🌹 श्री द्वारका धीश का तुला दान ⛳ {क्रमशः अंश भाग प्ररस्तुत} ✓२ क्रमशः----~सारा का सारा धन दूशरे पलड़े पर रख दिया लेकिन जिस पलड़े पर भगवान् बैठे थे वह वैसा का वैसा नीचे लगा रहा, ऊपर नहीं हुआ। नारदजी ने कहा"देखलो,तुला तो बराबर हो नहीं रहा है,अब मैं भगवान् को ले जाऊंगा।" सब कहने लगे"अरे कोइ उपाय बताओं।" नारदजी ने कहा "और उपाय नहीं है।" अन्य सब लोगों ने भी अपने अपने हीरे पन्ने लाकर डाल दिये लेकिन उनसे क्या होना था।वे तों त्रिलोक का भार लेकर बैठे थे। नारदजी ने सोचा अपने को अच्छा चेला मिल गया, बढ़िया काम हो गया उधर औरतें सब चीस रही थी। नारदजी प्रसन्नता के मारे इधर उधर टहल ने लगे। भगवान् ने धीरे से रुक्मिणी को बुलाया। रुक्मिणी कहा"कुछ तों ढंग निकालिए, आप इतना भार लेकर बैठ गये हम लोग का क्या हाल होगा? भगवान् ने कहा "ये सब हीरे, पन्ने, निकाल लो, नहीं तो बाबा जी मान नहीं रहे हैं। यह सब निकाल कर तुलसी का पत्ता और सोने का एक छोटा टुकड़ा "पलड़े में रख दो तो तुम लोगों का काम हो जायेगा।" रूक्मिणी ने सबसे कहां कि यह यह नहीं हो रहा है सब सामान हटाओ। सारा सामान हटा दिया और एक छोटे से सोने के पत्तरे पर तुलसी का पत्ता रखा गया तो भगवान् के वजन के बराबर हो गया। सब ने नारदजी से कहा ले जाओ "तुलादान " नारदजी ने खूब हिला डुलाकर देखा कि कहीं कोई डंडी तो नहीं मार रहा है। नारदजी ने कहा इन्होंने फिर धोखा दिया। फिर जहां के तहां यह लेकर क्या करुंगा ? उन्होंने कहा"भगवान् यहां आप अच्छा नहीं कर रहे हैं, केवल घर वालियों की बात सुनते हैं, मेरी तरफ देखो।" भगवान् ने कहा"तेरी तरफ क्या देखु ? तूं सारे संसार के स्वरुप को समझकर फिर मोह के रास्ते जाना चाह रहा है तो तेरी क्या बात सुनूं।" नारदजी ने समझ लिया कि भगवान् ने जो किया सो ठीक किया। नारदजी ने कहा"एक बात मेरी मान लो। अपने मेरे को तरह-तरह के नाच अनादि काल से नचाये और मैंने तरह-तरह के खेल आपको दिखाये। कभी मनुष्य, कभी कभी गाय, इत्यादि पशु, कभी इन्द्र, वरुण, आदि संसार में कोई स्वरुप नहीं जो चौरासी के चक्कर में किसी न किसी समय में हर प्राणी ने भोग लिया। अनादि काल से यह चक्कर चल रहा है, सब तरह से आपको खेल दिखाया। आप मेरे को ले जाते रहे और मैं खेल करता रहा। अगर आपको मेरा कोई खेल पसंद आ गया हो तो आप "राजा "की जगह पर है और मैं ब्राह्मण हुं तों मेरे को कुछ इनाम देना चाहिए। वह ईनाम यही चाहता हूं कि मेरे शौक़ मौह की भावना निवृत्त होकर मैं आपके परमधाम मैं पहुंच जाऊं। और यदि कहो कि"तूने जिताने खेल किये सब बैकार है"तों भी आप"राजा"है। जब कोई बार बार ख़राब खेल करता है तो राजा हुक्म देता है कि"ईसे निकाल दो।" इसी प्रकार यदि मेरा खेल आपको पसंद नहीं आया है तों फिर आप कहो कि इसको कभी संसार की नृत्यशाला में नहीं लाना है। तो भी मेरी मुक्ति हैं।" भगवान् बड़े प्रसन्न होकर"तराजू "उठे और नारदजी को छाती से लगाया और कहा"तेरी मुक्ति तों निश्चित है। 🌹 धर्म भक्ति 🌹 पौराणिक कथा 🌹 ज्ञानवर्षा 💐 ⛳ जय श्री द्वारिका धीश कृष्ण 🙏 जय श्री पुर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण 🙏 राधे राधे 🙏⛳ 🌷अंश भाग समाप्त 🙏⛳🕉️ नमः शिवाय 🙏

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🌹 श्री द्वारका धीश कृष्ण का तुलादान 🌹⛳ जय श्री पुर्ण पुरुषोत्तम श्री द्वारका धीश 🙏 🕉️💐एक बार नारद के मन में आया कि भगवान के पास बहुत महल है, एक आधा हमको दे दे तो यहीं आराम से टिक जाये, नहीं तो इधर उधर घूमते रहनां पड़ता है। भगवान के द्वारिका में बहुत महल थे! नारदजी ने भगवान से कहां, भगवान! आपके बहुत महल है, एक हमको दो तो हम भी आराम से रहे। आपके यहां खाने इंतजाम अच्छा ही है। भगवान ने सोचा कि यह मेरा भवन है,विरात संन्यासी है! अगर यह कहीं राजसी ठाठ में रहने लगा तो थोडे दिनों में ही इसकी सारी विरक्त भक्ति निफल जायेंगी। हम अगर सीधा ना करेंगे तो यह बुरा मान जायगा, लड़ाई, झगड़ा करेगा कि इतने महल है और एक महल नहीं दे रहें हैं। भगवान ने चतुराई से काम लिया.नारद से कहा "जाकर देख ले.जिस मकान में जगह ख़ाली मिलें वहीं तेरे नाम कर देंगे। नारदजी वहां चले। भगवान की तो १६१०८रनियोंऔर प्रत्येक के ११-११बच्चे भी थे। यह द्वापर युग की बात है। सब जगह नारदजी धूम आये लेकिन कहीं एक कमरा भी खाली नहीं मिला.सब भरे हुए थे। आकर भगवान से कहा"वहां कोई जगह ख़ाली नहीं मिली। भगवान ने कहा फिर क्या करू.होता तो तेरे को दे देता।" नारदजी के मन में आया कि यह तों भगवान ने मेरे साथ धोखाधड़ी की है.नही तो कुछ न कुछ करके,किसिको इधर उधर शिफ्ट कराकर एक कमरा तो दे ही सकते थें। इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है तो अब मैं भी इन्हें मजा चछाकर छोडूंगा। नारदजी रुक्मिणी जी के पास पहुंचे रुक्मिणी जी ने नारदजी की आवभगत की . बड़े प्रेम से रखा। उन दिनों भगवान् सत्यभामा जी के यहां रहते थे। एक आधा दिन तो नारदजी ने उनको दान की कथा सुनाई. सुनाने वाले स्वयं नारदजी । दान का महत्व सुनाने लगे कि जिस चीज का दान करोंगे वहीं चीज़ आगे तुम्हारे को मिलती हैं । जब नारदजी ने देखा कि यह बात रुक्मिणी जी को जम गई है तों उनसे पूछा "आपको सबसे ज्यादा प्यार किससे है? रुक्मिणी जी ने कहा "यह भी कोई पूछने की बात है भगवान हरि से ही मेरा प्यार है ।" कहने लगे " फिर आपकी यही इच्छा होगी कि अगले जन्म में तुम्हें वे हीं मिलें ।" रुक्मिणी जी बोला "इच्छा तों यही है।" नारदजी ने कहा इच्छा है तों फिर दान करदो , नहीं तों नहीं मिलेंगे । आप की सौते भी उनमें से कीसी ने पहले दान कर दिया उन्हें मिल जायेंगे । इसलिए दूशरे करे इसके पहले आप ही कर दें । रुक्मिणी जी को बात जॅच गई की जन्म जन्म में भगवान् मिले तों दान कर देना चाहिए। रुक्मिणी से नारदजी ने संकल्प कर लिया । अब क्या था नारदजी का काम बन गया । वहां से सिधे सत्यभामा जी के महल में पहुंच गये और भगवान् से कहा कि "उठाओ कमंडलु और चलो मेरे साथ । भगवान् ने कहाॅ कहाॅ चलनां है ।बात क्या हुईं ? नारदजी ने कहा "बात कुछ नहीं . आपकों मैंने दान में ले लिया है। आप ने एक कोठरी भी नहीं दी तों मैं अब आप को भी बाबा बनाकर पेड़ के नीचे सुलाॅउगा। और सारी बात कह सुनाई। भगवान् ने कहा"रुक्मिणी ने दान कर दिया है तों ठीक है।वह पटरानी है , उससे मिल तो आये।" भगवान् ने अपने सारे गहने गाॅठे,रेशम के कपड़े सब खोलकर सत्यभामा जी को दे दिये और वल्कल वस्त्र पहन कर,भस्मी लगा कर और कमंडलु लेकर वहां से चल दिये। उन्हें देखते ही रुक्मिणी के होशं उड़ गये। पुछा"हुआ क्या ? भगवान् ने कहा"पता नहीं ,नारद कहता है कि तूने मेरे को दान में दे दिया।" रुक्मिणी ने कहा लेकिन वें कपड़े गहने कहा गये,उत्तम केसर को छोड़कर यह भस्मी क्यो लगा ली ? भगवान् ने कहा"जब दान दें दिया तों अब मैं उसका हो गया। इसलिए अब ठाठ-बाट नहीं चलेंगे। अब तो अपने भी बाबाजी होकर जा रहें हैं। रुक्मिणी ने कहा"मैंने इसलिए थोड़े ही दिया था कि ये ले जाये।" भगवान् ने कहा"और काहे के लिए दिया जाता है ? इसलिए दिया जाता है कि जिसको दो वह लें जाये।" अब रुक्मिणी जी को होश आया कि यह तो गड़बड़ मामला हो गया। रुक्मिणी ने कहा"नारदजी यह आपने मेरे से पहले नहीं कहा.अगले जन्म में तों मिलेंगे सो मिलेंगे.अब तो हाथ से ही खो रहे हैं।" नारदजी ने कहा"अब तो जो हो हो गया सो हो गया,अब मैं लें जाऊंगा। रुक्मिणी जी बहुत रोने लगी। तब तक हल्ला गुल्ला मचा तो और सब रानियां भी वहां इक्ठी हो गई। सत्यभामा, जांम्बवती,सब समझ दार थी। उन्होंने कहा"भगवान् एक रुक्मिणी के पति थोड़े ही है.इसिलिए रुक्मिणी को सर्वथा दान करने का अधिकार नहीं हो सकता,हम लोग को भी अधिकार है।" नारदजी ने सोचा यह तों दपला हो गया। कहने लगे"क्या भगवान् के टूकडे कराओंगे ?तब तों १६१०८ हिस्से होंगे।" रानियों ने कहा"नारदजी कुछ ढंग की बात करो।"नारदजी ने विचार किया कि अपने तों महल ही चाहिए था और यह दे नहीं रहें थे,अब मौका ठीक है, समझौते पर बात आ रही है। नारदजी कहा भगवान् का जितना वजन है,उतने का तुला दान कर देने से भी दान मान लिया जाता है।तुलादान से देह का मानां जाता है। इसलिए भगवान् के वजन का सोना, हीरा, पन्ना, दें दो"इस पर सब रानियां राज़ी हो गई। बाकी तों राजी हो गए लेकिन भगवान् ने सोचा कि फिर मोह में पड रहा है।इसका महल का शोक नहीं गया। भगवान् कहां"तुला दान कर देना चाहिए यह बात तो ठीक है।" भगवान् तराजु के एक पलड़े के अन्दर बैठ गये। दूसरे पलड़े में सारे गहने,हीरे, पन्ने,रख जाने लगे। लेकिन जो ब्रह्मांड को पेट में लेकर बैठा हो, उसे द्वरिकापूरी के धन से कहां पूरा हना है। 🌹 धर्म भक्ति 🌹 पौराणिक कथा 🌹ज्ञानवर्षा 💐 🕉️⛳ जय श्री द्रारिका धीश कृष्ण 🙏 आवश्यक,संजोग के कारण"ये"पोस्ट का थोड़ा हिस्सा बाकी रह गया है। वो बाद में प्ररस्तुत करुंगा। सभी धर्म प्रेमी भाईयों बहनों को मेरी तरफ से नमस्कार 🙏 ⛳🕉️ जय श्री कृष्ण 🙏

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ARJUN, Mo,9879770109 Apr 20, 2021

⛳ श्री कृष्ण और जामवंत का युद्ध 🇮🇳 🌹🕉️ जामवंती और सत्यभामा का विवाह 🕉️ पौराणिक कथा ओं के अनुसार एक बार सत्राजित ने भगवान सुर्य की उपासना की जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने अपनी"स्यमन्तक"नाम की मणी जामवंत को दे दी। एक दिन जब कृष्ण साथियों के साथ चौसर खेल रहे थे तो सत्राजित स्यमन्तक मणी मस्तक पर धारण कर उनसे भेंट करने पहुंचे।उस स्यमन्तक मणी को देखकर कृष्ण ने सत्राजित से कहा कि तुम्हारे जो यह आलौकिक मणी है, इनका वास्तविक अधिकारी तो राजा होता है इसलिए तुम इस मणी को हमारे राजा उग्रसेन को दे दो।यह बात सुनकर सत्राजित ने स्यमन्तक मणी को अपने घर के मंदिर में स्थापित कर दिया।वह मणि रोजाना (८)आठ भार सोना देती थी, जिस स्थान में वह मणि होती थी, वहां के सारे कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते थे। एक दिन सत्राजित का भाई प्रसनजित उस मणि को पहनकर घोड़े पर सवार हो आरपेट के लिए गया।वन में प्रसनजित पर एक सिंह ने हमला कर दिया। जिससे वह मारा गया।उस सिंह ने अपने साथ मणि भी ले कर चला गया।उस सिंह को रीक्षराज जामवंत ने मारकर वह मणि प्राप्त कर ली और अपनी गुफा में चला गया जामवंत ने उस मणि को अपने बालक को दे दिया जो उसे खिलौना समझ उससे खेलने लगा। जब प्रसेनजित लौट कर नहीं आया तों सत्राजित ने समझा कि उसके भाई को कृष्ण ने मारकर मणि छीन ली है। कृष्ण जी पर चोरी के सन्देह की बात पूरे द्वरिकापूरी में फ़ैल गई। अपनें पर लगे कलंक को धोने के लिए वे नगर के प्रमुख यादवों को साथ ले लेकर रथ पर सवार हो स्यमन्तक की मणि की खोज में निकले।वन में उन्होंने घोड़ा सहित प्रोसेनजीत को मरा हुआ देखा पर मणी का कहीं पता नहीं चला। वहां निकट ही सिंह के पंजों के चिंन्ह थे। सिंह के पदचिन्हों के सहारे आगे बढ़ने पर उन्हें मरे हुए सिंह का शरीर मिला। वहां पर रींछ के पैरो के पद-चिन्ह भी मिले जो कि एक गुफा तक गये थे।जब वे उस भयंकर गुफा के निकट पहुंचे तब श्री कृष्ण ने यादवों से कहा कि तुम लोग यहीं रुको। मैं इस गुफा में प्रवेश कर मणी ले जाने वाले का पता लगाता हूं। इतना कहकर वे सभी यादवों को गुफा के मुख पर छोड़ उस गुफा के भीतर चले गए। वहां जाकर उन्होंने देखा कि वह मणि एक रींछ के बालक के पास है जो उसे हाथ में लिये खेल रहा था। श्री कृष्ण ने उस मणि को उठालिया। यह देखकर जामवंत अत्यंत क्रोधित होकर श्री कृष्ण को मार ने के लिए झपटा। जामवंत और श्री कृष्ण में भयंकर युद्ध होने लगा।जब कृष्ण गुफा से वापस नहीं लौटे तो सारे यादव उन्हे मरा हुआ समझ कर बारह दिन के उपरांत वहां से द्वारिकापूरी वापस आ गए तथा समस्त वृतांत वासुदेव और देवकी से कहा। वासुदेव और देवकी व्याकुल होकर"महामाया दुर्गा"की उपासना करने लगे। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने प्रकट होकर उन्होंने आशिर्वाद दिया कि तुम्हारा पुत्र तुम्है अवश्य मिलेगा, श्री कृष्ण और जामवंत दोनों ही पराक्रमी थे। युद्ध करते हुए गुफा में (२८)अठ्ठाईस दिन बीत गए। कृष्ण की मारसे महाबली जामवंत की नस टुट गई।वह अति व्याकुल हो उठा और अपने स्वामी श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करने लगा। जामवंत के द्वारा श्री रामचन्द्र जी के स्मरण करते ही भगवान श्री कृष्ण ने श्री रामचन्द्र जी के रूप में उसे दर्शन दिए। जामवंत उनके चरणों में गिर गया और बोला"हे भगवान"!अब जाना की अपने यदुवंश में अवतार लिया है,"श्री कृष्ण ने कहा,"हे जामवंत! तुमने मेरे राम अवतार के समय रावण के वध हो जाने के पश्चात मुझसे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की थी और मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारी इच्छा अपने अगले अवतार में अवश्य पूरी करुंगा,अपना वचन सत्य सिद्ध करने के लिए ही मैंने तुमसे यह युद्ध किया है"जामवंत ने भगवान श्री कृष्ण की अनेक प्रकार से स्तुति की और अपनी कन्या का विवाह उनसे (कृष्ण) से कर दिया। कृष्ण जामवंती को साथ लेकर द्वारिकापुरी में पहुंचे। उनके वापस आने से द्वारिकापूरी में चहुं और प्रसन्नता व्याप्त हो गई। श्री कृष्ण ने सत्राजित को बुलाकर उसकी मणि उसे वापस कर दी।सत्राजित अपने द्वारा श्री कृष्ण पर लगाये झुठे कलंक के कारण अती लज्जित हुआ और प्रश्चाताप करने लगा। प्रायश्चित के रूप में उसने अपनी कन्या" "सत्यभामा"का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया और वह"मणी" भी उन्हें दहेज में दे दी। किन्तु शरणागत वत्सल श्री कृष्ण ने उस मणि को स्वीकार न करके पु:न सत्राजित को वापस कर दिया। 🌹 धर्म भक्ति 🌹 धार्मिक बौधकथा 🌹 ज्ञानवर्षा 🌹🕉️⛳ जय श्री द्वारिका धीश कृष्ण 🕉️🙏 🌷🌳🌲🌻🌻🌲🌲🌳🌳

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ARJUN, Mo,9879770109 Apr 17, 2021

🌹⛳राधा और कृष्ण की पहली मुलाकात ⛳🌹 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏 🌹👉 जय श्री कृष्ण 👈🌹 सब ऐसा कहते हैं कि राधा धरती पर कृष्ण की इच्छा से ही आईं थीं! भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के अनुराधा नक्षत्र में "राधा "ने वृंदावन के पास "रावल "नाम क गांव के एक मंदिर में जन्म लिया था यह दिन को आज भी सभी लोगों राधा अष्टमी के नाम से मनाते हैं । कहते हैं कि,जन्म के (११) महिनों तक राधा ने अपनी आंखों नहीं खोली थी । थोड़ा दिनों के बाद राधा बरसाना चली गई और जहां पर आज भी राधा महल है! राधा और कृष्ण की पहली मुलाकात मांडिरवन में हुई! नंदबाबा यहां गाय चराते हुए कान्हा को गोद में लेकर पहुंचा था! कृष्ण की लीलाओं से राधा के मन में ऐसी छाप पड़ी की, राधा का तन-मन श्याम रंग में रंग गया, कृष्ण-राधा की नजरों से ओझल होते, वो बैचेन हो जाती! क‌ष्ण ये,राधा के लिए प्राणवायु की तरह था, जिसके बिनां जिवन की कल्पना करनां राधा के लिए मुश्किल था। 🌹 धर्म भक्ति 🌹 धार्मिक बौधकथा 🌹 ज्ञान वर्षा 🌹 🙏 राधा कृष्ण 🙏

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ARJUN, Mo,9879770109 Jan 24, 2021

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ARJUN, Mo,9879770109 Nov 24, 2020

🌹जय गुरुड जी 🙏 जय कश्यपजी 🙏 @@@@@@@@@##@@@@@@@@@ ☕ अमृत के लिए गुरुड जी की यात्रा-और -गज कच्छयप का वृत्तांत:!भाग:२। 🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀 प्राचिन काल में विभावसु एक ऋषि था,उसका छोटा भाई सु प्रतिक महान तेजस्वी था,सु प्रतिक खुद के भाग की संपत्ति, बड़े भाई के पास न रखने के लिए ईच्छते थे और हर दिन संपत्ति का भाग बंटाई करने कहते थे,विभावसु पोताना"नाना भाई"'सु प्रतिक को' बोला "संपत्ति"के मोह के कारण,जो लोग संपत्ति का भाग पाड ने चाहते हैं,उसकी भाग-बटाई के बाद, एक दूसरे से विरोध हो जाता है तब शत्रु पण उसके अलग-अलग-मित्र हो जाता है-भाई-भाई के बिच में वैमनस्य पेदा कर देते हैं, और वैर भाव बढा देते हैं, अलग-अलग होने से तुंरंतज उसका अध:पतन हो जाता है, इसलिए सत पुरुषों भाई ओ को अलग होने की बात को सही मानते नहीं है। जो लोगों, गुरु और शास्त्र का उपदेश पर ध्यान न देकर परस्पर एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते हैं,उसको वश में रखना कथिन हो,जो वो लोग के भेदभाव के कारण"ज"संपत्ति की वहेचणी करना ईंच्छते हो, इसलिए"जा" तुझको,"हाथी"की योनि होगी'सु प्रर्तिक बोला, में हाथी होंगे"तो" तुम काचबा होंगे,आ प्रमाणे बन्ने भाई धन की लालच में एक दूसरे को शाप देकर, हाथी और काचबा (कछ्यप) हो गया एक दूसरे का"प्राण"लेने के लिए अधिरा हो रहा है,उस दोनो "प्राणी" हाथी और काचबा को खा कर आप अमृत ले के आइये। *अमृत के लिए गुरुड जी की यात्रा ऐसे ही पुर्ण हुई* 🌀 धर्म भक्ति 🌹 पौराणिक कथा 🙏 ज्ञान वर्षा🌹 🌹🌹🌀🌀 संक्षिप्त महाभारत 🌀🌀🌹🌹

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