Babita Sharma Jan 23, 2019

ॐ सर्व सिद्धि प्रदाय नम: जय श्री गणेशाय नम: गणेश जी सदा सहाय हों🙏🙏 गणेशजी के इन 12 प्रसिद्ध नामों से हो जाती है हर बाधा दूर: इन बारह नामो के अर्थ : 1- सुमुख — अर्थात सुन्दर मुख वाले, 2- एकदन्त — अर्थात एक दांत वाले, 3- कपिल — अर्थात कपिल वर्ण के, 4- गजकर्ण — अर्थात हाथी के कान वाले, 5- लम्बोदर — अर्थात लम्बे पेट वाले, 6- विकट — अर्थात विपत्ति का नाश करने वाले, 7- विनायक — अर्थात न्याय करने वाले, 8- धूम्रकेतु — अर्थात धुएं के रंग वाली पताका वाले, 9- गणाध्यक्ष — अर्थात गुणों और देवताओं के अध्यक्ष, 10- भालचन्द्र — अर्थात मस्तक पर चन्द्रमा धारण करने वाले, 11- गजानन — अर्थात हाथी के समान मुख वाले, 12- विघ्ननाशक — अर्थात विघ्‍नों को हरने वाले

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Babita Sharma Jan 21, 2019

पौष मास की पूर्णिमा को माता दुर्गा ने लिया था शाकंभरी अवतार, इस बार 21 जनवरी यानि आज मनाई जाएगी शाकंभरी जयंती आज (21 जनवरी, सोमवार) पौष मास की पूर्णिमा है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इस दिन माता शाकंभरी की जयंती मनाई जाती है। माता शाकंभरी को देवी दुर्गा का ही रूप माना जाता है। देवी शाकंभरी की हैं हजारों आंखें, इसलिए इनका एक नाम शताक्षी भी है। 🙏इसलिए माता दुर्गा ने लिया शाकंभरी अवतार - दानवों के उत्पात से त्रस्त भक्तों ने कई वर्षों तक सूखा एवं अकाल से ग्रस्त होकर देवी दुर्गा से प्रार्थना की। तब देवी इस अवतार में प्रकट हुईं, उनकी हजारों आखें थीं। - अपने भक्तों को इस हाल में देखकर देवी की इन हजारों आंखों से नौ दिनों तक लगातार आंसुओं की बारिश हुई, जिससे पूरी पृथ्वी पर हरियाली छा गई। - यही देवी शताक्षी के नाम से भी प्रसिद्ध हुई एवं इन्ही देवी ने कृपा करके अपने अंगों से कई प्रकार की शाक, फल एवं वनस्पतियों को प्रकट किया। इसलिए उनका नाम शाकंभरी प्रसिद्ध हुआ। - पौष मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शाकंभरी नवरात्र का आरंभ होता है, जो पौष पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इस दिन शाकंभरी जयंती का पर्व मनाया जाता है। - मान्यता के अनुसार इस दिन असहायों को अन्न, शाक (कच्ची सब्जी), फल व जल का दान करने से अत्यधिक पुण्य की प्राप्ति होती हैं व देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं। ऐसा है माता शाकंभरी का स्वरूप - धर्म ग्रंथों के अनुसार देवी शाकंभरी आदिशक्ति दुर्गा के अवतारों में एक हैं। दुर्गा के सभी अवतारों में से रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी, शाकंभरी प्रसिद्ध हैं। दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य में देवी शाकंभरी के स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है- मंत्र शाकंभरी नीलवर्णानीलोत्पलविलोचना। मुष्टिंशिलीमुखापूर्णकमलंकमलालया।। अर्थात- देवी शाकंभरी का वर्ण नीला है, नील कमल के सदृश ही इनके नेत्र हैं। ये पद्मासना हैं अर्थात् कमल पुष्प पर ही विराजती हैं। इनकी एक मुट्‌ठी में कमल का फूल रहता है और दूसरी मुट्‌ठी बाणों से भरी रहती है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग इस दिन व्रत रखते हैं और स्नान और दान करते हैं वो जन्म मरण के फेर हट जाते हैं। उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए इस दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने बहुत ही शुभ माना गया है। बात ये है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा का अनोखा संगम होता है, क्योंकि ये माह सूर्य देव का है जबकि पूर्णिमा चंद्रमा की तिथि होती है। माना जाता है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों की पूजा करके मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। जय माता दी 🚩 मातारानी आप सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करें।

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Babita Sharma Jan 20, 2019

*🌹🙏जय जय श्री राधे कृष्णा🙏🌹* *मीठा बोलो,मिल के चलो,सबसे करो स्नेह।* *कितने दिन का जीवन है, कितने दिन की यह देह।।* *श्री कृष्णम शरणम ममः* *🙏सादर नमस्कार🙏* एक राजा के दरबार में ब्राह्मण भोज का आयोजन किया गया। छप्पनभोग महल के खुले आंगन में बनवाए गए। उसी वक्त अनजाने में एक हादसा हो गया। खुले में पक रही रसोई के ऊपर से एक चील अपने पंजे में जिंदा सांप दबोचकर निकल रही थी। सांप ने चील के पंजों से छुटकारा पाने के लिए फुंफकार भरी और साथ ही जहर उगला। उसके मुख से निकली जहर की कुछ बूंदें पाकशाला में पक रही रसोई के व्यंजनों में गिर गईं। जहरीले भोजन के खाने से सभी ब्राह्मण काल के गाल में समा गए। जब राजा को इस बात का पता चला तो ब्रह्महत्या के पाप ने उसको दुखी कर डाला। ऐसे में सबसे ज्यादा मुश्किल खड़ी हो गई यमराज के लिए कि आखिर इस पाप का भागी कौन है और ब्रह्महत्या के पाप के लिए किसको दंड दिया जाए। सबसे पहला नाम राजा का आया, क्योंकि राजा ने ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रित किया था। यमराज के मन में दूसरा नाम रसोइये का आया, जिसने ब्राह्मणों के लिए महाप्रसाद तैयार किया था। राजा को तीसरा ख्याल चील का आया जो सांप को पकड़कर ले जा रही थी। सबसे अंत में यमराज ने सांप के पाप पर विचार किया। लंबे समय तक यमराज अनिर्णय की स्थिति में रहे कि आखिर ब्रह्महत्या का दंड किसको दिया जाए। घटना के कुछ समय बाद कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने के लिए उसके महल में जा रहे थे। ब्राह्मणों ने एक महिला से महल का रास्ता पूछ लिया। तब महिला ने ब्राह्मणों को रास्ता बताते हुए कहा- 'देखो भाई जरा ध्यान से जाना। वह राजा ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है।' जैसे ही महिला ने यह बात कही, यमराज ने फैसला कर लिया कि मृत ब्राह्मणों के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और यह दंड को भोगेगी। यमदूतों ने यमराज से पूछा- 'प्रभु ऐसा क्यों?' तब यमराज ने कहा- 'जब कोई व्यक्ति पाप करता है तो उसको पापकर्म करने में बड़ा आनंद आता है। ब्राह्मणों की मौत से न तो राजा को, न रसोईये को, न चील को और न ही सांप को आनंद आया। ये सभी इस अपराध से अनजान भी थे। महापाप की इस दुर्घटना का इस महिला ने जोर-शोर से बखान कर जरूर मजा लिया, इसलिए ब्रह्महत्या का यह पाप इसके खाते में जाएगा।' अक्सर हम यही सोचते हैं कि हमने कभी कोई बड़ा पाप नहीं किया है, उसके बावजूद हमको किस बात का दंड मिल रहा है। यह दंड वही होता है, जो हम परनिंदा का पाप कर संचित करते रहते हैं। जय जय श्री राधे 🙏

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