sushil dhiman Aug 23, 2019

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sushil dhiman Aug 23, 2019

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sushil dhiman Aug 22, 2019

*👏🏻स्वयं को धोखा न दें* *वद्धावस्था में भक्ति करेंगे, गृहस्थी की जिम्मेदारियों से मुक्त होने पर भक्ति करेंगे । वृन्दावन में कुटिया बनाकर भक्ति करेंगे, किसी एकान्त स्थान में भक्ति करेंगे, कुछ वर्ष बाद केवल भक्ति ही करेंगे । यह सभी बातें खुद से धोखा करने जैसी हैं, सत्य तो यह है कि सन्सार में मन रमता है, कुछ और भोग लें, फ़िर मिले न मिले, भक्ति तो कभी भी हो सकती है।अभी तो बहुत समय है पास में भक्ति कभी भी हो सकती है लेकिन ऐसा नहीं है काल का परिस्थिति का कोई भरोसा नही है भक्ति केवल अभी ही हो सकती है जब हम स्वस्थ हैं, यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिये । श्वासों का पता नहीं, क्षणभंगुर शरीर का पता नहीं, तो किस आधार पर हम अपने आप को धोखा देते हैं । हम भोगों को नहीं भोग रहे, भोग ही हमें भोगते हैं ।* 🌹🙏🏻 *जय श्री कृष्ण*🙏🏻🌹

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sushil dhiman Aug 22, 2019

*बुरा वक्त आने से पहले ईश्वर देते हैं चेतावनी, समझें* एक नगर में एक संत अपना प्रवचन करने पहुंचे। नगरवासियों ने उन्हें उचित सम्मान दिया और उनके प्रवचन की व्यवस्था की। जब सब लोग इकट्ठे हो गए तो संत ने अपना प्रवचन शुरू किया। नगरवासियों से उन्होंने कहा, ‘‘हमेशा ईश्वर में अपनी सच्ची आस्था बनाए रखो। ईश्वर हमेशा सबकी रक्षा करते हैं।’’ एक शिष्य उनकी बातों पर तनिक हैरान होते हुए भी एक-एक शब्द को अपने हृदय में उतार रहा था। प्रवचन सुनने के कुछ दिन बाद वही शिष्य किसी जंगल से गुजर रहा था। तभी एक आदमी सामने से दौड़ता हुआ आया। वह चिल्ला रहा था, ‘‘बचाओ! पागल हाथी इधर ही आ रहा है।’’ शिष्य ने मन ही मन संत के शब्द दोहराए कि ईश्वर हमेशा सबकी रक्षा करता है। इससे उसे अपने अंदर शक्ति का अहसास हुआ और वह बिना डर के आगे चल दिया। थोड़ी देर बाद सामने से पागल हाथी चिंघाड़ता हुआ आया और शिष्य को धक्का देता हुआ जंगल में दूसरी ओर भाग गया। शिष्य बाल-बाल बच गया, पर उसे काफी चोट लगी। क्रोधित होकर वह सीधा संत के आश्रम में जा पहुंचा। संत के सामने शिष्य ने अपनी शंका प्रकट की कि उसने ईश्वर में अपनी सच्ची आस्था बनाए रखी, लेकिन ईश्वर ने उसकी रक्षा नहीं की। उसकी शिकायत सुनकर संत ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘ईश्वर ने तुम्हारी सच्ची आस्था का ध्यान रखकर ही तुम्हें चेतावनी देने के लिए एक रक्षक भेजा था लेकिन तुम नहीं चेते और आगे बढ़ते चले गए। फिर भी पागल हाथी ने तुम्हें चोट पहुंचाकर ही छोड़ दिया। अगर वह चाहता तो तुम्हें कुचलता हुआ भी जा सकता था। *ईश्वर में अपनी सच्ची आस्था रखो और उसके द्वारा समय-समय पर दी जाने वाली चेतावनियों को भी समझने का प्रयास करो। वह सबकी रक्षा करता है, परंतु अगर सचेत नहीं रहोगे तो इसके गंभीर परिणाम भी हो सकते हैं।’’* *🔱जय महाकाल...!!!*🔱

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sushil dhiman Aug 21, 2019

*🙇तीन मुट्ठी चावल का फल* जब भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी को तीनों लोको का स्वामी बना दिया तो सुदामा जी की संपत्ति देखकर यमराज से रहा न गया ! यम भगवान को नियम कानूनों का पाठ पढ़ाने के लिए अपने बहीखाते लेकर द्वारिका पहुंच गये ! भगवान से कहने लगे कि - अपराध क्षमा करें भगवन लेकिन सत्य तो ये है कि यमपुरी में शायद अब मेरी कोई आवश्यकता नही रह गयी है इसलिए में पृथ्वी लोक के प्राणियों के कर्मों का बहीखाता आपको सौंपने आया हूँ ! इस प्रकार यमराज ने सारे बहीखाते भगवान के सामने रख दिये भगवान मुस्कुराए बोले - यमराज जी आखिर ऐसी क्या बात है जो इतना चिंतित लग रहे हो ? यमराज कहने लगे - प्रभु आपके क्षमा कर देने से अनेक पापी एक तो यमपुरी आते ही नही है वे सीधे ही आपके धाम को चले जाते हैं और फिर आपने अभी अभी सुदामा जी को तीनों लोक दान दे दिए हैं । सो अब हम कहाँ जाएं ? यमराज भगवान से कहने लगे - प्रभु ! सुदामा जी के प्रारब्ध में तो जीवन भर दरिद्रता ही लिखी हुई थी लेकिन आपने उन्हें तीनों लोकों की संपत्ति देकर विधि के बनाये हुए विधान को ही बदलकर रख दिया है ! अब कर्मों की प्रधानता तो लगभग समाप्त ही हो गयी है ! भगवान बोले - यम तुमने कैसे जाना कि सुदामा के भाग्य में आजीवन दरिद्रता का योग है ? यमराज ने अपना बही खाता खोला तो सुदामा जी के भाग्य वाले स्थान पर देखा तो चकित रह गए देखते हैं कि जहां श्रीक्षय’ सम्पत्ति का क्षय लिखा हुआ था ! वहां स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने उन्ही अक्षरों को उलटकर ‘उनके स्थान पर यक्षश्री’ लिख दिया अर्थात कुबेर की संपत्ति ! भगवान बोले - यमराज जी ! शायद आपकी जानकारी पूरी नही है क्या आप जानते हैं कि सुदामा ने मुझे अपना सर्वस्व अपर्ण कर दिया था ! मैने तो सुदामा के केवल उसी उपकार का प्रतिफल उसे दिया है ! यमराज बोले - भगवन ऐसी कौनसी सम्पत्ति सुदामा ने आपको अर्पण कर दी उसके पास तो कुछ भी नही ! भगवान बोले - सुदामा ने अपनी कुल पूंजी के रूप में बड़े ही प्रेम से मुझे चावल अर्पण किये थे जो मैंने और देवी लक्ष्मी ने बड़े प्रेम से खाये थे ! जो मुझे प्रेम से कुछ खिलाता है उसे सम्पूर्ण विश्व को भोजन कराने जितना पुण्य प्राप्त होता है.बस उसी का प्रतिफल सुदामा को मैंने दिया है ! ऐसे दयालु हैं हमारे प्रभु श्रीकृष्ण भगवान जिन्होंने न केवल सुदामा जी पर कृपा की बल्कि द्रौपदी की बटलोई से बचे हुए साग के पत्ते को भी बड़े चाव से खाकर दुर्वासा ऋषि और उनके शिष्यों सहित सम्पूर्ण विश्व को तृप्त कर दिया था ओर पांडवो को श्राप से बचाया था !! *🔱जय महाकाल...!!!*🔱

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sushil dhiman Aug 21, 2019

*सुन्दर और दुर्लभ सत्य कथा* एक बार गोपियो ने श्री कृष्ण से कहा की 'हे कृष्ण हमे अगस्त्य ऋषि को भोग लगाने जाना है, और ये यमुना जी बीच में पड़ती है अब बताओ केसे जाये भगवान श्री कृष्ण ने कहा की जब तुम यमुना जी के पास जाओ तो कहना की, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दे गोपियाँ हंसने लगी की लो ये कृष्ण भी अपने आप को ब्रह्मचारी समझते है, सारा दिन तो हमारे पीछे पीछे घूमता है, कभी हमारे वस्त्र चुराता है कभी मटकिया फोड़ता है ... खेर फिर भी हम बोल देगी गोपिय यमुना जी के पास जाकर कहती है, हे यमुना जी अगर श्री कृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमे रास्ता दे, और गोपियो के कहते ही यमुना जी ने रास्ता दे दिया गोपिया तो सन्नन रह गई ये क्या हुआ कृष्ण ब्रह्मचारी ??????????? अब गोपिया अगस्त्य ऋषि को भोजन करवा कर वापिस आने लगी तो अगस्त्य ऋषि से कहा की अब हम घर केसे जाये यमुना जी बीच में है अगस्त्य ऋषि ने कहा की तुम यमुना जी को कहना की अगर अगस्त्य जी निराअहार है तो हमे रास्ता दे गोपियाँ मन में सोचने लगी की अभी हम इतना सारा भोजन लाई सो सब गटका गये और अब अपने आप को निराहार बता रहे है??????????? गोपिया यमुना जी के पास जाकर बोली, हे यमुना जी अगर अगस्त्य ऋषि निराहार है तो हमे रास्ता दे और यमुना जी ने रास्ता दे दिया गोपिया आश्चर्य करने लगी की जो खाता है वो निराहार केसे हो सकता है ??????????? और जो दिन रात हमारे पीछे पीछे फिरता है वो ब्रह्मचारी केसे हो सकता है ??????????? इसी उधेड़ बूंद में गोपिया कृष्ण के पास आकर फिर से वही प्रश्न किया भगवान श्री कृष्ण कहने लगे गोपियो मुझे तुमारी देह से कोई लेना देना नही है, मैं तो तुम्हारे प्रेम के भाव को देख कर तुम्हारे पीछे आता हूँ. मेने कभी वासना के तहत संसार नही भोगा मैं तो निर्मोही हूँ इस लिए यमुना ने आप को मार्ग दिया तब गोपिया बोली भगवन मुनिराज ने तो हमारे सामने भोजन ग्रहण किया फिर वि ओ बोले की अगत्स्य आजन्म उपवाशी हो तो हे यमुना मैया मार्ग देदे !!!!!!!!!!!! और बड़े आश्चर्य की बात है कि यमुना ने मार्ग देदिया!!!!!!! श्री कृष्ण हंसने लगे और बोले कि अगत्स्य आजन्म उपवाशी हे । अगत्स्य मुनि भोजन ग्रहण करने से पहले मुझे भोग लगाते है और उनका भोजन में कोई मोह नही होता उनको कतई मन में नही होता की में भोजन करु या भोजन कर रहा हु ओ तो अपने अंदर रहे मुझे भोजन करा रहे होते है इस लिए ओ आजन्म उपवासी हे जो मुझसे प्रेम करता है में उनका सच में ऋणि हुँ, में तुम सबका ऋणि हुँ 🙏🏻🌷🙏🏻🌷🙏🏻🌷🙏🏻🌷

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sushil dhiman Aug 20, 2019

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