Amit Kumar Jan 19, 2020

+1 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Amit Kumar Jan 18, 2020

आज ज्यादा समय नहीं मिला इस हेतु एक। छोटी सी कहानी पढ़े कर्म जिनके जीवन मे होता है कृपा भी उन्हें ही प्राप्त होता है एक गाँव मे एक ज्योतिषी आये और उन्होने बताया गाँव मे अगले दस साल पानी नहीं बरसेगा । सारे गांव के लोगो ने गांव छोड़ दिया वहाँ से जाने लगे पर ये बात एक किसान दंपत्ति ने अनसुनी कर दी सबके जाने जाने के बाद भी किसान अपने नियमानुसार हल चला रहा था। कुछ बादल थोड़ा नीचे से गुजरे और किसान से बोले क्यों भाई पानी तो हम बरसाएंगे नहीं फिर क्यों हल चला रहे हो? क्या तुमको पता नही है अगले 10 वर्ष वर्षा नही होने वाली ।। किसान बोला कोई बात नहीं जब पानी बरसेगा तब बरसेगा लेकिन मैं हल इसलिए चला रहा हूँ कि मैं दस साल में कहीं हल चलाना न भूल जाऊँ। यह सुन कर बादल भी घबरा गए कि हम भी 10 वर्ष न बरसे तो कहीं हम भी पानी बरसना न भूल जाएं। तो वो तुरंत बरसने लगे और उस किसान की मेहनत जीत गई तो प्यारे कामयाबी उन्हीं को मिलती है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मेहनत करना नहीं छोड़ते हैं।

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 13 शेयर
Amit Kumar Jan 17, 2020

दुनिया की सब से ऊंची भगवान शिव की मूर्ति 🌷 नाथद्वारा, राजस्थान, भारत 🇮🇳 नाथद्वारा के गणेश टेकरी में बनाई जा रही यह मर्ति दुनिया में अपनी तरह की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा होगी। भगवान शिव की ध्यान करती इस मूर्ति का सिर 70 फीट लंबा होगा। मूर्ति का स्थल क्षेत्र करीब 25 बीघा में फैला हुआ है। मूर्ति की डिजाइन का विंड टनल टेस्ट सिडनी में हुआ है। 250 किलोमीटर की रफ्तार से हवा चलने के दौरान भी प्रतिमा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बरसात और धूप से बचाने के लिए इस पर जिंक की कोटिंग कर कॉपर कलर किया जाएगा, जो 20 साल तक फीका नहीं पड़ेगा। मूर्ति के अंदर 4 लिफ्ट होंगी। 2 लिफ्ट में एक बार में 29-29 श्रद्धालु 110 फीट तक और दो अन्य लिफ्ट से 280 फीट तक 13-13 श्रद्धालु एक साथ जा-आ सकेंगे। इस शिव प्रतिमा में आधार 110 फीट गहरा है, जबकि पंजे की लंबाई 65 फीट बताई जा रही है। मर्ति की पंजे से घुटने तक की ऊंचाई 150 फीट है जबकि कंधा 260 फीट और कमरबंद 175 फीट पर स्थित है। त्रिशूल की लंबाई की बात करें तो यह 315 फीट है और जूडा 16 फीट ऊंचा है। 🌷 ॐ नमः शिवाय 🌷

+11 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 33 शेयर
Amit Kumar Jan 16, 2020

आज ज्यादा समय नहीं मिला इस हेतु एक। छोटी सी कहानी पढ़े कर्म जिनके जीवन मे होता है कृपा भी उन्हें ही प्राप्त होता है एक गाँव मे एक ज्योतिषी आये और उन्होने बताया गाँव मे अगले दस साल पानी नहीं बरसेगा । सारे गांव के लोगो ने गांव छोड़ दिया वहाँ से जाने लगे पर ये बात एक किसान दंपत्ति ने अनसुनी कर दी सबके जाने जाने के बाद भी किसान अपने नियमानुसार हल चला रहा था। कुछ बादल थोड़ा नीचे से गुजरे और किसान से बोले क्यों भाई पानी तो हम बरसाएंगे नहीं फिर क्यों हल चला रहे हो? क्या तुमको पता नही है अगले 10 वर्ष वर्षा नही होने वाली ।। किसान बोला कोई बात नहीं जब पानी बरसेगा तब बरसेगा लेकिन मैं हल इसलिए चला रहा हूँ कि मैं दस साल में कहीं हल चलाना न भूल जाऊँ। यह सुन कर बादल भी घबरा गए कि हम भी 10 वर्ष न बरसे तो कहीं हम भी पानी बरसना न भूल जाएं। तो वो तुरंत बरसने लगे और उस किसान की मेहनत जीत गई तो प्यारे कामयाबी उन्हीं को मिलती है जो विपरीत परिस्थितियों में भी मेहनत करना नहीं छोड़ते हैं।

+9 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 58 शेयर
Amit Kumar Jan 13, 2020

"रच्छ सह(राक्छस) प्रणाली, ज़्यादा श्रेष्ठ उपयोगी और निश्चित रूप से प्रभावी भी है|" जर्रे-2 में रहने वाले सकारात्मक तत्वों के योग को किसी खास प्रतीक(पत्‍थर) में स्थापित करके लोगों को पॉज़िटिव प्रेरणा देने की तकनीकी तो अपने ही ठेकेदारों के निकम्मेपन से धूल-धूसरित हो गयी| उसी का दुश्टों द्वारा स्थापित संस्करण नकारात्मक तत्वों के योग के सहारे किसी व्यक्ति-वस्तु-व्यवस्था को हीरो बनाकर उसके सहारे पलने वाले लोगों के रूप में यत्र-तत्र-सर्वत्र व्यवहरित होते देखा सुना और उपयोग किया जाता हुवा आसानी से देखा जा सकता है| वैसे भी ज़्यादातर समय दुश्टों का ही शासन रहता है, प्रभु राम के आने के कुछ दिनों बाद ही उससे भी निम्न स्तर का युग द्वापर आ गया था और श्री कृष्ण के आने के कुछ दिनों बाद ही सबसे निम्न स्तर का युग कलियुग आ गया था| इन भगवानों को पृथ्वी पर आने से श्रेष्ठ तरीकों की स्थापना तो हुई किंतु उपरोक्त देवताओं की स्थापना वाली तकनीकी की तर्ज पर उनकी तकनीकी भी उनके ही सेवकों द्वारा किये गये अनावश्यक महिमा मॅंडन की भेंट चढ़ने की वजह से भी दुश्टों के विरुद्ध काम नही कर सकी अपितु देवताओं की अपनी-२ शक्ति को एकत्रित करने की तकनीकी(दुर्गा) भी दैत्य गुरु शुक्राचार्य द्वारा स्थापित रछ-सह तकनीकी की वजह से अपना काम नही कर सकी| तब से लेकर आज तक विभिन्न नये नाम से संचालित और प्रचलित रच्छ सह(राक्छस या सिंडिकेट) प्रणाली की व्यवस्थाओं को खुद ही बनते-बिगड़ते-उपयोग किया जाते हुवे आसानी से देखा जा सकता है| यही वह तकनीकी है जिसका अंतिम रूप से प्रभावी होना निश्चित और स्वतः सिद्ध है अब इसे ही मैं दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा, बदमाश, लुच्चा और लफंगा बनने की तमन्ना रखने वाला अध्यावधिक सिंडिकेट के नाम से व्यवस्थित और विरोधियों के अभाव में प्रमाणित रूप से सार्वजनिक कर रहा हूँ, जिसे किसी भी कमजोर मजबूर दुष्ट द्वारा भी किया जा सकता है, जिस किसी भी तरह के सामर्थ्य की ज़रूरत नही रहती और ना ही ये कथित सामर्थ्यशाली लोग मिलकर भी उसे बाध्य, बाधित गुमराह या कंफ्यूज ही कर पाते हैं| जिसको मेरी वर्तमान या पूर्व की कोई पोस्ट समझ मे ना आए या कोई कमी या सुधार बताने बताने की हिम्मत ताक़त या बुद्धि रखता हो केवल वही कमेंट करे|

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Amit Kumar Jan 12, 2020

🔯#नानाजीववाद:🔯🚩 श्रीराम! निर्विषाद्वैतवाद के अनुसार श्रुतियों में कहा गया आत्माओं का परस्पर,व आत्माओं का ईस्वर से भेद औपाधिक (मिथ्या/कल्पित) है, स्वाभाविक/निरूपाधिक/सत्य नहीं है। इस औपाधिक आत्मभेद वाद में भी चार प्रशिद्ध मत हैं। उन में से #एकजीवात्मवाद व #अनेकजीवात्मवाद मुख्य व अधिक प्रशिद्ध हैं।एकजीवात्मवाद पूर्व में प्रस्तुत किया है। अब यहाँ नाना जीवात्मवाद प्रस्तुत है--- चेतन आत्मा एक है, अन्तःकरण उपाधिसे युक्त आत्मा ही जीव कहलाता है। जिस प्रकार आकाश एक है, घटादि उपाधियाँ नाना हैं, इसलिये महाकाश एक होनेपर भी घटादि उपाधियों में भेद के कारण घटादि-अवच्छिन्न आकाश नाना ( अनेक) हैं। उसी प्रकार चेतन आत्मा एक है, अन्तःकरण रूप उपाधियाँ नाना हैं, इसलिए नाना अन्तःकरण उपाधियोंसे अवच्छिन्न (युक्त/ सम्बद्ध) आत्मा नाना हैं। शुद्ध ( निरूपाधिक) आत्मस्वरूप ही ब्रह्म है। इस प्रकार आत्माओंका भेद स्वाभाविक नहीं है किन्तु औपाधिक है। अतः श्रुतियों में जहाँ आत्माओंका भेद प्रतिपादित है, उसे औपाधिक मानना चाहिए। आत्माओंका अभेद ही स्वाभाविक है। निर्विशेषाद्वैतमें स्वीकृत यह वाद #नानाजीववाद कहा जाता है। निवेदनम्---एक जीववाद के लिए इस सङ्केत में देखे *जीव अनेक एक श्रीकन्ता*

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Amit Kumar Jan 11, 2020

किसी भी चीज को प्राप्त करने के लिए केवल संकल्प की जरुरत होती है, बाकि सारी आवश्यक चीजें वहां खुद ही एकत्रित हो जाती हैं। जहाँ चाहत सुधृण होकर संकल्प बन जाता हैं वहां लगन और योग्यता या तो खुद ही आ जाती है या उसके बिना भी काम निकालने का तरीका मिल जाता है। कथित योग्यता या लगन धारी लोग यत्र तत्र सर्वत्र भटकते हुवे आसानी से देखे जा सकते हैं। अथवा किसी संकल्प धारी व्यक्ति के नेटवर्क(आडंबर) के पीछे कथित टुकड़े या उसमे लगने वाले मख्खन के चक्कर में दुम हिलाते, ताली बजाते या लकीर पीटते हुवे तमाम बुद्धिमान, बलवान, धनवान लोग आसानी से देखे जा सकते हैं। अंतिम और स्थाई नियंत्रण कभी भी योग्यता, ताकत या संपत्ति धारी लोगों के हाथों में नहीं होता है। जो चाहता है वह संकल्प करने पर एन केन प्रकारेण प्राप्त कर ही लेता है, बाकी लोगों को अंगूर खट्टे बताने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं होता है। जो चाहे और उसे नहीं मिले उसके लिए ही तो मैं हमेशा जिम्मेदार रहता हूँ, बाकि लोग चाहें तो विरोध करके समझने और मेरी गारंटी के साथ उपयोग करने की कोशिश के बजाये अंगूर खट्टे हैं कह कर काम चला सकते हैं।

+10 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 9 शेयर