महात्मा और खजूर महात्मा और खजूर एक ऐसी moral story है जिससे जीवन में यह सीख मिलती है कि यदि मन का कहना मानोगे तो जीवन भर मन की गुलामी करनी पड़ेगी| एक महात्मा ने कैसे अपने मन को समझाया और कैसे अपने मन को वश में किया, यह इस कहानी के माध्यम से समझाया गया है|  एक बार एक महात्मा बाजार से होकर गुजर रहा था| रास्ते में एक व्यक्ति खजूर बेच रहा था| उस महात्मा के मन में विचार आया कि खजूर लेनी चाहिए| उसने अपने मन को समझाया और वहां से चल दिए| किंतु महात्मा पूरी रात भर सो नहीं पाया| वह विवश होकर जंगल में गया और जितना बड़ा लकड़ी का गट्ठर उठा सकता था, उसने उठाया| उस महात्मा ने अपने मन से कहा कि यदि तुझे खजूर खानी है, तो यह बोझ उठाना ही पड़ेगा| महात्मा,थोड़ी दूर ही चलता, फिर गिर जाता, फिर चलता और गिरता| उसमें एक गट्ठर उठाने की हिम्मत नहीं थी लेकिन उसने लकड़ी के भारी भारी दो गट्ठर उठा रखे थे| दो ढाई मील की यात्रा पूरी करके वह शहर पहुंचा और उन लकड़ियों को बेचकर जो पैसे मिले उससे खजूर खरीदने के लिए जंगल में चल दिया| खजूर सामने देखकर महात्मा का मन बड़ा प्रसन्न हुआ| महात्मा ने उन पैसों से खजूर खरीदें लेकिन महात्मा ने अपने मन से कहा कि आज तूने खजूर मांगी है, कल फिर कोई और इच्छा करेगी| कल अच्छे-अच्छे कपड़े और स्त्री मांगेगा अगर स्त्री आई तो बाल बच्चे भी होंगे| तब तो मैं पूरी तरह से तेरा गुलाम ही हो जाऊंगा| सामने से एक मुसाफिर आ रहा था| महात्मा ने उस मुसाफिर को बुलाकर सारी खजूर उस आदमी को दे दी और खुद को मन का गुलाम बनने से बचा लिया| सीख:- यदि मन का कहना नहीं मानोगे तो इस जीवन का लाभ उठाओगे यदि मन की सुनोगे तो मन के गुलाम बन जाओगे|  साभार!

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राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र राजा होने के बावजूद राजा जनक राजसी वैभव के आदी नहीं थे। वे हमेशा लालच से दूर रहते थे। विनय उनके स्वभाव में था। ये निरंतर आत्मावलोकन करते रहते एवं अपनी गलतियों को गलतियों को सुधारते रहते। वे हमेशा आत्मशोध में प्रवृत्त रहते थे।  एक बार वे नदी किनरे बैठकर 'सोऽहं' का जाप कर रहे थे। उनका जाप प्रगति पर था।उसी समय अष्टावक्र ऋषि उधर से चले आ रहे थे। परम बुद्धिमान ऋषि अष्टावक्र राजा जनक का जाप सुनकर रुक गए और एक हाथ में छड़ी लेकर थोड़ी दूरी पर खड़े होकर ऊंची आवाज में कहने लगे, "मेरे हाथ में छड़ी है.... मेरे हाथ में छड़ी है।" राजा जनक के कानों में ऋषि की आवाज सुनाई दी, लेकिन उन्होंने अपना जाप जारी रखा। महर्षि अष्टावक्र भी अपनी आवाज़ तेज़ करते गए। अंत में जनक ने जाप बंद कर दिया और पूछा, "मुनिवर, आप यह क्या जोर जोर से कह रहे हैं?" ऋषि ने उत्तर दिया, "मेरे हाथ में छड़ी है... मेरे पास कंबल है।" राजा जनक ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, "भगवान, वह तो मैं भी देख रहा हूं कि आपके पास एक छड़ी और एक कंबल है, लेकिन आप इतना जोर से चिल्ला क्यों रहे हैं?" तब अष्टावक्र ने जनक राजा को समझाया, “राजन ! जो काम मैं कर रहा हूँ वही तो आप भी कर रहे हैं। 'सोऽहं' अर्थात "जो परमात्मा है वही मैं हूँ", इसमें कोई संशय नहीं लेकिन इसका जाप करने से क्या लाभ है? मंत्रजाप से कोई फल नहीं मिलता। मंत्र में निहित ज्ञान का अभ्यास करने या आंतरिक चेतना के साथ एकाकार होने से ही उसका फल प्राप्त होता है।" सारांश: बाह्याडम्बर नहीं आत्मज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए। कोरे जाप से कुछ नहीं होने वाला।

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