🌹वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ, 🌹 🥀निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा। 🥀 🚩🐚🛕 ॐ वक्रतुंडाय नमः 🛕🐚🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🎎🥗🌺शुभ देवउठनी एकादशी 🌺🥗🎎 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🚩🌿🌹शुभ तुलसी विवाह🌹🌿🚩 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 🌺🍀🐚 शुभ बुधवार 🐚🍀🌺 🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎🍎 🥀🥗🦞शुभरात्रि🦞🥗🥀 🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞🦞 🙏आप और आपके पूरे परिवार को देवउठनी एकादशी व्रत, तुलसी विवाह और शुभ बुधवार की हार्दिक शुभकामनाएं एवं ढेर सारी बधाई 🙏 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 👏आप और आपके पूरे परिवार पर श्री हरि विष्णु जी मां लक्ष्मी जी और सिद्धि विनायक दुखहर्ता गणेशजी की आशिर्वाद हमेशा बनी रहे और सभी मनोकमनाएं पूर्ण हो🌸 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 🎭आपका बुधवार की रात्रि शुभ अतिसुन्दर💐 🌹 शांतिमय और मंगलमय व्यतीत हो🐚 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🎎🐚🌹श्री गणेश 🌹🐚🎎 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯

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🌹श्रीराम के जीवन से हम क्या सीख सकते हैं🌹 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🚩🌿🌹जय श्री राम 🌹🌿🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🚩💐🛕जय श्री हनुमान🛕💐🚩 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕 🌺🍀⚛️ शुभ मंगलवार ⚛️🍀🌺 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ 🌈🌲🌻सुप्रभात 🌻🌲🌈 🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈 🎎जिनके सीने में श्री राम है, 🙏जिनके चरणों में धाम है, 🌹जिनके लिए सब कुछ दान है, 🎎अंजनी पुत्र वो हनुमान है। 💐*कभी हँसते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी* 🌀*कभी रोते हुए छोड़ देती है ये जिंदगी।* 🚩*न पूर्ण विराम सुख में,* 🌲*न पूर्ण विराम दुःख में,* 🌻*बस जहाँ देखो वहाँ अल्पविराम , 👩‍🎨*छोड़ देती है ये जिंदगी।* 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 🌹श्रीराम केजीवन से हम क्या सीख सकते हैं 🌹 🌿What can we learn from Shriram's life🌿 ******************************************* 1. अपने आँसू खुद पोंछो, दूसरे पोछेंगे तो सौदा करेंगे। जैसे सुग्रीव ने पहले अपना खोया हुआ राज्य और पत्नी को प्राप्त किया, उसके पश्चात श्रीराम की सहायता की। उसी प्रकार विभीषण सम्मानित जीवन और राज्य का प्रलोभन पाने के बाद श्रीराम की सहायता हेतु तत्पर हुआ। 1. Wipe your tears yourself, if others wipe your tears, you have to go through negotiations. As Sugriva first regained his lost kingdom and wife, thereafter assisted Shri Ram. In the same way, Vibhishan, was ready to help Shri Ram only after getting the honor of life and the temptation of the state. 🌹 2. अपनी मुश्किलों का सामना करने की क्षमता स्वयं में पैदा करो। परिवार और रिश्तेदार की सहायता मत लो नहीं तो ये लोग पूरा जीवन उपहास करेंगें। जैसे राम ने अयोध्या और जनक से अपनी मुश्किल दूर करने के लिए कोई सहायता नही ली। 2. Cultivate your ability to face your difficulties. Do not take help of family and relatives, otherwise these people will ridicule you their whole life. As Shri Ram did not seek any help from Ayodhya and Janak to overcome his difficulties. 🌺 3. अधर्म और अनीति की बुनियाद पर साम्राज्य स्थापित मत क़रो क्योंकि इनकी दीवारें कमजोर होती है। इसलिए सत्य तथा धर्म के मार्ग पर चलकर शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से सामर्थ्यवान बनो, क्योंकि शक्तिशाली व्यक्ति से ही लोग प्रेम करते हैं। 3. Do not put the empire on the foundation of unrighteousness and evil because their walls are weak. Therefore, walk on the path of truth and Dharma, become physically, mentally, economically, socially and spiritually empowered, because people love a powerful person. 🎎 4. आदर्श प्रस्थापित करने के लिए सर्वस्व त्याग के लिए तत्पर रहो और समाज में प्रत्येक वर्ग तथा व्यक्ति की अहमियत को समझो, किसी की उपेक्षा मत करो, अपितु उनका उपयोग करो। जैसे श्री राम ने सभी वर्गों से सहयोग प्राप्त किया। 4. To establish the ideal, be ready to sacrifice everything and understand the importance of every class and person in the society, do not ignore anyone, but use them effectively. Like Shri Ram got support from all classes. 👩‍🎨 5. राष्ट्र प्रेम, पिता- पुत्र का आदर्श, भाई- भाई के प्रति समर्पण का भाव, पति -पत्नी का प्रेम और शासक तथा प्रजा का धर्म, सत्य और निष्ठा के साथ बलिदान के लिए तत्पर रहना इत्यादि आदर्शों को अपने जीवन में धारण करना ही श्रीराम की अनुपम भक्ति है। 5. Love for the nation, father-son ideal, devotion among brothers, husband-wife love, ruler-ruled equation and ready to sacrifice with truth and loyalty etc. are the ideals to imbibe as a true devotion to Shri Ram. 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🙏 आप और आपके पूरे परिवार पर शिव के रुद्रावतार श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा सदा बनी रहेऔर सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🏵️ 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 🎭आपका मंगलवार का दिन शुभ अतिसुन्दर💐 🌹शांतिमयऔर मंगल ही मंगलमय व्यतीत हो🌹 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕 🚩🌿🌹जय श्री राम 🌹🌿🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕

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🚩🌿🌹जय श्री राम 🌹🌿🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 💐🏵️🚩 जय श्री हनुमान 🚩🏵️💐 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕 💐🍀⚛️ शुभ मंगलवार ⚛️🍀💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🎆🌲🎳शुभरात्रि 🎳🌲🎆 🎳🎳🎳🎳🎳🎳🎳🎳🎳 👏आप सभी को नवम्बर माह के पहले मंगलवार की हार्दिक शुभकामनाएं🙏 🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗 🌹बजरंगी तेरी पूजा से हर काम होता हैं,🌹 🥀दर पर तेरे आते ही दूर अज्ञान होता हैं,🥀 🛕राम जी के चरणों में ध्यान होता हैं, 🛕 🎎इनके दर्शन से बिगड़ा हर काम होता हैं।🎎 🙏🌹जय श्री राम 🌹🙏 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🙏 आप और आपके पूरे परिवार पर शिव के रुद्रावतार श्री राम भक्त हनुमान जी की कृपा सदा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🍑 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 🎭आपका मंगलवार का रात्रि शुभ शांतिमय और मंगल ही मंगलमय व्यतीत हो🌹 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕 🚩🌿🌹जय श्री राम 🌹🌿🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕🛕

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🚩🔱 🛕ॐ नमः शिवाय🛕🔱🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🌺🍀⚛️ शुभ सोमवार ⚛️🍀🌺 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🌈🌲🌻सुप्रभात 🌻🌲🌈 🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈🌈 🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾 🌹शिव की भक्ति , 🙏शिव की अपार शक्ति मिले, 🏵️ज़िंदगी भर खुशी की बहार , 🌀आपके पूरे परिवार को मिले 💐महादेव की कृपा आपकी , 🌿ज़िंदगी मे हमेशा बनी रहे, 🔱आपको ज़िंदगी के हर , 🌹प्रयास मे सफलता मिले। 🔱जय-जय भोलेनाथ!🔱 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 🙏आपको सपरिवार दिसम्बर माह के मंगलमय शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🙏 आप और आपके पूरे परिवार पर बाबा भोलेनाथ की आशिर्वाद सदा बनी रहे और सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो🍑 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 🎭आपका सोमवार का दिन शुभ अतिसुन्दर💐 🌹 शिवमय और मंगलमय व्यतीत हो 🍑 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 🚩🔱 हर हर महादेव 🔱🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🚩🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🚩

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🎎महाभागवत–देवी पुराण🎎 ✍️ अध्याय :- चौदहवां ✍️ 🚩🌺🦁जय माता दी 🦁🌺🚩 *सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके* *शरण्ये त्रयम्बके देवी नारायणी नमोस्तुते* ✍️इस अध्याय में ब्रह्माजी का गंगा जी को कमण्डलु में लेकर स्वर्ग में आना है, माता से मिले बिना गंगा के स्वर्गलोक चले जाने पर क्रुद्ध मेना द्वारा उन्हें जलरूप होकर पुन: पृथ्वीलोक आने का शाप देना है, स्वर्गलोक में देवी गंगा से भगवान शंकर का विवाह होना आदि बातें हैं. 🔱श्रीमहादेवजी बोले – महामुने ! तब ब्रह्माजी गिरिराज की अनुमति से गंगाजी को अपने कमण्डलु में लेकर शीघ्र ही स्वर्गलोक आ गये।।1।। इधर मेना जब गिरिराज के पास आयीं, तब बेटी को वहाँ न देखकर गिरिश्रेष्ठ हिमालय से कहने लगीं।।2।। 👩‍🎨मेनका बोलीं – राजन् ! प्रभो ! मेरी प्राणप्यारी पुत्री गंगा कहाँ गयी? वह तो आपकी गोद में बैठी थीं, उसे कौन ले गया? प्रभो ! मुझे बताइये।।3।। 🔱 श्रीमहादेवजी बोले – तब गिरिराज हिमालय ने आँसू भरी आँखों से मेना को देखकर ब्रह्माजी की याचना तथा गंगा के स्वर्ग जाने की बात बता दी।।4।। 🌹मुनिश्रेष्ठ ! ऎसा सुनकर गंगा के विरह से दु:खी गिरिराज पत्नी मेना अनेक प्रकार से रुदन करने लगीँ. ज्ञानियों में श्रेष्ठ गिरिराज ने मेना को सान्त्वना दी और उन्हें वह सारी बात भी बतायी, जो गंगा ने स्वयं उनसे कही थी।।5-6।। 👩‍🎨अपनी माँ से बिना कोई बात किये ही स्वर्ग चले जाने के कारण गिरिराज पत्नी मेना ने अपनी प्राणप्रिया पुत्री गंगा को कुपित होकर (इस प्रकार का) शाप दे दिया।।7।। “मुझ माता से बिना बात किये तुम स्वर्ग चली गई, इसीलिए तुम्हें जलरूप में पुन: पृथ्वीलोक में आना होगा”।।8।। नारद ! इस प्रकार हिमवान की पत्नी मेना शाप देकर भवन में चली गयीं और गिरिराज हिमवान भी उनके साथ चले गये।।9।। 🔯महामते ! इधर स्वर्गलोक में गंगा को लाकर देवगण अत्यंत उल्लासपूर्वक उनकी विवाह संबंधी मांगलिक क्रियाएँ करने लगे।।10।। तदनन्तर प्रसन्न मन ब्रह्माजी ने शिवजी को आदरपूर्वक बुलाने हेतु नारदजी को कामरूप महापीठ भेजा।।11।। नारदजी ने कामरूप में जाकर भगवान शिव को योगाभ्यास में संलग्न एवं ध्यानमग्न देखा।।12।। इन्द्रियों की वृत्तियों को समेटकर योग की गहन साधना में लीन, मध्यान्हकाल के सहस्त्रों सूर्यों के समान तेजस्वी और चन्द्रमा के समान प्रकाशित नेत्रवाले भगवान शिव को देखकर नारदजी वहीं खड़े रहे और सदाशिव के ध्यान को भंग करने के भय से विचार करने लगे कि यदि देवी सती के हिमालय के घर में जन्म की बात इनसे कहूँ तो इनका ध्यान भंग हो जाएगा।।13-15।। यदि कुछ ना कहूँ तो मुझे प्रतिज्ञाभंग का पाप लगेगा.यह भी तो हो सकता है कि देवी सती के पुनर्जन्म की बात सुनकर भगवान शिव परम सन्तुष्ट होकर मुझ पर प्रसन्न हो जाएँ. यह सब सोचकर धीरे-धीरे नारदजी भगवान शंकर के समीप पहुँचे और योग में लीन सदाशिव से बोले – ।।16-17½।। 🎎नारदजी बोले – जगद्गुरु महादेव ! आपको नमस्कार करता हूँ. आप मुझ पर प्रसन्न हों. मैं आपके पास से आपके लिए सती को लाने हेतु गया था. प्रभो ! आपकी प्रिया सती पुन: आपको पतिरुप में पाने की इच्छा से जन्म ले चुकी हैं. उन्हें प्राप्त करने हेतु मेरे साथ चलिए. अब योगचिन्तन छोड़िए।।18-19½।। 🔱श्रीमहादेवजी बोले – नारदजी की बातें सुनकर भगवान शंकर उसी समय ध्यान छोड़कर “वह मेरी सती कहाँ है” ऎसा कहते हुए स्थित हो गये. तब नारदजी ने उन्हें बताया – प्रभो ! भगवती सती अपने अंशरूप से हिमालय की सुन्दर नेत्रों वाली बेटी के रूप में गंगा के नाम से जन्मी हैं. उन्हें सभी देवताओं के साथ ब्रह्माजी स्वर्ग ले आये हैं और आपको प्रदान करना चाहते हैं. इसी निमित्त मुझे भेजा गया है. अत: आप मेरे साथ चलें और अपनी रमणीया पत्नी को प्राप्त करें. तब तक ब्रह्माजी अपने कमण्डलु में स्थित परा प्रकृति के अंश से उत्पन्न, तीनों लोकों को पवित्र करने वाली, सुन्दर रूपवाली उन शिवप्रिया की देखभाल करते रहे. महामते ! तब शिवजी उन्हें लेकर प्रसन्नचित्त से अपने प्रमथगणों के साथ कैलासपर्वत पर चले गये।।20-24½।। जो जगदम्बा ब्रह्मा के कमण्डलु में रही थीं, वे ही भगवान शिव को प्राप्त करने के बाद जलरूप में अवतीर्ण होकर पृथ्वीलोक में मायापुर आयीं. 🎎नारद ! स्वर्ग से ब्रह्मनदी ने पृथ्वीलोक में आकर सगरपुत्रों का उद्धार किया और जलनिधि सागर में मिलकर वे पाताललोक तक प्राणियों का कल्याण करती रहती हैं।।25-27।। मुने ! इस प्रकार सती ने अंशरूप से हिमालय की पुत्री होकर भगवान शंकर को पतिरुप में पुन: प्राप्त किया. मुनिवर ! भगवती सती ने ही अपने दूसरे रूप पूर्णावतार में पार्वतीरूप से जन्म लेकर भगवान शंकर को पतिरूप से प्राप्त किया।।28-29।। ।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “गंगाविवाहवर्णन” नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।। 🚩🌺🦁जय माता दी 🦁🌺🚩

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🎎महाभागवत–देवीपुराण🎎 ✍️ अध्याय :- तेरहवां ✍️ 🚩🦁🌺जय माता दी 🌺🦁🚩 ✍️इस अध्याय में मेनका के गर्भ के अर्धांश से गंगा के प्राकट्य का आख्यान, देवर्षि नारद द्वारा हिमालय को गंगा का माहात्म्य सुनाना, ब्रह्मादि देवताओं द्वारा हिमालय से भगवती गंगा को ब्रह्मलोक ले जाने की याचना करना आदि है.🌺 🔱 श्रीमहादेवजी बोले – वत्स ! मैं वह कथा सुना रहा हूँ, जिस प्रकार सती ने दो रूप धारण कर मेनका के गर्भ से हिमवान के घर पुत्री रूप में जन्म लिया।।1।। मुने ! पहले वे अपने अंश से धवल कान्तियुक्त गंगा के रूप में प्रकट हुईं. भगवान शंकर के सिर पर स्थान पाने के लिये उन्होंने जलरूप धारण किया. उसके बाद गौरी के रूप में वे शंकरप्रिया पूर्णावतार धारण कर अतिशय प्रेम के कारण शिव के शरीरार्ध में स्थित होकर उनकी अर्धांगिनी बनी।।2-3।। 💐महामते ! वे गंगा रूप में कैसे प्रकट हुईं, उस प्रकरण को सुनो, जिसका श्रवण करने से ब्रह्म-हत्या के पाप से लिप्त मनुष्य भी तत्क्षण मुक्त हो जाता है।।4।। सुमेरु की पुत्री मेना गिरिराज हिमवान की पत्नी थीं. जगदम्बा ने अपने अंशरूप से उनके यहाँ पुत्रीरूप में जन्म लिया।।5।। सती गंगा रूप से मेना के गर्भ में आयीं और गिरिश्रेष्ठ हिमवान की पत्नी ने एक सुमुखी सर्वांगसुन्दरी कन्या को जन्म दिया।।6।। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षयतृतीया) के दिन मध्यान्ह में गौरवर्णा सुन्दर मुख कमल वाली गंगा प्रकट हुईं।।7।। वे कृष्णकटाक्षयुक्त, तीन नेत्रों और चार भुजाओं से सुशोभित थीं. कन्या जन्म की बात सुनकर पर्वतराज बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर उन्हें प्रचुर दान-दक्षिणा दी. शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला तथा वर्षाकाल में नदी के जल के समान वह कन्या पिता के घर में बड़ी होने लगी।।8-9½।। एक दिन पर्वतराज हिमालय जब उस कन्या को गोद में लेकर अन्त:पुर में बैठे थे, उसी समय साक्षात् भगवती के अंश से गंगा को उत्पन्न हुआ जानकर ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारद उनके दर्शनहेतु वहाँ पधारे, जिन परा प्रकृति की आराधना करके भगवान शंकर कामरूप क्षेत्र में स्थित रहते हैं।।10-11½।। 👩‍🎨नारदजी बोले – प्रभो ! ब्रह्मन् ! सुनिए, मैं वह उपाय बताता हूँ, जिससे भगवान शिव का रोष हम लोगों के प्रति प्रसन्नता में बदल जाएगा. ऎश्वर्याशाली गिरिराज हिमालय धर्मज्ञ हैं और उदार भी हैं. इन्द्रादि देवताओं को साथ लेकर आप उनके पास जाकर गंगा को माँग लें. आपके अनुरोध से वे अवश्य भगवती गंगा को आपको प्रदान कर देंगे।।37-39।। तब उन्हें स्वर्ग में लाकर एक बड़े उत्सव का आयोजन करके भगवान शिव को उसमें आमन्त्रित कर आग्रहपूर्वक गंगा को उन्हें प्रदान कर दीजिए।।40।। जैसे छायासती उनके सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये जलरूप में उनके सिर पर निश्चित ही सुशोभित रहेंगी. इससे भगवान शंकर प्रसन्न हो जाएँगे।।41½।। 🎎ब्रह्माजी बोले – पुत्र ! तुम चिरंजीवी होओ. जैसा तुमने कहा वैसा करने से भगवान शंकर अवश्य प्रसन्न हो जाएँगे. अत: पुत्र ! तुम शीघ्रतापूर्वक इन्द्रादि देवों के पास जाकर उन्हें सारी बात बताकर मेरे पास आने का संदेश दे दो।।42-43½।। 🔱श्रीमहादेव जी बोले – महामते ! ब्रह्माजी के ऎसा कहने पर नारद मुनि प्रसन्न होकर वहाँ गये, जहाँ महामना इन्द्रादि देवगण विराजमान थे।।44½।। 🌹नारदजी बोले – प्रभो देवराज ! मैं ब्रह्मलोक से महात्मा पिताजी की आज्ञा से आपके पास आया हूँ. मृत्युलोक में हिमवान के गृह में साक्षात् देवी सती ने पुत्रीरूप से जन्म लिया है. अपने अर्धांश से महादेवी त्रैलोक्यपावनी गंगा के रूप में आयी हैं. उन्हें स्वर्ग में लाने के लिए ब्रह्माजी पृथ्वीतल पर जाएँगे. देवश्रेष्ठों ! आप लोग शीघ्र ही मृत्युलोक चलने के लिए ब्रह्मलोक आएँ।।45-47½।। 🔥देवगण बोले – मुनिवर ! आप क्या कह रहे हैं? क्या स्वयं सती ने मृत्युलोक में जन्म लिया है? मुने ! क्या भगवान शंकर को यह बात बता दी गयी है?।।48½।। 🎎नारदजी बोले – उन गंगा को स्वर्गलोक में लाने के बाद मैं शिवजी के पास जाऊँगा, देवगणों ! आप लोग शीघ्र ब्रह्माजी के निकट पहुँचें।।49½।। 🔱श्रीमहादेवजी बोले – तब देवगण “तथास्तु” कहकर ब्रह्मलोक पहुँचे. हर्ष से विकसित मुखकमल वाले उन इन्द्रादि देवगणों ने जगत्पति महात्मा ब्रह्माजी को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पूछा – प्रभो ! हमारे लिए क्या आज्ञा है?।।50-51½।। 💐ब्रह्माजी बोले – महादेवी सती हिमवान के घर में अपने अर्धांश से गंगारूप से जन्मी हैं. इसी प्रकार उमा भी वहाँ अवतार लेंगी. उन ज्येष्ठपुत्री गंगा को स्वर्ग में लाने के लिए हम लोग वहाँ चलेंगे।।52-53।। इन्द्र, कुबेर, वरुण, चन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु और बुद्धिमान नारद – आप सब लोग अपने-अपने स्थानों से मेरे साथ चलने को शीघ्र तैयार हो जाएँ।।54½।। 🔯श्रीमहादेवजी बोले – मुनिपुंगव ! इन्द्रादि देवगण “ऎसा ही हो” कहकर गंगा को माँगने का विचार कर महर्षि नारद तथा ब्रह्माजी के साथ हिमालय के पास शीघ्र पहुँच गये।।55-56।। देवताओं की चेष्टा जानकर महादेवी गंगा ने उससे पिछली रात्रि को ही गिरिराज को स्वप्न में श्वेतवर्ण, त्रिनयना, मकरवाहना एक देवी दिखायी दीं. वे सामने आकर बोलीं – पिताजी ! मैं आपकी पुत्री हूँ. एकमात्र मैं ही आद्या प्रकृति हूँ, और मैं वही हूँ जिसका दक्षप्रजापति की पुत्री सती रूप से पिता के यज्ञ में शरीर त्यागकर अपने पति शिव से वियोग हो गया था. शिवजी भी मेरे वियोग में व्यथित होकर कामरूपक्षेत्र में रहने लगे. वे मुझे पत्नीरूप से पुन: प्राप्त करने के लिए तप कर रहे हैं. आपने भी पुत्रीरूप से मुझे पाने के लिए भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है. इसलिए मैं अपने अर्धांश से इस समय आपके घर में आयी हूँ. अपने दूसरे अर्धांश से भी मैं आपकी ही पुत्री बनूँगी।।58-62।। मुझे ले जाने के लिए ब्रह्मादि देवगण आपके पास प्रार्थना करने आएँगे. मैं उन देवताओं के साथ स्वर्ग चली जाऊँगी और उन महान देवताओं के द्वारा भगवान शंकर को दी जाने पर मैं पुन: उन्हें पतिरूप से प्राप्त कर लूँगी. पिताजी ! मेरे लिए आप मोहासक्त होकर कभी भी शोक न करें।।63-64।। पिताजी ! आपको ये बातें पहले ही इसलिए बता दी हैं, जिससे आप ऎसा होने पर दु:खी न हों. मुने ! गिरिराज से स्वप्न में ऎसा कह करके वे गंगाजी अन्तर्धान हो गयीं और तब हिमवान जग गये. उन्होंने गंगाजी की कही हुई सारी बातों पर विचार किया।।65-66।। गिरिराज को इस विषय में पहले जो मोह था, वह दूर हो गया. मुनिश्रेष्ठ ! तब महान तेजस्वी ब्रह्मादि देवगण हिमालय के यहाँ गंगा को ले जाने की इच्छा से आये. उन बुद्धिमान गिरिराज ने उन्हें प्रणाम करके कहा – देवगणों ! आप यहाँ कैसे आये? जो उचित हो, वैसा आप मुझे कहिए।।67-68½।। 🎎 देवगण बोले – पर्वतराज ! सभी लोकों में दानी के रूप में आपकी कीर्ति गायी जाती है. गिरे ! आज हम सभी आपके पास भिक्षा माँगने आये हैं।।69½।। उनका ऐसा वचन सुनकर गिरिरज को स्वप्न में देखा सारा वृत्तान्त याद आ गया कि नारदजी ने भी पूर्व में ऎसा ही कहा था, तब हिमालय ने कोई उत्तर नहीं दिया था. तदनन्तर मन में विचारकर गिरिराज ने देवताओं से यह कहा – ।।70-71।। देवगणों ! आप लोग तो त्रिलोक के स्वामी हैं. आप देवों को भिक्षा माँगने की क्या आवश्यकता हो गयी? आप बतायें कि मैं आपको क्या प्रदान करूँ?।।72।। ब्रह्माजी बोले – वत्स ! सुनो, मैं बताता हूँ जिस कारण सभी प्रकार के रत्नों से सुशोभित ये देवगण तुम्हारे पास आये हैं।।73।। परा प्रकृति ही स्वयं दक्षप्रजापति की कन्या सती बनकर जन्मी थीं. उन साध्वी ने त्रिभुवनपति भगवान शंकर का वरण किया था. गिरिश्रेष्ठ ! दक्षप्रजापति ने कुबुद्धि के कारण भगवान शंकर की निन्दा में लीन रहते हुए द्वेष-बुद्धि से एक महायज्ञ का आयोजन किया. उसने इन्द्र प्रभृति सभी देवताओं को आमन्त्रित किया. मुझे और विष्णु को भी बुलाया, किंतु महान मूर्खतावश सती और शिव को नहीं बुलाया।।74-76।।गिरे ! इस कारण महादेवी सती कुपित होकर स्वयं दक्ष के नगर को जाने के लिए उद्यत हुईं, यद्यपि शिवजी ने उन्हें अनेक प्रकार से रोकना चाहा।।77।। अपने प्रभुत्व के अभिमान से शिवजी ने ऎसा किया है – यह सोचकर सती ने भगवान शिव को अपराधी समझा और क्रुद्ध होकर वे उन्हें छोड़कर दक्ष के घर को चली गयीं।।78।। दक्षप्रजापति ने भी माया के वशीभूत होकर शिव की निन्दा की. इसलिए सती ने अपराधी दक्ष और शिव दोनों को विमोहित कर और छोड़कर अपनी माया से मृत छायाशरीर धारण कर लिया. स्वयं वे पूर्णा नित्या ब्रह्मस्वरुपा अन्तर्धान हो गयीं।।79-80।। त्रिभुवनपति भगवान शिव दु:ख से व्याकुल होकर उस छायासती को सिर पर लिए धरातल पर नृत्य करने लगे. उस ताण्डव से त्रिभुवन रसातल को जाने लगा. ऎसा देखकर देवताओं ने विष्णु से त्रिभुवन की रक्षा करने की प्रार्थना की।।81-82।। पर्वतराज ! परमपुरुष भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के उस शरीर को धीरे-धीरे काट दिया. परमेश्वर शिव उस देह के वियोग से दु:खी होकर आज भी हमसे रुष्ट हैं।।83-84।। वे ही भगवती दाक्षायणी सती अब तुम्हारे घर में अपने अंशभाग से त्रिलोकेश्वरी गंगा के रुप में आयी हैं. ये भगवान शिव की पूर्वपत्नी हैं और उन्हें ही पुन: प्राप्त करेंगी, परंतु भगवान शंकर हम लोगों से रुष्ट ही रह जाएँगे. अत: यदि आप इस कन्या को हमें दे दें और हम इसे स्वर्गलोक में ले जाकर एक महोत्सव का आयोजन कर भगवान शंकर को समर्पित कर दें तो इससे हमें परम आनन्द प्राप्त होगा।।85-87½।। जो जगदम्बा अपने पूर्णांश से आपकी दूसरी पुत्री के रूप में जन्मेगी उन्हें आप स्वयं ही परमेश्वर सदाशिव को सादर समर्पित करेंगे. गिरे ! इस कन्या को हमें दे दीजिए. हम इसे ले जाकर भगवान शम्भु को समर्पित क देंगे।।88-89।। हिमालय बोले – कन्या अपने पिता के घर में हमेशा के लिए तो रहती नहीं. वह तो दूसरे को देने के लिये ही होती है, अपनी नहीं होती. इस बात को मैं अच्छी तरह समझता हूँ, फिर भी गंगा के जाने का मेरे मन में असहनीय दु:ख होगा।।90-91।। 🔱 श्रीमहादेवजी बोले – ऎसा कहकर महामति गिरिराज हिमालय गंगा को गोद में बिठाकर अश्रु भरे नेत्रों से बहुविध रुदन करने लगे. तब गंगाजी बोलीं – पिताजी ! आप मेरे लिये दु:खी न हों. मुझे ब्रह्माजी को दे दें. अब मैं स्वर्ग जाऊँगी।।92-93।। मैं आपसे दूर नहीं हूँ और न आप ही मुझसे दूर हैं. आप भक्त हैं और मैं भक्ति से प्राप्य हूँ. अत: आप मुझे सदा अपने निकट ही पाएँगे।।94।। पिता से ऎसा कहकर तथा उन्हें प्रणाम करके गिरिसुता गंगा भूतपति सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के पास चली गयीं।।95।। ।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “गंगागमन” नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।। 🚩🦁🌺जय माता दी🌺🦁🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯

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