Babita Sharma Dec 3, 2019

*दुनिया के हर रिश्ते को निभाने के लिए, चौबीसों घंटे लगे रहते हैं, फिर भी सब नाराज रहते हैं*..!! *एक 'परमात्मा' है, जिसे अगर एक घंटे का भी समय दे दें, तो वे इतना खुश हो जाते हैं, कि हमें 'भवसागर' से पार कर देते हैं*..!! सुप्रभात🙏🙏जय श्री राम 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता है लेकिन पूजा साधना की दृष्टि से यह बातें अति महत्वपूर्ण हैं... 1. गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं। भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है। 2. कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है। 3. बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते। 4. रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए। 5. केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए। 6. केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें। 7. देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए। 8. शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता। 9. जो मूर्ति स्थापित हो उसका आवाहन और विसर्जन नहीं होता। 10. तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें। 11. पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें। 12. मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है। 13. कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है। 14. पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है। 15. शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है। 16. हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं। 17. पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए। 18. दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है। दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखें। देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें। दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है। 19. द्वादशी, संक्रांति, रविवार, पक्षान्त और संध्याकाल में तुलसीपत्र न तोड़ें। 20. प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं। 21. आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है। 22. जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं। 23. मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें। 24. मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें। 25. पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें। 26. जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है। 27. पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें। 28. कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें। 29. अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें। 30. मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है। जय सियाराम जी की 🙏🙏

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Babita Sharma Nov 30, 2019

शुभ प्रभात जय सियाराम 🙏🌹🌹 विवाह पंचमी पर आपके सभी कष्ट दूूूर हो जाएं, आप अपनों के करीब और सेहत से अमीर हो जाएं. विवाह पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं🎉🎉🎉🎉 1 दिसंबर रविवार को है विवाह पंचमी श्री राम और माता सीता की शादी का पवित्र दिन🙏🙏 विवाह पंचमी मार्गशीर्ष के महीने के दौरान शुक्ल पक्ष के पांचवें दिन मनाया जाता है। इस वर्ष विवाह पंचमी 1 दिसंबर (रविवार) को मनाया जाएगा। विवाह पंचमी 1 दिसंबर 2019, रविवार  विवाह पंचमी पूजा का समय : पंचमी तिथि प्रारंभ - नवंबर 30, 2019 को शाम 06:05 बजे पंचमी तिथि समाप्त - दिसंबर 01, 2019 को शाम 07:13 बजे  मार्गशीर्ष (अगहन) मास में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्र जी एवं माता सीता जी का विवाह शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मिथिला राज्य जनकपुर में हुआ था। राजा जनक ने जिस दिन सीता स्वयंवर का आयोजन रखा था उस दिन मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी। अयोध्या पति महाराज दशरथ के जेष्ठ पुत्र राम ने अपने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से ही भगवान शिव के धनुष को तोड़कार राजा जनक की प्रतिज्ञा को पूर्णता प्रदान करते हुए उनकी पुत्री सीता से विवाह किया था।   विवाह पंचमी के दिन क्या वरदान मिलते हैं?  इस दिन पूजा करने से शादी में आने वाली समस्याएं, दिक्कतें दूर हो सकती हैं और विवाह जल्दी होने के रास्ते खुलते हैं।   ऐसे पति पत्नी जिनका वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं है, आपसी मतभेद लड़ाई झगड़े होते हैं उन लोगों को इस दिन अवश्य पूजा करनी चाहिए। इस दिन रामचरितमानस का पाठ करना चाहिए। बालकांड में भगवान राम और सीता विवाह का पाठ करना चाहिए। विवाह पंचमी के दिन राम सीता का विवाह कराएं।  प्रातः काल स्नान करने के बाद राम विवाह का संकल्प लेना चाहिए। उसके बाद विवाह की तैयारियां शुरू कर दें।  भगवान राम और माता सीता की प्रतिकृति (मूर्ति) की स्थापना करें। भगवान राम को पीले और माता सीता को लाल वस्त्र पहनाएं। बालकांड पढ़ते हुए विवाह प्रसंग का पाठ करें। ॐ जानकीवल्लभाय नमः का जाप करें। फिर भगवान राम और माता सीता का गठबंधन करें। उसके पश्चात आरती करें। गठबंधन किए हुए वस्तुओं को अपने पास संभालकर रखें। विवाह पंचमी के दिन नहीं होता है विवाह: विवाह पंचमी के दिन राम और सीता का विवाह हुआ था, पर इसके बावजूद भारत के कई स्थानों में इस दिन विवाह नहीं किए जाते हैं। नेपाल और मिथिलांचल में भी इस दिन विवाह नहीं किया जाता है। कुछ लोग राम और सीता के विवाह को एक दुखद विवाह मानते हैं। सियावर रामचन्द्र की जय🙏🙏

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Babita Sharma Nov 29, 2019

सुप्रभात वंदन ....🙏जय माता दी 🚩 🌹काल कंटक दूर भंडारा भरपूर 🙏मां महालक्ष्मी सदा आपके भंडार भरें 🌹🌹शुभ शुक्रवार शुक्रवार को मां महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के उपाय: सप्ताह में सात दिन होते हैं और सभी दिनों में किसी न किसी देवी-देवता को पूजा जाता है। शुक्रवार मां लक्ष्मी का दिन है। मां लक्ष्मी अपनी अर्चना से प्रसन्न होती है। माता लक्ष्मी की पूजा शुक्रवार के दिन करने से वह अति प्रसन्न होती हैं। ऐसे ही शुक्रवार के दिन कुछ अचूक उपाय करने से घर से बुरी बला टल जाती है। साथ ही व्यक्ति के सभी बिगड़े काम बनते हैं। शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के कुछ उपाय करने से धन वर्षा होती है। शुक्रवार के उपाय- लक्ष्मी विष्णु भगवान की अर्धांगिनी हैं इसलिए उन्हें प्रसन्न करने के लिए आप भगवान विष्णु की आराधना करें। इसके लिए आप शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें भगवान विष्णु और लक्ष्मी की एक साथ पूजा से भी लाभ मिलेगा। शुक्रवार के दिन आप कौड़ी वाला उपाय भी कर सकते हैं। इसके लिए आप एक पीला कपड़ा लें उसमें पांच पीली कौड़ी, केसर, एक चांदी का सिक्क रख लें। अब इसकी पोटली बांधकर घर की तिजोरी में रख दें। इससे दरिद्रता दूर होती हैं और धन लाभ के रास्ते खुलते हैं। शुक्रवार के दिन सुबह उठकर माता लक्ष्मी को नमन करें। इसके बाद शुक्रवार को सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए। शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी का सूक्त पाठ करें। माता लक्ष्मी को लाल या सफेद रंग का कमल पुष्प अर्पित करें। शुक्रवार के दिन घर से निकलते समय थोड़ा-सा दही खा लें, इस दही में मिश्री-चीनी आदि मिला लें। शुक्रवार के दिन बेडरूम में पक्षी जोड़े या हंस के जोड़े की फोटो लगाएं, इससे पति-पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होगा। शुक्रवार के दिन काली चींटियों को आटा या शक्कर खिलाना चाहिए, इससे सभी तरह की समस्याएं दूर होती हैं। शुक्रवार को माता लक्ष्मी के मंदिर जाकर शंख, कौड़ी, कमल, मखाना, बताशा मां को अर्पित करें। इससे मनोकामनाएं पूरी होंगी। शुक्रवार के दिन पीपल के वृक्ष की जड़ में लोहे के पात्र में जल लेकर, चीनी, घी तथा दूध डालना शुभ होता है। इससे घर में धन लाभ होता है। शुक्रवार को घर के मुख्य द्वार पर गुलाल छिड़कना शुभ होता है। इसके साथ ही गुलाल पर दो मुखी घी का दीपक जलाएं। इससे घर में कभी पैसों की कमी नहीं होगी। दीपक बुझ जाने के बाद इसे बहते जल में बहा दें। शुक्रवार के दिन कुंवारी कन्या को खीर खिलाएं। कन्या को दान दक्षिणा में पीले वस्त्र दें। माता लक्ष्मी की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥🙏🙏

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Babita Sharma Nov 27, 2019

महादेव के प्यारे हैं,मां गौरी के दुलारे हैं। सबके विघ्नहर्ता गणेश हमारे हैं। बुद्ध करें शुद्ध 🙏🙏शुभ दिवस की मंगलकामना 🌹🌹जय श्री गणेशाय नमः 🌹🌹 🌹🌹जय हो गजानन की🌹🌹 ॐ गं गणपतए नमः 🙏🌹🌹 एक व्यक्ति हर दिन सुबह शाम गणेश जी की पूजा करता है। धूप-दीप दिखाता। लेकिन कई वर्षों तक पूजा करने के बाद भी उसे जब कुछ लाभ नहीं दिखा तो गणेश जी से नाराज हो गया। इस व्यक्ति ने गणेश जी की पूजा बंद करके लक्ष्मी माता की पूजा शुरू कर दी। इसने देखा कि जो धूप दीप वह लक्ष्मी मां को दिखा रहा है उसका धुआं गणेश जी के पास भी जा रहा है। वह झट से रूई लेकर आया और गणेश जी नाक में लगा दिया, ताकि गणेश जी को धूप-दीप का गंध भी नहीं मिले। गणेश जी की मूर्ति जड़ से चेतन अवस्था में आकर हंसने लगी। व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि, आखिर जब तक मैं धूप-दीप दिखाकर गणेश जी की पूजा करता रहा तब तो गणेश जी नहीं आये, लेकिन आज जब मैंने उनकी नाक रूई से बंद कर दी तो गणेश जी भला कैसे मूर्ति में प्रकट हो गये। गणेश जी अपने भक्त के मन की बात समझ गये और बोले जब तक तुम मुझे जड़ मानते रहे अर्थात मिट्टी की मूर्ति मानकर पूजते रहे तब तक मैं जड़ बना रहा। आज तुमने मेरी नाक में रूई लगाया ताकि मैं धूप-दीप का गंध न प्राप्त कर सकूं इसका मतलब है कि तुमने आज मुझे चेतन अर्थात जीवित मान लिया है, बस यही कारण है कि मैं तुम्हारे सामने जीवित उपस्थित हूं। यानी ईश्वर की मूर्ति में चावल लेकर संस्कृत के कुछ मंत्र बोलकर मूर्ति पर चावल फेंकने से ईश्वर की मूर्ति में प्राण का संचार नहीं होता है। मूर्ति में प्राण का संचार हमारी आस्था से होता है। अगर बाजार से मूर्ति खरीदकर ले आयें और पूर्ण आस्था से मूर्ति को साक्षात मानकर उनकी पूजा करने लगें तो मूर्ति में भी ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। मूर्ति पर मंत्र द्वारा चावल फेंककर प्राण प्रतिष्ठा का तात्पर्य भी यही है कि व्यक्ति में यह विश्वास उत्पन्न हो कि मूर्ति में भगवान प्रवेश कर चुके हैं।जिस घड़ी आपने ईश्वर को चेतन जाना उस समय वास्तव में ईश्वर उस मूर्ति में वर्तमान थे। जब आपने उन्हें मात्र मूर्ति मानकर पूजा किया तो वह मात्र मूर्ति बने रहे। जय श्री गणेश🙏🙏

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Babita Sharma Nov 24, 2019

शुभ प्रभात वंदन ...🌞 शुभ रविवार 🌹🌹 ॐ सूर्याय नमः *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे,* *हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!* *Զเधे_Զเधे Զเधे_Զเधे* 🚩*जय श्री कृष्ण*🚩 इस मंदिर के दर्शन के बिना अधूरी है जगन्नाथ पुरी की यात्रा उड़ीसा शहर के पुरी के नजदीक साक्षी गोपाल नामक एक मंदिर है. एक बार दो ब्राह्मण वृंदावन की यात्रा पर निकले जिनमें से एक वृद्ध था और दूसरा जवान था. यात्रा काफी लम्बी और कठिन थी जिस कारण उन दोनों यात्रियों को यात्रा करने में कई कष्टों का सामना करना पड़ा उस समय रेलगाड़ियों की भी सुविधा उपलब्ध नहीं थी. वृद्ध व्यक्ति ब्राह्मण युवक का अत्यंत कृतज्ञ था क्योंकि उसने यात्रा के दौरान वृद्ध व्यक्ति की सहायता की थी. वृंदावन पहुंचकर उस वृद्ध व्यक्ति ने कहा," हे युवक ! तुमने मेरी अत्यधिक सेवा की है. मैं तुम्हारा अत्यंत कृतज्ञ हूं. मैं चाहता हूं कि तुम्हारी इस सेवा के बदले में मैं तुम्हे कुछ पुरस्कार दूं." उस ब्राह्मण युवक ने उससे कुछ भी लेने से इंकार कर दिया पर वृद्ध व्यक्ति हठ करने लगा. फिर उस वृद्ध व्यक्ति ने अपनी जवान पुत्री का विवाह उस ब्राह्मण युवक से करने का वचन दिया ब्राह्मण युवक ने वृद्ध व्यक्ति को समझाया कि ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि आप बहुत अमीर हैं और मैं तो बहुत ही गरीब ब्राह्मण हूं. यह वार्तालाप मंदिर में भगवान गोपाल कृष्ण के श्रीविग्रह के समक्ष हो रहा था लेकिन वृद्ध व्यक्ति अपनी हठ पर अड़ा रहा और फिर कुछ दिन तक वृंदावन रहने के बाद दोनों घर लौट आएं. वृद्ध व्यक्ति ने सारी बातें घर पर आकर बताई कि उसने अपनी बेटी का विवाह एक ब्राह्मण से तय कर दिया है पर पत्नी को यह सब मजूंर नहीं था. उस वृद्ध पुरुष की पत्नी ने कहा," यदि आप मेरी पुत्री का विवाह उस युवक से करेंगे तो मैं आत्महत्या कर लूंगी." कुछ समय व्यतीत होने के बाद ब्राह्मण युवक को यह चिंता थी कि वृद्ध अपने वचन को पूरा करेगा या नहीं. फिर ब्राह्मण युवक से रहा न गया और उसने वद्ध पुरुष को उसका वचन याद करवाया. वह वृद्ध पुरुष मौन रहा और उसे डर था कि अगर वह अपनी बेटी का विवाह इससे करवाता है तो उसकी पत्नी अपनी जान दे देगी और वृद्ध पुरुष ने कोई उत्तर न दिया. तब ब्राह्मण युवक उसे उसका दिया हुआ वचन याद करवाने लगा और तभी वृद्ध पुरुष के बेटे ने उस ब्राह्मण युवक को ये कहकर घर से निकाल दिया कि तुम झूठ बोल रहे हो और तुम मेरे पिता को लूटने के लिए आए हो, फिर ब्राह्मण युवक ने उसके पिता द्वारा दिया गया वचन याद करवाया." फिर ब्राह्मण युवक ने कहा कि यह सारे वचन तुम्हारे पिता जी ने श्रीविग्रह के सामने दिए थे तब वृद्ध व्यक्ति का ज्येष्ठ पुत्र जो भगवान को नहीं मानता था युवक को कहने लगा अगर तुम कहते हो भगवान इस बात के साक्षी है तो यही सही. यदि भगवान प्रकट होकर यह साक्षी दें कि मेरे पिता ने वचन दिया है तो तुम मेरी बहन के साथ विवाह कर सकते हो. तब युवक ने कहा," हां , मैं भगवान श्रीकृष्ण से कहूंगा कि वे साक्षी के रूप में आएं. उसे भगवान श्रीकृष्ण पर पूरा विश्वास था कि भगवान श्रीकृष्ण उसके लिए वृदांवन से जरूर आएंगे. फिर अचानक वृदांवन के मंदिर की मूर्ति से आवाज सुनाई दी कि मैं तुम्हारे साथ कैसे चल सकता हूं मैं तो मात्र एक मूर्ति हूं ,तब उस युवक ने कहा ," कि अगर मूर्ति बात कर सकती है तो साथ भी चल सकती है. तब भगवान श्रीकृष्ण ने युवक के समक्ष एक शर्त रख दी कि तुम मुझे किसी भी दिशा में ले जाना मगर तुम पीछे पलटकर नहीं देखोगे तुम सिर्फ मेरे नूपुरों की ध्वनि से यह जान सकोगे कि मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूं. "युवक ने उनकी बात मान ली और वह वृंदावन से चल पड़े और जिस नगर में जाना था वहां पहुंचने के बाद युवक को नूपुरों की ध्वनि आना बंद हो गई और युवक ने धैर्य न धारण कर सकने के कारण पीछे मुड़ कर देख लिया और मूर्ति वहीं पर स्थिर खड़ी थी अब मूर्ति आगे नहीं चल सकती थी क्योंकि युवक ने पीछे मुड़ कर देख लिया था. वह युवक दौड़कर नगर पहुंचा और सब लोगों को इक्ट्ठा करके कहने लगा कि देखो भगवान श्रीकृष्ण साक्षी रूप में आये हैं. लोग स्तंभित थे कि इतनी बड़ी मूर्ति इतनी दूरी से चल कर आई है. उन्होंने श्रीविग्रह के सम्मान में उस स्थल पर एक मंदिर बनवा दिया और आज भी लोग इस मंदिर में साश्री गोपाल की पूजा करते है। इस मन्दिर के बारे में यह धारणा प्रचलित है कि जो श्रद्धालु पुरी में जगन्नाथ जी के दर्शन करने के लिए आएगा उस की यह यात्रा तब ही सम्पूर्ण होगी यदि वह साक्षी गोपाल मन्दिर के भी दर्शन करेगा।  हरि ॐ 🙏

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Babita Sharma Nov 22, 2019

राधे राधे 🙏 उत्पन्ना एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹 शुभ एकादशी 🌹 श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी 🚩🚩हे नाथ नारायण वासुदेव जय माता दी 🚩 उत्पन्ना एकादशी कब मनाई जाती हैं : यह एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष के दिन मनाई जाती हैं . इसी दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था, इसी कारण इस दिन को उत्पन्ना एकादशी कहा जाता हैं . इसी दिन स्वयं भगवान विष्णु ने माता एकादशी को आशीर्वाद में इस दिन को एक महान व्रत बताया था. प्रति माह दो एकादशी का महत्व पुराणों में निकलता हैं सभी का फल एक समान एवं उत्तम होता हैं . माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखने से मानव जाति के पहले और वर्तमान दोनों के पाप मिट जाते है. जो भक्तजन हर महीने आने वाली एकादशी का व्रत शुरू करना चाहते है, वे लोग उत्पन्ना एकादशी से ही अपने एकादशी के व्रत शुरू करते है. उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा: स्वयं श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी माता के जन्म की कथा सुनाई : सतयुग के समय एक महा बल शाली राक्षस था, जिसका नाम मुर था . उसने अपनी शक्ति से स्वर्ग लोक को जीत लिया था . उसके पराक्रम के आगे इंद्र देव, वायु देव, अग्नि देव कोई भी नहीं टिक पाये थे, जिस कारण उन सभी को जीवन व्यापन के लिये मृत्युलोक जाना पड़ा . हताश होकर इंद्र देव कैलाश गये और भोलेनाथ के सामने अपने दुःख और तकलीफ का वर्णन किया . उसने प्रार्थना की कि वे उन्हें इस परेशानी से बाहर निकाले . भगवान शिव ने उन्हें विष्णु जी के पास जाने की सलाह दी . उनकी सलाह पर सभी देवता क्षीरसागर पहुंचे, जहाँ विष्णु जी निद्रा में थे . सभी ने इंतजार किया . कुछ समय बाद विष्णु जी के नेत्र खुले तब सभी देवताओं ने उनकी स्तुति की . विष्णु जी ने उनसे क्षीरसागर आने का कारण पूछा . तब इंद्र देव ने उन्हें विस्तार से बताया कि किस तरह मुर नामक राक्षस ने सभी देवताओं को मृत्यु लोक में जाने के लिये विवश कर दिया . सारा वृतांत सुन विष्णु जी ने कहा ऐसा कौन बलशाली हैं जिसके सामने देवता नही टिक पाये . तब इंद्र ने राक्षस के बारे में विस्तार से बताया कि इस राक्षस का नाम मुर हैं उसके पिता का नाम नाड़ी जंग हैं यह ब्रह्मवंशज हैं . उसकी नगरी का नाम चन्द्रावती हैं उसने अपने बल से सभी देवताओं को हरा दिया और उनका कार्य स्वयं करने लगा हैं वही सूर्य है वही मेघ और वही हवा और वर्षा का जल हैं . उसे हरा कर हमारी रक्षा करे नारायण . पूरा वर्णन सुनने के बाद विष्णु जी ने इंद्रा को आश्वासन दिया कि वो उन्हें इस विप्पति के निकालेंगे . इस प्रकार विष्णु जी मुर दैत्य से युद्ध करने उसकी नगरी चन्द्रावती जाते हैं . मुर और विष्णु जी के मध्य युद्ध प्रारंभ होता हैं . कई वर्षो तक युद्ध चलता हैं . कई प्रचंड अस्त्र शस्त्र का उपयोग किया जाता हैं पर दोनों का बल एक समान सा एक दुसरे से टकरा रहा था . कई दिनों बाद दोनों में मल्ल युद्ध शुरू हो गया और दोनों लड़ते ही रहे कई वर्ष बीत गये . बीच युद्ध में भगवान विष्णु को निद्रा आने लगी और वे बद्रिकाश्रम चले गये . शयन करने के लिये भगवान हेमवती नमक एक गुफा में चले गये . मुर भी उनके पीछे घुसा और शयन करते भगवान को देख मारने को हुआ जैसे ही उसने शस्त्र उठाया भगवान के अंदर से एक सुंदर कन्या निकली और उसने मुर से युद्ध किया . दोनों के मध्य घमासान युद्ध हुआ जिसमे मुर मूर्छित हो गया बाद में उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया गया . उसके मरते ही दानव भाग गये और देवता इन्द्रलोक चले गये . जब विष्णु जी की नींद टूटी तो उन्हें अचम्भा सा लगा कि यह सब कैसे हुआ तब कन्या ने उन्हें पूरा युद्ध विस्तार से बताया जिसे जानकर विष्णु जी प्रसन्न हुये और उन्होंने कन्या को वरदान मांगने कहा . तब कन्या ने भगवान से कहा मुझे ऐसा वर दे कि अगर कोई मनुष्य मेरा उपवास करे तो उसके सारे पापो का नाश हो और उसे विष्णुलोक मिले . तब भगवान विष्णु ने उस कन्या को एकादशी नाम दिया और कहा इस व्रत के पालन से मनुष्य जाति के लोगो के पापो का नाश होगा और उन्हें विष्णुलोक मिलेगा . उन्होंने यह भी कहा इस दिन तेरे और मेरे भक्त समान होंगे यह व्रत मुझे सबसे प्रिय होगा जिससे मनुष्य को मोक्ष प्राप्त होगा . इस प्रकार भगवान चले जाते हैं और एकादशी का जन्म सफल हो जाता हैं . इस प्रकार एकादशी का जन्म उत्पन्ना एकादशी से होता हैं और तब ही से आज तक इस व्रत का पालन किया जाता हैं और इसे सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा जाता हैं। उत्‍पन्ना एकादशी की तिथि और शुभ मुहूर्त  उत्‍पन्ना एकादशी की तिथि: 22 नवंबर 2019 एकादशी तिथि प्रारंभ: 22 नवंबर 2019 को सुबह 09 बजकर 01 मिनट से एकादशी तिथि समाप्‍त: 23 नवंबर 2019 को सुबह 06 बजकर 24 मिनट तक पारण का समय: 23 नवंबर 2019 को दोपहर 01 बजकर 10 मिनट से दोपहर 03 बजकर 15 मिनट तक  हरि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🙏 श्री कृष्ण: शरणं मम् 🙏

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