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शरीर और आत्मा क्या है? (ये पोस्ट उनके लिए है जिनको भागवत गीता पर विश्वास है और ये शरीर और आत्मा क्या , इसे जानने के लिए जिज्ञासु है, वाकी और लोग अपना कीमती समय वरबाद ना करे) पोस्ट जरा लंबी है तो धैर्यपूर्वक पढ़े और अर्थ समझने की कोशश करें, आपका दिन शुभ हो।। जय श्री कृष्ण।। महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन युद्ध करने से मना कर देता है। अर्जुन कहता है, कृष्ण मैं अपने सगे सम्बन्धियों के साथ युद्ध नहीं कर सकता। फिर भगवान अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए पूछते हैं। अर्जुन बताओ तुम्हारे भीष्म पितामह कहाँ है? अर्जुन कहता हैं वो रथ पर खड़े मेरे भीष्म पितामह हैं। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने जो श्रीमद भगवद गीता के जो वचनामृत बोले हैं, उन्हें सरल करके लिखा गया है। जो इस प्रकार हैं। कृष्ण कहते हैं- पर वो जो रथ के ऊपर खड़ा दिखाई दे रहा है पार्थ वो तो केवल भीष्म पितामह का शरीर है। मैं पूछता हूँ, असली भीष्म पितामह कौन है? कहाँ है? अर्जुन कहता है- हे कृष्णा! तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है। वो जो दिख रहा है वो भीष्म पितामह नहीं है, केवल शरीर है, इसका अर्थ है कि भीष्म पितामह कोई और है? कृष्ण कहते हैं- अवश्य! यही तुम्हे समझा रहा हूँ मैं। देखो ध्यान से, देखो उस शरीर में जो प्रकाश है जिसे आत्मा कहते हैं। मैं तुम्हे दिव्य चक्षु प्रदान करता हूँ। भगवान दिव्य चक्षु देते हैं अर्जुन को। कृष्ण कहते हैं इन दिव्य चक्षुओं से देखो उस आत्मा को। वो जो शरीर के अंदर जो आत्मा है, जो प्रकाश है, वही है असली भीष्म पितामह। दिखाई दे रही है उनकी आत्मा? अर्जुन कहता है- हाँ केशव! एक प्रकाश रूपी आत्मा दिखाई दे रही है। कृष्ण कहते हैं- बहुत अच्छा। अब देखो, यदि मैं अपने सुदर्शन चक्र से भीष्म पितामह का शरीर काट दूँ तो केवल उनका शरीर मरेगा। परन्तु उनकी आत्मा का प्रकाश नहीं बुझेगा। देखो, मैं तुम्हारे इन दिव्य चक्षुओं को ये दृश्य सजीव करके दिखाता हूँ। अब भगवान श्री कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र से भीष्म पितामह के शरीर के दो टुकड़े कर देते हैं। कृष्ण कहते हैं- देख लिया अर्जुन! मेरे सुदर्शन से केवल उस शरीर का नाश हुआ है। उसकी आत्मा का दीया अब भी उसी प्रकार चल रहा है। हे कौन्तेय! इस परम सत्य को अच्छी तरह समझ लो कि विश्व में केवल शरीर नाशवान है किन्तु आत्मा अविनाशी है। शरीर के मरने पर आत्मा नहीं मरती। आत्मा न केवल जन्म लेती है और ना कभी मरती है। वो अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। जो शरीर को मारने पर भी नहीं मारी जाती। न हन्यते हन्यमाने शरीरे – शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता॥ अर्जुन कहता है- केशव! तुम्हारी बाते मेरी बुद्धि को भ्रम में डाल रही हैं। तुम दो बातें एक साथ कह रहे हो। जो परस्पर विरोधी हैं। तुम कहते हो कि शरीर मर जाता है परन्तु शरीर का एक हिस्सा जिसे आत्मा कहते है वो नहीं मरता। कृष्ण कहते हैं- नहीं अर्जुन! मैंने आत्मा को शरीर का एक हिस्सा नहीं कहा। मैंने कहा है आत्मा और शरीर दो अलग अलग चीजे हैं। जैसे तुम और तुम्हारा कवच दो अलग चीजे हैं। तुम्हारे कवच के दो टुकड़े हो जाएँ तो उसका ये अर्थ नहीं होता कि अर्जुन के दो टुकड़े हो गए। जिस प्रकार तुम और तुम्हारा कवच दो अलग-अलग वस्तुएं है, या तुम और तुम्हारा ये रथ दो अलग अलग वस्तुएं हैं, उसी प्रकार मनुष्य का शरीर और उसकी आत्मा दो अलग अलग वस्तुएं है। यूँ समझ लो, जिस रथ में अर्जुन बैठा है वो रथ अर्जुन नहीं है। अर्जुन तो वो है जो रथ में बैठा हुआ रथी है। अर्जुन कहते हैं- ये ठीक है माधव! कि अर्जुन रथ नहीं है। अर्जुन मैं हूँ, जो रथ में बैठा हुआ है। तुम्हे रथ के टूटने का शोक नहीं होगा परन्तु अर्जुन के मरने का तो शोक होगा ही। कृष्ण कहते हैं- अर्जुन तुम्हारी बातें सुनकर मुझे तुम्हारी बुद्धि पर हंसी आ रही है। अपनी तरफ से तुम बड़े पंडितों और ज्ञानियों जैसी ऊँची ऊँची बातें कर रहे हो परन्तु तुम्हे ये पता नहीं जो सचमुच ज्ञानी होते हैं वो ना उनका शोक करते हैं जो मर गए हैं और ना उनका शोक करते हैं जो अभी नहीं मरे हैं। क्योंकि वो जानते हैं- जो मर गया है वो फिर जन्म लेगा और जो अभी जीवित है वो अवश्य मर जायेगा। मरने वाला फिर जन्म लेगा। क्योंकि केवल शरीर का नाश होता है, शरीर के अंदर जो आत्मा है वो कभी नहीं मरता। हे पार्थ! इस संसार में दो ही वस्तुएं हैं। एक शरीर और दूसरा उस शरीर में रहने वाला शरीरि। जो शरीर में रहने वाला आत्मा रूप शरीरी है वो कभी मरता नहीं और जो शरीर है वो सदा रहता नहीं। आत्मा एक शरीर छोड़ता है और दूसरा शरीर धारण कर लेता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे मनुष्य पुराने कपडे उतारकर नए कपडे धारण कर लेता है। वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22 भावार्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है॥ हे महाभाग ये देह का त्याग पुराने वस्त्र उतारने जैसा, जीवात्मा का नूतन जन्म नए परिधान के धारने जैसा। देह भी चोला, वस्त्र भी चोला, है यह तथ्य विचारने जैसा, चोले के इस परिवर्तन पर, क्या है धीरज हारने जैसा? हे पार्थ केवल इतना समझ लो कि मृत्यु एक दरवाजा है। जिसकी अंदर जाते हुए आत्मा पुराना शरीर छोड़ देती है। वास्तव में मृत्यु और जन्म के दो दरवाजे हैं जो एक दूसरे के आमने सामने हैं। प्राणी जब मृत्यु के दरवाजे पर पहुँचता है तो उस शरीर की मृत्यु हो जाती है। फिर आत्मा का प्रकाश उस शरीर को छोड़कर आगे चला जाता है और फिर वो प्रकाश नए जन्म के दरवाजे में प्रवेश करता है जहाँ जीवात्मा को फिर से एक नया शरीर प्राप्त हो जाता है और वहाँ से उसके नए जन्म की नई यात्रा शुरू हो जाती है। हे पार्थ! आत्मा नित्य है इसलिए वो नहीं बदलती। परन्तु शरीर नाशवान है इसलिए एक ही आत्मा के कई शरीर बदलते हैं। इसलिए हर जन्म में वो नए नए शरीर धारण करता रहता है। हर नए जन्म में आत्मा नए-नए शरीर तो बदलता ही है बल्कि हर एक जन्म में भी, उसे जो शरीर मिलता है वो एक शरीर भी उसी जन्म में बदलता रहता है। अर्जुन कहता है- ये बात मेरी समझ में नहीं आई केशव! क्योंकि एक जन्म में तो प्राणी को एक ही शरीर मिलता है। कृष्ण कहते हैं- एक नहीं, अनेक शरीर मिलते हैं एक ही जन्म में। अर्जुन कहता है- मैं अब भी नहीं समझा प्रभु! कृष्ण कहते हैं- मैं समझाता हूँ। याद करो अपना बचपन। उस समय अर्जुन का श्री शरीर कैसा था? अर्जुन कहता है- एक बालक का। कृष्ण पूछते हैं- और आज वो शरीर कहाँ है? अर्जुन कहता है वो शरीर तो बदल गया इस शरीर में। कृष्ण बोले- अर्थात वो शरीर नहीं रहा। आज तुम्हे एक युवक का शरीर मिला है। इसी प्रकार प्राणी को जन्म के समय जो शिशु का शरीर मिलता है, वही शिशु का शरीर काल के प्रभाव से एक बालक का शरीर हो जाता है। फिर वो किशोर अवस्था में आता है। फिर एक जवाब पुरुष का शरीर बनता है। फिर अधेड़ उम्र का। फिर बुड्ढे का रूप लेकर अंत में एक सूखे पत्ते की तरह जीवन के वृक्ष से टूटकर गिर जाता है। इस प्रकार जो शरीर पल-पल छिन्न-छिन्न अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है। उस शरीर की मृत्यु का शोक ज्ञानी जन नहीं करते। फूल की भांति हमारे शरीर अपने प्रकृति के कारण जन्मते हैं, बच्चे बनते हैं, जवाब होते हैं, फिर वही जवानी मुरझाने लगती है जिसे बुढ़ापा कहते हैं और उस वृद्ध शरीर को जब आत्मा छोड़ती है तो उस शरीर की मृत्यु हो जाती है। अर्जुन पूछता है – परन्तु वो आत्मा कहाँ चली जाती है? शरीर के बिना आत्मा कहाँ और कैसे वास करती है? कृष्ण बोले- पुराना शरीर छोड़ने के बाद आत्मा नए शरीर में वास करती है। किसी शिशु के शरीर में चेतना रूप होकर आ जाती है। फिर वही चक्र शुरू हो जाता है। फिर वही जन्मना, रेंगना, उठकर चलना, फिर लड़खड़ाना और गिर जाना, ये सब शरीर के कौतुक है। इतनी ही बात समझ लोगे तो न तुम्हे किसी के मरने का शोक होगा और ना तुम्हे मृत्यु का भय होगा। बचपन यौवन वृद्धावस्था जीवात्मा की हो जैसे तन में, वैसे ही रहकर नूतन जन्म प्रवेश करे वो नए जीवन में। हे अर्जुन! हम और तुम ये शरीर नहीं हैं। हम तो इन शरीर के अंदर रहने वाली आत्माएं है। ये शरीर तो केवल हमारे रथ हैं। हम उसके स्वामी हैं। रथ के टूटने से स्वामी नहीं टूट जाता। उसी प्रकार शरीर के सुख और दुःख आत्मा को सुखी या दुखी नहीं करते। अर्जुन कहता है- यदि हम आत्मा हैं तो ये सुख दुःख का आभास हमारी आत्मा को क्यों होता है? कृष्ण कहते हैं- ये सुख दुःख का आभास आत्मा को नहीं होता, केवल शरीर को होता है। अर्जुन बोला- तो फिर आत्मा को क्या होता है? कृष्ण कहते हैं- आत्मा को कुछ नहीं होता। क्योंकि ये होना, न होना, सुख-दुःख , सर्दी गर्मी, ये सब प्रकृति के नियम हैं। आत्मा तो अविनाशी परमात्मा का अंश है। इसलिए आत्मा प्रकृति की सीमा से बाहर है। आत्मा अचिन्त्य है। मानवीय चेतना के चिंतन के घेरे में नहीं आती। अर्जुन, आत्मा पर प्रकृति और सृष्टि के नियम लागू ही नहीं होते। क्योंकि वो सृष्टि और प्रकृति दोनों ही की पहुँच से बाहर है। जैसे एक चिंगारी अग्नि का ही अंश होती है वैसे ही आत्मा परमात्मा का ही अंश होता है। इसलिए वो नित्य, अजन्मा, सनातन और सर्वव्यापी है, स्थिर रहने वाला और अचल है। अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ भावार्थ : क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है॥ परमात्मा का अंश है आत्मा, परमानन्द लुटावे हो, तब तक विचरें परमात्मा में, जब तक जा ना समावे हो। करके इसका दुःख बावरबावरे व्यर्थ ही दुःख बहावे हो। हे पार्थ! आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है, न कोई उसे अग्नि जला सकती है, इसको जल नहीं गला सकता और न इसे वायु ही सूखा सकती है। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ भावार्थ : इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता॥ आत्मा है वह सत्य कि जिसको शस्त्र काट नहीं पावे हो, अलख अभेद्य नित्य को कोई कैसे लक्ष्य बनावे हो, अग्नि का भाग चर्म का तन है, तन को भस्म बनावे हो, अमर को मारे कौन अजर को, कैसे अग्नि जलावे हो? आत्मा नहीं माटी की मूरत जिसको नीर गलावे हो। ये तो है महासागर इसकी कोई थाह ना पावे हो। हे अर्जुन! ये सब समझकर तुम्हे ना किसी के मरने का शोक मनाना चाहिए और ना किसी के न मरने की ख़ुशी का प्रदर्शन करना चाहिए। अर्जुन कहता है- ये सब मानकर भी कि आत्मा नित्य, सनातन और अजन्मा है। उसे शस्त्र नहीं काट सकते, आग नहीं जला सकती, फिर भी प्राणी की आत्मा को दुःख-सुख, शोक ख़ुशी, मान-अपमान, पीड़ा और आनंद का एहसास क्यों होता है? कृष्ण कहते हैं- हे पार्थ! मैंने पहले ही तुम्हे बताया कि सुख दुःख का आभास करना आत्मा का नहीं, शरीर का काम है। अर्जुन ने पूछा- परन्तु केशव! शरीर को दुःख या पीड़ा तभी होगी जब शरीर को कोई चोट लग जाये, या उसका कोई अंग कट जाये। जैसे शरीर आग में जल जाये, उसे जो पीड़ा होती है वो तो शरीर की पीड़ा है। परन्तु मान हानि होने से जो दुःख होता है या मान होने से जो आनंद आता है, उसमें तो शरीर को कोई चोट नहीं पहुँचती। वो मान-हानि का दुःख, वो अपकीर्ति की पीड़ा तो आत्मा को ही होती है ना? कृष्ण मुस्कुरा कर कहते हैं- नहीं अर्जुन! ये कीर्ति-अपकीर्ति, मान-अपमान, ये लाभ-हानि, ये जीतने का आनंद, अथवा हारने की पीड़ा, ये भी आत्मा को नहीं होती।ये सब में की सरारत है।। ।। जय श्री कृष्ण।।

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