Neha Sharma, Haryana Jan 20, 2021

👉अवश्य पढ़ें श्री गुरु गोबिंद सिंह जन्मदिवस विशेष.... 🚩!! जयति जय श्री सिद्धिविनायक !!🚩 ******************************** *वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ अर्थ सहित जानिए गणेश जी के 5 महामंत्र :- मित्रों भगवान श्री गणेश जी की पूजा करने के लिए कुछ महामंत्र बताए गए हैं। जो आसान हैं और हर संस्कृत नहीं जानने वाले लोग भी इन मंत्रों को पढ़ सकते हैं। इन मंत्रों को बोलने से पूजा पूर्ण होती है और गणेश जी भी जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। अर्थ सहित जानिए गणपति जी के ऐसे ही खास मंत्र.…... 1- वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ *अर्थ :- घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली। मेरे प्रभु, हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करें (करने की कृपा करें)॥ 2- विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं। नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ *अर्थ :- विघ्नेश्वर, वर देने वाले, देवताओं को प्रिय, लम्बोदर, कलाओं से परिपूर्ण, जगत् का हित करने वाले, गजके समान मुख वाले और वेद तथा यज्ञ से विभूषित पार्वतीपुत्र को नमस्कार है ; हे गणनाथ ! आपको नमस्कार है । 3- अमेयाय च हेरम्ब परशुधारकाय ते । मूषक वाहनायैव विश्वेशाय नमो नमः ॥ *अर्थ :- हे हेरम्ब ! आपको किन्ही प्रमाणों द्वारा मापा नहीं जा सकता, आप परशु धारण करने वाले हैं, आपका वाहन मूषक है । आप विश्वेश्वर को बारम्बार नमस्कार है । 4- एकदन्ताय शुद्घाय सुमुखाय नमो नमः । प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने ॥ *अर्थ :- जिनके एक दाँत और सुन्दर मुख है, जो शरणागत भक्तजनों के रक्षक तथा प्रणतजनों की पीड़ा का नाश करनेवाले हैं, उन शुद्धस्वरूप आप गणपति को बारम्बार नमस्कार है । 5- एकदंताय विद्‍महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात।। *अर्थ :- एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश जी आप सहपरिवार का सर्वदा मङ्गल करें। ********************** !! जय श्री गणेश !! विघ्न हरण मंगल करण काटत सकल क्लेश सबसे पहले सुमरिये गौरी पुत्र गणेश !! जय श्री गणेश !! 🚩🙏🌸🙏🚩 *श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जन्म दिवस पौष शुक्ल सप्तमी विशेष 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ *ए नजरां नई बनिया चुकन वास्ते ए ता बनिया यारियां दे लई ते खुमारिया दे लइ दो कम्मा वास्ते साढ़े सिर बने या आरियां दे लइ या सरदारिया दे लइ। *सतगुरु श्रीगुरुगोबिंद सिंह जी जीवन परिचय..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *गुरु गोविंद सिंह का जन्म नौवें सिख गुरु गुरु तेगबहादुर और माता गुजरी के घर पटना में 05 जनवरी 1666 को हुआ था। जब वह पैदा हुए थे उस समय उनके पिता असम में धर्मउपदेश को गये थे। उनके बचपन का नाम गोविन्द राय था। पटना में जिस घर में उनका जन्म हुआ था और जिसमें उन्होने अपने प्रथम चार वर्ष बिताये थे, वहीं पर अब तखत श्री पटना साहिब स्थित है। *1670 में उनका परिवार फिर पंजाब आ गया। मर्च 1672 में उनका परिवार हिमालय के शिवालिक पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नामक स्थान पर आ गया। यहीं पर इनकी शिक्षा आरम्भ हुई। उन्होंने फारसी, संस्कृत की शिक्षा ली और एक योद्धा बनने के लिए सैन्य कौशल सीखा। चक नानकी ही आजकल आनन्दपुर साहिब कहलता है। गोविन्द राय जी नित्य प्रति आनंदपुर साहब में आध्यात्मिक आनंद बाँटते, मानव मात्र में नैतिकता, निडरता तथा आध्यात्मिक जागृति का संदेश देते थे। आनंदपुर वस्तुतः आनंदधाम ही था। यहाँ पर सभी लोग वर्ण, रंग, जाति, संप्रदाय के भेदभाव के बिना समता, समानता एवं समरसता का अलौकिक ज्ञान प्राप्त करते थे। गोविन्द जी शांति, क्षमा, सहनशीलता की मूर्ति थे। काश्मीरी पण्डितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाये जाने के विरुद्ध शिकायत को लेकर तथा स्वयं इस्लामन स्वीकारने के कारण 11 नवम्बर 1675 को औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनके पिता गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया। इसके पश्चात वैशाखी के दिन 29 मार्च 1676 को गोविन्द सिंह सिखों के दसवें गुरु घोषित हुए। 10 वें गुरु बनने के बाद भी आपकी शिक्षा जारी रही। शिक्षा के अन्तर्गत लिखना-पढ़ना, घुड़सवारी तथा धनुष चलाना आदि सम्मिलित था। 1684 में उन्होने चंडी दी वार कि रचना की। 1685 तक आप यमुना नदी के किनारे पाओंटा नामक स्थान पर रहे। गुरु गोबिन्द सिंह की तीन पत्नियाँ थीं। 21जून, 1677 को 10 साल की उम्र में उनका विवाह माता जीतो के साथ आनंदपुर से 10 किलोमीटर दूर बसंतगढ़ में किया गया। उन दोनों के 3 पुत्र हुए जिनके नाम थे – जुझार सिंह, जोरावर सिंह, फ़तेह सिंह। 4 अप्रैल, 1684 को 17 वर्ष की आयु में उनका दूसरा विवाह माता सुंदरी के साथ आनंदपुर में हुआ। उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम था अजित सिंह। 15 अप्रैल, 1700 को 33 वर्ष की आयु में उन्होंने माता साहिब देवन से विवाह किया। वैसे तो उनका कोई संतान नहीं था पर सिख धर्म के पन्नों पर उनका दौर भी बहुत प्रभावशाली रहा। *खालसा पंथ की स्थापना..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया। सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – "कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है"? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया। उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा। इधर 27 दिसम्बर सन्‌ 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावतसिंह व फतेहसिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरुजी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है। 8 मई सन्‌ 1705 में 'मुक्तसर' नामक स्थान पर मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। अक्टूबर सन्‌ 1706 में गुरुजी दक्षिण में गए जहाँ पर आपको औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी। गुरु गोविंदजी के बारे में लाला दौलतराय, जो कि कट्टर आर्य समाजी थे, लिखते हैं 'मैं चाहता तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, परमहंस आदि के बारे में काफी कुछ लिख सकता था, परंतु मैं उनके बारे में नहीं लिख सकता जो कि पूर्ण पुरुष नहीं हैं। मुझे पूर्ण पुरुष के सभी गुण गुरु गोविंदसिंह में मिलते हैं।' अतः लाला दौलतराय ने गुरु गोविंदसिंहजी के बारे में पूर्ण पुरुष नामक एक अच्छी पुस्तक लिखी है। इसी प्रकार मुहम्मद अब्दुल लतीफ भी लिखता है कि जब मैं गुरु गोविंदसिंहजी के व्यक्तित्व के बारे में सोचता हूँ तो मुझे समझ में नहीं आता कि उनके किस पहलू का वर्णन करूँ। वे कभी मुझे महाधिराज नजर आते हैं, कभी महादानी, कभी फकीर नजर आते हैं, कभी वे गुरु नजर आते हैं। सिखों के दस गुरू हैं। एक हत्यारे से युद्ध करते समय गुरु गोबिंद सिंह जी के छाती में दिल के ऊपर एक गहरी चोट लग गयी थी। जिसके कारण 18 अक्टूबर, 1708 को 42 वर्ष की आयु में नान्देड में उनकी मृत्यु हो गयी। *आनन्दपुर साहिब से संबंध..…. 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *अप्रैल 1685 में, सिरमौर के राजा मत प्रकाश के निमंत्रण पर गुरू गोबिंद सिंह ने अपने निवास को सिरमौर राज्य के पांवटा शहर में स्थानांतरित कर दिया। सिरमौर राज्य के गजट के अनुसार, राजा भीम चंद के साथ मतभेद के कारण गुरु जी को आनंदपुर साहिब छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था और वे वहाँ से टोका शहर चले गये। मत प्रकाश ने गुरु जी को टोका से सिरमौर की राजधानी नाहन के लिए आमंत्रित किया। नाहन से वह पांवटा के लिए रवाना हुऐ| मत प्रकाश ने गढ़वाल के राजा फतेह शाह के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से गुरु जी को अपने राज्य में आमंत्रित किया था। राजा मत प्रकाश के अनुरोध पर गुरु जी ने पांवटा में बहूत कम समय में उनके अनुयायियों की मदद से एक किले का निर्माण करवाया। गुरु जी पांवटा में लगभग तीन साल के लिए रहे और कई ग्रंथों की रचना की। *सन् 1687 में नादौन की लड़ाई में, गुरु गोबिंद सिंह, भीम चंद, और अन्य मित्र देशों की पहाड़ी राजाओं की सेनाओं ने अलिफ़ खान और उनके सहयोगियों की सेनाओ को हरा दिया था। विचित्र नाटक (गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित आत्मकथा) और भट्ट वाहिस के अनुसार, नादौन पर बने व्यास नदी के तट पर गुरु गोबिंद सिंह आठ दिनों तक रहे और विभिन्न महत्वपूर्ण सैन्य प्रमुखों का दौरा किया। भंगानी के युद्ध के कुछ दिन बाद, रानी चंपा (बिलासपुर की विधवा रानी) ने गुरु जी से आनंदपुर साहिब (या चक नानकी जो उस समय कहा जाता था) वापस लौटने का अनुरोध किया जिसे गुरु जी ने स्वीकार किया। वह नवंबर 1688 में वापस आनंदपुर साहिब पहुंच गये। 1695 में, दिलावर खान (लाहौर का मुगल मुख्य) ने अपने बेटे हुसैन खान को आनंदपुर साहिब पर हमला करने के लिए भेजा। मुगल सेना हार गई और हुसैन खान मारा गया। हुसैन की मृत्यु के बाद, दिलावर खान ने अपने आदमियों जुझार हाडा और चंदेल राय को शिवालिक भेज दिया। हालांकि, वे जसवाल के गज सिंह से हार गए थे। पहाड़ी क्षेत्र में इस तरह के घटनाक्रम मुगल सम्राट औरंगज़ेब लिए चिंता का कारण बन गए और उसने क्षेत्र में मुगल अधिकार बहाल करने के लिए सेना को अपने बेटे के साथ भेजा। *गुरुगोबिंद सिंह जी की प्रमुख रचनायें..... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ *दशम ग्रन्थ की पाण्डुलिपि का प्रथम पत्र। दशम ग्रन्थ में प्राचीन भारत की सन्त-सैनिक परम्परा की कथाएँ हैं। *जाप साहिब :👉 एक निरंकार के गुणवाचक नामों का संकलन *अकाल उस्तत:👉 अकाल पुरख की अस्तुति एवं कर्म काण्ड पर भारी चोट *बचित्र नाटक :👉 गोबिन्द सिंह की सवाई जीवनी और आत्मिक वंशावली से वर्णित रचना *चण्डी चरित्र 👉 4 रचनाएँ - अरूप-आदि शक्ति चंडी की स्तुति। इसमें चंडी को शरीर औरत एवंम मूर्ती में मानी जाने वाली मान्यताओं को तोड़ा है। चंडी को परमेशर की शक्ति = हुक्म के रूप में दर्शाया है। एक रचना मार्कण्डेय पुराण पर आधारित है। *शास्त्र नाम माला :👉 अस्त्र-शस्त्रों के रूप में गुरमत का वर्णन। *अथ पख्याँ चरित्र लिख्यते :👉 बुद्धिओं के चाल चलन के ऊपर विभिन्न कहानियों का संग्रह। *ज़फ़रनामा :👉 मुगल शासक औरंगजेब के नाम पत्र। *खालसा महिमा :👉 खालसा की परिभाषा और खालसा के कृतित्व। *गुरु_गोबिंद_सिंह_जयंती राष्ट्रीय_पितृदिवस...... *गुरु तेग बहादुर के प्रिय सपूत, सिख पंथ कर १०वें गुरु, महान योद्धा, संतशिरोमणि, मार्मिक कवि, तत्त्वज्ञानी, खालसा के संस्थापक, गुरु गोबिंद सिंह जी के ३५४वें प्रकाशपर्व की शुभकामनाएं। *विगत कईं वर्षों से हम Dharma Shakti के माध्यम से गुरु गोबिंद सिंह जयंती को पितृदिवस के रूप में मना रहे हैं। एक ऐसे पिता जिन्होंने अपने चार लाल देश और धर्म के लिये बलिदान कर दिये.... जो मात्र ९ वर्ष की आयु में अपने पिता गुरु तेगबहादुर जी को धर्म के लिये बलिदान होने की प्रेरणा देते हैं.... ऐसा महान व्यक्तित्व जिन्होंने समाज को आध्यात्मिक राह तो दिखाई, परन्तु अधर्मी लोगों से लड़ने के लिये हाथ में तलवार भी उठा ली... ऐसा महापुरुष, जो लोगों को आध्यात्मिक रस तो पिलाता है, परन्तु युद्ध में अपनी तलवार से दुश्मनों के दांत भी खट्टे करता है... ऐसा प्रेरक जो कहता है कि चिड़ियों से बाज लड़ाऊं, सवा लाख से १ लड़ाऊं... ऐसा बादशाह जिसे हर प्रकार का दर्द मिला, परन्तु फिर भी जिसने धर्म न छोड़ा.... ऐसे गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में कोटि कोटि नमन। *जून के तीसरे रविवार को father's day मनाया जाता है। परन्तु हमारे देश की परंपरा रही है कि कोई विशेष दिवस यदि मनाना हो तो उसका वैज्ञानिक कारण होना चाहिये, उस दिन का ऐतिहासिक महत्त्व होना चाहिये। यदि एक विशेष दिन पिता को समर्पित करना ही है तो यहीं दिन करना चाहिये। उनके जैसा व्यक्तित्व कोई नहीं दिखता जिन्होंने अपना सब कुछ ही कुर्बान कर दिया। *यदि देश के प्रत्येक पिता को किसी का अनुसरण करना चाहिये तो गुरू गोबिंद सिंह जी का करना चाहिये। कितने महान पिता थे वे! किसी शिक्षा अपने बच्चों को दी थी!! जिस आयु में बच्चे अपने खिलौने के लिये लड़ते रहते है, उतनी सी आयु में देश, धर्म और संस्कृति के लिये बलिदान होने वाले सपूतों के पिता के हम ऋणी हैं। नन्ही सी आयु में भी मौत के सामने निर्भय होकर सिंह के समान गर्जना करने वाले सपूत जिस पिता के हों, वो पिता देश का गौरव है। यदि भारत को विश्वगुरु के पद पर आसीन करना है तो आज देश के प्रत्येक पिता को गुरु गोबिंद सिंह जी की तरह बनना होगा। *तो आप भी इस पहल में हमारा साथ दीजिये। गुरु गोबिंद सिंह जयंती को पितृदिवस के रूप में मनाने का संकल्प लीजिये और अधिक से अधिक लोगों को यहीं करने के लिये प्रेरित कीजिये। पौष, शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत, २०७७ *NationalFathersDay, GuruGobindSinghJayanti *DharmaShakti...... *आप सभी को श्री गुरु गोबिंद सिंह जी जन्म दिवस की शुभकामनाएं*🙏🙏 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Neha Sharma, Haryana Jan 19, 2021

हर 41 साल बाद श्रीलंका के जंगल में आते हैं भगवान हनुमान जी! 'न्यू इंडियन एक्सप्रेस' में छपी खबर के मुताबिक श्रीलंका के जंगलों में कुछ ऐसे कबीलाई लोगों का पता चला है जिनसे मिलने हनुमान जी आते हैं. आज के डिजिटल युग में भी हनुमान के जिंदा होने की खबर आ रही है. बताया जा रहा है कि श्रीलंका के जंगलों में हनुमान की मौजूदगी के संकेत मिले हैं. पवनपुत्र हनुमान के बारे में कहा जाता है कि वो अमर हैं. रामायण काल में जन्मे हनुमान सैकड़ों साल बाद महाभारत काल में भी जिंदा थे. कहा जाता है कि महाभारत की लड़ाई से ऐन पहले हनुमान जी पांडवों से मिलने आए थे. महाभारत की लड़ाई के सैकड़ों साल बाद आज के डिजिटल युग में भी हनुमान जी के जिंदा होने की खबर आ रही है. बताया जा रहा है कि श्रीलंका के जंगलों में हनुमान जी की मौजूदगी के संकेत मिले हैं. न्यू इंडियन एक्सप्रेस' में छपी खबर के मुताबिक श्रीलंका के जंगलों में कुछ ऐसे कबीलाई लोगों का पता चला है जिनसे मिलने हनुमान जी आते हैं. अखबार ने इन जनजातियों पर अध्ययन करने वाले आध्यात्म‍िक संगठन 'सेतु' के हवाले से यह सनसनीखेज खुलासा किया है. कहा गया है कि हनुमान जी इस साल हाल ही में इस जनजाति के लोगों से मिलने आए थे. इसके बाद वे 41 साल बाद यानी 2055 में आएंगे. इस जनजाति के लोगों को 'मातंग' नाम दिया गया है. इनकी तादाद काफी कम है और ये श्रीलंका के अन्य कबीलों से काफी अलग हैं.सेतु के मुताबिक इस कबीले का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है. हनुमान जी को वरदान मिला था कि उनकी कभी मृत्यु नहीं होगी यानी वे चिरंजीवी रहेंगे. भगवान राम के स्वर्ग सिधारने के बाद हनुमान जी अयोध्या से लौटकर दक्ष‍िण भारत के जंगलों में लौट आए. उसके बाद उन्होंने फिर से समुद्र लांघा और श्रीलंका पहुंचे. उस समय हनुमान जी जब तक श्रीलंका के जंगलों में रहे, इस कबीले के लोगों ने उनकी सेवा की. हनुमान जी ने इस कबीले के लोगों को ब्रह्मज्ञान का बोध कराया. उन्होंने यह भी वादा किया कि वे हर 41 साल बाद इस कबीले की पीढियों को ब्रह्मज्ञान देने आएंगे. हनुमान जी जब इस कबीले के साथ रहते हैं, कबीले का मुख‍िया हर बातचीत और घटना को एक 'लॉग बुक' में दर्ज करता है. सेतु इस लॉग बुक का अध्ययन कर रहा है और इसका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद करा रहा है. . इस चैप्टर के जरिये खुलासा हुआ है कि किस तरह हनुमान जी कुछ समय पहले श्रीलंका के इस जंगल में आए थे. 27 मई 2014 हनुमान जी का इस जंगल में बिताया आख‍िरी दिन था. प्रकट होकर यहां चले जाते हैं हनुमान?: हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है...उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था। ''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि। वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥'' अर्थात: कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥ गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन : गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं। वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत? : इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी। विद्वानों का मानना है कि हनुमानजी रामेश्वरम के पास स्थित इसी पर्वत पर रहते हैं। लेकिन हम इस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। कैसे पहुंचे गंधमादन : पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे। गौरतलब है कि एक गंधमादन पर्वत उड़िसा में भी बताया जाता है लेकिन हम उस पर्वत की बात नहीं कर रहे हैं।मातंग आदिवासी : सेतु ने दावा किया है कि श्रीलंका के जंगलों में एक आदिवासी समूह से हनुमानजी प्रत्येक 41 साल बाद मिलने आते हैं। सेतु के शोधानुसार श्रीलंका के जंगलों में एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। उनका रहन-सहन और पहनावा भी अलग है। उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है। सेतु एशिया नाम इस आध्यात्मिक संगठन का केंद्र कोलंबों में है जबकि इसका साधना केंद्र पिदुरुथालागाला पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गांव नुवारा में है। इस संगठन का उद्देश्य मानव जाति को फिर से हनुमानजी से जोड़ना है। सेतु नामक इस आध्यात्मिक संगठन का दावा है कि इस बार 27 मई 2014 हनुमानजी ने इन आदिवासी समूह के साथ अंतिम दिन‍ बिताया था। इसके बाद अब 2055 में फिर से मिलने आएंगे हनुमानजी। सेतु संगठन अनुसार इस कबीलाई या आदिवासी समूह को मातंग लोगों का समाज कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पंपा सरोवर के पास मातंग ऋषि का आश्रम है जहां हनुमानजी का जन्म हुआ था। इस समूह का कहीं न कहीं यहां से संबंध हो सकता है। श्रीलंका के पिदुरु पर्वत के जंगलों में रहने वाले मातंग कबीले के लोग संख्या में बहुत कम हैं और श्रीलंका के अन्य कबीलों से काफी अलग हैं। सेतु संगठन ने उनको और अच्छी तरह से जानने के लिए जंगली जीवन शैली अपनाई और इनसे संपर्क साधना शुरू किया। संपर्क साधने के बाद उन समूह से उन्हें जो जानकारी मिली उसे जानकर वे हैरान रह गए। .'हनु पुस्तिका' में सब कुछ लिखा है : अध्ययनकर्ताओं अनुसार मातंगों के हनुमानजी के साथ विचित्र संबंध हैं जिसके बारे में पिछले साल ही पता चला। फिर इनकी विचित्र गतिविधियों पर गौर किया गया, तो पता चला कि यह सिलसिला रामायण काल से ही चल रहा है।इन मातंगों की यह गतिविधियां प्रत्येक 41 साल बाद ही सक्रिय होती है। मातंगों अनुसार हनुमानजी ने उनको वचन दिया था कि मैं प्रत्येक 41 वर्ष में तुमसे मिलने आऊंगा और आत्मज्ञान दूंगा। अपने वचन के अनुसार उन्हें हर 41 साल बाद आत्मज्ञान देकर आत्म शुद्धि करने हनुमानजी आते हैं। सेतु अनुसार जब हनुमानजी उनके पास 41 साल बाद रहने आते हैं, तो उनके द्वारा उस प्रवास के दौरान किए गए हर कार्य और उनके द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का एक-एक मिनट का विवरण इन आदिवासियों के मुखिया बाबा मातंग अपनी 'हनु पुस्तिका' में नोट करते हैं। 2014 के प्रवास के दौरान हनुमानजी द्वारा जंगल वासियों के साथ की गई सभी लीलाओं का विवरण भी इसी पुस्तिका में नोट किया गया है। सेतु ने दावा किया है कि हमारे संत पिदुरु पर्वत की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका तो समझकर इसका आधुनिक भाषाओँ में अनुवाद करने में जुटे हुए हैं ताकि हनुमानजी के चिरंजीवी होने के रहस्य जाना जा सके, लेकिन इन आदिवासियों की भाषा पेचीदा और हनुमानजी की लीलाएं उससे भी पेचीदा होने के कारण इस पुस्तिका को समझने में काफी समय लग रहा है। कहां है यह पर्वत : यह पर्वत श्रीलंका के बीचोबीच स्थित है जो श्रीलंका के नुवारा एलिया शहर में स्थित है। पर्वतों की इस श्रृंखला के आसपास घंने जंगल है। इन जंगलों में आदिवासियों के कई समूह रहते हैं। 'नुवारा एलिया' पर्वत श्रृंखला : वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। 'नुवारा एलिया' पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है। श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती ह। मातंगों ने की थी हनुमानज की सेवा : कहते हैं कि जब प्रभु श्रीरामजी ने अपना मानव जीवन पूरा करके जल समाधि ले ली थी, तब हनुमानजी पुनः अयोध्या छोड़कर जंगलों में रहने चले गए थे। किष्किंधा आदि जगह होते हुए वे लंका के जंगलों में भ्रमण हेतु गए। उस वक्त वहां विभीषण का राज था। विभीषण को भी चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त था। हनुमानजी ने कुछ दिन श्रीलंका के जंगलों में गुजारे जहां वे प्रभु श्रीराम का ध्यान किया करते थे। उस दौरान पिदुरु पर्वत में रहने वाले कुछ मातंग आदिवासियों ने उनकी खूब सेवा की। उनकी सेवा से प्रसंन्न होकर हनुमानजी ने उनको वचन दिया कि प्रत्येक 41 साल बाद में तुमसे मिलने आऊंगा। यही कारण है कि हनुमानजी आज भी इस वचन का पालन करते हैं। रहस्यमय मंत्र : सेतु का दावा है कि मातंगों के पास एक ऐसा रहस्यमय मं‍त्र है जिसका जाप करने से हनुमानजी सूक्ष्म रूप में प्रकट हो जाते हैं। वे आज भी जीवित हैं और हिमालय के जंगलों में रहते हैं। जंगलों से निकलकर वे भक्तों की सहायता करने मानव समाज में आते हैं, लेकिन किसी को दिखाई नहीं देते। मातंगों अनुसार हनुमानजी को देखने के लिए आत्मा का शुद्ध होना जरूरी है। निर्मल चित्त के लोग ही उनको देख सकते हैं। मंत्र जप का असर तभी होता है जबकि भक्त में हनुमानजी के प्रति दृढ़ श्रद्धा हो और उसका हनुमानजी से आत्मिक संबंध हो। सेतु का दावा है कि जिस जगह पर यह मंत्र जपा जाता है उस जगह के 980 मीटर के दायरे में कोई भी ऐसा मनुष्य उपस्थित न हो जो आत्मिक रूप से हनुमानजी से जुड़ा न हो। अर्थात उसका हनुमानजी के साथ आत्मा का संबंध होना चाहिए। *जय सीताराम जय श्री हनुमान*🚩🙏🌸

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Neha Sharma, Haryana Jan 19, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 099*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 04*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 31 (अन्तिम)* *इस अध्याय में प्रचेताओं को श्रीनारद जी का उपदेश और उनका परमपद-लाभ..... *श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! दस लाख वर्ष बीत जाने पर जब प्रचेताओं को विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान् के वाक्यों की याद आयी और वे अपनी भार्या मारिषा को पुत्र के पास छोड़कर तुरंत घर से निकल पड़े। वे पश्चिम दिशा में समुद्र के तट पर- जहाँ जाजलि मुनि ने सिद्धि प्राप्त की थी- जा पहुँचे और जिससे ‘समस्त भूतों में एक ही आत्मतत्त्व विराजमान है’ ऐसा ज्ञान होता है, उस आत्मविचाररूप ब्रह्मसत्र का संकल्प करके बैठ गये। उन्होंने प्राण, मन, वाणी और दृष्टि को वश में किया तथा शरीर को निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसन को जीतकर चित्त को विशुद्ध परब्रह्म में लीन कर दिया। ऐसी स्थिति में उन्हें देवता और असुर दोनों के ही वन्दनीय श्रीनारद जी ने देखा। *नारद जी को आया देख प्रचेतागण खड़े हो गये और प्रणाम करके आदर-सत्कारपूर्वक देश-कालानुसार उनकी विधिवत् पूजा की। जब नारद जी सुखपूर्वक बैठ गये, तब वे कहने लगे। *प्रचेताओं ने कहा- देवर्षे! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्य से हमें आपका दर्शन हुआ। ब्रह्मन्! सूर्य के समान आपका घूमना-फिरना भी ज्ञानालोक से समस्त जीवों को अभय-दान देने के लिये ही होता है। *प्रभो! भगवान् शंकर और श्रीविष्णु भगवान् ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थी में आसक्त रहने के कारण हम लोग प्रायः भूल गये हैं। अतः आप हमारे हृदयों में उस परमार्थतत्त्व का साक्षात्कार कराने वाले अध्यात्म ज्ञान को फिर प्रकाशित कर दीजिये, जिससे हम सुगमता से ही इस दुस्तर संसार-सागर से पार हो जायें। *श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- भगवन्मय श्रीनारद जी का चित्त सर्वदा भगवान् श्रीकृष्ण में ही लगा रहता है। वे प्रचेताओं के इस प्रकार पूछने पर उनसे कहने लगे। *श्रीनारद जी ने कहा- राजाओं! इस लोक में मनुष्य का वही जन्म, वही कर्म, वही आयु, वही मन और वही वाणी सफल है, जिसके द्वारा सर्वात्मा सर्वेश्वर श्रीहरि का सेवन किया जाता है। जिनके द्वारा अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाले श्रीहरि को प्राप्त न किया जाये, उन माता-पिता की पवित्रता से, यज्ञोपवीत-संस्कार से एवं यज्ञदीक्षा से प्राप्त होने वाले उन तीन प्रकार के श्रेष्ठ जन्मों में, वेदोक्त कर्मों से, देवताओं के समान दीर्घ आयु से, शास्त्रज्ञान से, तप से, वाणी की चतुराई से, अनेक प्रकार की बातें याद रखने की शक्ति से, तीव्र बुद्धि से, बल से, इन्द्रियों की पटुता से, योग से, सांख्य (आत्मानात्म विवेक) से, संन्यास और वेदाध्ययन से तथा व्रत-वैराग्यादि अन्य कल्याण-साधनों से भी पुरुष का क्या लाभ है? वास्तव में समस्त कल्याणों की अवधि आत्मा ही है और आत्मज्ञान प्रदान करने वाले श्रीहरि ही सम्पूर्ण प्राणियों की प्रिय आत्मा हैं। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ सींचने से उसके तना, शाखा, उपशाखा आदि सभी का पोषण हो जाता है और जैसे भोजन द्वारा प्राणों को तृप्त करने से समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार श्रीभगवान् की पूजा ही सबकी पूजा है। जिस प्रकार वर्षाकाल में जल सूर्य के ताप से उत्पन्न होता है और ग्रीष्म-ऋतु में उसी की किरणों में पुनः प्रवेश कर जाता है तथा जैसे समस्त चराचर भूत पृथ्वी से उत्पन्न होते हैं और फिर उसी में मिल जाते हैं, उसी प्रकार चेतना-चेतनात्मक यह समस्त प्रपंच श्रीहरि से ही उत्पन्न होता है और उन्हीं में लीन हो जाता है। *वस्तुतः यह विश्वात्मा श्रीभगवान् का वह शास्त्र प्रसिद्ध सर्वोपाधिरहित स्वरूप ही है। जैसे सूर्य की प्रभा उससे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार कभी-कभी गन्धर्व-नगर के समान स्फुरित होने वाला यह जगत् भगवान् से भिन्न नहीं है; तथा जैसे जाग्रत् अवस्था में इन्द्रियाँ क्रियाशील रहती हैं किन्तु सुषुप्ति में उनकी शक्तियाँ लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह जगत् सर्गकाल में भगवान् से प्रकट हो जाता है और कल्पान्त होने पर उन्हीं में लीन हो जाता है। स्वरूपतः तो भगवान् में द्रव्य, क्रिया और ज्ञानरूपी त्रिविध अहंकार के कार्यों की तथा उनके निमित्त से होने वाले भेदभ्रम की सत्ता है ही नहीं। *नृपतिगण! जैसे बादल, अन्धकार और प्रकाश- ये क्रमशः आकाश से प्रकट होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं; किन्तु आकाश इनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ये सत्त्व, रज, और तमोमयी शक्तियाँ कभी परब्रह्म से उत्पन्न होती हैं और कभी उसी में लीन हो जाती हैं। इसी प्रकार इनका प्रवाह चलता रहता है; किन्तु इससे आकाश के समान असंग परमात्मा में कोई विकार नहीं होता। अतः तुम ब्रह्मादि समस्त लोकपालों के भी अधीश्वर श्रीहरि अपने से अभिन्न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियों के एकमात्र आत्मा हैं। वे ही जगत् के निमित्तकारण काल, उपादान कारण प्रधान और नियन्ता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी काल शक्ति से वे ही इस गुणों के प्रवाहरूप प्रपंच का संहार कर देते हैं। वे भक्तवत्सल भगवान् समस्त जीवों पर दया करने से, जो कुछ मिल जाये उसी में सन्तुष्ट रहने से तथा समस्त इन्द्रियों को विषयों से निवृत्त करके शान्त करने से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। पुत्रैषणा आदि सब प्रकार की वासनाओं के निकल जाने से जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, उन संतों के हृदय में उनके निरन्तर बढ़ते हुए चिन्तन से खिंचकर अविनाशी श्रीहरि आ जाते हैं और अपनी भक्ताधीनता को चरितार्थ करते हुए हृदयाकाश की भाँति वहाँ से हटते नहीं। *भगवान् तो अपने को (भगवान् को) ही सर्वस्व मानने वाले निर्धन पुरुषों पर ही प्रेम करते हैं; क्योंकि वे परम रसज्ञ हैं-उन अकिंचनों की अनन्याश्रया अहैतु की भक्ति में कितना माधुर्य होता है, इसे प्रभु अच्छी तरह जानते हैं। जो लोग अपने शास्त्रज्ञान, धन, कुल और कर्मों के मद से उन्मत्त होकर, ऐसे निष्किंचन साधुजनों का तिरस्कार करते हैं, उन दुर्बुद्धियों की पूजा तो प्रभु स्वीकार ही नहीं करते। भगवान् स्वरूपानन्द से ही परिपूर्ण हैं, उन्हें निरन्तर अपनी सेवा में रहने वाली लक्ष्मी जी तथा उनकी इच्छा करने वाले नरपति और देवताओं की भी कोई परवा नहीं है। इतने पर भी वे अपने भक्तों के तो अधीन ही रहते हैं। अहो! ऐसे करुणा-सागर श्रीहरि को कोई भी कृतज्ञ पुरुष थोड़ी देर के लिये भी कैसे छोड़ सकता है? *श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! भगवान् नारद ने प्रचेताओं को इस उपदेश के साथ-साथ और भी बहुत-सी भगवत्सम्बन्धी बातें सुनायीं। इसके पश्चात् वे ब्रह्मलोक को चले गये। प्रचेतागण भी उनके मुख से सम्पूर्ण जगत् के पापरूपी मल को दूर करने वाले भगवच्चरित्र सुनकर भगवान् के चरणकमलों का ही चिन्तन करने लगे और अन्त में भगवद्धाम को प्राप्त हुए। इस प्रकार आपने जो मुझसे श्रीनारद जी और प्रचेताओं के भगवत्कथा सम्बन्धी संवाद के विषय में पूछा था, वह मैंने आपको सुना दिया। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! यहाँ तक स्वायम्भुव मनु के पुत्र उत्तानपाद के वंश का वर्णन हुआ, अब प्रियव्रत के वंश का विवरण भी सुनो। *राजा प्रियव्रत ने श्रीनारद जी से आत्मज्ञान का उपदेश पाकर भी राज्य भोग किया था तथा अन्त में इस सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने पुत्रों में बाँटकर वे भगवान् के परमधाम को प्राप्त हुए थे। *राजन्! इधर श्रीमैत्रेय जी के मुख से यह भगवद्गुणानुवाद युक्त पवित्र कथा सुनकर विदुर जी प्रेममग्न हो गये, भक्तिभाव का उर्द्रेक होने से उनके नेत्रों से पवित्र आँसुओं की धारा बहने लगी तथा उन्होंने हृदय में भगवच्चरणों का स्मरण करते हुए अपना मस्तक मुनिवर मैत्रेय जी के चरणों पर रख दिया। *विदुर जी कहने लगे- महायोनिन्! आप बड़े ही करुणामय हैं। आज आपने मुझे अज्ञानान्धकार के उस पार पहुँचा दिया है, जहाँ अकिंचनों के सर्वस्व श्रीहरि विराजते हैं। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- मैत्रेय जी को उपर्युक्त कृतज्ञतासूचक वचन कहकर तथा प्रणाम कर विदुर जी ने उनसे आज्ञा ली और फिर शान्तचित्त होकर अपने बन्धुजनों से मिलने के लिये वे हस्तिनापुर चले गये। *राजन्! जो पुरुष भगवान् के शरणागत परमभागवत राजाओं का यह पवित्र चरित्र सुनेगा, उसे दीर्घ आयु, धन, सुयश, क्षेम, सद्गति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होगी। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Jan 19, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 072*✳️✳️ ✳️✳️*क़ाज़ी की शरणागति*✳️✳️ *वन्दे स्वैराद्भुतेअहं तं चैतन्यं यत्प्रसादत:। *यवना: सुमनायन्ते कृष्णनामप्रजल्पका:॥ *बिना मुकुट के राजा भी होते हैं और बिना शस्त्र के सेना भी लड़ सकती है। जो मुकुटधारी राजा अथवा महाराजा होते हैं, उनके तो प्राय: जनता के ऊपर भय से आधिपत्य होता है, वे भीतर से उससे द्वेष भी रख सकते हैं और जनता कभी-कभी उनके विरुद्ध बलवा भी कर सकती है, किंतु जो बिना मुकुट के राजा होते हैं उनका तो जनता के हृदयों पर आधिपत्य होता है। वे तो प्रेम से ही सभी लोगों को अपने वश में कर सकते हैं। चाहे मुकुटधारी राजा की सेना रणक्षेत्र से भय के कारण भाग आवे, चाहे उसकी पराजय ही हो जाय, किंतु जिनका जनता के हृदयों के ऊपर आधिपत्य है, जनता के अन्त:करण पर जिनके शासन की प्रेम-मुहर लगी हुई है, उनके सैनिक चाहे शस्त्रधारी हों अथवा बिना शस्त्र के, बिना जय प्राप्त किये मैदान से भागते ही नहीं। क्योंकि वे अपने प्राणों की कुछ भी परवा नहीं करते। जिसे अपने प्राणों की कुछ भी परवा नहीं, जो मृत्यु का नाम सुनकर तनिक भी विचलित न होकर उसका सर्वदा स्वागत करने के लिये प्रस्तुत रहता है, उसके लिये संसार में कोई काम दुरूह नहीं। उसे इन बाह्यशस्त्रों की उतनी अधिक अपेक्षा नहीं, उसका तो साहस ही शस्त्र है। वह निर्भिक होकर अपने साहसरूपी शस्त्र के सहारे अन्याय के पक्ष लेने वाले का पराभव कर सकता है। फिर भी वह अपने विरोधी के प्रति किसी प्रकार के बुरे विचार नहीं रखता। वह सदा उसके हित की ही बात सोचता रहता है, अन्त में उसका भी कल्याण हो जाता है। प्रेम में यही तो विशेषता है। प्रेममार्ग में कोई शत्रु ही नहीं। घृणा, द्वेष, कपट, हिंसा अथवा अकारण कष्ट पहुँचाने के विचार तक उस मार्ग में नहीं उठते, वहाँ तो ये ही भाव रहते हैं- *सर्वे कुशलिन: सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:। *सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥ *इसी का नाम ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’, ‘सविनय अवज्ञा’ अथवा ‘सत्याग्रह’ है। महाप्रभु गौरांगदेव ने संकीर्तन रोकने के विरोध में इसी मार्ग का अनुसरण करना चाहा। क़ाज़ी की नीच प्रवृत्तियों के दमन करने के निमित्त उन्होंने इसी उपाय का अवलम्बन किया। सब लोगों से उन्होंने कह दिया- ‘आप लोग घबड़ायँ नहीं, मैं स्वयं क़ाज़ी के सामने संकीर्तन करता हुआ निकलूंगा, देखें, वह मुझे संकीर्तन से किस प्रकार रोकता है?’ प्रभु के ऐसे आश्वासन से सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने-अपने घरों को चले गये। *दूसरे दिन महाप्रभु ने नित्यानन्द जी को आज्ञा दी कि सम्पूर्ण नगर में इस संवाद को सुना आओ कि ‘हम आज सायंकाल के समय क़ाज़ी की आज्ञा के विरुद्ध नगर में संकीर्तन करते हुए निकलेंगे। संध्या के समय सभी लोग हमारे घर पर एकत्रित हों और प्रकाश के लिये एक-एक मशाल भी साथ लेते आवें।’ नित्यानन्द जी तो बहुत दिन से यही बात चाहते भी थे। उनकी इच्छा थी कि ‘एक दिन महाप्रभु सम्पूर्ण नगर में संकीर्तन करते हुए निकलें तो लोगों को पता चल जाय कि संकीर्तन में कितना माधुर्य है। उन्हें विश्वास था कि जो लोग संकीर्तन का विरोध करते हैं, यदि वे लोग एक दिन भी गौरांग के प्रेम-नृत्य को देख लेंगे, तो वे सदा के लिये गौरांग के तथा उनके संकीर्तन के भक्त बन जायंगे। महाप्रभु के खुलकर कीर्तन करने से भयभीत भक्तों का भय भी दूर भाग जायगा और अन्य लोगों को भी फिर संकीर्तन करने का साहस होगा। बहुत-से लोग हृदय से संकीर्तन के समर्थक हैं, किंतु क़ाज़ी के भय से उनकी कीर्तन करने से हिम्मत नहीं होती। *प्रभु को प्रोत्साहन की ही आवश्यकता है।’ इन बातों को नित्यानन्द जी मन-ही-मन में बहुत दिनों से सोच रहे थे। किंतु उन्होंने किसी पर अपने इन भावों को प्रकट नहीं किया। आज स्वयं महाप्रभु को नगर-कीर्तन करने के लिये उद्यत देखकर उनके आनन्द का पारावार नहीं रहा। वे हाथ में घण्टा लेकर नगर के मुहल्ले-मुहल्ले और गली-गली में घर-घर घूम-घूमकर इस शुभ संवाद को सुनने लगे। पहले वे घण्टे को जोरों से बजा देते। घण्टे की ध्वनि सुनकर बहुत-से स्त्री-पुरुष वहाँ एकत्रित हो जाते, तब नित्यानन्द जी हाथ उठाकर कहते- ‘भाइयो! आज शाम को श्रीगौरहरि अपने सुमधुर संकीर्तन से सम्पूर्ण नगर के लोगों को पावन बनावेंगे। नगरवासी नर-नारियों की चिरकाल की मनोवांछा आज पूरी होगी। सभी लोगों को आज प्रभु के अद्भुत और अलौकिक नृत्य के रसास्वादन का सौभाग्य प्राप्त होगा। सभी भाई संकीर्तनकारी भक्तों के स्वागत के निमित्त अपने-अपने घरों को सुन्दरता के साथ सजावें और शाम को सभी एक-एक मशाल लेकर प्रभु के घर पर आवें। वहाँ किसी प्रकार का शोर-गुल न मचावें। बस, संकीर्तन का सुख लूटते हुए अपने जीवन को कृतकृत्य बनावें। *सभी लोग इस मुनादी को सुनते और आनन्द से उछलने लगते। सामूहिक कार्यों में एक प्रकार का स्वाभाविक जोश आ जाता है। उस जोश में सभी प्रकार के लोग एक अज्ञातशक्ति के कारण खिंचे-से चले आते हैं, जिनसे कभी किसी शुभकाम की आशा नहीं की जाती वे भी जोश में आकर अपनी शक्ति से बहुत अधिक कार्य कर जाते हैं, इसीलिये तो कलिकाल में सभी कार्यों के लिये संघशक्ति को ही प्रधानता दी गयी है। *नवद्वीप में ऐसा नगर-कीर्तन पहले कभी हुआ ही नहीं था। वहाँ के नर-नारियों के लिये यह एक नूतन ही वस्तु थी। लोग बहुत दिनों से निमाई के नृत्य और कीर्तन की बातें तो सुनते थे, किंतु उन्होंने आज तक कभी निमाई का नृत्य तथा कीर्तन देखा नहीं था। श्रीवास पण्डित के घर के भीतर संकीर्तन होता था और उसमें खास-खास भक्तों के अतिरिक्त और कोई जा ही नहीं सकता था, इसीलिये नगरवासियों की कीर्तनानंद देखने की इच्छा मन-ही-मन में दब-सी जाती। आज नगर कीर्तन की बात सुनकर सभी की दबी हुई इच्छाएं उभड़ पड़ी। लोग अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार संकीर्तन के स्वागत के निमित्त भाँति-भाँति की तैयारियां करने लगे। कहावत है ‘खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलने लगता है’ जब भगवद्भक्त अपने-अपने घरों को बंदनवार, कदलीस्‍तम्भ और ध्वजा-पताकाओं से सजाने लगे, तब उनके समीप रहने वाले शाक्त अथवा विभिन्न पन्थवाले लोग भी शोभा के लिये अपने-अपने दरवाजों के सामने झंडियां लगाने लगे, जिससे हमारे घर के कारण नगर की सजावट में बाधा न पड़े। किसी जोशीले नये काम के लिये सभी लोगों के हृदयों में स्वाभाविक ही सहानुभुति उत्पन्न हो जाती है। *उस कार्य की घूम-घाम से तैयारियां होते देखकर विपक्षी भी उसमें सहयोग देने लगते हैं। उस समय उनके विरोधी भाव दूर हो जाते हैं, कारण कि उग्र विचारों का प्रभाव तो सभी प्रकारके लोगों के ऊपर पड़ता है। इसलिये जो लोग अपनी नीच प्रकृति के कारण संकीर्तन तथा श्रीगौरांग से अत्यंत ही द्वेष मानते थे, उन अकारण जलने वाले खल पुरुषों के घरों को छोड़कर सभी प्रकार के लोगों ने अपने-अपने घरों को भलीभाँति सजाया। नगर की सुंदर सड़कों पर छिड़काव किया गया। स्थान-स्थान पर धूप, गुग्गुल आदि सुगन्धित वस्तुएं जलायी गयीं। सड़क के किनारे के दुमंजले-तिमंजले मकान लाल, पीली, हरि, नीली आदि विविध प्रकार की रंगीन साड़ियों से सजाये गये थे। कहीं कागज की पताकाएँ फहरा रही हैं तो कहीं रंगीन कपड़ों की झंडियाँ शोभा दे रही हैं। *भक्तों ने अपने-अपने द्वारों पर मंगलसूचक कोरे घड़े जल से भर-भरकर रख दिये हैं। द्वारों पर गहरों के सहित केले के वृक्ष बड़े ही सुदंर तथा सुहावने ने दिखायी देते थे। लोगों का उत्साह इतना अधिक बढ़ गया था कि वे बार-बार यही सोचते थे कि हम संकीर्तन के स्वागत के निमित्त क्या-क्या कर डालें। संकीर्तन-मण्डल किधर होकर निकलेगा और कहाँ जाकर उसका अंत होगा, इसके लिये कोई पथ तो निश्चित हुआ ही नहीं था। सभी अपनी-अपनी भावना के अनुसार यही समझते थे कि हमारे द्वार की ओर होकर संकीर्तन-मण्डल जरूर आवेगा। सभी का अनुमान था, हमें संकीर्तनकारी भक्तों के स्वागत-सत्कार करने का सौभाग्य अवश्य प्राप्त हो सकेगा। इसलिये वे महाप्रभु के सभी साथियों के स्वागतार्थ भाँति-भाँति की सामग्रियाँ सजा-सजाकर रखने लगे। इस प्रकार सम्पूर्ण नवद्वीप में चारों ओर आनन्द–ही-आनन्द छा गया। इतनी सजावट-तैयारियाँ किसी महोत्सव पर अथवा किसी महाराज के आने पर भी नगर में नहीं होती थीं। चारों ओर धूम-धाम मची हुई थी। भक्तों के हृदय मारे प्रेम के बांसों उछल रहे थे। तैयारियां करते-करते ही बात-की-बात में संध्या हो गयी। *महाप्रभु भी घर के भीतर संकीर्तन की तैयारियाँ कर रहे थे। उन्होंने विशेष-विशेष भक्तों को बुलाकर नगर-कीर्तन की सभी व्यवस्था समझा दी। कौन आगे रहेगा, कौन उसके पीछे रहेगा और कौन सबसे पीछे रहेगा, ये सभी बातें बता दीं। किस सम्प्रदाय में कौन प्रधान नृत्यकारी होगा, इसकी भी वयवस्था कर दी। *अब प्रभु के अन्तरंग भक्त गदाधर ने महाप्रभु श्रृंगार किया। प्रभु के घुंघराले काले-काले बालों में भाँति-भाँति के सुगन्धित तैल डालकर उसका जूरा बांधा गया, उसमें मालती, चम्‍पा आदि के सुगन्धित-पुष्प गूंथे गये। नासिका पर ऊर्ध्व-पुण्ड्र लगाया गया। केसर-कुंकुम की महीन बिन्दियों से मस्तक तथा दोनों कपोलो के ऊपर पत्रावली बनायी गयी। उनके अंग-प्रत्यंग की सजावट इस प्रकार की गयी कि एक बार कामदेव भी देखकर लज्जित हो उठता। *महाप्रभु ने एक बहुत ही बढ़िया पीताम्बर अपने शरीर पर धारण किया। नीचे तक लटकती हुई थोड़ी किनारीदार चुनी हूई पीले रंग की धोती बड़ी ही भली मालूम होती थी। गदाधर ने घुटनों तक लटकने वाला एक बहुत ही बढ़िया हार प्रभु के गले में पहना दिया। उस हार के कारण प्रभु का तपाये हुए सुवर्ण के समान शरीर अत्यंत ही शोभित होने लगा। मुख में सुंदर पान की बीरी लगी हुई थी, इससे बायीं तरफ का कपोल थोड़ा उठा हुआ-सा दीखता था। दोनों अरुण अधर पान की लालिमा से और भी रक्तवर्ण के बन गये थे। उन्हें बिम्बा-फल की उपमा देने में भी संकोच होता था। कमान के समान दोनों कुटिल भ्रुकुटियों के मध्य में चारों ओर केसर लगाकर बीच में एक बहुत ही छोटी कुंकुम की बिन्दी लगा दी थी, पीतवर्ण के शरीर में वह लाल बिन्दी लाल रंग के हीरे की कनी की भाँति दूर ही चमक रही थी। इस प्रकार भलीभाँति श्रृंगार करके प्रभु घर से बाहर निकले। प्रभु के बाहर निकलते ही द्वारपर जो अपार भीड़ प्रभु की प्रतीक्षा कर रही थी, उसमें एकदम कोलाहल होने लगा। मानो समुद्र में ज्वार आ गया हो। सभी जोरों से ‘हरि बोल,’ 'हरि बोल’ कहकर दिशा-दिशाओं को गुँजाने लगे। लोग प्रभु के दर्शनों के लिये उतावले हो उठे। एक-दूसरे को धक्का देकर सभी पहले प्रभु के पाद-पद्मों के निकट पहुँचना चाहते थे। *प्रभु ने अपने दोनों हाथ उठाकर भीड़ को शांत हो जाने का संकेत किया। देखते-ही-देखते सर्वत्र सन्नाटा छा गया। उस समय ऐसा प्रतीत होने लगा, मानो यहाँ कोई है ही नहीं। गदाधर ने प्रभु के दोनों चरणों में नूपुर बांध दिये। फिर क्रमश: सभी भक्तों ने अपने-अपने पैरों में नूपुर पहन लिये। बायें पैर को ठमकाकर प्रभु ने नूपुरों की ध्वनि की। प्रभु के ध्वनि करते ही एक साथ ही सहस्त्रों भक्तों ने अपने-अपने नूपुरों का बजाया। भीड़ में आनन्द की तरंगें उठने लगीं। भीड़ में स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध तथा युवा सभी प्रकार के पुरुष थे। जाति-पांति का कोई भी भेद-भाव नहीं था, जो भी चाहे आकर संकीर्तन-समाज में सम्मिलित हो सकता था। किसी के लिये किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं थी। भीड़ मे जितने भी आदमी थे, प्राय: सभी के हाथों में एक-एक मशाल थी। लोगों की सूझ ही तो ठहरी। प्रकाश के लिये मशाल न लेकर उस दिन मशाल ले चलने का एक प्रकार से माहात्म्य ही बन गया था, मानो सभी लोग मिलकर अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार छोटे-बड़े आलोक के द्वारा नवद्वीप के चिरकाल के छिपे हुए अज्ञानान्धकार को खोज-खोजकर भगा देने के ही लिये कटिबद्ध होकर आये हैं। किसी के हाथ में बड़ी मशाल थी, किसी के छोटी। किसी-किसी ने तो दोनों हाथों में दो-दो मशालें ले रखी थीं। छोटे-छोटे बच्चे छोटी-छोटी मशालें लिये हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहकर उछल रहे थे। *गोधूलि का सुखमय समय था। आकाश-मण्डल में स्थित भगवान दिवानाथ गौरचन्द्र के असह्यरूप-लावण्य से पराभव पाकर अस्ताचल में मुंह छिपाने के लिये उद्योग कर रहे थे। लज्जा के कारण उनका सम्पूर्ण मुख-मण्डल रक्तवर्ण का हो गया था। इधर आकाश में अर्धचन्द्र उदित होकर पूर्णचन्द्र के पृथ्वी पर अवतीर्ण होने की घोषणा करने लगे। शुक्ल पक्ष था, चांदनी रात्रि थी, ग्रीष्मकाल का सुखद समय था। सभी प्रेम में उन्मत्त हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ कहकर चिल्ला रहे थे। प्रभु ने भक्तों को नियमपूर्वक खड़े हो जाने का संकेत किया। सभी लोग पीछे हट गये। संकीर्तन करने वाले भक्त आगे खड़े हुए। प्रभु ने भक्त-मण्डली को चार सम्प्रदायों में विभक्त किया। सबसे आगे वृद्ध सेनापति भक्ति-सेना के महारथी भीष्म पितामह के तुल्य श्री अद्वैताचार्य का सम्प्रदाय था। उस सम्प्रदाय के वे ही अग्रणी थे। इनके पीछे श्रीवास पण्डित अपने दल-बल के सहित डटे हुए थे। श्रीवास पण्डित के सम्प्रदाय में छटे हुए कीर्तन कला में कुशल सैकड़ों भक्त थे। इनके पीछे महात्मा हरिदास का सम्प्रदाय था। सबसे पीछे महाप्रभु अपने प्रधान-प्रधान भक्तों के सहित खड़े हुए। प्रभु के दायीं ओर नित्यानंद जी और बायीं ओर गदाधर पण्डित शोभायमान थे। *सब लोगों के यथायोग्य खड़े हो जाने पर प्रभु ने नूपुर बजाकर इशारा किया। बस, प्रभु का संकेत पाना था कि ढोल-करतालों की मधुर ध्वनि से आकाशमण्डल गूंजने लगा। प्रेम-वारुणी में पागल-से बने हुए भक्त ताल-स्वर के सहित गा-गाकर नृत्य करने लगे। उस समय किसी को न तो अपने शरीर की सुधि रही और न बाह्य जगत का ही ज्ञान रहा। जिस प्रकार भूत-पिशाच से पकड़े जाने वाले मनुष्य होश-हवास भुलाकर नाचने-कूदने लगते हैं, उसी प्रकार भक्तगण प्रेम में विभोर होकर नृत्य करने लगे, किंतु कोई भी ताल-स्वर के विपरीत नहीं जाता था। इतने भारी कोलाहल में भी सभी ताल-स्वर के नियमों का भलीभाँति पालन कर रहे थे। सभी के पैर एक साथ ही उठते थे। *घुँघरुओं की रुनझुन-रुनझुन ध्वनि के साथ ढोल-करताल और झाँझ-मजीरों की आवाजें मिलकर विचित्र प्रकार की ही स्वर-लहरी की सृष्टि कर रही थीं। एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से बिलकुल पृथक ही पदों का गायन करता था। वाद्य बजाने वाले भक्त नृत्य करते-करते बाद्य बजा रहे थे। ढोल बजाने वाले बजाते-बजाते दोहरे हो जाते और पृथ्वी पर लेट-लेटकर ढोल बजाने लगते। करताल बजाने वाले चारों ओर हाथ फेंक-फेंककर जोरों से करताल बजाते। झाँझ और मजीरा की मीठी-मीठी ध्वनि सभी के हृदयों में खलबली-सी उत्पन्न कर रही थी। नृत्य करने वाले के चारों ओर से घेरकर भक्त खडे़ हो जाते और वह स्वच्छन्द रीति से अनेक प्रकार के कीर्तन के भावों को दर्शाता हुआ नृत्य करने लगता। उसके सम्प्रदाय के सभी भक्त उसके पैरों के साथ पैर उठाते और उसकी नूपुर-ध्वनि के सहित अपनी नूपुर-ध्वनि को मिला देते। बीच-बीच में सम्पूर्ण लोग एक साथ जोरों से बोल उठते ‘हरि बोल,’ ‘हरि बोल’,’गौरहरि बोल।’ अपार भीड़ में से उठी हुई यह आकाश-मण्डल को कपाँ देने वाली ध्वनि बहुत देर तक अन्तरिक्ष में गूजंती रहती। भक्त फिर उसी प्रकार संकीर्तन में मग्न हो जाते। सबसे पीछे नित्यानन्द और गदाधर के साथ प्रभु नृत्य कर रहे थे। *महाप्रभु का आज का नृत्य देखने ही योग्य था। मानो आकाश-मण्डल में देवगण अपने-अपने विमानों में बैठे हुए प्रभु का नृत्य देख रहे हों। प्रभु उस समय भावावेश में आकर नृत्य कर रहे थे। घुंटुनों तक लटकी हुई उनकी मनोहर माला पृथ्वी को स्पर्श करने लगती। कमर को लचाकर, हाथों को उठाकर, ऊर्ध्व दृष्टि किये हुए प्रभु नृत्य कर रहे थे। उनके दोनों कमल-नयनों से प्रेमाश्रु बह-बहकर कपोलों के ऊपर से लुढ़क रहे थे। *तिरछी आँखों की कोरों में से शीतल अश्रुओं के कण बह-बहकर जब कपोलों पर कढ़ी हुई पत्रावली के ऊपर होकर नीचे गिरते तब उस समय के मुख-मण्डल की शोभा देखते ही बनती थी। वे गद्गद कण्ठ से गा रहे थे ‘तुम्हार चरण मन लागुरे, हे सांरगधर’- सांरगधर कहते-कहते प्रभु का गला भर आता और सभी भक्त एक स्वर में बोल उठते ‘हरि बोल’, ‘गौरहरि बोल’। प्रभु फिर संभल जाते और फिर उसी प्रकार कोकिल-कण्ठ से गान करने लगते। वे हाथ फैलाकर, कमर लचाकर, भौहें मरोड़कर, सिर को नीचा-ऊंचा करके भाँति-भाँति से अलौकिक भावों को प्रदर्शित करते। सभी दर्शक काठ की पुतलियों के समान प्रभु के मुख की ओर देखते-के-देखते ही रह जाते। *प्रभु के आज के नृत्य से कठोर-से-कठोर हृदय में भी प्रेम का संचार होने लगा। कीर्तन के महाविरोधियों के मुखों में से भी हठात निकल पड़ने लगा- ‘धन्य है, प्रेम हो तो ऐसा हो!’ कोई कहता- ‘इतनी तन्मयता तो मनुष्य-शरीर में सम्भव नहीं।’ दूसरा बोल उठता- ‘निमाई तो साक्षात नारायण है।’ कोई कहता- ‘हमने तो ऐसा सुख अपने जीवन में आज तक कभी पाया नहीं।’ दूसरा जल्दी से बोल उठता- ‘तुमने क्या, किसी ने भी ऐसा सुख आज तक कभी नहीं पाया। यह सुख तो देवताओं को भी दुर्लभ है। वे भी इसके लिये सदा लालायित बने रहते हैं।’ *प्रभु संकीर्तन करते हुए गंगा जी के घाट की ओर जा रहे थे। रास्ते में मनुष्यों की अपार भीड़ थी। उस भीड़ में से चींटी का भी निकल जाना सम्भव नहीं था। भगवद्भक्त सद्गृहस्थ अपने-अपने दरवाजों पर आरती लिये हुए खडे़ थे। कोई प्रभु के ऊपर पुष्पों की वर्षा करता, कोई भक्तों को माला पहनाता, कोई बहुमूल्य इत्र-फुलेल की शीशी-की-शीशी प्रभु के ऊपर उडे़ल देता। कोई इत्रदान में से इत्र छिड़क-छिड़ककर भक्तों को सराबोर कर देता। अटा, अटारी और छज्जे तथा द्वारों पर खड़ी हुई स्त्रियाँ प्रभु के ऊपर वहीं से पुष्पों की वृष्टि करतीं। कुमारी कन्याएं अपने आंचलों में भर-भरकर धान के लावा भक्तों के ऊपर बिखेरती। कोई सुन्दर सुगन्धित चन्दन ही छिड़क देती, कोई अक्षत, दूब तथा पुष्पों को ही फेंककर भक्तों का स्वागत करती। इस प्रकार सम्पूर्ण पथ पुष्पमय हो गया। लावा, अक्षत, पुष्प और फलों से रास्ता पट-सा गया। *प्रभु उन्मत्त हुए नृत्य कर रहे थे। उन्हें बाह्य-जगत का कुछ पता ही नहीं था। सभी संसारी विषयों का चिन्तन छोड़कर संकीर्तन की प्रेम-धारा में वे बहने लगे। उन्हें न तो क़ाज़ी का पता रहा और न उसके अत्याचारों का ही। सभी प्रभु के नृत्य को देखकर आपा भूले हुए थे। इस प्रकार का नगर-कीर्तन यह सबसे पहला ही था। सभी के लिये यह नयी बात थी, फिर मुसलमान शासक के शासन में ऐसा करने की हिम्मत ही किसकी हो सकती थी? किंतु आज तो प्रभु के प्रभाव से सभी अपने को स्वतन्त्र समझने लगे थे। उनके हृदयों पर तो एक मात्र प्रभु का साम्राज्य था, वे उनके तनिक-से इशारे पर सिर कटाने तक को तैयार थे। *इस प्रकार संकीर्तन-समाज अपने नृत्य-गान तथा जय-जयकारों से नगर-वासियों के हृदय में एक प्रकार के नवजीवन का संचार करता हुआ गंगा जी के उस घाट पर पहुँच, जहाँ प्रभु नित्यप्रति स्नान करते थे। वहाँ से प्रभु भक्त मण्डली के सहित मधाई-घाट पर गये। मधाई-घाट से सीधे ही बेलपुखरा जहाँ क़ाज़ी रहता था उसकी ओर चले। अब सभी को स्मरण हो उठा कि प्रभु को आज क़ाज़ी का भी उद्धार करना है। सभी उसके अत्याचारों को स्मरण करने लगे। कुछ लोग तो यहाँ तक आवेश में आ गये कि खूब जोरों के साथ चिल्लाने लगे- ‘इस क़ाज़ी को पकड़ लो’, ‘जान से मार डालो’, ‘इसने हिंद-धर्म पर बड़े-बड़े़ अत्याचार किये हैं।’ प्रभु को इन बातों का कुछ भी पता नहीं था। उन्हें किसी मनुष्य से या किसी सम्प्रदाय-विशेष से रत्तीभर भी द्वेष नहीं था। वे तो अन्याय के द्वेषी थे, सो भी अन्यायी के साथ वे लड़ना नहीं चाहते थे! वे तो प्रेमास्त्र द्वारा ही उसका पराभव करना चाहते थे। वे संहार के पक्षपाती न होकर उद्धार के पक्ष में थे। इसलिये मार-काट का नाम लेने वाले पुरुष उनके अभिप्राय को न समझने वाले अभक्त पुरुष ही थे। उन उत्तेजना प्रिय अज्ञानी मनुष्यों ने तो यहाँ तक किया कि वृक्षों की शाखाएं तोड़-तोड़कर वे क़ाज़ी के घर में घुस गये और उसकी फुलवारी तथा बाग के फल-फूलों को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे। क़ाज़ी के आदमियों ने पहले से ही क़ाज़ी को डरा दिया था। उससे कह दिया था- ‘निमाई पण्डित हजारों मनुष्यों को साथ लिये हुए तुम्हें पकड़ने के लिये आ रहा है। वे लोग तुम्हें जान से मार डालेंगे।’ कमज़ोर हृदय वाला क़ाज़ी अपार लोगों के कोलाहल से डर गया। उसकी फौज ने भी डरकर जवाब दे दिया। बेचारा चारों ओर से अपने का असहाय समझकर घर के भीतर जा छिपा। *जब प्रभु को इस बात का पता चला कि कुछ उपद्रवी लोग जनता को भड़काकर उसमें उत्तेजना पैदा कर रहे हैं और क़ाज़ी को क्षति पहुँचाने का उद्योग कर रहे थे, तो उन्होंने उसी समय संकीर्तन बंद कर देने की आज्ञा दे दी। प्रभु की आज्ञा पाते ही सभी भक्तों ने अपने-अपने वाद्य नीचे उतार कर रख दिये। नृत्य करने वाले रुक गये। पद गाने वालों ने पद बंद कर दिये। क्षणभर में ही वहाँ सन्नाटा-सा छा गया। प्रभु ने दिशाओं को गुंजाते हुए मेघ-गम्भीर स्वर में कहा- ‘खबरदार! किसी ने क़ाज़ी को तनिक भी क्षति पहुँचाने का उद्योग किया तो उससे अधिक अप्रिय मेरा और कोई न होगा। सभी एकदम शान्त हो जाओ।’ प्रभु का इतना कहना था कि सभी उपद्रवी अपने-अपने हाथों से शाखा तथा ईंट-पत्थर फेंककर चुपचाप प्रभु के समीप आ बैठे। सबको शान्त भाव से बैठे देखकर प्रभु ने क़ाज़ी के नौकरों से कहा- ‘काजी से हमारा नाम लेना और कहना कि आपको उन्होंने बुलाया है, आपके साथ कोई भी अभद्र व्यवहार नहीं कर सकता, आप थोड़ी देर को बाहर चलें।’ *प्रभु की बात सुनकर क़ाज़ी के सेवक घर में घिपे हुए क़ाज़ी के पास गये और प्रभु ने जो-जो बातें कही थीं, वे सभी जाकर क़ाज़ी से कह दीं। प्रभु के ऐसे आश्वासन को सुनकर और इतनी अपार भीड़ को चुपचाप शान्त देखकर क़ाज़ी बाहर निकला। प्रभु पे भक्तों के सहित क़ाज़ी का अभ्यर्थना की और प्रेमपुर्वक उसे अपने पास बिठाया। प्रभु ने कुछ हंसते हुए प्रेम के स्वर में कहा- ‘क्यों जी, यह कहाँ की रीति है कि हम तो आपके द्वार पर अतिथि होकर आये हैं और आप हमें देखकर घर में जा छिपे!’ *काजी ने कुछ लज्जित होकर विनीत भाव से प्रेम के स्वर में कहा- ‘मेरा सौभाग्य, जो आप मेरे घर पर पधारे! मैंने समझा था, आप क्रोधित होकर मेरे यहाँ आ रहे हैं, इसीलिये क्रोधित अवस्था में आपके सम्मुख होना ठीक नहीं समझा।’ *प्रभु ने हंसते हुए कहा- ‘क्रोध करने की क्या बात थी? आप तो यहाँ के शासक हैं, मैं आपके ऊपर क्रोध क्यों करने लगा?’ *यह बात हम पहले ही बता चुके हैं कि शचीदेवी के पूज्य पिता तथा महाप्रभु के नाना नीलाम्बर चक्रवर्ती का घर इसी बेलपुखरिया मुहल्ले में क़ाज़ी के पास ही था। क़ाज़ी चक्रवर्ती महाशय से बड़ा स्नेह रखते थे। इसीलिये क़ाज़ी ने कहा- ‘देखों निमाई! गांव-नाते से चक्रवर्ती मेरे चाचा लगते हैं, इसलिये तूम मेरे भानजे लगे। मैं तुम्हारा मामा हूँ, मामा के ऊपर भानजा यदि अकारण क्रोध भी करे तो मामा को सहना पड़ता है। मैं तुम्हारे क्रोध को सह लूंगा। तुम जितना चाहो, मेरे ऊपर क्रोध कर लो।‘ *प्रभु ने हंसते हुए कहा-‘मामा जी! मैं इस संबंध को कब अस्वीकार करता हूँ। आप तो मेरे बड़े हैं। आपने तो मुझे गोद में खिलाया है। मैं तो आपके सामने बच्चा हूँ, मैं आप पर क्रोध क्यों करूँगा!’ *काजी ने कुछ लजाते हुए कहा- ‘शायद इसीलिये कि मैंने तुम्हारे संकीर्तन का विरोध किया है।’ *प्रभु ने कुछ मुसकराकर कहा- ‘इससे मैं क्यों क्रोध करने लगा? आप भी तो स्वतन्त्र नहीं है, आपको बादशाह की जैसी आज्ञा मिली होगी या आपके अधीनस्थ कर्मचारियों ने जैसा कहा होगा वैसा ही आपने किया होगा। यदि कीर्तन करने वालों को दण्ड ही देना आपने निश्चय किया हो, तो हम सभी उसी अपराध को कर रहे हैं, हमें भी खुशी से दण्ड दीजिये। हम इसीलिये तैयार होकर आये हैं।’ *काजी ने कहा- ‘बादशाह की तो ऐसी आज्ञा नहीं थी, किंतु तुम्हारे बहुत-से पण्डितों ने ही आकर मुझसे शिकायत की थी कि यह अशास्त्रीय काम है। पहले ‘मंगलचण्डी’ के गीत गाये जाते थे। अब निमाई पण्डित भगवन्नाम के गोप्य मन्त्रों को खुल्लमखुल्ला गाता फिरता है और सभी वर्णों को उपदेश करता है। ऐसा करने से देश में दुर्भिक्ष पड़ेगा; इसीलिये मैंने संकीर्तन के विरोध में आज्ञा प्रकाशित की थी। कुछ मुल्ला और क़ाज़ी भी इसे बुरा समझते थे।’ *प्रभु ने यह सुनकर पूछा- ‘अच्छा, तो आप सब लोगों को संकीर्तन से क्यों नहीं रोकते!’ *काजी इस प्रश्न को सुनकर चुप हो गया। थोड़ी देर सोचते रहने के बाद बोला- ‘यह बड़ी गुप्त बात है, तुम एकान्त में चलो तो कहूँ।’ *प्रभु ने कहा- ‘यहाँ सब अपने ही आदमी हैं। इन्हें आप मेरा अन्तरंग ही समझिये। इनके सामने आप संकोच न करें। कहिये, क्या बात है?’ *प्रभु के ऐसा कहने पर क़ाज़ी ने कहा- ‘गौरहरि! मुझे तुम्हें गौरहरि कहने में अब संकोच नहीं होता। भक्त तुम्हें गौरहरि कहते हैं, इसलिये तुम सचमुच में हरि हो। तुम जब कृष्ण-कीर्तन करते थे, तब कुछ मुल्लाओं ने मुझसे शिकायत की थी कि यह निमाई ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहकर सभी को बरबाद करता है। इसका कोई उपाय कीजिये। तब मैंने विवश होकर उस दिन एक भक्त के घर में जाकर ढोल फोड़ा था और संकीर्तन के विरुद्ध लोगों को नियुक्त किया था, उसी दिन रात को मैंने एक बड़ा भंयकर स्वप्न देखा। मानो एक बड़ा भारी सिंह मेरे समीप आकर कह रहा है कि ‘यदि आज से तुमने संकीर्तन का विरोध किया तो उस ढोल की तरह ही मैं तुम्हारा पेट फोड़ दूंगा।’ यह कहकर वह अपने तीक्ष्ण पंजों से मेरे पेट को विदारण करने लगा। इतने में ही मेरी आँखे खुल गयीं! मेरी देह पर उन नखों के चिह्न अभी तक प्रत्यक्ष बने हुए हैं।’ यह कहकर क़ाज़ी ने अपने शरीर का वस्त्र उठाकर सभी भक्तों के सामने वे चिह्न दिखा दिये। *काजी के मुख से ऐसी बात सुनकर प्रभु ने क़ाज़ी का जोरों से आलिगंन किया और उसके ऊपर अनन्त कृपा प्रदर्शित करते हुए बोले- ‘मामा जी! आप तो परम वैष्णव बन गये। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जो किसी भी बहाने से, हंसी में, दु:ख में अथवा वैसे ही भगवान के नामों का उच्चारण कर लेता है उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। आपने तो कई बार ‘हरि’, ‘कृष्ण’ इन सुमधुर नामों का उच्चारण किया है। इन नामों के उच्चारण के ही कारण आपकी बुद्धि इतनी निर्मल हो गयी है।’ *प्रभु का प्रेमालिंगन पाकर क़ाज़ी का रोम-रोम खिल उठा। उसे अपने शरीर में एक प्रकार के नवजीवन का- सा संचार होता हुआ दिखायी देने लगा। वह अपने में अधिकाधिक स्निग्धता, कोमलता और पवित्रता का अनुभव करने लगा। तब प्रभु ने कहा- ‘अच्छा तो मामा जी! आपसे मुझे यही बात कहनी है कि अब आप संकीर्तन का विरोध कभी न करें।’ *गद्गद-कण्ठ से क़ाज़ी कहने लगा- ‘गौरहरि! तुम साक्षात नारायणस्वरूप हो, तुम्हारे सामने मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मैं अपने कुल-परिवार को छोड़ सकता हूँ, कुटुम्बी तथा जाति वालों का परित्याग कर सकता हूँ, किंतु आज से संकीर्तन का भी विरोध नहीं करूंगा। तुम लोगों से कह दो, वे बेखट के कीर्तन करें।’ *काजी की ऐसी बात सुनकर उपस्थित सभी भक्त मारे प्रसन्नता के उछलने लगे। प्रभु ने एक बार फिर क़ाज़ी को गाढालिंगन प्रदान किया और आप भक्तों के सहित फिर उसी प्रकार आगे चलने लगे। प्रभु के पीछे-पीछे प्रेम के अश्रु बहाते हुए क़ाज़ी भी चलने लगा और लोगों के ‘हरि बोल’ कहने पर वह भी ‘हरि बोल’ की उच्च ध्वनि करने लगा। इस प्रकार संकीर्तन करते हुए प्रभु केला खोल वाले श्रीधर भक्त के घर के सामने पहुँचे। भक्त-वत्सल प्रभु उस अकिंचन दीन-हीन भक्त के घर में घुस गये। गरीब भक्त एक ओर बैठा हुआ भगवान के सुमधुर नामों का उच्च स्वर से गायन कर रहा था। प्रभु को देखते ही वह मारे प्रेम के पुलकित हो उठा और जल्दी से प्रभु के पाद-पद्मों में गिर पड़ा। *श्रीधर को अपने पैरों के पास पड़ा देखकर प्रभु उससे प्रेमपूर्वक कहने लगे- ‘श्रीधर! हम तुम्हारे घर आये हैं, कुछ खिलाओगे नहीं?’ बेचारा गरीब-कंगाल सोचने लगा ‘हाय! प्रभु तो ऐसे असमय में पधारे है कि इस दीन-हीन कंगाल के घर में दो मुट्ठी चबेना भी नहीं। अब प्रभु को क्या खिलाऊं।’ भक्त यह सोच ही रहा था कि उसके पास के ही फूटे लोहे के पात्र में रखे हुए पानी को उठाकर प्रभु कहने लगे- ‘श्रीधर! तुम सोच क्या रहे हो। देखते नहीं हो, अमृत भरकर तो तुमने इस पात्र में ही रख रखा है।’ यह कहते-कहते प्रभु उस समस्त जल को पान कर गये। श्रीधर रो-रोकर कह रहा था- ‘प्रभो! यह जल आपके योग्य नहीं है, नाथ! इस फूटे पात्र का जल अशुद्ध है।’ किंतु प्रभु कब सुनने वाले थे। उनके लिये भक्त की सभी वस्तुएँ शुद्ध और परम प्रिय हैं। उनमें योग्यायोग्य और अच्छी-बुरी का भेदभाव नहीं। सभी भक्त श्रीधर के भाग्य की सराहना करने लगे और प्रभु की भक्त वत्सलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। श्रीधर भी प्रेम में विह्वल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। *काजी यहाँ तक प्रभु के साथ-ही-साथ आया था। अब प्रभु ने उससे लौट जाने के लिये कहा। वह प्रभु के प्रति नम्रतापूर्वक प्रणाम करके लौट गया। उस दिन से उसने ही नहीं, किंतु उसके सभी वश के लोगों ने संकीर्तन का विरोध करना छोड़ दिया। नवद्वीप में अद्यावधि चाँदखाँ क़ाज़ी का वश विद्यमान हैं क़ाज़ी के वश के लोग अभी तक श्रीकृष्ण-संकीर्तन में योगदान देते हैं। वेलपुकर या ब्राह्मणपुकर-स्थान में अभी तक चाँदखाँ क़ाज़ी की समाधि बनी हुई है। उस महाभागवत सौभाग्यशाली क़ाज़ी की समाधि के निकट अब भी जाकर वैष्णवगण वहाँ की धूलि को अपने मस्तक पर चढा़कर अपने को कृतार्थ मानते हैं। वह प्रेम-दृश्य उसकी समाधि के समीप जाते ही भावुक भक्तों के हृदयों में सजीव होकर ज्यों-का-त्यों ही नृत्य करने लगता है। धन्य है महाप्रभु गौरांगदेव के ऐसे प्रेम को, जिसके सामने विरोधी भी नतमस्तक होकर उसकी छत्र-छाया में अपने को सुखी बनाते हैं और धन्य है ऐसे महाभाग क़ाज़ी के जिसे मामा कहकर महाप्रभु प्रेमपूर्वक गाढालिंगन प्रदान करते हैं। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Neha Sharma, Haryana Jan 19, 2021

🙏*जय श्रीराम जय हनुमान*🚩*शुभ प्रभात् नमन*🙏 *बजरंगबली के सहस्त्र नाम*....... *जय श्री राम, जय बजरंगबली....आज मंगलवार के दिन ये नाम जपने से जीवन में सब मंगल ही मंगल होगा. जानिए मंगल को जन्मे मंगलकारी हनुमान के अद्भुत और चमत्कारी सहस्र नामों के बारे में जिनके जाप से आपके सारे कष्ट, रोग, पीड़ा और संकट खुद ब खुद नष्ट हो जाएंगे और जीवन में सब मंगलमय होगा. *शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं हनुमान जी. अपने भक्तों पर कृपा करते हैं और उनके सारे कष्‍ट संकटमोचन हर लेते हैं. वह महावीर भी हैं और हर युग में अपने भक्तों की समस्याओं का समाधान करते हैं. माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है. मंगलवार और शनिवार हनुमान जी के पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन हैं. *हर लेते हैं सारे संकट हनुमान चालीसा में लिखा हुआ है कि संकट कटे मिटे सब पीरा जो सुमरे हनुमत बलवीरा. जी हां यह अटल सत्य है. भूत पिसाच निकट नहीं आवे महावीर जब नाम सुनावे. जी हां यह भी अटल सत्य है, जैसे- राम नाम की महिमा अपरम्‍पार मानी जाती है. ठीक वैसे ही श्री हनुमान के नाम की महिमा भी अनंत फलदायी मानी गई है. *जैसा कि रामचरित मानस में लिखा हुआ है कि कलयुग केवल नाम अधरा सुमरि-सुमरि नर उतरहीं पारा और यह भी माना जाता है कि कलयुग में हनुमान ही सबसे प्रभावशाली देवता हैं. उनका नाम सुमरने से ही आप सारे काम बन जाएंगे, *महाबली बजरंग के सहस्र नामों का उच्चारण करने से आपकी कई वर्षों से चली आ रही परेशानियां पल भर में खत्म हो जाएंगी. *हनुमान जी की उपासना अत्यंत प्रभावशाली क्यों मानी जाती है? - हनुमान जी कलयुग के सबसे प्रभावशाली देव माने जाते हैं. - माना जाता है कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं और आज भी जीवित हैं. - अपनी अद्भुत और कठोर भक्ति के कारण इनको अष्टसिद्धि और नवनिधि का वरदान मिला है. - इसी वरदान और अपने ईष्ट श्रीराम की कृपा के कारण हनुमान जी अपने भक्तों के कष्ट हरने में सक्षम हैं. - इनकी उपासना तुरंत फलदायी होती है और हर तरह के संकट का नाश करती है. - *मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के सेवक, कार्य साधक भगवान हनुमान की महिमा अपरंपार है। उनके स्मरण मात्र से ही भूत-प्रेत, पिशाच तथा अनिष्टकारी शक्तियाँ दूर भाग जाती हैं। महावीर, ज्ञान, वैराग्य, बुद्घि के प्रदाता की साधना के अनेक रूप प्रचलित हैं। *श्री हनुमान जी के सहस्त्र नाम.....🌹🌹🌹🌹 1) ॐ हनुमते नमः। 2) ॐ श्रीप्रदाय नमः। 3) ॐ वायुपुत्राय नमः। 4) ॐ रुद्राय नमः। 5) ॐ अनघाय नमः। 6) ॐ अजराय नमः। 7) ॐ अमृत्यवे नमः। 8) ॐ वीरवीराय नमः। 9) ॐ ग्रामवासाय नमः। 10) ॐ जनाश्रयाय नमः। 11) ॐ धनदाय नमः। 12) ॐ निर्गुणाय नमः। 13) ॐ अकायाय नमः। 14) ॐ वीराय नमः। 15) ॐ निधिपतये नमः। 16) ॐ मुनये नमः। 17) ॐ पिङ्गालक्षाय नमः। 18) ॐ वरदाय नमः। 19) ॐ वाग्मिने नमः। 20) ॐ सीताशोकविनाशनाय नमः। 21) ॐ शिवाय नमः। 22) ॐ सर्वस्मै नमः। 23) ॐ परस्मै नमः। 24) ॐ अव्यक्ताय नमः। 25) ॐ व्यक्ताव्यक्ताय नमः। 26) ॐ रसाधराय नमः। 27) ॐ पिङ्गकेशाय नमः। 28) ॐ पिङ्गरोम्णे नमः। 29) ॐ श्रुतिगम्याय नमः। 30) ॐ सनातनाय नमः। 31) ॐ अनादये नमः। 32) ॐ भगवते नमः। 33) ॐ देवाय नमः। 34) ॐ विश्वहेतवे नमः। 35) ॐ निरामयाय नमः। 36) ॐ आरोग्यकर्त्रे नमः। 37) ॐ विश्वेशाय नमः। 38) ॐ विश्वनाथाय नमः। 39) ॐ हरीश्वराय नमः। 40) ॐ भर्गाय नमः। 41) ॐ रामाय नमः। 42) ॐ रामभक्ताय नमः। 43) ॐ कल्याणप्रकृतये नमः। 44) ॐ स्थिराय नमः। 45) ॐ विश्वम्भराय नमः। 46) ॐ विश्वमूर्तये नमः। 47) ॐ विश्वाकाराय नमः। 48) ॐ विश्वपाय नमः। 49) ॐ विश्वात्मने नमः। 50) ॐ विश्वसेव्याय नमः। 51) ॐ विश्वस्मै नमः। 52) ॐ विश्वहराय नमः। 53) ॐ रवये नमः। 54) ॐ विश्वचेष्टाय नमः। 55) ॐ विश्वगम्याय नमः। 56) ॐ विश्वध्येयाय नमः। 57) ॐ कलाधराय नमः। 58) ॐ प्लवङ्गमाय नमः। 59) ॐ कपिश्रेष्ठाय नमः। 60) ॐ ज्येष्ठाय नमः। 61) ॐ वैद्याय नमः। 62) ॐ वनेचराय नमः। 63) ॐ बालाय नमः। 64) ॐ वृद्धाय नमः। 65) ॐ यूने नमः। 66) ॐ तत्त्वाय नमः। 67) ॐ तत्त्वगम्याय नमः। 68) ॐ सख्ये नमः। 69) ॐ अजाय नमः। 70) ॐ अञ्जनासूनवे नमः। 71) ॐ अव्यग्राय नमः। 72) ॐ ग्रामख्याताय नमः। 73) ॐ धराधराय नमः। 74) ॐ भूर्लोकाय नमः। 75) ॐ भुवर्लोकाय नमः। 76) ॐ स्वर्लोकाय नमः। 77) ॐ महर्लोकाय नमः। 78) ॐ जनलोकाय नमः। 79) ॐ तपोलोकाय नमः। 80) ॐ अव्ययाय नमः। 81) ॐ सत्याय नमः। 82) ॐ ओंकारगम्याय नमः। 83) ॐ प्रणवाय नमः। 84) ॐ व्यापकाय नमः। 85) ॐ अमलाय नमः। 86) ॐ शिवधर्मप्रतिष्ठात्रे नमः। 87) ॐ रामेष्टाय नमः। 88) ॐ फाल्गुनप्रियाय नमः। 89) ॐ गोष्पदीकृतवारीशाय नमः। 90) ॐ पूर्णकामाय नमः। 91) ॐ धरापतये नमः। 92) ॐ रक्षोघ्नाय नमः। 93) ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः। 94) ॐ शरणागतवत्सलाय नमः। 95) ॐ जानकीप्राणदात्रे नमः। 96) ॐ रक्षःप्राणापहारकाय नमः। 97) ॐ पूर्णाय नमः। 98) ॐ सत्यायः नमः। 99) ॐ पीतवाससे नमः। 100) ॐ दिवाकरसमप्रभाय नमः। 101) ॐ देवोद्यानविहारिणे नमः। 102) ॐ देवताभयभञ्जनाय नमः। 103) ॐ भक्तोदयाय नमः। 104) ॐ भक्तलब्धाय नमः। 105) ॐ भक्तपालनतत्पराय नमः। 106) ॐ द्रोणहर्त्रे नमः। 107) ॐ शक्तिनेत्रे नमः। 108) ॐ शक्तिराक्षसमारकाय नमः। 109) ॐ अक्षघ्नाय नमः। 110) ॐ रामदूताय नमः। 111) ॐ शाकिनीजीवहारकाय नमः। 112) ॐ बुबुकारहतारातये नमः। 113) ॐ गर्वपर्वतप्रमर्दनाय नमः। 114) ॐ हेतवे नमः। 115) ॐ अहेतवे नमः। 116) ॐ प्रांशवे नमः। 117) ॐ विश्वभर्त्रे नमः। 118) ॐ जगद्गुरवे नमः। 119) ॐ जगन्नेत्रे नमः। 120) ॐ जगन्नाथाय नमः। 121) ॐ जगदीशाय नमः। 122) ॐ जनेश्वराय नमः। 123) ॐ जगद्धिताय नमः। 124) ॐ हरये नमः। 125) ॐ श्रीशाय नमः। 126) ॐ गरुडस्मयभञ्जनाय नमः। 127) ॐ पार्थध्वजाय नमः। 128) ॐ वायुपुत्राय नमः। 129) ॐ अमितपुच्छाय नमः। 130) ॐ अमितविक्रमाय नमः। 131) ॐ ब्रह्मपुच्छाय नमः। 132) ॐ परब्रह्मपुच्छाय नमः। 133) ॐ रामेष्टकारकाय नमः। 134) ॐ सुग्रीवादियुताय नमः। 135) ॐ ज्ञानिने नमः। 136) ॐ वानराय नमः। 137) ॐ वानरेश्वराय नमः। 138) ॐ कल्पस्थायिने नमः। 139) ॐ चिरञ्जीविने नमः। 140) ॐ तपनाय नमः। 141) ॐ सदाशिवाय नमः। 142) ॐ सन्नतये नमः। 143) ॐ सद्गतये नमः। 144) ॐ भुक्तिमुक्तिदाय नमः। 145) ॐ कीर्तिदायकाय नमः। 146) ॐ कीर्तये नमः। 147) ॐ कीर्तिप्रदाय नमः। 148) ॐ समुद्राय नमः। 149) ॐ श्रीप्रदाय नमः। 150) ॐ शिवाय नमः। 151) ॐ भक्तोदयाय नमः। 152) ॐ भक्तगम्याय नमः। 153) ॐ भक्तभाग्यप्रदायकाय नमः। 154) ॐ उदधिक्रमणाय नमः। 155) ॐ देवाय नमः। 156) ॐ संसारभयनाशनाय नमः। 157) ॐ वार्धिबन्धनकृते नमः। 158) ॐ विश्वजेत्रे नमः। 159) ॐ विश्वप्रतिष्ठिताय नमः। 160) ॐ लङ्कारये नमः। 161) ॐ कालपुरुषाय नमः। 162) ॐ लङ्केशगृहभञ्जनाय नमः। 163) ॐ भूतावासाय नमः। 164) ॐ वासुदेवाय नमः। 165) ॐ वसवे नमः। 166) ॐ त्रिभुवनेश्वराय नमः। 167) ॐ श्रीरामरूपाय नमः। 168) ॐ कृष्णाय नमः। 169) ॐ लङ्काप्रासादभञ्जकाय नमः। 170) ॐ कृष्णाय नमः। 171) ॐ कृष्णस्तुताय नमः। 172) ॐ शान्ताय नमः। 173) ॐ शान्तिदाय नमः। 174) ॐ विश्वपावनाय नमः। 175) ॐ विश्वभोक्त्रे नमः। 176) ॐ मारघ्नाय नमः। 177) ॐ ब्रह्मचारिणे नमः। 178) ॐ जितेन्द्रियाय नमः। 179) ॐ ऊर्ध्वगाय नमः। 180) ॐ लाङ्गुलिने नमः। 181) ॐ मालिने नमः। 182) ॐ लाङ्गूलाहतराक्षसाय नमः। 183) ॐ समीरतनुजाय नमः। 184) ॐ वीराय नमः। 185) ॐ वीरताराय नमः। 186) ॐ जयप्रदाय नमः। 187) ॐ जगन्मङ्गलदाय नमः। 188) ॐ पुण्याय नमः। 189) ॐ पुण्यश्रवणकीर्तनाय नमः। 190) ॐ पुण्यकीर्तये नमः। 191) ॐ पुण्यगतये नमः। 192) ॐ जगत्पावनापावनाय नमः। 193) ॐ देवेशाय नमः। 194) ॐ जितमाराय नमः। 195) ॐ रामभक्तिविधायकाय नमः। 196) ॐ ध्यात्रे नमः। 197) ॐ ध्येयाय नमः। 198) ॐ लयाय नमः। 199) ॐ साक्षिणे नमः। 200) ॐ चेतसे नमः। 201) ॐ चैतन्यविग्रहाय नमः। 202) ॐ ज्ञानदाय नमः। 203) ॐ प्राणदाय नमः। 204) ॐ प्राणाय नमः। 205) ॐ जगत्प्राणाय नमः। 206) ॐ समीरणाय नमः। 207) ॐ विभीषणप्रियाय नमः। 208) ॐ शूराय नमः। 209) ॐ पिप्पलाश्रयसिद्धिदाय नमः। 210) ॐ सिद्धाय नमः। 211) ॐ सिद्धाश्रयाय नमः। 212) ॐ कालाय नमः। 213) ॐ महोक्षाय नमः। 214) ॐ कालाजान्तकाय नमः। 215) ॐ लङ्केशनिधनाय नमः। 216) ॐ स्थायिने नमः। 217) ॐ लङ्कादाहकाय नमः। 218) ॐ ईश्वराय नमः। 219) ॐ चन्द्रसूर्याग्निनेत्राय नमः। 220) ॐ कालाग्नये नमः। 221) ॐ प्रलयान्तकाय नमः। 222) ॐ कपिलाय नमः। 223) ॐ कपिशाय नमः। 224) ॐ पुण्यराशये नमः। 225) ॐ द्वादशराशिगाय नमः। 226) ॐ सर्वाश्रयाय नमः। 227) ॐ अप्रमेयात्मने नमः। 228) ॐ रेवत्यादिनिवारकाय नमः। 229) ॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः। 230) ॐ सीताजीवनहेतुकाय नमः। 231) ॐ रामध्येयाय नमः। 232) ॐ हृषिकेशाय नमः। 233) ॐ विष्णुभक्ताय नमः। 234) ॐ जटिने नमः। 235) ॐ बलिने नमः। 236) ॐ देवारिदर्पघ्ने नमः। 237) ॐ होत्रे नमः। 238) ॐ धात्रे नमः। 239) ॐ कर्त्रे नमः। 240) ॐ जगत्प्रभवे नमः। 241) ॐ नगरग्रामपालाय नमः। 242) ॐ शुद्धाय नमः। 243) ॐ बुद्धाय नमः। 244) ॐ निरत्रपाय नमः। 245) ॐ निरञ्जनाय नमः। 246) ॐ निर्विकल्पाय नमः। 247) ॐ गुणातीताय नमः। 248) ॐ भयङ्कराय नमः। 249) ॐ हनुमते नमः। 250) ॐ दुराराध्याय नमः। 251) ॐ तपःसाध्याय नमः। 252) ॐ महेश्वराय नमः। 253) ॐ जानकीधनशोकोत्थतापहर्त्रे नमः। 254) ॐ परात्परस्मै नमः। 255) ॐ वाङ्मयाय नमः। 256) ॐ सदसद्रूपाय नमः। 257) ॐ कारणाय नमः। 258) ॐ प्रकृतेः परस्मै नमः। 259) ॐ भाग्यदाय नमः। 260) ॐ निर्मलाय नमः। 261) ॐ नेत्रे नमः। 262) ॐ पुच्छलङ्काविदाहकाय नमः। 263) ॐ पुच्छबद्धयातुधानाय नमः। 264) ॐ यातुधानरिपुप्रियाय नमः। 265) ॐ छायापहारिणे नमः। 266) ॐ भूतेशाय नमः। 267) ॐ लोकेशाय नमः। 268) ॐ सद्गतिप्रदाय नमः। 269) ॐ प्लवङ्गमेश्वराय नमः। 270) ॐ क्रोधाय नमः। 271) ॐ क्रोधसंरक्तलोचनाय नमः। 272) ॐ सौम्याय नमः। 273) ॐ गुरवे नमः। 274) ॐ काव्यकर्त्रे नमः। 275) ॐ भक्तानां वरप्रदाय नमः। 276) ॐ भक्तानुकम्पिने नमः। 277) ॐ विश्वेशाय नमः। 278) ॐ पुरुहूताय नमः। 279) ॐ पुरन्दराय नमः। 280) ॐ क्रोधहर्त्रे नमः। 281) ॐ तमोहर्त्रे नमः। 282) ॐ भक्ताभयवरप्रदाय नमः। 283) ॐ अग्नये नमः। 284) ॐ विभावसवे नमः। 285) ॐ भास्वते नमः। 286) ॐ यमाय नमः। 287) ॐ निर्ॠतये नमः। 288) ॐ वरुणाय नमः। 289) ॐ वायुगतिमते नमः। 290) ॐ वायवे नमः। 291) ॐ कौबेराय नमः। 292) ॐ ईश्वराय नमः। 293) ॐ रवये नमः। 294) ॐ चन्द्राय नमः। 295) ॐ कुजाय नमः। 296) ॐ सौम्याय नमः। 297) ॐ गुरवे नमः। 298) ॐ काव्याय नमः। 299) ॐ शनैश्चराय नमः। 300) ॐ राहवे नमः। 301) ॐ केतवे नमः। 302) ॐ मरुते नमः। 303) ॐ होत्रे नमः। 304) ॐ दात्रे नमः। 305) ॐ हर्त्रे नमः। 306) ॐ समीरजाय नमः। 307) ॐ मशकीकृतदेवारये नमः। 308) ॐ दैत्यारये नमः। 309) ॐ मधुसूदनाय नमः। 310) ॐ कामाय नमः। 311) ॐ कपये नमः। 312) ॐ कामपालाय नमः। 313) ॐ कपिलाय नमः। 314) ॐ विश्वजीवनाय नमः। 315) ॐ भागीरथीपदाम्भोजाय नमः। 316) ॐ सेतुबन्धविशारदाय नमः। 317) ॐ स्वाहायै नमः। 318) ॐ स्वधायै नमः। 319) ॐ हविषे नमः। 320) ॐ कव्याय नमः। 321) ॐ हव्यवाहप्रकाशकाय नमः। 322) ॐ स्वप्रकाशाय नमः। 323) ॐ महावीराय नमः। 324) ॐ लघवे नमः। 325) ॐ ऊर्जितविक्रमाय नमः। 326) ॐ उड्डीनोड्डीनगतिमते नमः। 327) ॐ सद्गतये नमः। 328) ॐ पुरुषोत्तमाय नमः। 329) ॐ जगदात्मने नमः। 330) ॐ जगद्योनये नमः। 331) ॐ जगदन्ताय नमः। 332) ॐ अनन्तकाय नमः। 333) ॐ विपाप्मने नमः। 334) ॐ निष्कलङ्काय नमः। 335) ॐ महते नमः। 336) ॐ महदहङ्कृतये नमः। 337) ॐ खाय नमः। 338) ॐ वायवे नमः। 339) ॐ पृथिव्यै नमः। 340) ॐ अद्भ्यो नमः। 341) ॐ वह्नये नमः। 342) ॐ दिक्पालाय नमः। 343) ॐ क्षेत्रज्ञाय नमः। 344) ॐ क्षेत्रहर्त्रे नमः। 345) ॐ पल्वलीकृतसागराय नमः। 346) ॐ हिरण्मयाय नमः। 347) ॐ पुराणाय नमः। 348) ॐ खेचराय नमः। 349) ॐ भूचराय नमः। 350) ॐ अमराय नमः। 351) ॐ हिरण्यगर्भाय नमः। 352) ॐ सूत्रात्मने नमः। 353) ॐ राजराजाय नमः। 354) ॐ विशाम्पतये नमः। 355) ॐ वेदान्तवेद्याय नमः। 356) ॐ उद्गीथाय नमः। 357) ॐ वेदवेदाङ्गपारगाय नमः। 358) ॐ प्रतिग्रामस्थितये नमः। 359) ॐ सद्यः स्फूर्तिदात्रे नमः। 360) ॐ गुणाकराय नमः। 361) ॐ नक्षत्रमालिने नमः। 362) ॐ भूतात्मने नमः। 363) ॐ सुरभये नमः। 364) ॐ कल्पपादपाय नमः। 365) ॐ चिन्तामणये नमः। 366) ॐ गुणनिधये नमः। 367) ॐ प्रजाधाराय नमः। 368) ॐ अनुत्तमाय नमः। 369) ॐ पुण्यश्लोकाय नमः। 370) ॐ पुरारातये नमः। 371) ॐ ज्योतिष्मते नमः। 372) ॐ शर्वरीपतये नमः। 373) ॐ किल्किलारावसन्त्रस्तभूतप्रेतपिशाचकाय नमः। 374) ॐ ऋणत्रयहराय नमः। 375) ॐ सूक्ष्माय नमः। 376) ॐ स्थूलाय नमः। 377) ॐ सर्वगतये नमः। 378) ॐ पुंसे नमः। 379) ॐ अपस्मारहराय नमः। 380) ॐ स्मर्त्रे नमः। 381) ॐ श्रुतये नमः। 382) ॐ गाथायै नमः। 383) ॐ स्मृतये नमः। 384) ॐ मनवे नमः। 385) ॐ स्वर्गद्वाराय नमः। 386) ॐ प्रजाद्वाराय नमः। 387) ॐ मोक्षद्वाराय नमः। 388) ॐ यतीश्वराय नमः। 389) ॐ नादरूपायx नमः। 390) ॐ परस्मै ब्रह्मणे नमः। 391) ॐ ब्रह्मणे नमः। 392) ॐ ब्रह्मपुरातनाय नमः। 393) ॐ एकस्मै नमः। 394) ॐ अनेकाय नमः। 395) ॐ जनाय नमः। 396) ॐ शुक्लाय नमः। 397) ॐ स्वयंज्योतिषे नमः। 398) ॐ अनाकुलाय नमः। 399) ॐ ज्योतिर्ज्योतिषे नमः। 400) ॐ अनादये नमः। 401) ॐ सात्त्विकाय नमः। 402) ॐ राजसाय नमः। 403) ॐ तमाय नमः। 404) ॐ तमोहर्त्रे नमः। 405) ॐ निरालम्बाय नमः। 406) ॐ निराकाराय नमः। 407) ॐ गुणाकराय नमः। 408) ॐ गुणाश्रयाय नमः। 409) ॐ गुणमयाय नमः। 410) ॐ बृहत्कर्मणे नमः। 411) ॐ बृहद्यशसे नमः। 412) ॐ बृहद्धनवे नमः। 413) ॐ बृहत्पादाय नमः। 414) ॐ बृहन्मूर्ध्ने नमः। 415) ॐ बृहत्स्वनाय नमः। 416) ॐ बृहत्कर्णाय नमः। 417) ॐ बृहन्नासाय नमः। 418) ॐ बृहद्बाहवे नमः। 419) ॐ बृहत्तनवे नमः। 420) ॐ बृहज्जानवे नमः। 421) ॐ बृहत्कार्याय नमः। 422) ॐ बृहत्पुच्छाय नमः। 423) ॐ बृहत्कराय नमः। 424) ॐ बृहद्गतये नमः। 425) ॐ बृहत्सेव्याय नमः। 426) ॐ बृहल्लोकफलप्रदाय नमः। 427) ॐ बृहच्छक्तये नमः। 428) ॐ बृहद्वाञ्छाफलदाय नमः। 429) ॐ बृहदीश्वराय नमः। 430) ॐ बृहल्लोकनुताय नमः। 431) ॐ द्रष्ट्रे नमः। 432) ॐ विद्यादात्रे नमः। 433) ॐ जगद्गुरवे नमः। 434) ॐ देवाचार्याय नमः। 435) ॐ सत्यवादिने नमः। 436) ॐ ब्रह्मवादिने नमः। 437) ॐ कलाधराय नमः। 438) ॐ सप्तपातालगामिने नमः। 439) ॐ मलयाचलसंश्रयाय नमः। 440) ॐ उत्तराशास्थिताय नमः। 441) ॐ श्रीदाय नमः। 442) ॐ दिव्यौषधिवशाय नमः। 443) ॐ खगाय नमः। 444) ॐ शाखामृगाय नमः। 445) ॐ कपीन्द्राय नमः। 446) ॐ पुराणश्रुतिचञ्चुराय नमः। 447) ॐ चतुरब्राह्मणाय नमः। 448) ॐ योगिने नमः। 449) ॐ योगगम्याय नमः। 450) ॐ परस्मै नमः। 451) ॐ अवरस्मै नमः। 452) ॐ अनादिनिधनाय नमः। 453) ॐ व्यासाय नमः। 454) ॐ वैकुण्ठाय नमः। 455) ॐ पृथिवीपतये नमः। 456) ॐ अपराजिताय नमः। 457) ॐ जितारातये नमः। 458) ॐ सदानन्दाय नमः। 459) ॐ दयायुताय नमः। 460) ॐ गोपालाय नमः। 461) ॐ गोपतये नमः। 462) ॐ गोप्त्रे नमः। 463) ॐ कलिकालपराशराय नमः। 464) ॐ मनोवेगिने नमः। 465) ॐ सदायोगिने नमः। 466) ॐ संसारभयनाशनाय नमः। 467) ॐ तत्त्वदात्रे नमः। 468) ॐ तत्त्वज्ञाय नमः। 469) ॐ तत्त्वाय नमः। 470) ॐ तत्त्वप्रकाशकाय नमः। 471) ॐ शुद्धाय नमः। 472) ॐ बुद्धाय नमः। 473) ॐ नित्यमुक्ताय नमः। 474) ॐ भक्तराजाय नमः। 475) ॐ जयद्रथाय नमः। 476) ॐ प्रलयाय नमः। 477) ॐ अमितमायाय नमः। 478) ॐ मायातीताय नमः। 479) ॐ विमत्सराय नमः। 480) ॐ मायाभर्जितरक्षसे नमः। 481) ॐ मायानिर्मितविष्टपाय नमः। 482) ॐ मायाश्रयाय नमः। 483) ॐ निर्लेपाय नमः। 484) ॐ मायानिर्वर्तकाय नमः। 485) ॐ सुखाय नमः। 486) ॐ सुखिने नमः। 487) ॐ सुखप्रदाय नमः। 488) ॐ नागाय नमः। 489) ॐ महेशकृतसंस्तवाय नमः। 490) ॐ महेश्वराय नमः। 491) ॐ सत्यसन्धाय नमः। 492) ॐ शरभाय नमः। 493) ॐ कलिपावनाय नमः। 494) ॐ सहस्रकन्धरबलविध्वंसनविचक्षणाय नमः। 495) ॐ सहस्रबाहवे नमः। 496) ॐ सहजाय नमः। 497) ॐ द्विबाहवे नमः। 498) ॐ द्विभुजाय नमः। 499) ॐ अमराय नमः। 500) ॐ चतुर्भुजाय नमः। 501) ॐ दशभुजाय नमः। 502) ॐ हयग्रीवाय नमः। 503) ॐ खगाननाय नमः। 504) ॐ कपिवक्त्राय नमः। 505) ॐ कपिपतये नमः। 506) ॐ नरसिंहाय नमः। 507) ॐ महाद्युतये नमः। 508) ॐ भीषणाय नमः। 509) ॐ भावगाय नमः। 510) ॐ वन्द्याय नमः। 511) ॐ वराहाय नमः। 512) ॐ वायुरूपधृषे नमः। 513) ॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः। 514) ॐ पराजितदशाननाय नमः। 515) ॐ पारिजातनिवासिने नमः। 516) ॐ वटवे नमः। 517) ॐ वचनकोविदाय नमः। 518) ॐ सुरसास्यविनिर्मुक्ताय नमः। 519) ॐ सिंहिकाप्राणहारकाय नमः। 520) ॐ लङ्कालङ्कारविध्वंसिने नमः। 521) ॐ वृषदंशकरूपधृषे नमः। 522) ॐ रात्रिसंचारकुशलाय नमः। 523) ॐ रात्रिंचरगृहाग्निदाय नमः। 524) ॐ किङ्करान्तकराय नमः। 525) ॐ जम्बुमालिहन्त्रे नमः। 526) ॐ उग्ररूपधृषे नमः। 527) ॐ आकाशचारिणे नमः। 528) ॐ हरिगाय नमः। 529) ॐ मेघनादरणोत्सुकाय नमः। 530) ॐ मेघगम्भीरनिनदाय नमः। 531) ॐ महारावणकुलान्तकाय नमः। 532) ॐ कालनेमिप्राणहारिणे नमः। 533) ॐ मकरीशापमोक्षदाय नमः। 534) ॐ रसाय नमः। 535) ॐ रसज्ञाय नमः। 536) ॐ सम्मानाय नमः। 537) ॐ रूपाय नमः। 538) ॐ चक्षुषे नमः। 539) ॐ श्रुतये नमः। 540) ॐ वचसे नमः। 541) ॐ घ्राणाय नमः। 542) ॐ गन्धाय नमः। 543) ॐ स्पर्शनाय नमः। 544) ॐ स्पर्शाय नमः। 545) ॐ अहङ्कारमानगाय नमः। 546) ॐ नेतिनेतीतिगम्याय नमः। 547) ॐ वैकुण्ठभजनप्रियाय नमः। 548) ॐ गिरीशाय नमः। 549) ॐ गिरिजाकान्ताय नमः। 550) ॐ दुर्वाससे नमः। 551) ॐ कवये नमः। 552) ॐ अङ्गिरसे नमः। 553) ॐ भृगवे नमः। 554) ॐ वसिष्ठाय नमः। 555) ॐ च्यवनाय नमः। 556) ॐ नारदाय नमः। 557) ॐ तुम्बराय नमः। 558) ॐ अमलाय नमः। 559) ॐ विश्वक्षेत्राय नमः। 560) ॐ विश्वबीजाय नमः। 561) ॐ विश्वनेत्राय नमः। 562) ॐ विश्वपाय नमः। 563) ॐ याजकाय नमः। 564) ॐ यजमानाय नमः। 565) ॐ पावकाय नमः। 566) ॐ पितृभ्यो नमः। 567) ॐ श्रद्धायै नमः। 568) ॐ बुद्धयै नमः। 569) ॐ क्षमायै नमः। 570) ॐ तन्द्रायै नमः। 571) ॐ मन्त्राय नमः। 572) ॐ मन्त्रयित्रे नमः। 573) ॐ स्वराय नमः। 574) ॐ राजेन्द्राय नमः। 575) ॐ भूपतये नमः। 576) ॐ रुण्डमालिने नमः। 577) ॐ संसारसारथये नमः। 578) ॐ नित्यसम्पूर्णकामाय नमः। 579) ॐ भक्तकामदुहे नमः। 580) ॐ उत्तमाय नमः। 581) ॐ गणपाय नमः। 582) ॐ केशवाय नमः। 583) ॐ भ्रात्रे नमः। 584) ॐ पित्रे नमः। 585) ॐ मात्रे नमः। 586) ॐ मारुतये नमः। 587) ॐ सहस्रमूर्ध्ने नमः। 588) ॐ अनेकास्याय नमः। 589) ॐ सहस्राक्षाय नमः। 590) ॐ सहस्रपादे नमः। 591) ॐ कामजिते नमः। 592) ॐ कामदहनाय नमः। 593) ॐ कामाय नमः। 594) ॐ कामफलप्रदाय नमः। 595) ॐ मुद्रापहारिणे नमः। 596) ॐ रक्षोघ्नाय नमः। 597) ॐ क्षितिभारहराय नमः। 598) ॐ बलाय नमः। 599) ॐ नखदंष्ट्रायुधाय नमः। 600) ॐ विष्णवे नमः। 601) ॐ भक्ताभयवरप्रदाय नमः। 602) ॐ दर्पघ्ने नमः। 603) ॐ दर्पदाय नमः। 604) ॐ दंष्ट्राशतमूर्तये नमः। 605) ॐ अमूर्तिमते नमः। 606) ॐ महानिधये नमः। 607) ॐ महाभागाय नमः। 608) ॐ महाभर्गाय नमः। 609) ॐ महार्द्धिदाय नमः। 610) ॐ महाकाराय नमः। 611) ॐ महायोगिने नमः। 612) ॐ महातेजसे नमः। 613) ॐ महाद्युतये नमः। 614) ॐ महासनाय नमः। 615) ॐ महानादाय नमः। 616) ॐ महामन्त्राय नमः। 617) ॐ महामतये नमः। 618) ॐ महागमाय नमः। 619) ॐ महोदाराय नमः। 620) ॐ महादेवात्मकाय नमः। 621) ॐ विभवे नमः। 622) ॐ रौद्रकर्मणे नमः। 623) ॐ क्रूरकर्मणे नमः। 624) ॐ रत्नाभाय नमः। 625) ॐ कृतागमाय नमः। 626) ॐ अम्भोधिलङ्घनाय नमः। 627) ॐ सिंहाय नमः। 628) ॐ सत्यधर्मप्रमोदनाय नमः। 629) ॐ जितामित्राय नमः। 630) ॐ जयाय नमः। 631) ॐ सोमाय नमः। 632) ॐ विजयाय नमः। 633) ॐ वायुनन्दनाय नमः। 634) ॐ जीवदात्रे नमः। 635) ॐ सहस्रांशवे नमः। 636) ॐ मुकुन्दाय नमः। 637) ॐ भूरिदक्षिणाय नमः। 638) ॐ सिद्धार्थाय नमः। 639) ॐ सिद्धिदाय नमः। 640) ॐ सिद्धसङ्कल्पाय नमः। 641) ॐ सिद्धिहेतुकाय नमः। 642) ॐ सप्तपातालचरणाय नमः। 643) ॐ सप्तर्षिगणवन्दिताय नमः। 644) ॐ सप्ताब्धिलङ्घनाय नमः। 645) ॐ वीराय नमः। 646) ॐ सप्तद्वीपोरुमण्डलाय नमः। 647) ॐ सप्ताङ्गराज्यसुखदाय नमः। 648) ॐ सप्तमातृनिषेविताय नमः। 649) ॐ सप्तस्वर्लोकमुकुटाय नमः। 650) ॐ सप्तहोत्रे नमः। 651) ॐ स्वाराश्रयाय नमः। 652) ॐ सप्तच्छन्दोनिधये नमः। 653) ॐ सप्तच्छन्दसे नमः। 654) ॐ सप्तजनाश्रयाय नमः। 655) ॐ सप्तसामोपगीताय नमः। 656) ॐ सप्तपातालसंश्रयाय नमः। 657) ॐ मेधादाय नमः। 658) ॐ कीर्तिदाय नमः। 659) ॐ शोकहारिणे नमः। 660) ॐ दौर्भाग्यनाशनाय नमः। 661) ॐ सर्वरक्षाकराय नमः। 662) ॐ गर्भदोषघ्ने नमः। 663) ॐ पुत्रपौत्रदाय नमः। 664) ॐ प्रतिवादिमुखस्तम्भाय नमः। 665) ॐ रुष्टचित्तप्रसादनाय नमः। 666) ॐ पराभिचारशमनाय नमः। 667) ॐ दुःखघ्ने नमः। 668) ॐ बन्धमोक्षदाय नमः। 669) ॐ नवद्वारपुराधाराय नमः। 670) ॐ नवद्वारनिकेतनाय नमः। 671) ॐ नरनारायणस्तुत्याय नमः। 672) ॐ नवनाथमहेश्वराय नमः। 673) ॐ मेखलिने नमः। 674) ॐ कवचिने नमः। 675) ॐ खड्गिने नमः। 676) ॐ भ्राजिष्णवे नमः। 677) ॐ जिष्णुसारथये नमः। 678) ॐ बहुयोजनविस्तीर्णपुच्छाय नमः। 679) ॐ पुच्छहतासुराय नमः। 680) ॐ दुष्टग्रहनिहन्त्रे नमः। 681) ॐ पिशाचग्रहघातकाय नमः। 682) ॐ बालग्रहविनाशिने नमः। 683) ॐ धर्मनेत्रे नमः। 684) ॐ कृपाकराय नमः। 685) ॐ उग्रकृत्याय नमः। 686) ॐ उग्रवेगाय नमः। 687) ॐ उग्रनेत्राय नमः। 688) ॐ शतक्रतवे नमः। 689) ॐ शतमन्युनुताय नमः। 690) ॐ स्तुत्याय नमः। 691) ॐ स्तुतये नमः। 692) ॐ स्तोत्रे नमः। 693) ॐ महाबलाय नमः। 694) ॐ समग्रगुणशालिने नमः। 695) ॐ व्यग्राय नमः। 696) ॐ रक्षोविनाशकाय नमः। 697) ॐ रक्षोऽग्निदाहाय नमः। 698) ॐ ब्रह्मेशाय नमः। 699) ॐ श्रीधराय नमः। 700) ॐ भक्तवत्सलाय नमः। 701) ॐ मेघनादाय नमः। 702) ॐ मेघरूपाय नमः। 703) ॐ मेघवृष्टिनिवारकाय नमः। 704) ॐ मेघजीवनहेतवे नमः। 705) ॐ मेघश्यामाय नमः। 706) ॐ परात्मकाय नमः। 707) ॐ समीरतनयाय नमः। 708) ॐ योद्ध्रे नमः। 709) ॐ नृत्यविद्याविशारदाय नमः। 710) ॐ अमोघाय नमः। 711) ॐ अमोघदृष्टये नमः। 712) ॐ इष्टदाय नमः। 713) ॐ अरिष्टनाशनाय नमः। 714) ॐ अर्थाय नमः। 715) ॐ अनर्थापहारिणे नमः। 716) ॐ समर्थाय नमः। 717) ॐ रामसेवकाय नमः। 718) ॐ अर्थिवन्द्याय नमः। 719) ॐ असुरारातये नमः। 720) ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः। 721) ॐ आत्मभुवे नमः। 722) ॐ सङ्कर्षणाय नमः। 723) ॐ विशुद्धात्मने नमः। 724) ॐ विद्याराशये नमः। 725) ॐ सुरेश्वराय नमः। 726) ॐ अचलोद्धारकाय नमः। 727) ॐ नित्याय नमः। 728) ॐ सेतुकृते नमः। 729) ॐ रामसारथये नमः। 730) ॐ आनन्दाय नमः। 731) ॐ परमानन्दाय नमः। 732) ॐ मत्स्याय नमः। 733) ॐ कूर्माय नमः। 734) ॐ निराश्रयाय नमः। 735) ॐ वाराहाय नमः। 736) ॐ नारसिंहाय नमः। 737) ॐ वामनाय नमः। 738) ॐ जमदग्निजाय नमः। 739) ॐ रामाय नमः। 740) ॐ कृष्णाय नमः। 741) ॐ शिवाय नमः। 742) ॐ बुद्धाय नमः। 743) ॐ कल्किने नमः। 744) ॐ रामाश्रयाय नमः। 745) ॐ हरये नमः। 746) ॐ नन्दिने नमः। 747) ॐ भृङ्गिणे नमः। 748) ॐ चण्डिने नमः। 749) ॐ गणेशाय नमः। 750) ॐ गणसेविताय नमः। 751) ॐ कर्माध्यक्षाय नमः। 752) ॐ सुराध्यक्षाय नमः। 753) ॐ विश्रामाय नमः। 754) ॐ जगतीपतये नमः। 755) ॐ जगन्नाथाय नमः। 756) ॐ कपीशाय नमः। 757) ॐ सर्वावासाय नमः। 758) ॐ सदाश्रयाय नमः। 759) ॐ सुग्रीवादिस्तुताय नमः। 760) ॐ दान्ताय नमः। 761) ॐ सर्वकर्मणे नमः। 762) ॐ प्लवङ्गमाय नमः। 763) ॐ नखदारितरक्षसे नमः। 764) ॐ नखयुद्धविशारदाय नमः। 765) ॐ कुशलाय नमः। 766) ॐ सुधनाय नमः। 767) ॐ शेषाय नमः। 768) ॐ वासुकये नमः। 769) ॐ तक्षकाय नमः। 770) ॐ स्वर्णवर्णाय नमः। 771) ॐ बलाढ्याय नमः। 772) ॐ पुरुजेत्रे नमः। 773) ॐ अघनाशनाय नमः। 774) ॐ कैवल्यरूपाय नमः। 775) ॐ कैवल्याय नमः। 776) ॐ गरुडाय नमः। 777) ॐ पन्नगोरगाय नमः। 778) ॐ किल्किल् रावहतारातये नमः। 779) ॐ गर्वपर्वतभेदनाय नमः। 780) ॐ वज्राङ्गाय नमः। 781) ॐ वज्रदंष्ट्राय नमः। 782) ॐ भक्तवज्रनिवारकाय नमः। 783) ॐ नखायुधाय नमः। 784) ॐ मणिग्रीवाय नमः। 785) ॐ ज्वालामालिने नमः। 786) ॐ भास्कराय नमः। 787) ॐ प्रौढप्रतापाय नमः। 788) ॐ तपनाय नमः। 789) ॐ भक्ततापनिवारकाय नमः। 790) ॐ शरणाय नमः। 791) ॐ जीवनाय नमः। 792) ॐ भोक्त्रे नमः। 793) ॐ नानाचेष्टाय नमः। 794) ॐ अचञ्चलाय नमः। 795) ॐ स्वस्तिमते नमः। 796) ॐ स्वास्तिदाय नमः। 797) ॐ दुःखशातनाय नमः। 798) ॐ पवनात्मजाय नमः। 799) ॐ पावनाय नमः। 800) ॐ पवनाय नमः। 801) ॐ कान्ताय नमः। 802) ॐ भक्तागःसहनाय नमः। 803) ॐ बलिने नमः। 804) ॐ मेघनादरिपवे नमः। 805) ॐ मेघनादसंहतराक्षसाय नमः। 806) ॐ क्षराय नमः। 807) ॐ अक्षराय नमः। 808) ॐ विनीतात्मने नमः। 809) ॐ वानरेशाय नमः। 810) ॐ सताङ्गतये नमः। 811) ॐ श्रीकण्ठाय नमः। 812) ॐ शितिकण्ठाय नमः। 813) ॐ सहायाय नमः। 814) ॐ सहनायकाय नमः। 815) ॐ अस्थूलाय नमः। 816) ॐ अनणवे नमः। 817) ॐ भर्गाय नमः। 818) ॐ दिव्याय नमः। 819) ॐ संसृतिनाशनाय नमः। 820) ॐ अध्यात्मविद्यासाराय नमः। 821) ॐ अध्यात्मकुशलाय नमः। 822) ॐ सुधिये नमः। 823) ॐ अकल्मषाय नमः। 824) ॐ सत्यहेतवे नमः। 825) ॐ सत्यदाय नमः। 826) ॐ सत्यगोचराय नमः। 827) ॐ सत्यगर्भाय नमः। 828) ॐ सत्यरूपाय नमः। 829) ॐ सत्याय नमः। 830) ॐ सत्यपराक्रमाय नमः। 831) ॐ अञ्जनाप्राणलिङ्गाय नमः। 832) ॐ वायुवंशोद्भवाय नमः। 833) ॐ शुभाय नमः। 834) ॐ भद्ररूपाय नमः। 835) ॐ रुद्ररूपाय नमः। 836) ॐ सुरूपाय नमः। 837) ॐ चित्ररूपधृषे नमः। 838) ॐ मैनाकवन्दिताय नमः। 839) ॐ सूक्ष्मदर्शनाय नमः। 840) ॐ विजयाय नमः। 841) ॐ जयाय नमः। 842) ॐ क्रान्तदिङ्मण्डलाय नमः। 843) ॐ रुद्राय नमः। 844) ॐ प्रकटीकृतविक्रमाय नमः। 845) ॐ कम्बुकण्ठाय नमः। 846) ॐ प्रसन्नात्मने नमः। 847) ॐ ह्र​स्वनासाय नमः। 848) ॐ वृकोदराय नमः। 849) ॐ लम्बौष्ठाय नमः। 850) ॐ कुण्डलिने नमः। 851) ॐ चित्रमालिने नमः। 852) ॐ योगविदां वराय नमः। 853) ॐ विपश्चिते नमः। 854) ॐ कवये नमः। 855) ॐ आनन्दविग्रहाय नमः। 856) ॐ अनल्पशासनाय नमः। 857) ॐ फाल्गुनीसूनवे नमः। 858) ॐ अव्यग्राय नमः। 859) ॐ योगात्मने नमः। 860) ॐ योगतत्पराय नमः। 861) ॐ योगविदे नमः। 862) ॐ योगकर्त्रे नमः। 863) ॐ योगयोनये नमः। 864) ॐ दिगम्बराय नमः। 865) ॐ अकारादिहकारान्तवर्णनिर्मितविग्रहाय नमः। 866) ॐ उलूखलमुखाय नमः। 867) ॐ सिद्धसंस्तुताय नमः। 868) ॐ प्रमथेश्वराय नमः। 869) ॐ श्लिष्टजङ्घाय नमः। 870) ॐ श्लिष्टजानवे नमः। 871) ॐ श्लिष्टपाणये नमः। 872) ॐ शिखाधराय नमः। 873) ॐ सुशर्मणे नमः। 874) ॐ अमितशर्मणे नमः। 875) ॐ नारायणपरायणाय नमः। 876) ॐ जिष्णवे नमः। 877) ॐ भविष्णवे नमः। 878) ॐ रोचिष्णवे नमः। 879) ॐ ग्रसिष्णवे नमः। 880) ॐ स्थाणवे नमः। 881) ॐ हरिरुद्रानुसेकाय नमः। 882) ॐ कम्पनाय नमः। 883) ॐ भूमिकम्पनाय नमः। 884) ॐ गुणप्रवाहाय नमः। 885) ॐ सूत्रात्मने नमः। 886) ॐ वीतरागस्तुतिप्रियाय नमः। 887) ॐ नागकन्याभयध्वंसिने नमः। 888) ॐ रुक्मवर्णाय नमः। 889) ॐ कपालभृते नमः। 890) ॐ अनाकुलाय नमः। 891) ॐ भवोपायाय नमः। 892) ॐ अनपायाय नमः। 893) ॐ वेदपारगाय नमः। 894) ॐ अक्षराय नमः। 895) ॐ पुरुषाय नमः। 896) ॐ लोकनाथाय नमः। 897) ॐ ऋक्षःप्रभवे नमः। 898) ॐ दृढाय नमः। 899) ॐ अष्टाङ्गयोग फलभुजे नमः। 900) ॐ सत्यसन्धाय नमः। 901) ॐ पुरुष्टुताय नमः। 902) ॐ श्मशानस्थाननिलयाय नमः। 903) ॐ प्रेतविद्रावणक्षमाय नमः। 904) ॐ पञ्चाक्षरपराय नमः। 905) ॐ पञ्चमातृकाय नमः। 906) ॐ रञ्जनध़्वजाय नमः। 907) ॐ योगिनीवृन्दवन्द्यश्रियै नमः। 908) ॐ शत्रुघ्नाय नमः। 909) ॐ अनन्तविक्रमाय नमः। 910) ॐ ब्रह्मचारिणे नमः। 911) ॐ इन्द्रियरिपवे नमः। 912) ॐ धृतदण्डाय नमः। 913) ॐ दशात्मकाय नमः। 914) ॐ अप्रपञ्चाय नमः। 915) ॐ सदाचाराय नमः। 916) ॐ शूरसेनाविदारकाय नमः। 917) ॐ वृद्धाय नमः। 918) ॐ प्रमोदाय नमः। 919) ॐ आनन्दाय नमः। 920) ॐ सप्तद्वीपपतिन्धराय नमः। 921) ॐ नवद्वारपुराधाराय नमः। 922) ॐ प्रत्यग्राय नमः। 923) ॐ सामगायकाय नमः। 924) ॐ षट्चक्रधान्मे नमः। 925) ॐ स्वर्लोकाभयकृते नमः। 926) ॐ मानदाय नमः। 927) ॐ मदाय नमः। 928) ॐ सर्ववश्यकराय नमः। 929) ॐ शक्तये नमः। 930) ॐ अनन्ताय नमः। 931) ॐ अनन्तमङ्गलाय नमः। 932) ॐ अष्टमूर्तये नमः। 933) ॐ नयोपेताय नमः। 934) ॐ विरूपाय नमः। 935) ॐ सुरसुन्दराय नमः। 936) ॐ धूमकेतवे नमः। 937) ॐ महाकेतवे नमः। 938) ॐ सत्यकेतवे नमः। 939) ॐ महारथाय नमः। 940) ॐ नन्दिप्रियाय नमः। 941) ॐ स्वतन्त्राय नमः। 942) ॐ मेखलिने नमः। 943) ॐ डमरुप्रियाय नमः। 944) ॐ लौहाङ्गाय नमः। 945) ॐ सर्वविदे नमः। 946) ॐ धन्विने नमः। 947) ॐ खण्डलाय नमः। 948) ॐ शर्वाय नमः। 949) ॐ ईश्वराय नमः। 950) ॐ फलभुजे नमः। 951) ॐ फलहस्ताय नमः। 952) ॐ सर्वकर्मफलप्रदाय नमः। 953) ॐ धर्माध्यक्षाय नमः। 954) ॐ धर्मपालाय नमः। 955) ॐ धर्माय नमः। 956) ॐ धर्मप्रदाय नमः। 957) ॐ अर्थदाय नमः। 958) ॐ पञ्चविंशतितत्त्वज्ञाय नमः। 959) ॐ तारकाय नमः। 960) ॐ ब्रह्मतत्पराय नमः। 961) ॐ त्रिमार्गवसतये नमः। 962) ॐ भीमाय नमः। 963) ॐ सर्वदुःखनिबर्हणाय नमः। 964) ॐ ऊर्जस्वते नमः। 965) ॐ निष्कलाय नमः। 966) ॐ शूलिने नमः। 967) ॐ मौलिने नमः। 968) ॐ गर्जन्निशाचराय नमः। 969) ॐ रक्ताम्बरधराय नमः। 970) ॐ रक्ताय नमः। 971) ॐ रक्तमाल्याय नमः। 972) ॐ विभूषणाय नमः। 973) ॐ वनमालिने नमः। 974) ॐ शुभाङ्गाय नमः। 975) ॐ श्वेताय नमः। 976) ॐ श्वेताम्बराय नमः। 977) ॐ यूने नमः। 978) ॐ जयाय नमः। 979) ॐ अजयपरीवाराय नमः। 980) ॐ सहस्रवदनाय नमः। 981) ॐ कपये नमः। 982) ॐ शाकिनीडाकिनीयक्षरक्षोभूतप्रभञ्जकाय नमः। 983) ॐ सद्योजाताय नमः। 984) ॐ कामगतये नमः। 985) ॐ ज्ञानमूर्तये नमः। 986) ॐ यशस्कराय नमः। 987) ॐ शम्भुतेजसे नमः। 988) ॐ सार्वभौमाय नमः। 989) ॐ विष्णुभक्ताय नमः। 990) ॐ प्लवङ्गमाय नमः। 991) ॐ चतुर्नवतिमन्त्रज्ञाय नमः। 992) ॐ पौलस्त्यबलदर्पघ्ने नमः। 993) ॐ सर्वलक्ष्मीप्रदाय नमः। 994) ॐ श्रीमते नमः। 995) ॐ अङ्गदप्रियाय नमः। 996) ॐ ईडिताय नमः। 997) ॐ स्मृतिबीजाय नमः। 998) ॐ सुरेशानाय नमः। 999) ॐ संसारभयनाशनाय नमः। 1000) ॐ उत्तमाय नमः। 1001) ॐ श्रीपरीवाराय नमः। महावीर आपकी मनोकामना पूर्ण करें,.....🙏 ,..🙏🙏..🌹🌹..जय श्री राम..🌹🌹..🙏🙏..,

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Neha Sharma, Haryana Jan 18, 2021

🌸*जय श्री राधेकृष्णा*🙏*शुभ रात्रि नमन*🌸 🌸*एक संत की वसीयत*🌸🙏🌸*पोस्ट - 02*🌸 *गतांक से आगे:- श्रद्धातत्त्व अविनाशी है। अतः उन साधकों के अविनाशी सिद्धान्तों तथा वचनों पर ही श्रद्धा होनी चाहिये न कि विनाशी देह या नाम में। नाशवान् शरीर तथा नाम में तो मोह होता है, श्रद्धा नहीं। परंतु जब मोह ही श्रद्धा का रूप धारण कर लेता है तभी ये अनर्थ होते हैं। अतः भगवान् के शाश्वत, दिव्य, अलौकिक श्रीविग्रह की पूजा तथा उनके अविनाशी नाम की स्मृति को छोड़कर इन नाशवान् शरीरों तथा नामों को महत्त्व देने से न केवल अपना जीवन ही निरर्थक होता है, प्रत्युत अपने साथ महान् धोखा भी होता है। *वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो शरीर मल-मूत्र बनाने की एक मशीन ही है। इसको उत्तम-से-उत्तम भोजन या भगवान् का प्रसाद खिला दो तो वह मल बनकर निकल जायगा तथा उत्तम-से-उत्तम पेय या गङ्गाजल पिला दो तो वह मूत्र बनकर निकल जायगा। जब तक प्राण हैं, तब तक तो यह शरीर मल-मूत्र बनाने की मशीन है और प्राण निकल जानेपर यह मुर्दा है, जिसको छू लेने पर स्नान करना पड़ता है। वास्तव में यह शरीर प्रतिक्षण ही मर रहा है, मुर्दा बन रहा है। इसमें जो वास्तविक तत्त्व (चेतन) है, उसका चित्र तो लिया ही नहीं जा सकता। चित्र लिया जाता है उस शरीर का, जो प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है। इसलिये चित्र लेने के बाद शरीर भी वैसा नहीं रहता, जैसा चित्र लेते समय था। इसलिये चित्र की पूजा तो असत् ('नहीं')-की ही पूजा हुई। चित्र में चित्रित शरीर निष्प्राण रहता है, अतः हाड़-मांसमय अपवित्र शरीर का चित्र तो मुर्दे का भी मुर्दा हुआ। हम अपनी मान्यता से जिस पुरुष को महात्मा कहते हैं, वह अपने शरीर से सर्वथा सम्बन्ध विच्छेद हो जाने से ही महात्मा है, न कि शरीर से सम्बन्ध रहने के कारण। शरीर को तो वे मल के समान समझते हैं। अतः महात्मा के कहे जाने वाले शरीर का आदर करना मल का आदर करना हुआ। क्या यह उचित है ? यदि कोई कहे कि जैसे भगवान् के चित्रकी पूजा आदि होती है, वैसे ही महात्मा के चित्र की भी पूजा आदि की जाय तो क्या आपत्ति है ? तो यह कहना भी उचित नहीं है। कारण कि भगवान् का शरीर चिन्मय एवं अविनाशी होता है, जबकि महात्मा का कहा जाने वाला शरीर पाञ्चभौतिक होने के कारण जड़ एवं विनाशी होता है। क्रमशः...... ************************************************ वृंदावन की रज.....🌹🌹🌹 जरूर पढ़े 👇 . किसी आयुर्वैदिक संस्थान से रिटायर होकर एक वैद्य जी अपनी पत्नी से बोले:- . आज तक मैं संसार में रहा अब ठाकुर जी के चरणों में रहना चाहता हूं। तुम मेरे साथ चलोगी या अपना शेष जीवन बच्चों के साथ गुजारोगी। . पत्नी बोली:- "चालीस वर्ष साथ रहने के बाद भी आप मेरे ह्रदय को नहीं पहचान पाए मैं आपके साथ चलूंगी।" . वैद्य जी बोले:- "कल सुबह वृन्दावन के लिए चलना है।" अगले दिन सुबह दोंनो वृन्दावन जाने के लिए तैयार हुए। . अपने बच्चों को बुलाया और कहा:- "प्यारे बच्चों हम जीवन के उस पार हैं तुम इस पार हो। . आज से तुम्हारे लिए हम मर गए और हमारे लिए तुम। तुमसे तो हमारा हाट बाट का साथ है। असली साथी तो सबके श्री हरि ही है।" . वृन्दावन आए तो दैवयोग से स्वामी जी से भेंट हुई। उन्होंने गुजारे लायक चीजों का इन्तजाम करवा दिया। . दोंनो का आपस में बोलना चालना भी कम हो गया केवल नाम जाप में लगे रहते और स्वामी जी का सत्संग सुनते। . जैसा कुछ ठाकुर जी की कृपा से उपलब्ध होता बनाते पकाते और प्रेम से श्री हरि जी को भोग लगाकर खा लेते। . किन्तु अभाव का एहसास उन्हें कभी नहीं हुआ था। . जाड़े का मौसम था। तीन दिन से दोंनो ने कुछ नहीं खाया था। भूख और ठंड खूब सता रही थी। . अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी... वैद्य जी ने उठ कर दरवाजा खोला सामने एक किशोरी खड़ी थी बोली:- . "स्वामी जी के यहां आज भंडारा था उन्होंने प्रशाद भेजा है।" . वैद्य जी ने प्रशाद का टिफिन पकड़ा तभी एक किशोर अंदर आया और दोनों के लिए गर्म बिस्तर लगाने लगा। . वैद्य जी की पत्नी बोली:- ध्यान से बच्चों हमारे यहां रोशनी का कोई प्रबंध नहीं है। कहीं चोट न लग जाए। . इतने में किशोर बाहर गया और मोमबत्तियों का डिब्बा और दिया सलाई लेकर आ गया। कोठरी में रोशनी कर दोनों चले गए। . दोनों ने भर पेट खाना खाया और गर्म बिस्तर में सो गए। . अगले दिन स्वामी जी का टिफिन वापिस करने गए तो उन्होंने कहा:- "टिफिन तो हमारा है पर यहां कल कोई भंडारा नहीं था और न ही उन्होंने कोई प्रशाद या अन्य सामान भिजवाया है।" . यह सुनकर दोनों सन्न रह गए। वह समझ गए ये सब बांके बिहारी जी की कृपा है। . दोनों को बहुत ग्लानि हो रही थी प्रभु को उनके कष्ट दूर करने स्वयं आना पड़ा। . घर जाकर वैद्य जी के प्राण निकल गए। . स्वामी जी को खबर भिजवाई गई। विमान बना... शवयात्रा में सैंकड़ों स्त्री पुरूष संकिर्तन करते सम्मिलित हुए। . खूब धूम - धाम से संस्कार हुआ। . शाम के समय स्वामी जी ने अपने आश्रम से एक सन्यासी को भेजा। . उसने जाकर वैद्य जी की पत्नी से कहा:- "बहुत दुख हुआ वैद्य जी इस संसार से चले गए।" . दुख की बात सुनकर वृद्धा बोली:- "दुख की इसमें क्या बात है। हम तो इस संसार में आते ही इसलिए हैं कि हमारा शरीर यहां की रज में मिल जाए। . आज वैद्य जी की मनोकामना पूर्ण हो गई। इस बात की मुझे अपार प्रसन्नता है।" *********************************************** 🔴 #भक्त____कथा 🔴✍️🔰 #विरहिणी_गोपी💐 🙇 👉✍️एक नयी गोपी को श्री बाल कृष्ण का बहुत विरह हो रहा था। सारी रात विरह में करवटे बदलते ही बीत रही थी।सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जागी तो देखा जोरों की वर्षा हो रही है। बादल बिल्कुल काले होकर नभ पर बिखरे पड़े हैं।श्याम वर्ण घने बादल देखते ही गोपी की बिरह वेदना बढ़ने लगी। और मन ही मन बोली हे श्याम घन!! तुम भी मेरे प्रियतम घनश्याम की तरह हो। 🙇💁‍♂️ हे घन! जाओ और उस नटखट को मेरा सन्देश दे आओ कि एक गोपी तुम्हारी याद में पल पल तड़प रही है।मेरे इन आंसुओं को अपने जल में मिलाकर श्याम पर बरसा देना। मेरे आंसुओं की तपन से शायद उस छलिया को मेरी पीड़ा का एहसास हो। 🙇💁‍♂️थोडी देर के बाद बारिश रुकी तो मटकी उठाकर अपनी सास से जल भरने की अनुमति मांग कर घर से बाहर निकल गइ।मुख पर घूँघट, कमर और सर पर मटकी रख कर कृष्ण की याद में खोई चलती जा रही है पनघट की डगर। थोडी आगे गई थी कि बारिश फिर से शुरू हो गई। अब गोपी के वस्त्र भी भीगने लगे। अब गोपी का बाह्य तन बारिश की वजह से भीगने लगा और ठंड भी लगने लगी। और गोपी का अंतर मन (हृदय) विरह अग्नि से जल रहा था। 🙇💁‍♂️अब वह गोपी बाहर से ठंठक और अंदर से जलन, दोनो अनुभव कर रही है। उधर कान्हा को अपनी भक्त की पीड़ा का एहसास हो गया था। और वह भी विरह में छटपटाने लगे। फिर तुरंत ही काली कमली कांधे पर डाली और निकल पड़े वंशी बजाते हुए यमुना के तीर। 🙇💁‍♂️एक वृक्ष के नीचे कान्हा जी उस गोपी की राह देखने लगे। सहसा देखा कि कुछ दूर वही गोपी घूँघट डाले चली आ रही है। 🤗💁‍♂️तभी नटखट कान्हा जी ने रास्ता रोक लिया। और बोले :- भाभी....! तनिक थोड़ा पानी पिला दो, बड़ी प्यास लगी है।वह गोपी घूँघट में थी, पहचान नही पाई कि जिसकी याद में तड़प रही है वोही समक्ष आ गया है। 🙇💁‍♂️गोपी तो विरह अग्नि में जल रही थी तो बीना देखे ही रुक्षता से बोली, अरे ग्वाले! नेत्र क्या कहीं गिरवी धरा आये हो ? देखता नहीं कि मटकी खाली है। पनघट जा रही हूँ अभी। 🤗💁‍♂️तभी नटखट कान्हा जी ने एक करामत करी। मंद मंद मुस्कुराते कान्हा ने घूँघट पकड लिया और बोले, अरि भाभी! नेक अपना चांद सा मुखड़ा तो दिखाती जा! ✍️🤗अब गोपी डर गई कि एक तो वन का एकान्त और यह कोई लूटेरा लग रहा है। फिर गोपी ने घुंघट जोर से पकड लिया।लेकिन कान्हा जी भी कहां छोडने वाले थे। अब दोनों तरफ से घुंघट की खिंचातानी होने लगी।तभी नटखट कान्हा जी ने गोपी का घुंघट खिंच लिया। और गोपी ने चौंककर एक हाथ से अपना मुख ढक लिया। 🤗💁‍♂️ एक क्षण के बाद गोपी ने हाथ हटाया और दोनों की आँखे मिली। और गोपी हतप्रभ हो गई ! अरे ये तो मेरे श्याम हैं। और ये मुझे भाभी कहकर बुला रहे हैं!कितने नटखट हैं! अब दोनों तरफ से आंखों से मूक प्रेम बरस रहा था और दोनों तरफ से हृदय से बात हो रही थी। एक अलौकिक प्रेममय वातावरण हो गया था। 🤗💁‍♂️सहसा गोपी बोली, मैं भाभी नही, तुम्हारी गोपी हूँ।तुम्हारी सखी हूँ। कान्हा जी ज़ोर से खिलखिलाकर हँस पड़े। 💖🤗कान्हा जी बोले :- अरि गोपी! हम तो तुम्हें दिक करने को भाभी बोले हैं !गोपी थोड़ा शरमा गई। बोली तो हटो राह से! जल भर लाने दो हमें। कृष्ण ने हंसते हंसते रास्ता दे दिया। गोपी अब तो असमंजस में पड़ गई। जल भरने जाऊ तो मिलन अधुरा रहेगा और न जाऊ तो सास खिजेगी। इसी असमंजस में एक क्षण के बाद देखा तो कान्हा जी को दूर जाते देखा और हृदय में अधुरे मिलन की विरहाग्नी शुरू हो गई। 🔰✍️वैष्णवों! यहां प्रभु सभी जीव को यह समजा रहे हैं कि अगर मेरा ही स्मरण करोगे तो मुझे तुरंत ही समक्ष पावोगे। लेकिन संसार के डर से थोडे भी विमुख रहोगे तो मैं कहीं भी नहीं मिलूँगा............🙇🤗 🤔🤗लेकिन अगर जीव को गोपी जैसा विरह होता है तो मुझे वापिस सन्मुख होना ही पड़ता है 🙇💁‍♂️इसलिए जीव के हृदय में सतत गोपी भाव रहना ही चाहिए जिससे हमारे प्रभु सदा हमारे हृदय में ही वास करें.........‼️ 🙇💁‍♂️अब गोपी विरहाग्नी में जलती हुई कान्हा जी का स्मरण करते हुए अनमने भाव से जल भरकर वापस आई।🌺* 🙇💁‍♂️एक मटका सर पर, दूसरा कमर पर। कृष्ण के ख्यालों में खोई सी चल रही है। अब तो घुंघट भी नहीं किया है और चारो तरफ कान्हा जी को ढुंढती हुई वापस आ रही है।लेकिन कृष्ण जिनका नाम है वो ही विरह और मिलन के सुख का दान देते हैं। और रास्ते में ही पास के कदम्ब के पेड़ पर उस गोपी की घात लगाकर वह नटखट छलिया बैठे है.............🤗‼️ 💖🤗कान्हा जी ने गोपी के निकट आते ही कंकड़ मारकर सर पर रखी मटकी फोड़ दी। तो घबराहट में दूसरी मटकी भी हाथ से छूट गई। कदम्ब के पत्तों में छिपे श्याम की शरारती खिलखिलाहट समग्र भूमण्डल में गूंजने लगी। 💖🤗सारी प्रकृति खिल उठी। गोपी कृष्ण प्रेम रुपी जल से भीज गई। संसार को भूल गई और कृष्ण मय हो गई। सब ओर सावन दृष्टिगोचर होने लगा.............💐💐 🤗💖फिर भी गोपी ऊपर से रूठती, अंदर से प्रसन्न, आल्हादित हुई ! और हो भी क्यों न? सबके मन को हरने वाला सांवरा आज उसपर कृपा कर गया...............🤗‼️ 🔰👉व्रज की गोपियों के भाग्य का क्या कहना। गोपियों का माखन चोरी करना , मटकी फोड़ना और उन्हें परेशान करना ये सब गोपियों को भी बहुत भाता है। इसमें जो आनंद है, वो जगत में कहीं नही.........🤔🙇 🔴💜छछिया भर छाछ के लालच में कमर मटका मटका कर नन्हा कृष्ण जब उन्हें नृत्य दिखाता है तो सब दीवानी हो उठती हैं🔴💜 कोई गाल चूमती है, कोई हृदय से लगाकर रोती है। कोई आलिंगन में ले गोद में बिठा लेती है, और वचन देने को कहती है कि अगले जन्म में उसका बेटा बने। अ आहाहा.... गोपियां कितनी भाग्यशाली हैं.............🤗🤗 💁‍♂️💜एक नन्हा नटखट कान्हा और सैंकड़ों गोपियाँ हैं। सबके अलग भाव है । किसीको बेटा दिखता है, किसी को प्रियतम और किसीको सखा..........🔴‼️ 💁‍♂️💜परन्तु प्रभु का ऐश्वर्यशाली रूप उन्हें नही पता। उनका अबोध, निश्छल मन तो उन्हें बृज का ग्वाल समझकर ही प्रेम करता है.......🔴‼️ ऐसा प्रेम जिसकी कोई पराकाष्ठा नही है । श्याम को भी कोई परेशानी नही, खूब माखन लिपटवाते हैं मुख पर.......‼️🔴 कपोल चूम चूम कर लाल कर देती हैं गोपियाँ। जिससे नन्हे कन्हैया का सांवला रूप और भी मोहक लगने लगता है......‼️🔴 💖गोपियां जो भी मन में हो वैसा ही वर्तन न्हे कान्हा जी के साथ करती है और कृष्ण सभी को उनके मन जैसा ही प्रेम देते हैं।🌺* 🙏हे प्रभु!🙏 हम भी सैंकड़ों वर्षो से आपसे बिछड़े हैं। हमारे भीतर भी गोपी जैसा विरह हो ऐसी कृपा करो। यही विनती है...........❇️❇️

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Neha Sharma, Haryana Jan 18, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 098*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 04*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 30*🙏🌸 *इस अध्याय में प्रचेताओं को श्रीविष्णु भगवान् का वरदान.... *विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मन्! आपने राजा प्राचीनबर्हि के जिन पुत्रों का वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीत के द्वारा श्रीहरि की स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की? बार्हस्पत्य! मोक्षाधिपति श्रीनारायण के अत्यन्त प्रिय भगवान् शंकर का अकस्मात् सान्निध्य प्राप्त करके प्रचेताओं ने मुक्ति तो प्राप्त की ही होगी; इससे पहले इस लोक में अथवा परलोक में भी उन्होंने क्या पाया-वह बतलाने की कृपा करें। *श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! पिता के आज्ञाकारी प्रचेताओं ने समुद्र के अंदर खड़े रहकर रुद्रगीत के जपरूपी यज्ञ और तपस्या के द्वारा समस्त शरीरों के उत्पादक भगवान् श्रीहरि को प्रसन्न कर लिया। तपस्या करते-करते दस हजार वर्ष बीत जाने पर पुराणपुरुष श्रीनारायण अपनी मनोहर कान्ति द्वारा उनके तपस्याजनित क्लेश को शान्त करते हुए सौम्य विग्रह से उनके सामने प्रकट हुए। गरुड़ जी के कंधे पर बैठे हुए श्रीभगवान् ऐसे जान पड़ते थे, मानो सुमेरु के शिखर पर कोई श्याम घटा छायी हो। उनके श्रीअंग में मनोहर पीताम्बर और कण्ठ में कौस्तुभ मणि सुशोभित थी। अपनी दिव्य प्रभा से वे सब दिशाओं का अन्धकार दूर कर रहे थे। *चमकीले सुवर्णमय आभूषणों से युक्त उनके कमनीय कपोल और मनोहर मुखमण्डल की अपूर्व शोभा हो रही थी। उनके मस्तक पर झिलमिलाता हुआ मुकुट शोभायमान था। प्रभु की आठ भुजाओं में आठ आयुध थे; देवता, मुनि और पार्षदगण सेवा में उपस्थित थे तथा गरुड़ जी किन्नरों की भाँति साममय पंखों की ध्वनि से कीर्तिगान कर रहे थे। उनकी आठ लंबी-लंबी स्थूल भुजाओं के बीच में लक्ष्मी जी से स्पर्धा करने वाली वनमाला विराजमान थी। आदिपुरुष श्रीनारायण ने इस प्रकार पधारकर अपने शरणागत प्रचेताओं की ओर दयादृष्टि से निहारते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा। *श्रीभगवान् ने कहा- राजपुत्रों! तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब में परस्पर बड़ा प्रेम है और स्नेहवश तुम एक ही धर्म का पालन कर रहे हो। तुम्हारे इस आदर्श सौहार्द से मैं बड़ा प्रसन्न हूँ। मुझसे वर मांगो। जो पुरुष सायंकाल के समय प्रतिदिन तुम्हारा स्मरण करेगा, उसका अपने भाइयों में अपने ही समान प्रेम होगा तथा समस्त जीवों के प्रति मित्रता का भाव हो जायेगा। जो लोग सायंकाल और प्रातःकाल एकाग्रचित्त से रुद्रगीता द्वारा मेरी स्तुति करेंगे, उनको मैं अभीष्ट वर और शुद्ध बुद्धि प्रदान करूँगा। तम लोगों ने बड़ी प्रसन्नता से अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की है, इससे तुम्हारी कमनीय कीर्ति समस्त लोकों में फैल जायेगी। तुम्हारे एक बड़ा ही विख्यात पुत्र होगा। वह गुणों में किसी भी प्रकार ब्रह्मा जी से कम नहीं होगा तथा अपनी सन्तान से तीनों लोकों को पूर्ण कर देगा। *राजकुमारों! कण्डु ऋषि के तपोनाश के लिये इन्द्र की भेजी हुई प्रम्लोचा अप्सरा से एक कमलनयनी कन्या उत्पन्न हुई थी। उसे छोड़कर वह स्वर्गलोक को चली गयी। तब वृक्षों ने उस कन्या को लेकर पाला-पोसा। जब वह भूख से व्याकुल होकर रोने लगी, तब ओषधियों के राजा चन्द्रमा ने दयावश उसके मुँह में अपनी अमृतवर्षिणी तर्जनी अँगुली दे दी। तुम्हारे पिता आजकल मेरी सेवा (भक्ति) में लगे हुए हैं; उन्होंने तुम्हें सन्तान उत्पन्न करने की आज्ञा दी है। अतः तुम शीघ्र ही उस देवोपम सुन्दरी कन्या से विवाह कर लो। *तुम सब एक ही धर्म में तत्पर हो और तुम्हारा स्वभाव भी एक-सा ही है; इसलिये तुम्हारे ही समान धर्म और स्वभाव वाली वह सुन्दरी कन्या तुम सभी की पत्नी होगी तथा तुम सभी में उसका समान अनुराग होगा। तुम लोग मेरी कृपा से दस लाख दिव्य वर्षों तक पूर्ण बलवान् रहकर अनेकों प्रकार के पार्थिव और दिव्य भोग भोगोगे। अन्त में मेरी अविचल भक्ति से हृदय का समस्त वासनारूप मल दग्ध हो जाने पर तुम इस लोक तथा परलोक के नरकतुल्य भोगों से उपरत होकर मेरे परमधाम को जाओगे। जिन लोगों के कर्म भगवदर्पण बुद्धि से होते हैं और जिनका सारा समय मेरी कथा वार्ताओं में ही बीतता है, वे गृहस्थाश्रम में रहें तो भी घर उनके बन्धन का कारण नहीं होते। वे नित्यप्रति मेरी लीलाएँ सुनते रहते हैं, इसलिये ब्रह्मवादी वक्ताओं के द्वारा मैं ज्ञान-स्वरूप परब्रह्म उनके हृदय में नित्य नया-नया-सा भासता रहता हूँ और मुझे प्राप्त कर लेने पर जीवों को न मोह हो सकता है, न शोक और न हर्ष ही। *श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- भगवान् के दर्शनों से प्रचेताओं का रजोगुण-तमोगुण मल नष्ट हो चुका था। जब उनसे सकल पुरुषार्थों के आश्रय और सबके परम सुहृद् श्रीहरि ने इस प्रका कहा, तब वे हाथ जोड़कर गद्गद वाणी से कहने लगे। *प्रचेताओं ने कहा- प्रभो! आप भक्तों के क्लेश दूर करने वाले हैं, हम आपको नमस्कार करते हैं। वेद आपके उदार गुण और नामों का निरूपण करते हैं। आपके वेग मन और वाणी के वेग से भी बढ़कर हैं तथा आपका स्वरूप सभी इन्द्रियों की गति से परे हैं। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं। आप अपने स्वरूप में स्थित रहने के कारण नित्य शुद्ध और शान्त हैं, मनरूप निमित्त के कारण हमें आपमें यह मिथ्या द्वैत भास रहा है। वास्तव में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय के लिये आप माया के गुणों को स्वीकार करके ही ब्रह्मा, विष्णु और महादेव रूप धारण करते हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं। आप विशुद्ध सत्त्वरूप हैं, आपका ज्ञान संसार बन्धन को दूर कर देता है। आप ही समस्त भागवतों के प्रभु वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण हैं, आपको नमस्कार है। आपकी ही नाभि से ब्रह्माण्डरूप कमल प्रकट हुआ था, आपके कण्ठ में कमलकुसुमों की माला सुशोभित है तथा आपके चरण कमल के समान कोमल हैं; कमलनयन! आपको नमस्कार है। आप कमलकुसुम की केसर के समान स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हुए हैं, समस्त भूतों के आश्रयस्थान हैं तथा सबके साक्षी हैं; हम आपको नमस्कार करते हैं। *भगवन्! आपका यह स्वरूप सम्पूर्ण क्लेशों की निवृत्ति करने वाला है; हम अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेषादि क्लेशों से पीड़ितों के सामने आपने इसे प्रकट किया है। इससे बढ़कर हम पर और क्या कृपा होगी। अमंगलहारी प्रभो! दीनों पर कृपा करने वाले समर्थ पुरुषों को इतनी ही कृपा करनी चाहिये कि समय-समय पर उन दीनजनों को ‘ये हमारे हैं’ इस प्रकार स्मरण कर लिया करें। इसी से उनके आश्रितों का चित्त शान्त हो जाता है। आप तो क्षुद्र-से-क्षुद्र प्राणियों के भी अन्तःकरणों में अन्तर्यामी रूप से विराजमान रहते हैं। फिर आपके उपासक हम लोग जो-जो कामनाएँ करते हैं, हमारी उन कामनाओं को आप क्यों न जान लेंगे। जगदीश्वर! आप मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले और स्वयं पुरुषार्थस्वरूप हैं। आप हम पर प्रसन्न हैं, इससे बढ़कर हमें और क्या चाहिये। बस, हमारा अभीष्ट वर तो आपकी प्रसन्नता ही है। तथापि, नाथ! हम एक वर आप से अवश्य माँगते हैं। प्रभो! आप प्रकृति आदि से परे हैं और आपकी विभूतियों का भी कोई अन्त नहीं हैं; इसलिये आप ‘अनन्त’ कहे जाते हैं। *यदि भ्रमर को अनायास ही कल्पवृक्ष मिल जाये, तो क्या वह किसी दूसरे वृक्ष का सेवन करेगा? तब आपकी चरण शरण में आकर अब हम क्या-क्या माँगे। हम आपसे केवल यही माँगते हैं कि जब तक आपकी माया से मोहित होकर हम अपने कर्मानुसार संसार में भ्रमते रहें, तब तक जन्म-जन्म में हमें आपके प्रेमी भक्तों का संग प्राप्त होता रहे। हम तो भगवद्भक्तों के क्षण भर के संग के सामने स्वर्ग और मोक्ष को भी कुछ नहीं समझते; फिर मानवी भोगों की तो बात ही क्या है। भगवद्भक्तों के समाज में सदा-सर्वदा भगवान् की मधुर-मधुर कथाएँ होती रहती हैं, जिनके श्रवणमात्र से किसी प्रकार का वैर विरोध या उद्वेग नहीं रहता। अच्छे-अच्छे कथा-प्रसंगों द्वारा निष्काम भाव से संन्यासियों के एकमात्र आश्रय साक्षात् श्रीनारायणदेव का बार-बार गुणगान होता रहता है। आपके वे भक्तजन तीर्थों को पवित्र करने के उद्देश्य से पृथ्वी पर पैदल ही विचरते रहते हैं। भला, उनका समागम संसार से भयभीत हुए पुरुषों को कैसे रुचिकर न होगा। *भगवन्! आपके प्रिय सखा भगवान् शंकर के क्षण भर के समागम से ही आज हमें आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है। आप जन्म-मरणरूप दुःसाध्य रोग के श्रेष्ठतम वैध्य हैं, अतः अब हमने आपका ही आश्रय लिया है। प्रभो! हमने समाहित चित्त से जो कुछ अध्ययन किया है, निरन्तर सेवा-शुश्रूषा करके गुरु, ब्राह्मण और वृद्धजनों को प्रसन्न किया है तथा दोषबुद्धि त्यागकर श्रेष्ठ पुरुष, सुहृद्गण, बन्धुवर्ग एवं समस्त प्राणियों की वन्दना की है और अन्नादि को त्यागकर दीर्घकाल तक जल में खड़े रहकर तपस्या की है, वह सब आप सर्वव्यापक पुरुषोत्तम के सन्तोष का कारण हो–यही वर माँगते हैं। स्वामिन्! आपकी महिमा का पार न पाकर भी स्वयाम्भुव मनु, स्वयं ब्रह्मा जी, भगवान् शंकर तथा तप और ज्ञान से शुद्धचित्त हुए अन्य पुरुष निरन्तर आपकी स्तुति करते रहते हैं। अतः हम भी अपनी बुद्धि के अनुसार आपका यशोगान करते हैं। आप सर्वत्र समान शुद्ध स्वरूप और परमपुरुष हैं। आप सत्त्वमूर्ति भगवान् वासुदेव को हम नमस्कार करते हैं। *श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! प्रचेताओं के इस प्रकार स्तुति करने पर शरणागतवत्सल श्रीभगवान् ने प्रसन्न होकर कहा- ‘तथास्तु’। अप्रतिहत प्रभाव श्रीहरि की मधुर मूर्ति के दर्शनों से सभी प्रचेताओं के नेत्र तृप्त नहीं हुए थे, इसलिये वे उन्हें जाने देना नहीं चाहते थे; तथापि वे अपने परमधाम को चले गये। इसके पश्चात् प्रचेताओं ने समुद्र के जल से बाहर निकल कर देखा कि सारी पृथ्वी को ऊँचे-ऊँचे वृक्षों ने ढक दिया है, जो मानो स्वर्ग का मार्ग रोकने के लिये ही इतने बढ़ गये थे। यह देखकर वे वृक्षों पर बड़े कुपित हुए। तब उन्होंने पृथ्वी को वृक्ष, लता आदि से रहित कर देने के लिये अपने मुख से प्रचण्ड वायु और अग्नि को छोड़ा, जैसे कालाग्नि रुद्र प्रलयकाल में छोड़ते हैं। जब ब्रह्मा जी ने देखा कि वे सारे वृक्षों को भस्म कर रहे हैं, तब वे वहाँ आये और प्राचीनबर्हि के पुत्रों को उन्होंने युक्तिपूर्वक समझाकर शान्त किया। फिर जो कुछ वृक्ष वहाँ बचे थे, उन्होंने डरकर ब्रह्मा जी के कहने से वह कन्या लाकर प्रचेताओं को दी। *प्रचेताओं ने भी ब्रह्मा जी के आदेश से उस मारिषा नाम की कन्या से विवाह कर लिया। इसी के गर्भ से ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष ने, श्रीमहादेव जी की अवज्ञा के कारण अपना पूर्व शरीर त्यागकर जन्म लिया। *इन्हीं दक्ष ने चाक्षुष मन्वन्तर आने पर, जब कालक्रम से पूर्वसर्ग नष्ट हो गया, भगवान् की प्रेरणा से इच्छानुसार नवीन प्रजा उत्पन्न की। इन्होंने जन्म लेते ही अपनी कान्ति से समस्त तेजस्वियों का तेज छीन लिया। *ये कर्म करने में बड़े दक्ष (कुशल) थे, इसी से इनका नाम ‘दक्ष’ हुआ। इन्हें ब्रह्मा जी ने प्रजापतियो के नायक के पद पर अभिषिक्त कर सृष्टि की रक्षा के लिये नियुक्त किया और इन्होंने मरीचि आदि दूसरे प्रजापतियों को अपने-अपने कार्य में नियुक्त किया। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Jan 18, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 070*✳️✳️ ✳️✳️*नदिया में प्रेम-प्रवाह और क़ाज़ी का अत्याचार*✳️✳️ *नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं श्रोत्रमूलं गतं वा *शुद्ध वाशुद्धवर्णव् यवहितिसहितं तारमत्येव सत्यम्। *तच्चेद्देहद्रविणजनतालोभपाखण्डमध्ये *निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र॥ *प्रेम ही ‘जीवन’ है। जिस जीवन में प्रेम नहीं, वह जीवन नहीं जंजाल है। जहाँ प्रेम है, वही वास्तविक प्रेम की छटा दृष्टिगोचर होती है। कहीं प्रेमियों का सम्मिलन देखिये, प्रेमियों की वार्ता सुनिये अथवा प्रेमियों के हास-परिहास, खान-पान अथवा उनके मेलों-उत्सवों में सम्मिलित हूजिये, तब आपको पता चलेगा कि वास्तविक जीवन कैसा होता है और उसमे कितना मजा है, कितनी मिठास है। उस मिठास के सामने संसार के जितने मीठे कहे जाने वाले पदार्थ हैं, सभी फीके-फीके–से प्रतीत होने लगते हैं। किसी भाग्यवान पुरुष के शरीर में ही प्रेम प्रकट होता है और उसकी छत्रछाया में जितने भी प्राणी आकर आश्रय ग्रहण करते हैं, वे सभी पावन बन जाते हैं, उन्हें भी वास्तविक जीवन का सुख मिल जाता है। प्रेमी जिस स्थान में निवास करता है, वह भूमि पावन बन जाती है, जिस स्थान में वह क्रीड़ा करता है, वह स्थान तीर्थ बन जाता है, और जिन पुरुषों के साथ वह लीला करता है, वे बड़भागी पुरुष भी सदा के लिये अमर बन जाते हैं। जिस नवद्वीप में प्रेमवतार गौरचन्द्र उदित होकर अपनी सुखद शीतल किरणों के प्रकाश से संसारी तापों से आक्लांत प्राणियों को शीतलता प्रदान कर रहे हों उस भाग्यवती नगरी के उस समय के आनन्द का वणन कर ही कौन सकता है? महाप्रभु के कीर्तनारम्भ से सम्‍पूर्ण नवद्वीप एक प्रकार से आनन्द का घर ही बन गया था। वहाँ हर समय श्रीकृष्ण-कीर्तन की सुमधुर ध्वनि सुनायी पड़ती थी। *जगाई-मधाई के उद्धार से लोग संकीर्तन का महत्त्व समझने लगे। हजारों लोग सदा प्रभु के दशर्नों के लिये आते। वे प्रभु के लिये भाँति-भाँति की भेंटे लाते। कोई तो सुंदर पुष्पों की मालाएँ लाकर प्रभु के गले में पहनाता, कोई स्वादिष्ट फलों को ही उपहार स्वरूप प्रभु के सामने रखता। बहुत-से सुंदर-सुंदर पकवान अपने घरों से लाकर प्रभु को भेंट करते। प्रभु उनमें से थोड़ा-सा लेकर सभी के मन को प्रसन्न कर देते। सभी आकर पूछते- प्रभो! हमलोग भी कुछ कर सकते हैं? क्या हमलोगों को भी कृष्ण कीर्तन का अधिकार है?’ *प्रभु कहते- ‘कृष्ण-कीर्तन सब कोई कर सकता है। इसमें तो अधिकार-अनधिकारी का प्रश्न ही नहीं। भगवन्नाम के तो सभी अधिकारी हैं। नाम में विधि-निषेध अथवा ऊँच-नीच का विचार ही नहीं। आपलोग प्रेम-पूर्वक श्रीकृष्ण-कीर्तन कर सकते हैं।‘ इस पर लोग पूछते- ‘प्रभो! हमलोग तो जानते भी नहीं, कीर्तन कैसे किया जाता है। हमें आजतक संकीर्तन की शिक्षा ही नहीं मिली और न हमने इसकी पद्धति किसी पुस्तक में ही पढ़ी। *प्रभु हंसकर कहने लगते- ‘नाम-संकीर्तन में सीखना ही क्या है, यह तो बड़ा सरल मार्ग है। इसके लिये विज्ञता अथवा बहुज्ञता की आवश्यकता नहीं। सभी कोई इसे कर सकते हैं। देखो, इस प्रकार ताली बजाकर- *हरि हरये नम: कृष्ण यादवाय नम:। *गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥ *इस मन्त्र को या और किसी मन्त्र को जिसमें भगवान के नामों का ही कीर्तन हो, गाते गये, दस-पांच अपने साथी इकट्ठे कर लिये और सभी मिलकर नाम-संकीर्तन करने लगे। तुम लोग नियमपूर्वक महीने भर तक करो तो सही, फिर देखना कितना आनन्द आता है।’ लोग प्रभु के मुख से भगवन्नाम-माहात्म्य और कीर्तन की महिमा सुनते और वहीं उन्हें दिखा-दिखाकर संकीर्तन करने लगते। जहाँ वे भूल करते प्रभु उन्हें फौरन बता देते। इस प्रकार उनसे जो भी पूछने आते, उन सभी को भगवन्नाम संकीर्तन का ही उपदेश करते। लोग महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके अपने-अपने घरों को चले आते और दूसरे ही दिन से संकीर्तन आरम्भ कर देते। पहले तो लोग ताली बजा-बजाकर ही कीर्तन करते थे, किंतु ज्यों-ज्यों उन्हें आनन्द आने लगा, त्यों-ही-त्यों उनके संकीर्तन के साथ ढोल-करताल तथा झाँझ-मृदंग आदि वाद्यों का ही समावेश होने लगा। एक को कीर्तन करते देखकर दूसरे को भी उत्साह होने लगा और उसने भी दस-पांच लोगों को इकट्ठा करके अपनी एक छोटी संकीर्तन-मण्डली बना ली और दोनों समय नियम से संकीर्तन करने लगे। इस प्रकार प्रत्येक मुहल्ले में बहुत-सी संकीर्तन मण्डलियां स्थापित हो गयीं। अच्छे-अच्छे घरों के लोग संध्या-समय अपने सभी परिवार वालों को साथ लेकर संकीर्तन करते। जिसमें स्त्री-पुरुष, छोटे-बडे़ सभी सम्मिलित होते। *भक्त सदा आनन्द में छके-से रहते। परस्पर एक-दूसरे का आलिंगन करते। दो भक्त जहाँ भी रास्ते में मिलते, वहीं एक-दूसरेसे लिपट जाते। कोई दूसरे को साष्टांग प्रणाम ही करते, वह जल्दी से उनकी चरण-रज लेने को दौड़ता। कभी दस-बीस भक्त मिलकर संकीर्तन के पदों का ही गायन करने लगे। कोई बाजार में सबके सामने नृत्य करते ही निकलते। इस प्रकार भक्तिरूपी नदिया में सदा प्रेम की तरंगें ही उठती रहतीं। रात्रि-दिन शंख, घड़ियाल, तुरही, ढोल, करताल, झांझ, मृदंग तथा अन्यान्य प्रकार के वाद्यों से सम्पूर्ण नवद्वीप नगर गूंजता ही रहता। *महाप्रभु भक्तों को साथ लेकर रात्रिभर संकीर्तन ही करते रहते। प्रात:काल घंटे-दो-घंटे के लिये सोते। उठते ही भक्तों को साथ लेकर गंगा-स्नान करने के लिये चले जाते। भक्तों को तो लोगों ने सदा से ही ‘बावले’ की उपाधि दे रखी है। इन बावले भक्तों का स्नान भी विचित्र प्रकार का होता। ये लोग सदा अफीमची की तरह पिनक में ही बने रहते। मद्यप के समान नशे में ही झूमते रहते और पागलों के समान ही बड़बड़ाया करते। स्नान करते-करते किसी ने किसी की धोती ही फेंक दी है, तो कोई किसी के ऊपर जल ही उलीच रहा है। कोई तैर कर उस पार जा रहा है, तो कोई प्रवाह के विरुद्ध ही तैरने का दुस्साहस कर रहा है। इस प्रकार घंटों में इनका स्नान समाप्त होता। तब प्रभु सब भक्तों के सहित घर आते। *देवपूजन, तुलसीपूजन आदि कर्मों को करते। तब तक विष्णुप्रिया भोजन बनाकर तैयार कर लेतीं। जल्दी से आप भोजनों पर बैठ जाते। भक्तों के बिना साथ लिये इन्हें भोजन अच्छा ही नहीं लगता था, इसलिये दस-पांच भक्त सदा इनके साथ ही भोजन करते। भोजन करते-करते कभी तो माता से कहते- ‘अम्मा! तेरी बहू के हाथ में जाने क्या जादू है।’ सभी चीजों में बड़ी भारी मिठास आ जाती है। और तो और, साग भी तो मीठा लगता है।’ पास बैठे हुए भक्त से कहने लगते- ‘क्यों जी! ठीक है न? तुम्हें साग में भी मिठास मालूम पड़ती है!’ यह सुनकर सभी भक्त हंसने लगते। विष्णुप्रिया जी भी मन-ही-मन मुसकराने लगतीं। *भोजन के अनन्तर आप थोड़ी देर विश्राम करते। तीसरे पहर फिर धीरे-धीरे सभी भक्त प्रभु के घर आकर एकत्रित हो जाते। तब प्रभु उनके साथ श्रीकृष्ण-कथाएँ कहने लगते। कभी कोई श्रीमद्भागवत का ही प्रकरण छिड़ गया है। कभी कोई ‘गीत-गोविन्द’ के पद की ही व्याख्या कर रहा है। *सांयकाल के समय भक्तों को साथ लेकर प्रभु नगर-भ्रमण करने के लिये निकलते। इस प्रकार इनका सभी समय भक्तों के सहवास में ही व्यतीत होता। क्षणभर भी भक्तों का पृथक् होना इन्हें असह्य-सा प्रतीत होता। भक्तों की भी प्रभु के चरणों में अहैतु की भक्ति थी। वे प्रभु के संकेत के अनुसार चेष्टाएँ करते। वे सदा प्रभु के मुख की ही ओर देखते रहते कि किस समय प्रभु के मुख पर कैसे भावों के लक्षण प्रतीत होते हैं। उन्हीं भावों के अनुसार वे क्रियाएँ करने लगते। इस कारण ईर्ष्या करना ही जिनका स्वभाव है, जो दूसरे के अभ्युदय तथा गौरव को देख ही नहीं सकते, ऐसे खल पुरुष सदा प्रभु की निन्दा किया करते। प्रभु उन लोगों की बातों के ऊपर ध्यान ही नहीं देते थे। जब कोई भक्त किसी के सम्बन्ध की ऐसी बातें छेड़ भी देता तो आप उसी समय उसे डांटकर कह देते *‘अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु *त्यक्त्वासेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम्’ *दूसरों की निन्दा-स्तुति करना छोड़कर तुम निरन्तर श्रीकृष्ण-कीर्तन में ही अपने मन को क्यों नहीं लगाते। इस कारण प्रभु के सम्मुख किसी की निन्दा-स्तुति करने की भक्तों को हिम्मत ही नहीं होती थी। *प्रभु के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर द्वेषी लोगों ने मुसलमानों को भड़काया। वे जानते थे कि हम निमाई पण्डित का वैसे तो कुछ बिगाड़ नहीं सकते। उनके कहने में हजारों आदमी हैं। हाँ, यदि शासकों की ओर से इन्हें पीड़ा पहुँचायी जायगी, तब तो इनका सभी गौरहरिपना ठीक हो जायगा। उस समय मुसलमानों का शासन था। इसलिये मुसलमानों की शिकायतों पर विशेष ध्यान दिया जाता था। इसलिये खलों ने मुसलमानों को ही बहकाना शुरू किया- ‘निमाई पण्डित अशास्त्रीय काम करता है। उसकी देखा-देखी सम्पूर्ण नगर में कीर्तन होने लगा है। दिन-रात्रि कीर्तन की ही ध्वनि सुनायी पड़ती है। इस कोलाहल के कारण रात्रि में लोगों को निद्रा भी तो नहीं आने पाती। क़ाज़ी से कहकर इन लोगों को दण्ड दिलाना चाहिये। न जाने ये सब मिलकर क्या कर बैठें?’ मुसलमानों को भी यह बात जँच गयी। वे भला हिंदु धर्म का अभ्युदय कब देख सकते थे! इसलिये सभी ने मिलकर क़ाज़ी के यहाँ संकीर्तनके विरुद्ध अभियोग चलाया। उस समय बंगाल-सूबे में अभियोगों के निर्णय करने का काम काजियों के ही अधीन था। जमींदार, राजा अथवा मण्डलेश्वर कुछ गांवों का बादशाह से नियत समय के लिये ठेका ले लेते और जितने में ठेका लेते उतने रूपये तो कर उगाहकर बादशाह को दे देते, जो बचते उसे अपने पास रख लेते। दीवानी और फौजदारी के जितने मामले होते उनका फैसला क़ाज़ी किया करते। बादशाह की ओर से स्थान-स्थान पर क़ाज़ी नियुक्त थे। *उस समय बंगाल के नवाब हुसेनशाह थे। वे बंगाल के स्वतन्त्र शासक थे। उनकी ओर से फौजदार चाँदखाँ नाम के क़ाज़ी नवद्वीप में भी नियुक्त हुए थे। बादशाह के दरबार में इनका बड़ा सम्मान था। कुछ लोगों का कहना है, ये हुसेनशाह के विद्यागुरु थे। कुछ भी हो, चाँदखाँ सहृदय, समझदार और शान्तिप्रिय मनुष्य थे। हिन्दुओं से वे अकारण नहीं चिढ़ते थे। *नीलाम्बर चक्रवर्ती के दौहित्र होने के नाते से वे महाप्रभु से भी परिचित थे। इसलिये लोगों के बार-बार शिकायत करने पर भी उन्होंने महाप्रभु के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करनी चाही। जब लोगों ने नित्यप्रति उनसे संकीर्तन की शिकायत करनी आरम्भ कर दी और उन पर अत्यधिक जोर डाला गया तब उनकी भी समझ में यह बात आ गयी कि ‘हाँ, ये लोग दिन-रात्रि बाजे बजा-बजाकर शोर मचाते रहते हैं। ऐसा भी क्या भजन-कीर्तन? यदि भजन ही करना है, तो धीरे-धीरे करें। यही सोचकर वे एक दिन अपने दल-बल के सहित कीर्तनवालों को रोकने के लिये चले। बहुत-से लोग प्रेम में उन्मत्त होकर संकीर्तन कर रहे थे। इनके आदमियों ने उनसे कीर्तन बंद कर देने के लिये कहा; किंतु वे भला किसी की सुनने वाले थे। मना करने पर भी वे बराबर कीर्तन करते ही रहे। इस पर क़ाज़ी को गुस्सा आ गया और उसने घुसकर कीर्तन करने वालों के ढोल फोड़ दिये और भक्तों से डांटकर कहने लगे- ‘खबरदार, आज से किसी ने इस तरह शोर मचाया तो सभी को जेल खाने भेज दूंगा।’ बेचारे भक्त डर गये। उन्होंने संकीर्तन बंद कर दिया। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ भी सकीर्तन हो रहा था, क़ाज़ी के आदमी वहाँ-वहाँ जाकर संकीर्तन को बंद कराने लगे। सम्पूर्ण नगर में हाहाकर मच गया। *लोग संकीर्तन के संबंध में भाँति-भाँति की बातें कहने लगे। कोई तो कहता- ‘भाई! यहाँ मुसलमानी शासन में संकीर्तन हो ही नहीं सकता। हम तो इस देश को परित्याग करके किसी ऐसे देश में जाकर रहेंगे, जहाँ सुविधा पूर्वक संकीर्तन कर सकेंगे।’ कोई कहते ‘अजी! जोर-जोर से नाम लेने में ही क्या लाभ? यदि क़ाज़ी मना करता है, तो धीरे-धीरे ही नाम-जप कर लिया करेंगे। किसी प्रकार भगवन्नाम-जप होना चाहिये।’ इस प्रकार भयभीत होकर लोग भाँति-भाँति की बातें कहने लगे। *दूसरे दिन सभी मिलकर महाप्रभु के निकट आये और उन्होंने रात्रि में जो-जो घटनाएँ हुईं सब कह सुनायी और अंत में कहा- ‘प्रभो! आप तो हमसे संकीर्तन करने के लिये कहते हैं, किंतु हमारे ऊपर संकीर्तन करने से ऐसी-ऐसी विपत्तियाँ आती हैं। अब हमारे लिये क्या आज्ञा होती है। आपकी आज्ञा हो तो हम इस देश को छोड़कर किसी ऐसे देश में चले जायँ, जहाँ सुविधापूर्वक संकीर्तन कर सकें। या आज्ञा हो तो संकीर्तन करना ही बंद कर दें। बहुत-से लोग तो डर के कारण भागे भी जा रहे हैं।’ *प्रभु ने कुछ दृढ़ता के साथ रोष में आकर कहा- ‘तुम लोगों को न तो देश का ही परित्याग करना होगा और संकीर्तन को ही बंद करना! तुम लोग जैसे करते रहे हो, उसी तरह संकीर्तन करते रहो। मैं उस क़ाज़ी को और उसके साथियों को देख लूँगा, वे कैसे संकीर्तन को रोकते हैं? तुम लोग तनिक भी न घबड़ाओ।’ प्रभु के ऐसे आश्वासन को सुनकर सभी भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। बहुत-से तो प्रभु के आज्ञानुसार पूर्ववत ही संकीर्तन करते रहे। किंतु उनके मन में सदा डर ही बना रहता था। बहुतों ने उसी दिन से संकीर्तन करना बंद ही कर दिया। लोगों को डरा हुआ देखकर प्रभु ने सोचा कि इस प्रकार काम नहीं चलने का। *लोग क़ाज़ी के डर से भयभीत हो गये हैं। जब तक मैं क़ाज़ी का दमन न करूँगा, तब तक लोगों का भय दूर न होगा। यह सुनकर पालक आश्चर्य करेंगे कि क़ाज़ी के पास अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित बहुत-सी सेना है, बादशाह की ओर उसे अधिकार प्राप्त है। उसके पास राजबल, धनबल, सैन्यबल तथा अधिकारबल आदि सभी मौजूद हैं। उसका दमन अहिंसाप्रिय, शांत स्वभाव वाले, अस्त्र-शस्त्रहीन, ढोल-करताल के लय के साथ नृत्य करने वाले निमाई पण्डित कैसे कर सकेंगे? इस प्रश्न का उत्तर पाठकों को अगले अध्याय में आप-से-आप ही मिल जायगा। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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