Hirdesh Sharma Mar 31, 2020

🔱🐚🔱🐚🔱🐚🔱🐚🔱 🚩🚩जय माता दी🚩🚩 🌼🍁🌼🍁🌼🍁🌼🍁🌼 🙏🙏शुभ प्रभात वंदन🙏🙏 📿🌷📿🌷📿🌷📿🌷📿 या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेना संस्थिता! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!! 🌻🌾🌻🌾🌻🌾🌻🌾🌻 दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, तेरी शक्ति है अपार कोई पाया नही पार मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵 शुम्भ निशुम्भ ने जब देवो को हराया उनका स्वर्ग लिया छीन देव हुए बलहीन, मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 सभी देव मिल आये माँ तेरी शरण में, तुम्ह्ने काली रूप धारा असुरो को ललकारा, मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 रूप था भयंकर तीनो लोक थराए, माँ की आँखों में थी ज्वाला गल में थी मुंड माला मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 असुरो के मुंड माल गले में सजाये कर में खडग खपर धारे रन में भर्ती हुंकारे मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 चंड मुंड तुमसे लड़ने रन में जब आये, शीश दोनों के उतारे , लाखो रक्त बीच मारे मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 शुंभ निशुंभ भारी सेना लेकर आये किया दोनों का संहार देवो ने की जय जय कार , मैया जगदम्बे मैया जगदम्बे दुर्गा भवानी तू ही काली कल्याणी, 🌴🌾🌴🌾🌴🌾🌴🌾🌴 🚩🚩जय माता दी🚩🚩 🌷🌸🌼🍁💮🌷🌸🌼🌳🍁💮🌷🌸🌼🍁💮🌷🌸🌼🍁💮🌷

+44 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 5 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 31, 2020

माँ कालरात्रि – नवदुर्गा की सातवीं शक्ति सप्तम देवी कालरात्रि की उत्पत्ति इस जगत में धर्म की रक्षा तथा दैत्यों के विनाश के लिए ऋषि-मुनियों ने जब-जब ईश्वर से प्रार्थना की तब-तब उस ईश्वर ने किसी शक्ति को धरा के कल्याण के लिए दैवीय शक्ति को उत्पन्न किया। ऐसे ही परम शक्ति माँ आदि शक्ति दुर्गा भवानी की उत्पत्ति ईश्वरीय इच्छा से हुई जिसमें अनेक देवी देवताओं की शक्ति समाहित है। माँ श्री दुर्गा की सांतवी मूर्ति देवी माँ कालरात्रि की उत्पत्ति नवरात्रि के सातवें दिन होती है। जो कि देवता सहित इस संसार के मानव का कल्याण करती है। क्योंकि पौराणिक कथानक इस बात का गवाह है कि इस धरा सहित देव समूह को जब आदि काल में वरदान पाकर महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ जैसे महाभयानक राक्षस तरह-तरह के अत्याचारों से पीड़ित करते है तो धर्म इस धरा से गायब होने लगा। धरती में रहने वाले मानव के आचार-विचार भ्रष्ट हो गए सर्वत्र राक्षसी प्रतृत्तियों का बोल बाला होने लगा। यज्ञ, दान, परोपकार, धर्म, दया, क्षमा जैसे यशस्वी गुणों का कहीं ठिकाना न रहा। देव पूजन, माता-पिता, गुरू, ब्राह्मणों को भी तिरष्कृत किया जाने लगा। ऐसे महाभयानक अंधकार मे सतत डूबता हुआ समाज तथा दैत्यों के अत्याचार से बचाने के लिए कालरात्रि की प्रतिमा संसार के सामने प्रकट होती है। जो सर्वविधि कल्याण करने वाली और दैत्य समूहों का संहार करके इस धरा के मानव की रक्षा करती हैं तथा देव समुदाय को अभय प्रदान करती हैं। काली माँ का नाम उनके शक्ति के कारण पड़ा है। जो सबको मारने वाले काल की भी रात्रि है अर्थात् काल को भी समाप्त कर देती है उनके सम्मुख वह भी नहीं ठहर सकता है। काल की विनाशिका होने से उनका काल रात्रि नाम पड़ा। काल का अर्थ समय से है और समय को भी काल के रूप में जाना जाता है। जिसका अर्थ मृत्यु से है। काल जो सभी को एक दिन मार देता है। उससे भी महाभयानक शक्ति का स्रोत माँ काली हैं। जिनके सम्मुख दैत्य क्या? साक्षात् काल! भी नहीं बच सकता है। वह माँ काली इस संसार की रक्षा करती है। और अपने श्रद्धालु भक्तों को भूत, प्रेत, राक्षस, बाधा, डर, दुःख, दरिद्रता, रोग, पीड़ाओं से बचाकर भक्त को अभय देने वाली हैं। जिससे भक्त को सुख समृद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा के इस सातवें रूप को कालरात्रि के नाम से जाना जाता है जो इस संसार में आदि काल से सुप्रसिद्ध है। इन माँ की मूर्ति यद्यपि बड़ी ही विकराल प्रतीत होती है, जो परम तेज से युक्त है जो भक्तों के हितार्थ अति भयानक कालिरात्रि के रूप मे प्रकट होती हैं। माँ की चार भुजाएं जिसमे दाहिने हाथ में ऊपर वाला हाथ वर मुद्रा धारण किए हुए जो संसार में भक्त लोगों को उनकी इच्छा के अनुसार वरदान देता है तथा नीचे वाला अभय मुद्रा धारण किए हुए लोगों को निर्भय बना रहा है। बांये हांथ में ऊपर वाले हाथ में कटार और नीचे वाले में लोहे का काटा नुमा अस्त्र धारण किए है। इनके बाल घने काले और बिखरे हुए रौद्र रूप में दिखाई देते हैं। और तीन आंखें हैं, जो अत्यंत भयंकर व अतिउग्र और ब्रह्माण्ड की तरह ही गोलाकार है जिसमें बादल की विजली की तरह ही चमक हैं, यह घने काले अंधकार की तरह प्रतिभासित हो रही है। इनकी नासिकाओं सांस से अग्नि की अति भयंकर ज्वालाएं निकल रही है। कालि रात्रि के गले में दिव्य तेज की माला शोभित हो रही है और यह गर्दभारूढ़ है। इनकी अर्चना से सभी प्रकार के कष्ट रोग दूर होते है जीवन में सुख शांति की लहर होती है। कालरात्रि की पूजा का विधान श्री माँ आदि शक्ति दुर्गा के इस सातवें विग्रह को कालरात्रि के नाम से संसार में ख्याति प्राप्त है। इनकी कालि रात्रि की पूजा अस्तुति नवरात्रि के सातवें दिन करने का विधान होता है। यह अपने भक्तों को संकट से बचाने तथा स्मरण मात्र से अनेक प्रकार के भय को दूर करने वाली प्रेतिक बाधा को हरने वाली है तथा हर प्रकार से भक्त जनों का कल्याण करती है। यद्यपि इनका रूप बड़ा ही भयानक दिखाई देता है। किन्तु यह परम कल्याण प्रद है। अतः किसी को डरने की जरूरत नहीं हैं। भक्त को माँ इच्छित फल देने वाली है। अर्थात् माँ की कृपा को प्राप्त करने हेतु श्रद्धालु भक्तों को पहले के दिनों की तरह नित्यादि शुचि कर्मों को करते हुए। पूजन की जरूरी समाग्री एकत्रित करके तथा सुवासित जल, तीर्थ जल गंगा जल आदि सहित पंचमेवा व पंचामृत, पुष्प, गंध, अक्षत आदि से विविध प्रकार से पूजन करने का विधान है। इनकी पूजा से व्यक्ति के जीवन से प्रेतिक भय, दुःख, रोग, शोक आदि दूर रहते हैं। इस संसार में उसे कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता है। प्रत्यक्ष व परोक्ष शत्रुओं का नाश होता है। इनकी पूजा में पवित्रता, शुद्धता, संयम, ब्रह्मचर्य का पालन तथा सत्य मार्ग का अनुसरण करने का विधान होता। पूजा में श्रद्धा, विश्वास, शुद्ध भावना होना चाहिए अहंकार, लोभ, झूठ, क्रोध, मोह का त्याग करने का विधान है। जो व्यक्ति अन्याय व गलत करता है, उसे माँ दण्ड भी देने से परहेज नहीं करती है। क्योंकि यह प्रत्यक्ष रूप में आज कलियुग में भी मुखर हैं। इनकी साधना यदि शास्त्रीय विधि से की जाए तो तत्काल फल प्राप्त होता है। इसमे तनिक भी संदेह नहीं हैं। काली कलकत्ते वाली का नाम कौन है जो नहीं जानता? माँ काली की पूजा व अर्चना यद्यपि सम्पूर्ण भारत व विश्व के अन्य देशों में होती है। किन्तु बंगाल व असम में उनकी पूजा बड़े ही धूम-धाम से होती है। माँ कालरात्रि की कथा माँ काल रात्रि प्रत्येक भक्त का कल्याण करने वाली है। माँ के विषय में पुराणों कई कथानक मिलते हैं। जिसमें सबसे प्रमाणिक दुर्गा सप्तशती है, जो दुर्गा के नवरूपों की उत्पत्ति के विषय को बड़े ही सार गर्भित रूप से जानकारी देती है। इसके अतिरिक्त देवी भागवत तथा अन्य पुराणों में भी माँ की कथा व महिमा के अंश प्राप्त होते है। काल रात्रि को काली का ही रूप माना जाता है। काली माँ इस कलियुग मे प्रत्यक्ष फल देने वाली है। क्योंकि काली, भैरव तथा हनुमान जी ही ऐसे देवता व देवी हैं, जो शीघ्र ही जागृत होकर भक्त को मनोवांछित फल देते हैं। काली के नाम व रूप अनेक हैं। किन्तु लोगों की सुविधा व जानकारी के लिए इन्हें भद्रकाली, दक्षिण काली, मातृ काली व महाकाली भी कहा जाता है। इनका यह प्रत्येक रूप नाम समान रूप से शुभ फल देने वाला है, जिससे इन्हें शुभंकारी भी कहते हैं। अर्थात् भक्तों का सदा शुभ करने वाली हैं। दुर्गा सप्तशती में महिषासुर के बध के समय माँ भद्रकाली की कथा वर्णन मिलता है। कि युद्ध के समय महाभयानक दैत्य समूह देवी को रण भूमि में आते देखकर उनके ऊपर ऐसे बाणों की वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरूगिरि के शिखर पर पानी की धार की बरसा रहा हो। तब देवी ने अपने बाणों से उस बाण समूह को अनायास ही काटकर उसके घोड़े और सारथियों को भी मार डाला। साथ ही उसके धनुष तथा अत्यंत ऊॅची ध्वजा को भी तत्काल काट गिराया। धनुष कट जाने पर उसके अंगों को अपने बाणों से बींध डाला। और भद्रकाली ने शूल का प्रहार किया। उससे राक्षस के शूल के सैकड़ों टुकड़े हो गये, वह महादैत्य प्राणों से हाथ धो बैठा। इसी प्रकार चण्ड और मुण्ड के वध के लिए माँ विकराल मुखी काली प्रकट हुई। जिसकी कथा के कुछ अंश इस प्रकार हैं ऋषि कहते हैं – तदन्तर शुम्भ की आज्ञा पाकर वे चण्ड -मुण्ड आदि दैत्य चतुरंगिणी सेना के साथ अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो चल दिये। फिर गिरिराज हिमालय के सुवर्णमय ऊॅचे शिखर पर पहॅंचकर उन्होंने सिंह पर बैठी देवी को देखा। उन्हें देखकर दैत्य लोग तत्परता से पकड़ने का उद्योग करने लगे। तब अम्बिका ने उन शत्रुओं के प्रति बड़ा क्रोध किया। उस समय क्रोध के कारण उनका मुख काला पड़ गया। ललाट में भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वहाँ से तुरंत विकराल मुखी काली प्रकट हुई, जो तलवार और पाश लिये हुए थी। वे विचित्र खट्वांग धारण किये और चीते के चर्म की साड़ी पहने नर-मुण्डों की माला से विभूषित थीं। उनके शरीर का मांस सूख गया था। केवल हड्यिों का ढ़ाचा था, जिससे वे अत्यंत भंयकर जान पड़ती थी। उनका मुख बहुत विशाल था, जीभ लपलपाने के कारण वै और भी डरावनी प्रतीत होती थीं। उनकी आंखें भीतर को धॅसी हुई और कुछ लाल थीं, वे अपनी भयंकर गर्जना से सम्पूर्ण दिशाओं को गुंजा रही थी। बड़े-बड़े दैत्यों का वध करती हुई वे कालिका देवी बड़े बेग से दैत्यों की उस सेना पर टूट पड़ीं और उन सबको भक्षण करने लगीं। आदि कथानक है। काल रात्रि के मंत्र माँ काल रात्रि माता के अनेकों उपयोगी मंत्र यथा स्थान संबंधित ग्रथों में उपलब्ध होते हैं। जिसमें प्रत्येक मंत्र का अपना महत्व है। जिसमें विभिन्न प्रकार के भय, शत्रु भय, जल भय, रोग भय आदि को दूर करने के मंत्र है। माँ अपने श्रद्धालु भक्तों को सभी वांछित वस्तुएं प्रदान करने वाली हैं। यहाँ काल रात्रि के आराधना के मंत्रों को दिया जा रहा है। दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे । चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ।। या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। काल रात्रि महात्म्य माता काल रात्रि के महात्म्य को दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया है। भक्तों को अभय देने व विभिन्न प्रकार के भयों से मुक्ति देने वाली कालिरात्रि का बड़ा ही महात्म्य है। अतः श्रद्धालुओं को वैदिक रीति द्वारा अनुष्ठान व व्रत का पालन करते हुए माँ कालरात्रि की पूजा बड़े ही निष्ठा से करना चाहिए।

+23 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 30, 2020

🐚🌴🐚🌴🐚🌴🐚🌴🐚 🔱🔱ॐनम:शिवाय🔱🔱 🌙🌿🌙🌿🌙🌿🌙🌿🌙 🙏🙏शुभ सोमवार🙏🙏 हे भोले भंडारी हमारी विनती है आपसे हम सबकी इस कोरोना महामारी से हमारी रक्षा करो 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 आपका दिन शुभमंगलमय व खुशियों भरा हो 💐🌺💐🌺💐🌺💐🌺💐 अरे भोले हम तो बैठे तेरी आस में, जाने तुझको, हायरे जाने तुझको खबर कब होगी, 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 अरे एक हांथ में डमरू बाजे, दूजा चिमटा साझे, एक हांथ में डमरू बाजे, दूजा चिमटा साझे, और माथे पर है चंदा चमके, माथे पर है चंदा चमके, बम बम भोला नाचे, बम बम भोले हम तो, 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 अरे बांझन आई निर्धन आई, कन्या आई द्वारे, बांझन आई निर्धन आई, कन्या आई द्वारे, और इनकी झोली खाली बाबा, इनकी झोली खाली बाबा, तुम हो भरने वाले , बम बम भोलेहम तो।। 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 अरे रामनाम को रटने वाले, ओ भोले भंडारी, अरे रामनाम को रटने वाले, ओ भोले भंडारी, और मैं भी शरण में आई तेरे, मैं भी शरण में आई तेरे, रक्षा करो हमारी, बम बम भोले हम तो 🌙🌿🌙🌿🌙🌿🌙🌿🌙 🔱हर हर महादेव जी🔱 🍀💐🍁🌳💮🍀💐🍁🌳💮🍀💐🍁🌳💮🍀💐🍁🌳💮🍀💐

+32 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 30, 2020

🚩🏵🚩🏵🚩🏵🚩🏵🚩 🌹🌹जय माता दी🌹🌹 📿🌻📿🌻📿🌻📿🌻📿 🙏🙏शुभ प्रभात वंदन🙏🙏 🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚 या देवी सर्वभूतेषु मां कात्यानी रूपेण संस्थिता! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!! 🌴🌾🌴🌾🌴🌾🌴🌾🌴 लाल चुनरियां लेके मैया सारी संगत आई है है दाती हमने तेरे , दर पे झोली फैलाई है तेरे द्वार सवाली आ गए …….. माँ खाली झोली भर दो , माँ इच्छा पूरी कर दो 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 दुनियां के सब छोड़ सहारे , तुझसे लगन लगाई माँ जग जननी शेरावाली , अब तेरी जोत जगाई माँ तेरा दर्शन दाती पा गए………. माँ खाली झोली भर दो , माँ इच्छा पूरी कर दो 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 है मन्दिरवाली जगदम्बे , अब नजर महर की कर दी ज्यो हम सारे तेरे बालक है , माँ हाथ शीश पे धर दीजे जो आये खाली ना गए ………. माँ खाली झोली भर दो , माँ इच्छा पूरी कर दो 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 तेरी महिमा बहुत सुनी हमने , दाती ना हमको ठुकराना है करुणा माई थोड़ी करुणा , हरीश पे माँ बरसाना भूलन भी शीश झुका गया …….. माँ खाली झोली भर दो , माँ इच्छा पूरी कर दो 🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵 माँ खाली झोली भर दो , माँ इच्छा पूरी कर दो 🌸🥀🌸🥀🌸🥀🌸🥀🌸 🌹🌹जय माता दी🌹🌹 🌳💮🍀💐🍁🌳💮🍀💐🍁🌳💮🍀💐🍁🌳💮🍀💐🍁🌳💮

+30 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 30, 2020

माँ कात्यायनी – नवदुर्गा की छठी शक्ति षष्ठ देवी कात्यायनी की उत्पत्ति जब-जब संसार में दैत्यों का अत्याचार बढ़ता है। धर्म व धरा तथा ऋषि समुदाय सहित देव गण भी उनके बढ़ते हुए दुराचारों से आक्रान्त होने लगते हैं। तब-तब किसी न किसी दैवीय शक्ति की उत्पत्ति असुरों के विनाश व जगत के कल्याण हेतु होती है। ऐसी ही माँ भगवती देवी कात्यानी की उत्पत्ति संसार के कल्याण हेतु होती है। जिन्होंने वरदान के मद में चूर महिषासुर जैसे महाभयानक दैत्यो को मारकर जगत का कल्याण किया है। माँ दुर्गा जगत जननी के इस विग्रह अर्थात् छठे रूप को कात्यानी के रूप में सुप्रसिद्धि प्राप्त है। अपने श्रद्धालु भक्तों को अभय देने वाली, रोग, पीड़ाओं, भय, ग्लानि को दूर करने वाली परम शक्ति का पावन स्मरण सभी के लिए कल्याणकारी है। माँ की उत्पत्ति के संदर्भ में दुर्गा सप्तशती में वर्णित है। कि देवताओं के कार्य सिद्ध करने के लिये देवी महर्षि कात्यायन के आश्रम पर प्रकट हुई और महर्षि ने उन्हें अपनी कन्या माना, इसलिए कात्यानी नाम से उनकी प्रसिद्ध सम्पूर्ण विश्व में हुई। यह महिषासुर का संहार करने वाली हैं, जो श्री हरि विष्णु, आदि देव महादेव तथा ब्रह्म जी के परम तेज से उत्पन्न हुई। माँ ईश्वरी की सर्व प्रथम आराधना व पूजा अर्चना ख्याति प्राप्ति जग जाहिर महर्षि कात्यायन ने की, और माँ कृपा करके उन्हीं के नाम को और प्रसिद्ध कर दिया। जिससे इन्हें दिव्य शक्ति माँ कात्यानी कहा जाने लगा। माँ की प्रतिमा चतुर्भुजी है जो विविध प्रकार के अस्त्रादि से युक्त है। जिनमें अभय मुद्रा, वरमुद्रा तथा तलवार व कमल प्रमुख हैं। माँ श्रद्धालु भक्तों को जीवन में सफलता दिलाने वाली तथा कुशाग्र बुद्धि का बनाती हैं और उन्हें इच्छित फल भी देती हैं। इनके भक्तों को वांछित कार्य करने में महारथ हासिल होती है। तथा संबंधित क्षेत्रों में माँ की कृपा से उन्हे उच्च शिखर प्राप्त होता है। कात्यायनी की पूजा का विधान श्री माँ दुर्गा के इस छठे विग्रह को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है। इनकी पूजा अर्चना नवरात्रि के छठे दिन करने का विधान होता है। यह अपने भक्तों को वांछित फल देने वाली है। अर्थात् माँ की कृपा को प्राप्त करने हेतु पूर्व के दिनों के तरह नित्यादि शुचि कर्मों को करते हुए। पूजन में विहित सम्पूर्ण वस्तुओं को पूर्व की तरफ संग्रहित करके तथा सुवासित जल, तीर्थ जल गंगा जल आदि सहित पंचमेवा व पंचामृत आदि से विविध प्रकार से पूजन करने का विधान है। इनकी पूजा से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। तथा शारीरिक बल और समृद्ध हुआ करता है। व्यक्ति जीवन पथ पर रोग, भय से मुक्त होता है। तथा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शत्रुओं से छुटकारा प्राप्त होता है। ऐसा भी कथानक प्राप्त होता है कि, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण को प्रीयतम के रूप में प्राप्त करने हेतु व्रज मंडल की गोपियों ने इनकी आराधना की थी। माता ने उन्हें वांछित वर प्रदान किया तथा ब्रज में आज भी दिव्य रूप में प्रतिष्ठत हैं। माँ कात्यायनी की कथा माँ कात्यायनी भक्त जनों के हितार्थ परम शक्ति के रूप मे उत्पन्न हुई और संसार में व्याप्त असुरों के भय को समाप्त किया है। माँ के नाम के संदर्भं में कथानक आता है, कि देवताओ के कल्याण हेतु यह महर्षि कात्यायन के यहाँ प्रकट हुई जिससे इनका नाम कात्यायनी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तथा महर्षि द्वारा इन्हें पुत्री के रूप में स्वीकार करते हुए पूजा अर्चना की गई। पूर्व काल में जब महिषासुर के अत्याचार से धरा में पाप बढ़ गए और देवताओ का यज्ञ भाग छीना जाने लगा। देव समुदाय मे यह चर्चा होने लगी कि धरती के पाप कैसे नष्ट होगे और देवताओं सहित पूरे विश्व का कल्याण कैसे होगा। इस संदर्भ में गहन चिंतन करने पर देवताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि ईश्वरी देवी को प्रकट किया जाए। क्योंकि वह किसी भी देवताओं से मर नहीं रहा था। अर्थात् महिषासुर को यह देवताओं से ही वरदान मिला था कि उसे कन्या अर्थात् स्त्री के सिवा और कोई न मार सके। इस वरदान के मद में चूर वह दानव राज कू्ररता पूर्वक अत्याचार को अंजाम देने लगा। जिससे देवताओं ने अपने शरीर के द्वारा परम तेजस्वनी कन्या को उत्पन्न किया। जिसका नाम कात्यायनी पड़ा। तथा देव कार्य को माता ने अपनी अद्वितीय शक्ति के द्वारा सिद्ध करते हुए उस महासुर का संहार दशमी के दिन कर दिया। दूसरा कथानक है कि कात्यायन गोत्रीय ऋषि ने तपस्या करके कन्या रत्न का वरदान माँगा जिससे उनके कुल मे माँ उत्पन्न हुई और महिषासुर जैसे दानव को मारकर संसार को अभय दिया । कात्यायनी के मंत्र माँ कात्यायनी माता के संदर्भं में संबंधित शास्त्रों में कई स्थानों में उनसे संबंधित मंत्रो का उल्लेख प्राप्त होता है। माँ की पूजा हेतु जरूरत के अनुसार मंत्रों का जाप व उच्चारण किया जाता है। माँ भक्त जनों को सुख शांति, ऐश्वर्य, सौभाग्य देने वाली हैं। यहाँ माँ कात्यायनी के आराधना के मंत्रों को दिया जा रहा है। शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।। कात्यायनी महात्म्य कात्यायनी माता के महात्म्य को दुर्गा सप्तशती में कई स्थानों पर वर्णित किया गया है। माँ अपने श्रद्धालु भक्त जनों को वांछित फल देने वाली हैं। तथा इनकी पूजा अर्चना से जीवन में सुख-शांति, सौभाग्य, आरोग्यता की प्राप्त होती है। यह माँ शारीरिक बल को बढ़ाने की अद्भूत शक्ति देती है। राक्षस समूहों का विनाश करने व शत्रुओं के दमन की इनमें अद्भुत शक्ति हैं। माँ वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने का परम आशीर्वाद अपने भक्तों को देती है। इनकी पूजा करने से व्यक्ति को सद्गृहस्थ में शामिल होने की क्षमता प्राप्त होती है। अर्थात् उसे स्त्री पुत्र, पौत्र की प्राप्ति तो होती ही है। साथ ही धन ऐश्वर्य भी मिलता है। माँ के भक्त स्त्री पुरूष कोई भी हों उन्हें अपार कृपा प्राप्त होती है। सौभाग्याकांक्षी कन्याओं हेतु माता की पूजा विशेष रूप से फल दायी होती है। अतः अनुकूल जीवन साथी की प्राप्ति हेतु माता की पूजा अर्चना का बड़ा ही महात्म्य है। अतः श्रद्धालुओं को वैदिक रीति द्वारा अनुष्ठान करते हुए माँ का पूजन करना चाहिए।

+28 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 28, 2020

पंचम रूप स्कंदमाता की पूजा व कथा मां दुर्गा का पंचम रूप स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कंद कुमार [कार्तिकेय] की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। भगवान स्कंद जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। ... मां दुर्गा का पंचम रूप स्कंदमाता के रूप में जाना जाता है। भगवान स्कंद कुमार [कार्तिकेय] की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है। भगवान स्कंद जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। स्कंद मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजाएं हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कंद को गोद में पकड़े हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। मां का वर्ण पूर्णत: शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है। स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी है। इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है। यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है। एकाग्रभाव से मन को पवित्र करके मां की स्तुति करने से दु:खों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। स्कंदमाता की पूजा विधि- कुण्डलिनी जागरण के उद्देश्य से जो साधक दुर्गा मां की उपासना कर रहे हैं उनके लिए दुर्गा पूजा का यह दिन विशुद्ध चक्र की साधना का होता है. इस चक्र का भेदन करने के लिए साधक को पहले मां की विधि सहित पूजा करनी चाहिए। पूजा के लिए कुश अथवा कंबल के पवित्र आसन पर बैठकर पूजा प्रक्रिया को उसी प्रकार से शुरू करना चाहिए जैसे आपने अब तक के चार दिनों में किया है फिर इस मंत्र से देवी की प्रार्थना करनी चाहिए सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।। अब पंचोपचार विधि से देवी स्कंदमाता की पूजा करें- नवरात्रि की पंचमी तिथि को कहीं कहीं भक्त जन उद्यंग ललिता का व्रत भी रखते हैं। इस व्रत को फलदायक कहा गया है। जो भक्त देवी स्कंद माता की भक्ति-भाव सहित पूजन करते हैं उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है। देवी की कृपा से भक्त की मुराद पूरी होती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं। स्कंदमाता का मंत्र- सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी ।। या देवी सर्वभूतेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। स्कंदमाता का ध्यान- वंदे वांछित कामार्थे चंद्रार्धकृतशेखराम्। सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कंदमाता यशस्वनीम्।। धवलवर्णा विशुद्ध चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्। अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥ पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥ प्रफु्रल्ल वंदना पल्लवांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्। कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥ स्कंदमाता का कवच- ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा। हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥ श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा। सर्वाग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥ वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता। उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠ तेअवतु॥ इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी। सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥ वात, पित्त, कफ जैसी बीमारियों से पीडि़त व्यक्ति को स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए और माता को अलसी चढ़ाकर प्रसाद में रूप में ग्रहण करना चाहिए। स्कंद माता कथा- दुर्गा पूजा के पांचवें दिन देवताओं के सेनापति कुमार कार्तिकेय की माता की पूजा होती है। कुमार कार्तिकेय को ग्रंथों में सनत-कुमार, स्कंद कुमार के नाम से पुकारा गया है। माता इस रूप में पूर्णत: ममता लुटाती हुई नजर आती हैं। माता का पांचवां रूप शुभ्र अर्थात श्वेत है। जब अत्याचारी दानवों का अत्याचार बढ़ता है तब माता संत जनों की रक्षा के लिए सिंह पर सवार होकर दुष्टों का अंत करती हैं। देवी स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, माता अपने दो हाथों में कमल का फूल धारण करती हैं और एक भुजा में भगवान स्कंद या कुमार कार्तिकेय को सहारा देकर अपनी गोद में लिए बैठी हैं। मां का चौथा हाथ भक्तो को आशीर्वाद देने की मुद्रा मे है। देवी स्कंद माता ही हिमालय की पुत्री पार्वती हैं इन्हें ही माहेश्वरी और गौरी के नाम से जाना जाता है। यह पर्वत राज की पुत्री होने से पार्वती कहलाती हैं, महादेव की वामिनी यानी पत्नी होने से माहेश्वरी कहलाती हैं और अपने गौर वर्ण के कारण देवी गौरी के नाम से पूजी जाती हैं। माता को अपने पुत्र से अधिक प्रेम है अत: मां को अपने पुत्र के नाम के साथ संबोधित किया जाना अच्छा लगता है। जो भक्त माता के इस स्वरूप की पूजा करते है मां उस पर अपने पुत्र के समान स्नेह लुटाती हैं। भोले शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने महान व्रत किया उस महादेव की पूजा भी आदर पूर्वक करें क्योंकि इनकी पूजा न होने से देवी की कृपा नहीं मिलती है। श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए। आरती के साथ पूजा का समापन करें।

+19 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 12 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 28, 2020

🔆🔱🔆🔱🔆🔱🔆🔱🔆 🚩🚩जय माता दी🚩🚩 🌸🏵🌸🏵🌸🏵🌸🏵🌸 🙏🙏शुभ प्रभात वंदन🙏🙏 🍁🌺🍁🌺🍁🌺🍁🌺🍁 या देवी सर्वभूतेषु स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता! नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!! 📿🌹📿🌹📿🌹📿🌹📿 निकल न जाए हाथ से तेरे मौका ये अनमोल, जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल, 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 आके देख ले सजा दरबार अम्बे रानी का, सुख वरदानी का जग कल्याणी का, देती छप्पर फाड़ के मैया झोली ले तू खोल. जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल, 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 कौन जाने कब नसीबा बदल जायेगा, जो नहीं था सोचा वो भी मिल जायेगा, करती चमत्कार मैया आँखे बंद खोल, जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल, 🌷🏵🌷🏵🌷🏵🌷🏵🌷 🚩🚩जय माता दी🚩🚩 💐🥀🍂🌻🍀💐🥀🍂🌻🍀💐🥀🍂🌻🍀💐🥀🍂🌻🍀💐🥀

+32 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 8 शेयर
Hirdesh Sharma Mar 27, 2020

नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा कैसे करें नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा-आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। देवी कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। कूष्मांडा का अर्थ है कुम्हड़े। मां को बलियों में कुम्हड़े की बलि सबसे ज्यादा प्रिय है। इसलिए इन्हें कूष्मांडा देवी कहा जाता है। ऐसा है मां का स्वरुप: कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है। ऐसे करें पूजा माता कूष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगाकर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए। इससे माता की कृपा स्वरूप उनके भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि और कौशल का विकास होता है। देवी को लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चूड़ी भी अर्पित करना चाहिए। मां कूष्मांडा पूजन विधि नवरात्र में इस दिन भी रोज की भांति सबसे पहले कलश की पूजा कर माता कूष्मांडा को नमन करें। इस दिन पूजा में बैठने के लिए हरे रंग के आसन का प्रयोग करना बेहतर होता है। मां कूष्मांडा को इस निवेदन के साथ जल पुष्प अर्पित करें कि, उनके आशीर्वाद से आपका और आपके स्वजनों का स्वास्थ्य अच्छा रहे। अगर आपके घर में कोई लंबे समय से बीमार है तो इस दिन मां से खास निवेदन कर उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करनी चाहिए। देवी को पूरे मन से फूल, धूप, गंध, भोग चढ़ाएं। मां कूष्मांडा को विविध प्रकार के फलों का भोग अपनी क्षमतानुसार लगाएं। पूजा के बाद अपने से बड़ों को प्रणाम कर प्रसाद वितरित करें। देवी योग-ध्यान की देवी भी हैं। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। उदराग्नि को शांत करती हैं। इसलिए, देवी का मानसिक जाप करें। देवी कवच को पांच बार पढ़ना चाहिए।

+28 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 10 शेयर