Ansouya M Mar 1, 2021

🌹🙏🌹🙏🙏जय श्री राधे कृष्ण 🌹🙏🌹🌹🌹🌹🌹श्री गणेशाय नमः 🙏🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏हर हर महादेव 🙏🌹 🌹🙏🌹🌹🌹🌹जय भोले नाथ की 🙏🙏 🙏🌹🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌿नमस्कार भारतीय संस्कृति का संस्कार🌿 भारतीय संस्कृति का संस्कार व्यक्ति को हृदय के गहरे अपनत्व से मानवता की सेवा के लिए समर्पित करता है। इसे एक कहानी के माध्यम से इस प्रकार समझें। एक गाँव के कुएँ पर तीन महिलाएँ पानी भर रही थी। तभी एक महिला का बेटा वहाँ से गुजरा उसने तीनों की तरफ देखा तो उसकी माँ बोली : यह मेरा बेटा है और विदेश की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ता है। थोड़ी देर बाद दूसरी महिला का पुत्र गुजरा उसने भी तीनों की तरफ देखा तो उसकी माँ बोली : यह मेरा बेटा है कान्वेंट स्कूल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ता है। तभी तीसरी महिला की बेटी वहाँ से गुजरी उसने तीनों को "नमस्कार" किया और माँ के पास आई। पानी से भरी घघरी उठाकर उसने अपने कंधे पर रखी, दुसरे हाथ में भरी हुई बाल्टी सम्हाली और माँ से बोली : "चल माँ, घर चल।" उसकी माँ बोली : यह मेरी बेटी है सरकारी स्कूल में हिंदी माध्यम से पढ़ती है जहां अध्ययन के साथ साथ माता-पिता की सेवा और मानवता के प्रति समर्पण की शिक्षा भी दी जाती है। उस माँ के चेहरे का आनंद देख बाकी दूसरी दोनों महिलाओं की नजरें झुक गई। भारतीय संस्कृति के संस्कार का शब्द "नमस्कार" हृदय के गहरे अपनत्व को दर्शाता है और ऐसी महान संस्कृति मानवता का उत्त्थान करती है। 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🌹🙏🌹🙏🙏🌹🙏🙏🙏🌹सुख समृद्धि और खुशियों की कामना करते हुए शुभ प्रभात आप सभी भक्ततों को जी 🌷🙏🌷🙏 🙏सर्वे भवन्तू सुखिनह 🌹🙏🌹🌹🙏🌹🌹🙏🌹🌹🌹🙏🌹🌹🌹🌹🙏🌹🕉

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Ansouya M Feb 28, 2021

🌹🙏जय श्री राधे कृष्ण 🌹🙏🌹🙏🌹🌹🌹🙏🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🌹🌹🙏🌹🙏🌹🙏🙏🌹🙏🙏🙏🌹🙏शुभ संध्या मंगलमय हो आप सभी को जी🌹🙏🌹🙏🌹🌹🙏🌹🌹🙏🌹🙏🙏🙏🙏🙏🌹"एक कहानी है:–एक घुड़सवार कहीं दूर जा रहा था। बहुत देर से पानी न मिलने से उसका घोड़ा प्यास से बेहाल था। तभी उसे एक खेत में रहट चलता दिखाई दिया।वह घोड़े को रहट के पास ले आया, ताकि घोड़ा पानी पी सके। पर वह रहट बहुत जोर से टक-टक-टक-टक आवाज कर रहा था। उस आवाज से घबरा कर घोड़ा पीछे हट गया।घुड़सवार के कई बार प्रयास करने पर भी जब वह घोड़े को पानी न पिला सका, तो उसने खेत के मालिक को आवाज लगा कर उससे बोला- भैया! आप कुछ देर के लिए अपना रहट बंद कर दो। ताकि घोड़ा पानी पी सके। रहट की टक-टक के कारण घोड़ा पानी नहीं पी पा रहा है।खेत का मालिक उसकी बात सुन कर हंसने लगा। और बोला- भाई! तुम समझदार लगते हो, फिर ऐसी मूर्खतापूर्ण बात क्यों करते हो?! अगर रहट बंद हो जाएगा तो पानी आना भी तो बंद हो जाएगा। तब घोड़ा पियेगा क्या?! अगर तुम अपने घोड़े की प्यास बुझाना चाहते हो, तो तुम्हें उसे इस टक-टक में ही पानी पीने का अभ्यास कराना पड़ेगा। दूसरा कोई उपाय नहीं है।वह घुड़सवार और कोई नहीं, आप ही हैं। मन ही घोड़ा है। जगत की चिक-चिक ही रहट की टक-टक है। भगवान स्वयं ही खेत के मालिक हैं। भगवान का भजन ही पानी है। बिना भगवान का भजन किए इस मन की जन्मों जन्मों की प्यास बुझना असंभव है।मन कहता है कि मैं इस चिक-चिक में भगवान का भजन कैसे करूं?! पर भगवान कहते हैं कि अगर तुझे प्यास बुझानी है, अगर तूं आराम, विश्राम, आनन्द चाहता है, दुख से छूटना चाहता है, मुक्ति चाहता है, तो तुझे भजन का जल पीना ही पड़ेगा।"और भजन तो जगत की चिक-चिक में ही करना पड़ता है। यदि आप सोचते हैं कि पहले जगत की चिक-चिक रुक जाए, फिर मैं भजन करूंगा। तो निश्चित ही इस प्यास के बुझने की न कोई संभावना थी, न है, न कभी होगी।इसलिए क्रियाओं के अभ्यास से अपने श्वासों के भीतर की शक्ति को पहचान करके शान्ति का अनुभव करें और अपना जीवन सफल बनायें।" **"अंतरराष्ट्रीय शांतिबक्ता, प्रेम रावत जी"** 🌹🙏🌹ॐ आदित्याय नमः 🌹 🌹🙏ॐ शान्ति शान्ति शान्ति 🌹🙏

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Ansouya M Feb 28, 2021

🌹🙏🌹🌹जय श्री राधे कृष्ण 🙏🌹🙏🙏🙏🙏🌹🌹श्री गणेशाय नमः 🌹🙏 🙏🌹🙏🙏🌹🌹ॐ घृणी सुर्याय नमः 🌹🙏 🙏🌹🙏🙏🌹🙏🙏🙏कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ जिनके हृदय में निरन्तर प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे शुद्धान्त:करण पुरुष स्वप्नमें भी यमराजको नहीं देखते ॥ जिनके हृदयमें भक्ति महारानीका निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते ॥ भगवान्‌ तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधनसे वशमें नहीं किये जा सकते; वे केवल भक्तिसे ही वशीभूत होते हैं। इसमें श्रीगोपीजन प्रमाण हैं ॥ मनुष्योंका सहस्रों जन्मके पुण्य-प्रतापसे भक्तिमें अनुराग होता है। कलियुगमें केवल भक्ति, केवल भक्ति ही सार है। भक्तिसे तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं ॥ येषां चित्ते वसेद्‌भक्तिः सर्वदा प्रेमरूपिणी । नते पश्यन्ति कीनाशं स्वप्नेऽप्यमलमूर्तयः ॥ न प्रेतो न पिशाचो वा राक्षसो वासुरोऽपि वा । भक्तियुक्तमनस्कानां स्पर्शने न प्रभुर्भवेत् ॥ न तपोभिर्न वेदैश्च न ज्ञानेनापि कर्मणा । हरिर्हि साध्यते भक्त्या प्रमाणं तत्र गोपिकाः ॥ नृणां जन्मसहस्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते । कलौ भक्तिः कलौ भक्तिः भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः ॥ ………. (श्रीमद्भागवतमाहात्म्य २|१६-१९) 🌹🙏🌹सुख समृद्धि और खुशियों की कामना करते हुए शुभ प्रभात आप सभी भक्ततों को जी 🌷🙏🌷🙏 🙏🌹🙏🌹🙏🙏🌹🙏🙏🙏🕉

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Ansouya M Feb 26, 2021

🌹🌹🙏🌹🌹जय श्री राधे कृष्ण 🙏🌹🙏🌹🙏ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🌹🙏🌹🌹🙏🌹🌹श्री गणेशाय नमः 🌹🙏🌹 🙏🌹🙏🌹🌹जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 🙏🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌹🙏🙏*शांति सन्देश* मानवीय प्रेम , प्रेम है और हृदय का प्रेम भक्ति है । इस शरीर के खत्म हो जाने पर वह मानवीय प्रेम भी खत्म हो जाता है लेकिन जो हृदय का प्रेम है , जो भक्ति है वह शरीर खत्म भी हो जाए , फिर भी रहेगी । 🙏 ***प्रेम रावत***🌹🙏 श्री कृष्ण: शरणम् मम 🌹🙏🌹🌹 कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ जिनके हृदय में निरन्तर प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे शुद्धान्त:करण पुरुष स्वप्नमें भी यमराजको नहीं देखते ॥ जिनके हृदयमें भक्ति महारानीका निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते ॥ भगवान्‌ तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधनसे वशमें नहीं किये जा सकते; वे केवल भक्तिसे ही वशीभूत होते हैं। इसमें श्रीगोपीजन प्रमाण हैं ॥ मनुष्योंका सहस्रों जन्मके पुण्य-प्रतापसे भक्तिमें अनुराग होता है। कलियुगमें केवल भक्ति, केवल भक्ति ही सार है। भक्तिसे तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं ॥ येषां चित्ते वसेद्‌भक्तिः सर्वदा प्रेमरूपिणी । नते पश्यन्ति कीनाशं स्वप्नेऽप्यमलमूर्तयः ॥ न प्रेतो न पिशाचो वा राक्षसो वासुरोऽपि वा । भक्तियुक्तमनस्कानां स्पर्शने न प्रभुर्भवेत् ॥ न तपोभिर्न वेदैश्च न ज्ञानेनापि कर्मणा । हरिर्हि साध्यते भक्त्या प्रमाणं तत्र गोपिकाः ॥ नृणां जन्मसहस्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते । कलौ भक्तिः कलौ भक्तिः भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः ॥ ………. (श्रीमद्भागवतमाहात्म्य २|१६-१९)

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Ansouya M Feb 26, 2021

🌹🌹🙏🌹🌹जय श्री राधे कृष्ण 🙏🌹🙏🌹🙏ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🌹🙏🌹🌹🙏🌹🌹श्री गणेशाय नमः 🌹🙏🌹 🙏🌹🙏🌹🌹जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹 🙏🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌹🙏🙏*शांति सन्देश* मानवीय प्रेम , प्रेम है और हृदय का प्रेम भक्ति है । इस शरीर के खत्म हो जाने पर वह मानवीय प्रेम भी खत्म हो जाता है लेकिन जो हृदय का प्रेम है , जो भक्ति है वह शरीर खत्म भी हो जाए , फिर भी रहेगी । 🙏 ***प्रेम रावत***🌹🙏 श्री कृष्ण: शरणम् मम 🌹🙏🌹🌹 कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ जिनके हृदय में निरन्तर प्रेमरूपिणी भक्ति निवास करती है, वे शुद्धान्त:करण पुरुष स्वप्नमें भी यमराजको नहीं देखते ॥ जिनके हृदयमें भक्ति महारानीका निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या दैत्य आदि स्पर्श करनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते ॥ भगवान्‌ तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधनसे वशमें नहीं किये जा सकते; वे केवल भक्तिसे ही वशीभूत होते हैं। इसमें श्रीगोपीजन प्रमाण हैं ॥ मनुष्योंका सहस्रों जन्मके पुण्य-प्रतापसे भक्तिमें अनुराग होता है। कलियुगमें केवल भक्ति, केवल भक्ति ही सार है। भक्तिसे तो साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र सामने उपस्थित हो जाते हैं ॥ येषां चित्ते वसेद्‌भक्तिः सर्वदा प्रेमरूपिणी । नते पश्यन्ति कीनाशं स्वप्नेऽप्यमलमूर्तयः ॥ न प्रेतो न पिशाचो वा राक्षसो वासुरोऽपि वा । भक्तियुक्तमनस्कानां स्पर्शने न प्रभुर्भवेत् ॥ न तपोभिर्न वेदैश्च न ज्ञानेनापि कर्मणा । हरिर्हि साध्यते भक्त्या प्रमाणं तत्र गोपिकाः ॥ नृणां जन्मसहस्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते । कलौ भक्तिः कलौ भक्तिः भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः ॥ ………. (श्रीमद्भागवतमाहात्म्य २|१६-१९)

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Ansouya M Feb 25, 2021

🙏🌹🙏जय श्री राधे कृष्ण 🌹🙏🌹🌹🌹🌹🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹🌹🙏🌹🌹🌹🌹राजा और गुरु🙏🌹🙏🙏🙏🙏🙏 एक राजा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखते थे। उन्होंने अपने राज्य में अनेक विद्यालय, चिकित्सालय और अनाथालयों का निर्माण करवाया ताकि कोई भी व्यक्ति शिक्षा, चिकित्सा और आश्रय से वंचित न रहे। एक दिन अपनी प्रजा के सुख-दुख का पता लगाने के लिए वह अपने मंत्री के साथ दौरे पर निकले। उन्होंने गांवों, कस्बों व खेड़ों की यात्रा कर विभिन्न समस्याओं को जाना। कहीं सब ठीक था तो कहीं कुछ परेशानियां भी थीं। राजा ने लोगों को उनकी समस्याओं के शीघ्र निदान करने का आश्वासन दिया और आगे बढ़ गए। एक दिन जंगल से गुजरते हुए राजा को एक तेजस्वी संत से मिलने का मौका मिला। संत एक छोटी-सी कुटिया में रहकर छात्रों को पढ़ाते और सादा जीवन व्यतीत कर रहे थे। लौटते समय राजा ने संत को सोने की कुछ मोहरें भेंट करनी चाहीं। संत ने कहा : 'राजन, इनका हम क्या करेंगे? इन्हें आप गरीबों में बांट दें।' राजा ने जानना चाहा कि आश्रम में धनापूर्ति कैसे होती है तो संत बोले, 'हम क्रियाओं के अभ्यास द्वारा स्वांसों के भीतर की शक्ति के दिव्य रसायन से तांबे को सोना बना देते हैं। राजा ने चकित होकर कहा : 'अगर आप वह दिव्य रसायन मुझे उपलब्ध करा दें तो मैं अपने संपूर्ण राज्य को वैभवशाली बना सकता हूं।' संत ने कहा, 'आपको एक माह तक हमारे साथ सत्संग करना होगा। तभी इस ज्ञान की क्रिया को जाना जा सकता है। राजा एक माह तक सत्संग में आए। एक दिन संत ने कहा, 'राजन, अब आप स्वर्ण रसायन का तरीका जान लीजिए।' इस पर राजा बोले : 'गुरुवर, अब मुझे स्वर्ण रसायन की जरूरत नहीं है। आपने मेरे हृदय को ही अमृत रसायन बना डाला है।' वह समझ गए थे कि सत्संग से व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि विकारों से सहज ही मुक्त हो जाता है और स्वांसों के भीतर की दिव्य शक्ति आत्मा सात्विक प्रकाश से आलोकित हो जाती है।🙏🌹🙏🙏🕉🕉🕉🌹🙏🌹🙏 🌷🙏🌷🙏🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🌹शुभ संध्या मंगलम🌹🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🕉🕉🌹🌹🌹🙏🙏🕉🌹🌹🙏

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