Bindi Pandey May 14, 2020

Good night *(((( देह का सत्य ))))* .******************** सातवें दिन मरने वाले राजा परीक्षित को शुकदेवजी श्रीमद्भागवत सुना रहे थे। . छः दिन हो चुके थे और अगले ही दिन राजा परीक्षित को तक्षक नाग डसने वाला था। . छः दिन तक श्रीमद्भागवत सुनने के बाद भी राजा का शोक और भय दूर नहीं हुआ। . राजा का विचलित मन देख शुकदेवजी ने एक कथा सुनानी आरम्भ की । . राजन ! प्राचीन समय की बात है, एक राजा एक बार आखेट के लिए जंगल में गया। . शिकार के पीछे भागते – भागते वह राजा अपने साथियों से भटक गया। जंगल बहुत घना था और वर्षा भी होने लगी थी। . ऐसी घड़ी में रास्ता ढूँढना उस राजा के लिए दूभर हो गया था। बहुत भटकने के बाद भी उसे रास्ता नहीं मिला। . आख़िरकार सूर्य अस्त हो चूका था और चारों तरफ घना अँधेरा छा चूका था। रात्रि के इस गहन अंधकार में सिंह और चीते आदि जंगली जानवरों की आवाजों से राजा और भी अधिक भयभीत हो रहा था। . अब तो वह किसी तरह रात्रि बिताने के लिए किसी सुरक्षित स्थान की तलाश कर रहा था। . तभी घने अन्धकार में उसे रोशनी की एक किरण दिखाई दी। वह एक बहेलिये की झोपड़ी में दीपक जल रहा था। . जब वह राजा उस झोपड़ी के निकट गया तो देखा कि झोपड़ी से बड़ी दुर्गन्ध आ रही थी। . उसमें एक गन्दा बहेलिया रहता था, जो ज्यादा चल फिर नहीं सकता था इसलिए उसने झोपडी में ही एक तरफ मल – मूत्र का स्थान बना रखा था। . उस झोपड़ी के चारों तरफ उसने मांस लटका रखा था। . इतनी नरक तुल्य जगह देख राजा अचंभित रह गया लेकिन और कोई उपाय न देख राजा ने बहेलिये से एक रात्रि उस झोपड़ी में बिताने की विनती की। . बहेलिया बोला – अक्सर लोग विश्राम के लिए यहाँ आ जाते है, लेकिन जाने में बड़ा ही झगड़ा करते है। सबको मेरी झोपड़ी परमप्रिय हो जाती है। . इसलिए अब मैंने लोगों को ठहरने की अनुमति देना बंद कर दिया। मैं नहीं चाहता कि आप भी सुबह उठकर मेरी झोपड़ी पर कब्ज़ा जमाये। . इसलिए कृपा करके कहीं और जाइये और मुझे चैन से जीने दीजिये। . और कोई उपाय न जान राजा दीन स्वर में बोला – देखो ! मैं वचन देता हूँ, सूरज की पहली किरण के साथ ही मैं आपकी झोपड़ी छोड़ दूंगा। . मैं तो मज़बूरी में यहाँ आ फंसा हूँ अन्यथा मेरा उद्देश्य और कार्य बहुत ही बड़ा और महान है। . आपसे विनती है कि मुझे मात्र एक रात्रि के लिए आश्रय प्रदान करे। . बहेलिया बोला – ठीक है, एक रात्रि मतलब एक रात्रि, मुझे और कोई झंझट नहीं चाहिए ! समझे। . आखिर राजा को आश्रय मिल ही गया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा। . रातभर झोपड़ी की दुर्गन्ध राजा के मन – मस्तिष्क में ऐसे रस – बस गई कि सुबह उठते ही राजा को झोपडी परमप्रिय लगने लगी। . सुबह बहेलिये ने उठते ही महाराज को बोला – महाराज ! उठिए और अपना रास्ता नापिए। . राजा बहेलिये से और अधिक रहने के लिए बोलने लगा। इस पर बहेलिया गुस्से से लाल हो गया और बोला.. . मैंने कहा था ना, स्वार्थी लोग मेरी झोपडी पर कब्ज़ा ज़माने आते है। महाराज ! कृपा करके आप चले जाइये। . दोनों में तू – तू मैं – मैं होने लगी। . इतनी कथा सुनाकर शुकदेवजी ने राजा परीक्षित से पूछा – अब राजन ! आप ही बताओ ?.. . उस राजा का अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर उस झोपड़ी में रहने के लिए झगड़ा करना कहाँ तक उचित था ? . परीक्षित बोला – प्रभु ! ये कौन मुर्ख राजा था। जो गन्दी झोपड़ी में अपने राज परिवार को भूलकर और अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर रहने के लिए जिद कर रहा था ? . अचरज होता है ! ऐसा मुर्ख भी कोई राजा हुआ होगा ? . इस पर शुकदेवजी मुस्कुराते हुए बोले – राजन ! वो मुर्ख राजा और कोई नहीं, आप है। जो अब भी मल- मूत्र और मांस की गठरी देह से मोह रखे हुए है। . राजन ! आपका इस देह रूपी गठरी में रहने का काल कल समाप्त हो रहा है तो फिर शोक किसलिए करना ! क्या इसमें आपकी मुर्खता नहीं ? . अब राजा परीक्षित को बोध हो चूका था। वह देह के सत्य से अवगत हो चुके थे। अब वह मृत्यु से निर्भय हो मुक्ति के लिए तैयार थे। . असल में हम सबकी मनस्थिति यही है। जन्म के समय एक बच्चे को याद होता है कि वह कहाँ आ पड़ा। इसलिए वह रोता है। . लेकिन कालान्तर में उसकी वह याददाश्त धीरे – धीरे विस्मृत होने लगती है। और वह इस देह और इसके सम्बन्धियों को ही अपना सब कुछ समझने लगता है। . जब अंत समय आता है तो यही मोह उसके दुःख का कारण बनता है। ये राजा परीक्षित और कोई नहीं। हममें से ही हर कोई है। ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय राधे))))))

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Bindi Pandey May 9, 2020

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Bindi Pandey May 9, 2020

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Bindi Pandey May 9, 2020

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Bindi Pandey May 9, 2020

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Bindi Pandey May 5, 2020

सच्ची भक्ति 〰️🔸 🔸〰️ एक अत्यंत गरीब दीन_हीन अपाहिज था, वो एक छोटे से गाँव में रहता था, वहाँ के लोग उसकी कान्हा भक्ति देख उसे पागल कहतें थें, वहाँ नित्य प्रतिदिन रोज सुबह 10 किलोमीटर कान्हा के मंदिर के लिए निकलता था, और कुछ ज्यादा नही चल पाता था, उसके पैर छिल जातें थें, बाजूओं में बैशाखी से छालें पड़ जातें थे, उसे लोग चिढ़ाते थें, ये लगड़ा क्या 10 किलोमीटर भगवान के मंदिर जा पाएगा, सब उस पर हंसते थे, मजाक उड़ाते थे........ पर वो अपाहिज रूकता नही था, कभी हाथों के बल तो कभी, पूरे जिस्म से रगड़कर आगे बढ़ता था, वो कान्हा का परम भक्त था, जब वो टूट जाता बिल्कुल भी हिल नही पाता तो, कान्हा को पुकारता और कहता, मेरे प्रभु मैं आपके मंदिर नही आ पाऊंगा ना कभी, और रोने लगता, फिर रास्तें में पड़ा कोई भी पत्थर उठाता और जहाँ होता, वही कान्हा को पूजता और कान्हा की भक्ति में लग जाता......... आश्चर्य तो तब होता जिस जगह वो कान्हा को पूजता उसी जगह कान्हा का मंदिर बन जाता, और खुद कान्हा जी उसके पास आतें और उसकी भक्ति से प्रसन्न हो उससे कहते माँगों वत्स तुम्हें क्या वर चाहिए, पर वो अपहिज कुछ नही कहता, बस उनकी पूजा में लग जाता............ रोज यही क्रम चलता वो सुबह उठता मंदिर के लिए निकलता और मंदिर पहुंच नही पाता, और लोग उसका मजाक उड़ाते, और वो वही रास्तें से पत्थर उठाता, और वही मंदिर बन जाता, रोज कान्हा आते, उसे वर मांगने को कहते और वो रोज कुछ नही माँगता............ एक रोज वो अपाहिज मंदिर जाने के लिए निकला, रास्तें में गाँव के लोग ने उसे घेर लिया और उसे मरने लगें ये कहकर की तु अफवाह फैलाता हैं, की कान्हा का मंदिर तेरे सामने बन जाता हैं, कान्हा तेरे सामने प्रकट होते हैं, तु अपहिज आज तक एक किलोमीटर भी नही चल पाया, तो तु कहा से कान्हा जी के मंदिर पहुंच गया, गाँव वालों ने उसे बहुत मारा और उसकी बैशाखी तोड़ दी, वो अपहिज हंसते_हंसते सब सह गया, और जहाँ गिरा वही कान्हा की भक्ति करने लगा, मंदिर फिर बन गया, कान्हा जी प्रकट हुये, और उसकी हालत देख कहने लगें, हे भक्त तुम क्यूं इतना कष्ट सहते हो वर माँग क्यू नही लेते, मैं अभी तुम्हारे पैर और दुनिया की तमाम सुविधाए एक क्षण दे दूंगा, अपाहिज कहता हें नाथ मुझे कुछ नही चाहिए, और वहाँ कान्हा जी एक ध्यान में मग्न हो जाता........... अब बाँकेबिहारी लाल सोच में पड़ गयें आखिर ये भक्त कुछ माँगता क्यूं नही, आज इसको मुझे कुछ बिन माँगे ही देना पड़ेगा, दूसरे दिन की सुबह हुई, वो अपाहिज मंदिर जाने के लिए निकला, जैसें ही रास्ते पर पहुंचा एक बड़ी सी गाड़ी उसके पास आकर रूकी और उसमें से सुंदर सा शख्स निकला और वो कान्हा जी का मंदिर उस अपहिज से पूछने लगा, अपहिज ने उसे रास्ता बताया और कहा मैं भी वही जा रहा आप पहुंचे मैं भी आता हूं, तुम मेरे साथ चलो तुम इतनी दूर पैदल कैंसे जाओगे मैं अपनी गाड़ी में ले चलता हूं, अपहिज ने कहा नही महशय आप जाइयें मैं आता हूं, उस शख्श ने बहुत जोर दिया पर अपहिज नही माना, और आगे बढ़ने लगा........... जैंसे ही वो थोड़ी दूर पहुंचा, उसे रास्तें में स्वर्ण से भरा एक मटका दिखाई दिया, अपहिज ने उसे देखा और, उसे खींचते हुयें किनारे लाकर छोड़ आगे बढ़ गया, बढ़ते_बढ़ते उसे रास्ते पर एक सुंदर भवन दिखाई दीया मानों जैसे विश्वकर्मा जी ने देवताओं के लिए आज ही बनाई हो, और उस भवन से आवाज आयी अंदर आ जाओ तो ये भवन नौकर_चाकर स्वर्ण हीरे, रत्न, मणिक धन वैभव सब तुम्हारा होगा, अपहिज ने उसे अनसुना कर आगे बढ़ने लगा............ कुछ कदम चले ही थे, की उसे सामने से आती सुंदर_सुंदर स्त्रीयाँ दिखाई देने लगी, उन स्त्रीयों ने अपहिज के पास आकर कहा, तुम चाहों तो हमारे साथ भोग_विलास कर सकतें हो कुछ क्षण आराम करो और हमारे महल चलों, अपहिज ने उनसे हाथ जोड़े और आगे बढ़ गया, जैंसे ही वो आगे बढ़ा भयंकार गर्मी पढ़ने लगी अपहिज का सारा बदन तपने लगा वो थककर चूर हो गया, पसीने से लथपथ हो गया, फिर भी उसने हार नही मानी और जिस्म के बल रगड़ने लगा, और आगे बढ़ने लगा, रगड़ते_रगड़ते वो इतना थक गया की वही बैठ गया और पत्थर उठाकर उसे अपने कान्हा को देख पूजने लगा, मंदिर बन गया और कान्हा दौड़े चले आयें और आते ही उस अपहिज से पूछा हे भक्त, आज मैंने तुम्हारे दुनिया का हर ऐसवर्य देना चाहा पर तुमने उनको ठोकर मार दिया, स्वर्ण, भवन, नारी, यहाँ तक की मंदिर जाने के लिए रोज गाड़ी तुमने उसे भी ठुकरा दिया, ये वत्स तुमने ऐसा क्यूं किया, कान्हा जी ने उस अपहिज से पूछा? अपहिज ने कहा हे_नाथ, आपने गाड़ी भेजी, पर आप ये क्यू भूल गयें, मेरे चिंतन मात्र से आप दौड़े चले आते हैं, मुजे चल पाता ना देख, तो बताओं मैं उस गाड़ी में बैठकर आपकी मूर्ति देखने आता, जबकी मेरे प्रभु साक्षात मेरे सामने प्रकट हो जातें हैं, आपने स्वर्ण की मुद्राए दी वो मेरे किस काम की जिसमें आपका नाम ना हो, वो भवन मेरे किस काम का जिसे पाने के बाद आप मुजे दिखाई ना दें, उससे अच्छा तो मेरा यही जीवन हैं, जिसमें आप मेरे लिए आ जाते हैं, वो नारीयाँ उनका मैं क्या करूँ, मेरे रोम_रोम में तो बस आप बसें हैं, किसी और के लिए तानिक मात्र भी जगह नही, और वो भयंकार गर्मी, जिसे पाने बाद मुजे आपके दर्शन हुयें, मेरे कान्हा करें, ऐसी गर्मी मुजे रोज पड़े............... कान्हाजी भाव_विभोर हो गयें, और कहने लगें, धन्य हैं मेरे भक्त तु, तुमने मेरी भक्ति सच्चें दिल से की हैं मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम्हार पैर, बस कान्हा जी बोलने ही वाले थे की तुम्हार पैर ठीक हो जाए, उससे पहले अपहिज ने कान्हा जी के पैर पकड़ लिए और कहा, प्रभु मुज पर इतना बड़ा अत्चार मत कीजिए, मुझे ऐसा ही रहने दीजिए, समस्त रिशी_मुनियों को बड़े_बड़े पंडितो को देवता नर दानव मानव को जो सौभाग्य प्राप्त नही है वो मुजे है मेरे कष्ट देख पर अपना मंदिर, आप स्वयं दौडे आते हैं बस मुझे इससे जादा और कुछ नही चाहिए मेरे लिए ये एक नही असंख्य वरदान है इसे मुझसे मत छीनियें.............. कान्हाजी ने उस भक्त की लाज रखी और रोज उस अपहिज को जहाँ वो बैठ जाए, जिस पत्थर को चुने वही मंदिर और स्वयं प्रकट हो जाते थें, अपाहिज भी नित्य_प्रतिदिन सबके ताने सुनता पर हर दिन हरिभजन में मस्त रहता और कान्हा जी की महिमा गाता। जय श्री राधे कृष्णा जी 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Bindi Pandey Apr 30, 2020

*🌸 "उलटे भजन का सीधा भाव" 🌸💐👏🏻* एक बार एक व्यक्ति श्री धाम वृंदावन में दर्शन करने गया। दर्शन करके लौट रहा था। तभी एक संत अपनी कुटिया के बाहर बैठे बड़ा अच्छा पद गा रहे थे कि "हो नयन हमारे अटके श्री बिहारी जी के चरण कमल में" बार-बार यही गाये जा रहे थे तभी उस व्यक्ति ने जब इतना मीठा पद सुना तो वह आगे न बढ़ सका, और संत के पास बैठकर ही पद सुनने लगा और संत के साथ-साथ गाने लगा। कुछ देर बाद वह इस पद को गाता-गाता अपने घर गया, और सोचता जा रहा था कि वाह ! संत ने बड़ा प्यारा पद गाया। जब घर पहुँचा तो पद भूल गया। अब याद करने लगा कि संत क्या गा रहे थे, बहुत देर याद करने पर भी उसे याद नहीं आ रहा था। फिर कुछ देर बाद उसने गाया "हो नयन बिहारी जी के अटके, हमारे चरण कमल में" उलटा गाने लगा। उसे गाना था "नयन हमारे अटके बिहारी जी के चरण कमल में" अर्थात बिहारी जी के चरण कमल इतने प्यारे हैं कि नजर उनके चरणों से हटती ही नहीं हैं। नयन मानो वही अटक के रह गए हैं। पर वो गा रहा था कि बिहारी जी के नयन हमारे चरणों में अटक गए, अब ये पंक्ति उसे इतनी अच्छी लगीं कि वह बार-बार बस यही गाये जाता, आँखे बंद है बिहारी के चरण हृदय में है और बड़े भाव से गाये जा रहा है। जब बहुत समय तक गाता रहा, तो अचानक क्या देखता है सामने साक्षात् बिहारी जी खड़े हैं। झट चरणों में गिर पड़ा। बिहारी जी बोले,"भईया ! एक से बढ़कर एक भक्त हुए। पर तुम जैसा भक्त मिलना बड़ा मुश्किल है लोगो के नयन तो हमारे चरणों के अटक जाते हैं पर तुमने तो हमारे ही नयन अपने चरणों में अटका दिए, और जब नयन अटक गए तो फिर दर्शन देने कैसे नहीं आता।" भगवान बड़े प्रसन्न हो गए। वास्तव में बिहारी जी ने उसके शब्दों की भाषा सुनी ही नहीं क्योकि बिहारी जी शब्दों की भाषा जानते ही नहीं है वे तो एक ही भाषा जानते है वह है भाव की भाषा। भले ही उस भक्त ने उलटा गाया पर बिहारी जी ने उसके भाव देखे कि वास्तव में ये गाना तो सही चाहता है शब्द उलटे हो गए तो क्या भाव तो कितना उच्च है। सही अर्थो में भगवान तो भक्त के हृदय का भाव ही देखते हैं। *"जय जय श्री राधे"*🙏🏻💫 RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI

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