Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2021

*तेरी गलियों का हूं आशिक...*बहुत ही सुंदर भजन*👌 🌸*जय श्री राधेकृष्णा*🙏*बड़ी सुन्दर सत्य कथा है*🌸 *वृंदावन में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह बांके बिहारी से असीम प्यार करता था। वह बांके बिहारी का इतना दीवाना था कि सुबह शाम जब तक वह मंदिर ना जाए उसे किसी भी काम में मन नहीं लगता था। मंदिर में जब भी भंडारा होता वह प्रमुख रूप से भाग लेता. एक दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हो गई और जिस दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हुई उसी दिन ब्राह्मण का बांके बिहारी के मंदिर में भी ड्यूटी लग गई ब्राह्मण परेशान हो गया कि वह करें तो क्या करें बेटी की शादी भी जरूरी है और बांके बिहारी की आज्ञा भी ठुकरा नहीं सकता। ब्राम्हण ने सोचा कि अगर यह बात वह अपनी पत्नी से बताएगा तो उसकी पत्नी नाराज हो जाएगी वह कहेगी कि कोई क्या अपनी बेटी की शादी भी छोड़ता है। 1 दिन अगर तुम भंडारे में नहीं जाओगे तो भंडारा रुक नहीं जाएगा कोई और संभाल लेगा लेकिन बेटी की शादी दोबारा तो नहीं होगी। ब्राह्मण परेशान हो गया था वह जानता था कि कुछ भी हो जाएगा उसकी पत्नी उसे भंडारे में जाने नहीं देगी। लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था वह अपने बांके बिहारी से नजरे नहीं चुरा सकता था तो उसने अपनी बेटी की शादी के दिन ही अपने घर में बिना बताए चुपचाप समय से पहले ही मंदिर पहुंच चुका था। मंदिर में जाकर प्यार से सब को भंडारा खिलाया और शाम होते ही जल्दी से घर वापस पहुंचा क्योंकि बेटी की शादी में भी पहुंचना था लेकिन ब्राह्मण को पहुंचते-पहुंचते देर हो चुकी थी और बिटिया की शादी हो कर बिटिया की विदाई भी हो चुकी थी। वह घर पहुंचा तो उसकी पत्नी उसे बोली आओ चाय पी लो बहुत थक चुके होंगे। सोचने लगा कि घर वाले कोई भी उसे डांट नहीं रहे हैं और ना ही परिवार के कोई भी सदस्य उससे कोई सवाल कर रहा है कि वह शादी में नहीं था फिर भी पत्नी सही से उसे प्यार से बात कर रही थी। ब्राह्मण ने भी सोचा छोड़ो क्या गड़े मुर्दे उखाड़ना है जो हो गया सो हो गया सब प्रभु की इच्छा है पत्नी अगर प्यार से बात कर रही है इससे अच्छी बात क्या है। कुछ दिनों के बाद बेटी की शादी में जो फोटोग्राफी हुई थी फोटोग्राफर शादी का एल्बम घर पर दे गया। ब्राह्मण सोचा इस शादी में तो शरीक हुआ नहीं था चलो एल्बम देख लेता हूं बेटी की शादी कैसी हुई थी। मगर यह क्या वह तो देख रहा है इस शादी में हर जगह उसकी भी तस्वीर है जो जगह जगह विवाह की जिम्मेदारियाँ सम्भल रहे थे ब्राह्मण फूट फूट कर रोने लगा और कहने लगा प्रभु तेरी कैसी लीला है!वो रोता हुआ बिहारी जी के मंदिर पहुँचा और चरणी में गिरकर बोला प्रभु मैं जीवन भर तुम्हारी नियमत रूप से सेवा करूंगा! **कोई कमी नहीं उस घर में *जिस घर में हरिकरते निवास *श्रीं कृष्ण सहारा जीवन का बस इतना रखना विश्वास** 🌸🙏*जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸

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Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 104*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 05*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 05*🙏🌸 *इस अध्याय में ऋषभजी का अपने पुत्रों को उपदेश देना और स्वयं अवधूतवृत्ति ग्रहण करना..... *श्रीऋषभदेव जी ने कहा- पुत्रो! इस मर्त्यलोक में यह मनुष्य शरीर दुःखमय विषयभोग प्राप्त करने के लिये ही नहीं है। ये भोग तो विष्ठाभोजी सूकर-कूकरादि को भी मिलते ही हैं। इस शरीर से दिव्य तप ही करना चाहिये, जिससे अन्तःकरण शुद्ध हो; क्योंकि इसी से अनन्त ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है। शास्त्रों ने महापुरुषों की सेवा को मुक्ति का और स्त्रीसंगी कामियों के संग को नरक का द्वार बताया है। महापुरुष वे ही हैं जो समानचित्त, परमशान्त, क्रोधहीन, सबके हितचिन्तक और सदाचारसम्पन्न हों अथवा मुझ परमात्मा के प्रेम को ही जो एकमात्र पुरुषार्थ मानते हों, केवल विषयों की ही चर्चा करने वाले लोगों में तथा स्त्री, पुत्र और धन आदि सामग्रियों से सम्पन्न घरों में जिनकी अरुचि हो और जो लौकिक कार्यों में केवल शरीर निर्वाह के लिये ही प्रवृत्त होते हों। मनुष्य अवश्य प्रमादवश कुकर्म करने लगता है, उसकी वह प्रवृत्ति इन्द्रियों को तृप्त करने के लिये ही होती है। मैं इसे अच्छा नहीं समझता, क्योंकि इसी के कारण आत्मा को यह असत् और दुःखदायक शरीर प्राप्त होता है। *जब तक जीव को आत्मतत्त्व की जिज्ञासा नहीं होती, तभी तक अज्ञानवश देहादि के द्वारा उसका स्वरूप छिपा रहता है। जब तक यह लौकिक-वैदिक कर्मों में फँसा रहता है, तब तक मन में कर्म की वासनाएँ भी बनी ही रहती हैं और इन्हीं से देहबन्धन की प्राप्ति होती है। इस प्रकार अविद्या के द्वारा आत्मस्वरूप के ढक जाने से कर्मवासनाओं के वशीभूत हुआ चित्त मनुष्य को फिर कर्मों में ही निवृत्त करता है। अतः जब तक उसको मुझ वासुदेव में प्रीति नहीं होती, तब तक वह देहबन्धन से छूट नहीं सकता। स्वार्थ में पागल जीव जब तक विवेक-दृष्टि का आश्रय लेकर इन्द्रियों की चेष्टाओं को मिथ्या नहीं देखता, तब तक आत्मस्वरूप की स्मृति को बैठने के कारण वह अज्ञानवश विषयप्रधान गृह आदि में आसक्त रहता है और तरह-तरह के क्लेश उठाता रहता है। *स्त्री और पुरुष इन दोनों का जो परस्पर दाम्पत्य-भाव है, इसी को पण्डितजन उनके हृदय की दूसरी स्थूल एवं दुर्भेद्य ग्रन्थि कहते हैं। देहाभिमानरूपी एक-एक सूक्ष्म ग्रन्थि तो उनमें अलग-अलग पहले से ही है। इसी के कारण जीव को देहेन्द्रियादि के अतिरिक्त घर, खेत, पुत्र, स्वजन और धन आदि में भी ‘मैं’ और ‘मेरेपन' का मोह हो जाता है। जिस समय कर्मवासनाओं के कारण पड़ी हुई इसकी यह दृढ़ हृदय-ग्रन्थि ढीली हो जाती है, उसी समय यह दाम्पत्य भाव से निवृत्त हो जाता है और संसार के हेतुभूत अहंकार को त्यागकर सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो परमपद प्राप्त कर लेता है। *पुत्रो! संसारसागर से पार होने में कुशल तथा धैर्य, उद्यम एवं सत्त्वगुणविशिष्ट पुरुष को चाहिये कि सबके आत्मा और गुरुस्वरूप मुझ भगवान् में भक्तिभाव रखने से, मेरे परायण रहने से, तृष्णा के त्याग से, सुख-दुःख आदि द्वन्दों के सहने से ‘जीव को सभी योनियों में दुःख ही उठाना पड़ता है’ इस विचार से, तत्त्वजिज्ञासा से, तप से, सकाम कर्म के त्याग से, मेरे ही लिये कर्म करने से, मेरी कथाओं का नित्यप्रति श्रवण करने से, मेरे भक्तों के संग और मेरे गुणों के कीर्तन से, वैर त्याग से, समता से, शान्ति से और शरीर तथा घर आदि में मैं-मेरेपन के भाव को त्यागने की इच्छा से, अध्यात्मशास्त्र के अनुशीलन से, एकान्त-सेवन से, प्राण, इन्द्रिय और मन के संयम से, शास्त्र और सत्पुरुषों के वचन में यथार्थ बुद्धि रखने से, पूर्ण ब्रह्मचर्य से, कर्तव्य कर्मों में निरन्तर सावधान रहने से, वाणी के संयम से, सर्वत्र मेरी ही सत्ता देखने से, अनुभवज्ञानरहित तत्त्व विचार से और योग साधन से अहंकाररूप अपने लिंग शरीर को लीन कर दे। मनुष्य को चाहिये कि वह सावधान रहकर अविद्या से प्राप्त इस हृदय ग्रन्थिरूप बन्धन को शास्त्रोक्त रीति से इन साधनों के द्वारा भलीभाँति काट डाले; क्योंकि यही कर्मसंस्कारों के रहने का स्थान है। तदनन्तर साधन का भी परित्याग कर दे। *जिसको मेरे लोक की इच्छा हो अथवा जो मेरे अनुग्रह की प्राप्ति को ही परम पुरुषार्थ मानता हो-वह राजा हो तो अपनी अबोध प्रजा को, गुरु अपने शिष्यों को और पिता अपने पुत्रों को ऐसी ही शिक्षा दे। अज्ञान के कारण यदि वे उस शिक्षा के अनुसार न चलकर कर्म को ही परम पुरुषार्थ मानते रहें, तो भी उन पर क्रोध न करके उन्हें समझा-बुझाकर कर्म में प्रवृत्त न होने दे। उन्हें विषयासक्तियुक्त काम्यकर्मों में लगाना तो ऐसा ही है, जैसे किसी अंधे मनुष्य को जान-बूझकर गढ़े में ढकेल देना। इससे भला, किस पुरुषार्थ की सिद्धि हो सकती है। अपना सच्चा कल्याण किस बात में है, इसको लोग नहीं जानते; इसी से वे तरह-तरह की भोग-कामनाओं में फँसकर तुच्छ क्षणिक सुख के लिये आपस में वैर ठान लेते हैं और निरन्तर विषय भोगों के लिये ही प्रयत्न करते रहते हैं। वे मूर्ख इस बात पर कुछ भी विचार नहीं करते कि इस वैर-विरोध के कारण नरक आदि घोर दुःखों की प्राप्ति होगी। गढ़े में गिरने के लिये उलटे रास्ते से जाते हुए मनुष्य को जैसे आँख वाला पुरुष उधर नहीं जाने देता, वैसे ही अज्ञानी मनुष्य को अविद्या में फँसकर दुःखों की ओर जाते देखकर कौन ऐसा दयालु और ज्ञानी पुरुष होगा, जो जान-बूझकर भी उसे उसी राह पर जाने दे या जाने के लिये प्रेरणा करे। *जो अपने प्रिय सम्बन्धी को भगवद्भक्ति का उपदेश देकर मृत्यु की फाँसी से नहीं छुड़ाता, वह गुरु गुरु नहीं है, स्वजन स्वजन नहीं, पिता पिता नहीं है, माता माता नहीं है, इष्टदेव इष्टदेव नहीं है और पति पति नहीं है। मेरे इस अवतार-शरीर का रहस्य साधारण जनों के लिये बुद्धिगम्य नहीं है। शुद्ध सत्त्व ही मेरा हृदय है और उसी में धर्म की स्थिति है, मैंने अधर्म को अपने से बहुत दूर पीछे की ओर ढकेल दिया है, इसी से सत्पुरुष मुझे ‘ऋषभ’ कहते हैं। *तुम सब मेरे उस शुद्ध सत्त्वमय हृदय से उत्पन्न हुए हो, इसलिये मत्सर छोड़कर अपने बड़े भाई भरत की सेवा करो। उसकी सेवा करना मेरी ही सेवा करना है और यही तुम्हारा प्रजा पालन भी है। अन्य सब भूतों की अपेक्षा वृक्ष अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, उनसे चलने वाले जीव श्रेष्ठ हैं और उनमें भी कीटादि की अपेक्षा ज्ञानयुक्त पशु आदि श्रेष्ठ हैं। पशुओं से मनुष्य, मनुष्यों से प्रमथगण, प्रमथों से गन्धर्व, गन्धर्वों से सिद्ध और सिद्धों से देवताओं के अनुयायी किन्नरादि श्रेष्ठ हैं। उनसे असुर, असुरों से देवता और देवताओं से भी इन्द्र श्रेष्ठ हैं। इन्द्र से भी ब्रह्मा जी के पुत्र दक्षादि प्रजापति श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मा जी के पुत्रों में रुद्र सबसे श्रेष्ठ हैं। वे ब्रह्मा जी से उत्पन्न हुए हैं, इसलिये ब्रह्मा जी उनसे श्रेष्ठ हैं। वे भी मुझसे उत्पन्न हैं और मेरी उपासना करते हैं, इसलिये मैं उनसे भी श्रेष्ठ हूँ। परन्तु ब्राह्मण मुझसे भी श्रेष्ठ हैं, क्योंकि मैं उन्हें पूज्य मानता हूँ। *[सभा में उपस्थित ब्राह्मणों को लक्ष्य करके] विप्रगण! दूसरे किसी भी प्राणी को मैं ब्राह्मणों के समान भी नहीं समझता, फिर उनसे अधिक तो मान ही कैसे सकता हूँ। लोग श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों के मुख में जो अन्नादि आहुति डालते हैं, उसे मैं जैसी प्रसन्नता से ग्रहण करता हूँ, वैसे अग्निहोत्र में होम की हुई सामग्री को स्वीकार नहीं करता। जिन्होंने इस लोक में अध्ययनादि के द्वारा मेरी वेदरूपा अति सुन्दर और पुरातन मूर्ति को धारण कर रखा है तथा जो परम पवित्र सत्त्वगुण, शम, दम, सत्य, दया, तप, तितिक्षा और ज्ञानादि आठ गुणों से सम्पन्न है। मैं ब्रह्मादि से भी श्रेष्ठ और अनन्त हूँ तथा स्वर्ग-मोक्ष आदि देने की भी सामर्थ्य रखता हूँ; किन्तु अकिंचन भक्त ऐसे निःस्पृह होते हैं कि वे मुझसे भी कभी कुछ नहीं चाहते; फिर राज्यादि अन्य वस्तुओं की तो वे इच्छा ही कैसे कर सकते हैं? *पुत्रों! तुम सम्पूर्ण चराचर भूतों को मेरा ही शरीर समझकर शुद्ध बुद्धि से पद-पद पर उनकी सेवा करो, यही मेरी सच्ची पूजा है। मन, वचन, दृष्टि तथा अन्य इन्द्रियों की चेष्टाओं का साक्षात् फल मेरा इस प्रकार का पूजन ही है। इसके बिना मनुष्य अपने को महामोहमय कालपाश से छुड़ा नहीं सकता। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! ऋषभदेव जी के पुत्र यद्यपि स्वयं ही सब प्रकार से सुशिक्षित थे, तो भी लोगों को शिक्षा देने के उद्देश्य से महाप्रभावशाली परम सुहृद् भगवान् ऋषभ ने उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया। ऋषभदेव जी के सौ पुत्रों में भरत सबसे बड़े थे। वे भगवान् के परम भक्त और भगवद्भक्तों के परायण थे। ऋषभदेव जी ने पृथ्वी का पालन करने के लिये उन्हें राजगद्दी पर बैठा दिया और स्वयं उपशमशील निवृत्तिपरायण महामुनियों के भक्त, ज्ञान और वैराग्यरूप परमहंसोचित्त धर्मों की शिक्षा देने के लिये बिलकुल विरक्त हो गये। केवल शरीर मात्र का परिग्रह रखा और सब कुछ घर पर रहते ही छोड़ दिया। अब वे वस्त्रों का भी त्याग करके सर्वथा दिगम्बर हो गये। उस समय उनके बाल बिखरे हुए थे। उन्मत्त का-सा वेष था। इस स्थिति में वे आह्वनीय (अग्निहोत्र की) अग्नियों को अपने में ही लीन करके संन्यासी हो गये और ब्रह्मावर्त देश से बाहर निकल गये। *वे सर्वथा मौन हो गये थे, कोई बात करना चाहता तो बोलते नहीं थे। जड़, अंधे, बहरे, गूँगे, पिशाच और पागलों की-सी चेष्टा करते हुए वे अवधूत बने जहाँ-तहाँ विचरने लगे। कभी नगरों और गावों में चले जाते तो कभी खानों, किसानों की बस्तियों, बगीचों, पहाड़ी गावों, सेना की छावनियों गोशालाओं, अहीरों की बस्तियों और यात्रियों के टिकने के स्थानों में रहते। कभी पहाड़ों, जंगलों और आश्रम आदि में विचरते। वे किसी भी रास्ते से निकलते तो जिस प्रकार वन में विचरने वाले हाथी को मक्खियाँ सताती हैं, उसी प्रकार मूर्ख और दुष्ट लोग उनके पीछे हो जाते और उन्हें तंग करते। कोई धमकी देते, कोई मारते, कोई पेशाब कर देते, कोई थूक देते, कोई ढेला मारते, कोई विष्ठा और धूल फेंकते, कोई अधोवायु छोड़ते और कोई खोटी-खरी सुनाकर उनका तिरस्कार करते। किन्तु वे इन सब बातों पर जरा भी ध्यान नहीं देते। *इसका कारण यह था कि भ्रम से सत्य कहे जाने वाले इस मिथ्या शरीर में उनकी अहंता-ममता तनिक भी नहीं थी। वे कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण प्रपंच के साक्षी होकर अपने परमात्मस्वरूप में ही स्थित थे, इसलिये अखण्ड चित्तवृत्ति से अकेले ही पृथ्वी पर विचरते रहते थे। यद्यपि उनके हाथ, पैर, छाती, लम्बी-लम्बी बाँहें, कंधे, गले और मुख आदि अंगों की बनावट बड़ी ही सुकुमार थी; उनका स्वभाव से ही सुन्दर मुख स्वाभाविक मधुर मुस्कान से और भी मनोहर जान पड़ता था; नेत्र नवीन कमलदल के समान बड़े ही सुहावने, विशाल एवं कुछ लाली लिये हुए थे; उनकी पुतलियाँ शीतल एवं संतापहारिणी थीं। उन नेत्रों के कारण वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। कपोल, कान और नासिका छोटे-बड़े न होकर समान एवं सुन्दर थे तथा उनके अस्फुट हास्य युक्त मनोहर मुखारविन्द की शोभा को देखकर पुरनारियों के चित्त में कामदेव का संचार हो जाता था; तथापि उनके मुख के आगे जो भूरे रंग की लम्बी-लम्बी घुँघराली लटें लटकी रहती थीं, उनके महान् भार और अवधूतों के समान धूलिधूसरित देह के कारण वे ग्रहग्रस्त मनुष्य के समान जान पड़ते थे। *जब भगवान् ऋषभदेव ने देखा कि यह जनता योगसाधन में विघ्नरूप है और इससे बचने का उपाय बीभत्स वृत्ति से रहना ही है, तब उन्होंने अजगर वृत्ति धारण कर ली। वे लेटे-ही-लेटे खाने-पीने, चबाने और मल-मूत्र त्याग करने लगे। वे अपने त्यागे हुए मल में लोट-लोटकर शरीर को उससे सान लेते। (किन्तु) उनके मल में दुर्गन्ध नहीं थी, बड़ी सुगन्ध थी और वायु उस सुगन्ध को लेकर उनके चारों ओर दस योजन तक सारे देश को सुगन्धित कर देती थी। इसी प्रकार गौ, मृग और काकादि की वृत्तियों को स्वीकार कर वे उन्हीं के समान कभी चलते हुए, कभी खड़े-खड़े, कभी बैठे हुए और कभी लेटे-लेटे ही खाने-पीने और मल-मूत्र का त्याग करने लगते थे। *परीक्षित! परमहंसों को त्याग के आदर्श की शिक्षा देने के लिये इस प्रकार मोक्षपति भगवान् ऋषभदेव ने कई तरह की योगचर्याओं का आचरण किया। वे निरन्तर सर्वश्रेष्ठ महान् आनन्द का अनुभव करते रहते थे। उनकी दृष्टि में निरुपाधिरूप से सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मा अपने आत्मस्वरूप भगवान् वासुदेव से किसी प्रकार का भेद नहीं था। इसलिये उनके सभी पुरुषार्थ पूर्ण हो चुके थे। उनके पास आकाशगमन, मनोजवित्व (मन की गति के समान ही शरीर का भी इच्छा करते ही सर्वत्र पहुँचा जाना), अन्तर्धान, परकायप्रवेश (दूसरे के शरीर में प्रवेश करना), दूर की बातें सुन लेना और दूर के दृश्य देख लेना आदि सब प्रकार की सिद्धियाँ अपने-आप ही सेवा करने को आयीं; परन्तु उन्होंने उनका मन से आदर या ग्रहण नहीं किया। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ************************************************

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Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 077*✳️✳️ ✳️✳️*शचीमाता और गौरहरि*✳️✳️ *अहो विधतस्तव न क्वचिद्दया *संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिन:। *तांश्चाकृतार्थान्वियुनड़्क्ष्यपार्थकं *विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा॥ *भक्तों के मुख से निमाई के संन्‍यास की बात सुनकर माता के शोक का पारावार नहीं रहा। वह भूली-सी, भटकी-सी, किंकर्तव्यविमूढा-सी होकर चारों ओर देखने लगी। कभी आगे देखती, कभी पीछे को निहारती, कभी आकाश की ही ओर देखने लगती। मानो माता दिशा-विदिशाओं से सहायता की भिक्षा माँग रही है। लोगों के मुख से इस बात को सुनकर दु:खिनी माता का धैर्य एकदम जाता रहा। वह विलखती हुई, रोती हुई, पुत्र-वियोगरूपी दावानल से झुलसी हुई-सी महाप्रभु के पास पहुँची और बड़ी ही कातरता के साथ कलेजे की कसक को अपनी मर्माहत वाणी से प्रकट करती हुई कहने लगी- ‘बेटा निमाई! मैं जो कुछ सुन रही हूँ वह सब कहाँ तक ठीक है?’ पुत्र-वियोग को अशुभ समझने वाली माता के मुख से वह दारुण बात स्वयं ही न निकली। उसने गोलमाल तरह से ही उस बात को पूछा। कुछ अन्यमनस्क भाव से प्रभु ने पूछा- ‘कौन-सी बात?’ हाय! उस समय माता का हृदय स्थान-स्थान से फटने लगा। वह अपने मुख से वह हृदय को हिला देने वाली बात कैसे कहती? कड़ा जी करके उसने कहा- ‘बेटा! कैसे कहूँ, इस दु:खिनी विधवा के ही भाग्य में न जाने विधाता ने सम्पूर्ण आपत्तियाँ लिख दी हैं क्या? मेरे कलेजे का बड़ा टुकड़ा विश्वरूप घर छोड़कर चला गया और मुझे मर्माहत बनाकर आज तक नहीं लौटा। तेरे पिता बीच में ही धोखा दे गये। उस भयंकर पति-वियोगरूपी पहाड़-से दु:ख को भी मैंने केवल तेरा ही मुख देखकर सहन किया। तेरे कमल के समान खिले हुए मुख को देखकर मैं सभी विपत्तियों को भूल जाती। मुझे जब कभी दु:ख होता तो तुझसे छिपकर रोती। तेरे सामने इसलिये खुलकर नहीं रोती थी कि मेरे रुदन से तेरा चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख कहीं म्लान न हो जाय। मैं तेरे मुख पर म्लानता नहीं देख सकती! दु:ख-दावानल में जलती हुई इस अनाश्रिता दु:खिनी का तेरा चन्द्रमा के समान शीतल मुख ही एकमात्र आश्रय था। उसी की शीतलता में मैं अपने तापों को शांत कर लेती। अब भक्तों के मुख से सुन रही हूँ कि तू भी मुझे धोखा देकर जाना चाहता है। बेटा! क्या यह बात ठीक है?’ माता की ऐसी करुणापूर्ण कातर वाणी को सुनकर प्रभु ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वे डबडबाई आँखों से पृथ्वी की ओर देखने लगी। उनके चेहरे पर म्लानता आ गयी। वे भावी वियोगजन्य दु:ख के कारण कुछ विषण्ण-से हो गये। *माता की अधीरता और भी अधिक बढ़ गयी। उसने भयभीत होकर बड़े ही आर्तस्वर में पूछा- ‘निमाई! बेटा, मैं सत्य-सत्य जानना चाहती हूँ। क्या यह बात ठीक है? चुप रहने से काम न चलेगा। मौन रहकर मुझे और अत्यधिक क्लेश मत पहुँचा, मुझे ठीक-ठीक बता दे।’ सरलता के साथ प्रभु ने स्वीकार किया कि माता ने जो कुछ सुना है, वह ठीक ही है। *इतना सुनने पर माता को कितना अपार दु:ख हुआ होगा, इसे किस कवि की निर्जीव लेखनी व्यक्त करने में समर्थ हो सकती है? माता के नेत्रों से निरन्तर अश्रु निकल रहे थे। वे उस सूखे हुए मुख को तर करते हुए माता के वस्त्रों को भिगोने लगे। रोते-रोते माता ने कहा- ‘बेटा! तुझको जाने के लिये मना करूँ, तो तू मानेगा नहीं। इसलिये मेरी यही प्रार्थना है कि मेरे लिये थोड़ा विष खरीदकर और रखता जा। मेरे आगे-पीछे कोई भी तो नहीं है। तेरे पीछे से मैं मरने के लिये विष किससे मंगाऊंगी? बेचारी विष्‍णुप्रिया अभी बिलकुल अबोध बालिका है। उसे अभी संसार का कुछ पता ही नहीं। उसने आज तक एक पैसे की भी कोई चीज नहीं खरीदी। यदि उसे ही विष लेने भुजूं तो हाल तो वह जा ही नहीं सकती। चली भी जाय तो कोई उसे अबोध बालिका समझकर देगा नहीं। ये जो इतने भक्त यहाँ आते हैं, ये सब तेरे ही कारण आया करते हैं। तू चला जायगा तो फिर ये बेचारे क्यों आवेंगे? मेरे सूने घर का तू ही एकमात्र दीपक है, तेरे रहने से अंधेरे में भी मेरा घर आलोकित होता रहता है। तू अब मुझे आधी सुलगती ही हुई छोड़कर जा रहा है। जा बेटा! खुशी से जा। किंतु मैंने तुझे नौ महीने गर्भ में रखा है, इसी नाते से मेरा इतना काम तो कर जा। मुझ दु:खिनी का विष के सिवा दूसरा कोई और आश्रय भी तो नहीं। गंगा जी में कूदकर भी प्राण गंवाये जा सकते हैं; किंतु बहुत सम्भव है कोई दयालु पुरुष मुझे उसमें से निकाल ले। इसलिये घर के भीतर ही रहने वाली मुझ आश्रयहीना दु:खिनी का विष ही एकमात्र सहारा है।’ यह कहते-कहते वृद्धा माता बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ी। *प्रभु ने अपने हाथों से अपनी दु:खिनी माता को उठाया और सम्पूर्ण शरीर में लगी हुई उसकी धूलि को अपने वस्त्र से पोंछा और माता को धैर्य बंधाते हुए वे कहने लगे- ‘माता! तुमने मुझे गर्भ में धारण किया है। मेरे मल-मूत्र साफ किये हैं, मुझे खिला-पिलाकर और पढा़-लिखाकर इतना बड़ा किया है। तुम्हारे ऋण से मैं किस प्रकार उऋण हो सकता हूँ? *माता! यदि मैं अपने जीवित शरीर पर से खाल उतारकर तुम्हारें पैरों के लिये जूता बनाकर पहनाऊँ तो भी तुम्हारे इतने भारी ऋण का परिशोध नहीं कर सकता। मैं जन्म-जन्मान्तरों से तुम्हारा ऋणी रहा हूँ और आगे भी रहूँगा। मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ, यदि मेरे वश की बात होती, तो मैं प्राणों को गंवाकर भी तुम्हें प्रसन्न कर सकता। किंतु मैं क्या करूँ? मेरा मन मेरे वश में नहीं है। मैं ऐसा करने के लिये विवश हूँ।’ *‘तुम वीर-जननी हो। विश्वरूप-जैसे महापुरुष की माता होने का सौभाग्य तुम्हें प्राप्त हुआ है। तुम्हें इस प्रकार का विलाप शोभा नहीं देता। ध्रुव की माता सुनीति ने अपने प्राणों से भी प्यारे पाँच वर्ष की अवस्था वाले अपने इकलौते पुत्र को तपस्या करने के लिये जाने की आज्ञा प्रदान कर दी थी। *भगवान श्रीरामचन्द्रजी की माता ने पुत्र वधू सहित अपने इकलौते पुत्र को वन जाने की अनुमति दे दी थी। सुमित्रा ने दृढ़तापूर्वक घर में पुत्रवधू रहते हुए भी लक्ष्मण को आग्रहपूर्वक श्रीरामचन्द्र जी के साथ वन में भेज दिया था। मदालसा ने अपने सभी पुत्रों को संन्यास धर्म की दीक्षा दी थी। तुम क्या उन माताओं से कुछ कम हो? जननि! तुम्हारें चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है। तुम मेरे काम में पुत्रस्नेह के कारण बाधा मत पहुँचाओ! मुझे प्रसन्नतापूर्वक संन्यास ग्रहण करने की अनुमति दो और ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने इस व्रत को भलीभाँति निभा सकूँ।’ *माता ने आंसुओं को पोंछते हुए कहा- ‘बेटा! मैंने आज तक तेरे किसी भी काम में हस्तक्षेप नहीं किया। तू जिस काम में प्रसन्न रहा, उसी में मैं यदा प्रसन्न बनी रही। मैं चाहे भूखी बैठी रही, किंतु तुझे हजार जगह से लाकर तेरी रुचि के अनुसार सुन्दर भोजन कराया। मैं तेरी इच्छा के विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकती। किंतु घर में रहकर क्या भगवद्भजन नहीं हो सकता? यहीं पर श्रीवास, गदाधर, मुकुन्द, अद्वैताचार्य- इन सभी भक्तों को लेकर दिन-रात्रि भजन-कीर्तन करता रह। मैं तुझे कभी भी न रोकूँगी। बेटा! तू सोच तो सही, इस अबोध बालिका विष्णुप्रिया की क्या दशा होगी? इसने तो अभी संसार का कुछ भी सुख नहीं देखा। तेरे बिना यह कैसे रह सकेगी? मेरा तो विधान ने वज्र का हृदय बनाया है। विश्वरुप के जाने पर भी यह नहीं फटा और तेरे पिता के परलोक-गमन करने पर भी यह ज्यों-का-त्यों ही बना रहा। *मालूम पड़ता है, तेरे चले जानेपर भी इसके टुकडे़-टुकडे़ नहीं होंगे। रोज सुनती हूँ, अमुक मर गया, अमुक चल बसा। न जाने मेरी आयु विधाता ने कितनी बड़ी बना दी है, जो अभी तक वह सुध ही नहीं लेता। विष्णुप्रिया के आगे के लिए कोई आधार हो जाय और मैं मर जाऊँ, तब तू खुशी से संन्यास ले लेना। मेरे रहते हुए और उस बालिका को जीवित रहने पर भी विधवा बनाकर तेरा घर में जाना ठीक नहीं। मैं तेरी माता हूँ। मेरे दु:ख की ओर थोड़ा भी तो खयाल कर! तू जगत के उद्धार के लिये काम करता है। क्या मैं जगत में नहीं हूँ? मुझे जगत से बाहर समझकर मेरी उपेक्षा क्यों कर रहा है? मुझ दु्:खिनी को तू इस तरह विलखती हुई छोड़ जायगा तो तुझे माता को दु:खी करने का पाप लगेगा।’ *प्रभु ने धैर्य के साथ कहा- ‘माता! तुम इतनी अधीर मत हो। भाग्य को मेटने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है। विधाता ने मेरा-तुम्हारा संयोग इतने ही दिन का लिखा था। अब आगे लाख प्रयत्न करने पर भी मैं नहीं रह सकता। भगवान वासुदेव सबकी रक्षा करते हैं। उनका नाम विश्वम्भर है। जगत के भरण-पोषण का भार उन्हीं पर है। तुम हृदय से इस अज्ञानजन्य मोह को निकाल डालो और मुझे प्रेमपूर्वक हृदय से यति-धर्म ग्रहण करने की अनुमति प्रदान करो।’ *रोते-रोते माता ने कहा- ‘बेटा! मैं बालकपन से ही तेरे स्वभाव को जानती हूँ। तू जिस बात को ठीक समझता है, उसे ही करता है। फिर चाहे उसके विरुद्ध साक्षात ब्रह्मा भी आकर तुझे समझावें तो भी तू उससे विचलित नहीं होता। अच्छी बात है, जिसमें तुझे प्रसन्नता हो, वही कर। तेरी प्रसन्नता में ही मुझे प्रसन्नता हैं। कहीं भी रह, सुखपूर्वक रह। चाहे गृहस्थी बनकर रह या यति बनकर। मैं तो तुझे कभी भुला ही नहीं सकती। भगवान तेरा कल्याण करें। किंतु तुझे जाना हो तो मुझसे बिना ही कहे मत जाना। मुझे पहले से सूचना दे देना। *महाप्रभु ने इस प्रकार माता से अनुमति लेकर उसकी चरणवन्दना की और उसे आश्वासन देते हुए कहने लगे- ‘माता! तुमसे मैं ऐसी ही आशा करता था, तुमने योग्य माता के अनुकूल ही बर्ताव किया है। मैं इस बात का तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि तुमसे बिना कहे नहीं जाऊँगा। जिस दिन जाना होगा, उससे पहले ही तुम्हें सूचित कर दूँगा।’ इस प्रकार प्रभु ने माता को तो समझा-बुझाकर उससे आज्ञा ले ली। विष्णुप्रिया को समझाना थोड़ा कठिन था। वह अब तक अपने पितृगृह में थीं, इसलिये उनके सामने यह प्रश्न उठा ही नहीं था। प्रभु के संन्यास ग्रहण करने की बात सम्पूर्ण नवद्वीप नगर में फैल गयी थी। विष्णुप्रिया ने भी अपने पिता के घर में ही यह बात सुनी। उसी समय वह अपने पिता के घर से पतिदेव के यहाँ आ गयीं। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2021

*24 जनवरी को मनाया जाता है राष्ट्रीय बालिका दिवस, जानें क्यों मनाया जाता है यह दिन..... *हर साल भारत में 24 जनवरी को नेशनल गर्ल चाइल्ड डे मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 2008 में महिला और बाल विकास मंत्रालय ने की थी। इस दिन को मनाने के उद्देश्य देश में बालिकाओं के साथ होने वाले भेदभाव के प्रति लोगों को जागरुक करना है। 2008 से यह दिन पूरे देश में मनाया जाने लगा। इस अवसर पर देश पर में बालिका बचाओं अभियान चलाए जाने लगे, इसके अलावा चाइल्ड सेक्स रेशो और लड़कियों को स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण देने के लिए हर संभव कोशिश की जाती है।  महिलाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शुरुआत की थी। सरकार का 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान लड़कियों के लिए चलाया गया एक बहुत अच्छा कदम है। इसके जरिए लड़कियों और महिलाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया जाता है। महिलाओं के प्रति होने वाली कई अमानवीय प्रथाओं जैसे भ्रूण हत्या अब कम हो गए हैं। *इन अभियानों से लोगों की मानसिकता को बदलने में मदद मिली है ,खासकर ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा को लेकर काफी जागरुकता आई है। समाज के लोगों की मानसिकता पर इन अभियानों का काफी असर हुआ है। अब लोग लड़कियों को लड़कों के बराबर सम्मान और अधिकार दे रहे हैं। *नेशनल गर्ल चाइल्ड डे के अवसर पर लड़कियों की सुरक्षा, शिक्षा, लिंग अनुपात, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अलग-अलग तरह के अभियान चलाए जाते हैं। लोगों को नुक्कड़ नाटकों के जरिए जागरुक किया जाता है। आपको बता दें कि गांव ही नहीं फिलहाल पढ़े लिखे तपके में महिलाओं को लिंगभेद का सामना करना पड़ता है। राष्ट्रीय बालिका दिवस विशेष..... *इस दिन इंदिरा गांधी जी पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठी थी इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।तिथि24 जनवरीउद्देश्यबालिकाओं को घरेलू हिंसा, बाल विवाह व दहेज जैसी चीज़ों के बारे में सचेत करना चाहिए।अन्य जानकारीकिशोरियों व बालिकाओं के कल्याण के लिए सरकार ने 'समग्र बाल विकास सेवा', 'धनलक्ष्मी', 'सबला' जैसी योजनाएँ चलाई हैं। इन सबका उद्देश्य लड़कियों, ख़ासकर किशोरियों को सशक्त बनाना है ताकि वे आगे चलकर एक बेहतर समाज के निर्माण में योगदान दे सकें। *राष्ट्रीय बालिका दिवस (अंग्रेज़ी:National Girl Child Day) 24 जनवरी को मनाया जाता है। 24 जनवरी के दिन इंदिरा गांधी को नारी शक्ति के रूप में याद किया जाता है। इस दिन इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठी थी इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है। यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर लिया गया है। आज की बालिका जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रही है चाहे वो क्षेत्र खेल हो या राजनीति, घर हो या उद्योग। राष्ट्रमण्डल खेलों के गोल्ड मैडल हो या मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति के पद पर आसीन होकर देश सेवा करने का काम हो सभी क्षेत्रों में लड़कियाँ समान रूप से भागीदारी ले रही हैं।[1] हर क्षेत्र में लड़की आगे, फिर क्यों हम लड़की से भागें। इंदिरा गाँधी मनाने का कारण आज बालिका हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है लेकिन आज भी वह अनेक कुरीतियों का शिकार हैं। ये कुरीतियों उसके आगे बढ़ने में बाधाएँ उत्पन्न करती है। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इस समस्या से अछूता नहीं है। आज हज़ारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है या जन्म लेते ही लावारिस छोड़ दिया जाता है। आज भी समाज में कई घर ऐसे हैं, जहाँ बेटियों को बेटों की तरह अच्छा खाना और अच्छी शिक्षा नहीं दी जा रही है। भारत में 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 44.5 प्रतिशत (क़रीब आधी) औरतें ऐसी हैं, जिनकी शादियाँ 18 साल के पहले हुईं हैं। इन 20 से 24 साल की शादीशुदा औरतों में से 22 प्रतिशत (क़रीब एक चौथाई) औरतें ऐसी हैं, जो 18 साल के पहले माँ बनी हैं। इन कम उम्र की लड़कियों से 73 प्रतिशत (सबसे ज़्यादा) बच्चे पैदा हुए हैं। इन बच्चों में 67 प्रतिशत (दो-तिहाई) कुपोषण के शिकार हैं।[1] लता मंगेशकर अनुपात कन्या भ्रूण हत्या की वजह से लड़कियों के अनुपात में काफ़ी कमी आयी है। पूरे देश में लिंगानुपात 933:1000 है। वृद्धि दर में गिरावट 1991 की जनगणना से 2001 की जनगणना तक, हिन्दू और मुसलमानों दोनों की ही जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है। 2001 की जनगणना का यह तथ्य सबसे ज़्यादा हैरान करता है कि 0 से 6 साल के बच्चों के लिंग अनुपात में भी भारी गिरावट आई है। यहाँ कुल लिंग अनुपात में 8 के अंतर के मुक़ाबले बच्चों के लिंग अनुपात में अब 24 का अंतर दर्ज है। यह उनके स्वास्थ्य और जीवन-स्तर में गिरावट का अनुपात भी है। यह अंतर भयावह भविष्य की ओर भी इशारा करता है। एशिया महाद्वीप में भारत की महिला साक्षरता दर सबसे कम है। गौरतलब है कि ‘नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रंस राइट्स’ यानी एनसीपीसीआर की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 6 से 14 साल तक की ज़्यादातर लड़कियों को हर दिन औसतन 8 घंटे से भी ज़्यादा समय केवल अपने घर के छोटे बच्चों को संभालने में बिताना पड़ता है। इसी तरह, सरकारी आँकड़ों में दर्शाया गया है कि 6 से 10 साल की जहाँ 25 प्रतिशत लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है, वहीं 10 से 13 साल की 50 प्रतिशत (ठीक दोगुनी) से भी ज़्यादा लड़कियों को स्कूल छोड़ना पड़ता है। 2008 के एक सरकारी सर्वेक्षण में 42 प्रतिशत लड़कियों ने यह बताया कि वे स्कूल इसलिए छोड़ देती हैं, क्योंकि उनके माता-पिता उन्हें घर संभालने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने को कहते हैं। लोगों को इसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह करने और लड़कियों को बचाने के लिए 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है।[2] बाधाएँ पी. टी. उषा लड़कियों के आगे न बढ़ने के कारण यह भी है कि अक्सर घरों में कहा जाता है कि अगर लड़की है, तो उन्हें घर संभालने और अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने की अधिक ज़रूरत है। इस प्रकार की बातें उसके सुधार की राह में बाधाएँ बनती हैं। इन्हीं सब स्थितियों और भेदभावों को मिटाने के मक़सद से ‘बालिका दिवस’ मनाने पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसे बालिकाओं की अपनी पहचान न उभर पाने के पीछे छिपे असली कारणों को सामने लाने के रूप में मनाने की जरुरत है, जो सामाजिक धारणा को समझने के साथ-साथ बालिकाओं को बहन, बेटी, पत्नी या माँ के दायरों से बाहर निकालने और उन्हें सामाजिक भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करने में मदद के तौर पर जाना जाए।[3] सुझाव राष्ट्रीय बालिका दिवस के दिन हमें लड़का-लड़की में भेद नहीं करने व समाज के लोगों को लिंग समानता के बारे में जागरूक करने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। देश में लड़कियों की घटती संख्या को देखते हुए ही राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाने लगा है। भेदभाव समाज में आज भी बालक और बालिकाओं में भेदभाव किया जा रहा है। यही कारण है कि बालिकाओं को जन्म लेने से पहले (भ्रूण) ही खत्म करवाया जा रहा है। सभी को मिलकर इस कुरीति को मिटाना है। बाल विवाह, भ्रूण हत्या, शिशु मृत्यु दर रोके जाने, स्तनपान कराने, नियमित टीकाकरण, दहेज प्रथा एवं अन्य सामाजिक ज्वलंत विषयों में सुधार लाना चाहिए। अमृता प्रीतम जीने का उसको भी अधिकार, चाहिए उसे थोडा सा प्यार। जन्म से पहले न उसे मारो, कभी तो अपने मन में विचारो। शायद वही बन जाए सहारा, डूबते को मिल जाए किनारा॥ आत्मनिर्भरता बालिकाओं की सेहत, पोषण व पढ़ाई जैसी चीज़ों पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है ताकि बड़ी होकर वे शारीरिक, आर्थिक, मानसिक व भावनात्मक रूप से आत्मनिर्भर व सक्षम बन सकें। बालिकाओं को घरेलू हिंसा, बाल विवाह व दहेज जैसी चीज़ों के बारे में सचेत करना चाहिए। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक बनाया जाना चाहिए। किशोरियों व बालिकाओं के कल्याण के लिए सरकार ने 'समग्र बाल विकास सेवा', 'धनलक्ष्मी' जैसी योजनाएँ चलाई हैं। हाल ही में लागू हुई 'सबला योजना' किशोरियों के सशक्तीकरण के लिए समर्पित है। इन सबका उद्देश्य लड़कियों, ख़ासकर किशोरियों को सशक्त बनाना है ताकि वे आगे चलकर एक बेहतर समाज के निर्माण में योगदान दे सकें। बालिका दिवस का नारा बेटी कुदरत का उपहार नहीं करो उसका तिरस्कार जो बेटी को दे पहचान माता-पिता वही महान

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Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2021

~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞 ⛅ *दिनांक 24 जनवरी 2021* ⛅ *दिन - रविवार* ⛅ *विक्रम संवत - 2077* ⛅ *शक संवत - 1942 ⛅ *अयन - उत्तरायण* ⛅ *ऋतु - शिशिर* ⛅ *मा - पौष* ⛅ *पक्ष - शुक्ल* ⛅ *तिथि - एकादशी रात्रि 10:57 तक तत्पश्चात द्वादशी* ⛅ *नक्षत्र - रोहिणी रात्रि 12:00 तक तत्पश्चात मॄगशिरा* ⛅ *योग - ब्रह्म रात्रि 10:30 तक तत्पश्चात इन्द्र* ⛅ *राहुकाल - शाम 05:01 से शाम 06:24 तक* ⛅ *सूर्योदय - 07:19* ⛅ *सूर्यास्त - 18:22* ⛅ *दिशाशूल - पश्चिम दिशा में* ⛅ *व्रत पर्व विवरण - पुत्रदा एकादशी* 💥 *विशेष - हर एकादशी को श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से घर में सुख शांति बनी रहती है lराम रामेति रामेति । रमे रामे मनोरमे ।। सहस्त्र नाम त तुल्यं । राम नाम वरानने ।।* 💥 *आज एकादशी के दिन इस मंत्र के पाठ से विष्णु सहस्रनाम के जप के समान पुण्य प्राप्त होता है l* 💥 *एकादशी के दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए।* 💥 *एकादशी को चावल व साबूदाना खाना वर्जित है | एकादशी को शिम्बी (सेम) ना खाएं अन्यथा पुत्र का नाश होता है।* 💥 *जो दोनों पक्षों की एकादशियों को आँवले के रस का प्रयोग कर स्नान करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।* 🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *आर्थिक परेशानी या कर्जा हो तो* 🌷 ➡ *26 जनवरी 2021 मंगलवार को भौम प्रदोष योग है ।* 🙏🏻 *किसी को आर्थिक परेशानी या कर्जा हो तो भौम प्रदोष योग हो, उस दिन शाम को सूर्य अस्त के समय घर के आसपास कोई शिवजी का मंदिर हो तो जाए और ५ बत्ती वाला दीपक जलाये और थोड़ी देर जप करें :* 👉🏻 *ये मंत्र बोले :–* 🌷 *ॐ भौमाय नमः* 🌷 *ॐ मंगलाय नमः* 🌷 *ॐ भुजाय नमः* 🌷 *ॐ रुन्ह्र्ताय नमः* 🌷 *ॐ भूमिपुत्राय नमः* 🌷 *ॐ अंगारकाय नमः* 👉🏻 *और हर मंगलवार को ये मंगल की स्तुति करें:-* 🌷 *धरणी गर्भ संभूतं विद्युत् कांति समप्रभम |* *कुमारं शक्ति हस्तं तं मंगलम प्रणमाम्यहम ||* 🙏🏻 *सुरेशनंदजी* 🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *पुत्रदा एकादशी* 🌷 🙏🏻 *पुत्रदा एकादशी ( पुत्र की इच्छा से व्रत करनेवाला पुत्र पाकर स्वर्ग का अधिकारी हो जाता है | सब पापों को हरनेवाले इस व्रत का माहात्म्य पढ़ने व सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है | )* 🙏🏻 *स्त्रोत – ऋषिप्रसाद , दिसम्बर २०१६ से* 🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🌷 *कर्ज-निवारक कुंजी भौम प्रदोष व्रत* 🌷 🙏🏻 *त्रयोदशी को मंगलवार उसे भौम प्रदोष कहते हैं ....इस दिन नमक, मिर्च नहीं खाना चाहिये, इससे जल्दी फायदा होता है | मंगलदेव ऋणहर्ता देव हैं। इस दिन संध्य के समय यदि भगवान भोलेनाथ का पकरें तो भोलेनाथ की, गुरु की कृपा से हम जल्दी ही कर्ज से मुक्त हो सकते हैं। इस दैवी सहायता के साथ थोड़ा स्वयं भी पुरुषार्थ करें। पूजा करते समय यह मंत्र बोलें –* 🌷 *मृत्युंजयमहादेव त्राहिमां शरणागतम्।* *जन्ममृत्युजराव्याधिपीड़ितः कर्मबन्धनः।।* 🙏🏻 🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞 🙏🍀🌻🌹🌸💐🍁🌷🌺🙏 *पौष पुत्रदा एकादशी व्रत* ~~~~~~~~~~~~~~~ 24 जनवरी 2021 रविवार पौष पुत्रदा ऐकादशी, साल की दूसरी एकादशी हे, विवाहित लोगों के लिए बेहद खास है. *पौष शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा गया है।* वर्ष 2021 में पुत्रदा एकादशी 24 जनवरी, रविवार को पड़ रही है। नि:संतान दंपत्ति के लिए यह व्रत काफी लाभदायक बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत से व्रती को योग्य संतान की प्राप्ति होती है और मृत्यु के बाद स्वर्ग मे स्थान प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। प्रात: स्नान करके पूजन और उपवास करना चाहिए। भगवान विष्णु (शालिग्राम) को गंगाजल से स्नान कराकर भोग लगाना चाहिए। पूरे दिन भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। भगवान नारायण के साथ लक्ष्मी जी की साधना भी करनी चाहिए। इस दिन बाल गोपाल की पूजा भी लाभकारी मानी जाती है। क्यों रखते हैं पुत्रदा एकादशी का व्रत ❓ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ दरअसल इस व्रत के नाम के जैसा ही इससे प्राप्त होने वाला फल है। जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती है अथवा जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की कामना करते हैं उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत बहुत ही शुभफलदायक होता है। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को व्यक्ति विशेष को अवश्य रखना चाहिए, जिससे मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो सके। इस व्रत के प्रभाव से संतान की रक्षा भी होती है। । इस व्रत की खास बात यह है कि यह स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से फल देता है। व्रत की कथा ~~~~~~~~~ भद्रावती नगर में राजा सुकेतुमान व उनकी पत्नी शैव्या निवास करते थे। इस दंपत्ति को कोई संतान नहीं थी। दोनों को दिन-रात यह चिंता सताती थी कि उनकी मृत्यु के बाद उन्हें अग्नि कौन देगा। इसी चिंता में दोनों दिन-रात दुखी रहते थे। एक दिन राजा दुखी मन से वन में गए। राजा को वन में प्यास लगी। कुछ दूर भटकने पर उन्हें एक सरोवर दिखा। सरोवर के पास पहुंचने पर राजा ने देखा कि वहां कुछ दूरी पर ऋषियों के आश्रम बने हुए हैं। वहां बहुत से मुनि वेदपाठ कर रहे थे। राजा ने सरोवर से पानी पीया। प्यास बुझाकर राजा ने सभी मुनियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने राजा को आशीर्वाद दिया और बोले कि हम आपसे प्रसन्न हैं। राजा ने ऋषियों से उनके एकत्रित होने का कारण पूछा। तब उनमें से एक मुनि ने कहा कि वह विश्वदेव हैं और सरोवर के निकट स्नान के लिए आए हैं। राजा को ऋषियों ने बताया कि आज पुत्रदा एकादशी है, जो मनुष्य इस दिन व्रत करता है उसे संतान की प्राप्ति होती है। राजा ने मुनियों के कहे अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत आरंभ किया और अगले दिन द्वादशी को पारण (व्रत खोला) किया। व्रत के प्रभाव स्वरूप कुछ समय के पश्चात रानी गर्भवती हुईं और इन्हें योग्य संतान की प्राप्ति हुई। व्रत विधि ~~~~~~ -पूरे दिन उपवास रहकर शाम के समय कथा सुनने के बाद फलाहार करना चाहिए। -इस दिन दीप दान करने का भी महत्व है। -पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को व्रत से पूर्व यानी दशमी के दिन एक ही वक्त भोजन करना चाहिए। भोजन भी सात्विक करना चाहिए। -व्रत के दौरान संयमित और ब्रह्मचर्य के नियम का पालन करना चाहिए। -प्रात: स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर गंगा जल, तुलसी, तिल, फूल और पंचामृत से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। -व्रत के अगले दिन द्वादशी पर किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण (व्रत खोलना) करना चाहिए। -संतान की इच्छा के लिए पति-पत्नी को प्रात:काल संयुक्त रूप से भगवान श्री कृष्ण की उपासना करनी चाहिए। -इस दिन संतान गोपाल मंत्र का जाप करना लाभकारी होता है। तत्पश्चात् प्रसाद ग्रहण कर गरीबों और जरुरतमंदों को भोजन कराना और दक्षिणा देना चाहिए। ।। ओम नमो नारायणाय ।। ~~~~~~~~~~~~~~

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Neha Sharma, Haryana Jan 23, 2021

तन की जाने मन की जाने,जाने चित की चोरी..! उस "ठाकुर"से क्या छिपावे जिसके हाथ सदा सब की डोरी..!! ┈┉┅━👣❀जय श्री राधेकृष्णा ❀👣━┅┉┈ 💁‍♂️✍️एक राजा बहुत दिनों से पुत्र की प्राप्ति के लिए आशा लगाए बैठा था लेकिन पुत्र नहीं हुआ। उसके सलाहकारों ने तांत्रिकों से सहयोग लेने को कहा.........🔴‼️ 💁‍♂️✍️सुझाव मिला कि किसी बच्चे की बलि दे दी जाए तो पुत्र प्राप्ति हो जायेगी......🔴‼️ 💁‍♂️✍️राजा ने राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो अपना बच्चा देगा,उसे बहुत सारा धन दिया जाएगा.......🔴‼️ 💁‍♂️✍️एक परिवार में कई बच्चें थे,गरीबी भी थी।एक ऐसा बच्चा भी था,जो ईश्वर पर आस्था रखता था तथा सन्तों के सत्संग में अधिक समय देता था.....🔴‼️ 💁‍♂️✍️परिवार को लगा कि इसे राजा को दे दिया जाए क्योंकि ये कुछ काम भी नहीं करता है,हमारे किसी काम का भी नहीं है.....🔴‼️ 💁‍♂️✍️इसे देने पर राजा प्रसन्न होकर बहुत सारा धन देगा..ऐसा ही किया गया। बच्चा राजा को दे दिया गया.....🔴‼️ 💁‍♂️✍️राजा के तांत्रिकों द्वारा बच्चे की बलि की तैयारी हो गई.......🔴‼️ 💁‍♂️✍️राजा को भी बुलाया गया। बच्चे से पूछा गया कि तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है ?* 💁‍♂️✍️बच्चे ने कहा कि ठीक है ! मेरे लिए रेत मँगा दिया जाए रेत आ गया......🔴‼️ 💁‍♂️✍️बच्चे ने रेत से चार ढेर बनाए। एक-एक करके तीन रेत के ढेरों को तोड़ दिया और चौथे के सामने हाथ जोड़कर बैठ गया उसने कहा कि अब जो करना है करें.......🔴‼️ 💁‍♂️✍️यह सब देखकर तांत्रिक डर गए उन्होंने पूछा कि ये तुमने क्या किया है?.......🔴‼️ 💁‍♂️✍️पहले यह बताओ। राजा ने भी पूछा तो बच्चे ने कहा कि..पहली ढेरी मेरे माता पिता की है मेरी रक्षा करना उनका कर्त्तव्य था परंतु उन्होंने पैसे के लिए मुझे बेच दिया.......🔴‼️ 💁‍♂️✍️इसलिए मैंने ये ढेरी तोड़ी दूसरी मेरे सगे-सम्बन्धियों की थी। उन्होंने भी मेरे माता-पिता को नहीं समझाया........🔴‼️ 💁‍♂️✍️ तीसरी आपकी है राजा क्योंकि राज्य की प्रजा की रक्षा करना राजा का ही धर्म होता है परन्तु राजा ही मेरी बलि देना चाह रहा है तो ये ढेरी भी मैंने तोड़ दी.......🔴‼️ 💁‍♂️✍️अब सिर्फ अपने सद् गुरु और ईश्वर पर ही मुझे भरोसा है इसलिए यह एक ढेरी मैंने छोड़ दी है............🔴‼️ 💁‍♂️✍️राजा ने सोचा कि पता नहीं बच्चे की बलि देने के पश्चात भी पुत्र प्राप्त हो या न हो,तो क्यों न इस बच्चे को ही अपना पुत्र बना ले......🔴‼️ 💁‍♂️✍️इतना समझदार और ईश्वर-भक्त बच्चा है।इससे अच्छा बच्चा कहाँ मिलेगा ?....🔴‼️ 💁‍♂️✍️राजा ने उस बच्चे को अपना पुत्र बना लिया और राजकुमार घोषित कर दिया..🔴‼️ 🤗🔰जो ईश्वर और सद् गुरु पर विश्वास रखते हैं,उनका बाल भी बाँका नहीं होता है..🤗🔰 🔰हर मुश्किल में एक का ही जो आसरा लेते हैं,उनका कहीं से किसी प्रकार का कोई अहित नहीं होता है.........🙏🔰 🔱🔱💜🔱🔱💜🔱🔱💜🔱🔱 ⚜️🌻⚜️🌻💥"ॐ परमात्मने नमः"💥🌻⚜️🌻⚜️ ✨"ईश्वर" का नाम कल्याणकारी एवं मोक्ष को प्रदान करने वाला है,,"अनिच्छा से भी "ईश्वर" का नाम लिया जाए तो भी फलदायी होता है! """इसका उदाहरण है,,अजामिल नामक डाकू..!! ✨"अजामिल एक ब्राह्मण होने के बावजूद कुसंगत से एक वैश्या के रूप लावण्य से ऐसा आसक्त हुआ, कि अपनी पत्नी का परित्याग कर वैश्या के साथ ही रहने लगा,वैश्या की प्रसन्नता ही अब अजामिल की प्रसन्नता थी,वैश्या को सुख पहुचानें के लिए वह अपना घर•बार लुटाने में भी संकोच नहीं करता था,,कुसंग से अंतत: विनाश निश्चित है! ""कुसंग के परिणामस्वरूप अजामिल की बुद्धि कुंठित हो चुकी थी,अब उसे न्याय अन्याय में कोई भेद नहीं दिखता था,वह अपना सारा धन वैश्या पर लुटाने के बाद अब राहगीरों को लूटने लगा था,कभी यात्रियों को बांधकर मारता,और कभी किसी का धन चुरा लिया करता था,उस वैश्या से अजामिल को दस संताने उत्पन्न हुई,जब दसवीं संतान का जन्म हुआ,तब अजामिल के घर कुछ सन्तजन पधारे,कुंठित बुद्धि का स्वामी अजामिल उन पर क्रोधित होते हुए बोला:- जाओ यहां से यहां तुम्हें कोई दान•दक्षिणा नहीं मिलेगी! ""महात्मा बोले:- तुम हमें दान•दक्षिणा मत दो,परंतु एक बात हमारी मान लो! ""अजामिल:- क्या ? ""महात्मा:- तुम अपनी सबसे छोटी संतान का नाम "नारायण" रख दो,कहकर महात्मा चल दिए! """अजामिल ने अपने छोटे पुत्र का नाम "नारायण" ही रख दिया,अजामिल अपने सबसे छोटे पुत्र "नारायण" से अत्याधिक प्रेम करता था,वह हर वक्त उसको ही पुकारा करता था,अजामिल की नजरों से ओझल होते ही "नारायण•नारायण" अरे कहां है,तू ? ✨"ऐसे ही समय बीतते अजामिल अब बूढ़ा हो चला था,शक्ति क्षीण हो चुकी थी,और मृत्यु का बोध होने लगा था,मरणासन्न पर पड़े नारायण•नारायण ही पुकारा करता था,पुत्र के प्रति मोह ने उसे जकड़ रखा था! """एक दिन अचानक उसे यमदूत नजर आएं, जो दिखने में बड़े भयावह थे,उनको देख भयवश और पुत्र के प्रति आसक्ति होने से अजामिल अपने पुत्र "नारायण" को उच्च स्वर में पुकारने लगा,""नारायण.."नारायण.. ""तभी वहां विष्णुदूत प्रकट हुए,और उन्होंने यमदूतों को फटकार लगाकर कहा.. """क्या तुम्हें ज्ञात नहीं ?""यदि कोई भूल से भी मृत्यु के समय "नारायण" का नाम पुकार ले,तो तुम्हें उस स्थान को तुरन्त छोड़ देना चाहिए! ""परंतु ये "बैकुंठ वासी नारायण" का नहीं,बल्कि अपने पुत्र "नारायण" नाम पुकार रहा था,यमदूत ने बताया! ""विष्णु पार्षदों ने कहा:- जिस वक्त मृत्यु के समय इसने "नारायण" पुकारा तभी ये सभी पापों से मुक्त हो गया था,अब इस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है ""उनके मध्य इस विस्तृत वार्ता को मृत्युशैय्या पर पड़ा हुआ महापापी अजामिल सुन रहा था,,जब विष्णुदूत और यमदूत वहां से चले गए,तब वह उठ बैठा,क्योंकि उसको "नारायण•नारायण" पुकारते रहने से एक वर्ष की आयु और प्राप्त हो चुकी थी,,अब अजामिल अपने आपसे ही बोला:- """भगवान की माया ने स्त्री रूप धारण करके मुझ अधम को फांस लिया,और क्रीड़ामृग की भांति मुझे नाच नचाया,अब मैं अपने आपको इस माया से मुक्त करूंगा,मैंने सत्य { परमात्मा } को पहचान लिया है, अतः अब मैं शरीर आदि में "मैं" तथा "मेरे" का भाव छोड़कर भगवन्नाम संकीर्तन द्वारा अपने मन को शुद्ध करूंगा,और अपने मन को "ईश्वर चरण" में लगाऊंगा! ""और बन्धुओं उस एक ही वर्ष में अजामिल ने "भगवद्भक्ति" में ऐसा मन लगाया, कि उसे "बैकुंठ धाम" की प्राप्ति हुई! { श्रीमद्भागवत ६/२/३७/३८ } 🥀"हरे कृष्ण"🥀

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Neha Sharma, Haryana Jan 23, 2021

*पिया तोड़ दो बंधन आज...*श्रद्धेय विनोद जी अग्रवाल* 🌸*जय श्री राधेकृष्णा*🙏*शुभ संध्या*🌸*गोपीगीत... *जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । *दयित दृश्यतां दिक्षु तावका स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते ॥1॥ *हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी व्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण्ठ छोड़कर यहाँ नित्य निरंतर निवास करने लगी है , इसकी सेवा करने लगी है। परन्तु हे प्रियतम ! देखो तुम्हारी गोपियाँ जिन्होंने तुम्हारे चरणों में ही अपने प्राण समर्पित कर रखे हैं , वन वन भटककर तुम्हें ढूंढ़ रही हैं।।*जय श्री राधे गोविन्द*🙏🌸🌸 🌷🙏*श्रीहरिः*🌷🙏🌷*श्रीभक्तमाल*🙏🌷 🌸🙏*श्री निषाद वसु और उसका पुत्र*🙏🌸 *दक्षिण भारत में वेंकटगिरि ( तिरुपति बालाजी ) सुप्रसिद्ध तीर्थ है । महर्षि अगस्त्य की प्रार्थना से भगवान् विष्णु ने वेङ्कटाचल को अपनी नित्य निवास – भूमि बनाकर पवित्र किया है । पर्वतके मनोरम शिखरपर स्वामिपुष्करिणी तीर्थ है, जहाँ रहकर पार्वतीनन्दन स्कन्द स्वामी प्रतिदिन श्रीहरि की उपासना करते हैं । उन्हींके नामपर उस तीर्थ को स्वामि पुष्करिणी कहते हैं । उसके पास ही भगवानका विशाल मन्दिर है, जहाँ वे श्रीदेवी और भूदेवीके साथ विराजमान हैं । सत्ययुग में अंजनागिरि, त्रेता में नारायण गिरि, द्वापर में सिंहाचल और कलियुग में वेङ्कटाचल को ही भगवान का नित्य निवास – स्थान बताया गया है । कितने ही प्रेमी भक्त यहाँ भगवानके दिव्य विमान एवं दिव्य चतुर्भुज स्वरुपका सुदुर्लभ दर्शन पाकर कृतार्थ हो चुके हैं । श्रद्धालु पुरुष सम्पूर्ण पर्वतको ही भगवत्स्वरुप मानते हैं ।* *पूर्वकालमें वेंकटाचलपर एक निषाद रहता था । उसका नाम था वसु । वह भगवानका बड़ा भक्त था । प्रतिदिन स्वामि पुष्करिणी में स्नान करके श्री निवास की पूजा करता और श्यामाक ( सावाँ ) के भात में मधु मिलाकर वही श्री भूदेवियोंसहित उन्हें भोगके लिये निवेदन करता था । भगवान के उस प्रसाद को ही वह पत्नी के साथ स्वयं पाता था । यही उसका नित्यका नियम था । भगवान् श्रीनिवास उसे प्रत्यक्ष दर्शन देते और उससे वार्तालाप करते थे । उसके और भगवानके बीचमें योगमायाका पर्दा नहीं रह गया था । उस पर्वतके एक भागमें सावाँका जंगल था । वसु उसकी सदा रखवाली किया करता था, इसलिये कि उसीका चावल उसके प्राणाधार प्रभुके भोगमें काम आता था । वसुकी पत्नीका नाम था चित्रवती । वह बड़ी पतिव्रता थी ।* *दोनों भगवानकी आराधना मे संलग्न रहकर उनके सान्निध्य का दिव्य सुख लूट रहे थे । कुछ कालके बाद चित्रवती के गर्भसे एक सुन्दर बालक उत्पन्न हुआ । वसु ने उसका नाम ‘वीर’ रखा। वीर यथानाम – तथागुणः था । उसके मनपर शैशवकाल से ही माता – पिता दोनों के भगवच्चिन्तन का गहरा प्रभाव पड़ने लगा । जब वह कुछ बड़ा हुआ, तब प्रत्येक कार्यमें पिताका हाथ बँटाने लगा । उसके अन्त: करण में भगवानके प्रति अनन्य भक्ति का भाव भी जग चुका था । भगवान् बड़े कौतुकी हैं । वे भक्तोंके साथ भाँति – भाँति के खेल खेलते और उनके प्रेम एवं निष्ठाकी परीक्षा भी लेते रहते हैं । एक दिन वसुको ज्ञात हुआ कि घरमें मधु नहीं हैं । भगवानके भोगके लिये भात बन चुका था ।* *वसुने सोचा की मधु के बिना मेरे प्रभु अच्छी तरह भोजन नही कर सकेंगे । अतः वह वीरको सावाँके जंगल और घरकी रखवालीका काम सौंपकर पत्नीके साथ मधुकी खोजमें चल दिया । बहुत विलम्ब के बाद दूरके जंगल में मधु का छत्ता दिखायी दिया । वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । उसने युक्ति से मधु निकाला और घरकी और प्रस्थान किया । इधर निषाद – कुमार वीरने यह सोचकर कि भगवान के भोग में विलम्ब हो रहा है ,तैयार किये हुए भातको एक पात्रमें निकाला । उसमें से कुछ अग्निमें डाल दिया और शेष सब भात वृक्षकी जड़ में स्थापित करके भगवानका आवाहन किया । भगवानने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उसका दिया हुआ भोग स्वीकार किया । तत्पश्चात् प्रभुका प्रसाद पाकर बालक वीर माता – पिताके आनेकी बाट देखने लगा । वसु अपनी पत्नीके साथ जब घर पहुँचा, तब देखता है, वीरने भातमेंसे कुछ अंश निकालकर खा लिया है । इससे उसे बड़ा दुःख हुआ ।* *प्रभु के लिये जो भोग तैयार किया गया था , उसे इस नादान बालक ने उच्छिष्ट कर दिया ! यह इसका अक्षभ्य अपराध है । यह सोचकर वसु कुपित हो उठा । उसने तलवार खींच ली और वीरका मस्तक काटनेके लिये हाथ ऊँचा किया । इतनेमें ही किसीने पीछेसे आकर वसु का हाथ पकड़ लिया । वसुने पीछे वृक्षकी ओर घूमकर देखा तो भक्तवत्सल भगवान् स्वयं उसका हाथ पकड़े खड़े हैं । उनका आधा अङ्ग वृक्षके सहारे टीका हुआ है । हाथोंमें शङ्ख, चक्र और गदा सुशोभित हैं । मस्तकपर किरीट, कानोंमें मकराकृति कुण्डल, अधरोंपर मन्द मन्द मुसकान और गलेमें कौस्तुभमणिकी छटा छा रही है । चारों ओर दिव्य प्रकाशका पारावार – सा उमड़ पड़ा है ।* *वसु तलवार फेंककर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और बोला – देवदेवेश्वर ! आप क्यों मुझे रोक रहे हैं ? वीर ने अक्षम्य अपराध किया है । भगवान् अपनी मधुर वाणी से कानों मे अमृत उड़ेलते हुए बोले – वसु ! तुम उतावली न करो ! तुम्हारा पुत्र मेरा अनन्य भक्त है । यह मुझे तुमसे भी अधिक प्रिय है । इसीलिये मैंने इसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया है । इसकी दृष्टि मे मैं सर्वत्र हूँ, किंतु तुम्हारी दृष्टि मे केवल स्वामि पुष्करणी के तटपर ही मेरा निवास हैं ।( संतो द्वारा सर्वत्र भगवत्दर्शन यही सबसे ऊँची अवस्था है । नामदेव जी को भी गुरु प्राप्ति के बाद ही सर्वत्र भगवान् के दर्शन होने लगे – प्रेतों में ,कुत्ते में । )भगवान का यह वचन सुनकर वसु बड़ा प्रसन्न हुआ । वीर और चित्रवती भी प्रभु के चरणो मे लोट गये । उनका दुर्लभ कृपा – प्रसाद पाकर यह निषाद – परिवार धन्य – धन्य हो गया !* *जय जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸

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Neha Sharma, Haryana Jan 23, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 103*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 05*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 04*🙏🌸 *इस अध्याय में ऋषभदेव जी का राज्यशासन..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! नाभिनन्दन के अंग जन्म से ही भगवान् विष्णु के वज्र-अंकुश आदि चिह्नों से युक्त थे; समता, शान्ति, वैराग्य और ऐश्वर्य आदि महाविभूतियों के कारण उनका प्रभाव दिनोंदिन बढ़ता जाता था। यह देखकर मन्त्री आदि प्रकृतिवर्ग, प्रजा, ब्राह्मण और देवताओं की यह उत्कट अभिलाषा होने लगी कि ये ही पृथ्वी का शासन करें। उनके सुन्दर और सुडौल शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणों के कारण महाराज नाभि ने उनका नाम ‘ऋषभ’ (श्रेष्ठ) रखा। *एक बार भगवान् इन्द्र ने ईर्ष्यावश उनके राज्य में वर्षा नहीं की। तब योगेश्वर भगवान् ऋषभ ने इन्द्र की मूर्खता पर हँसते हुए अपनी योगमाया के प्रभाव से अपने वर्ष अजनाभखण्ड में खूब जल बरसाया। *महाराज नाभि अपनी इच्छा के अनुसार श्रेष्ठ पुत्र पाकर अत्यन्त आनन्दमग्न हो गये और अपनी ही इच्छा से मनुष्य शरीर धारण करने वाले पुराणपुरुष श्रीहरि का सप्रेम लालन करते हुए, उन्हीं के लीला-विलास से मुग्ध होकर ‘वत्स! तात!’ ऐसा गद्गद-वाणी कहते हुए बड़ा सुख मानने लगे। जब उन्होंने देखा कि मन्त्रिमण्डल, नागरिक और राष्ट्र की जनता ऋषभदेव से बहुत प्रेम करती है, तो उन्होंने उन्हें धर्म मर्यादा की रक्षा के लिये राज्याभिषिक्त करके ब्राह्मणों की देख-रेख में छोड़ दिया। आप अपनी पत्नी मेरुदेवी के सहित बदरिकाश्रम को चले गये। वहाँ अहिंसावृत्ति से, जिससे किसी को उद्वेग न हो, ऐसी कौशलपूर्ण तपस्या और समाधियोग के द्वारा भगवान् वासुदेव के नर-नारायणरूप की आराधना करते हुए समय आने पर उन्हीं के स्वरूप में लीन हो गये। *पाण्डुनन्दन! राजा नाभि के विषय में यह लोकिक्ति प्रसिद्ध है- *राजर्षि नाभि के उदार कर्मों का आचरण दूसरा कौन पुरुष कर सकता है- जिनके शुद्ध कर्मों से सन्तुष्ट होकर साक्षात् श्रीहरि उनके पुत्र हो गये थे। महाराज नाभि के समान ब्राह्मण भक्त भी कौन हो सकता है-जिनकी दक्षिणादि से सन्तुष्ट हुए ब्राह्मणों ने अपने मन्त्रबल से उन्हें यज्ञशाला में साक्षात् श्रीविष्णु भगवान् के दर्शन करा दिये। *भगवान् ऋषभदेव ने अपने देश अजनाभखण्ड को कर्मभूमि मानकर लोक संग्रह के लिये कुछ काल गुरुकुल में वास किया। गुरुदेव को यथोचित दक्षिणा देकर गृहस्थ में प्रवेश करने के लिये उनकी आज्ञा ली। फिर लोगों को गृहस्थधर्म की शिक्षा देने के लिये देवराज इन्द्र की दी हुई उनकी कन्या जयन्ती से विवाह किया तथा श्रौत-स्मार्त्त दोनों प्रकार के शास्त्रोपदिष्ट कर्मों का आचरण करते हुए उसके गर्भ से अपने ही समान गुण वाले सौ पुत्र उत्पन्न किये। उनके महायोगी भरत जी सबसे बड़े और सबसे अधिक गुणवान् थे। उन्हीं के नाम से लोग इस अजनाभखण्ड को ‘भारतवर्ष’ कहने लगे। *उनसे छोटे कुशावर्त, इलावर्त, ब्रह्मावर्त्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इंद्रस्पृक, विदर्भ और कीकट -ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयों से बड़े एवं श्रेष्ठ थे। उनसे छोटे कवि, हरि, अंतरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रमिल, चमस और करभाजन -ये नौ राजकुमार भावगत धर्म का प्रचार करने वाले बड़े भगवद्भक्त थे। *भगवान् की महिमा से महिमान्वित और परमशान्ति से पूर्ण इनका पवित्र चरित हम नारद-वसुदेव संवाद के प्रसंग से आगे (एकादश स्कन्ध में) कहेंगे। इनसे छोटे जयन्ती के इक्यासी पुत्र पिता की आज्ञा का पालन करने वाले, अति विनीत, महान् वेदज्ञ और निरन्तर यज्ञ करने वाले थे। वे पुण्यकर्मों का अनुष्ठान करने से शुद्ध होकर ब्राह्मण हो गये थे। *भगवान् ऋषभदेव, यद्यपि परम स्वतन्त्र होने के कारण स्वयं सर्वदा ही सब प्रकार की अनर्थ परम्परा से रहित, केवल आनन्दानुभवस्वरूप और साक्षात् ईश्वर ही थे, तो भी अज्ञानियों के समान कर्म करते हुए उन्होंने काल के अनुसार प्राप्त धर्म का आचरण करके उसका तत्त्व न जानने वाले लोगों को उसकी शिक्षा दी। साथ ही सम, शान्त, सुहृद् और कारुणिक रहकर धर्म, अर्थ, यश, सन्तान, भोग-सुख और मोक्ष का संग्रह करते हुए गृहस्थाश्रम में लोगों को नियमित किया। महापुरुष जैसा-जैसा आचरण करते हैं, दूसरे लोग उसी का अनुकरण करने लगते हैं। यद्यपि वे सभी धर्मों के साररूप वेद के गूढ़ रहस्य को जानते थे, तो भी ब्राह्मणों की बतलायी हुई विधि से साम-दानादि नीति के अनुसार ही जनता का पालन करते थे। उन्होंने शास्त्र और ब्राह्मणों के उपदेशानुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के उद्देश्य से द्रव्य, देश, काल, आयु, श्रद्धा और ऋत्विज् आदि से सुसम्पन्न सभी प्रकार के सौ-सौ यज्ञ किये। भगवान् ऋषभदेव के शासनकाल में इस देश का कोई भी पुरुष अपने लिये किसी से भी अपने प्रभु के प्रति दिन-दिन बढ़ने वाले अनुराग के सिवा और किसी वस्तु की कभी इच्छा नहीं करता था। यही नहीं, आकाशकुसुमादि अविद्यमान वस्तु की भाँति कोई किसी की वस्तु की ओर दृष्टिपात भी नहीं करता था। *एक बार भगवान् ऋषभदेव घूमते-घूमते ब्रह्मावर्त देश में पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े ब्रह्मर्षियों की सभा में उन्होंने प्रजा के सामने ही अपने समाहितचित्त तथा विनय और प्रेम के भार से सुसंयत पुत्रों को शिक्षा देने के लिये इस प्रकार कहा। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 *************************************************

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