Babita Sharma Sep 24, 2020

सुप्रभात वंदन 🌞🌹 *हरि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय* हरि सुमिरन करते रहें, ईश्वर की कृपा जरुर मिलेगी 🙏🙏 *जय श्री कृष्ण* कंचन महल उन्हें दे श्याम,जिनके सर पर आस नहीं। मैं मोर पंख की छाँव में राज़ी चाहे कुछ भी पास नहीं।🙏🙏🌺🌺🌺🌺⚘ एक बार देवर्षि नारद के मन में आया कि भगवान् के पास बहुत महल आदि हैं , एक- आध हमको भी दे दें तो यहीं आराम से टिक जायें , नहीं तो इधर - उधर घूमते रहना पड़ता है । भगवान् के द्वारिका में बहुत महल थे । नारद जी ने भगवान् से कहा - " भगवन ! " आपके बहुत महल हैं , एक हमको दो तो हम भी आराम से रहें । आपके यहाँ खाने - पीने का इंतजाम अच्छा ही है । भगवान् ने सोचा कि यह मेरा भक्त है , विरक्त संन्यासी है। अगर यह कहीं राजसी ठाठ में रहने लगा तो थोड़े दिन में ही इसकी सारी विरक्ति भक्ति निकल जायेगी । हम अगर सीधा ना करेंगे तो यह बुरा मान जायेगा , लड़ाई झगड़ा करेगा कि इतने महल हैं और एक महल नहीं दे रहे हैं । भगवान् ने चतुराई से काम लिया , नारद से कहा " जाकर देख ले , जिस मकान में जगह खाली मिले वही तेरे नाम कर देंगे ।" नारद जी वहाँ से चले । भगवान् की तो १६१०८रानियाँ थी यह द्वापर युग की बात है । सब जगह नारद जी घूम आये लेकिन कहीं एक कमरा भी खाली नहीं मिला , सब भरे हुए थे । आकर भगवान् से कहा " वहाँ कोई जगह खाली नहीं मिली ।" भगवान् ने कहा फिर क्या करूँ , होता तो तेरे को दे देता। " नारद जी के मन में आया कि यह तो भगवान् ने मेरे साथ धोखाधड़ी की है , नहीं तो कुछ न कुछ करके, किसी को इधर उधर शिफ्ट कराकर , खिसकाकर एक कमरा तो दे ही सकते थे । इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है तो अब मैं भी इन्हे मजा चखाकर छोडूँगा । नारद जी रुक्मिणी जी के पास पहुँचे , रुक्मिणी जी ने नारद जी की आवभगत की , बड़े प्रेम से रखा । उन दिनों भगवान् सत्यभामा जी के यहाँ रहते थे । एक आध दिन बीता तो नारद जी ने उनको दान की कथा सुनाई , सुनाने वाले स्वयं नारद जी। दान का महत्त्व सुनाने लगे कि जिस चीज़ का दान करोगे वही चीज़ आगे तुम्हारे को मिलती है। जब नारद जी ने देखा कि यह बात रुक्मिणी जी को जम गई है तो उनसे पूछा " आपको सबसे ज्यादा प्यार किससे है? रुक्मिणी जी ने कहा " यह भी कोई पूछने की बात है , भगवान् हरि से ही मेरा प्यार है ।" कहने लगे " फिर आपकी यही इच्छा होगी कि अगले जन्म में तुम्हें वे ही मिलें ।" रुक्मिणी जी बोली " इच्छा तो यही है ।" नारद जी ने कहा " इच्छा है तो फिर दान कर दो, नहीं तो नहीं मिलेँगे । आपकी सौतें भी बहुत है और उनमें से किसी ने पहले दान कर दिया उन्हें मिल जायेंगे। इसलिये दूसरे करें इसके पहले आप ही कर दें । रुक्मिणी जी को बात जँच गई कि जन्म जन्म में भगवान् मिले तो दान कर देना चाहियें। रुक्मिणी से नारद जी ने संकल्प करा लिया । अब क्या था , नारद जी का काम बन गया । वहाँ से सीधे सत्यभामा जी के महल में पहुँच गये और भगवान् से कहा कि " उठाओ कमण्डलु , और चलो मेरे साथ ।" भगवान् ने कहा " कहाँ चलना है , बात क्या हुई ? " नारद जी ने कहा " बात कुछ नहीं , आपको मैंने दान में ले लिया है । आपने एक कोठरी भी नहीं दी तो मैं अब आपको भी बाबा बनाकर पेड़ के नीचे सुलाउँगा ।" सारी बात कह सुनाई । भगवान् ने कहा " रुक्मिणी ने दान कर दिया है तो ठीक है । वह पटरानी है , उससे मिल तो आयें ।" भगवान् ने अपने सारे गहने गाँठे , रेशम के कपड़े सब खोलकर सत्यभामा जी को दे दिये और वल्कल वस्त्र पहनकर, भस्मी लगाकर और कमण्डलु लेकर वहाँ से चल दिये । उन्हें देखते ही रुक्मिणी के होश उड़ गये । पूछा " हुआ क्या ? " भगवान् ने कहा " पता नहीं , नारद कहता है कि तुमने मुझे दान में दे दिया । " रुक्मिणी ने कहा " लेकिन वे कपड़े , गहने कहाँ गये, उत्तम केसर को छोड़कर यह भस्मी क्यों लगा ली ? " भगवान् ने कहा " जब दान दे दिया तो अब मैं उसका हो गया। इसलिये अब वे ठाठबाट नहीं चलेंगे । अब तो अपने भी बाबा जी होकर जा रहे हैं ।" रुक्मिणी ने कहा " मैंने इसलिये थोड़े ही दिया था कि ये ले जायें।" भगवान् ने कहा " और काहे के लिये दिया जाता है ? इसीलिये दिया जाता है कि जिसको दो वह ले जाये ।" अब रुक्मिणी को होश आया कि यह तो गड़बड़ मामला हो गया। रुक्मिणी ने कहा " नारद जी यह आपने मेरे से पहले नहीं कहा , अगले जन्म में तो मिलेंगे सो मिलेंगे , अब तो हाथ से ही खो रहे हैं । " नारद जी ने कहा " अब तो जो हो गया सो हो गया , अब मैं ले जाऊँगा ।" रुक्मिणी जी बहुत रोने लगी। तब तक हल्ला गुल्ला मचा तो और सब रानियाँ भी वहा इकठ्ठी हो गई । सत्यभामा , जाम्बवती सब समझदार थीं । उन्होंने कहा " भगवान् एक रुक्मिणी के पति थोड़े ही हैं, इसलिये रुक्मिणी को सर्वथा दान करने का अधिकार नहीं हो सकता , हम लोगों का भी अधिकार है ।" नारद जी ने सोचा यह तो घपला हो गया । कहने लगे " क्या भगवान् के टुकड़े कराओगे ? तब तो 16108 हिस्से होंगे ।" रानियों ने कहा " नारद जी कुछ ढंग की बात करो । " नारद जी ने विचार किया कि अपने को तो महल ही चाहिये था और यही यह दे नहीं रहे थे , अब मौका ठीक है , समझौते पर बात आ रही है । नारद जी ने कहा भगवान् का जितना वजन है उतने का तुला दान कर देने से भी दान मान लिया जाता है । तुलादान से देह का दान माना जाता है । इसलिये भगवान् के वजन का सोना , हीरा , पन्ना दे दो ।" इस पर सब रानियाँ राजी हो गई। बाकी तो सब राजी हो गये लेकिन भगवान् ने सोचा कि यह फिर मोह में पड़ रहा है । इसका महल का शौक नहीं गया। भगवान् ने कहा " तुलादान कर देना चाहिये , यह बात तो ठीक हे ।" भगवान् तराजु के एक पलड़े के अन्दर बैठ गये । दूसरे पलड़े में सारे गहने , हीरे , पन्ने रखे जाने लगे । लेकिन जो ब्रह्माण्ड को पेट में लेकर बैठा हो , उसे द्वारिका के धन से कहाँ पूरा होना है । सारा का सारा धन दूसरे पलड़े पर रख दिया लेकिन जिस पलड़े पर भगवान बैठे थे वह वैसा का वैसा नीचे लगा रहा , ऊपर नहीं हुआ । नारद जी ने कहा " देख लो , तुला तो बराबर हो नहीं रहा है , अब मैं भगवान् को ले जाऊँगा ।" सब कहने लगे " अरे कोई उपाय बताओ ।" नारद जी ने कहा " और कोई उपाय नहीं है ।" अन्य सब लोगों ने भी अपने अपने हीरे पन्ने लाकर डाल दिये लेकिन उनसे क्या होना था । वे तो त्रिलोकी का भार लेकर बैठे थे । नारद जी ने सोचा अपने को अच्छा चेला मिल गया , बढ़िया काम हो गया । उधर औरते सब चीख रही थीं। नारद जी प्रसन्नता के मारे इधर ऊधर टहलने लगे । भगवान् ने धीरे से रुक्मिणी को बुलाया । रुक्मिणी ने कहा " कुछ तो ढंग निकालिये , आप इतना भार लेकर बैठ गये , हम लोगों का क्या हाल होगा ? " भगवान् ने कहा " ये सब हीरे पन्ने निकाल लो , नहीं तो बाबा जी मान नहीं रहे हैं । यह सब निकालकर तुलसी का एक पत्ता और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा रख दो तो तुम लोगों का काम हो जायगा ।" रुक्मिणी ने सबसे कहा कि यह नहीं हो रहा है तो सब सामान हटाओ । सारा सामान हटा दिया गया और एक छोटे से सोने के पतरे पर तुलसी का पता रखा गया तो भगवान् के वजन के बराबर हो गया । सबने नारद जी से कहा ले जाओ " तुला दान ।" नारद जी ने खुब हिलाडुलाकर देखा कि कहीं कोई डण्डी तो नहीं मार रहा है । नारद जी ने कहा इन्होंने फिर धोखा दिया । फिर जहाँ के तहाँ यह लेकर क्या करूँगा ? उन्होंने कहा " भगवन् ।यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं , केवल घरवालियों की बात सुनते हैं , मेरी तरफ देखो ।" भगवान् ने कहा " तेरी तरफ क्या देखूँ ? तू सारे संसार के स्वरूप को समझ कर फिर मोह के रास्ते जाना चाह रहा है तो तेरी क्या बात सुनूँ।" तब नारद जी ने समझ लिया कि भगवान् ने जो किया सो ठीक किया । नारद जी ने कहा " एक बात मेरी मान लो । आपने मेरे को तरह तरह के नाच अनादि काल से नचाये और मैंने तरह तरह के खेल आपको दिखाये। कभी मनुष्य , कभी गाय इत्यादि पशु , कभी इन्द्र , वरुण आदि संसार में कोई ऐसा स्वरूप नहीं जो चौरासी के चक्कर में किसी न किसी समय में हर प्राणी ने नहीं भोग लिया । अनादि काल से यह चक्कर चल रहा है , सब तरह से आपको खेल दिखाया । आप मेरे को ले जाते रहे और मैं खेल करता रहा । अगर आपको मेरा कोई खेल पसंद आ गया हो तो आप राजा की जगह पर हैं और मैं ब्राह्मण हूँ तो मेरे को कुछ ईनाम देना चाहिये । वह ईनाम यही चाहता हूँ कि मेरे शोक मोह की भावना निवृत्त होकर मैं आपके परम धाम में पहुँच जाऊँ । और यदि कहो कि " तूने जितने खेल किये सब बेकार है " , तो भी आप राजा हैं । जब कोई बार बार खराब खेल करता है तो राजा हुक्म देता है कि " इसे निकाल दो ।" इसी प्रकार यदि मेरा खेल आपको पसन्द नहीं आया है तो फिर आप कहो कि इसको कभी संसार की नृत्यशाला में नहीं लाना है । तो भी मेरी मुक्ति है ।" भगवान् बड़े प्रसन्न होकर तराजू से उठे और नारद जी को छाती से लगाया और कहा " तेरी मुक्ति तो निश्चित है। हरि ॐ🙏🙏💐💐💐

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Babita Sharma Sep 22, 2020

✍🏻 *दुनियाँ वालों पर किया भरोसा भले ही टूट जाए मगर दुनियां के मालिक पर किया भरोसा नहीं टूटना चाहिए।। सावधानी बरतें स्वस्थ रहें ख़तरा पहले से ज्यादा है।।* 🙏🏻 *सुप्रभात* 🙏🏻 🌹🙏जय श्री राम 🙏🌹 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम जन्मभूमि पूजने के पूर्व हनुमानगढ़ी क्षेत्र में पारिजात के पौधे का रोपण किया । जानिए इस पेड़ का महत्व और इसके चमत्कारिक फायदे। पारिजात के पेड़ को हरसिंगार का पेड़ भी कहा जाता है। इसमें बहुत ही सुंदर और सुगंधित फूल उगते हैं। यह सारे भारत में पैदा होता है। इसे संस्कृत में पारिजात, शेफालिका। हिन्दी में हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी में पारिजातक। गुजराती में हरशणगार। बंगाली में शेफालिका, शिउली। तेलुगू में पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल में पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम में पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़ में पारिजात। उर्दू में गुलजाफरी। इंग्लिश में नाइट जेस्मिन। लैटिन में निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस कहते हैं। उत्तर प्रदेश में दुर्लभ प्रजाति के पारिजात के चार वृक्षों में से हजारों साल पुराने वृक्ष दो वन विभाग इटावा के परिसर में हैं जो पर्यटकों को 'देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन' के बारे में बताते हैं। 1. कहते हैं कि पारिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी जिसे इंद्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। हरिवंशपुराण में इस वृक्ष और फूलों का विस्तार से वर्णन मिलता है। 2. पौराणिक मान्यता अनुसार पारिजात के वृक्ष को स्वर्ग से लाकर धरती पर लगाया गया था। नरकासुर के वध के पश्चात एक बार श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और वहां इन्द्र ने उन्हें पारिजात का पुष्प भेंट किया। वह पुष्प श्रीकृष्ण ने देवी रुक्मिणी को दे दिया। देवी सत्यभामा को देवलोक से देवमाता अदिति ने चिरयौवन का आशीर्वाद दिया था। तभी नारदजी आए और सत्यभामा को पारिजात पुष्प के बारे में बताया कि उस पुष्प के प्रभाव से देवी रुक्मिणी भी चिरयौवन हो गई हैं। यह जान सत्यभामा क्रोधित हो गईं और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष लेने की जिद्द करने लगी। 3. पारिजात के फूलों को खासतौर पर लक्ष्मी पूजन के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन केवल उन्हीं फूलों को इस्तेमाल किया जाता है, जो अपने आप पेड़ से टूटकर नीचे गिर जाते हैं। 4. पारिजात के फूलों की सुगंध आपके जीवन से तनाव हटाकर खुशियां ही खुशियां भर सकने की ताकत रखते हैं। इसकी सुगंध आपके मस्तिष्क को शांत कर देती है। 5. पारिजात के ये अद्भुत फूल सिर्फ रात में ही खिलते हैं और सुबह होते-होते वे सब मुरझा जाते हैं। यह फूल जिसके भी घर-आंगन में खिलते हैं, वहां हमेशा शांति और समृद्धि का निवास होता है। 6. पारिजात के यह अद्भुत फूल सिर्फ रात में ही खिलते हैं और सुबह होते होते वे सब मुरझा जाते हैं। यह माना जाता है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से ही व्यक्ति की थकान मिट जाती है। 7. हृदय रोगों के लिए हरसिंगार का प्रयोग बेहद लाभकारी है। इस के 15 से 20 फूलों या इसके रस का सेवन करना हृदय रोग से बचाने का असरकारक उपाय है, लेकिन यह उपाय किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह पर ही किया जा सकता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। जय बजरंग बली 🙏🙏

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Babita Sharma Sep 21, 2020

शुभ प्रभात 🙏🙏ॐ नमः शिवाय 🔱 भोलेनाथ आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करें। हर हर महादेव भगवान भोलेनाथ ,माँ पार्वती सहित समस्त देवी देवताओं की कृपा आप पर पर सदा बनी रहे। जैसा बोओगे वैसा काटोगे : एक बार एक गाँव में कुछ मित्र मण्डली बनाकर बैठे थे । वह लोग ईश्वर के अन्याय पर चर्चा कर रहे थे । एक व्यक्ति बोला –“ भगवान कितना निर्दयी है, उसे तनिक भी दया नहीं आती, कितने ही लोग भूकंप में मर जाते है, कितने ही बेघर हो जाते है, कितने ही अपंग हो जाते है, बेचारे जिंदगी भर जीवन का भार ढोते रहते है ।” इतने में दूसरा व्यक्ति बोला – “ ईश्वर बड़ा ही पक्षपाती है, दुष्टों को अमीर बना देता है और सज्जनों को गरीब । ये भगवान मेरी तो समझ से बाहर है ।” इतने में तीसरा व्यक्ति बोला – “ भाई ! इस संसार में ईश्वर नाम की कोई चीज़ नहीं, सब बकवास की बाते है ।” इतने में चौथा बोला – “ हाँ ! सही कहते हो भाई ! किन्तु हमारे शास्त्र तो ईश्वर को बताते है, मुझे तो लगता है ईश्वर होगा भी तो किसी तानाशाह की तरह पड़ा होगा कहीं वैकुण्ठ में । इसी तरह लोगों की बातचीत चल रही थी कि पास से ही एक दार्शनिक गुजर रहे थे । उनके कान में लोगों के ये शब्द पड़े । वह लोगों के पास आये और बोले – “ भाइयों ! चलो मेरे साथ आप सभी को एक अजूबा दिखाना है । सभी आश्चर्य से दार्शनिक के साथ चल दिए । दार्शनिक महोदय सभी को खेतों की ओर ले गये और दो खेतों के बीचोंबीच जाकर खड़े हो गये । एक तरफ थी फूलों की खेती और दूसरी तरफ थी तम्बाकू की खेती । दार्शनिक महोदय बोले – धरती भी कैसा अन्याय करती है । एक फसल से खुशबू आती है और एक से बदबू । उनके पास खड़े लोग बोले – “ नहीं नहीं श्री मान ये दोष धरती का नहीं, उसमें बोये गये बीज का है । जहाँ फूलों के बीज बोये गये वहाँ से खुशबू आती है और जहाँ तम्बाकू के बीज बोये गये वहाँ से बदबू आती है । इसमें धरती को दोष देना उचित नहीं ।” दार्शनिक महोदय बड़े विनम्र भाव से बोले – “ जी आपका कहना सही है, धरती को दोष देना मेरी मुर्खता है, किन्तु मुझे यह बताइए कि ईश्वर के संसार रूपी खेत में ईश्वर को दोषी ठहराना कहाँ की समझदारी है । जो आप ईश्वर को अन्यायी और पक्षपाती कह रहे थे । इन्सान जैसे कर्मों के बीज अपने जीवन में बोयेगा, उसको वैसा ही फल प्राप्त होगा, वैसी ही उसकी फसल होगी, इसके लिए ईश्वर को दोष देना कहाँ तक उचित है ।” सभी महानुभावों को बात समझ आ गई थी । ईश्वर हमेशा सबके साथ न्याय ही करता है । जो लोग ईश्वर पर दोषारोपण करते है वह या तो खुद की गलती स्वीकार नहीं करना चाहते है या फिर अपने अज्ञान का परिचय दे रहे है । जरुरी नहीं कि जिसे आप अच्छा कहते है वही आपके लिए अच्छा हो । कभी – कभी सामायिक दर्द और नुकसान हमारे भविष्य के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकते है । जैसे जब किसान बुवाई करता है तो वह नुकसान में रहता है क्योंकि मेहनत भी करता है और महंगे बीज मिट्टी में मिला देता है किन्तु फिर भी धैर्य पूर्वक परिश्रम करते रहने पर जो पारितोषिक उसे प्राप्त होता है । उससे वह और उसका पूरा परिवार खुशियों से भर उठता है। हर हर महादेव 🙏🙏

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Babita Sharma Sep 18, 2020

*माँगी हुई ख़ुशियों से....किसका भला होता है.....!!* *मिलता वो ही है.... जो हमने बोया होता है.....!!* * सुप्रभात 🙏🙏 समस्त बंधुगणों को अधिकमास(पुरुषोत्तम माह)की हार्दिक शुभकामनायें क्या है अधिकमास, कब आता है, जानिए इसका पौराणिक आधार: हिंदू कैलेंडर में हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मल मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। हर तीन साल में क्यों आता है: अधिकमास- वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय हिंदू कैलेंडर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतर से आता है। इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को पाटने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है। मल मास क्यों कहा गया: हिंदू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। मलिन मानने के कारण ही इस मास का नाम मल मास पड़ गया है। पुरुषोत्तम मास नाम क्यों: अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में पढ़ने को मिलती है। कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ, तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने ऊपर लें। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मल मास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया। अधिकमास का पौराणिक आधार: अधिक मास के लिए पुराणों में बड़ी ही सुंदर कथा सुनने को मिलती है। यह कथा दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से जुड़ी है। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रह्मा जी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरता का वरदान मांगा। चुंकि अमरता का वरदान देना निषिद्ध है, इसीलिए ब्रह्मा जी ने उसे कोई भी अन्य वर मांगने को कहा। तब हिरण्यकश्यप ने वर मांगा कि उसे संसार का कोई नर, नारी, पशु, देवता या असुर मार ना सके। वह वर्ष के 12 महीनों में मृत्यु को प्राप्त ना हो। जब वह मरे, तो ना दिन का समय हो, ना रात का। वह ना किसी अस्त्र से मरे, ना किसी शस्त्र से। उसे ना घर में मारा जा सके, ना ही घर से बाहर मारा जा सके। इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने खुद को भगवान घोषित कर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार यानि आधा पुरुष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर, शाम के समय, देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीन कर उसे मृत्यु के द्वार भेज दिया। इसका महत्व क्यों है: हिंदू धर्म के अनुसार प्रत्येक जीव पंचमहाभूतों से मिलकर बना है। इन पंचमहाभूतों में जल, अग्नि, आकाश, वायु और पृथ्वी सम्मिलित हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप ही ये पांचों तत्व प्रत्येक जीव की प्रकृति न्यूनाधिक रूप से निश्चित करते हैं। अधिकमास में समस्त धार्मिक कृत्यों, चिंतन- मनन, ध्यान, योग आदि के माध्यम से साधक अपने शरीर में समाहित इन पांचों तत्वों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इस पूरे मास में अपने धार्मिक और आध्यात्मिक प्रयासों से प्रत्येक व्यक्ति अपनी भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति और निर्मलता के लिए उद्यत होता है। इस तरह अधिकमास के दौरान किए गए प्रयासों से व्यक्ति हर तीन साल में स्वयं को बाहर से स्वच्छ कर परम निर्मलता को प्राप्त कर नई उर्जा से भर जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किए गए प्रयासों से समस्त कुंडली दोषों का भी निराकरण हो जाता है। अधिकमास में क्या करना उचित: आमतौर पर अधिकमास में हिंदू श्रद्धालु व्रत- उपवास, पूजा- पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते हैं। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ- हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं, इसीलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते हैं, उनके पापों का शमन करते हैं और उनकी समस्त इच्छाएं पूरी करते हैं। अधिकमास अत्यंत पवित्र माह माना जाता है इसके बावजूद कि इसमें मंगल कार्य निषेध होते हैं लेकिन ईश्वर आराधना के लिए और दान पुण्य के लिए इसे बड़ा शुभ माना जाता है। नाम से ही स्पष्ट है कि इस माह जो भी दान करेंगे उसका अधिक पुण्य फल प्राप्त होगा। आइए जानें इस माह के पवित्र दान... कृष्ण पक्ष का दान (1) घी से भरा चांदी का दीपक (2) सोना या कांसे का पात्र (3) कच्चे चने (4) खारेक (5) गुड़, तुवर दाल (6) लाल चंदन (7) मीठा रंग (8) कपुर, केवड़े की अगरबत्ती (9) केसर (10) कस्तूरी (11) गोरोचन (12) शंख (13) गरूड़ घंटी (14) मोती या मोती की माला (15) हीरा या पन्ना का नग शुक्ल पक्ष का दान (1) माल पुआ (2) खीर भरा पात्र (3) दही (4) सूती वस्त्र (5) रेशमी वस्त्र (6) ऊनी वस्त्र (7) घी (8) तिल गुड़ (9) चावल (10) गेहूं (11) दूध (12) कच्ची खिचड़ी (13 ) शक्कर व शहद (14) तांबे का पात्र (15) चांदी का नन्दीगण। हरि ॐ🙏🙏

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Babita Sharma Sep 17, 2020

🙏🏻‼श्रीकृष्ण ‼🙏🏻 *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,* *हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!* *꧁!! Զเधॆ Զเधॆ !!꧂* सर्वपितृ अमावस्या शुभ हो 🙏🙏 पितृ दोष दूर करने के लिए आजमाएं अचूक उपाय: 1.सर्व पितृ अमावस्या के दिन भूखे लोगो को भोजन अवश्य कराएं। इस दिन भूखे लोगो में मीठे चावल बांटते हैं तो आपको कभी भी धन की कमी नही होगी। 2.इस दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद आटे की गोलियां बनाएं और किसी तालाब या नदी के किनारे जाकर ये आटे की गोलियां मछलियों को खिला दें। ऐसा करने से आपकी सभी परेशानियों का अंत होगा। 3.सर्व पितृ अमावस्या पर काली चीटियों को शक्कर मिला हुआ आटा खिलाएं। ऐसा करने से आपको सभी पापों से मुक्ति मिलेगी। 4.यदि आप कालसर्प दोष से पीड़ित है तो आप सर्व पितृ अमावस्या के दिन चांदी के नाग नागिन की पूजा करें और इसे बहते जल में प्रवाहित कर दें। 5.यदि आपको अपने रोजगार में किसी प्रकार की समस्या आ रही है तो आप सर्व पितृ अमावस्या के दिन अपने घर में एक नीबूं लेकर आएं और इसे सारा दिन अपने घर में रखकर रात के समय 7 बार अपने ऊपर से उतारकर चार भागों में बांटकर किसी चौराहे पर फेंक दें। 6.सर्व पितृ अमावस्या के दिन शाम के समय घर के ईशान कोण में पूजा वाले स्थान पर गाय के घी का दीपक जलाएं।ऐसा करने से आपको सभी सुखों की प्राप्ति होगी। 7.इस दिन रात के समय 5 लाल फूल 5 जलते हुए दीए बहती नदी में प्रवाहित कर दें। इस उपाय से आपकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। 8.यदि आप अपने शत्रुओं से अत्याधिक परेशान हैं तो आप सर्व पितृ अमावस्या पर काले कुत्ते को तेल से चुपड़ी रोटी अवश्य खिलाएं। 9.सर्व पितृ अमावस्या के दिन गाय, कुते और कौए को भोजन अवश्य कराना चाहिए। ऐसा करने से आपके पितरों को शांति प्राप्त होगी। 10. इस दिन आपको किसी ब्राह्मण को आदर सहित अपने घर पर बुलाकर उसे भोजन कराकर दक्षिणा देकर पैर छूने चाहिए। ऐसा करने से न केवल आपके पितृ प्रसन्न होंगे। बल्कि आपको उनका आशीर्वाद भी प्राप्त होगा। सर्वपितृ अमावस्या : पितरों की शांति के लिए अंतिम दिन करें यह प्रार्थना ॐ पितृभ्य:स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्यं: स्वधा नम: । अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृप्यन्त पितर: पितर:शुन्धध्वम् ॥

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Babita Sharma Sep 13, 2020

जय श्री कृष्ण 🙏 इंदिरा एकादशी पर शालिग्राम की पूजा करने से आपके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो.. आपको पापों से मुक्ति दिलाए साथ ही इस लोक के सुख भोगते हुए स्‍वर्ग की प्राप्‍ति कराये। ॐ विष्णवे नम: 🙏🙏 क्या है इंदिरा एकादशी का महत्व और पूजा विधि : आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहा जाता है| इंदिरा एकादशी उपवास का विशेष महत्व है| इससे पापों का नाश तो होता ही है, साथ ही पूर्वजों को भी मुक्ति मिलती है| इससे मन और शरीर दोनों ही संतुलित रहते हैं| इस समय एकादशी के उपवास से गंभीर रोगों से रक्षा होती है| किस प्रकार पूजा उपासना करें: इस दिन प्रातः उठकर स्नान करने के बाद पहले सूर्य को अर्घ्य दें, तत्पश्चात भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरुप की आराधना करें| उनको पीले फूल, पंचामृत तथा तुलसी दल अर्पित करें| फल भी अर्पित कर सकते हैं| इसके बाद भगवान का ध्यान करें और उनके मंत्रों का जाप करें| इस दिन पूर्ण रूप से जलीय आहार लें| अगर फलाहार लें तो इसके श्रेष्ठ परिणाम मिलेंगे| इस दिन फलाहार का दान करें और गाय को भी फल आदि खिलाएं| अगले दिन प्रातः निर्धन लोगों को भोजन कराएं, वस्त्र आदि का दान करें| फिर स्वयं भोजन करके व्रत का समापन करें| इस दिन मन को ईश्वर में लगाएं, क्रोध न करें, झूठ न बोलें। पितरों के लिए इस दिन क्या विशेष प्रयोग करें: जब कभी श्राद्ध, श्रद्धा से न करके दबाव से किया जाता है या अयोग्य व्यक्ति के द्वारा श्राद्ध होता है तो श्राद्ध के बावजूद भी मुक्ति नहीं होती है| पितृ पक्ष की एकादशी के दिन महाप्रयोग करके इस समस्या का निदान किया जा सकता है| एकादशी के दिन उरद की दाल, उरद के बड़े और पूरियां बनाएं और चावल का प्रयोग न करें| भगवद्गीता का पाठ करें| निर्धनों को भोजन कराएं और उनसे आशीर्वाद लें| इंदिरा एकादशी के दिन किस प्रकार पितरों की आत्मा को शांति दें: पितृ पक्ष में पड़ने की वजह से इंदिरा एकादशी का विशेष महत्‍व है. पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी का व्रत करने से एक करोड़ पितरों का उद्धार होता है और स्‍वयं के लिए स्‍वर्ग लोक का मार्ग प्रशस्‍त होता है. मान्‍यता है कि एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके लिए भगवान को फल और तुलसी दल अर्पित करें| भगवान के समक्ष भगवदगीता का पाठ करें| निर्धनों को फल का दान करें| एक तुलसी का पौधा जरूर लगाएं| किसी सार्वजनिक स्थान पर पीपल का पौधा लगा दें। जय श्री कृष्ण हरि ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

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Babita Sharma Sep 11, 2020

पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्।। माँ महालक्ष्मी आप सभी के भंडार भरें। शुक्रवार सुबह की ढेरों शुभकामनायें एवं मंगलकामनाये 🙏⚘⚘जय माता दी 🙏🙏 शुक्रवार को बरसती है मां वैभव लक्ष्मी की कृपा, ऐसे करें पूजा लक्ष्मीजी सभी अभावों का अंत करती हैं। शुक्रवार को वैभवलक्ष्मी की पूजा करने से धन की कभी कमी नहीं होगी। जैसा कि नाम में शामिल है वैभव लक्ष्मी, वैसा ही इनका फल भी मिलता है। इनकी पूजा अर्चना करने से वैभव और लक्ष्मी दोनों की प्राप्ति होती है। वैभव लक्ष्मी का व्रत शुक्रवार को रखा जाता है और इनकी पूजा शाम के समय की जाती है। वैसे तो इस व्रत को कोई भी रख सकता है। लेकिन, घर की महिला इस व्रत को रखे तो अधिक फलदायी होता है। घर की स्त्रियां व्रत रख सकती है। लेकिन, यदि घर में कोई विवाहित स्त्री नहीं हैं तो कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत को रख सकती हैं। वैभव लक्ष्मी का व्रत रखने से पहले उसके दिनों का संकल्प लिया जाता है। यानि सात शुक्रवार, 11 शुक्रवार या फिर 21 शुक्रवार। संकल्प लेने के बाद और इस व्रत के समाप्त करने के बाद उद्यापन करना आवश्यक होता है। ये व्रत हमेशा घर में ही रखा जाता है। किसी कारणवश 11 या 21 शुक्रवार के व्रत के बीच आप किसी शुक्रवार को व्रत नहीं कर पाये तो माफी माँग कर उस व्रत को अगले शुक्रवार को रख लें। वैभव लक्ष्मी का व्रत स्त्री और पुरुष, दोनों ही कर सकते हैं। व्रत शुरू करने से पहले अपनी उस मन्नत का उल्लेख अवश्य कर दें जिसको पूरी करने के लिए आप व्रत का संकल्प ले रहे हैं। व्रत पूरी श्रद्धा और शांत मन के साथ ही रखना चाहिए। अगर मन में अशांति हो या कोई अन्य समस्या हो तो भी यह व्रत नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। वैभव लक्ष्मी व्रत में श्री यंत्र का पूजन भी किया जाता है। इस व्रत में जरूरी है सोने या चांदी का सिक्का: इस व्रत को शुक्रवार के दिन किया जाता है, सबसे पहले व्रती प्रातःकाल जागकर स्नान आदि से निवृत होकर पवित्र हो जाए। उसके बाद पूरे दिन मां का नाम धारण करे। शाम के समय पूरी सामग्री एकत्रित करें। व्रती स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजन करने के लिए पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठ जाएं। उसके बाद लाल चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं और यहां मां वैभव लक्ष्मी की तस्वीर के साथ श्रीयंत्र रखें। चौकी पर चावल का ढेर रखें और उसपर जल का कलश स्थापित करें। सोने या चांदी का आभूषण या फिर सिक्का भी कलश पर रखी कटोरी पर डाल दें। वैभव लक्ष्मी जी को लाल गुलाब का फूल अर्पित करें और लक्ष्मी स्तवन का पाठ करते हुए गहने या रुपए की पूजा करें। लक्ष्मी जी की धूप, फूल, दीप, गंध, अक्षत, रोली आदि से पूजा करनी चाहिए। "श्री वैभव लक्ष्मी मंत्र" के मंत्र से जाप करें। उद्यापन विधि: आपने जितने भी शुक्रवार के व्रत करने की मन्नत मांगी थी, उतने शुक्रवार हो गये हैं तो अंतिम व्रत वाले दिन शाम को कथा का श्रवण कुछ सुहागिन स्त्रियों के संग करें। माता को सुहाग की सामग्री चढ़ाएं और सभी सौभाग्यशाली महिलाओं को कथा के बाद वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की एक-एक पुस्तक उपहार में दें और खीर का प्रसाद दें। सभी महिलाओं को कुमकुम का तिलक भी लगाएँ और कम से कम सात कुआंरी कन्याओं को भोजन करा कर उन्हें उपहार स्वरूप कुछ दें। पूजन के पश्चात वैभव लक्ष्मी के 'धनलक्ष्मी स्वरूप' को नमन कर प्रार्थना करें- 'हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका 'वैभवलक्ष्मी व्रत' करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है। हमारी मनोकामना पूरी करो माँ। यह कह कर वैभव लक्ष्मी को प्रणाम करें। वैभव लक्ष्मी व्रत के लाभ: : अदालत में यदि कोई आपका केस चल रहा हो, जिसका बहुत समय से कोई हल न मिल रहा हो। - तो व्रत करने से आपको अदालत में जीत मिलने में मदद मिलती है। : कोई काम न बन रहा हो, या किसी काम में रूकावट आ रही हो। - तो आप इन परेशानियों से निजात पाने के लिए भी कर सकते हैं। : व्यापार में तरक्की न हो, दूकान का काम न हो। - तो इन परेशानियों को को दूर करने के लिए भी व्रत रखने से फायदा मिलता है। माना जाता है कि ऐसा करने से आपके व्यापार व दूकान के काम में तरक्की होती है। सुख समृद्धि के लिए... : व्रत के संबंध में मान्यता है कि यदि कोई शादी शुदा महिला शुक्रवार का व्रत अपने परिवार में सुख समृद्धि के लिए करती है। - तो इस व्रत को करने से परिवार में सुख समृद्धि बनी रहती है। - परिवार के लोगों के बीच स्नेह व अपनापन रहता है। - घर में ख़ुशी और सकारत्मकता रहती है। - साथ ही महिला के शादीशुदा जीवन में यदि कोई समस्या है तो उसे भी दूर करने में मदद मिलती है। धन में होती है बरकत... कुछ लोग हमेशा इस चीज को लेकर परेशान रहते हैं की उनके पैसे में बरकत नहीं रहती है। और हमेशा कभी कुछ तो कभी कुछ घाटा लगा रहता हैं। - ऐसे में इस परेशानी से बचाव के लिए यह व्रत बहुत ही फायदेमंद माना जाता है। मान्यता के अनुसार वैभव लक्ष्मी का व्रत रखने से आपके पैसे में बरकत होने में मदद मिलती है। जय माता दी 🚩 जय मां महालक्ष्मी 🙏🙏

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Babita Sharma Sep 9, 2020

जाने कौन सी शौहरत पर आदमी को नाज़ है,* *जो खुद आखरी सफर के लिए भी * औरों का मोहताज़ है.. सुप्रभात🌷🌺🌷गणपति बप्पा मोरया ॐ विनायकाय नमः ॐ सिद्धिप्रदाय नमः ॐ एकदंताय नमः 🙏🙏🙏🙏🚩 धन के अभाव में करें पितरों से यह प्रार्थना🙏🙏 पितृ पक्ष के 16 दिनों में हर कोई अपनी श्रद्धानुसार श्राद्ध अवश्य करता है लेकिन कुछ लोग आर्थिक दृष्‍टि से समृद्ध नहीं होते हैं और श्राद्ध परंपरा अनुसार नहीं कर पाते हैं। शास्त्रों में उनके लिए भी समाधान है। एक सच्ची प्रार्थना, आपके पितरों को तृप्त कर सकती है। ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि धन के अभाव में श्रद्धापूर्वक केवल शाक से भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि इतना भी न हो तो अपनी दोनों भुजाओं को उठाकर कह देना चाहिए कि मेरे पास श्राद्ध के लिए न धन है और न ही कोई वस्तु। अत: मैं अपने पितरों को प्रणाम करता हूं, वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों। जय श्री गणेशाय नमः 🙏🙏

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