Gayatri Kulkarni Apr 13, 2021

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Gayatri Kulkarni Mar 16, 2021

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Gayatri Kulkarni Mar 4, 2021

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Gayatri Kulkarni Mar 4, 2021

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Gayatri Kulkarni Feb 8, 2021

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Gayatri Kulkarni Jan 21, 2021

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Gayatri Kulkarni Jan 5, 2021

देवी पार्वती के 108 नाम और इनका अर्थ 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ देवी पार्वती विभिन्न नामों से जानी जाता है और उनमें से हर एक नाम का एक निश्चित अर्थ और महत्व है। देवी पार्वती से 108 नाम जुड़े हुए है । भक्त बालिकाओं के नाम के लिए इस नाम का उपयोग करते है। 1 . आद्य - इस नाम का मतलब प्रारंभिक वास्तविकता है। 2 . आर्या - यह देवी का नाम है 3 . अभव्या - यह भय का प्रतीक है। 4 . अएंदरी - भगवान इंद्र की शक्ति। 5 . अग्निज्वाला - यह आग का प्रतीक है। 6 . अहंकारा - यह गौरव का प्रतिक है । 7 . अमेया - नाम उपाय से परे का प्रतीक है। 8 . अनंता - यह अनंत का एक प्रतीक है। 9 . अनंता - अनंत 10 अनेकशस्त्रहस्ता - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला । 11 . अनेकास्त्रधारिणी - इसका मतलब है कई हतियारो को रखने वाला । 12 . अनेकावारना - कई रंगों का व्यक्ति । 13 . अपर्णा – एक व्यक्ति जो उपवास के दौरान कुछ नहि कहता है यह उसका प्रतिक है । 14 . अप्रौधा – जो व्यक्ति उम्र नहि करता यह उसका प्रतिक है । 15 . बहुला - विभिन्न रूपों । 16 . बहुलप्रेमा - हर किसी से प्यार । 17 . बलप्रदा - यह ताकत का दाता का प्रतीक है । 18 . भाविनी - खूबसूरत औरत । 19 . भव्य – भविष्य । 20 . भद्राकाली - काली देवी के रूपों में से एक । 21 . भवानी - यह ब्रह्मांड की निवासी है । 22 . भवमोचनी - ब्रह्मांड की समीक्षक । 23 . भवप्रीता - ब्रह्मांड में हर किसी से प्यार पाने वाली । 24 . भव्य - यह भव्यता का प्रति है । 25 . ब्राह्मी - भगवान ब्रह्मा की शक्ति । 26 . ब्रह्मवादिनी – हर जगह उपस्तित । 27 . बुद्धि - ज्ञानी 28 . बुध्हिदा - ज्ञान की दातरि । 29 . चामुंडा - राक्षसों चंदा और मुंडा की हत्या करने वलि देवि । 30 . चंद्रघंटा - ताकतवर घंटी 31 . चंदामुन्दा विनाशिनी - देवी जिसने चंदा और मुंडा की हत्या की । 32 . चिन्ता - तनाव । 33 . चिता - मृत्यु - बिस्तर । 34 . चिति - सोच मन । 35 . चित्रा - सुरम्य । 36 . चित्तरूपा - सोच या विचारशील राज्य । 37 . दक्शाकन्या - यह दक्षा की बेटी का नाम है । 38 . दक्शायाज्नाविनाशिनी - दक्षा के बलिदान को टोकनेवाला । 39 . देवमाता - देवी माँ । 40 . दुर्गा - अपराजेय । 41 . एककन्या - बालिका । 42 . घोररूपा - भयंकर रूप । 43 . ज्ञाना - ज्ञान । 44 . जलोदरी - ब्रह्मांड मेइन वास करने वाली । 45 . जया - विजयी 46 कालरात्रि - देवी जो कालि है और रात के समान है । 47 . किशोरी - किशोर 48 . कलामंजिराराजिनी - संगीत पायल । 49 . कराली - हिंसक 50 . कात्यायनी - बाबा कत्यानन इस नाम को पूजते है । 51 . कौमारी - किशोर । 52 . कोमारी - सुंदर किशोर । 53 . क्रिया - लड़ाई । 54 . क्र्रूना - क्रूर । 55 . लक्ष्मी - धन की देवी । 56 . महेश्वारी - भगवान शिव की शक्ति । 57 . मातंगी - मतंगा की देवी । 58 . मधुकैताभाहंत्री - देवी जिसने राक्षसों मधु और कैताभा को आर दिया । 59 . महाबला - शक्ति । 60 . महातपा - तपस्या । 61 . महोदरी - एक विशाल पेट में ब्रह्मांड में रखते हुए । 62 . मनः - मन । 63 . मतंगामुनिपुजिता - बाबा मतंगा द्वारा पूजी जाती है । 64 . मुक्ताकेशा - खुले बाल । 65 . नारायणी - भगवान नारायण विनाशकारी विशेषताएँ । 66 . निशुम्भाशुम्भाहनानी - देवी जिसने भाइयो शुम्भा निशुम्भा को मारा । 67 . महिषासुर मर्दिनी - महिषासुर राक्षस को मार डाला जो देवी ने । 68 नित्या - अनन्त । 69 . पाताला - रंग लाल । 70 . पातालावती - लाल और सफ़द पहेने वाली । 71 . परमेश्वरी - अंतिम देवी । 72 . पत्ताम्बरापरिधान्ना - चमड़े से बना हुआ कपडा । 73 . पिनाकधारिणी - शिव का त्रिशूल । 74 . प्रत्यक्ष – असली । 75 . प्रौढ़ा - पुराना । 76 . पुरुषाकृति - आदमी का रूप लेने वाला । 77 . रत्नप्रिया - सजी 78 . रौद्रमुखी - विनाशक रुद्र की तरह भयंकर चेहरा । 79 . साध्वी - आशावादी । 80 . सदगति - मोक्ष कन्यादान । 81 . सर्वास्त्रधारिणी - मिसाइल हथियारों के स्वामी । 82 . सर्वदाना वाघातिनी - सभी राक्षसों को मारने के लिए योग्यता है जिसमें । 83 . सर्वमंत्रमयी - सोच के उपकरण । 84 . सर्वशास्त्रमयी - चतुर सभी सिद्धांतों में । 85 . सर्ववाहना - सभी वाहनों की सवारी । 86 . सर्वविद्या - जानकार । 87 . सती - जो महिला जिसने अपने पति के अपमान पर अपने आप को जला दिया । 89 . सत्ता - सब से ऊपर । 90 . सत्य - सत्य । 91 . सत्यानादास वरुपिनी - शाश्वत आनंद । 92 . सावित्री - सूर्य भगवान सवित्र की बेटी । 93 . शाम्भवी - शंभू की पत्नी । 94 . शिवदूती - भगवान शिव के राजदूत । 95 . शूलधारिणी – व्यक्ति जो त्र्सिहुल धारण करता है । 96 . सुंदरी - भव्य । 97 . सुरसुन्दरी - बहुत सुंदर । 98 . तपस्विनी - तपस्या में लगी हुई । 99 . त्रिनेत्र - तीन आँखों का व्यक्ति । 100 . वाराही – जो व्यक्ति वाराह पर सवारी करता हियो । 101 . वैष्णवी - अपराजेय । 102 . वनदुर्गा - जंगलों की देवी । 103 . विक्रम - हिंसक । 104 . विमलौत्त्त्कार्शिनी - प्रदान करना खुशी । 105 . विष्णुमाया - भगवान विष्णु का मंत्र । 106 . वृधामत्ता - पुराना है , जो माँ । 107 . यति - दुनिया त्याग जो व्यक्ति एक । 108 . युवती - औरत । देवी पार्वती यह सभी नाम पूजा करने के लिए और उनके आशीर्वाद पाने के लिए , लिए जाते है। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Gayatri Kulkarni Dec 30, 2020

॥श्रीमहालक्ष्मीस्तोत्रम् विष्णुपुराणान्तर्गतम्॥ श्रीगणेशाय नमः। श्रीपराशर उवाच सिंहासनगतः शक्रस्सम्प्राप्य त्रिदिवं पुनः। देवराज्ये स्थितो देवीं तुष्टावाब्जकरां ततः॥ १॥ इन्द्र उवाच नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्जसम्भवाम्। श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम्॥ २॥ पद्मालयां पद्मकरां पद्मपत्रनिभेक्षणाम् वन्दे पद्ममुखीं देवीं पद्मनाभप्रियाम्यहम्॥ ३॥ त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनी। सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती॥ ४॥ यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने। आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी॥ ५॥ आन्वीक्षिकी त्रयीवार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च। सौम्यासौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद्देवि पूरितम्॥ ६॥ का त्वन्या त्वमृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः। अध्यास्ते देवदेवस्य योगचिन्त्यं गदाभृतः॥ ७॥ त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम्। विनष्टप्रायमभवत्त्वयेदानीं समेधितम्॥ ८॥ दाराः पुत्रास्तथाऽऽगारं सुहृद्धान्यधनादिकम्। भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम्॥ ९॥ शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम्। देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम्॥ १०॥ त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता। त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम्॥ ११॥ मनःकोशस्तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम्। मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथाः सर्वपावनि॥ १२॥ मा पुत्रान्मा सुहृद्वर्गान्मा पशून्मा विभूषणम्। त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलाश्रये॥ १३॥ सत्त्वेन सत्यशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैः। त्यज्यन्ते ते नराः सद्यः सन्त्यक्ता ये त्वयाऽमले॥ १४॥ त्वयाऽवलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैः। कुलैश्वर्यैश्च पूज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि॥ १५॥ सश्लाघ्यः सगुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान्। स शूरः सचविक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः॥ १६॥ सद्योवैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः। पराङ्गमुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे॥ १७॥ न ते वर्णयितुं शक्तागुणाञ्जिह्वाऽपि वेधसः। प्रसीद देवि पद्माक्षि माऽस्मांस्त्याक्षीः कदाचन॥ १८॥ श्रीपराशर उवाच एवं श्रीः संस्तुता सम्यक् प्राह हृष्टा शतक्रतुम्। शृण्वतां सर्वदेवानां सर्वभूतस्थिता द्विज॥ १९॥ श्रीरुवाच परितुष्टास्मि देवेश स्तोत्रेणानेन ते हरेः। वरं वृणीष्व यस्त्विष्टो वरदाऽहं तवागता॥ २०॥ इन्द्र उवाच वरदा यदिमेदेवि वरार्हो यदिवाऽप्यहम्। त्रैलोक्यं न त्वया त्याज्यमेष मेऽस्तु वरः परः॥ २१॥ स्तोत्रेण यस्तवैतेन त्वां स्तोष्यत्यब्धिसम्भवे। स त्वया न परित्याज्यो द्वितीयोऽस्तुवरो मम॥ २२॥ श्रीरुवाच त्रैलोक्यं त्रिदशश्रेष्ठ न सन्त्यक्ष्यामि वासव। दत्तो वरो मयाऽयं ते स्तोत्राराधनतुष्ट्या॥ २३॥ यश्च सायं तथा प्रातः स्तोत्रेणानेन मानवः। स्तोष्यते चेन्न तस्याहं भविष्यामि पराङ्गमुखी॥ २४॥ श्रीपाराशर उवाच एवं वरं ददौ देवी देवराजाय वै पुरा। मैत्रेय श्रीर्महाभागा स्तोत्राराधनतोषिता॥ २५॥ भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना श्रीः पूर्वमुदधेः पुनः। देवदानवयत्नेन प्रसूताऽमृतमन्थने॥ २६॥ एवं यदा जगत्स्वामी देवराजो जनार्दनः। अवतारः करोत्येषा तदा श्रीस्तत्सहायिनी॥ २७॥ पुनश्चपद्मा सम्भूता यदाऽदित्योऽभवद्धरिः। यदा च भार्गवो रामस्तदाभूद्धरणीत्वियम्॥ २८॥ राघवत्वेऽभवत्सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनि। अन्येषु चावतारेषु विष्णोरेखाऽनपायिनी॥ २९॥ देवत्वे देवदेहेयं मानुषत्वे च मानुषी। विष्णोर्देहानुरुपां वै करोत्येषाऽऽत्मनस्तनुम्॥ ३०॥ यश्चैतशृणुयाज्जन्म लक्ष्म्या यश्च पठेन्नरः। श्रियो न विच्युतिस्तस्य गृहे यावत्कुलत्रयम्॥ ३१॥ पठ्यते येषु चैवर्षे गृहेषु श्रीस्तवं मुने। अलक्ष्मीः कलहाधारा न तेष्वास्ते कदाचन॥ ३२॥ एतत्ते कथितं ब्रह्मन्यन्मां त्वं परिपृच्छसि। क्षीराब्धौ श्रीर्यथा जाता पूर्वं भृगुसुता सती॥ ३३॥ इति सकलविभूत्यवाप्तिहेतुः स्तुतिरियमिन्द्रमुखोद्गता हि लक्ष्म्याः। अनुदिनमिह पठ्यते नृभिर्यैर्वसति न तेषु कदाचिदप्यलक्ष्मीः॥ ३४॥ ॥ इति श्रीविष्णुपुराणे महालक्ष्मी स्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

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