🌹कार्तिक मास की तीर्थ यात्रायें🌹 🎎स्कन्दपुराण कार्तिक मास माहात्म्य🎎 🚩🌲🌷ॐ विष्णुदेवाय नमः🌷🌲🚩 🔱🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🔱 🌻🌲🌼शुभ सोमवार🌼🌲🌻 🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯 🎎 कार्तिक मास भगवान् विष्णु को सदा ही प्रिय है। कार्तिक सब मासों में उत्तम है। इस महीने में तैंतीसों देवता मनुष्य के सन्निकट हो जाते हैं तथा इस माह में किये हुए व्रत-स्नान, भोजन, व्रत, तिल, धेनु, सुवर्ण, रजत, भूमि, वस्त्र आदि के दानों को विधिपूर्वक ग्रहण करते हैं। 🎎कार्तिक मास महात्मय : - 🏵 स्कन्द पुराणकार्तिक में जो भी तप किया जाता है, जो भी दान दिया जाता है, भगवान् विष्णु ने उसे अक्षय फल देने वाला बताया है। विष्णु-भक्त कार्तिक में गुरु की सेवा कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस समय अन्नदान का महत्व अधिक है। यद्यपि कन्यादान श्रेष्ठ बताया जाता है तथापि उससे श्रेष्ठ क्रमशः विद्यादान,गोदान तथा सर्वाधिक श्रेष्ठ अन्नदान है। 🏖कार्तिक मास स्नान एवं स्नान के लिए श्रेष्ठ तीर्थ :-- 🎎 हिन्दू पञ्चांग के अनुसार, कार्तिक का व्रत आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी तक अथवा आश्विन की पूर्णिमा से कार्तिक की पूर्णिमा तक की जाती है। 🌞 सूर्य की प्रीति के लिये जब तक सूर्यनारायण तुला राशि पर स्थित है तब तक व्रत किया जाता है। 🔱 भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिए आश्विन की पूर्णिमा से कार्तिक की पूर्णिमा तक व्रत किया जाता है। 👣 भगवती दुर्गा की प्रसन्नता के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की महारात्री तक व्रत किया जाता है। 🐚 गणेशजी की प्रसन्नता के लिए आश्विन कृष्ण चतुर्थी से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तक व्रत किया जाता है। 🌹 भगवान् जनार्दन की प्रसन्नता के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक नियमपूर्वक प्रातःस्नान का विधान है। सूर्य रुपी नारायण को पूजनोपचार समर्पित किया जाता है। पीपल भगवान् विष्णु तथा वट भगवान् शंकर का स्वरूप है। अतः इनकी यथोचित पूजा एवं सांगोपन करना चाहिये। शालग्राम शिला के चक्र में सदा भगवान् विष्णु का निवास है इसलिए सदा उसकी पूजा की जाती है। पलाश ब्रम्हाजी के अंश से उत्पन्न हुआ है। अतः स्कन्दपुराण में कार्तिक में पलाश के पत्तल में भोजन कर विष्णु लोक को प्राप्त करने का भी उल्लेख है। जलाशय, कुँए, बावडी, पोखर, झरना व नदी में स्नान क्रमशः अधिक पुण्यवान होता जाता है। जहां दो अथवा तीन नदियों का संगम हो तो पुण्य की कोई सीमा नहीं। 🌋 सिन्धु, कृष्णा, वेणी(वेन्ना), यमुना, सरस्वती, गोदावरी, विपासा(व्यास), नर्मदा, तमसा(गंगा की सहनदी), माही, कावेरी, सरयू, क्षिप्रा, चर्मण्वती(चम्बल), बितस्ता(झेलम), वेदिका, शोणभद्र(सोन नद), वेत्रवती(बेतवा), अपराजिता, गण्डकी, गोमती, पूर्णा(गोदावरी की सहनदी), ब्रम्हपुत्र, मानसरोवर, वाग्मती(नेपाल), शतद्रु(सतलज) इत्यादि पवित्र नदियाँ हैं जिनमें स्नान अत्यंत पुण्यदायी माना गया है| 🌷 स्नान हेतु कोल्हापुर, उससे श्रेष्ठ क्रमशः विष्णुकांची, शिवकांची, वराह्क्षेत्र(उ.प्र.), चक्रकक्षेत्र(उड़ीशा), मुक्तिकक्षेत्र(कर्नाटक) हैं। इनसे श्रेष्ठ हैं क्रमशः अवन्तिपुरी(उज्जैन), बद्रिकाश्रम, अयोध्या, गंगाद्वार, कनखल(हरिद्वार) एवं मथुरा जहां भगवान् राधाकृष्ण स्नान करते थे। इनसे श्रेष्ठ द्वारका, तत्पश्चात भागीरथी, प्रयाग एवं काशी हैं। कुछ रात्री शेष रहे तभी स्नान किया जाय तो वह उत्तम तथा सूर्योदयकाल का स्नान मध्यम श्रेणी का है। विलम्ब से किया गया स्नान कार्तिक स्नान में नहीं आता। 🍑स्नान के विविध प्रकार :- 🎭 स्नान के चार प्रकार बतलाये गए हैं- वायव्य, वारुण, ब्राम्ह तथा दिव्य। गोधूलि में किया हुआ स्नान वाव्य कहलाता है। समुद्र आदि के जल में जो स्नान किया जाता है उसे वारुण कहते हैं। वेद-मन्त्रों के उच्चारपूर्वक किया गया स्नान ब्राम्ह तथा मेघों अथवा सूर्या की किरणों द्वारा जो जल शरीर पर गिरता है उसे दिव्य स्नान कहा जाता है। इन सब में वारुण स्नान सबसे उत्तम है। 💐कार्तिक मास में दीपदान एवं आकाशदीप की महिमा :-- 🌹कार्तिकमास में स्नान व दान आदि कर दीपदान करने का विधान है। पुराण के अनुसार यह समस्त उपद्रवों का नाश कर भगवान् विष्णु की प्रसन्नता बढ़ाता है। दीपदान के साथ आकाशदीप के दान का भी उल्लेख किया गया है। स्कन्दपुराण के अनुसार आकाशदीपदान करने वाला सुख-संपत्ति एवं मोक्ष प्राप्त करता है। अतः कार्तिक में स्नान-दान कर भगवान् विष्णु के मंदिर के कंगूरे पर एक मास तक दीपदान अवश्य करना चाहिए। एकादशी से, तुलाराशि के सूर्य से अथवा पूर्णिमा से लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णु का ध्यान कर आकाशदीप दान आरम्भ किया जाता है। 🕯कार्तिक मास में दीप दान :-- 🎎 इस पुराण के अनुसार आकाश में दीपदान करते हैं उनके पूर्वज उत्तम गति को प्राप्त होते हैं। जो देवालय में, नदी के किनारे, सड़क पर तथा नींद लेने के स्थान पर दीप प्रज्वलित करता है वह लक्ष्मी को प्रसन्न करता है। जो कीट एवं काँटों से भरी हुई दुर्गम एवं ऊंची-नीची भूमिपर दीपदान करता है उसे किसी प्रकार का कष्ट नहीं भोगना पड़ता। अनुमानतः इस प्रकार दीप एवं आकाशदीप दान द्वारा चारों ओर प्रकाश फैलाकर दूसरों के जीवन को प्रकाशमान करना चाहिए। इससे हमारे जीवन में भी प्रसन्नता एवं संतुष्टी का प्रादुर्भाव होता है। 🔔 कार्तिक मास में तुलसीवृक्ष के आरोपण व पूजन की महिमा🌼 🐚 स्कन्दपुराण के अनुसार तुलसी पाप का नाश एवं पुण्य की वृद्धी करने वाली है। अतः घर घर में तुलसी का पौधा लगाना चाहिए। जिस घर में तुलसी का बगीचा विद्यमान है वह तीर्थस्थल बन जाता है। कहा जाता है कि देवताओं एवं असुरों द्वारा समुद्र मंथन करने पर लक्ष्मी एवं अन्य के साथ अमृत भी प्राप्त हुआ था। अमृतकलश हाथ में लिए विष्णु के नेत्रों से हर्ष के अश्रु निकल पड़े तथा अमृत पर गिरे। तत्काल उस से तुलसी उत्पन्न हुई थी। ब्रम्हा आदि देवताओं ने लक्ष्मी एवं तुलसी को श्रीहरी को समर्पित किया। तब से दोनों भगवान् विष्णु को अत्यंत प्रियकर हैं। अतः इस समय लक्ष्मी एवं तुलसी दोनों को पूजने का विधान है। 🎎 त्रयोदशी से दीपावली तक के उत्सव :- 🎨 स्कन्दपुराण के अनुसार, हिन्दी पञ्चांग के कार्तिकी कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के प्रदोषकाल में घर के द्वार पर दीप जलाना शुभकारी होता है। कदाचित इसीलिए दीपावली के उत्सव में हम त्रयोदिशी के दिवस से ही द्वार पर दीये जलाना आरम्भ करते हैं। दीपावली से पूर्व चतुर्दशी को तेलमात्र में लक्ष्मी तथा जलमात्र में गंगा निवास करती है। अतः इस दिन प्रातःकाल तेल व उबटन लगाकर जल से स्नान बताया गया है। इसे अभ्यंगस्नान कहते हैं। इस दिन से लेकर तीन दिनों तक दीपोत्सव करना चाहिए। 🚩 कार्तिक महात्मय स्कन्द पुराणपुराण के अनुसार वामन रूप में विष्णु ने राजा बलि द्वारा दी गयी भूमि को तीन दिनों में तीन पगों द्वारा नाप लिया था। भूमि दान में देने के उपरांत बलि ने विष्णु से वर माँगा कि आज से तीन दिवसों तक पृथ्वी पर उसका राज रहे। इन तीन दिनों तक जो पृथ्वी पर दीपदान करे उसके गृह में लक्ष्मी निवास करे। भगवान् ने बलि की इच्छा पूर्ण की। इसलिए इन तीन दिनों तक महोत्सव करना चाहिए। 🔔 तदनंतर अमावस्या को लक्ष्मीदेवी का पूजन कर दीपदान किया जाता है। अपनी शक्ति के अनुसार देवमन्दिर में दीपों का वृक्ष बनाना चाहिए। चौराहे पर, श्मशान भूमि में, नदी के किनारे, पर्वत पर, घरों में, वृक्षों की जड़ों के समीप, गोशालाओं में, चबूतरों पर तथा प्रत्येक गृह में दीप जलाकर रखना चाहिए। सर्वप्रथम ब्राम्हणों एवं भूखे मनुष्यों को भोजन कराकर पीछे स्वयं नूतन वस्त्र एवं आभूषण से विभूषित होकर भोजन करना चाहिये। जीवहिंसा, मदिरापान, अगम्यागमन, चोरी तथा विश्वासघात ये पांच नरक के द्वार कहे गये हैं एवं इनका सदैव त्याग करना चाहिए। तदनंतर आधी रात के समय नगर की शोभा देखने के लिए धीरे धीरे पैदल चलाना चाहिए तथा आनंदोत्सव देखकर घर लौटना चाहिए। 🎎भाईदूज का उत्सव एवं बहन के घर भोजन का महत्त्व :- 🕯 दीपावली के अगले दिन अर्थात् बलिप्रतिपदा के दिवस बलिराज गौओं को भोजन अर्पित कर अलंकार से विभूषित किया जाता है। उनकी आरती उतारी जाती है। 🎭 अगला दिवस यम द्वितीय कहलाता है जिसे भाईदूज के रूप में मनाया जाता है। पूर्वकाल में हिंदी पञ्चांग के कार्तिक शुक्ल द्वितीय को यमुनाजी ने भ्राता यम को अपने घर भोजन कराया था तथा उसका सत्कार किया था। तभी से भाईदूज की यह प्रथा आरम्भ हुई। इस दिन भाई अपनी बड़ी बहन के घर जाकर उसे प्रणाम कर उससे आशीर्वाद प्राप्त करता है। तत्पश्चात बहन के घर भोजन ग्रहण करता है। भोजन के पश्चात भाई बहन को वस्त्राभूषण देता है। इस प्रकार बहन के कुशलक्षेम की जानकारी उसके मायकेवालों तक पहुँचती थी। उन्हें यह संतुष्टि प्राप्त होती थी कि उनकी पुत्री अपने ससुराल में कुशल एवं संतुष्ट है। 🎎आँवले के वृक्ष की उत्पत्ति एवं उसका माहात्म्य :-- 🎨 स्कन्दपुराण के अनुसार वैकुण्ठ चतुर्दशी को आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि सम्पूर्ण विश्व जब जलमग्न हो गया था व सर्व चराचर प्राणी नष्ट हो गए थे, तब देवाधिदेव ब्रम्हा अविनाशी परब्रम्ह का जप करने लगे। तत्पश्चात भगवत दर्शन के अनुरागवश उनके नेत्रों से अश्रु निकल पड़े। प्रेम से परिपूर्ण अश्रु की बूँद जब पृथ्वी पर गिरी तब वहां से आँवले का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ। 🌲सब वृक्षों में सर्वप्रथम उत्पन्न होने के कारण इसे आदिरोह भी कहा जाता है। इसके पश्चात ही ब्रम्हा ने समस्त प्रजा एवं देवताओं की सृष्टि की। इसीलिए समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु आँवले के वृक्ष का पूजन एवं इसके फल के सेवन का विधान है। 🎎कार्तिक मास में मनाये जाने वाले मुख्य पर्व :- 🕯 धनतेरस 🔥 दिवाली 🏵 अन्नकूट 🎭 भाई दूज 🌿 तुलसी विवाह 🍑 देव दीपावली 🎎 त्रिपुरारी पूर्णिमा 🌹पुष्कर मेला 🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯🕯 🚩🌲 🌹विष्णुदेवाय नमः🌹🌲🚩 🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊

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🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🔱🌹🔔शिवरक्षास्तोत्रम्🔔🌹🔱 🎎 विनियोग: – 🌷 ऊँ अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषि:, श्रीसदाशिवो देवता, अनुष्टुप् छन्द:, श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोग: । अर्थ – विनियोग – इस शिवरक्षास्तोत्र मन्त्र के याज्ञवल्क्य ऋषि हैं, श्रीसदाशिव देवता हैं और अनुष्टुप छन्द है, श्रीसदाशिव की प्रसन्नता के लिए शिवरक्षास्तोत्र के जप में इसका विनियोग किया जाता है. 🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨 🍑चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् । अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ।।1।। अर्थ – देवाधिदेव महादेव का यह परम पवित्र चरित्र चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) – की सिद्धि प्रदान करने वाला दाशन है, यह अतीव उदार है. इसकी उदारता का पार नहीं है. 🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔 🌿 गौरीविनायकोपेतं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रकम् । शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नर: ।।2।। अर्थ – साधक को गौरी और विनायक से युक्त, पाँच मुख वाले दश भुजाधारी त्र्यम्बक भगवान शिव का ध्यान करके शिवरक्षास्तोत्र का पाठ करना चाहिए. 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋 🔱 गंगाधर: शिर: पातु भालमर्धेन्दुशेखर: । नयने मदनध्वंसी कर्णौ सर्पविभूषण: ।।3।। अर्थ – गंगा को जटाजूट में धारण करने वाले गंगाधर शिव मेरे मस्त्क की, शिरोभूषण के रूप में अर्धचन्द्र को धारण करने वाले अर्धेन्दुशेखर मेरे ललाट की, मदन को ध्वंस करने वाले मदनदहन मेरे दोनों नेत्रों की, सर्प को आभूषण के रूप में धारण करने वाले सर्पविभूषण शिव मेरे कानों की रक्षा करें. 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🌼 घ्राणं पातु पुरारातिर्मुखं पातु जगत्पति:। जिह्वां वागीश्वर: पातु कन्धरां शितिकन्धर:।।4।। अर्थ – त्रिपुरासुर के विनाशक पुराराति मेरे घ्राण (नाक) की, जगत की रक्षा करने वाले जगत्पति मेरे मुख की, वाणी के स्वामी वागीश्वर मेरी जिह्वा की, शितिकन्धर (नीलकण्ठ) मेरी गर्दन की रक्षा करें. 🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵🏵 🎎 श्रीकण्ठ: पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धर:। भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ।।5।। अर्थ – श्री अर्थात सरस्वती यानी वाणी निवास करती है जिनके कण्ठ में, ऎसे श्रीकण्ठ मेरे कण्ठ की, विश्व की धुरी को धारण करने वाले विश्वधुरन्धर शिव मेरे दोनों कन्धों की, पृथ्वी के भारस्वरुप दैत्यादि का संहार करने वाले भूभारसंहर्ता शिव मेरी दोनों भुजाओं की, पिनाक धारण करने वाले पिनाकधृक मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें. 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 💐हृदयं शंकर: पातु जठरं गिरिजापति: । नाभिं मृत्युंजय: पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बर: ।।6।। अर्थ – भगवान शंकर मेरे हृदय की और गिरिजापति मेरे जठरदेश की रक्षा करें. भगवान मृत्युंजय मेरी नाभि की रक्षा करें तथा व्याघ्रचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले भगवान शिव मेरे कटि-प्रदेश की रक्षा करें. 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 🔱 सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सल: । ऊरू महेश्वर: पातु जानुनी जगदीश्वर: ।।7।। अर्थ – दीन, आर्त और शरणागतों के प्रेमी – दीनार्तशरणागतवत्सल मेरे समस्त सक्थियों (हड्डियों) की, महेश्वर मेरे ऊरूओं तथा जगदीश्वर मेरे जानुओं की रक्षा करें. 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🎭 जंघे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिप: । चरणौ करुणासिन्धु: सर्वांगानि सदाशिव: ।।8।। अर्थ – जगत्कर्ता मेरे जंघाओं की,🌿 गणाधिप दोनों गुल्फों (एड़ी की ऊपरी ग्रंथि) की, करुणासिन्धु दोनों चरणों की तथा भगवान सदाशिव मेरे सभी अंगों की रक्षा करें. 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🌷 एतां शिवबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठेत् । स भुक्त्वा सकलान् कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ।।9।। अर्थ – जो सुकृती साधक कल्याणकारिणी शक्ति से युक्त इस शिवरक्षास्तोत्र का पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं का उपभोग कर अन्त में शिवसायुज्य को प्राप्त करता है. 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🌹 ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये । दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात् ।।10।। अर्थ – त्रिलोक में जितने ग्रह, भूत, पिशाच आदि विचरण करते हैं, वे सभी इस शिवऱअस्तोत्र के पाठ मात्र से ही तत्क्षण दूर भाग जाते हैं. 🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊 🚩 अभयंकरनामेदं कवचं पार्वतीपते: । भक्त्या बिभर्ति य: कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ।।11।। अर्थ – जो साधक भक्तिपूर्वक पार्वतीपति शंकर के इस “अभयंकर” नामक कवच को कण्ठ में धारण करता है, तीनों लोक उसके अधीन हो जाते हैं. 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🎎 इमां नारायण: स्वप्ने शिवरक्षां यथाssदिशत् । प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यस्तथाsलिखत् ।।12।। अर्थ – भगवान नारायण ने स्वप्न में इस “शिवरक्षास्तोत्र” का इस प्रकार उपदेश किया, योगीन्द्र मुनि याज्ञवल्क्य ने प्रात:काल उठकर उसी प्रकार इस स्तोत्र को लिख लिया. ।।इति श्रीयाज्ञवल्क्यप्रोक्तं शिवरक्षास्तोत्रमं सम्पूर्णम्।। 🔱🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🔱 🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑

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🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🎨🌋🎎रुद्रपाठ🎎🌋🎨 🔱🌿🚩रुद्राष्टाध्यायी🚩🌿🔱 👏🌷🔔स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राध्याय 🔔🌷👏 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🙏 स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राध्याय :-- 🎎 महती कीर्ति वाले ऎश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, सर्वज्ञ तथा सबके पोषणकर्ता पूषादेव (सूर्य) हमारे लिए मंगल का विधान करें. चक्रधारा के समान जिनकी गति को कोई रोक नहीं सकता, वे तार्क्ष्यदेव हमारा कल्याण करें और वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारे लिए कल्याण का विधान करें. हे अग्निदेव ! आप हमारे लिए पृथ्वी पर रस धारण कीजिए, औषधियों में रस डालिए, स्वर्गलोक तथा अन्तरिक्ष में रस स्थापित कीजिए, आहुति देने से सारी दिशाएँ और विदिशाएँ मेरे लिए रस से परिपूर्ण हो जाएँ. 🎭 हे दर्भमालाधार वंश ! तुम यज्ञरूप विष्णु के ललाटस्थानीय हो. हे ललाट के प्रान्तद्वय ! तुम दोनों यज्ञरूप विष्णु के ओष्ठसन्धिरूप हो. हे बृहत-सूची ! तुम यज्ञीय मण्डप की सूची हो. हे ग्रंथि ! तुम यज्ञीय विष्णुरुप मण्डप की मजबूत गाँठ हो. हे हविर्धान ! तुम विष्णुसंबंधी हो, इस कारण विष्णु की प्रीति के लिए तुम्हारा स्पर्श करता हूँ. दोनों हविर्धानों (शकटों) को दक्षिणोत्तर स्थापित करके उनके ढक्कनों का मण्डप बनाएँ. हविर्धान-मण्डप के पूर्वद्वारवर्ती स्तम्भ के मध्य में कुशों की माला गूँथे. 🌋अग्नि देवता, वायु देवता, सूर्य देवता, चन्द्र देवता, वसु देवता, रुद्र देवता, आदित्य देवता, मरुत् – देवता, विश्वेदेव देवता, बृहस्पति देवता, इन्द्र देवता और वरुण देवता का स्मरण करके मैं इस इष्टका को स्थापित करता हूँ. मैं “सद्योजात” नामक परमेश्वर की शरण लेता हूँ. पश्चिमाभिमुख भगवान सद्योजात के लिए प्रणाम हैं. हे रुद्रदेव ! अनेक बार जन्म लेने हेतु मुझे प्रेरित मत कीजिए, किंतु जन्म से दूर करने के निमित्त मुझे तत्त्वज्ञान के लिए प्रेरणा प्रदान कीजिए. संसार के उद्धारकर्ता सद्योजात के लिए नमस्कार है. 🔔उत्तराभिमुख वामदेव के लिए नमस्कार है. उन्हीं के विग्रहस्वरुप ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, रुद्र, काल, कलविकरण, बलविकरण, बल, बलप्रमथन, सर्वभूतदकिमन तथा मनोन्मन – इन महादेव की पीठाधिष्ठित शक्तियों के स्वामियों को नमस्कार है. दक्षिणाभिमुख सत्त्वगुणयुक्त “अघोर” नामक रुद्रदेव के लिए प्रणाम है. इसी प्रकार राजसगुणयुक्त “घोर” तथा तामसगुणयुक्त “घोरतर” नामक रुद्र के लिए प्रणाम है. हे शर्व ! आपके रुद्र आदि सभी रूपों के लिए नमस्कार है. 🔱 हम लोग उस पूर्वाभिमुख “तत्पुरुष” महादेव को गुरु तथा शास्त्रमुख से जानते हैं, ऎसा जानकर हम उन महादेव का ध्यान करते हैं, इसलिए वे रुद्र हमको ज्ञान-ध्यान के लिए प्रेरित करें. उन ऊर्ध्वमुखी भगवान “ईशान” के लिए प्रणाम है जो वेदशास्त्रादि विद्या और चौंसठ कलाओं के नियामक, समस्त प्राणियों के स्वामी, वेद के अधिपति एवं हिरण्यगर्भ के स्वामी हैं. वे साक्षात ब्रह्मस्वरुप परमात्मा शिव हमारे लिए कल्याणकारी हों (अथवा उनकी कृपा से मैं भी सदाशिवस्वरुप हो जाऊँ). 🎎 हे क्षुर ! आपका नाम “शान्त” है. आपके पिता वज्र हैं. मैं आपके लिए नमस्कार करता हूँ. आप मुझे किसी प्रकार की क्षति मत पहुँचाइए. हे यजमान ! आपके बहुत दिनों तक जीवित रहने के लिए, अन्न भक्षण करने के लिए, संतति के लिए, द्रव्यवृद्धि के लिए तथा उत्तम अपत्य उत्पन्न होने के लिए और उत्तम सामर्थ्य की प्राप्ति के लिए मैं आपका वपन (मुण्डन) करता हूँ. हे सूर्यदेव ! आप मेरे सभी पापों को दूर कीजिए और जो कुछ भी मेरे लिए कल्याणकारी हो, उसे मुझे प्राप्त कराइए. 🌷 द्युलोकरूप शान्ति, अन्तरिक्षरुप शान्ति, भूलोकरूप शान्ति, जलरुप शान्ति, औषधिरुप शान्ति, वनस्पतिरुप शान्ति, सर्वदेवरुप शान्ति, ब्रह्मरुप शान्ति, सर्वजगत्-रूप शान्ति और संसार में स्वभावत: जो शान्ति रहती है, वह शान्ति मुझे परमात्मा की कृपा से प्राप्त हो. सभी वेदों का तत्त्वस्वरुप रस, जो सामवेद अथवा भगवान साम (भगवान विष्णु या कृष्ण – “वेदानां सामवेदोsस्मि”) हैं, वे अपने उसी सामरस से समस्त वेदों का अभिसिंचन करते हैं. 🚩🌹🔱ॐ नमः शिवाय🔱🌹🚩 ।। इस प्रकार स्वस्तिप्रार्थनानाममन्त्राध्याय पूर्ण हुआ ।। इस प्रकार रुद्राष्टाध्यायी सम्पूर्ण हुआ ।। 🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌹

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🍑🌲🌋रुद्रपाठ 🌋🌲🍑 🎎🎊🌹रुद्राष्टाध्यायी 🌹🎊🎎 ।।🙏🎭शान्त्यध्याय 🎭🙏 ।। 🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🙏🌿🌷शान्त्यध्याय 🌷🌿🙏 🔔 मैं ऋचारूप वाणी की शरण लेता हूँ, मैं यजु:स्वरूप मन की शरण लेता हूँ, मैं प्राणरूप साम की शरण लेता हूँ और मैं चक्षु-इन्द्रिय तथा श्रोत्र-इन्द्रिय की शरण लेता हूँ. वाक् – शक्ति, शारीरिक बल और प्राण-अपानवायु – ये सब मुझ में स्थिर हों. मेरे नेत्र तथा हृदय की जो न्यूनता है और मन की जो व्याकुलता है, उसे देवगुरु बृहस्पति दूर करें अर्थात यज्ञ करते समय मेरे नेत्र, हृदय तथा मन से जो त्रुटि हो गई है, उसे वे क्षमा करें. सम्पूर्ण भुवन के जो अधिपतिरूप भगवान यज्ञपुरुष हैं, वे हमारे लिए कल्याणकारी हों. 🔱 उन प्रकाशात्मक जगत्स्रष्टा सविता देव के भूर्लोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोक में व्याप्त रहने वाले परब्रह्मात्मक सर्वोतम तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों के अनुष्ठान हेतु प्रेरित करें. सदा सबको समृद्ध करने वाला आश्चर्यरूप परमेश्वर किस तर्पण या प्रीति से तथा किस वर्तमान याग-क्रिया से हमारा सहायक होता है अर्थात हम कौन-सी उत्तम क्रिया करें और कौन-सा शोभन कर्म करें, जिससे परमात्मा हमारे सहायक हों और अपनी पालन शक्ति द्वारा हमारे वृद्धिकारी सखा हों. 🎎 हे परमेश्वर ! मदजनक हवियों में श्रेष्ठ सोमरुप अन्न का कौन-सा अंश आपको सर्वाधिक तृप्त करता है? आपकी इस प्रसन्नता में दृढ़ता से रहने वाले हम भक्तजन अपने धन आदि के साथ उसे आपको समर्पित करते हैं. हे परमेश्वर ! आप मित्रों के तथा स्तुति करने वाले हम ऋत्विजों के पालक हैं और हम भक्तों की रक्षा के लिए भली-भाँति अभिमुख होकर आप अनन्त रूप धारण करते हैं. हे इन्द्र ! आप किस तृप्ति अथवा हविदान से हमें प्रसन्न करते हैं? और किस दिव्यरूप को धारण कर स्तुति करने वाले हम उपासकों की सारी अभिलाषाओं को पूरा करते हैं? 🔱 सबके स्वामी परमेश्वर चारों तरफ प्रकाशमान हैं. वे हमारे पुत्र आदि के लिए कल्याणरूप हों, वे हमारे गौ आदि पशुओं के लिए सुखदायक हों. मित्रदेवता हमारे लिए कल्याणमय हों, वरुणदेवता हमारे लिए कल्याणकारी हों, अर्यमा हमारे लिए कल्याणप्रद हों, इन्द्र देवता हमारे लिए कल्याणमय हों, बृहस्पति हमारे लिए कल्याणकारी हों तथा विस्तीर्ण पादन्यास वाले विष्णु हमारे लिए कल्याणमय हों. वायुदेव हमारे लिए सुखकारी होकर बहें, सूर्यदेव हमारे निमित्त सुखरूप होकर तपें और पर्जन्य देवता शब्द करते हुए हमारे निमित्त सुखदायक वर्षा करें. 🏖 दिन हमारे लिए सुखकारी हों, रात्रियाँ हमारे लिए सुखरूप हों, इन्द्र और अग्नि देवता हमारी रक्षा करते हुए सुखरूप हों, हवि से तृप्त इन्द्र और वरुण देवता हमारे लिए कल्याणकारी हों, अन्न की उत्पत्ति करने वाले इन्द्र और पूषा देवता हमारे लिए सुखकारी हों एवं इन्द्र और सोम देवता श्रेष्ठ गमन अथवा श्रेष्ठ उत्पत्ति के निमित्त और रोगों का नाश करने के लिए तथा भय दूर करने के लिए हमारे लिए कल्याणकारी हों. दीप्तिमान जल हमारे अभीष्ट स्नान के लिए सुखकर हो, पीने के लिए स्वादिष्ट तथा स्वास्थ्यकारी हो, यह जल हमारे रोग तथा भय को दूर करने के लिए निरन्तर प्रवाहित होता रहे. 🌹 हे पृथिवि ! निष्कण्टक सुख में स्थित रहने वाली तथा अति विस्तारयुक्त आप हमारे लिए सुखकारी बनें और हमें शरण प्रदान करें. हे जलदेवता ! आप जल देने वाले हैं और सुख की भावना करने वाले व्यक्ति के लिए स्नान-पान आदि के द्वारा सुख के उत्पादक हैं. हमारे रमणीय दर्शन और रसानुभव के निमित्त यहाँ स्थापित हो जाइए. हे जल देवता ! आपका जो शान्तरुप सुख का एकमात्र कारण रस इस लोक में स्थित है. हमको उस रस का भागी उसी तरह से बनाएँ जैसे प्रीतियुक्त माता अपने बच्चे को दूध पिलाती है. 🎭 हे जल देवता ! आपके उस रस की प्राप्ति के लिए हम शीघ्र चलना चाहते हैं, जिसके द्वारा आप सारे जगत को तृप्त करते हैं, और हमें भी उत्पन्न करते हैं. द्युलोकरूप शान्ति, अन्तरिक्षरूप शान्ति, भूलोकरूप शान्ति, जलरूप शान्ति, औषधिरूप शान्ति, वनस्पतिरूप शान्ति, सर्वदेवरुप शान्ति, ब्रह्मरूप शान्ति, सर्वजगत-रूप शान्ति और संसार में स्वभावत: जो शान्ति रहती है, वह शान्ति मुझे परमात्मा की कृपा से प्राप्त हो. हे महावीर परमेश्वर ! आप मुझको दृढ़ कीजिए, सभी प्राणी मुझे मित्र की दृष्टि से देखें, मैं भी सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ और हम लोग परस्पर द्रोहभाव से सर्वथा रहित होकर सभी को मित्र की दृष्टि से देखें. 🏵 हे भगवन ! आप मुझे सब प्रकार से दृढ़ बनाएँ. आपके संदर्शन में अर्थात आपकी कृपा दृष्टि से मैं दीर्घ काल तक जीवित रहूँ. हे अग्निदेव ! सब रसों को आकर्षित करने वाली आपकी तेजस्विनी ज्वाला को नमस्कार है, आपके पदार्थ-प्रकाशक तेज को नमस्कार है. आपकी ज्वालाएँ हमें छोड़कर दूसरों के लिए तापदायक हों और आप हमारा चित्त-शोधन करते हुए हमारे लिए कल्याणकारक हों. 💐 विद्युत रूप आपके लिए नमस्कार है, गर्जनारूप आपके लिए नमस्कार है, आप सभी प्राणियों को स्वर्ग का सुख देने की चेष्टा करते हैं, इसलिए आपके लिए नमस्कार है. हे परमेश्वर ! आप जिस रुप से हमारे कल्याण की चेष्टा करते हैं उसी रुप से हमें भयरहित कीजिए, हमारी संतानों का कल्याण कीजिए और हमारे पशुओं को भी भयमुक्त कीजिए. जल और औषधियाँ हमारे लिए कल्याणकारी हों और हमारे उस शत्रु के लिए वे अमंगलकारी हों, जो हमारे प्रति द्वेषभाव रखता है अथवा हम जिसके प्रति द्वेषभाव रखते हैं. 🎎 देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित, जगत के नेत्रस्वरुप तथा दिव्य तेजोमय जो भगवान आदित्य पूर्व दिशा में उदित होते हैं उनकी कृपा से हम सौ वर्षों तक देखें अर्थात सौ वर्षों तक हमारी नेत्र ज्योति बनी रहे, सौ वर्षों तक सुखपूर्वक जीवन-यापन करें, सौ वर्षों तक सुनें अर्थात सौ वर्षों तक श्रवणशक्ति से संपन्न रहें, सौ वर्षों तक अस्खलित वाणी से युक्त रहें, सौ वर्षों तक दैन्यभाव से रहित रहें अर्थात किसी के समक्ष दीनता प्रकट न करें. सौ वर्षों से ऊपर भी बहुत काल तक हम देखें, जीयें, सुनें, बोलें और अदीन रहें. 🔔🚩🔱ॐ नमः शिवाय🔱🚩🔔 ।। इस प्रकार रुद्रपाठ – रुद्राष्टाध्यायी – का शान्त्यध्याय पूर्ण हुआ ।। 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱

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🎎🌲🐚पापकुंशी एकादशी 🐚🌲🎎 🚩🌿🌹ॐ विष्णुदेवाय नमः🌹🌿🚩 🚩🐚🔔ॐ गणपतये नमः🔔🐚🚩 🌋🌿🍑शुभ बुधवार🍑🌿🌋 💐🌲🌻सुप्रभात🌻🌲💐 🎨 दिनांक :- 9-10-19 🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚 🎎 पापकुंशी एकादशी :-- ********************* 🚩 आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी दशहरे के बाद आने वाली एकादशी को होता है पापांकुशा एकादशी व्रत। इस एकादशी का नाम पापकुंशी इसलिए पड़ क्योंकि इस दिन व्रत रखने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। 🐚 इस एकादशी पर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा की जाती है। पापरूपी हाथी को इस व्रत के पुण्यरूपी अंकुश से वेधने के कारण इसका नाम पापांकुशा एकादशी हुआ। इस व्रत में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। रात्रि जागरण कर भगवान का स्मरण करना चाहिए। रात्रि में भगवान विष्णु की मूर्ति के समीप ही शयन करना चाहिए। द्वादशी तिथि को सुबह ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद यह व्रत समाप्त किया जाता है। इस व्रत से एक दिन पहले दशमी के दिन गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल तथा मसूर का सेवन नहीं करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से व्रती, बैकुंठ धाम प्राप्त करता है। 🎎 कथा :- 🎭 एक समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। वह बड़ा क्रूर था। उससे बहुत से पाप हुए थे। जब उसकी मृत्यु का समय नजदीक आया तो वह महर्षि महर्षि अंगिरा के आश्रम में गया। उसने महर्षि से प्रार्थना की कि मुझसे जीवन में बहुत पाप हुए हैं। हमेशा लोगों की बुरा किया है। इसलिए अब कोई ऐसा उपाय है जिससे मैं अपने सारे पाप धो सकूं और मोक्ष को प्राप्त करूं। 👏 उसकी प्रार्थना पर हर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करके को कहा। महर्षि अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया और किए गए सारे पापों से छुटकारा पा लिया। 🚩🌲🌹ॐ विष्णुदेवाय नमः🌹🌲🚩 🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚

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🎎🌲🐯शुभ नवरात्रि🐯🌲🎎 🍑🎭🚩नवरात्रि का नवाँ दिन🚩🎭🍑 🐯👣🚩माँ सिद्धिदात्री देवी🚩👣🐯 🌋🏖💐सुप्रभात🌻🏖🌋 🔱🌿🌹शुभ सोमवार🌹🌿🔱 🦁या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।🦁 🔔नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।🔔 🙏मङ्गलमयी सुबह की शुरूआत माता रानी के चरण कमलों के वन्दन के साथ🙏 🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔 9. 🦁👣🚩सिद्धिदात्री🚩👣🦁 सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यामत सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ।। 🐯माता गौरी का यह स्वरुप सभी तरह की सिद्धियाँ प्रदान करने वाला है | पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने सृष्टि की रचना के लिए माता आदि साधना की उपासना की थी। आदि पराशक्ति को हिन्दू धर्म में शुद्ध अलजा के रूप में माना जाता है | जिससे इसका सृजन हुआ है | माना जाता है कि यह आदि पराशक्ति भगवान् शिव के दाहिने भाग से उत्पन्न हुई है | इसलिए शंकर को अर्ध नारीश्वर भी कहा जाता है | 👣माता का स्वरूप :-- इस देवी के दाहिनी ओर नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा और बायीं ओर के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है। इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प पर भी आसीन होता है। 🎎 माता-पिता के स्वरूप का महत्त्व इस देवी की पूजा नौंवे दिन की जाती है। यह देवी सर्व प्राणियों को प्रदान करने वाली देवी हैं। सच्चे मन से भक्ति करने पर श्रद्धालु की सभी मनोकामना पूर्ण हो जाती है | हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व दोनों सिद्धों में होता है। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियों प्राप्त की जा सकती हैं। 🌹मंत्र: 🌹:- 🦁ओम देवी सिद्धिदात्रीयै नमः दा देवी सिद्धिदात्रीयै नमः🦁 🎭 ध्यान :- वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखरम्। कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धिदीदात्री यशस्वनीम् चतु स्वर्णावर्ण निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्। शख, चक्र, गदा, पदम, धरण सिध्दिदत्री भजम् ग पटाम्बर, परिधान मृदुहास्या नानालंकार भूशिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किटिनी रत्नकुंडल मण्डिताम्, प्रफुल्ल वदना पल्लवधरण कातं कपोला पीनपयोधराम्। कमनीयां लावण्य श्रीणकटि निम्नलिखितनाभि नितम्बनीम् ण 🚩स्तोत्र पाठ :- कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो। स्मरिलन शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते त् पटाम्बर परिधान नानालंकार भूषिता। नलिस्थितां नलनार्षि सिध्दिदत्री नमोअस्तुते नल परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा। परम संभावना, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोअस्तुते क्ति विश्वकर्ति, विश्वभती, विश्वहृति, विश्वप्रीति। विश्व वार्चिता विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोअस्तुते वा भुक्ति मुक्तिकारिणी भक्तकांतिवरिणी। गर्व सागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ध धर्मार्थपाद प्रदायिनी महामोह विनाशिनी। मोक्षदायिनी सिध्दिदायिनी सिद्धिदात्री नमोअस्तुते ध 🐯 कवच :-- ओंकारपातु शीर्षो माता ऐं बीजं माता ह्रदयो। हीं बीज सदापातु नभो, गुहो च पाद्यो ाप ललाट कर्णो श्रीं बीजपुतु क्लीं बीजं मां दर्शराणो। कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै माता सर्व वदनो ह माँ भगवती सिध्दिदत्री का ध्यान, स्तोत्र व कवच का पाठ करने से 'निर्वाण चक्र' जाग्रत हो जाता है। 🐯👣🚩जय माता दी🚩👣🐯 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱

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🎎🌲🐯शुभ नवरात्रि🐯🌲🎎 💐🌲नवरात्रि का आठवाँ दिन🌲💐 🐯👣🚩माँ महागौरी🚩👣🐯 🏖🌻🐚सुप्रभात🐚🌻🏖 🍑🌞🌹शुभ रविवार🌹🌞🍑 🌷या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।🌷 🌹नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।🌹 👏मंगलमय सुबह की शुरुआत माता रानी के चरण कमलों के वन्दन के साथ🙏 🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔 8. 🐯👣🚩महागौरी🚩👣🐯 🚩श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः। 🚩 🌹महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।।🌹 🦁 माता गौरी का आठवां स्वरुप महागौरी है | यह पवित्रता और स्वक्षता का प्रतीक है | पौराणिक कथाओं के अनुसार हिमालय की पुत्री शैलपुत्री जब 16 वर्ष की अत्यंत सुंदर और भव्य हो गई | उनके इसी स्वरुप को महागौरी ने कहा | 🎎 माता का स्वरूप :- नाम से प्रकट होता है कि इनका रूप पूर्ण तो गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। उनके सभी गहने और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनकी 4 भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा गया है। उनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है और नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बांए हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। 🎎माता-पिता के स्वरूप का महत्त्व :- यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है।इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं। 🔔 मंत्र: :- 🚩ओम देवी महागौर्यै नमः ग देवी महागौर्यै नमः🚩 🎭 ध्यान :-- वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखरम्। सिंहारूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम् चतु पूर्णन्दु हरिण गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्। वराहिकतिकरण त्रिशूल डमरूधरान महागौरी भज्म त्र पटाम्बर परिधान मृदुहास्या नानालंकार भूशिताम्। मंजीर, हार, केयूर कि बुटानी रत्नकुंडल मण्डिताम् हार प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्। कमनीया लावण्य मृणाल चंदनगंधिलिपम ाव 🐯 स्तोत्र पाठ :-- सर्वसंकट ह्रीति त्वं धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्। ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमभ्यम् मय सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रद्युम्म्। डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमभ्यम् द्य त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तत्रै हारनिम्। वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणम्यहम् तन। 🎎 कवच :- ओंकार: पातु शीर्षो माँ, हीं बीज माँ, ह्रदयो। क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो सद ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो। कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो । 🚩 देवी महागौरी का ध्यान, स्त्रोत पाठ और कवच का पाठ करने से क्र सोमचक्र ’जाग्रत होता है जिससे संकट से मुक्ति मिलती है और धन, सम्पत्ति और श्री की वृध्दि होती है। इनका वाहन वृषभ है। 🚩👣🐯जय माता दी🐯👣🚩 🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊

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