Amit Kumar Apr 25, 2019

🔯#विशिष्टाद्वैतम् 🔯🚩 श्रीराम! विशिष्टञ्च विशिष्टञ्च इति विशिष्टे।विशिष्टयोरद्वैतम् इति विशिष्टाद्वैतम् ।अर्थात् कारण ब्रह्म और कार्य ब्रह्म ,इन दोनोंका अद्वैत (ऐक्य) विशिष्टाद्वैत है। शुक्ष्म चिदचित् से विशिष्ट ब्रह्म #कारणब्रह्म है। स्थूल चिदचित् से विशिष्ट ब्रह्म #कार्य_ब्रह्महैं। शूक्ष्म चित् जीव हैं। शूक्ष्म अचित् ( नाम रूप से अविभक्त) प्रकृति है।इन दोनोंसे विशिष्ट अर्थात् शूक्ष्म चिदचित् से विशिष्ट ब्रह्म ही कारण ब्रह्म है। स्थूल चित् जीव, और स्थूल अचित् (नामरूपसे विभक्त) प्रकृति ,इन दोनोंसे विशिष्ट ब्रह्म ही कार्यब्रह्महै। यहां जीव को स्थूल प्रकृतिसे सम्बद्ध होने के कारण स्थूल कहा जाता है। विशेषण से संयुक्त तत्व को विशिष्ट कहा जाताहै। विशेषण विशेष्य के ही आश्रित होते हैं।विशेष्यके विना विशेषणकी स्थिति नहीं होती। जैसे अपने आधार रूप बृक्षको छोंड़कर फलों की कहीं स्थिति नहीं होती,उसी प्रकार चित् तत्व जीव और अचित्(जड़)तत्व प्रकृति ,ये दोनों अपने आधार ब्रह्मके विना कहीं कभी पृथक् स्वतंत्र रूपसे स्थित नहीं रहते। स्वतन्त्र रूपसे व पृथक् रूपसे इनका सदा अभाव रहता है। इसी लिए इन्हें अपृथक्सिद्ध विशेषण कहा जाताहै। इस प्रकार चित् (जीव) और अचित्(प्रकृति) इन दोनोंसे विशिष्ट ब्रह्म एक ही है।अतः यह शिद्धान्त #विशिष्टाद्वैत कहा जाता है।अर्थात् ब्रह्म चिदचित् से विशिष्ट होने से, तथा, चिदचित् की एकता (एक ही ब्रह्ममें स्थित होने से यह शिद्धान्त विशिष्टाद्वैत है।। इस प्रकार कारण और कार्य के भेदसे ब्रह्म दो प्रकार के होतेहैं।यह द्विविधता कालिकी, अर्थात् काल के भेदसे दो प्रकारकी प्रतीत होती है।जैसे सृष्टि काल, प्रलय काल। प्रलय काल में शूक्ष्म चिद्रूप जीव और शूक्ष्मा प्रकृति ,ये दोनों तत्व ब्रह्ममें लीन (अपृथक् रूपसे नाम रूप रहित होकर)रहते हैं।तब वही ब्रह्म "#कारणब्रह्म" इस प्रकार से व्यवहार किया जाता है। अथवा #शूक्ष्मचिदचिद्विष्टब्रह्म" कहा जाताहै। सृष्टि कालमें वही चित् स्थूल तत्व जीव, और स्थूला अचित् प्रकृति ,अर्थात् स्थूल चिदचित् तत्व ब्रह्ममें स्थित होता है, तब "#कार्यब्रह्म " इस प्रकार का व्यवहार होताहै।अर्थात् स्थूल चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म ही कार्यब्रह्महै , ऐसा कहा जाता है। ये कार्य ब्रह्म और कारण ब्रह्म दोनों एक ही हैं ।यही श्रुति प्रतिपादित अद्वैत है। न कि सभी जड़ चेतन एक ही है, यह कल्पित शिद्धान्त । ब्रह्म दो होते हैं ऐसा यहाँ नहीं समझना चाहिए। काल के कारण ही कार्य ब्रह्म और कारण ब्रह्म इस प्रकार द्विधा व्यवहार होताहै। जैसे वटबृक्ष अपने बीजमें शूक्ष्म रूपसे निलीन रहता है, और काल वातावरण के अनुसार अंकुर द्वारा विशाल बृक्ष होकर स्थूल रूप में प्रगट होताहै।उसी प्रकार शूक्ष्मचिदचिद्विशिष्ट कारण ब्रह्म सृष्टि कालमें स्थूलचिदचिद्विशिष्ट कार्य ब्रह्म होते हैं।।दोनों में कोई भेद नहीं होता।।इसे ही कार्यकारणब्रह्माद्वैत,कहा जाता है। विशिष्टाद्वैत" यह नामकरण श्रीरामानुजाचार्य जी ने नहीं किया है।कालान्तर में अन्य आचार्यों ने स्पष्टता के लिए किया है।। ।।नमो वेदान्तवेद्याय ।।

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Amit Kumar Apr 24, 2019

जय बिहारी जी जय श्री कृष्ण परमात्मा क्या है? परमात्मा अमृत की प्यास है। परमात्मा क्या है? परमात्मा भीतर सनातन की खोज है। शाश्वत की खोज है। परमात्मा की प्रतिमा क्या है? यह जो गवेषणा में आतुर, जिज्ञासा और मुमुक्षा से भरा हुआ खोजी है, इसी में परमात्मा की प्रतिमा है। कहीं और नहीं, पत्थरों में नहीं, मंदिर की मूर्तियों में नहीं। इस पुजारी में, जो परमात्मा की पूजा में लगा है। खोज रहा है जगह—जगह, अर्चना अपनी चढ़ा रहा है। हर जगह से जिसकी चेष्टा चल रही है कि परमात्मा को पहचान लूं। इसमें ही उसकी प्रतिमा है। कबीर ने कहा है, भक्त में भगवान है। महवीर ने कहा है, अप्पा सो परमप्पा। वह जो आत्मा है, उसी में परमात्मा है। परमात्मा कुछ इस तरह नहीं है जिसे किसी दिन देख लेंगे। स्वयं के भीतर जिस दिन प्रेम की ऐसी घटा उठेगी कि बेशर्त इस सारे अस्तित्व को प्रेम कर पाएंगे, इस अस्तित्व से चित्त का कोई विरोध, कोई संघर्ष न रह जाएगा, इस अस्तित्व से जिस दिन सहयोग परिपूर्णता से सध जाएगा, जिस दिन एक संवाद होगा स्वयं के और अस्तित्व के बीच, उसी दिन जानेंगे परमात्मा क्या है। स्वयं भी परमात्मा हैं और शेष सब भी परमात्मा है।

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Amit Kumar Apr 23, 2019

🔯#वर्णसङ्कर_दोषसे_पितृपतन 🔯🚩 श्रीराम! भगवती गीता जी के प्रथम सोपान में -अर्जुन दोनों सेनाओंमें अपने ही स्वजनों को युद्ध के लिए खड़े देखकर कार्पण्य वश श्रीभगवान् से कहते हैं-- वर्णशङ्कर नरक के लिए ही होताहै--#शङ्करो_नरकायैव,, #पतन्ति_पितर:--इनके पितृ गण पतन को प्राप्त होते हैं" ऐसा कह कर और भी कई आपत्तियां देते हुए, युद्ध से उपरत होगए; यह वर्णित हुआ है।। यहां यह विचार करते हैं कि आखिर सङ्कर दोष से पिण्डोदक क्रिया क्यों लुप्त होती है, पितृ पतन क्यों होताहै,,वर्णसङ्कर के हाथ से प्रदत्त पिण्डादि क्यों स्वीकृत नहीं होता?? स्वर्गस्थ हमारे पितर न तो अल्पज्ञ होते और न हमारे जैसे सामान्य ही। जो कि जिस किसी के अंश से समुद्भूत जन का दिया हुआ स्वीकार करलें। चूंकि दाता में उनका अंश स्वल्प भी नहीं होता, इस लिए वे जिनमें उनका अंश नहीं होता, उसके हाथ से दिया हुआ कुछ भी स्वीकार नहीं करते। जिस व्यक्तिमें उनका अंश होता है उसी के द्वारा प्रदत्त तिलाम्बु पिण्डादि स्वीकार करतेहैं। जब व्यक्ति जन्म लेताहै, तो वह पूर्व जन्म के अनुशय(संस्कार) के साथ ही अपने शुक्रमें चौरासी(८४) प्रकार के संस्कारोंके साथही युक्क्त होताहै। इन में से २८ प्रकार के स्वकीय संस्कारों को लेकर आता है। शेष ५६ मेंसे २१ संस्कार अपने पिता से प्राप्त करताहै। १५ संस्कार पितामहके। दश(१०) प्रपितामह से। छः(६) संस्कार वृद्धप्रपितामह से। तीन (३) वृद्धतरप्रपितामह से।तथा एक(१) वृद्धतमप्रपितामहसे प्राप्त करता है। इस प्रकार क्रमश: पिता से लेकर बृद्धतम प्रपितामह के अंशों को लेकर ही जन्म होताहै। जीव इस प्रकार अपने वीर्यमें अपने सहित छह पूर्वजों तथा सप्तम अपना , इस प्रकार सात(७) पुरुषोंके अंश समूह होते हैं। यतः स्वकीय शुक्र को अपनी ही भार्यामें आधान करना चाहिए, अन्य किसी में नहीं। जिससे कि स्वर्गस्थ पितर नरक भागी न हों।इसी प्रकार आगे आने वाली पीढ़ीमें स्वपुत्रके वीर्यमें (२१) अंशहोंगें। पौत्रमें(१५),,प्रपौत्रमें,(१०),,उसके पुत्रमें (६),।उसके भी पुत्रमें (३)अंश । उसके भी पुत्रमें (१) ही अंश होंगें।। इस प्रकार सात पूर्वकी तथा सात बादकी पीढी में शुक्रसम्बन्ध होताहै। इस लिए जिसमें जिस अंशका संबंध होताहै, उसीके द्वारा नाम निर्देश पूर्वक श्राद्ध आदिमें दिए गए तिलाम्बु, पिण्ड आदि को उसके पितामहादि के पास सूर्य, अग्नि ,चंद्र,वायु आदि शीघ्र ही उसके पास उसके स्थान योनि के अनुरूप पहुँचा देते हैं।और पितर अपने स्थान में ही प्रीति पूर्वक ग्रहण करते हैं।दाताको आशीष प्रदान करतेहैं। यदि इस चौदह पुरुष पर्यन्त व्याप्त वीर्य चक्र को, किसी कारण नष्ट किया जाता है तो ,सारी पितृ प्रक्रिया, आदान प्रदान व्यवस्था भङ्ग हो जाती है।पितरों से सम्बन्ध कट जाते हैं।उनको कुछ भी प्राप्त नहीं होता।अतः लुप्त पिण्डोदकक्रिया होकर पूर्वज और भावी पीढ़ी भी स्वपरम्परामर्यादा के विच्छेद होनेसे -पतन्ति नरकेशुचौ। इसी क्रमको उद्देश्य कर के श्रुतिमे--#सपिण्ड्यं_साप्तपौरुषम् कहा है। । ।।जय श्रीराम।।

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Amit Kumar Apr 22, 2019

जय बिहारी जी महाराज अक्सर लोग हमसे पूछते है दि दी हमारे पुत्र हमारे साथ नही रहते हमे सताते है बहुत तरह कि बाते है कहते है प्यारे सबसे पहले यह जान लो यह सब हमारे पुर्व कर्मो का फल है प्यारे सबसे पहले यह जान लो हमारे जन्म लेने पर हमारा वश नहीं है। हम अपनी इच्छा से जन्म लेने लिए किसी घर परिवार का चुनाव नहीं कर सकते। जन्म लेने के लिए घर-परिवार का चुनाव करता है हमारा भाग्य। जो हमारे पैदा होने से पहले ही तय हो चुका होता है, और हमारा भाग्य बनाते हैं हमारे पिछले जन्म के कर्म। प्यारे हमें जन्म के समय जो कुछ भी मिलता है वो हमारे पिछले जन्म के कर्मों का फल है। सुनो महाराज हमारे कर्मों के अनुसार मिलते हैं सम्बन्धी हमारे पूर्व जन्मों का फल हमें इस जन्म में मिलता है, और पूर्व जन्म के कर्म से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि मिलते हैं। संसार में जितने भी रिश्ते नाते हैं सब हमारे पिछले जन्म के कर्म के आधार पर ही हमें मिलते हैं। हमारा उनसे लेनदेन इस जन्म का नहीं होता। महाराज हमारे कर्मों के अनुसार ही प्राप्त होते हैं पुत्र या पुत्री जिस प्रकार हमारे सभी सम्बन्धी हमें अपने पिछले जन्म के कर्मों के कारण मिले हैं, वैसे ही पुत्र भी हमारा पिछले जन्म के कर्मों का ही फल हैं। शास्त्रों के अनुसार हमारा कोई पिछले जन्म का संबंधी ही हमारे यहाँ आकर पुत्र के रूप में जन्म लेता है। बन्धुओ.........। पिछले जन्म के कर्म के अनुसार हमें इस जन्म में 4 प्रकार के पुत्र संतान के रूप में मिलते हैं। जो अपने गुणों तथा अवगुणों से अलग पहचाने जाते हैं। चलो हम आपको बताते है वो चार प्रकार के पुत्र कौन से है 1. ऋणानुबंध पुत्र पूर्व जन्म में किसी से लिया हुआ क़र्ज़ (ऋण) अथवा आपके द्वारा किया गया किसी का नुक्सान या किसी प्रकार से आपने किसी की संपत्ति नष्ट की हो, तो यह पुत्र आपके घर में जन्म लेता है। इस तरह का पुत्र अपने साथ कोई बीमारी लेकर आता है, और आपका धन गंभीर बीमारी या व्यर्थ के कामों में तब तक नष्ट होता रहता है जब तक कि उसका पूरा हिसाब ना हो जाये। यही नियति है। 2. शत्रु पुत्र यह पुत्र पूर्व जन्म का आपका कोई सबसे बड़ा शत्रु होता है जोकि आपसे बदला लेने के लिए आया है। इस प्रकार के पुत्र बड़े होने पर अपने माता-पिता से लड़ाई-झगड़ा करके उन्हें पूरी ज़िन्दगी किसी ना किसी प्रकार से कष्ट पहुँचाने का कार्य करता है, और यह तब तक करते हैं जब तक कि उसके पूर्व जन्म का हिसाब ना हो जाए। 3. उदासीन पुत्र इस प्रकार के पुत्र जन्मोपरांत अर्थात बड़े होने पर अपने माता-पिता की सेवा नहीं करते। अपितु अपना विवाह करके उनसे अलग हो जाते हैं। ऐसे पुत्र पशु के समान कहलाते हैं और इस प्रकार से आपके पूर्व जन्म का हिसाब करते हैं। 4. सेवा करने वाला पुत्र इस प्रकार का पुत्र आपके द्वारा पिछले जन्म में की गयी सेवा का फल है। जो कि पुत्र या पुत्री का रूप लेकर आता है और आपकी सेवा का क़र्ज़ चुकाता है। और अपने माता-पिता को हर प्रकार से सुख देता है। उनकी सेवा करता है। महाराज इस लिये मै सदा कहती हु “जैसी करनी , वैसी भरनी , जो बोया था वोही काटोगे” भगवन सुनो इसलिए किसी के साथ कभी बुरा ना करो, क्योंकि प्रकृति का नियम है। यदि आप बुरा करोगे तो आपको अगले जन्म में उन सब बुरे कर्मों का फल मिलेगा और उस समय आप सिर्फ रो सकते हैं जो आप कर चुके हैं उसे बदल नहीं सकते। इसलिए प्रयास करें कि आप चौथे प्रकार के पुत्र बनें। यही आपका इस जन्म में बोया गया बीज होगा जो न सिर्फ अगले जन्म में आपको फल देगा बल्कि इस जन्म में भी आपके भाग्य के सारे रास्ते खोल देगा। महाराज ध्यान दो ... मेरा आप सभी बन्धुओ यही कहना है कि हमारे मरणोपरांत हमारे साथ कुछ नहीं जाता। जाते हैं तो हमारे द्वारा किये गए अच्छे बुरे कर्म ही जाते हैं। सारा पैसा बैंक में, सारा सोना चाँदी, दौलत तिजोरी में ही रखे रह जाते हैं। मुँह में लगा सोने का दांत भी साथ नहीं जा पाता। हमारे साथ तो हमारे किये हुए सत्कर्म और कुकर्म ही साथ जाते हैं। अगर आपकी संतान अच्छी है, योग्य है तो सब धन दौलत बना लेगी, किन्तु यदि आपकी औलाद नालायक है तो आपका संचय किया हुआ धन भी चंद दिनों में ही बर्बाद कर देगी। साथ जाएगी तो बस नेकियां। इसलिए जितना हो सके सही कर्म करें, नेकी करें, इन्सान की मदद करें। धन्यवाद।

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