🌾9 मसाले कौन कौन से हैं,ये किस प्रकार किन ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं !व इनके पीछे छिपी वैज्ञानिकता क्या है ?* 🌺1. नमक *(पिसा हुआ) सूर्य* 2.🌸 लाल मिर्च.... *(पिसी हुई) मंगल...* 3🌺. हल्दी *(पिसी हुई ) गुरु....* 4.🌺 जीरा *(साबुत या पिसा हुआ) राहु-केतु...* 5🌹. धनिया *(पिसा हुआ) बुध...* 6.🍂 काली मिर्च *(साबुत या पाउडर) शनि...* 7.🌺 अमचूर *(पिसा हुआ) केतु....* 8. 🌷गर्म मसाला *(पिसा हुआ)* *राहु....* 9💐. मेथी *मंगल....* 👉🌸मसाले के सेवन से अपने स्वास्थ्य और ग्रहो को ठीक करे.. 👇👇👇 *भारतीय रसोई में मिलने वाले मसाले सेहत के लिए तो अच्छे होते ही है ,पर साथ में उन के सेवन से हमारे ग्रह भी अच्छे होते है* *🌷सौंफ* *सौंफ का जिक्र हम पहले भी कर चुके है की सौंफ खाने से हमारा शुक्र और चंद्र अच्छा होता है , इसे मिश्री के साथ ले या उस के बिना भी ले खाने के बाद ,* *एसिडिटि और जी मिचलाने जैसी समस्या कम होने लगेंगी* *सौंफ को गुड के साथ सेवन करें जब आप घर से किसी काम के लिए निकाल रहे हो , इस से आप का मंगल ग्रह आप का पूरा काम करने में साथ देता है ...स्नेहा समूह.* 🌹*दालचीनी* *अगर किसी का मंगल और शुक्र कुपित है ,तो थोड़ी सी दालचीनी को शहद में मिलाकर ताज़े पानी के साथ ले , इस से आप की शरीर में शक्ति बढ़ेगी और सर्दियों में कफ की समस्या कम परेशान करती है .......* 🌻*काली मिर्च* *काली मिर्च के सेवन से हमारा शुक्र और चंद्रमा अच्छा होता है , इस के सेवन से कफ की समस्या कम होती है और हमारी स्मरण शक्ति भी बढ़ती है*, *तांबे के किसी बर्तन में काली मिर्च डालकर Dining Table पर रखने से घर को नज़र नहीं लगती है....* *🥀जौं* *जौ के प्रयोग से सूर्य ग्रह और गुरु ग्रह ठीक होता है जौं के आटे की रोटी खाने से पथरी कभी नहीं होती है.....* 🌺*हरी इलायची* *🍃इस के प्रयोग से बुध ग्रह मजबूत होता है अगर किसी को दूध पचाने में परेशानी होती है....* *🍃तो हरी इलायची उस में पका कर फिर दूध का सेवन करें इस से ऐसी परेशानी नहीं होगी ....* *🍃यह उन लोगो के लिए उपकारी है की जिन को दूध अपनी सेहत बनाए रखने या कैल्सियम के लिए दूध तो पीना पड़ता है पर उसको पीकर पचाने में समस्या आती है ...*स्नेहा आयुर्वेद ग्रुप 🌼*हल्दी* *🍃हल्दी के गुण हम सबसे छुपे नहीं है , हल्दी के सेवन से बृहस्पति ग्रह अच्छा होता है ,* *🍃हल्दी की गांठ को पीले धागे में बांधकर गुरुवार को गले में धारण करने से बृहस्पति के अच्छे फल मिलते है और यह तो हम सब को पता है की हल्दी का दूध पीने से Arthritis , Bones और Infections में ज़बरदस्त फायदा मिलता है....* *🌹जीरा* *जीरा राहू व केतू का प्रतिनिधित्व करता है.* *जीरा का सेवन खाने में करने से आप के दैनिक जीवन में सौहार्द व शांति बने रहते हैं.* 🏵️*हींग* *हींग बुध ग्रह का प्रतिनिधित्व करती है हींग का नित्य प्रतिदिन सेवन करने से वात व पित्त के रोग नियंत्रित होते हैं* *हींग आप की पाचन शक्ति भी बढाती है व क्रोध समस्या से भी निजात दिलाती है.* *🌷सौंफ :* *शुक्र ग्रह मजबूत होता है* *सौंफ हम रोज़ तो इस्तेमाल करते है ,पर क्या आप को पता है*स्नेहा समूह *की सौंफ के सेवन से आपका शुक्र ग्रह मजबूत होता है...!

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विनियोग ॐ अस्य श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मंत्रस्य, नारायण ऋषि: अनुष्टुप् छ्न्द: श्री महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवता: श्री दुर्गा प्रीत्यर्थे सप्तश्लोकी दुर्गा पाठे विनियोग: । श्लोक ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।।१।। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं । दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेष जन्तो: स्वस्थै: स्मृता मति मतीव शुभां ददासि दारिद्र्य दु:ख भय हारिणि का त्वदन्या सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता ।।२।। माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्धारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं । दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो । सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ।।३।। नारायणी ! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी शिवा हैं । आप सब पुरुषार्थ्रो को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं । आपको नमस्कार है । [quads id = “3”] शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ।।४।। शरणागतों, दिनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी ! आपको नमस्कार है । सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ।।५।। सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा कीजिये ! आपको नमस्कार है । रोगान शेषा नपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलान भीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन् नराणां त्वामाश्रिता ह्या श्रयतां प्रयान्ति ।।६।। देवी ! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं । जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं ; आपकी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं । सर्वा बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि एकमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरि विनाशनं ।।७।। सर्वेश्वरि ! आप ऐसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें । इति सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्र सम्पूर्णा ।।

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विनियोग ॐ अस्य श्री दुर्गा सप्तश्लोकी स्तोत्र मंत्रस्य, नारायण ऋषि: अनुष्टुप् छ्न्द: श्री महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वत्यो देवता: श्री दुर्गा प्रीत्यर्थे सप्तश्लोकी दुर्गा पाठे विनियोग: । श्लोक ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।।१।। वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं । दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेष जन्तो: स्वस्थै: स्मृता मति मतीव शुभां ददासि दारिद्र्य दु:ख भय हारिणि का त्वदन्या सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता ।।२।। माँ दुर्गे ! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्धारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं । दुःख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवी ! आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो । सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते ।।३।। नारायणी ! आप सब प्रकार का मंगल प्रदान करनेवाली मंगलमयी हैं, आप ही कल्याणदायिनी शिवा हैं । आप सब पुरुषार्थ्रो को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं । आपको नमस्कार है । [quads id = “3”] शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ।।४।। शरणागतों, दिनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवी ! आपको नमस्कार है । सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समन्विते भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ।।५।। सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवी ! सब भयों से हमारी रक्षा कीजिये ! आपको नमस्कार है । रोगान शेषा नपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलान भीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन् नराणां त्वामाश्रिता ह्या श्रयतां प्रयान्ति ।।६।। देवी ! आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हैं । जो लोग आपकी शरण में हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं ; आपकी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं । सर्वा बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि एकमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरि विनाशनं ।।७।। सर्वेश्वरि ! आप ऐसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें । इति सप्तश्लोकी दुर्गास्तोत्र सम्पूर्णा ।।

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यंत्र का महत्व यंत्र एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा व्यक्ति को अपनी आत्मशक्ति का आभास होता है। इसके द्वारा वह अपनी एकाग्रता और ध्यान क्रिया को मजबूत करता है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार, यंत्र ब्रह्माण्डीय शक्तियों का संवाहक है। यंत्र मूल रूप से संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ साधना क्रिया को सिद्ध करने वाला साधन है। इस शब्द की उत्पत्ति "यम" शब्द से हुई है जिसका अर्थ है - सहयोग करना। वैदिक यंत्रों में ज्यामितीय रेखाएँ उकरी या बनी हुई होती हैं जो वातावरण और मनुष्य को ऊर्जावान बनाती हैं। यंत्रों के प्रभाव से व्यक्ति का जीवन धन्य हो जाता है। क्योंकि यंत्र जीवन में भाग्य, स्वास्थ्य लाभ, शिक्षा, प्रेम और धन-समृद्धि को लेकर आता है। यंत्र में सीधी-तिरछी रेखाएँ, वर्गाकार और त्रिकोण जैसी ज्यामितीय आकृतियाँ बनी होती हैं। हिन्दू धर्म में इन आकृतियों का विशेष महत्व होता है। इसलिए किसी भी यंत्र में एक अथवा एक से अधिक शक्ति समाहित होती हैं। यंत्र को मंत्रों का चित्रात्मक रूप भी कहते हैं। भारतीय प्राचीन विज्ञान द्वारा वास्तु शास्त्र में दैवीय ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए जिन साधनों के प्रयोग करने की सलाह दी गई है उन्हें सामान्य भाषा में यंत्र कहते हैं। यंत्रों के लिए निम्न चीजों का प्रयोग किया जाता है। इनमें सोना, चाँदी, तांबा, क्रिस्टल, भोज पत्र, हड्डी, पेज और विष्णु पत्थर शामिल हैं। जैसा कि हमने बताया है कि हिन्दू धर्म में वैदिक यंत्रों का विशेष महत्व होता है। यंत्र व्यक्ति के जीवन से नकारात्मक प्रभावों को नष्ट करते हैं। इनके प्रभाव से साधक की साधना सिद्ध होती है और निःसंतान दंपति को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके अलावा यंत्र कार्य और पारिवारिक जीवन में तालमेल बनाने में मददगार होते हैं और व्यक्ति को आर्थिक रूप से संपन्न बनाते हैं। जिस प्रकार मंत्र हमारे शरीर और मन के बीच तालमेल बनाते हैं ठीक उसी प्रकार यंत्र भी हमारे शरीर और मन को नियंत्रण में रखते हैं। इन यंत्रों का संबंध किसी न किसी देवी/देवाताओं और ग्रहों से होता है जिन्हें धारण करने पर व्यक्ति को उनका आशीर्वाद मिलता है। हालाँकि यंत्र को धारण करने से पूर्व इनको विधि-विधान से स्थापित किया जाता है जिसके बाद व्यक्ति को इसके लाभ प्राप्त होते हैं। वैदिक यंत्र कई प्रकार के होते हैं और प्रत्येक यंत्र की अपनी विशेषता और उद्देश्य होता है। अतः यंत्र की विशेषता और उद्देश्य को ध्यान में रखकर इसे स्थापित किया जाता है। जैसे कि आप जिस भी देवी/देवता या ग्रह का आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो आपको उनसे संबंधित यंत्र को स्थापित करना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आपकी धन-समृद्धि पाने की कामना है तो आपके लिए कुबेर यंत्र की आराधना करना शुभ रहेगा और यदि आप आध्यात्मिक सुख और ज्ञान के पिपासु हैं तो आपके लिए गुरु यंत्र लाभकारी रहेगा।

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