Anita Mittal Jun 17, 2019

🌿🌹जो समय की चाल है , अपने भक्तों की ढाल है । पल में बदल दे सृष्टिको , वो बाबा महाकाल हैं ।।🌹🌿 🌷🌷हर हर महादेव जी 🌷🌷 🌴🌴यज्ञ की श्रेष्ठता 🌴🌴 :::::::::::::::::::::::::::::: महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ समाप्त होने पर एक अद्भुत नेवला , जिसका आधा शरीर सुनहरा था , यज्ञ भूमि में लोटने लगा । वह रोते हुए बोला कि यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ है । सभी उपस्थित लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ , पूछने पर नेवले ने बताया कि कुछ समय पूर्व अमुक देश में अकाल पड़ा ।मनुष्य भूख से तड़प - 2 कर मरने लगे । एक ब्राह्मण परिवार काफी दिनों से भूखा था । एक दिन कहीं से कुछ अन्न मिला । ब्राह्मणी ने उसकी चार रोटियाँ बनाई । उस ब्राह्मण का यह नियम था कि भोजन से पूर्व कोई भूखा होता तो उसे भोजन कराकर पीछे भोजन करता । उस दिन भी उसने आवाज़ दी कि जो हमसे अधिक भूखा हो उसका अधिकार इस भोजन पर है , वह आये और अपना भाग ग्रहण करे । तो एक चाण्डाल भूख से तड़प रहा था , आ गया । ब्राह्मण ने उसे भोजन कराया। जब वह चाण्डाल भोजन कर चुका और उसने पानी पीकर हाथ धोये , तो उससे कुछ पानी नीचे गिर गया । मैं उधर से निकल रहा था , तो गीली जमीन पर लेट गया । मेरा आधा शरीर ही संपर्क में आया , जिससे उतना ही स्वर्णमय हो गया । मैने सोचा था कि आधा बचा शरीर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से स्वर्णमय हो जायेगा । परंतु यहाँ ऐसा नहीं हुआ । इसलिए यह यज्ञ मेरे विचार से पूर्ण नहीं हुआ है । यज्ञ की श्रेष्ठता उसके बाह्य स्वरुप की विशालता में नहीं , अंतर की उत्कृष्ट त्याग वृत्ति में है । 🥀🥀महादेव का कृपाप्रसाद आपके साथ बना रहे जी 🥀🥀 🌿🌿हर हर महादेव जी 🌿🌿

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Anita Mittal Jun 16, 2019

🌷🌷आप सभी को * फादर्स डे * की सपरिवार अनेकानेक हार्दिक शुभेच्छायें जी 🌷🌷 🌿🌿हर हर महादेव जी 🌿🌿 🌼🌼 माँ - बाप का कर्ज़ 🌼🌼 ********************** सौरभ भी अपने मित्र नीरज की तरह अपने पिता को अपने पास ही रखना चाहता था , किंतु घर में खींचतान की वजह से यह संभव नहीं हो पा रहा था । पिता जी आते और अनमने हो वापस लौट जाते । इसका कोई हल सौरभ को नज़र नहीं आ रहा था । एक दिन बातों ही बातों में सौरभ ने नीरज से पूछ ही लिया । नीरज ! तुम बहुत खुशनसीब हो । मैं बरसों से देख रहा हूँ , तुम्हारे पिताजी या तुम एक दिन के लिये भी एक दूसरे को छोड़कर कहीं नहीं जाते । इतना ही नहीं , घर में शांति भी बनी रहती है । मुझे भी कोई ऐसा मंत्र बता दो कि मेरे पिता जी भी हमेशा मेरे साथ रह सकें । प्रश्न सुनते ही नीरज के चेहरे पर एक शालीनतापूर्ण मुस्कान फैल गयी और उसने बड़ी सहजता से जवाब दिया । मंत्र तो मुझे नहीं मालूम । बस इतना है कि जब मैं लगभग दस साल का था , उस वक्त एक महात्मा हमारे घर पधारे थे । उन्होंने एक छोटा सा नियम मुझे सिखाया था । बस उस नियम की बदौलत ही मैं अपने पिताजी के साथ हूँ । संतश्री ने केवल इतना ही कहा था कि बेटा ! जबतक सुबह उठकर माता - पिता के चरण स्पर्श ना कर लो तब तक मुँह में पानी की एक बूंद भी मत डालना । 🌷🌷महादेव की रहमतें आप सभी के साथ बनी रहें जी 🌷🌷 🌿🌿हर हर महादेव जी 🌿🌿 🌹🌹हैप्पी फादर्स डे 🌹🌹

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Anita Mittal Jun 15, 2019

🌴🌴सुख का घर तेरे अंदर , उसकी बाहर तलाश ना कर 🌴🌴 🌹🌹जय श्रीराम जी 🌹🌹 !!! झरना और प्यासा !!! ############ एक बार भगवान बुद्ध से उनके प्रिय शिष्य आनंद ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की और पूछा , भगवन् ! आप जब प्रवचन देते हैं तो सभी सुनने वाले नीचे बैठते हैं और आप ऊँचे आसन पर बैठते हैं , ऐसा भेदभाव क्यों ? सवाल सुनकर भगवान बुद्ध ने मुसकुराते हुये जवाब दिया , आनंद ! तुमने कभी झरने का पानी पिया है ? आनंद ने " हाँ " में उत्तर दिया । तथागत ने पुनः पूछा , यह बताओ कि पानी झरने के ऊपर खड़े होकर पिया या नीचे जाकर ? आनंद ने उत्तर दिया , झरने का पानी ऊँचाई से गिरता है। ऊँचाई पर जाना व्यवहारिक ही नहीं है । अतः नीचे जाकर ही पानी पिया जा सकता है । भगवान बुद्ध ने कहा , तो फिर यदि प्यासे को संतुष्ट करना है , तो झरने को ऊँचाई से ही बहना होगा ? आनंद ने पुनः " हाँ " में सिर हिलाया । यह देखकर भगवान बुद्ध बोले , आनंद ! ठीक इसी प्रकार यदि तुम्हें किसी से कुछ प्राप्त करना है , तो स्वयं को दाता से नीचे लाकर ही प्राप्त कर सकते हो और तुम्हें देने के लिये दाता को भी ऊपर खड़ा होना होगा । यदि तुम समर्पण के लिये तैयार हो , तो तुम एक ऐसे सागर में बदल जाओगे, जो ज्ञान की सभी धाराओं को अपने में समेट लेता है । भगवान बुद्ध का कथन शिष्य आनंद की समझ में आ गया । 🥀🥀रामजी की कृपा से आपका सप्ताहांत मंंगलमय व सर्वसुखप्रदायी हो जी 🥀🥀 🌹🌹जय श्री राम जी 🌹🌹

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Anita Mittal Jun 14, 2019

🌷🌷मेरी ही बंदगी में कुछ कमी है हे प्रभु ! ....वरना तेरा दर तो रहमतों का खजाना है 🌷🌷 🌹🌹जय श्री कृष्णा जी 🌹🌹 🌺🌺दुख का मूल आसक्ति है 🌺🌺 ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^ महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने किसी पहुँचे हुये शास्त्रज्ञ से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की । पिता ने उन्हें राजा जनक के पास भेज दिया । शुकदेव जी राजा जनक के राजमहल पहुँचे । उन्हें लगा कि ऐश्वर्य से घिरे जनक क्या उपदेश देंगे । वह निराश होकर लौटने ही वाले थे कि जनक ने उन्हें बुलवाया और कहा , धर्म - चर्चा हम इस महल में नहीं , पास स्थित सत्संग भवन में करेंगे । वहाँ पहुँचकर जनक ने शुकदेव से आत्मा - परमात्मा संबंधी बातचीत प्रारंभ कर दी । अचानक कुछ राजकर्मचारियों ने उन्हें सूचना दी कि महल के एक कक्ष में आग लग गयी है । राजा जनक ने शांत स्वभाव से कहा , मैं इस समय मुनि के साथ ईश्वर संबंधी बातें कर रहा हूँ । देखते ही देखते आग की लपटें सत्संग भवन तक आ पहुँची । राजा जनक तनिक भी विचलित नहीं हुये । शुकदेव जी आगको देखकर अपनी पुस्तकें उठाकर कक्ष से निकल आये । उन्होंने देखा कि राजा जनक को कोई चिंता नहीं थी । वह निश्चिंत होकर ईश्वर चिंतन में लगे रहे । कुछ देर बाद राजा जनक ने शुकदेव जी से कहा , दुख का मूल संपत्ति नहीं , संपत्ति से आसक्ति है । संसार में हमें केवल वस्तुओं का उपयोग करने का अधिकार दिया गया है । अक्षय संपत्ति के स्वामी और निर्धन , दोनों को मृत्यु के समय सब कुछ यहाँ छोड़कर जाना है । इसलिए नाशवान धन - संपत्ति के प्रति अधिक आसक्ति अधर्म है । 🌼🌼कान्हा जी की रहमतें आपके साथ हर पल बनी रहें जी 🌼🌼 🌹🌹जय श्री कृष्णा जी 🌹🌹

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Anita Mittal Jun 13, 2019

🌼🌼अपने भीतर विद्यमान ईश्वर को महसूस करें 🌹🌹जय श्री हरि जी 🌹🌹 भगवान ने गीता में कहा है , " न हि कश्चित् क्षणमपि जातुति अकर्मकृत् " अर्थात् कोई भी व्यक्ति क्षण भर के लिये भी कर्म से रहित होकर नहीं रह सकता । शरीर है , तो क्रिया करनी ही पड़ेगी । बैठना भी एक क्रिया है , सोना , साँस लेना व रक्त प्रवाह भी एक क्रिया है । शरीर में सभी नाड़ियाँ भी कार्य कर रही हैं । लगता है कि कुछ नहीं कर रही पर वे सब क्रियाशील हैं । क्रिया के बिना जीवन नहीं है तो क्रिया का परिष्कार किया , ऋषियों ने , विद्बानों ने , मनीषियों ने । जीवन का उत्कर्ष तबतक संभव नहीं है जबतक यह भाव न हो कि सृष्टि की रचना किसी मनुष्य ने नहीं की है । प्रह्लाद का चिंतन देखें कि ," ईश्वर के बिना संसार कैसा " हम तमाम लोगों को सुनते हैं , विषयों का स्मरण करते हैं , चिंतन और निश्चय करते हैं अहंकार करते हैं । किंतु इन सभी का मुख्य व्यवहार ईश्वर ही है । हम सुनेंगे , तो ईश्वर को सुनेंगे । हम देखेंगे , तो ईश्वर को देखेंगे । वेदों में लिखा है : " त्मा वा रे द्रष्टव्य " यानि आत्मा का ही दर्शन करो । देखो उसी को , वही देखने योग्य है , उसका साक्षात्कार करो , उसकी अनुभूति करो , जो ज्ञान की अनुभूति का सर्वश्रेष्ठ स्वरुप है । वही है देखने योग्य , उसको देखो । प्रह्लाद ने कहा है कि आत्मा ही देखने योग्य है । मन कैसा है , क्रिया कैसी है , तुम्हारी इच्छायें कैसी हैं , संकल्प कैसे हैं , उसको भी देखना है । प्रह्लाद ने कहा , " श्रवणं कीर्तनम विष्णोः " अर्थात् हमें सुनना भी उसी को है , जो वेदों ने कहा है । ईश्वर को यदि जानना है , तो ज्ञान का सबसे बड़ा साधन श्रवण है । तो ईश्वर को अपने भीतर सुनना चाहिए । वेद , पुराणों के माध्यम से सुनना है । संसार में अनेक मत , संप्रदाय ,परंपरायें खड़ी हो गयी हैं , जिनके बारे में लोग बोलते हैं कि सब बराबर है , तो आइंस्टीन भी बराबर और साधारण पटाखा बनाने वाला भी बराबर । पर हमें यह नहीं मानना है कि ईश्वर के लिए किसी को भी सुनें । हमें उस ईश्वर को जानना है , जिसे प्रह्लाद ने जाना । जिस प्रकार स्वजनों से महीनों बात न होने पर भी उनका स्मरण रहता है , अपनत्व बना रहता है ठीक वैसे ही ईश्वर का संबंध है । स्मरण का अर्थ है अनुभव । अनुभव होगा तो संस्कार उत्पन्न होंगे , उन्हीं संस्कारों से ईश्वर की प्राप्ति होगी । प्रह्लाद ने कहा है , अपने आप को ईश्वर को समर्पित करें । मन , वाणी , आँखें , हाथ - पैर , रोम - रोम और साँस - साँस भगवान के लिये समर्पित और श्रेष्ठ जीवन यही है । जीवन में सर्वश्रेष्ठ व्यवहार का जो स्वरुप है , वह यही है कि हम ईश्वर के प्रति समर्पित करें । 🌷🌷निर्जला एकादशी की सपरिवार अनेकों हार्दिक शुभेच्छायें जी 🌷🌷 🌹🌹जय श्री हरि जी 🌹🌹 🌹🌹जय लक्ष्मी पति की जी 🌹🌹

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Anita Mittal Jun 12, 2019

🌷🌷सभी एकादशियों की पुण्यफल एकादशी : निर्जला एकादशी ,आप सभी को निर्जला एकादशी की सपरिवार अग्रिम अनेकानेक हार्दिक शुभेच्छायें जी 🌷🌷 🌹🌹जय श्री हरि जी 🌹🌹 🏵🏵 महाभारत - प्रसंग 🏵🏵 ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; वर्ष भर में कुल चौबीस एकादशी और यदि मलमास आ जाये तो इनकी संख्या बढ़कर छब्बीस हो जाती है । इनमें ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं क्योंकि इस एकादशी को पानी पीने की मनाही है । कहते हैं जब वेदव्यास जी ने पांडवों से एकादशी संकल्प करवाया , तो भीम ने कहा कि मैं एक दिन तो क्या एक समय भी भोजन के बिना नहीं रह सकता । कितने लोगों के बराबर और कितनी बार भोजन करना पड़ता है , तो क्या अपनी भूख के कारण एकादशी जैसा व्रत नहीं कर पाऊँगा ? महर्षि व्यास जी ने कहा , कि हे भीम ! धर्म सबको धारण नहीं करता , सबके योग्य साधन , व्रत - नियमों को सहज और लचीला भी बनाता है । अतः आप निर्जला नाम की एकादशी का व्रत करोऔय वर्ष की समस्त एकादशियों का फल पाओ । भीमसेन इस व्रत के लिए राजी हो गये । इसलिए निर्जला एकादशी को लोक में पांडव या भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं । इसलिए स्वयं निर्जल रहकर किसी जरुरतमंद को पानी से भरा घड़ा देना पुण्य माना जाता है । एक अन्य प्रसंग यह भी है कि महर्षि व्यास जी से भीमसेन ने यह भी कहा था कि युधिष्ठिर यदि एकादशी का व्रत करते हैं तो मुझे भी ऐसा करने को कहते हैं , पर मैं तो भोजन के बिना नहीं रह सकता हूँ । इसलिए एकादशियों पर निराहार रहने के कष्ट से बचने का कोई एक ऐसा व्रत मुझे बतायें , जिसे करने में मुझे विशेष असुविधा न हो । महर्षि व्यास जानते थे कि भीम के उदर में वृक नामक अग्नि है , इसलिए उसकी भूख शांत नहीं होती । ऐसा जानते हुए महर्षि जी ने भीम जी से कहा , तुम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का व्रत किया करो । इस व्रत में स्नान आचमन में पानी पीने से दोष नहीं होता। अन्य तेईस एकादशियों का पुण्य लाभ भी मिलेगा और वर्ष में एकबार करने से तुम इसका पालन भी कर सकोगे । 🌻🌻श्रीहरि जी की असीम कृपा आपके साथ बनी रहे 🌻🌻 🥀🥀गंगा दशहरा की सपरिवार अनेकानेक हार्दिक शुभेच्छायें जी 🥀🥀 🌹🌹जय श्री हरि जी 🌹🌹

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Anita Mittal Jun 11, 2019

🌲🌲संसार का सबसे सुरक्षित बीमा " परमात्मा पर भरोसा " , बस याद रखें , और "अच्छे कर्मों की किस्त " समय पर भरते रहें 🌲🌲 🌹🌹जय श्री राम जी 🌹🌹 🌺🌺 धैर्य की आवश्यकता 🌺🌺 ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''' महात्मा बुद्ब भ्रमण कर रहे थे । रास्ते में उन्हें प्यास लगी , तो शिष्य आनंद पास की एक छोटी नदी से पानी लेने गये । उन्होंने देखा कि कुछ समय पूर्व वहाँ से बैलगाड़ियाँ गुजरी हैं तथा बैलों ने नदी का सारा पानी गंदा कर दिया है । वह वापस लौटकर बुद्ब से बोले , यहाँ का जल गंदा है । मार्ग में हमें जो बड़ी नदी मिली थी , मैं वहाँ का साफ जल आपके लिये ले आता हूँ । किंतु बुद्ब देव बोले , जाओ ! उसी छोटी नदी से जल ले आओ । जब वह पुनः नदी के समीप गये तो देखा कि जल अब भी साफ नहीं हुआ है । वापस आकर उन्होंने फिर जल के साफ ना होने की बात बताई । लेकिन बुद्ध भी अडिग थे । आनंद से कहा , थोड़ी देर रुककर उसी नदी से जल ले आना । थोड़ी देर बाद आनंद वहाँ गये , तो उन्होंने देखा कि मिट्टी और सड़े गले पत्ते नीचे बैठ चुके हैं और पानी आईने की तरह साफ है । आनंद खुश हो गये और इस बार जल लेकर बुद्ब के पास लौटे । तब बुद्ब ने उन्हें समझाते हुए कहा , आनंद ! हमारे जीवन रुपी जल को भी कुविचार रुपी बैल प्रतिदिन गंदा करते हैं । तब हम घबराकर जीवन से पलायन करते हैं । लेकिन हमें भागना नहीं चाहिए , बल्कि मन रुपी नदी के शांत होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए । परन्तु इसके लिये धीरज की आवश्यकता है । तभी सब कुछ साफ दिखाई देगा । आनंद को एक बहुत बड़ी सीख मिली । 🌻🌻रामजी का शुभाशीषों भरा हाथ आपके साथ बना रहे जी 🌻🌻 🌹🌹जय श्री राम जी 🌹🌹 🌹🌹जम हनुमानजी 🌹🌹

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Anita Mittal Jun 10, 2019

🌿🌿तेरी रज़ा को समझ पाऊँ , ये हुनर मुझमें नहीं मेरे भोले !! जिंदगी को आजमाने के बाद इतना जाना है कि तूने जो किया मेरे भले के लिये किया 🌿🌿 🌹🌹हर हर महादेव जी 🌷🌷आत्मप्रशंसा से पतन 🌷🌷 ************************ दीर्घकाल तक राज करने के बाद महाराज ययाति ने छोटे पुत्र पुरु को राजा बनाया और खुद संन्यासी हो गये । वन में कंद - मूल खाकर तप करने लगे । नित्य हवन , अतिथि - अभ्यागतों का सत्कार करते थे और स्वयं खेत में गिरे अन्न के दाने और वृक्ष से गिरे फल खाकर निर्वाह करते थे । वर्षों तक कठोर तप करने के बाद उन्होंने शरीर छोड़ा और ब्रह्मलोक पहुँचे , तो देवताओं को डाह हुआ । वे ययाति को स्वर्ग - भ्रष्ट करने की दुरभिसंधि करने लगे । एक दिन इंद्र ने उनसे पूछा कि आपने ऐसा कौन सा तप किया है , जिसके प्रभाव से ब्रह्मलोक में इच्छानुसार रह लेते हैं । यह सुनकर ययाति फूले ना समाये । अपनी प्रशंसा करते हुए वह बोले , देवता , मनुष्य , गंधर्व और ऋषि आदि में कोई भी मुझे अपने समान नहीं दिखता । यह सुनते ही देवराज के तेवर बदल गये । वह कठोर स्वर में बोले , मेरे आसन से उठ जाओ । तुमने अपने मुँह अपनी प्रशंसा की है , इससे वे सभी पुण्य नष्ट हो गये , जिनकी तुमने चर्चा की है , देवता , मनुष्य , गंधर्व और ऋषि आदि ने किसने कितना तप किया है , यह जाने बिना ही तुमने उनका तिरस्कार किया है । इससे अब तुम स्वर्ग से गिरोगे । आत्मप्रशंसा ने ययाति के तप के फल को नष्ट कर दिया । उनकी प्रार्थना पर देवराज ने कृपा करके यह सुविधा दे दी कि वे सत्पुरुषों की मंडली में ही गिरें ताकि उनके सत्संग से वे वापस पुण्यात्मा बन सकें । 🌳🌳महादेव का स्नेहानुराग आपके साथ हर पल बना रहे जी 🌳🌳 🌿🌹हर हर महादेव जी 🌹🌿

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