anita sharma Feb 18, 2019

🔔🔔🔔🔔 सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान् के गुणों की तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणों की तरफ भी नहीं देखता | वह भगवान् के ऊँचे-ऊँचे प्रेमियों की तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसे-ऐसे होते हैं; तत्व को जानने वाले जीवन्मुक्त ऐसे-ऐसे होते हैं | प्राय: लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान् का भजन करता तो बीमार कैसे हो गया ? भगवान् का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया ? उस पर दुःख क्यों आ गया ? उसका बेटा क्यों मर गया ? उसका धन क्यों चला गया ? उसका संसार में अपयश क्यों गया ? उसका निरादर क्यों हो गया ? आदि-आदि | ऐसी कसौटी कसना बिलकुल फालतू बात है, बड़े नीचे दर्जे की बात है | ऐसे लोगों को क्या समझायें ! वे सत्संग के नजदीक ही नहीं आये, इसी वास्ते उनको इस बात का पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है ? शरणागति क्या होती है ? वे इन बातों को समझ ही नहीं सकते, परंतु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान् का भक्त दरिद्र होता ही है, उसका संसार में अपमान होता ही है, उसकी निन्दा होती ही है | शरणागत भक्त को तो निन्दा-प्रशंसा, रोग-निरोगता आदि से कोई मतलब ही नहीं होता | इनकी तरफ वह देखता ही नहीं | वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं, बस ! अब संसार में क्या है, क्या नहीं है ? त्रिलोकी में क्या है, क्या नहीं है ? प्रभु ऐसे हैं, वे उत्पति, स्थिति और प्रलय करने वाले हैं – इन बातों की तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं | किसी ने एक सन्त से पूछा – ‘आप किस भगवान् के भक्त हो ? जो उत्पति, स्थिति, प्रलय करते हो, उनके भक्त हो क्या ?’ तो उस सन्त ने उतर दिया – ‘हमारे भगवान् का तो उत्पति, स्थिति, प्रलय के साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं | यह तो हमारे प्रभु का एक ऐश्वर्य है | यह कोई विशेष बात नहीं है |’ शरणागत भक्त को ऐसा होना चाहिये | ऐश्वर्य आदि की तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये | 🙏🙏🙏🙏

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anita sharma Feb 18, 2019

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