Babita Sharma Dec 11, 2020

राधे राधे 🙏 उत्पन्ना एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹 शुभ एकादशी 🌹 श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी 🚩🚩हे नाथ नारायण वासुदेव जय माता दी 🚩 उत्पन्ना एकादशी कब मनाई जाती हैं : यह एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष के दिन मनाई जाती हैं . इसी दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था, इसी कारण इस दिन को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता हैं . इसी दिन स्वयं भगवान विष्णु ने माता एकादशी को आशीर्वाद में इस दिन को एक महान व्रत बताया था. प्रति माह दो एकादशी का महत्व पुराणों में निकलता हैं सभी का फल एक समान एवं उत्तम होता हैं . माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने से मानव जाति के पहले और वर्तमान दोनों के पाप मिट जाते है. जो भक्तजन हर महीने आने वाली एकादशी का व्रत शुरू करना चाहते है, वे लोग उत्पन्ना एकादशी से ही अपने एकादशी के व्रत शुरू करते है. उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा: स्वयं श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी माता के जन्म की कथा सुनाई : सतयुग के समय एक महा बल शाली राक्षस था, जिसका नाम मुर था . उसने अपनी शक्ति से स्वर्ग लोक को जीत लिया था . उसके पराक्रम के आगे इंद्र देव, वायु देव, अग्नि देव कोई भी नहीं टिक पाये थे, जिस कारण उन सभी को जीवन व्यापन के लिये मृत्युलोक जाना पड़ा . हताश होकर इंद्र देव कैलाश गये और भोलेनाथ के सामने अपने दुःख और तकलीफ का वर्णन किया . उसने प्रार्थना की कि वे उन्हें इस परेशानी से बाहर निकाले . भगवान शिव ने उन्हें विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी . उनकी सलाह पर सभी देवता क्षीरसागर पहुंचे, जहाँ विष्णु जी निद्रा में थे . सभी ने इंतजार किया . कुछ समय बाद विष्णु जी के नेत्र खुले तब सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की . विष्णु जी ने उनसे क्षीरसागर आने का कारण पूछा . तब इंद्र देव ने उन्हें विस्तार से बताया कि किस तरह मुर नामक राक्षस ने सभी देवताओं को मृत्यु लोक में जाने के लिये विवश कर दिया . सारा वृतांत सुन विष्णु जी ने कहा ऐसा कौन बलशाली हैं जिसके सामने देवता नही टिक पाये . तब इंद्र ने राक्षस के बारे में विस्तार से बताया कि इस राक्षस का नाम मुर हैं उसके पिता का नाम नाड़ी जंग हैं यह ब्रह्मवंशज हैं . उसकी नगरी का नाम चन्द्रावती हैं उसने अपने बल से सभी देवताओं को हरा दिया और उनका कार्य स्वयं करने लगा हैं वही सूर्य है वही मेघ और वही हवा और वर्षा का जल हैं . उसे हरा कर हमारी रक्षा करे नारायण . पूरा वर्णन सुनने के बाद विष्णु जी ने इंद्रा को आश्वासन दिया कि वो उन्हें इस विप्पति के निकालेंगे . इस प्रकार विष्णु जी मुर दैत्य से युद्ध करने उसकी नगरी चन्द्रावती जाते हैं . मुर और विष्णु जी के मध्य युद्ध प्रारंभ होता हैं . कई वर्षो तक युद्ध चलता हैं . कई प्रचंड अस्त्र शस्त्र का उपयोग किया जाता हैं पर दोनों का बल एक समान सा एक दुसरे से टकरा रहा था . कई दिनों बाद दोनों में मल्ल युद्ध शुरू हो गया और दोनों लड़ते ही रहे कई वर्ष बीत गये . बीच युद्ध में भगवान विष्णु को निद्रा आने लगी और वे बद्रिकाश्रम चले गये . शयन करने के लिये भगवान हेमवती नमक एक गुफा में चले गये . मुर भी उनके पीछे घुसा और शयन करते भगवान को देख मारने को हुआ जैसे ही उसने शस्त्र उठाया भगवान के अंदर से एक सुंदर कन्या निकली और उसने मुर से युद्ध किया . दोनों के मध्य घमासान युद्ध हुआ जिसमे मुर मूर्छित हो गया बाद में उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया गया . उसके मरते ही दानव भाग गये और देवता इन्द्रलोक चले गये . जब विष्णु जी की नींद टूटी तो उन्हें अचम्भा सा लगा कि यह सब कैसे हुआ तब कन्या ने उन्हें पूरा युद्ध विस्तार से बताया जिसे जानकर विष्णु जी प्रसन्न हुये और उन्होंने कन्या को वरदान मांगने कहा . तब कन्या ने भगवान से कहा मुझे ऐसा वर दे कि अगर कोई मनुष्य मेरा उपवास करे तो उसके सारे पापो का नाश हो और उसे विष्णुलोक मिले . तब भगवान विष्णु ने उस कन्या को एकादशी नाम दिया और कहा इस व्रत के पालन से मनुष्य जाति के लोगो के पापो का नाश होगा और उन्हें विष्णुलोक मिलेगा . उन्होंने यह भी कहा इस दिन तेरे और मेरे भक्त समान होंगे यह व्रत मुझे सबसे प्रिय होगा जिससे मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होगा . इस प्रकार भगवान चले जाते हैं और एकादशी का जन्म सफल हो जाता हैं . इस प्रकार एकादशी का जन्म उत्पन्ना एकादशी से होता हैं और तब ही से आज तक इस व्रत का पालन किया जाता हैं और इसे सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा जाता हैं। शुभ मुहूर्त और महत्व: मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी के दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था। इसी के चलते इस दिन को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता है। देवी एकादशी, भगवान विष्णु की एक शक्ति का रूप हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन देवी एकादशी ने राक्षस मुर का वध किया था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति इस दिन उत्पन्ना एकादशी का व्रत करता है उसके पूर्वजन्म और वर्तमान दोनों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। आइए जानते हैं उत्पन्ना एकादशी का शुभ मुहूर्त और महत्व। उत्पन्ना एकदाशी का शुभ मुहूर्त: एकादशी तिथि प्रारम्भ- दिसम्बर 10, 2020 को दोपहर 12:51 बजे से एकादशी तिथि समाप्त- दिसम्बर 11, 2020 को सुबह 10:04 बजे तक पारण का समय: दिसम्बर 11, 2020 को दोपहर 01:17 से 03:21 तक पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय- दोपहर 03:18 बजे उत्पन्ना एकादशी का महत्व: मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति एकादशी व्रत शुरू करना चाहते हैं तो उत्पन्ना एकादशी से शुरू कर सकते हैं। एकादशी का पर्व भगवान श्री कृष्ण और एकादशी माता की राक्षसों के ऊपर जीत की खुशी में मनाया जाता है। इस दिन अगर विधि-विधान से पूजा की जाए तो व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती हैं। साथ ही देवी एकादशी, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है। हरि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🙏 श्री कृष्ण: शरणं मम् 🙏

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Babita Sharma Dec 10, 2020

यशोदा का नंदलाल, हमारा रखपाल, हम भूलनहार , वो पालनहार हरे कृष्ण🙏🙏 घर में लड्डू गोपाल रखते हैं तो ये न‍ियम जान लीज‍िए: 🔔जिस भी घर में लड्डू गोपाल जी का प्रवेश हो जाता है वह घर लड्डू गोपाल जी का हो जाता है। 🔔हमें अपने लड्डू गोपाल जी को कोई प्यारा सा नाम जरुर देना चाहिए। आपके घर मे लड्डू गोपाल जी हैं तो आप इस बात का विशेष ध्यान रखें. 🔔 प्रथम तो यह बात मन में बैठाना बहुत आवश्यक है कि जिस भी घर में लड्डू गोपाल जी का प्रवेश हो जाता है वह घर लड्डू गोपाल जी का हो जाता है, इसलिए मेरा घर का भाव मन से समाप्त होना चाहिए अब वह लड्डू गोपाल जी का घर है। 🔔 दूसरी विशेष बात यह कि लड्डू गोपाल जी अब आपके परिवार के सदस्य है, सत्य तो यह है कि अब आपका परिवार लड्डू गोपाल जी का परिवार है। अतः लड्डू गोपाल जी को परिवार के एक सम्मानित सदस्य का स्थान प्रदान किया जाए। 🔔 परिवार के सदस्य की आवश्यक्ताओं के अनुसार ही लड्डू गोपाल जी की हर एक आवश्यकता का ध्यान रखा जाए। 🔔 एक विशेष बात यह कि लड्डू गोपाल जी किसी विशेष ताम झाम के नहीं आपके प्रेम और आपके भाव के भूखे हैं, अतः उनको जितना प्रेम जितना भाव अर्पित किया जाता है वह उतने आपके अपने होते हैं। 🔔प्रति दिन प्रातः लड्डू जी को स्नान अवश्य कराएं, किन्तु स्नान कराने के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखे कि जिस प्रकार घर का कोई सदस्य सर्दी में गर्म पानी व गर्मी में ठन्डे पानी से स्नान करता है, उसी प्रकार से लड्डू गोपाल जी के स्नान के लिए मौसम के अनुसार पानी का चयन करें, स्नान के बाद प्रति दिन धुले स्वस्छ वस्त्र पहनाएं। 🔔 जिस प्रकार आपको भूख लगती है उसी प्रकार लड्डू गोपाल जी को भी भूख लगती है अतः उनके भोजन का ध्यान रखे, भोजन के अतिरिक्त, सुबह का नाश्ता और शाम के चाय नाश्ते आदि का भी ध्यान रखे। 🔔 घर में कोई भी खाने की वस्तु आए लड्डू गोपाल जी का हिस्सा भी उसमे अवश्य होना चाहिए। 🔔 प्रत्येक मौसम के अनुसार लड्डू गोपाल जी के लिए सर्दी गर्मी से बचाव का प्रबन्ध करना चाहिए, मौसम के अनुसार ही वस्त्र पहनाने चाहिएं। 🔔 लड्डू गोपाल जी को खिलौने बहुत प्रिये हैं उनके लिए खिलौने अवश्य लेकर आएं और उनके साथ खेलें भी। 🔔 लड्डू गोपाल जी से कोई ना कोई नाता अवश्य कायम करें, चाहे वह भाई, पुत्र, मित्र, गुरु आदि कोई भी क्यों ना हो, जो भी नाता लड्डू गोपाल जी से बनाये उसको प्रेम और निष्ठा से निभाएं। 🔔 अपने लड्डू गोपाल जी को कोई प्यारा सा नाम अवश्य दें। 🔔 लड्डू गोपाल से प्रेम पूर्वक बाते करें, उनके साथ खेलें, जिस प्रकार घर के सदस्य को भोजन कराते हैं उसी प्रकार उनको भी प्रेम से भोजन कराएं। पहले लड्डू गोपाल को भोजन कराएँ उसके बाद स्वयं भोजन करें। 🔔 प्रतिदिन रात्री में लड्डू गोपाल जी को शयन अवश्य कराएं, जिस प्रकार एक छोटे बालक को प्रेम से सुलाते हैं उसी प्रकार से उनको भी सुलायें, थपथपाएँ, लोरी सुनाएँ। 🔔 प्रतिदिन प्रातः प्रेम पूर्वक पुकार कर उनको जगाएं। 🔔 किसी भी घर में प्रवेश के साथ ही लड्डू गोपाल जी में प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है इसलिए उनको मात्र प्रतीमा ना समझ कर घर के एक सदस्य के रूप में ही उनके साथ व्यवहार करें। 🔔अगर आप किसी काम से घर के बाहर जा भी रहे हैं तो इस बात का ध्‍यान रखें कि घर की एक चाभी लड्डू गोपाल को देकर जाएं और यह प्रार्थना करके जाएं कि हे प्रभु आप घर की रक्षा करें। आप चाहें तो ऐसा भी कर सकते हैं कि अपने किसी करीबी पड़ोसी को लड्डू गोपालजी को सौंपकर जाएं ताकि वह रोजाना उनका भोग और पूजा कर सके। 🔔 यूं तो प्रत्येक जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल जी की पूजा धूम-धाम से होती है, किन्तु यदि आपको वह तिथि पता है जिस दिन लड्डू गोपाल जी ने घर में प्रवेश किया तो उस तिथि को लड्डू गोपाल जी के जन्म दिन के रूप में मान कर प्रति वर्ष उस तिथि में उनका जन्म दिन अवश्य मनाएं , बच्चों को घर बुला कर उनके साथ लड्डू जी का जन्म दिन मनायें और बच्चों को खिलौने वितरित करें यूँ तो और भी बहुत से कार्य हैं जो भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार करते हैं, किन्तु यदि इन बातों पर ध्यान दिया जाए तो लड्डू गोपाल जी को सरलता से प्रसन्न किया जा सकता है। गिरधर गोपाल से ये ही प्रार्थना है कि ठाकुर जी आपको सुख,शांति, प्यार एवं ढेर सारी खुशियां प्रदान करें।जय श्री कृष्ण 🙏🌺🍃🌺

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Babita Sharma Dec 7, 2020

ॐ नम: शिवाय 🙏🙏 काल भैरव अष्टमी पर्व की सपरिवार आपको अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 भैरव बाबा का आशीर्वाद सदा आप पर बना रहे। 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 शिव के रौद्र रूप कालभैरव की पूजा होती है कालाष्टमी पर: कालाष्टमी शिव जी के क्रोध से प्रकट हुए कालभैरव की पूजा का दिन होता है। इस दिन पूजन और व्रत करने से सुख और समृद्धि बनी रहती है।... कब होती है कालाष्टमी: हर माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन कालभैरव की पूजा का विधान है जिन्हें शिवजी का अवतार माना जाता है। कालाष्टमी को भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन दुर्गा जी की पूजा और व्रत भी किया जाता है। शिव पुराण के अनुसार भैरव, शंकर के ही रूप हैं, कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा में इस मंत्र का जाप करना चाहिए, अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्, भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि। कालभैरव को काशी का कोतवाल भी कहते हैं। कहते हैं इस दिन साधना करने पर किसी भी प्रकार की उपरी बाधा, भूत-प्रेत, जादू-टोने आदि का खतरा नहीं रहता है। कैसे करें कालाष्टमी का व्रत पूजन : नारद पुराण में बताया गया है कि कालाष्टमी के दिन कालभैरव और मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। कालाष्टमी की रात काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। ये पूजा उसी प्रकार करनी चाहिए जैसे दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को की जाती है। इस दिन पार्वती और शिव जी की कथा सुन कर जागरण करना चाहिए। इस व्रत में फलाहार ही करना चाहिए। कालभैरव की सवारी कुत्ता होता है इसलिए कुत्ते को भोजन करवाना शुभ माना जाता है। कालाष्टमी व्रत की कथा: एक पौराणिक कथा के अनुसार एक दिन भगवान ब्रह्मा और विष्णु के बीच कौन है श्रेष्ठ इसको लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। विवाद के समाधान के लिए दोनों सभी देवता और ऋषि मुनियों सहित शिव जी के पास पहुंचे। वहां पहुंच कर सभी को लगा कि सर्वश्रेष्ठ तो शिव जी ही हैं। इस बात से ब्रह्मा जी सहमत नहीं थे, वे क्रोधित हो कर शिव जी का अपमान करने लगे। वे बातें सुनकर शिव जी को क्रोध आ गया जिसके परिणाम स्वरूप कालभैरव का जन्म हुआ। कालाष्टमी की पूजा के लाभ: कालाष्टमी पर शिव जी का पंचामृत से अभिषेक करें, इससे दुर्घटनाओं का खतरा टलता है और कठिन रोग भी दूर हो जाते हैं। धन संपदा के लिए कालाष्टमी के दिन भगवान शिव को सफेद साफा पहनायें और सफेद मिठाई का भोग लगायें। इस दिन शंकर जी को 108 बिल्व पत्र, 21 धतूरे और भांग अर्पित करने से मुकदमों में जीत मिलेगी और शत्रु शांत होंगे। कालाष्टमी के दिन भैरवनाथ को नारियल और जलेबी का भोग लगाकर उसे वहीं भक्तों और गरीबों में बांटने से कार्यों में सफलता मिलती है। जन्मकुंडली में अगर मंगल ग्रह दोष है तो काल भैरव की पूजा से इस दोष का निवारण हो सकता है। ॐ काल भैरवाय नमः 🙏

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