह सुनाया। निमाई को ही सर्वस्व समझने वाली माँ अपने प्यारे पुत्र की ऐसी दयनीय दशा सुनकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसके अतिक्षीण शरीर में अब अधिक दिनों तक जीवित रहने की सामर्थ्य नहीं रही थी। जो कुछ थोड़ी-बहुत सामर्थ्य थी भी सो निमाई की ऐसी भयंकर दशा सुनकर उसके शोक के कारण विलीन हो गयी। माता अब अपने जीवन से निराश हो बैठी, निमाई का चन्द्रवदन अब जीवन में फिर देखने को न मिल सकेगा, इस बात से माता की निराशा और बढ़ गयी। वह अब इस विषमय जीवनभार को बहुत दिनों तक ढोते रहने में असमर्थ-सी हो गयी। माता ने पुत्र को रोते-रोते आशीर्वाद पठाया और जगदानन्द जी को प्रेमपूर्वक विदा किया। जगदानन्द जी वहाँ से अन्यान्य भक्तों के यहाँ होते हेुए श्री अद्वैताचार्यजी के घर गये। आचार्य ने उनका अत्यधिक स्वागत-सत्कार किया और प्रभु के सभी समाचार पूछे। आचार्य का शरीर भी अब बहुत वृद्ध हो गया था। उनकी अवस्था 90 से ऊपर पहुँच गयी थी। खाल लटक गयी थी, अब वे घर से बाहर बहुत ही कम निकलते थे। जगदानन्द को देखकर मानो फिर उनके शरीर में नवयौवन का संचार हो गया और वे एक-एक करके सभी विरक्त भक्तों का समाचार पूछने लगे। जगदानन्द जी दो-चार दिन आचार्य के यहाँ रहे। जब उन्होंने प्रभु के पास जने के लिये अत्यधिक आग्रह किया तब आचार्य ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी और प्रभु के लिये एक पहेली युक्त पत्र भी लिखकर दिया। जगदानन्दजी उस पत्र को लेकर प्रभु के पास पहुँचे। महाप्रभु जब बाह्य दशा में आये, तब उन्होंने सभी भक्तों के कुशल-समाचार पूछे। जगदानन्द जी सबका कुशल-क्षेम बताकर अन्त में अद्वैताचार्य की वह पहेलीवाली पत्री दी। प्रभु की आज्ञा से वे सुनाने लगे। प्रभु को कोटि-कोटि प्रणाम कर लेने के अनन्तर उसमें यह पहेली थी– बाउलके कहिह-लोक हइल बाउल। बाउलके कहिह-बाटेना बिकाय चाउल॥ बाउलके कहिह-काजे नाहिक आउल। बाउलके कहिह-इहा कहिया छे बाउल॥ सभी समीप में बैठे हुए भक्त इस विचित्र पहेली को सुनकर हँसने लगे। महाप्रभु मन ही मन इसका मर्म समझकर कुछ मन्द-मन्द मुसकाये और जैसी उनकी आज्ञा, इतना कहकर चुप हो गये। प्रभु के बाहरी प्राण श्रीस्वरूप गोस्वामी को प्रभु की मुसकराहट में कुछ विचित्रता प्रतीत हुई। इसलिये दीनता के साथ पूछने लगे– ‘प्रभो ! मैं इस विचित्र पहेली का अर्थ समझना चाहता हूँ। आचार्य अद्वैत राय ने यह कैसी अनोखी पहेली भेजी है। आप इस प्रकार इसे सुनकर क्यों मुसकराये?’ प्रभु ने धीरे-धीरे गम्भीरता के स्वर में कहा– अद्वैताचार्य कोई साधारण आचार्य तो हैं ही नहीं। वे नाम के ही आचार्य नहीं हैं, किन्तु आचार्यपने के सभी कार्य भली-भाँति जानते हैं। उन्हें शास्त्रीय विधि के अनुसार पूजा-पाठ करने की सभी विधि मालूम है। पूजा में पहले तो बडे सत्कार के साथ देवताओं को बुलाया जाता है, फिर उनकी षोडशोपचार रीति से विधिवत् पूजा की जाती है, यथास्थान पधराया जाता है, तब देवताओं से हाथ जोड़कर कहते है– ‘गच्छ-गच्छ परं स्थानम्’ अर्थात ‘अब अपने परम स्थान को पधारिये।’ सम्भवतया यही उनका अभिप्राय हो, वे ज्ञानी पण्डित हैं, उनके अर्थ को ठीक-ठीक समझ ही कौन सकता है। इस बात को सुनकर स्वरूप गोस्वामी कुछ अन्यमनस्क से हो गये। सभी को पता चल गया कि महाप्रभु अब शीघ्र ही लीला-संवरण करेंगे। इस बात के स्मरण से सभी का हृदय फटने-सा लगा। उसी दिन से प्रभु की उन्मादावस्था और भी अधिक बढ़ गयी। वे रात-दिन उसी अन्तर्दशा में निमग्न रहने लगे। प्रतिक्षण उनकी दशा लोक-बाह्य-सी बनी रहती थी। कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– स्तम्भ, कम्प, प्रस्वेद, वैवर्ण अश्रुस्वर-भेद। देह हैल पुलके व्यापित॥ हासे-कान्दे, नाचे, गाय, उठि इति-उति धाय। क्षणे, भूमैं पड़िया मूर्च्छिते॥ ‘शरीर सन्न पड़ जाता है, कँपकँपी छूटने लगती है। शरीर से पसीना बहने लगता है, मुख म्लान हो जाता है, आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है। गला भर आता है, शब्द ठीक-ठीक उच्चारण नहीं होते हैं। देह रोमांचित हो जाती है। हँसते हैं, जोरों से रुदन करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं, उठ-उठकर इधर-उधर भागने लगते हैं, क्षणभर में मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं।’ प्यारे ! पगले दयालु चैतन्य ! क्या इस पागलपन में हमारा कुछ भी साझा नहीं है? हे दीनवत्सल ! इस पागलपन में से यत्किंचित भी हमें मिल जाय तो यह सार-हीन जीवन सार्थक बन जाय। मेरे गौर ! उस मादक मदिरा का एक प्याला मुझको भी क्यों नहीं पिला देता? हे मेरे पागलशिरोमणि ! तेरे चरणों में मैं कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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