Ankur Singh Feb 4, 2020

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Ankur Singh Nov 4, 2019

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Ankur Singh Nov 4, 2019

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Ankur Singh Oct 28, 2019

जय श्री गोवर्धन महाराज की कथा दीपावली की अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में काफी महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व की अपनी मान्यता और लोककथा है। गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। देवी लक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं। इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की। जब कृष्ण ने ब्रजवासियों को मूसलधार वर्षा से बचने के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उँगली पर उठाकर रखा और गोप-गोपिकाएँ उसकी छाया में सुखपूर्वक रहे। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा। जय श्री गोवर्धन महाराज की जय श्री राधे कृष्णा हर हर महादेव 💖💖💖💖💖💖💖

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Ankur Singh Jul 16, 2019

#श्रीगुरुपूर्णिमा सनातन धर्म में प्रारंभ से ही गुरुओं के सम्मान की परंपरा रही है। हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक गुरुओं का वर्णन मिलता है, जिन्होंने गुरु शिष्य की महिमा और परंपरा को नई ऊंचाइयां प्रदान की है। गुरु का अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला यानी गुरु ही शिष्य को जीवन में सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन करता है। भगवान शिव आदि व अनंत हैं अर्थात न तो कोई उनकी उत्पत्ति के बारे में जानता है और न कोई अंत के बारे में। यानी शिव ही परमपिता परमेश्वर हैं। भगवान शिव ने भी गुरु बनकर अपने शिष्यों को परम ज्ञान प्रदान किया है। अगर कहा जाए कि भगवान शिव सृष्टि के प्रथम गुरु हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।सृष्टि के रचनाकार ने सृष्टि की रचना अंतरिक्ष,ग्रह,नक्षत्र,तारामंडल,पृथ्वी एव समस्त जड़ चेतन जीव की रचना करने के पश्चात प्राणिमात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने का उत्तरदायित्व #महादेव ने लिया। #महादेव #हिमालय के #कैलाश पर अवतरित हो ध्यानमग्न अवस्था मे विराजते हैं,लगातार वर्षो तक ध्यानावस्थित योगी की चर्चा सुन ७युवा उनके सम्मुख यो मुद्रा में विराजमान हो जाते कई वर्ष व्यतीत होने के पश्चात जब #योगेश्वरमहादेव अपने नेत्र खोलते है तो सर्वप्रथम उनकी दृष्टि वहां उपस्थित उन सातो युवाओ पर पड़ती है।#देवाधि #महादेव #दृष्टिपात द्वारा उन सातो युवाओ को दीक्षित करते है,ज्ञान से परिपूर्ण करते है वही सात युवक आगे चलकर #सप्तऋषि कहलाये।दीक्षा देने के पश्चात #आदिगुरूमहादेव उन सातो ऋषियों को इस #भूमण्डल पर स्थित #सप्त #द्वीपो पर एक एक ऋषि को #मानवकल्याण को ज्ञान के प्रसार हेतु भेज देते । यही से #श्रीगुरुपूर्णिमा का प्रारम्भ होता इसे वैसाख पूर्णिमा भी कहते है,व्यास पूर्णिमा भी कहते है।इसी दिन वेदों के रचनाकार #महृषिवेदव्यास का भी जन्म हुआ था।#श्रीगुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर उन सभी को जिनसे जीवन मे कुछ भी ज्ञान प्राप्त हुआ,कुछ भी सीखने को प्राप्त हुआ ,उनको हृदय से नमन, वन्दन एव उनके प्रति सदैव समर्पण का भाव बना रहे यही ईश्वर से प्रार्थना सभी को #श्रीगुरुपूर्णिमा की #बधाई एवं #शुभकामनाये

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Ankur Singh Jul 16, 2019

#श्रीगुरुपूर्णिमा सनातन धर्म में प्रारंभ से ही गुरुओं के सम्मान की परंपरा रही है। हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक गुरुओं का वर्णन मिलता है, जिन्होंने गुरु शिष्य की महिमा और परंपरा को नई ऊंचाइयां प्रदान की है। गुरु का अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला यानी गुरु ही शिष्य को जीवन में सफलता के लिए उचित मार्गदर्शन करता है। भगवान शिव आदि व अनंत हैं अर्थात न तो कोई उनकी उत्पत्ति के बारे में जानता है और न कोई अंत के बारे में। यानी शिव ही परमपिता परमेश्वर हैं। भगवान शिव ने भी गुरु बनकर अपने शिष्यों को परम ज्ञान प्रदान किया है। अगर कहा जाए कि भगवान शिव सृष्टि के प्रथम गुरु हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।सृष्टि के रचनाकार ने सृष्टि की रचना अंतरिक्ष,ग्रह,नक्षत्र,तारामंडल,पृथ्वी एव समस्त जड़ चेतन जीव की रचना करने के पश्चात प्राणिमात्र के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने का उत्तरदायित्व #महादेव ने लिया। #महादेव #हिमालय के #कैलाश पर अवतरित हो ध्यानमग्न अवस्था मे विराजते हैं,लगातार वर्षो तक ध्यानावस्थित योगी की चर्चा सुन ७युवा उनके सम्मुख यो मुद्रा में विराजमान हो जाते कई वर्ष व्यतीत होने के पश्चात जब #योगेश्वरमहादेव अपने नेत्र खोलते है तो सर्वप्रथम उनकी दृष्टि वहां उपस्थित उन सातो युवाओ पर पड़ती है।#देवाधि #महादेव #दृष्टिपात द्वारा उन सातो युवाओ को दीक्षित करते है,ज्ञान से परिपूर्ण करते है वही सात युवक आगे चलकर #सप्तऋषि कहलाये।दीक्षा देने के पश्चात #आदिगुरूमहादेव उन सातो ऋषियों को इस #भूमण्डल पर स्थित #सप्त #द्वीपो पर एक एक ऋषि को #मानवकल्याण को ज्ञान के प्रसार हेतु भेज देते । यही से #श्रीगुरुपूर्णिमा का प्रारम्भ होता इसे वैसाख पूर्णिमा भी कहते है,व्यास पूर्णिमा भी कहते है।इसी दिन वेदों के रचनाकार #महृषिवेदव्यास का भी जन्म हुआ था।#श्रीगुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर उन सभी को जिनसे जीवन मे कुछ भी ज्ञान प्राप्त हुआ,कुछ भी सीखने को प्राप्त हुआ ,उनको हृदय से नमन, वन्दन एव उनके प्रति सदैव समर्पण का भाव बना रहे यही ईश्वर से प्रार्थना सभी को #श्रीगुरुपूर्णिमा की #बधाई एवं #शुभकामनाये

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Ankur Singh Jun 17, 2019

मोह के मसाले में ज्ञान का अचार, कैसे आएं अच्छे विचार! एक मजेदार प्रश्न आया है किसी युवा का. उसकी पत्नी बड़ी धार्मिक स्वभाव की हैं, जितने संभव हों उतनी पूजा-पाठ कर लेती हैं. महिलाओं का एक भजन-सत्संग ग्रुप है उसमें भी नियमित तौर से जाती हैं. माता-पिता भी धार्मिक स्वभाव के हैं. कीर्तन आदि में जितना संभव हो उतना जाते हैं. चलने-फिरने में तकलीफ है इसलिए धार्मिक चैनलों पर ही कथा-प्रवचन सुनते रहते हैं. घर को बाहर से देखें तो लगेगा किसी आश्रम में ही हैं लेकिन अंदर का कलह ऐसा कि पूछिए मत. मेरे पास समय नहीं है. ऑफिस के लिए आते-जाते समय प्रभु शरणम् की कथाएं पढ़ने का समय मिल जाता है. बस उसमें ही पढ़ लेता हूं. मंदिर के सामने से गुजरता हूं तो रूककर प्रणाम कर लेता हूं. इससे ज्यादा कोई धार्मिक कार्य नहीं कर पाता. मेरे परिजन तो पूरा समय कथा सत्संग में दे रहे हैं, फिर भी घर युद्ध का मैदान ही बना हुआ है. एक दूसरे को नीचा दिखाने पर आमादा हैं. कोई मौका नहीं छोड़ते. उनपर कोई असर क्यों नहीं हो रहा? बंधु की शिकायत है कि मैं अक्सर बताता हूं कि सज्जनों के साथ मित्रता और सत्संग दोनों से जीवन में सकारात्मकर बदलाव आते हैं. विचारों में शुद्धता आती है- फिर मेरे घर में क्यों नहीं? मेरा इन चीजों पर से भरोसा उठ रहा है. यह प्रश्न ऐसा हो जो उन्होंने खुलकर कह दिया लेकिन देखें तो हर दूसरे घर की यही हालत है. निराश व्यक्ति अंततः सारी झल्लाहट उसी पर निकालता है जहां से प्रतिरोध का स्वर नहीं आएगा. अक्सर धर्म-आध्यात्म को ही लोग कोसते हैं क्योंकि उससे उन्हें आशा सबसे अधिक होती है. इस पर बात करेंगे, पहले एक छोटी सी कथा सुना देता हूं आपको. राजा जनक बड़े ब्रह्मवेत्ता थे. उनके पास ज्ञानियों का जमावड़ा रहता था. एक ऋषि ने अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए जनक के पास भेजा. ऋषिपुत्र जनक के पास आया. जनक पारखी थे, उस बालक के हाव-भाव से उसे पूरा समझ गए. जनक ने महल में ही उसके रहने का प्रबंध कराया जो उसने स्वीकार लिया. अगले दिन जनक ने उससे आने का कारण पूछा. ऋषिपुत्र ने कहा- मैंने सारे शास्त्र पढ़ लिए. यह संसार मिथ्या है. दुख औऱ मृत्यु का सामना तो जीवन में सबको करना ही है. कुछ भी स्थिर नहीं है. फिर ब्रह्म क्या है? मुझे ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा है. एक बालक के मुख से ऐसी गंभीर-गंभीर बातें सुनकर महाराजा जनकजी समझ गए कि इसने शास्त्र पढ़ तो अच्छा लिया है. जनकजी उसे उपदेश देने लगे. तभी एक सेवक ने आकर कहा- महाराज महल में आग लग गई है. जनक ने सेवक की बात सुनी और लापरवाही से टाल दी जैसे साधारण सी बात इस इतना क्या बल देना. वह उपदेश देने में लगे रहे. थोड़ी देर में वह सेवक फिर लौटा. उसने जनकजी को आग का पूरा ब्योरा दिया कि आग बढ़ती-बढ़ती महल में कहां तक पहुंच चुकी है. जनकजी के अपने कक्ष तक आग पहुंच चुकी थी. जनक ने कहा- यह चिंता की बात तो है परंतु तुम अभी जाओ. यहां ब्रह्मज्ञान की चर्चा हो रही है. इसमें आग को बाधक नहीं बनना चाहिए. जनक स्थिरभाव से फिर उस ऋषिकुमार को उपदेश देने लगे. सेवक बार-बार आता और विनम्रता से आग का ब्योरा देकर जाता. बार-बार आग की बात सुनकर ऋषिकुमार का ध्यान ब्रह्म उपदेश से हटकर आग की गति पर जा टिका. जनकजी उसके सामने ब्रह्म व्याख्या कर रहे थे किंतु वह तो अंदाजा लगा रहा था कि आग अब कहां तक पहुंची होगी. थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा और घबराते हुए बोला- महाराज, क्षमा करें. अब तो आग अतिथिगृह तक पहुंच गई है जहां ऋषिपुत्र ठहरे हैं. इस पहले कि जनक कुछ उत्तर देते वह ऋषिपुत्र खड़ा हुआ और घबराते हुए बोला- महाराज मेरी तो लंगोट और धोती टंगी है, कक्ष में. मैं उसे उतार लाता हूं, कहीं जल न जाए. ब्रह्मचर्चा तो होती रहेगी. जनकजी बोले- ऋषिकुमार तुम कहते हो कि संसार के सारे शास्त्र पढ़कर समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है. क्या यही ज्ञान है? इसी के आधार पर संसार को मिथ्या कह रहे हो. तुम्हारा मोह तो खूंटी पर लटके साधारण वस्त्रों से लिपटा है. मोह ही अज्ञान की वह रस्सी है जिसमें सारा ज्ञान उलझकर छटपटाता रह जाता है. कुछ प्राप्त करने के स्थान पर कुछ प्रदान करने की भावना से बिताया एक दिन प्राप्ति की इच्छा वाले सौ दिनों से ज्यादा सुखमय होता है. यही ब्रह्म सत्य है. तो अब आते हैं बंधु की बात पर. मित्रवर! आपके परिजन तन से तो सत्संग में होते हैं पर मन उनका घर की खूंटी में टंगा रहता है. उनके कानों ने बातें सुन तो लीं आनंदित भी हुए पर उसे आगे हृदय तक भेजा नहीं. इसलिए उनका सत्संग ऋषिपुत्र जैसा ही है जो लंगोट और धोती तक ही उलझा है. आत्मा तक ज्ञान को पहुंचने ही नहीं दे रहे तो फिर वह आत्मा को निर्मल करेगा कैसे? अब आपकी भी बात कर लेते हैं. संभव है कि घर में य़ुद्ध की मुद्रा में रहने वाले लोग इतने ज्यादा हैं कि उन सेनानायकों के सामने आप शस्त्र उठाने की हिम्मत न कर पा रहे हों परंतु गति आपकी भी वही है. आपने कहा कि बस जब मौका मिले चलते-फिरते पढ़ लेता हूं. मंदिर दिख गए तो प्रणाम कर लेता हूं, बाकी का खाली समय सोशल मीडिया में निकल जाता है. यदि उन्हें सत्संग का लाभ नहीं हो रहा तो आपको भी फेसबुक, व्हॉटसएप्प का क्या लाभ हो रहा है कहना मुश्किल है. आप अपनी जीवनचर्या का गहराई से अवलोकन करिएगा, आप पाएंगे कि जब से आप इन चीजों में ज्यादा समय देने लगे हैं आपका प्रोफेशनल जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. आपकी झल्लाहट बढ़ी होगी. ऑफिस में जो लोग आपके अजीज हुआ करते थे अब उनसे कट रहे हैं आप. दोष सत्संग का नहीं है. न दोष सोशल मीडिया का है. दोष हमारा है कि हम वहां से लेकर क्या आ रहे हैं? बहुत से लोग मंदिरों में जाते हैं टाइमपास करने, कुछ जूते चुराने, कुछ मुफ्त का प्रसाद खाने और कुछ अभद्रता करने. इसका अर्थ यह नहीं हो गया कि मंदिर इसका ही स्थान है. ज्यादातर लोग मंदिर मानसिक शांति और नई आशा की आस से जाते हैं और उन्हें वह मिलती भी है. जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तीन्हिं देखि तैसी. आप एक बार स्वयं प्रयास करके देखिए घर की व्यवस्था दुरुस्त करने का. सत्संग मंडली या टीवी पर प्रवचन दे रहे बाबा की जिम्मेदारी नहीं है आपका परिवार. एक प्रयास आप स्वयं भी करके देखिए. शायद सत्संग में वे यही सीख कर आए हों कि घर का भर्ता यानी सबके लिए पेट भरने का प्रबंध करने वाला जो राह दिखाए उस पर चलना चाहिए. भर्ता तो उन्हें कोई राह ही नहीं दिखा रहा. झल्लाकर बस कह रहा है कि दिल करता है घर ही छोड़ दूं. छोड़ने से नहीं जोड़ने की बात कहने से बनेगी बात. -राजन प्रकाश ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव 🙏🙏🙏🙏🙏

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