🔱🌿🚩ॐ नमः शिवाय🚩🌿🔱 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🚩🌫️💐जय मां गंगे 💐🌫️🚩 🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️🏔️ 🎎🥦🪔शुभ गंगा दशहरा🪔🥦🎎 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋 🙏🔯💦शुभ सोमवार💦🔯🙏 🌹🌹🌹🌹🌹🌹❤️🌹🌹🌹 🥀🌲🌻सुप्रभात🌻🌲🥀 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ 🙏आपको सपरिवार को मां गंगा अवतरण अर्थात गंगा दशहरा व शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🙏 🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿🧿 🎎आप और आपके संपूर्ण परिवार पर मां गंगा और भोलेनाथ की आशीर्वाद हमेशा बनी रहे और सभी मनोकानाएं पूर्ण हो🌹 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 👏आपका गंगा दशहरा सोमवार का दिन शुभ शांतिमय ममतामय शिवमय और मंगलमय हो🔯 🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲 🎎गंगा मैय्या की आरती, हर हर गंगे, जय मां गंगे🎎 ***************************************** 🔱हर हर गंगे, जय मां गंगे, हर हर गंगे, जय मां गंगे ॥ 🧿ओम जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता । जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥ चंद्र सी जोत तुम्हारी, जल निर्मल आता । शरण पडें जो तेरी, सो नर तर जाता ॥ ॥ ओम जय गंगे माता..॥ 💐पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता । कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता ॥ ॥ ओम जय गंगे माता..॥ 🌺एक ही बार जो तेरी, शारणागति आता । यम की त्रास मिटा कर,परमगति पाता ॥ ॥ ओम जय गंगे माता..॥ 🪔आरती मात तुम्हारी, जो जन नित्य गाता । दास वही सहज में, मुक्त्ति को पाता ॥ ॥ ओम जय गंगे माता..॥ 🌹ओम जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता । जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥ ओम जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता । 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🙏🚩हर हर गंगे जय मां गंगे🚩🙏 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦

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🎎गंगा दशहरा अर्थात गंगावतरणकी पौराणिक कथा🎎 ******************************************** 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🌹इस वर्ष 1 जून 2020, सोमवार को गंगा दशहरा मनाया जाएगा। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी 'गंगा' स्वर्ग से अवतरित हुई थीं। गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के पर्व को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है।गंगा मैया हम भारतवासियों के लिए देवलोक का महाप्रसाद हैं। मां गंगा हम भारतीयों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोती हैं। हमारे यहां मृत्यु से ठीक पूर्व गंगा जल की कुछ बूंदें मुंह में डालना मोक्ष का पर्याय माना जाता है। इसके जल में स्नान करने से जीवन के सभी संतापों से मुक्ति मिलती हैं। गंगा दशहरा तन के साथ-साथ मन की शुद्धि का पर्व भी है,इसलिए इस दिन गंगा जी में खड़े होकर अपनी पूर्व में की हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगनी चाहिए और भविष्य में कोई भी बुरा कार्य नहीं करने का संकल्प लेना चाहिए। 🎎आइए गंगा दशहरा के पावन पर्व पर जाने गंगा दशहरा अर्थात गंगावतरण की पौराणिक कथा🎎 ☸️भारतवर्ष के पौराणिक राजवंशों में सबसे प्रसिद्ध राजवंश इक्ष्‍वाकु कुल है। इस कुल की अट्ठाईसवीं पीढ़ी में राजा हरिश्‍चन्द्र हुए, जिन्‍होंने सत्‍य की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया । इसी कुल की छत्‍तीसवीं पीढ़ी में अयोध्या में सगर नामक महाप्रतापी , दयालु, धर्मात्‍मा और प्रजा हितैषी राजा हुए। गर अर्थात विष के साथ पैदा होने के कारण वह सगर कहलाए। सगर का शाब्दिक अर्थ होता है विष के साथ जल। हैहय वंश के कालजंघ ने सगर के पिता वाहु को एक संग्राम में पराजित कर दिया था। राज्‍य से हाथ धो चुके वाहु अग्नि और्व ऋषि के आश्रम चले गए। इसी समय वाहु के किसी दुश्‍मन ने उनकी पत्‍नी को विष खिला दिया। जब उन्‍हें जहर दिया गया उस समय वह गर्भवती थी। ऋषि और्व को जब यह पता चला तो उन्‍होंने अपने प्रयास से वाहु की पत्‍नी को विषमुक्‍त कर उसकी जान बचा ली। इस प्रकार भ्रूण की रक्षा हुई और समय पर सगर का जन्‍म हुंआ। विष को गरल कहते हैं। चूकिं बालक का जन्म गरल के साथ हुआ था इस लिए वह स+गर= सगर कहलाया। सगर के पिता वाहु का और्व ऋषि के आश्रम में ही निधन हो गया। 🥀सगर बड़े होकर काफी बलशाली और पराक्रमी हुए। उन्‍होंने अपने पिता का खोया हुआ राज्‍य वापस अपने बल और पराक्रम से जीता। इस प्रकार सगर ने हैहयों को जीत कर अपने पिता की हार का बदला लिया। सातों समुद्रों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया और सगर चक्रवर्ती सम्राट बने। अपने गुरूदेव और्व की आज्ञा मानकर उन्‍होंने तालजंघ, यवन, शक, हैहय और बर्बर जाति के लोगों का वध न कर उन्‍हें विरूप बना दिया। कुछ के सिर मुँड़वा दिए, कुछ की मूँछ या दाढ़ी रखवा दी। कुछ को खुले बालों वाला रखा तो कुछ का आधा सिर मुँड़वा दिया। किसी को वस्‍त्र ओढ़ने की अनुमति दी, पहनने की नहीं और कुछ को केवल लँगोटी पहनने को कहा। संसार के अनेक देशों में इस प्रकार की परम्परा प्राचीन काल में प्रचलित थी । कहीं-कहीं इनकी झलक आज भी दिखती है। भारतीय पौराणिक इतिहास की सबसे महत्‍वपूर्ण कथा गंगावतरण, जिसके द्वारा भारतवर्ष की धरती पवित्र हुई, इन राजा सगर से सम्बन्धित है। 🎎ऋषि अग्नि और्व हैहयों के परम्परागतगत शत्रु थे। उन्‍होंने भी सगर को हैहयों के विरूद्ध संग्राम में हर प्रकार की सहायता प्रदान की। सगर की दो पत्‍नियां थी वैदर्भी और शैव्या। कुछ पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार उनकी पत्नियों का नाम केशिनी तथा सुमति है ।राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर भगवान शंकर की कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है। अतएव मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम्हारी एक रानी के साठ हजार पुत्र होंगे किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही सन्तान होगा। 💐वैदभी (केशिनी) के गर्भ से मात्र एक पुत्र था उसका नाम था असमंज। वह बड़ा ही दुष्‍ट और प्रजा को दुख पहुँचाने वाला था । जबकि सगर अत्यन्त ही धार्मिक सहिष्‍णु और उदार व्यक्तित्व के स्वामी थे। सगर के लिए असमंज का व्‍यवहार बड़ा ही कष्ट देने वाला साबित हो रहा था। जब उसकी आदतें नहीं सुधरी तो सगर ने असमंज को त्‍याग दिया। असमंज के औरस से अंशुमान का जन्‍म हुआ। वह बहुत ही पराक्रमी था। अंशुमान ने अश्‍वमेघ और राजसूय यज्ञ सम्‍पन्‍न कराया और राजर्षि की उपाधि प्राप्‍त की। शैव्‍या (सुमति) के गर्भ से साठ हजार पुत्र उत्‍पन्‍न हुए। सभी काफी वीर और पराक्रमी थे। उनके ही बल पर सगर ने मध्‍यभारत में एक विशाल साम्राज्‍य की स्‍थापना की । सगर न सिर्फ बाहुबली और पराक्रमी थे, बल्कि धार्मिक प्रकृति के व्‍यक्ति भी थे। वे ऋषियों महर्षियों का काफी आदर सत्‍कार और सम्‍मान किया करते थे। वशिष्‍ठ मुनि ने सगर को सलाह दी की अश्‍वमेघ यज्ञ का अनुष्‍ठान करें ताकि उनके साम्राज्‍य का विस्तार हो। 🧿 पौराणिक मान्यतानुसार प्राचीन काल में किए जाने वाले यज्ञानुष्‍ठानों में अश्‍वमेघ यज्ञ और राजसूय यज्ञ सर्वश्रेष्‍ठ यज्ञ माने जाते थे। उन दिनों बड़े व प्रतापी और पराक्रमी सम्राट ही अश्‍वमेघ यज्ञ का आयोजन किया करते थे। इस यज्ञ में निन्यान्ब्बे यज्ञ सम्‍पन्‍न होने पर एक बहुत अच्‍छे गुणों वाले घोड़े पर जयपत्र बाँध कर राजा सगर ने छोड़ दिया । उस पत्र पर लिखा था कि घोड़ा जिस जगह से गुजरेगा वह राज्‍य यज्ञ करने वाले राजा सगर के अधीन माना जाएगा। जो राजा या जगह स्‍वामी अधीनता स्‍वीकार नहीं करना चाहते , वे उस घोड़े को रोक कर युद्ध हेतु तैयार रहें । घोड़े के साथ हजारों सैनिक साथ-साथ चल रहे थे। एक वर्ष पूरा होने पर उस घोड़ा वापस लौट आना था। इसके बाद ही यज्ञ की पूर्णाहुति सम्भव थी। महाराजा सगर ने अपने यज्ञ के घोड़े श्यामकर्ण की सुरक्षा के लिए हजारो सैनिकों की व्‍यवस्‍था की थी। वीर बाहुबलि सैनिक घोडे़ के साथ निकले, और आगे बढ़ते रहे। सगर का प्रताप चतुर्दिक फैल रहा था। जगह जगह उनके बल-पराक्रम और शौर्य की चर्चा होने लगी। 🎎इससे देवाधिपति देवराज इन्‍द्र को शंका हुई। सगर के इस अश्वमेघ यज्ञ से भयभीत होकर इन्‍द्र यह सोचने लगे कि अगर यह अश्‍वमेघ यज्ञ सफल हो गया तो यज्ञ करने वाले को स्‍वर्गलोक का राजपाट मिल जाएगा। इन्‍द्र ने यज्ञ के घोड़े को अपने मायाजाल के बल पर चुरा लिया। इतना ही नहीं उन्‍होंने इस घोड़े को पाताललोक में तपस्‍यारत महामुनि कपिल के आश्रम में छिपा दिया। उस समय मुनि गहन साधना में लीन थे। फलतः उन्‍हें पता ही नहीं लगा कि क्‍या हो रहा है? एक साल पूरा होने को जब आया तो घोड़ा को लौटते न देखकर सगर चिन्‍तित हो उठे। 🌹राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को यज्ञ के घोड़े की खोज कर लाने का आदेश दिया। ये पुत्र यज्ञ के घोड़े की खोज में निकल पड़े।सारा भूमण्डल छान मारा फिर भी अश्वमेध का अश्व नहीं मिला। फिर राजा सगर के सुमति से उत्पन्न साठ हजार पुत्र अश्व को खोजते-खोजते जब कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचे तो वहाँ उन्होंने देखा कि सांख्‍य दर्शन के प्रणेता और भगवान् के अंशावतार साक्षात भगवान महर्षि कपिल के रूप में तपस्या कर रहे हैं और उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है। कपिल के आश्रम में कपिला गाय कामधेनु थी, जो मनचाही वस्‍तु प्रदान कर सकती थी। यज्ञ के अश्व को वहीँ पर बंधा और चरता हुआ देख सगर के पुत्र उन्हें देखकर चोर-चोर शब्द कर तिरस्कृत, अपमानित और शोर –गुल करने लगे। इससे महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्योंही महर्षि ने अपने नेत्र खोले त्योंही सुमति के साठ हजार पुत्र सब जलकर भस्म हो गए। 💦यज्ञाश्व के नहीं मिलने से चिन्तित राजा सगर की आज्ञा से उनका पौत्र अंशुमान घोड़ा ढूँढ़ने निकला और खोजते हुए प्रदेश के किनारे चलकर कपिल मुनि के आश्रम में साठ हजार प्रजाजनों की भस्‍म के पास यज्ञ के घोड़े को देखा। अपने पितृव्य चरणों को खोजता हुआ राजा सगर का पौत्र अंशुमान जब मुनि के आश्रम में पहुँचे तो अंशुमान को महात्मा गरुड़ ने उनके पूर्वजों के भस्म होने का सारा वृतान्त कह सुनाया। गरुड़ ने यह भी बताया कि यदि इन सबकी मुक्ति चाहते हो तो🌹 गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाना पड़ेगा। इस समय अश्व को ले जाकर अपने पितामह के यज्ञ को पूर्ण कराओ, उसके बाद यह कार्य करना।इस पर अंशुमान ने महर्षि कपिल की स्तुति और प्रार्थना की । अंशुमान की स्‍तुति से कपिल मुनि ने वह यज्ञ-पशु उसे दे दिया, जिससे सगर के यज्ञ की शेष क्रिया पूर्ण हुई। कपिल मुनि ने कहा, स्‍वर्ग की गंगा जब यहॉं आएगी तब भस्‍म हुए साठ हजार तुम्हारे पूर्वजों को मुक्ति मिलेगी । अंशुमान ने घोड़े सहित यज्ञमण्डप पर पहुँचकर सगर से सब वृतांत कह सुनाया। 🎎 महर्षि कपिल की आज्ञानुसार अंशुमान ने स्‍वर्ग की गंगा को भारतभूमि में लाने की कामना से घोर तपस्‍या की। उनका और उनके पुत्र दिलीप का संपूर्ण जीवन इसमें लग गया, परन्तु उन्हें इस कार्य में सफलता न मिली। महाराज सगर की मृत्यु के उपरान्त अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप जीवन पर्यन्त तपस्या करके भी गंगा को मृत्युलोक में लाने में सफल न हो सके। सगर के वंश में अनेक राजा हुए सभी ने अपने साठ हज़ार पूर्वजों की भस्मी-पहाड़ को गंगा के प्रवाह के द्वारा पवित्र करने का भरसक प्रयत्न किया किन्तु इस कार्य में वे सफल न हुए। तत्पश्चात दिलीप के पुत्र भगीरथ ने यह बीड़ा उठाया और गंगा को इस लोक में लाने के लिए गोकर्ण तीर्थ में जाकर कठोर तपस्या की । तपस्या करते-करते कई वर्ष व्यतीत हो जाने पर उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने वरदान माँगने को कहा तो भागीरथ ने अपने पूर्वजों और पृथ्वीलोक के कल्याण हेतु गंगा की माँग की। वरदान में भागीरथ के गंगा माँगने पर ब्रह्मा ने कहा- राजन! तुम गंगा को पृथ्वी पर तो ले जाना चाहते हो , परन्तु स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरते समय गंगा के वेग को सम्भालेगा कौन? क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी?’ ब्रह्मा ने आगे यह भी कहा कि भूलोक में गंगा का भार एवं वेग संभालने की शक्ति केवल भगवान शिव में है। 🌺इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग को सम्भालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए। महाराज भागीरथ ने वैसा ही किया और एक अंगूठे के बल पर खड़ा होकर भगवान शिव की आराधना की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटा में सम्भालने के लिए हामी भर दी । तब ब्रह्मा ने गंगा की धारा को अपने कमण्डल से छोड़ा और भगवान शिव ने प्रसन्न होकर गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेट कर जटाएँ बांध लीं। गंगा देवलोक से छोड़ी गईं और शंकर जी की जटा में गिरते ही विलीन हो गईं। गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका। गंगा को ऐसा अहंकार था कि मैं शंकर की जटाओं को भेदकर रसातल में चली जाऊंगी। 👩‍❤️‍👨पौराणिक कथाओं के अनुसार गंगा शंकर जी की जटाओं में कई वर्षों तक भ्रमण करती रहीं लेकिन उसे निकलने का कहीं मार्ग ही न मिला। अब महाराज भागीरथ को और भी अधिक चिन्ता हुई।उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की प्रसन्नतार्थ घोर तप शुरू किया। अनुनय -विनय करने पर शिव ने प्रसन्न होकर गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया। इस प्रकार शिव की जटाओं से छूटकर गंगा हिमालय में ब्रह्मा के द्वारा निर्मित बिन्दुसर सरोवर में गिरी, उसी समय इनकी सात धाराएँ हो गईं। 🎎 आगे-आगे भागीरथ दिव्य रथ पर चल रहे थे, पीछे -पीछे सातवीं धारा गंगा की चल रही थी। 🌫️पृथ्वी पर गंगा के आते ही हाहाकार मच गया। जिस रास्ते से गंगा जा रही थीं, उसी मार्ग में ऋषिराज जहु का आश्रम तथा तपस्या स्थल पड़ता था। तपस्या में विघ्न समझकर वे गंगा को पी गए। फिर देवताओं के प्रार्थना करने पर उन्हें पुन: जांघ से निकाल दिया। तभी से गंगा जाह्नवी कहलाईं। 🔯 इस प्रकार अनेक स्थलों का तरन-तारन करती हुई जाह्नवी ने कपिल मुनि के आश्रम में पहुँचकर सगर के साठ हज़ार पुत्रों के भस्मावशेष को तारकर उन्हें मुक्त किया। उसी समय ब्रह्मा ने प्रकट होकर भागीरथ के कठिन तप तथा सगर के साठ हज़ार पुत्रों के अमर होने का वरदान दिया। साथ ही यह भी कहा कि तुम्हारे ही नाम पर गंगा का नाम भगीरथी होगा। अब तुम अयोध्या में जाकर अपना राज-काज संभालो । 💐ऐसा कहकर ब्रह्मा अन्तर्ध्यान हो गए। इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगावतरण करके बड़े भाग्यशाली हुए। उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया। भगीरथ लम्बी अवधी तक पुत्र लाभ प्राप्त कर तथा सुखपूर्वक राज्य भोगकर परलोक गमन कर गए। युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है। गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं वरन मुक्ति भी देती है । 🧿पुरातन ग्रंथों के अनुसार भारतवर्ष के उत्तर में खडा यह हिमालय पर्वत (कैलाश) शिव का निवास है, और शिव के फैले हुए जटाजूट उसकी पर्वत-श्रेणियॉं हैं। त्रिविष्‍टप ( आधुनिक तिब्‍बत) को प्राचीन काल में स्‍वर्ग, अपवर्ग आदि नामों से पुकारा जाता था । उनके बीच स्थित है मानसरोवर झील, जिसकी यात्रा महाभारत काल में पाण्डवों ने सशरीर स्‍वर्गारोहण के लिए की थी । 🌫️ इस झील से प्रत्‍यक्ष तीन नदियॉं निकलती हैं। ब्रह्मपुत्र पूर्व की ओर बहती है, सिन्धु उत्‍तर-पश्चिम और सतलुज (शतद्रु) दक्षिण-पश्चिम की ओर। गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के कार्य में अर्थात गंगावतरण के द्वारा यह स्‍वर्ग का जल उत्‍तराखण्ड की प्‍यासी धरती को देने का , पहुँचाने की तकनीकी का आभियान्त्रिक अर्थात इंजीनियरिंग के सफलीभूत प्रयोग का अभूतपूर्व कमाल होना था । इसके लिए पूर्व की अलकनन्दा की घाटी अपर्याप्‍त थी। परन्तु राजा सगर के वंशजों द्वारा लम्बी अवधि तक धैर्यपूर्वक किया गया यह साहसिक कार्य 🥀अंशुमान के पौत्र भगीरथ के समय में पूर्ण हुआ, जब हिमालय के गर्भ से होता हुआ मानसरोवर अर्थात स्‍वर्ग का जल गोमुख से फूट निकला। गंगोत्री के प्रपात द्वारा भागीरथी एक गहरे खड्ड में बहती है, जिसके दोनों ओर सीधी दीवार सरीखी चट्टानें खड़ी हैं। किम्बदन्ती के अनुसार गंगा का वेग शिव की जटाजूट ने सँभाला। गंगा उसमें खो गई, उसका प्रवाह कम हो गया। जब वहॉं से समतल भूमि पर निकली तो भगीरथ आगे-आगे चले। गंगा उनके दिखाए मार्ग से उनके पीछे -पीछे चलीं। 🏵️आज भी गंगा को प्रयाग तक देखने से उसके तट पर कोई बड़े कगार नहीं मिलते । मानो यह मनुष्‍य निर्मित नगर हो । ऐसा उसका मार्ग यम की पुत्री यमुना की नील, गहरे कगारों के बीच बहती धारा से वैषम्‍य उपस्थित करता है। प्रयाग में यमुना से मिलकर गंगा की धारा अंत में गंगासागर, जिसे महोदधि भी कहा जाता है, में मिल गई। राजा सगर का स्‍वप्‍न साकार हुआ। उनके द्वारा खुदवाया गया सागर भर गया और उत्‍तरी भारतवर्ष में पुन: प्रसन्नता छा गई ।गौर से देखने से ऐसा परिलक्षित होता है कि आज का भारतवर्ष और भारतीयों की प्रसन्नता सचमुच गंगा की ही देन है। मनुष्यों को मुक्ति देने वाली अतुलनीय गंगा नदी का पृथ्वी पर अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हुआ था ।संसार की सर्वाधिक पवित्र नदी गंगा के पृथ्वी पर आने अर्थात अवतरित होने का पर्व गंगा दशहरा है । वैसे तो प्रतिदिन ही पापमोचनी, स्वर्ग की नसैनी गंगा का स्नान एवं पूजन पुण्यदायक है और प्रत्येक अमावस्या एवं अन्य पर्वों पर भक्तगण दूर-दूर से आकर गंगा में स्नान-ध्यान, नाम-जप-स्मरण कर मोक्ष प्राप्ति की कामना करते हैं , परन्तु गंगा दशहरा के दिन गंगा में स्नान-ध्यान, दान, तप, व्रतादि की अत्यंत महिमा पुराणिक ग्रन्थों में गायी गई है । 🙏🚩जय मां गंगा🚩🙏 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️🌫️

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🚩🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🏹🌿🚩श्री शिव लिंगाष्टकम🚩🌿🏹 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🔱🌼🚩श्री शिव लिंग 🚩🌼🔱 ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ ✳️🎇🌺 शुभ सोमवार 🌺🎇✳️ 🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦🥦 💐🌲🌻सुप्रभात🌻🌲💐 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 🙏शिवमय सोमवार आपका मंगलमय हो 🙏 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 🎭 लिंगाष्टकम भगवान भोलेनाथ के लिंगस्वरूप की स्तुति कर भोलेनाथ करने का उत्तम अष्टक है, जो कोई भक्त पूर्ण आस्था तथा श्रृद्धा सहित भोले बाबा के लिंगाष्टकम का पाठ करेगा उसकी सभी मनोकामना तथा इच्छाओं की पूर्ति स्वयं शिव शंकर करते हैं, श्री शिव लिंगाष्टकम अर्थ सहित इस प्रकार है:- 🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹🏹 🚩 ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम् निर्मलभासित शोभित लिंगम्। जन्मज दुःख विनाशक लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥1॥ भावार्थः- जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, जो संसार के संहारक है और जन्म और मृत्यु के दुखो का विनाश करते है ऐसे भगवान आशुतोष को नित्य निरंतर प्रणाम है | 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🔱 देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम् कामदहन करुणाकर लिंगम्। रावणदर्प विनाशन लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥ भावार्थः- भगवान सदाशिव जो मुनियों और देवताओं के परम आराध्य देव हैं, तथा देवो और मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं, जो काम (वह कर्म जिसमे विषयासक्ति हो) का विनाश करते हैं, जो दया और करुना के सागर है तथा जिन्होंने लंकापति रावन के अहंकार का विनाश किया था, ऐसे परमपूज्य महादेव के लिंग रूप को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ | 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋 🎎 सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम् बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्। सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥ भावार्थः- लिंगमय स्वरूप जो सभी तरह के सुगन्धित इत्रों से लेपित है, और जो बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी लिंग स्वरुप को प्रणाम है | 🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔🔔 🌹 कनक महामणि भूषित लिंगम् फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् । दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥ भावार्थः- लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, जो चारों ओर से सर्पों से घिरे हुए है, तथा जिन्होंने प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) के यज्ञ का विध्वस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को बारम्बार प्रणाम | 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🔔 कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम् पंकज हार सुशोभित लिंगम् । सञ्चित पाप विनाशन लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥ भावार्थः- देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ | 🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇🎇 🏹 देवगणार्चित सेवित लिंगम् भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्। दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥ भावार्थः- जो सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रृद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है, जो हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को प्रणाम है | 🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊🎊 🚩 अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम् सर्व समुद्भव कारण लिंगम्। अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥ भावार्थः- जो पुष्प के आठ दलों (कलियाँ) के मध्य में विराजमान है, जो सृष्टि में सभी घटनाओं (उचित-अनुचित) के रचियता हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ | 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🔱 सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम् सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्। परात्परं परमात्मक लिंगम् तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥ भावार्थः- जो देवताओं के गुरुजनों तथा सर्वश्रेष्ठ देवों द्वारा पूजनीय है, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से कि जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका न आदि है और न ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ | 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 🎎 लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ । शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥ भावार्थः- जो कोई भी इस लिंगाष्टकम को शिव या शिवलिंग के समीप श्रृद्धा सहित पाठ करेगा उसको शिवलोक प्राप्त होता है तथा भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है | 🔱🌿🌹ॐ नमः शिवाय🌹🌿🔱 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉

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🚩🌿🔱ॐ नमः शिवाय 🔱🌿🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🚩🔔🌺 जय माता दी 🌺🔔🚩 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ 🎎शुभ वट सावित्री व्रत🎎 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿 💐🌲🍑शुभ शुक्रवार🍑🌲💐 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥 🚩🌿🌹श्री शनिदेव जयंती🌹🌿🚩 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ 🌻❇️🌺सुप्रभात🌺❇️🌻 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 👏आपको सपरिवार श्री शनिदेव जयंती और अखंड सौभाग्य का व्रत वट सावित्री एवं कृष्ण अमावस्या की हार्दिक शुभकामनाएं जी🙏 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 *भावनायें ही तो है जो दूर रहकर भी * *अपनों की नज़दीकियों का* *अहसास कराती हैं* *वर्ना दूरी तो दोनों आँखों के बीच भी है।* 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🎎आप और आपके पूरे परिवार पर बाबा भोलनाथ ,श्री शनिदेव महाराज और माता रानी की आशिर्वाद निरंतर बनी रहे और सभी मनोकमनाएं पूर्ण हो🌹 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ 🍑आपका शुक्रवार का दिन शुभ सुंदर शांतिमय और मंगलमय व्यतिय हो 🌋 ❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️❇️ 🚩🌿🔱ओम नमः शिवाय 🔱🌿🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾

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🎎🌲🚩वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा🚩🌲🎎 ==================================== 🚩🌲🌹जय मां महालक्षमी🌹🌲🚩 ⚜️🎇🍑शुभ शुक्रवार🍑🎇⚜️ 🌼🌴🌻सुप्रभात🌻🌴🌼 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋 🎎वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा🎎 ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ 💐पूजा-उपासना तो जैसे भारतवासियों की सांसों में बसा हुआ है. शायद की ऐसा कोई दिन गुजरता होगा, जब कोई खास पूजा का संयोग न बनता हो. सप्ताह के हर दिन के अनुसार भी विशेष पूजा का विधान है. शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का व्रत रखा जाता है. इसे 'वैभव लक्ष्मी व्रत' भी कहा जाता है. 🌹 वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथावैभव लक्ष्मी पूजा-उपासना तो जैसे भारतवासियों की सांसों में बसा हुआ है. शायद की ऐसा कोई दिन गुजरता होगा, जब कोई खास पूजा का संयोग न बनता हो. सप्ताह के हर दिन के अनुसार भी विशेष पूजा का विधान है. शुक्रवार को लक्ष्मी देवी का व्रत रखा जाता है. इसे 'वैभव लक्ष्मी व्रत' भी कहा जाता है. इस व्रत को स्त्री या पुरुष, कोई भी कर सकता है. इस व्रत को करने से उपासक को धन और सुख-समृ्द्धि की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में लक्ष्मी का वास बनाए रखने के लिए भी यह व्रत उपयोगी है. इस दिन स्त्री-पुरुष लक्ष्मी की पूजा करते हुए सफेद फूल, सफेद चंदन आदि से पूजा करते हैं. खीर से भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं. इस व्रत के दिन उपासक को एक समय भोजन करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति माता वैभव लक्ष्मी का व्रत करने के साथ ही लक्ष्मी श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी नियमित रूप से पूजा करता है, तो उसके व्यापार में वृ्द्धि ओर धन में बढोतरी होती है. ✍️ वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा: किसी शहर में अनेक लोग रहते थे. सभी अपने-अपने कामों में लगे रहते थे. किसी को किसी की परवाह नहीं थी. भजन-कीर्तन, भक्ति-भाव, दया-माया, परोपकार जैसे संस्कार कम हो गए. शहर में बुराइयां बढ़ गई थीं. शराब, जुआ, रेस, व्यभिचार, चोरी-डकैती वगैरह बहुत से गुनाह शहर में होते थे. इनके बावजूद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे. ऐसे ही लोगों में शीला और उनके पति की गृहस्थी मानी जाती थी. शीला धार्मिक प्रकृति की और संतोषी स्वभाव वाली थी. उनका पति भी विवेकी और सुशील था. शीला और उसका पति कभी किसी की बुराई नहीं करते थे और प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे. शहर के लोग उनकी गृहस्थी की सराहना करते थे. देखते ही देखते समय बदल गया. शीला का पति बुरे लोगों से दोस्ती कर बैठा. अब वह जल्द से जल्द करोड़पति बनने के ख्वाब देखने लगा. इसलिए वह गलत रास्ते पर चल पड़ा फलस्वरूप वह रोडपति बन गया. यानी रास्ते पर भटकते भिखारी जैसी उसकी हालत हो गई थी. शराब, जुआ, रेस, चरस-गांजा वगैरह बुरी आदतों में शीला का पति भी फंस गया. दोस्तों के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई. इस प्रकार उसने अपना सब कुछ रेस-जुए में गंवा दिया. शीला को पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ, किन्तु वह भगवान पर भरोसा कर सबकुछ सहने लगी. वह अपना अधिकांश समय प्रभु भक्ति में बिताने लगी. अचानक एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी. शीला ने द्वार खोला तो देखा कि एक माँजी खड़ी थी. उसके चेहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था. उनकी आँखों में से मानो अमृत बह रहा था. उसका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलक रहा था. उसको देखते ही शीला के मन में अपार शांति छा गई. शीला के रोम-रोम में आनंद छा गया. शीला उस माँजी को आदर के साथ घर में ले आई. घर में बिठाने के लिए कुछ भी नहीं था. अतः शीला ने सकुचाकर एक फटी हुई चद्दर पर उसको बिठाया. मांजी बोलीं- क्यों शीला! मुझे पहचाना नहीं? हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन के समय मैं भी वहां आती हूं.' इसके बावजूद शीला कुछ समझ नहीं पा रही थी. फिर मांजी बोलीं- 'तुम बहुत दिनों से मंदिर नहीं आईं अतः मैं तुम्हें देखने चली आई.' मांजी के अति प्रेमभरे शब्दों से शीला का हृदय पिघल गया. उसकी आंखों में आंसू आ गए और वह बिलख-बिलखकर रोने लगी. मांजी ने कहा- 'बेटी! सुख और दुःख तो धूप और छाँव जैसे होते हैं. धैर्य रखो बेटी! मुझे तेरी सारी परेशानी बता.' मांजी के व्यवहार से शीला को काफी संबल मिला और सुख की आस में उसने मांजी को अपनी सारी कहानी कह सुनाई. कहानी सुनकर माँजी ने कहा- 'कर्म की गति न्यारी होती है. हर इंसान को अपने कर्म भुगतने ही पड़ते हैं. इसलिए तू चिंता मत कर. अब तू कर्म भुगत चुकी है. अब तुम्हारे सुख के दिन अवश्य आएँगे. तू तो माँ लक्ष्मीजी की भक्त है. माँ लक्ष्मीजी तो प्रेम और करुणा की अवतार हैं. वे अपने भक्तों पर हमेशा ममता रखती हैं. इसलिए तू धैर्य रखकर माँ लक्ष्मीजी का व्रत कर. इससे सब कुछ ठीक हो जाएगा.' शीला के पूछने पर मांजी ने उसे व्रत की सारी विधि भी बताई. मांजी ने कहा- 'बेटी! मां लक्ष्मीजी का व्रत बहुत सरल है. उसे 'वरदलक्ष्मी व्रत' या 'वैभव लक्ष्मी व्रत' कहा जाता है. यह व्रत करने वाले की सब मनोकामना पूर्ण होती है. वह सुख-संपत्ति और यश प्राप्त करता है.' शीला यह सुनकर आनंदित हो गई. शीला ने संकल्प करके आँखें खोली तो सामने कोई न था. वह विस्मित हो गई कि मांजी कहां गईं? शीला को तत्काल यह समझते देर न लगी कि मांजी और कोई नहीं साक्षात्‌ लक्ष्मीजी ही थीं. दूसरे दिन शुक्रवार था. सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया. आखिरी में प्रसाद वितरण हुआ. यह प्रसाद पहले पति को खिलाया. प्रसाद खाते ही पति के स्वभाव में फर्क पड़ गया. उस दिन उसने शीला को मारा नहीं, सताया भी नहीं. शीला को बहुत आनंद हुआ. उनके मन में 'वैभवलक्ष्मी व्रत' के लिए श्रद्धा बढ़ गई. शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक 'वैभवलक्ष्मी व्रत' किया. इक्कीसवें शुक्रवार को माँजी के कहे मुताबिक उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को 'वैभवलक्ष्मी व्रत' की सात पुस्तकें उपहार में दीं. फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है. हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो. हमारा सबका कल्याण करो. जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना. कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना. सभी को सुखी करना. हे माँ! आपकी महिमा अपार है.' ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को प्रणाम किया. व्रत के प्रभाव से शीला का पति अच्छा आदमी बन गया और कड़ी मेहनत करके व्यवसाय करने लगा. उसने तुरंत शीला के गिरवी रखे गहने छुड़ा लिए. घर में धन की बाढ़ सी आ गई. घर में पहले जैसी सुख-शांति छा गई. 'वैभवलक्ष्मी व्रत' का प्रभाव देखकर मोहल्ले की दूसरी स्त्रियां भी विधिपूर्वक 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने लगीं. 🎎 'वैभव लक्ष्मी व्रत' उद्यापन विधि: सात, ग्यारह या इक्कीस, जितने भी शुक्रवारों की मन्नत माँगी हो, उतने शुक्रवार ‍तक यह व्रत पूरी श्रद्धा तथा भावना के साथ करना चाहिए. आखिरी शुक्रवार को इसका शास्त्रीय विधि के अनुसार उद्यापन करना चाहिए. आखिरी शुक्रवार को प्रसाद के लिए खी‍र बनानी चाहिए. जिस प्रकार हर शुक्रवार को हम पूजन करते हैं, वैसे ही करना चाहिए. पूजन के बाद माँ के सामने एक श्रीफल फोड़ें फिर कम से कम सात‍ कुंआरी कन्याओं या सौभाग्यशाली स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर मां वैभवलक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक की एक-एक प्रति उपहार में देनी चाहिए और सबको खीर का प्रसाद देना चाहिए. इसके बाद माँ लक्ष्मीजी को श्रद्धा सहित प्रणाम करना चाहिए. फिर माताजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करें- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है. हे माँ! हमारी (जो मनोकामना हो वह बोले) मनोकामना पूर्ण करें. हमारी हर विपत्ति दूर करो. हमारा सबका कल्याण करो. जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना. कुँआरी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना. सभी को सुखी करना. हे माँ! आपकी महिमा अपार है.' आपकी जय हो! ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' की छवि को प्रणाम करें. 🚩🌿🍑जय मां महालक्षमी 🍑🌿🚩 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️

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🚩💐🪔ॐ गणपतये नमः🪔💐🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🌋🌲🌸 शुभ बुधवार 🌸🌲🌋 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 🌻🐚🌞शुभ दोपहर 🌞🐚🌻 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋🎋 🪔🐚 जय श्री गणेश🐚🪔 ********************** 🎎मन को बुरे विचारों से दूर रख कर हमेशा अच्छे विचार और अच्छे संकल्प ही मन में धारण करने चाहिए ।सभी प्रकार के अच्छे या बुरे विचार धारण करने वाला यह हमारा मन ही है और - " तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु" (यजुर्वेद)के अनुसार ऐसा हमारा मन कल्याणकारी और शुभ संकल्पों वाला हो ऐसा हमें सदैव ध्यान रखना होगा ।तभी हम मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सकेंगे। 🌹मन को शुद्ध रखने का काम हमारी बुद्धि करती है और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है इसलिए हमें हमेशा ज्ञान प्राप्त करने में जुटे रहना चाहिए । मनुस्मृति में कहा है कि - 🏵️अद्विर्गात्राणि शुद्धयन्ति मन: सत्येन शुद्धयति । विधातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्जनिन शुद्धयति ।। 🌀जल से शरीर शुद्ध होता है , सत्य से मन शुद्ध होता है , विद्या और तप से आत्मा तथा ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है । 🎎 जो भी व्यक्ति इन चार प्रकार की शुद्धियों को धारण करेगा वह मन , आत्मा और शरीर से सदा निरोग और स्वस्थ बना रहेगा और संसार के सब सुख भोगता हुआ अपना जीवन सफल कर सकेगा । 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 🎎॥ सिद्धि विनायक मंत्र ॥ 🎎 ************************* 🌹ॐ नमो सिद्धि विनायकाय सर्व कार्य कर्त्रे सर्व विघ्न प्रशमनाय सर्व राज्य वश्यकरणाय सर्वजन सर्वस्त्री पुरुष आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा ।।🌹 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋 👏हे भगवान गणेश आप हमारे हर क्षेत्र में सफलता ले आएं , यही मै कामना करता हूँ । आप को मेरा बारम्बार प्रणाम 🙏 🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚 🎭आप और आपके पूरे परिवारपर सिद्धि विनायक💐 🏵दुखहर्ता गणपति महाराज की कृपा दृष्टि सदा 🌺 👏 बनी रहे और सभी मनोकामना पूर्ण हो 🌸 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🌹आपका बुधवार के दिन शुभ गणेशमय 🎡 🍑शांतिमय अतिसुन्दर और मंगलमय हो🙏 🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂🍂 🕉🚩💐 ॐ वक्रतुण्डाय नमः 💐🚩 🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚🐚 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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