Babita Sharma Jul 18, 2019

ॐ नमः शिवाय 🔱 क्यों करते हैं भगवान की आरती? आरती का अर्थ होता है – व्याकुल होकर भगवान को याद करना, उनका स्तवन करना। आरती, पूजा के अंत में धूप, दीप, कर्पूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। हिंदू धर्म में अग्नि को शुद्ध माना गया है। आरती एक विज्ञान है। आरती के साथ – साथ ढोल – नगाड़े, तुरही, शंख, घंटा आदि वाद्य भी बजते हैं। इन वाद्यों की ध्वनि से रोगाणुओं का नाश होता है। वातावरण पवित्र होता है। दीपक और धूप की सुगंध से चारों ओर सुगंध का फैलाव होता है। पर्यावरण सुगंध से भर जाता है। पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका जवाब स्कंद पुराण में मिलता है। इस पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन सिर्फ आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं। आरती करते हुए भक्त के मान में ऐसी भावना होनी चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारती कहलाती है। आरती प्रायः दिन में एक से पांच बार की जाती है। इसे हर प्रकार के धामिक समारोह एवं त्यौहारों में पूजा के अंत में करते हैं। आरती करने का समय 1-मंगला आरती-यह आरती भगवान् को सूर्योदय से पहले उठाते समय करनी चाहिए. 2 श्रृगार आरती-यह आरती भगवान् जी के श्रृंगार,पूजन आदि करने के बाद करनी चाहिए. 3- राजभोग आरती-यह आरती दोपहर को भोग लगाते समय करनी चाहिए,और भगवान् जी की आराम की व्यवस्था कर देनी चाहिए. 4-संध्या आरती-यह आरती शाम को भगवान् जी को उठाते समय करनी चाहिए. 5-शयन आरती -यह आरती भगवान् जी को रात्री में सुलाते समय करनी चाहिए. एक पात्र में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या (जैसे ३, ५ या ७) में बत्तियां जलाकर आरती की जाती है। इसके अलावा कपूर से भी आरती कर सकते हैं। मान्यता अनुसार ईश्वर की शक्ति उस आरती में समा जाती है, जिसका अंश भक्त मिल कर अपने अपने मस्तक पर ले लेते हैं। आरती से वातावरण में मौजूद नकारत्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। आरती के पूर्ण होते ही इस दिव्य व अलौकिक मंत्र को विशेष रूप से बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भबं भवानीसहितं नमामि।। इसका अर्थ इस प्रकार है- कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले। करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं। संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं। भुजगेंद्रहारम्- इसका अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं। सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभवानी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है। मंत्र का पूरा अर्थ- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णुजी द्वारा गाई हुई मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव शमशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य है। शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं। उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है, वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो। ॐ नमः शिवाय 🔱 हर हर महादेव 🌿🌿

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Babita Sharma Jul 17, 2019

भगवान भोलेनाथ ,माँ पार्वती सहित समस्त देवी देवताओं की कृपा आप पर बरसे🙏🙏सावन मास की शुभकामनाये ! ॐ नमः शिवाय 🔱 हर हर महादेव 🌿🌿 श्रावण या सरल शब्दों में सावन मास भगवान शिव का अत्यंत प्रिय महीना है। शिव शंकर का द्रव्य से पूजन करना चाहिए। सभी अभिषेक द्रव्य का फल अलग-अलग है। 1. गंगाजल या शुद्ध जल- सौभाग्य वृद्धि। 2. दुग्ध गाय का- गृह शांति तथा लक्ष्मी प्राप्ति। 3. सुगंधित तेल- भोग प्राप्ति। 4. सरसों का तेल- शत्रु नाश। 5. मीठा जल या दुग्ध- बुद्धि प्राप्ति। 6. घी- वंश वृद्धि। 7. पंचामृत- मनोवांछित प्राप्ति के लिए। 8. गन्ने का रस या फलों का रस- लक्ष्मी तथा ऐश्वर्य प्राप्ति। 9. छाछ - ज्वर से छुटकारा। 10. शहद- ऐश्वर्य प्राप्ति। शिव पूजन में कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखें जैसे - 🔱शिवजी की आराधना सुबह के समय पूर्व दिशा की ओर मुंह करके करनी चाहिए। 🔱 संध्या समय शिव साधना करते वक्त पश्चिम दिशा की ओर मुंह रखें। 🔱 अगर शिव उपासक रात्रि में शिव आराधना करता है तो उसके लिए उत्तर दिशा की ओर मुंह रखें। 🔱शिव उपासना के विशेष दिन सोमवार को बहुत ही शुभ फल मिलता है। 🔱चंपा और केवड़ा के पुष्प शिव पूजन में निषेध है। 🔱 श्रावण मास में शिव महापुराण का पाठ अत्यंत मंगलकारी होता है। ॐ नमः शिवाय 🔱 हर हर महादेव 🌿🌿

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Babita Sharma Jul 16, 2019

गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर समस्त गुरूजनों को शत् शत् नमन, विनम्र नमन, श्रद्धा नमन🙏🙏 गुरू पूर्णिमा की अनंत शुभकामनाएं 🌹🌹ॐ गुरुभ्यो नम: एक दरोगा....संत दादू की ईश्वर भक्ति और सिद्धि से बहुत प्रभावित था। उन्हें गुरु मानने की इच्छा से वह उनकी खोज में निकल पड़ा। लगभग आधा जंगल पार करने के बाद दरोगा को केवल धोती पहने एक साधारण-सा व्यक्ति दिखाई दिया। वह उसके पास जाकर बोला, “क्यों बे तुझे मालूम है कि संत दादू का आश्रम कहाँ है?” वह व्यक्ति दरोगा की बात अनसुनी कर के अपना काम करता रहा। भला दरोगा को यह सब कैसे सहन होता? लोग तो उसके नाम से ही थर-थर काँपते थे उसने आव देखा न ताव लगा ग़रीब की धुनाई करने। इस पर भी जब वह व्यक्ति मौन धारण किए अपना काम करता ही रहा तो दरोगा ने आग बबूला होते हुए एक ठोकर मारी और आगे बढ़ गया। थोड़ा आगे जाने पर दरोगा को एक और आदमी मिला। दरोगा ने उसे भी रोक कर पूछा, ”क्या तुम्हें मालूम है संत दादू कहाँ रहते है?” ”उन्हें भला कौन नहीं जानता, वे तो उधर ही रहते हैं जिधर से आप आ रहे हैं। यहाँ से थोड़ी ही दूर पर उनका आश्रम है। मैं भी उनके दर्शन के लिए ही जा रहा था। आप मेरे साथ ही चलिए।” वह व्यक्ति बोला। दरोगा मन ही मन प्रसन्न होते हुए साथ चल दिया। राहगीर जिस व्यक्ति के पास दरोगा को ले गया उसे देख कर वह लज्जित हो उठा क्यों संत दादू वही व्यक्ति थे जिसको दरोगा ने मामूली आदमी समझ कर अपमानित किया था। वह दादू के चरणों में गिर कर क्षमा माँगने लगा। बोला, ”महात्मन् मुझे क्षमा कर दीजिए, मुझसे अनजाने में अपराध हो गया।” दरोगा की बात सुनकर संत दादू हँसते हुए बोले, ”भाई, इसमें बुरा मानने की क्या बात? कोई मिट्टी का एक घड़ा भी ख़रीदता है तो ठोक बजा कर देख लेता है। फिर तुम तो मुझे गुरु बनाने आए थे।” संत दादू की सहिष्णुता के आगे दरोगा नतमस्तक हो गया। गुरु आपके उपकार का कैसे चुकाऊं मैं मोल लाख कीमती धन भला, गुरु है मेरा अनमोल जय गुरुदेव 🙏🙏

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Babita Sharma Jul 14, 2019

149 साल बाद गुरु पूर्णिमा पर होगा चंद्र ग्रहण, सभी राशियों पर होगा असर: मंगलवार,16 वह 17 की मध्यरात्रि को खंडग्रास चंद्रग्रहण दिखाई देगा।ये ग्रहण भारत में दिखाई देगा। इस बार आषाढ़ मास की पूर्णिमा यानी गुरु पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण हो रहा है।  मंगलवार, 16 जुलाई 2019 की रात करीब 1.30 बजे से ग्रहण शुरू हो जाएगा। इसका मोक्ष 17 जुलाई की सुबह करीब 4.30 बजे होगा। पूरे तीन घंटे ग्रहण रहेगा। 149 साल पहले ऐसे दुर्लभ योग बने थे। 12 जुलाई, 1870 को 149 साल पहले गुरु पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण हुआ था। उस समय भी शनि, केतु और चंद्र के साथ धनु राशि में स्थित था। सूर्य, राहु के साथ मिथुन राशि में स्थित था। सूतक का समय चंद्र ग्रहण का सूतक ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है। सूर्य ग्रहण का सूतक ग्रहण से 12 घंटे पहले शुरू होता है। चंद्र ग्रहण का सूतक काल दोपहर 1.30 बजे से शुरू हो जाएगा, जो कि 17 जुलाई की सुबह 4.31 बजे तक रहेगा। सूतक से पहले करें पूजा-पाठ 16 जुलाई को गुरु पूर्णिमा होने से इस दिन विशेष पूजा-पाठ करने की परंपरा है। इस दिन अपने गुरु की पूजा की जाती है। इस दिन पूजन दोपहर 1.30 बजे से पहले ही करना होगा। उसके बाद सूतक काल शुरु हो जाने से पूजा-पाठ नहीं हो सकेगी।सूतक लगने से पहले घर के अनाज आदि में तुलसी या कुश अवश्य डाल दें। सावन के पहले दिन भगवान शिव के पूजन और दर्शन के लिए भक्तों को थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है। सावन-2019 का महीना 17 जुलाई से शुरू हो रहा है। देर रात लगने वाले चंद्रग्रहण और सुबह 4 बजे के बाद इसके मोक्ष के समय के कारण सावन के पहले दिन पूजा-पाठ के समय में ये बदलाव हो रहे हैं। चंद्रग्रहण का स्पर्श 16 जुलाई की देर रात 1.31 बजे शुरू होगा और इसका मध्य तीन बजे होगा। ग्रहण का मोक्ष रात 4.30 बजे होगा। पूरे भारत में देखा जा सकने वाला इस खंड ग्रास चंद्रग्रहण की पूर्ण अवधि दो घंटे और 59 मिनट की होगी। भारत में चंद्र 17 जुलाई की सुबह 5.25 बजे अस्त होगा। इस बार सावन के शुरू होने के साथ एक और खास बात ये भी है कि सूर्य राशि बदलकर मिथुन से कर्क में प्रवेश करेंगे। ग्रहण का राशियों पर प्रभाव: सभी 12 राशियों पर ग्रहण का असर मेष राशि इस राशि के लिए ग्रहण के योग शुभ रहने वाला है। इन लोगों को सफलता के साथ ही मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। धन लाभ मिलने की संभावनाएं हैं। वृषभ राशि आपके लिए समय कष्टदायी रहेगा। सावधान रहकर काम करना होगा, क्योंकि धन हानि हो सकती है। मिथुन राशि इनके लिए दुखद समय रहेगा। काम समय पर पूरे नहीं होंगे। बाधाएं आएंगी। धैर्य रखें। कर्क राशि कर्क राशि के लिए उत्तम समय रहेगा। काम जल्दी पूरे होंगे और आशा के अनुरूप फल भी मिलेंगे। सुखद वातावरण रहेगा। सिंह राशि तनाव बढ़ सकता है। बाधाओं की वजह से किसी काम में मन नहीं लगेगा। मन शांत रखें। कुछ दिन बाद समय पक्ष में हो जाएगा। कन्या राशि चिंताएं बढ़ सकती हैं। नौकरी में अधिकारियों का सहयोग नहीं मिलने से मन उदास रहेगा। बने बनाए काम बिगड़ सकते हैं। तुला राशि लाभदायक समय रहेगा। सोचे हुए काम समय पर पूरे कर पाएंगे। अविवाहितों को विवाह के प्रस्ताव मिल सकते हैं। वृश्चिक राशि आपके लिए सावधान रहने का समय है। थोड़ी लापरवाही भी बड़ी हानि करवा सकती है। धनु राशि सतर्कता रखनी होगी। कोई करीबी व्यक्ति धोखा दे सकता है। नौकरी में नुकसान होने के योग बन रहे हैं। मकर राशि आपको इस समय संघर्ष करना होगा। पुरानी योजनाएं विफल हो सकती हैं। किसी अनजान व्यक्ति पर भरोसा न करें। कुंभ राशि इस राशि के लिए समय शुभ रहने वाला है। तरक्की मिल सकती है। कार्य समय पर पूरे हो जाएंगे और वर्चस्व बढ़ेगा। मीन राशि आपको लंबी दूरी की यात्रा पर जाना पड़ सकता है। इस यात्रा से लाभ मिलेगा। भविष्य को लेकर प्रसन्न रहेंगे। चंद्रग्रहण समाप्त होने के बाद घर में शुद्धता के लिए गंगाजल का छिड़काव जरूर करें। स्नान के बाद भगवान की मूर्तियों को स्नान कराके उनकी पूजा करें। ग्रहण काल के दौरान भगवान का ही नाम जाप करें। 16 जुलाई को गुरु पूर्णिमा होने से इस दिन विशेष पूजा-पाठ करने की परंपरा है। इस दिन अपने गुरु की पूजा की जाती है। इस दिन पूजन दोपहर 1.30 बजे से पहले ही करना होगा। उसके बाद सूतक काल शुरु हो जाने से पूजा-पाठ नहीं हो सकेगी। हरि ॐ 🙏

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Babita Sharma Jul 13, 2019

*🌹🙏सुप्रभात*🙏🌹जय श्री शनिदेव *निश्चल व्यक्ति के साथ किया गया छल आपकी बर्बादी के सभी द्वार खोल देता है, चाहे आप कितने भी बड़े शतरंज के धूर्त खिलाड़ी क्यों न हो ॥* 🌿🍁🌻🍃🍁🌻🌿 यह सरलतम उपाय, शनि के हर दोष से बचाए.... * गोरज मुहूर्त में चींटियों को तिल,चीनी डालना। * भगवान शंकर पर काले तिल व कच्चा दूध नित्य प्रतिदिन चढ़ाना चाहिए। यदि शिवलिंग पीपल वृक्ष के नीचे हो तो अति उत्तम। * सुंदरकांड का पाठ सर्वश्रेष्ठ फल प्रदान करता है। * काले उड़द जल में प्रवाहित करें। * काले उड़द भिखारियों को दान करें। * भैरव मंत्र का जप। * मां भगवती काली की आराधना करने से अत्यंत शुभ फल प्राप्त होते हैं। *गरीबों, असहायों को काला कंबल सप्तधान्य, काले वस्त्र दान करें। * अपने घर में संध्या के समय गुगल की धूप दें। शनिवार को घर का पुराना कबाड़ बेचने से शनिदेव की कृपा मिलती है। घर-परिवार को परेशानियों से छुटकारा मिलता है। ऐसे कई उपाय हैं, जिनके द्वारा शनि की शांति होती है। अतः आप बिना किसी संकोच के अपने मन से यह धारणा निकाल दें कि सारे दुःखों का कारण शनि ग्रह ही हैं। शनि ग्रह किसी कार्य को देर से करवाते हैं, परंतु कार्य अत्यंत सफल होता है। ऊँ शं शनैश्चाराय नमः🙏🙏🌹🌺🌹

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Babita Sharma Jul 9, 2019

देवशयनी एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं🙏 हरि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌹🌹 देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में जाते हैं। इसलिए अगले चार महीने तक कोई भी शुभ कार्य वर्जित हो जाते हैं। इसे चातुर्मास कहते हैं। भगवान विष्णु देवउठनी एकादशी के दिन निद्रा से जागते हैं। क्या है महत्व: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसे हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं। आषाढ़ के महीने में दो एकादशी आती है। एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। भगवान विष्णु ही प्रकृति के पालनहार हैं और उनकी कृपा से ही सृष्टि चल रही है। इसलिए जब श्रीहरि चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं तो उस दौरान कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। इसी समय से चातुर्मास की शुरुआत भी हो जाती है। इस समय कोई मांगलिक या भौतिक कार्य तो नहीं होता, लेकिन तपस्या होती है। इसलिए इसे चातुर्मास भी कहा जाता है। इसे बहुत ही शुभ महीना माना जाता है। देवशयनी एकादशी के बाद चार महीने तक सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति का तेजस तत्व कम हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि देवशयन हो गया है। शुभ शक्तियों के कमजोर होने पर किए गए कार्यों के परिणाम भी शुभ नहीं होते। चातुर्मास के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। देवशयनी एकादशी से साधुओं का भ्रमण भी बंद हो जाता है। वह एक जगह पर रुक कर प्रभु की साधना करते हैं। चातुर्मास के दौरान सभी धाम ब्रज में आ जाते हैं। इसलिए इस दौरान ब्रज की यात्रा बहुत शुभकारी होती है। अगर कोई व्यक्ति ब्रज की यात्रा करना चाहे तो इस दौरान कर सकता है। जब भगवान विष्णु जागते हैं, तो उसे देवोत्थान एकादशी या देवउठनी एकादशी कहा जाता है. इसके साथ ही शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं। इस बार देवशयनी एकादशी 12 जुलाई 2019 को है....देवशयनी एकादशी के बाद चार महीने तक सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति का तेजस तत्व कम हो जाता है। पूजन से लाभ : देवशयनी एकादशी व्रत करने और इस दिन भगवान श्रीहरि की विधिवत पूजन से सभी प्रकार के पापों का नाश होता है। सारी परेशानियां समाप्त हो जाती हैं। मन शुद्ध होता है, सभी विकार दूर हो जाते हैं। दुर्घटनाओं के योग टल जाते हैं। देवशयनी एकादशी के बाद शरीर और मन तक नवीन हो जाता है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा : एक राजा के राज्य में बरसात नहीं हो रही थी। सारे लोग बहुत परेशान थे और अपनी परेशानी लेकर राजा के पास पहुंचे। हर तरफ अकाल था। ऐसी दशा में राजा ने भगवान विष्णु की पूजा की। देवशयनी एकादशी का व्रत रखा। इसके फलस्वरूप भगवान विष्णु और राजा इंद्र ने बरसात की और राजा के साथ-साथ सभी लोगों के कष्ट दूर हो गए। पूजन विधि: इस दिन भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजन की जाती है ताकि चार महीने तक भगवान विष्णु की कृपा बनी रहे. – मूर्ति या चित्र रखें – दीप जलाएं – पीली वस्तुओं का भोग लगाएं – पीला वस्त्र अर्पित करें – भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें. अगर कोई मंत्र याद नहीं है तो सिर्फ हरि के नाम का जाप करें हरि का नाम अपने आप में एक मंत्र है – जप तुलसी या चंदन की माला से जप करें. – आरती करें. – विशेष हरिशयन मंत्र का उच्चारण करें: सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्दे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्। यानी, हे प्रभु आपके जगने से पूरी सृष्टि जग जाती है और आपके सोने से पूरी सृष्टि, चर और अचर सो जाते हैं. आपकी कृपा से ही यह सृष्टि सोती है और जागती है. आपकी करुणा से हमारे ऊपर कृपा बनाए रखें। श्री हरि की कृपा सभी पर सदा बनी रहे। हरि ॐ🙏🙏

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Babita Sharma Jul 8, 2019

शुभ दिवस की मंगलकामना 🌹🌹 भगवान गौरीशंकर की कृपा आप सभी पर सदा बनी रहे,ॐ नमः शिवाय 🔱 *समय को नमन।*🙏🙏समय कभी भी स्थिर नहीं रहता जिसने यह जान लिया सही मायने में जीत उसी की है। *"सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।* *सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।* *सदा न फूलै केतकी, सदा न सावन होय।* *सदा न विपदा रह सके, सदा न सुख भी कोय।* *सदा न मौज बसन्त री, सदा न ग्रीष्म भाण।* *सदा न जोवन थिर रहे, सदा न संपत माण।* *सदा न काहू की रही, गल प्रीतम की बांह।* *ढ़लते ढ़लते ढ़ल गई, तरवर की सी छाँह।"* "परिवार"का हाथ पकड़ कर चलिये; लोगों के "पैर" पकड़ने की नौबत नहीं आएगी; परिवार के प्रति जब तक मन में"खोट" और दिल में "पाप" है; तब तक सारे"मंत्र" और "जाप" बेकार है;। जीवन एक यात्रा है; रो कर जीने से बहुत लम्बी लगेगी; और हंस कर जीने पर कब पूरी हो जाएगी; पता भी नहीं चलेगा;। *ह्रदय कैसे चल रहा है;, यह डाक्टर बता देंगे; परन्तु ह्रदय में क्या चल रहा है; यह तो स्वयं को ही देखना है...!!* हर हर महादेव🙏 ॐ नमः शिवाय🙏

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Babita Sharma Jul 4, 2019

🙏रथ यात्रा के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं भगवान जगन्नाथ की कृपा से आप सभी का जीवन खुशहाल और समृद्ध बने।जय श्री जगन्नाथ 🚩 जब इस एक भक्त के लिए रूक जाता है भगवान जगन्नाथ का रथ, जानिए रोचक कहानी: प्रभु जगन्नाथ को भक्तों का भगवान कहा जाता है. जब-जब भक्तों ने भक्ति से पुकारा भगवान उस के साथ खड़े हुए नजर आए. यह कहा जाता है जब तक प्रभु जगन्नाथ की डोरी नही लगती तब तक प्रभु का दर्शन नहीं हो पाता है. कई ऐसी कहानी है जब प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों के विश्वास पर खरे उतरे हैं. महाप्रभु जगन्नाथ के सामने न कोई जाति है न कोई धर्म जो भी भगवान जगन्नाथ को भक्ति से पुकारता है भगवान उस की भक्ति पर खरे उतरते हैं. ऐसी है भक्त सालबेग की कहानी: ऐसी ही एक कहानी भक्त सालबेग की है जो धर्म से तो मुस्लिम थे, लेकिन प्रभु जगन्नाथ के सबसे बडे भक्त बन गये थे. भक्त सालबेग के पिता मुस्लिम और माता ब्राह्मण थीं. सालबेग के पिता मुगल आर्मी में सैनिक थे. अपने पिता की तरह सालबेग ने भी मुगल आर्मी में काम किया. एक बार युद्ध के दौरान सालबेग पूरी तरह घायल हो गए. जब सभी को लगा था कि सालबेग ठीक नहीं हो पाएंगे तब सालबेग की मां ने प्रभु जगन्नाथ की शरण में जाने के लिए कहा. जगन्नाथ के आर्शीवाद से सालबेग पूरी तरह ठीक हो गए और प्रभु जगन्नाथ के बहुत बडे भक्त बन गए. सालबेग ने जगन्नाथ की भक्ति में कई भक्ति कविता भी लिखीं. एक बार सालबेग प्रभु जगन्नाथ से मिलने के लिए पुरी गए, लेकिन मुसलमान होने की वजह से उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया. फिर हर साल सालबेग रथ यात्रा के दौरान पुरी जाते थे और प्रभु जगन्नाथ के दूर से दर्शन करते थे. एक बार रथयात्रा के दिन सालबेग पुरी से बाहर थे. उन्हें लगा की समय पर रथ यात्रा देखने के लिए पुरी पहुंच नहीं पाएंगे. सालबेग ने प्रभु जगन्नाथ से विनती की, कि उनके पहुंचने तक वह इंतजार करें. फिर क्या हुआ भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्त की बात मान ली. रथ जहां खड़ा था वहीं रूक गया . लाखों भक्त भगवान के रथ को आगे ले जाने के लिए कोशिश कर रहे थे. भक्तों की कई कोशिशों के बावजूद रथ आगे नहीं जा रहा था. जैसे ही सालबेग पुरी पहुंचे और भगवान के दर्शन कर लिए, तब रथ आगे जाने लगा. इसके बाद भक्त सालबेग की भक्ति के बारे में सभी को पता चला. फिर सालबेग पुरी में रहने लगे. उनके देहांत के बाद उनकी समाधि पुरी के उस जगह पर बनाई गई जहां वह रहते थे. इस समाधि के रास्ते में प्रभु जगन्नाथ रथ हर साल जाता है और जब रथ इस जगह पर पहुंचता है तो कुछ समय के लिए रूक जाता है. भक्त वत्सल भगवान जगन्नाथ की कृपा सभी भक्तों पर सदैव बनी रहे‌ 🚩🙏🙏

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