Dr. Ratan Singh Mar 18, 2019

🎎🌷अर्धनारीश्वर नाम क्यों पड़ा 🌷🎎 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 🏵सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। 🎭तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। 🍥मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। 🌹इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं। 🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉

+143 प्रतिक्रिया 36 कॉमेंट्स • 8 शेयर
Dr. Ratan Singh Mar 18, 2019

🚩 🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🌸🍀🍥शुभ सोमवार🍥🍀🌸 🌻💦🕎सुप्रभात🕎💦🌻 🏵🐚💐ॐ गणेशाय नम💐🐚🏵 🎎जीवंत मैं, मैं ही ब्रह्म हूँ... सम्पूर्ण जगत हूँ, निरंजन हूँ... विकराल काल हूँ, मैं ही एक लघु पल हूँ... मैं ही अमर हूँ, और प्रतेक मृत्यु मैं ही मरता भी हूँ... 🌿महापर्वत मैं हूँ, सूक्ष्म छिद्र मैं हूँ... पृथ्वी मैं हूँ, आकाश भी मैं ही हूँ... बन्धन मैं हूँ, मुक्ति मैं हूँ... काल,,,कूट,,,विश और अमृत भी मैं हूँ... ज्ञान भी हूँ, अज्ञान भी हूँ... प्रकाश भी हूँ, अंधकार भी हूँ... दुविधा मैं हूँ, निर्णय भी मैं हूँ... शान्ति मैं और समस्त आशन्ति भी मैं हूँ... 🌸मैं ही ब्रह्मा, मैं ही नारायण... मैं महादेव हूँ...मैं शिव हूँ...🔱 🎎आप सभी पर सपरिवार बाबा काशी 🍥 🌿विश्वनाथ जी की कृपा सदा बनी रहे🕎 🌹आपका दिन शुभ और मंगलमय हो🙏 🌻सुप्रभात #🚩महादेव #🙏नमस्कार मित्रों 👏🌷नमस्कार जी🌷👏 🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊 🚩🌿🍑 ॐ हर हर महादेव 🍑🌿🚩 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨🎨

+330 प्रतिक्रिया 101 कॉमेंट्स • 46 शेयर
Dr. Ratan Singh Mar 17, 2019

🚩🌞सूर्य देवता की पौराणिक कथा 🌞🚩 🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍🎍 🎎विंध्या ने सूर्य का मार्ग रोका🎎 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲 🎡स्कंद महापुराण के काशी खंड में एक कथा वर्णित है कि त्रैलोक्य संचारी महर्षि नारद एक बार महादेव के दर्शन करने के लिए गगन मार्ग से जा रहे थें। मार्ग के बीच में उनकी दृष्टि उत्तुंग विंध्याद्रि पर केंद्रित हुई। ब्रह्मा के मानस पुत्र देवर्षि नारद को देखकर विंध्या देवी अति प्रसन्न हुई। तत्काल उनका स्वागत कर विंध्या ने देवर्षि को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। दवेमुति नारद ने आह्लादित होकर विंध्या को आशीर्वाद दिया। 🏵इसके बाद विंध्या ने यथोचित सत्कार करके नारद को उचित आसन पर बैठाया। यात्रा की थकान दूर करने के लिए उनके चरण दबाते हुए विंध्या ने कहा कि देवर्षि, मैंने सुना है कि मेरु पर्वत अहंकार के वशीभूत हो सर्वत्र यह प्रचार कर रहा है कि वही समस्त भूमंडल का वहन कर रहा है। हिमवंत गौरीदेवी के पिता हैं। इस कारण से उनको गिरिराज की उपाधि उपलब्ध हो गई है। कहा जाता है कि हिमगिरी में रत्नभंडार है और वह स्वर्णमय है, परंतु मैं इस कारण उसे अधिक महत्व नहीं देती। यह भी माना जाता है कि हिमवान पर अधिक संख्या में महात्मा और ऋषि, मुनि निवास करते हैं। इस कारण से भी मैं उनका अधिक आदर नहीं कर सकती। उनसे भी अधिक उन्नत पर्वतराज इस भूमंडल पर अनेक हैं। आप ही बताइए, इस संबंध में आपके क्या विचार हैं? 🌹देवर्षि मंदहास करके बोले, मैं तुम लोगों के बल-सामर्थ्य के बाबत अधिक नहीं जानता, परंतु इतना बता सकता हूं कि इसका निर्णय भविष्य ही कर सकता है। यह उत्तर देकर देवमुनि आकाश पथ पर अग्रसर हुए। नारद का उत्तर सुनकर विंध्या देवी मन-ही-मन खिन्न हो गई और अपनी मानसिक शांति खोकर सोचने लगी कि ज्ञाति के द्वारा किए गए अपमान को सहन करने की अपेक्षा मृत्यु ही उत्तम है। मेरु पर्वत की प्रशंसा मैं सुन नहीं सकती। इसके बाद ईष्या के वशीभूत हो विंध्या देवी सदा अशांत रहने लगी। क्रमश: निद्रा और आहार से वंचित हो वह दिन-प्रतिदिन दुर्बल होती गई। 🍥प्रतिकार की भावना से प्रेरित हो वह सोचती रह गई। अंत में वह एक निश्चय पर आ गई कि सूर्य भगवान प्रतिदिन मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा किया करते हैं। मैं ग्रह एवं नक्षत्रों के मार्ग को अवरुद्ध करते हुए आकाश की ओर बढ़ती जाऊंगी। तब तमाशा देखूंगी, किसकी ताकत कैसी है? इस निश्चय पर पहुंचकर विंध्या देवी आकाश की ओर बढ़ चली। बढ़ते-बढ़ते उसने सूर्य के आड़े रहकर उनके मार्ग को अवरुद्ध कर दिया। परिणामस्वरूप तीनों लोक सूर्य प्रकाश से वंचित रह गए और सर्वत्र अंधकार छा गया। समस्त प्राणी समुदाय तड़पने लगा। देवताओं ने व्याकुल होकर सृष्टिकर्ता से शिकायत की। ब्रह्मदेव को जब पता चला तो उन्होंने देवताओं को उपाय बताया कि पुत्रो सुनो, इस समय विंध्या और मेरु पर्वत के बीच बैर हो गया है। इस कारण से विंध्या ने सूर्य के परिभ्रमण के पथ को रोक रखा है। इस समस्या का समाधान केवल महर्षि अगस्त्य ही कर सकते हैं। इस समय वे काशी क्षेत्र में विश्वेश्वर के प्रति तपस्या में निमग्न हैं और तपोबल में वे अद्वितीय हैं। 🎭एक बार उन्होंने लोक कंटक वातापि और इलवल का मर्दन कर जगत् की रक्षा की थी। इस भूमंडल पर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं, जो उनसे भय न खाता हो। उस महानुभाव ने सागर को ही मथ डाला था। इसलिए तुम लोग उस महाभाग के आश्रय में जाकर उनसे प्रार्थना करो। तुम लोगों के मनोरथ की सिद्धि होगी। ब्रह्मदेव के मुंह से उपाय सुनकर देवता प्रसन्न हुए। वे उसी समय काशी नगरी पहुंचे। वहां पर देखा, महर्षि अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्रा समेत पर्ण-कुटी में तपस्या में लीन हैं। देवताओं ने भक्तिभाव से उन मुनि दम्पति को प्रणाम करके निवेदन किया कि महानुभाव! हम अपनी विपदा क्या बताएं? विंध्या पर्वत मेरु पर्वत के साथ शत्रु-भाव से उसका अपमान करने के लिए तैयार हैं। इसी आशय से उसने सूर्य पथ को रोक रखा है। विंध्या गगन की ओर गतिमान है। उसकी गति को रोकने की क्षमता केवल आप ही रखते हैं। आप कृपा करके सूर्य की परिक्रमा को यथावत् संपन्न करके तीनों लोकों की रक्षा कीजिए। यही मेरा आपसे सादर निवेदन है, देवगुरु बृहस्पति ने प्रार्थना की। 💐महर्षि अगस्त्य ने देवताओं की विपदा पर दया दिखाकर उन्हें अभय प्रदान किया। जगत के कल्याण के लिए महर्षि ने देवताओं को अभय तो प्रदान किया, परंतु उनका मन काशी नगरी और काशी के अधिष्ठाता देव विश्वेश्वर को छोड़ने को मानता न था। गंगा जी में स्नान किए बिना वे कभी पानी तक ग्रहण नहीं करते और विश्वेश्वर के दर्शन किए बिना वे पल-भर नहीं रह सकते। काशी को त्यागते हुए उनका मन विकल हो उठा। विवश होकर मन-ही-मन महादेव का स्मरण करते हुए सती समेत विंध्या देव ने दूर से ही महर्षि अगस्त्य को देखा। निकट आने पर उनके तमतमाए हुए मुखमंडल को देख विंध्या देवी नख से लेकर शिख तक कांप उठी। अपना मस्तक झुकाकर मुनि के चरणों में प्रणाम किया। मुनि को शांत करने के विचार से विनीत भाव से बोली कि महात्मा, आदेश दीजिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूं? 🎎विंध्या, तुम साधु प्रकृति की हो। स्थिर चित्त हो। मेरे स्वभाव से भी तुम भली-भांति परिचित हो। मैं दक्षिणापथ में जा रही हूं। तुम मेरे लौटने तक इसी प्रकार झुकी रहो, ऊपर उठने की चेष्टा न करो। यही मेरा आदेश है। यह कहकर महर्षि अगस्त्य ने विंध्या को आशीर्वाद दिया और दक्षिण दिशा की ओर निकल पड़े। दक्षिण में मुनि दम्पति ने पवित्र गोदावरी के तट पर अपना स्थिर निवास बनाया। किंतु विंध्या को इस बात का पता न था और वह अपना इसी इंतजार में समय काटने लगी कि महर्षि अगस्त्य शीघ्र ही लौट आनेवाले हैं। समय बीतता गया, परंतु महर्षि नहीं लौटे। विंध्या ने जो अपना मस्तक झुकाया, उसे अगस्त्य की प्रतीक्षा में झुकाए ही रखा। फिर क्या था, पूर्व दिशा में सूर्योदय हुआ और पश्चिमी दिशा में सूर्यास्त होता रहा। समस्त दिशाएं सूर्य के आलोक से दमक उठीं। प्राणी-समुदाय हर्षोल्लास से नाच उठा। जगत के कार्यकलाप यथावत् घटित होने लगे। 🚩सूर्यदेव #🏵पौराणिक कथा 🚩🌞ॐ सूर्यदेवाय नमः🌞🚩

+376 प्रतिक्रिया 133 कॉमेंट्स • 32 शेयर
Dr. Ratan Singh Mar 17, 2019

🌹🌿ॐ विष्णुदेवाय नमः🌿🌹 🚩🌞ॐ सूर्यदेवाय नमः🌞🚩 🌸🌲शुभ रविवार🌲🌸 🎎🍀आमलकी एकादशी🍀🎎 🌻🐚सुप्रभात🐚🌻 🎡पंचांग:- 🕉💐श्री गणेशाय नमः💐🕉 🎆दिनाँक ------ 17 मार्च 2019 🌷दिन -------- रविवार 🎡सम्वत -------- 2075 विरोधकृत नाम सम्वत्सर फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि पूरे दिन व रात्रि में8:51 बजे तक तत पश्चात द्वादशी तिथि 🌸नक्षत्र ------ पुष्य पूरे दिन व रात्रि में 12:11 बजे तक तत पश्चात आश्लेषा नक्षत्र 🍥योग ------- अतिगण्ड पूरे दिन व रात्रि में 1:04 बजे तक तत पश्चात सुकर्मा योग 🌋चन्द्रमा -------- कर्क राशि में पूरे दिन व रात्रि 🎨राहू काल ------- सायं काल 4:30 बजे से 6 बजे तक 🎍आज ------- भद्रा(भूलोक) में दिन में 10:12 से रात्रि में 8:51 बजे तक रहेगी, भद्रा काल मे कोई शुभ कार्य प्रारंभ नही करना चाहिए, 🌹आज आमलकी एकादशी व्रत हैं सभी का हैं, 🎎आज रंगभरी एकादशी हैं, 🎭 आज मथुरा, वृंदावन, बरसाने में श्री राधा कृष्ण जी का होली ,रंग उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता हैं, 🐚आज एकादशी तिथि में श्रीहरि विष्णुजी की आराधना करने का विशेष महत्व है, अतः सभी को दूध , जल, केसर, शहद आदि मिलाकर श्री शालिग्राम जी को स्नान कराके केसरयुक्त मलयागिरि चन्दन के साथ तुलसीदल अर्पित करके सुगन्धित पुष्प अर्पित करके फल, मिठाई का भोग निवेदित करना चाहिए, तत पश्चात शुद्ध घी से दीपक बनाकर आरती करना चाहिए, एवम श्री विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए, 🏵आज एकादशी तिथि को चावल का प्रयोग भोजन में नही करना चाहिए, 🙏आप सभी पर श्री विष्णु हरि और भगवान श्री सूर्यदेव जी की कृपा दृष्टि हमेसा बनी रहे🏵 👏आप आपके पूरे परिवार को शुभ रविवार आमलकी एकादशी एवं रंगभरी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं🙏 🎭आपका रविवार का दिन शुभ खूबसूरतऔरमंगलमय हो🙏 🌹🌿🚩ॐ विष्णुदेवाय नमः🚩🌿🌹 🚩🌿🌞ॐ सूर्यदेवाय नमः🌞🌿🚩 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉

+154 प्रतिक्रिया 34 कॉमेंट्स • 48 शेयर