dheeraj patel Jul 21, 2019

🌿🌹ऊँ नमः शिवाय🌹🌿 👏🌹बम बम भोले🌹👏 🌹ऊँ नमो नारायण🌹 🔔🌹🙏🌹🔔 आप सभी को श्रावण के पहले सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌹 सुबह की आप सभी को राम राम जी🙏🌹 एक बार भगवान नारायण वैकुण्ठलोक मे सोये हुये थे। उन्होंने स्वप्र मे देखा कि करोडो़ चन्द्रमा ओं की क्रांतिवाले, त्रिशुल -डमरू धारी, स्वर्णाभरण-भूषित-सुरेन्द, सिद्धिसेवित त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनन्दातिरेक से उन्यत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे है। उन्हे देखकर भगवान विष्णु हर्ष से गद़द हो उठे और अचानक उठकर बैंठ गये, कुछ देर तक ध्यानस्य बैंठे रहे। उन्हे इस प्रकार बैंठे देखकर श्री लक्ष्मी जी पूछने लगी "भगवन आप के इस प्रकार अचानक निद्रा से उठकर बैंठने का कँया कारण है?" भगवान ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्र का कोई उत्तर नही दिया और आनंद में निमग्न हुए चुपचाप बैंठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले, " देवी मैने स्वप्र मे भगवान श्री महेश्वर का दर्शन किया है। उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनंदमय एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी, मालूम होता है । शंकर जी ने मूझे स्मरण किया है। अहो भाग्य, चलो कैलाश पर चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करे, ऐसा विचार कर दोनों कैलाश की ओर चल दिये। भगवान शिव के दर्शन के लिये कैलाश मार्ग पर आधी दूर गये होंगे कि । भगवान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी ओर चले आ रहे है। अब भगवान कज आनंद का तो ठिकाना ही नही रहा। मानों घर बैंठे निधि मिल गयी । पास आते ही दोनों परस्पर बडे़ प्रेम से मिले। ऐसा लगा मानों प्रेम औय आनंद का समुद उमड़ पडा़ । एक दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से आनन्दाक्षु बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया दोनों ही एक दूसरे से लिपट हुए कुछ देर मूकवत खडे़ रहे। प्रशनोत्तर होने पर मालुम हुआ कि शंकर जी को भी रात्रि मे इसी प्रकार का स्वप्र आया कि मानो विष्णु भगवान को वे उसी रुप मे देख रहे है । जिस रुप मे अब उनके सामने खडे़ थे। दोनों के स्वप्र के वृतान्त से अवगत होने बाद दोनों एक दूसरे को अपने निवास ले जाने का आग्रह करने लगे। नारायण ने कहा कि वैकुण्ठ चलो। औय भोलेनाथ कहने लगे कि कैलाश की ओर प्रस्थान किया जाये। दोनों के आग्रह मे इतना अलोंकिक प्रेम था की यह निर्णय करना कठीन हो गया कि कहां चला जाये।? इतने मे ही क्या देखते है कि वीणा बजाते , हरिगुण गाते नारद जी कही से आ रहे है। बस फिर क्या था लगे दोनों उनसे निर्णय कराने की कहां चला जाये? बेचारे नारदजी तो स्वयं ही परेशान थे, चस अलौकिक-मिलन को देखकर वे तो स्वयं ही अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों का गुणगान करने, अब निर्णय कौन करे? अंत मे ये तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दे वही ठीक है। भगवती चमा पहले तो कुछ देर चुप रही। अंत मे दोनों की ओर मुख करतू हुए बोली "हे नाथ, हे नारायण आप लोगों की निक्षुल,अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ आता है कि आपके निवास अलग-अलग नही है। जो कैलाश है ।वही वैकुण्ठ है। और जो वैकुण्ठ है वही कैलाश है। केवल नाम में ही भेद है। यही नही। मूझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप की आत्मा भी एक ही है।केवल शरीर देखने मे दो है। औय तो और मूझे तो स्पस्ट लग रहा है कि आप की मार्याएं भी एक ही है। जो मे हूँ वही लक्ष्मी है। और जो लक्ष्मी है वही में हूँ केवल इतना ही नही मेरी तो अब यह दृढ़ धारणा हो गयी है कि आप लोगों के प्रति जो द्वेष करता है। वह मानों दूसरे के प्रति भी करता है। एक की जो पूजा करता है ।वह मानों दूसरे की भी पूजा करता है। मैं तो तय समझती हूं कि आप दोनों मे जो भेद मानता है उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है। मैं देखती हूँ की आप मूझे इस प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवंचना कर रहे है। मूझे असमंजस मे डाल रहे है। मुझे भुला रहे है। अब मेरी यही प्रार्थना है की आप दोनों ही अपने -अपने लोक को पधारिये। श्री विष्णु यह समझे कि हम शिल रुप मे वैकुण्ठ जा रहे है और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णु रुप मे कैलाश गमन कर रहे है। इस उत्तर को सुनकर दोनों प्रसन्न हुए ओर भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए ,दोनों एक दूसरे को प्रणाम किया और अत्यंत हर्षित होकर अपने-अपने लोक को प्रस्थान किया। लोटकय जब श्री हरिविष्णु वैकुण्ठ पहूंचे तो श्री लक्ष्मी ने उनसे प्रश्र किया "हे प्रभु आप को सबसे अधिक प्रिय कोन है?" भगवान बोले मेरे प्रियतम केवल श्री शंकर है देवधारियों को अपने देह की भांति वे मूझे अकारण ही प्रिय है। एक बार मे और शंकर दोनों पृथ्वी पर घूमने निकले । मैं अपने प्रियतम की खोज मे इस आशय से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज मे देश-देशान्तर में भटक रहा होगा,वही मूझे अकारण प्रिय होगा थोडी़ देर के बाद मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गयी वास्तव मे मै ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूँ। अलग-अलग दों घडो़ मे रखे जल की भांति मुझे में और उनमे कोई अंतर नही है। शंकय जी के अतिरित्क शिल की चर्चा करने वाला शिवभक्त भी मूझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरित जो शिव की पूजा नही करते वे मूझे कदापि प्रिय नही हो सकते। इस तरह जो शिव की पूजा करते है वह वैकुण्ठवासी विष्णु को भी स्वीकार है। और जो श्री विष्णु की वंदना करता है वह त्रिपुरारी को भी मना लेता है। 🌹ऊँ नमो नारायण🌹 🌿🌹ऊँ नमः शिवाय🌹🌿 👏🌹बम बम भोले🌹👏

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