Amit Kumar Apr 14, 2021

ईश्वर एक है और वो हम सभी के भीतर विराजमान है। मनुष्य जन्म का मुख्य लक्ष्य है उस परमसत्ता को जानना। सम्पूर्ण ब्रह्मांड का सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता उस परमात्मा से,साधना और निश्छल प्रेम से हमारा मिलन संभव है। कर्मों के जाल जो हमने जन्मों जन्मों में बुने हैं वही कर्म हमारे मिलन में बाधा हैं। आसक्ति से मुक्त हो कर, सच्चे प्रेम के रास्ते चल कर हम कर्म बंधनों से मुक्त हो सकते हैं। कर्म बंधनों से मुक्त होते ही यह महायोग सम्भव होता है और तभी हम सच्चे गृहस्थ या विरक्त बनते हैं। जीवन के प्रत्येक दिन के संघर्ष और झँझावातों में भी एक अजीब सुकून महसूस करते हैं। एक ऐसा आनंद जो भौतिक जगत की कोई भी वस्तुएँ हमें नहीं दे सकतीं हैं।

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Amit Kumar Apr 13, 2021

श्रीराम! सृष्ट्यादि दिवस व नव सम्वत्सर व नवरात्र महापर्व की बहुत बहुत बधाई व शुभासंशा। इस शुभ अवसर पर कुछ न कुछ आराधन अवश्य करें। जो किसी पकरम्परा विशेष में दीक्षित हैं, वे उसी विधि अनुसार अभीष्ट साधन करें। जो कहीं किसी परम्परा में दीक्षित नहीं हैं, वे मानस भागवत पाठ- परायण, गीता पाठ, हनुमान चालीसा रामरक्षा आदि दिव्य स्तोत्रों का जप पाठ करें। नामसङ्कीर्तन करें। अपने आस पास के मन्दिरों को स्वच्छ अलङ्कृत करें। हो सके तो दिन में एक बार ( सूर्यास्त से पूर्व) सात्विक मित आहार करें। सम्भव हो तो सरल सात्विक सुपुष्ट फलाहार करें। इससे धातुओं में साम्य आता है। दो बार स्नान अवश्य करें। असत्यभाषण अधिक भाषण न करें। किसी का अनिष्ट चिन्तन न करें। कम से कम सुंदरकाण्ड या ११हनुमान चालीसा करें। परीक्षा वाले छात्र भी स्नान करके एक बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सूर्योदय के पूर्व शय्या त्याग अवश्य करें। यथाशक्ति कुछ न कुछ दान भी अवश्य करें। और इन्ही माध्यमों से दैवी सम्पदा से सुदृढ बनें। लोक व परलोक दोनों में समृद्धि व सुशान्ति लाभ करें। परावार प्रकाशनिधि परमार्थस्वरूप भक्तजीवनधन सदा प्रसन्नवदन जीवेश राघवेश श्री राम चन्द्र जी के प्राकट्य दिवस श्रीरामनौमी की भी बहुत बहुत बधाई।। जय श्रीराम

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Amit Kumar Apr 12, 2021

शुभ प्रभात हरीॐ 🌹: यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌ । यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌ ॥ भावार्थ : हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर॥27॥ [ शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः । सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ भावार्थ : इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते हैं- ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा। ॥28॥🌹 🌹🌹🌹देखो भाई , जीव के लिए कर्म ही बंधन है और कर्म ही मुक्ति , सकाम कर्म बन्धन में डालता है तो निसकाम कर्म बन्धन मुक्त करता है,अगर कर्म के कर्ता बनोगे ,या अपने सुख के लिए कर्म करोगे तो भोक्ता बनना ही पड़ेगा ,,,अवश्यमेव भोक्तव्यम कर्मफल सुभासुभम,, कर्म करने के बाद अगर मैंने किया है ऐसा भाव रखोगे तो कर्म फल भी भोगना पड़ेगा चाहे वह शुभ हो या अशुभ हो ,जिस तरह अपने समाज के संविधान के न्यायालय में भी तब तक सजा नही जा सकती जब तक जुर्म को कबूल न कर ले ,अगर जुर्म कर्ता ने यह कह दिया कि मैंने किया है तो उसे सजा अवश्य मिलेगी जब तकअपराधी जुर्म कबूल नही करता तब तक उसे सजा नही दी जा सकती या फिर यह सिद्ध हो जाये कि इसने यह जुर्म किया है तब सजा दी जा सकती है, ठीक उसी तरह जीव जब अपने को कर्ता मानता है तो उसे भोक्ता बनना ही पड़ता है, इसलिए जीव के उद्धार के लिए भगवान ने कहा कि अगर तुझे कर्मो के बनधन से मुक्त होना है तो तू जो भी कर्म कर वह मुझे अर्पित कर दे,तो तुझे कर्म बन्धन नही होंगे ,और मुक्त हो जाएगा ,,मगर जीव की विडम्बना है कि वह अच्छा कर्मफल तो चाहता है पर बुरा नही चाहता , अगर आप यह चाहते हैं कि हमारे कर्म बनधन न बने तो बस एक ही तरीका है सभी कर्मो के फल को परमात्मा को अर्पित कर दें,तो वे कर्म बीज बनकर अंकुरित ही नही होंगे तो फल कैसा ,जिस तरह से आप अपने खेत मे अगर किसी बीज को बोना तो चाहते हो मगर चाहते हो कि वह अंकुरित ही न हो तो उस बीज को भून कर बो दिया जाए तो वह अंकुरित ही नही होगा,ठीक उसी तरह कर्म बीज को पर्मात्मार्पनम करदो तो भ अंकुरित नही होगा,🌹 🌹जै श्री कृष्ण🌹🌹

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Amit Kumar Apr 11, 2021

जानने, समझने और उपयोग करने योग्य केवल तीन ही काम हैं, जानने योग्य आत्मा, समझने योग्य विध्या औरउपयोग करने योग्य शिव| पहला-जानने योग्य, आत्मा अर्थात जर्रे-2 मे रहने वाली सकारात्मक शक्तियाँ जो सभी के कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहती हैं, जिनका स्वाभाव चेतन है और काम केवल कल्याण करना ही है, जिन्हे केवल कल्याण के नाम से ही उपयोग, दुरुपयोग कंफ्यूज और गुमराह किया जा सकता है| दूसरा-समझने योग्य, विध्या अर्थात जिस तरीकों से निर्जीव चीज़ों मे भी निहित आत्म(चेतन) तत्व विभिन्न रूपों में बाँटकर या आपस मे मिलाकर अपना काम निकाला जा सकता है, इसे ही हम तकनीकी, तरीका, जानकारी, योजना, प्रवृत्ति या प्रकृति के नाम से भी जानते हैं, जिससे काम आसानी से हो सकते हैं| इसी को समझने और उपयोग करने के लिए लोग विभिन्न धर्म, व्यवसाय, राजनीति, ज्ञान और विग्यान की शाखाओ में उलझे रहते हैं| तीसरा-उपयोग करने योग्य, शिव अर्थात विश्वास या यथार्थ, जो उपरोक्त चेतन और विध्या का अंतिम परिणाम, स्वतः सर्वत्र व्यक्त और अंतिम रूप से प्रमाणित और मृत्यु की तरह निश्चित है| इन तीनों को जान, समझ और उपयोग करके सभी लोग अपनी और सभी की ज़रूरत पूरी और समस्या दूर कर सकते हैं| निकम्मों के साथ परिणाम रहित वार्ता मे संलग्न रहने वाले लोग अपना काम अनवरत जारी रख सकते हैं| जो निश्चित परिणामदाई व्यवस्था, तरीका, योजना को समझना और उपयोग करना चाहे केवल मेरी आलोचना की कोशिश करेगा तो जो भी चाहेगा निश्चित रूप से कर सकेगा| उसे किसी भी तरह की विध्या या विध्याधारी(बल-बुद्धि-धन-पद-प्रतिष्ठा) की ज़रूरत नही रह जाएगी, उसके बिना ही जो भी चाहेगा ज़रूर कर सकेगा| अपने द्वारा लिखे जा रहे प्रत्येक शब्द को प्रमाणित रखने और वही परिणाम लाने के लिए मैं व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार और सदैव सर्वत्र उपस्थित भी हूँ| सादर,

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Amit Kumar Apr 10, 2021

"राम राज्य" अर्थात इच्छा मात्र पर ही अभीष्ठ पूरा होने वाली व्यवस्था एक काल्पनिक अवधारणा नही है। यह केवल बुद्धिमान और समर्थ लोगो की उदासीनता या निष्क्रियता के कारण, कमजोर और अज्ञानी लोगो द्वारा केवल अपने तात्कालिक एवं सीमित हितो के लिये काम किये जाने की वजह लापरवाही या जानबूझकर फैलाई गई भ्रांती है, जिससे कोई इसकी तरफ रुख ना करे, क्योन्कि यह तो स्वतः स्थापित होने वाली अवस्था है। सबसे आसानी से सभी को जीत सकती है और सभी को जिता भी सकती है| इसके लिए किसी काबिलियत की जरूरत नही रहती या सारे काबिल लोग मिलकर भी इसे नही रोक पाते। सभी लोग स्वतः ही इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहते हैं। सबसे ज़्यादा प्रमाणित है, आनंद देने वाली है, नियंत्रण देने वाली है, स्थाईत्व दिलाने वाली है, सर्वत्र है, स्वतः सिद्ध भी है...आदि आदि| जहाँ लोगो के हित पुरे होते है, समस्याएँ दूर होती है वही आनंद मिलता है, लोग वही रहना पसंद करते है इसलिये नियंत्रण भी वही रहता है, सर्वत्र, सदैव और स्वतः भी यही होता रहता है| कलयुग(मशीनी या नेटवर्क के युग) मे एसी अवस्था का नाम लेने से भी काम चल जाता है, इसलिए कुछ लोग सिंडिकेट के दम से काबिल होने का लबादा ओढ़ कर ही लोगों को इससे दूर रख पाते हैं, यही स्थिती सर्वत्र है, प्रमाणित है, सिद्ध है, व्यक्त है| अपने हितो को पुरा करने वाली या समस्यओ को दूर करने वाली व्यवस्था का कोई भी विरोधी हो ही नही सकता, इसे पागल भी समझता है, गून्गा भी बोल पाता है, बहरा भी सुन पाता है, अंधा भी देख पाता है, पशु-पछि आदि भी पहचानते है| हां, सीमित या व्यक्तिगत हितो के कारण कुछ आंख वाले नही देख पाते, कान वाले नही सुन पाते, जुबान वाले नही बोल पाते, किन्तु जब उनके अपने राम(हित-अहित) की बारी आती है तो सब तत्काल खुद ब खुद ही हो जाता है| केवल विरोध करने से भी मेरी बाते अधिक स्पष्ट हो सकती है।

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Amit Kumar Apr 9, 2021

जय-जय श्री राधे सुनो प्यारे भक्तों न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ अर्थात आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता। वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ अर्थात जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।

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Amit Kumar Apr 8, 2021

आज की कहानी पढ़े कि गुरु जी ने चोर, कुत्ते और छोटा बच्चे को गुरु क्यों बनाये बड़ी ही ज्ञानवर्धक कहानी ...... सभी पढ़े एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, ” स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है?” महंत शिष्य का सवाल सुन कर मुस्कुराए और बोले, ” मेरे हजारों गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनवाने बैठ जाऊ तो शायद महीनों लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओं के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा। एक था चोर। एक बार मैं रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन अंततः मुझे एक व्यक्ति मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मैं कहाँ ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ ठहर सकते हैं। मै एक चोर हूँ और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते हैं। “वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मैं अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, हमेशा मस्त रहता था। जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी हो नहीं रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना-वाधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो प्रतिदिन कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा। और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था। एक बहुत गर्मी वाले दिन मै बहुत प्यासा था और पानी के खोज में घूम रहा था कि एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने *डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सीख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है। ”और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है। मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलता हुआ दीपक ले के जा रहा था। वह पास के किसी मंदिर की मुंडेर पर रखने जा रहा था। उपहास में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह ये दीपक तुमने जलाया है ? वह बोला, जी मैंने ही जलाया है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह दीपक बुझा हुआ था और फिर एक क्षण आया जब यह दीपक जल गया। क्या तुम मुझे वह अग्नि/ज्योतिस्त्रोत दिखा सकते हो जहाँ से वह ज्योति आई? ”वह बच्चा हँसा और दीपक को हाथ हिलाकर हवा से बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहाँ गई वह ? आप ही मुझे बताइए। “ “मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता/मूर्खता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। “ शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पूरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना।जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए।यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं! सदैव प्रसन्न रहिये जो प्राप्त है-पर्याप्त है

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Amit Kumar Apr 7, 2021

संत महिमा मथुरा में एक संत रहते थे। उनके बहुत से शिष्य थे। उन्हीं में से एक सेठ जगतराम भी थे। जगतराम का लंबा चौड़ा कारोबार था। वे कारोबार के सिलसिले में दूर दूर की यात्राएं किया करते थे। एक बार वे कारोबार के सिलसिले में कन्नौज गये। कन्नौज अपने खुशबूदार इत्रों के लिये प्रसिद्ध है। उन्होंने इत्र की एक मंहगी शीशी संत को भेंट करने के लिये खरीदी। सेठ जगतराम कुछ दिनों बाद काम खत्म होने पर वापस मथुरा लौटे। अगले दिन वे संत की कुटिया पर उनसे मिलने गये।संत कुटिया में नहीं थे। पूछा तो जवाब मिला कि यमुना किनारे गये हैं, स्नान-ध्यान के लिये। जगतराम घाट की तरफ चल दिये। देखा कि संत घुटने भर पानी में खड़े यमुना नदी में कुछ देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं। तेज चाल से वे संत के नजदीक पहुंचे। प्रणाम करके बोले आपके लिये कन्नौज से इत्र की शीशी लाया हूँ। संत ने कहा : लाओ दो।सेठ जगतराम ने इत्र की शीशी संत के हाथ में दे दी। संत ने तुरंत वह शीशी खोली और सारा इत्र यमुना में डाल दिया और मुस्कुराने लगे। जगतराम यह दृश्य देख कर उदास हो गये और सोचा एक बार भी इत्र इस्तेमाल नहीं किया, सूंघा भी नहीं और पूरा इत्र यमुना में डाल दिया। वे कुछ न बोले और उदास मन घर वापस लौट गये।कई दिनों बाद जब उनकी उदासी कुछ कम हुयी तो वे संत की कुटिया में उनके दर्शन के लिये गये। संत कुटिया में अकेले आंखे मूंदे बैठे थे और भजन गुनगुना रहे थे।आहट हुयी तो सेठ को द्वार पर देखा। प्रसन्न होकर उन्हें पास बुलाया और कहा उस दिन तुम्हारा इत्र बड़ा काम कर गया।सेठ ने आश्चर्य से संत की तरफ देखा और पूछा - मैं कुछ समझा नहीं। संत ने कहा -- उस दिन यमुना में राधा जी और श्री कृष्ण की होली हो रही थी। श्रीराधा जी ने श्रीकृष्ण के ऊपर रंग डालने के लिये जैसे ही बर्तन में पिचकारी डाली, उसी समय मैंने तुम्हारा लाया इत्र बर्तन में डाल दिया। सारा इत्र पिचकारी से रंग के साथ श्रीकृष्ण के शरीर पर चला गया और भगवान श्रीकृष्ण इत्र की महक से महकने लगे। तुम्हारे लाये इत्र ने श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की होली में एक नया रंग भर दिया। तुम्हारी वजह से मुझे भी श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की कृपा प्राप्त हुयी। सेठ जगतराम आंखे फाड़े संत को देखते रहे। उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। संत ने सेठ की आंखों में अविश्वास की झलक देखी तो कहा - शायद तुम्हें मेरी कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा। जाओ मथुरा के सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों के दर्शन कर आओ, फिर कुछ कहना। सेठ जगतराम मथुरा में स्थित सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों में गये। उन्हें सभी मंदिरों में श्रीकृष्णराधा की मूर्ति से अपने इत्र की महक आती प्रतीत हुयी। सेठ जगतराम का इत्र श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी ने स्वीकार कर लिया था।वे संत की कुटिया में वापस लौटे और संत के चरणों में गिर पड़े। सेठ की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। संत की आंखें भी प्रभू श्रीकृष्ण की याद में गीली हो गयीं। सेठ जगतराम को संत जी का अधिकार मालूम हुआ कि संत महात्मा भले ही हमारे जैसे दिखते हों, रहते हों लेकिन वो हर वक्त ईश्वर मे मन लगाये रहते हैं, और हम जैसो को यह अधिकार तब प्राप्त होगा जब हमारी भक्ति बढ़े, नाम-सिमरन बढ़े और हमारी श्रद्धा बढ़े ।

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