Akash Saxena May 2, 2020

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Akash Saxena Apr 30, 2020

चैटिगँ छोडकर इस पोस्ट को जरूर पढेँ वर्ना सारी जिन्दगी चैट ही करते रह जाओग... 1378 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम है इरान. 1761 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम है अफगानिस्तान. 1947 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम है पाकिस्तान. 1971 मेँ भारत से एक हिस्सा अलग हुआ, इस्लामिक राष्ट्र बना - नाम हैँ बांग्लादेश. 1952 से 1990 के बीच भारत का एक राज्य इस्लामिक हो गया - नाम है कशमीर... और अब उत्तरप्रदेश, आसाम और केरला इस्लामिक राज्य बनने की कगार पर है ! और हम जब भी हिँदुओँ को जगाने की बात करते हैँ, सच्चाई बताते हैँ तो कुछ लोग हमेँ RSS, VHP और SHIV-SENA, BJP वाला कहकर पल्ला झाङ लेते हैँ ! वन्दे मातरम हाल की दो महत्वपूर्ण घटनाओ को देश ने जरूर देखा होगा -- ( 1 ) उपराष्ट्रपति हमीद अंसारी ने अपने धर्म के महत्व को समझते हुए दशहरा उत्सव के दौरान आरती उतारने से मना कर दिया क्योकि इस्लाम मे ये करना "मना" है । ( 2 ) टी॰वी॰ सीरियल बिग बॉस की एक प्रतियोगी गौहर खान ने दुर्गा पुजा करने से मना कर दिया और वो दूर खड़ी रहकर देखती रही, जबकि ये एक कार्य था जिसे करना सभी प्रतियोगी के लिए जरूरी था लेकिन गौहर खान ने इस कार्य को करने से साफ मना कर दिया क्योकि इस्लाम मे ये करना "मना" है । मित्रो इन दोनों ( हमीद अंसारी व गौहर खान ) को मेरा साधुवाद क्योकि दोनों ने किसी कीमत पर भी अपने धर्म से समझौता नहीं किया, चाहे इसके लिए कितनी बड़ी कीमत भी क्यो न चुकनी पड़े । ये घटना उन तथाकथित "सेकुलर" हिन्दुओ के मुह पर जोरदार तमाचा है जो कहते फिरते है की कभी "टोपी" भी पहननी पड़ती है तो कभी "तिलक" भी लगाना पड़ता है... इस घटना मे मीडिया का मौन रहना सबसे ज्यादा अचरज का विषय है क्योकि सबसे ज्यादा हाय तौबा यही मीडिया वाले मचाते रहे है जब नरेंद्र मोदी जी ने मुल्ला टोपी पहनने से इनकार कर दिया था । उदाहरण लेना है तो मुस्लिम समुदाय के लोगो से सीखो जो अपने धर्म के लिए बड़ी से बड़ी कीमत चुकाने को तैयार रहते है, पर अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं कर सकते । वही हमारे हिन्दू लोग "कायरता" का दूसरा रूप "सेकुलर" होने का झूठा दिखावा करने से बाज नहीं आते । इस को गौर से एक बार पढ़ लो... अमल करो मत करो आप लोगो की मर्जी... मैंने 10 लोगो को जो की हिन्दू है उनसे पुछा... किस जाती के हो...? सभी ने अलग अलग जवाब दिया... किसी ने कहा राजपूत किसी ने कहा बामण किसी ने कहा जाट किसी ने जैन तो किसी ने अग्रवाल... सब अलग अलग । लेकीन मैने 10 मुसलमानो को पूछा की कौन सी जाती के हो ? सभी का एक जवाब आया, "मुसलमान" । मूझे अजीब लगा मैने फिर से पूछा फिर वही जवाब आया, "मुसलमान" । तब मुझे बड़ा अफसोस हुआ और लगा हम कीतने अलग और वो कितने एक... कुछ समझ मै आया हो तो आगे से कोई पूछे तो एक ही जवाब आना चाहीये 🚩॥ हिन्दू ॥🚩 और गर्व करते हो "हिन्दू" होने का तो इस मैसेज को इतना फैला दो यह मैसेज मूझे वापस किसी हिन्दू से ही मिले...! पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट में एक मुस्लिम भाई ने जनहित याचिका डाली थी कि पडोसी मुल्क में हज करने के लिए सब्सिडी मिलती है तो हमें भी मिलनी चाहिए. पाकिस्तान कोर्ट ने जनहित याचिका रिजेक्ट करते हुये कहा कि कुरान और हदीसे के हिसाब से हज पसीने की कमाई से करना पड़ता है ! दूसरों की कमाई से नहीं ! सब्सिडी इस्लाम के खिलाफ है ! पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से भारतीय मुसलमानों को मिल रही सब्सिडी हराम है क्या नेता इस पर कुछ टिप्पणी देंगे ? अजीब कानून है भैया, गाय का चारा खाया तो जेल भेज दिया और जो गाय को खा रहा है उसको हज के लिए भेजते हो... ये जो नीचे लिखा है वो कोई मज़ाक नहीं है... कल ये आपके सहर में भी हो सकता है... अगर ये अमेरिका, जापान या फिर चाइना में हुवा होता तो इन शांति प्रिय मजहब वालों को काट कर गटर में फेंक देते... कुछ दिन पहले NDTV के रवीश कुमार ने... RSS के सिन्हा सर से तल्ख़ मुद्रा में पूछा था कि अगर देश में मुस्लिम ज्यादा हो जायेंगें तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ??? - इसका एक प्रायोगिक उत्तर कल के एक वाकये ने दिया मुस्लिम बाहुल्य "काश्मीर विश्वविद्यालय" में एक फिल्म "हैदर" की शूटिंग चल रही थी उसके एक दृश्य के फिल्मांकन के लिए तिरंगा झंडा लगाया गया और कलाकारों को जय हिंद बोलना पड़ा | इतना होना था कि विश्वविद्यालय के छात्र उस यूनिट पर टूट पड़े फिल्म का सेट तोड़ दिया गया | काफी जद्दोजहद के बाद फिल्म के कलाकारों को बाहर निकाला जा सका | तिरंगे से उनकी नफरत और जय हिंद पर आपत्ति इस सबका कारण थी | पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन कालेज प्रशासन के कहने पर छोड़ दिया गया | ध्यान रहे वो अनपढ़ लोग नहीं विश्वविद्यालय के छात्र थे ! हाथ जोड़ के विनंती है इसे शेयर करें ये कोई छोटी खबर नहीं है ये हमारे देश की सम्मान की बात है... एक सुन्दर संवाद : एक बार ज़रूर पढ़ेँ बी एस सी का छात्र... कॉलेज का पहला दिन... (गले में बड़े बड़े रुद्राक्ष की माला) . प्रोफेसर : बड़े पंडित दिखाई देते हो लेकिन कॉलेज में पढाई लिखाई पर ध्यान दो पूजा पाठ घर में ही ठीक है !! (क्लास के सभी बच्चे ठहाका लगाते है ) . छात्र (विनम्रता से) : सर आप मेरे गुरु है और सम्माननीय भी इसलिए आपकी आज्ञा से ही कुछ कहना चाहूँगा | . शिक्षक कहते है : बोलो... . छात्र : सर ऐसे छोटे कॉलेज छोडिये, जब आई आई टी और मेडिकल कॉलेज तक में एक मुस्लिम छात्र दाढ़िया बढाकर या टोपी चढाकर जाते है और कितनी भी बड़ी लेक्चर हो क्लास छोड़कर namaz के लिए बाहर निकल जाते है तो शिक्षक को वो धर्मनिष्ठता लगता है जब क्रिस्चन छात्र गले में बड़े क्रौस लटकाकर घूमते है तो वो धर्मनिष्ठता है और ये उनके मजहब की बात हुई और आज आपके सामने इसी क्लास में कितने ही लड़कियों ने बुर्खा पहना है और कितने ही बच्चो ने जालि-टोपी चढा रखा है तो आपने उन्हें कुछ नहीं कहा तो आखिर मेरी गलती क्या है ??? क्या बस इतना की मै एक हिंदू हूँ ??? शिक्षक क्लास छोड़कर बाहर चला गया... आँखो से पर्दा हटाओ दोस्तो और मशाल जलाओ । ज्यादा से ज्यादा शेयर करो मित्रो और ये पोस्ट पूरी whats app पर फैलानी है । जय हिन्द...!!! 1 मिनट चैटिगँ छोडकर इस पोस्ट को जरूर पढेँ वर्ना सारी जिन्दगी चैट ही करते रह जाओगे..

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Akash Saxena Apr 30, 2020

👉हमने लिखने में 35 मिनट खर्च किया है उम्मीद है आप पढ़ने में 3 मिनट जरूर दे सकते हैं। आप में से शायद कई लोगों ने #बेनी_हिन् का नाम पहले कभी नहीं सुना होगा, क्यूँकि हम अधिकतर वही सुनना और देखना पसंद करते हैं जो हमें दिखाया जाता है.. उसके आगे न हम देखना चाहते हैं और न हमें उससे कुछ मतलब है...अपनी जिन्दगी चलती रहे, भाड़ में जाए दुनियादारी... हमें PK दिखाई गई, हमें ‘ओह माय गॉड’ दिखाई गईं, हम खुश रहें और हमने इन पिक्चरों को सुपरहिट बना दिया... 1995-1996 के समय भारत में #Faith_Healing के नाम पर दो बड़े शहर दिल्ली और बेंगलोर में एक अनूठे शो का आयोजन किया गया ; आयोजन भी कोई छोटा-मोटा नहीं, बेंगलोर सहित कर्नाटक में तत्कालीन मुख्यमंत्री #देवेगोड़ा की सरकार ने तथा दिल्ली में तत्कालीन प्रधानमंत्री #नरसिम्हा राव की सरकार ने इसका जबरदस्त प्रचार-प्रसार किया... शो में Faith-Healer के रूप में जीसस के दूत- बेनी हिन् आया और मंच पर कई-कई गंभीर बीमारियों वाले मरीजों को बेनी हिन् ने हाथ रखते से ही एकदम ठीक कर दिया... ● बंगलोर के शो में तो कर्नाटक का मुख्यमंत्री देवगोडा बेनी हिन् के पैरों में गिर गया था । कई मरीज स्टेज पर आये, किसी को ब्लड कैंसर था, किसी को आर्थराइटिस था, कोई जन्म से ही विकलांग था तो कोई ब्रेन-ट्यूमर के कारण परेशान था...यह सारे मरीज बेनी हिन् द्वारा अमेरिका से इम्पोर्ट किये गये थें... और जैसे ही बेनी हिन् का हाथ लगता है, चमत्कार होता है और विकलांग चलने लगता है, जिसे आर्थराइटिस थी उसके पैरों का दर्द गायब हो जाता है, ट्यूमर वाले को अपना सिर कुछ हल्का सा लगने लगता है... सारा जनसमूह बेनी हिन् के चमत्कारों ( दिखावे ) से अचम्भित हो जाता है और लगातार तालियों से उसका उत्साहवर्धन करता है... बेनी-हिन् अंतिम समय में लोगों से कहता है कि आपको कोई डाउट या समस्या हो तो आप पूछ सकते हैं...तभी... भीड़ में से एक व्यक्ति खड़ा होता है और सवाल पूछने की अनुमति चाहता है... बेनी हिन् – आपका नाम क्या है #Jesus_boy...? व्यक्ति – मेरा नाम “#राजीव_दीक्षित” है और मैं कोई Jesus-boy नहीं, मैं एक सनातनी #हिन्दू हूँ... बेनी हिन् – अपना सवाल पूछिए, क्या आपको भी कोई बीमारी अथवा समस्या है...? व्यक्ति – जी नहीं, मुझे कोई बीमारी नहीं है... पर आपके #ईसाई धर्म ( तथाकथित ) का जो दुनिया का सबसे बड़ा अधिकारी है पॉप, उसे दुनिया की सबसे खतरनाक बीमारी है #पार्किन्सन, तो मेरी आपसे प्रार्थना है कि उसकी बीमारी दुनिया के बड़े से बड़े डॉक्टर ठीक नहीं कर पा रहे हैं तो आप अगली फ्लाइट पकड़ कर सीधा #वैटिकन सिटी जाइए और सबसे पहले अपने पॉप पर हाथ रखकर उसे ठीक कीजिये... बेनी हिन् – This is an Absurd question, यह एक बेहूदा सवाल है... व्यक्ति – हाँ, यह बेहूदा सवाल है, पर मेरे लिए नहीं आपके लिए... यदि आप किसी को भी केवल हाथ लगाकर ठीक कर सकते हो तो सबसे पहले पॉप को ठीक करो जिससे आपको अपने ईसाई धर्म ( तथाकथित ) को फ़ैलाने और आगे बढाने में मदद मिलेगी...।। सारे शो में उथल-पुथल मच गई, लोग बेनी हिन् को फर्जी-फर्जी चिल्लाकर इधर उधर भागने लगें और उस दिन उस राजीव दीक्षित नाम के व्यक्ति ने कई हज़ार हिन्दुओं को एक झटके में ईसाई बनने से बचा लिया... उस शो के बाद भी बेनी हिन् के कई शो हुए, पर हर जगह राजीव दीक्षित जैसे व्यक्ति का होना मुश्किल होता है, उस शो के बाद बेनी हिन् के बहकावे में आकर कई लोग अपना धर्म छोड़ Faith-Healing के नाम पर ईसाई बन गएं...हमारे भारत में कई अंधश्रद्धा-निर्मूलन संस्थाएं चलती हैं जिनका एक ही उद्देश्य रहता है कि हिन्दू धर्म के संत, हिन्दू धर्म के शंकराचार्य, हिन्दू धर्म के पंडित जो कुछ करें उसे अंधश्रद्धा घोषित कर उसका विरोध करो... और दूसरे धर्म के प्रचारक कितनी भी अंधश्रद्धा फैलाएं, कितने भी Faith-Healing जैसे शो करें पर उनका कोई भी विरोध, उनके Rules के खिलाफ रहता है... हिन्दू धर्म के कर्मकांडों का मजाक उड़ाने भारत में PK जैसी फिल्में बनाई जाती हैं और दुर्भाग्यवश हम सब के कारण वो भारत की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन जाती है... हम मूर्खता में आकर इतने अंधे हो जाते हैं कि हमें गौमाता को घास खिलाना तक ‘Wrong Number’ दिखाई देने लगता है... बेनी हिन् आज हार्ट की बीमारी के चलते कई अस्पतालों से इलाज करवा रहा है और 1995 के उस शो से लेकर आज तक जितने लोग भारत में उसके Faith-Healing नामक झांसे का शिकार बन उसके द्वारा ईसाई बने, वो आज अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। इसीलिए मैं आप सभी बन्धुओं से ये निवेदन करता हूँ कि अपना धर्म कभी न त्यागें। और सदैव अपने साधु-संतों की इज़्ज़त करें।। 1 शेयर कर दें तो लिखना सार्थक हो जाये🙏

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Akash Saxena Apr 20, 2020

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Akash Saxena Apr 10, 2020

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Akash Saxena Apr 8, 2020

मातावैष्णो देवी और भैरोंनाथ की कथा ? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हिंदू महाकाव्य के अनुसार, मां वैष्णो देवी ने भारत के दक्षिण में रत्नाकर सागर के घर जन्म लिया। उनके लौकिक माता-पिता लंबे समय तक निःसंतान थे। दैवी बालिका के जन्म से एक रात पहले, रत्नाकर ने वचन लिया कि बालिका जो भी चाहे, वे उसकी इच्छा के रास्ते में कभी नहीं आएंगे। मां वैष्णो देवी को बचपन में त्रिकुटा नाम से बुलाया जाता था। बाद में भगवान विष्णु के वंश से जन्म लेने के कारण वे वैष्णवी कहलाईं। जब त्रिकुटा 9 साल की थीं, तब उन्होंने अपने पिता से समुद्र के किनारे पर तपस्या करने की अनुमति चाही। त्रिकुटा ने राम के रूप में भगवान विष्णु से प्रार्थना की. सीता की खोज करते समय श्री राम अपनी सेना के साथ समुद्र के किनारे पहुंचे। उनकी दृष्टि गहरे ध्यान में लीन इस दिव्य बालिका पर पड़ी। त्रिकुटा ने श्री राम से कहा कि उसने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया है। श्री राम ने उसे बताया कि उन्होंने इस अवतार में केवल सीता के प्रति निष्ठावान रहने का वचन लिया है। लेकिन भगवान ने उसे आश्वासन दिया कि कलियुग में वे कल्कि के रूप में प्रकट होंगे और उससे विवाह करेंगे। इस बीच, श्री राम ने त्रिकुटा से उत्तर भारत में स्थित माणिक पहाड़ियों की त्रिकुटा श्रृंखला में अवस्थित गुफ़ा में ध्यान में लीन रहने के लिए कहा.रावण के विरुद्ध श्री राम की विजय के लिए मां ने 'नवरात्र' मनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी. त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी। समय के साथ-साथ, देवी मां के बारे में कई कहानियां उभरीं. ऐसी ही एक कहानी है श्रीधर की. श्रीधर मां वैष्णो देवी का प्रबल भक्त थे। वे वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित हंसली गांव में रहता थे। एक बार मां ने एक मोहक युवा लड़की के रूप में उनको दर्शन दिए। युवा लड़की ने विनम्र पंडित से 'भंडारा' (भिक्षुकों और भक्तों के लिए एक प्रीतिभोज) आयोजित करने के लिए कहा. पंडित गांव और निकटस्थ जगहों से लोगों को आमंत्रित करने के लिए चल पड़े. उन्होंने एक स्वार्थी राक्षस 'भैरव नाथ' को भी आमंत्रित किया। भैरव नाथ ने श्रीधर से पूछा कि वे कैसे अपेक्षाओं को पूरा करने की योजना बना रहे हैं। उसने श्रीधर को विफलता की स्थिति में बुरे परिणामों का स्मरण कराया. चूंकि पंडित जी चिंता में डूब गए, दिव्य बालिका प्रकट हुईं और कहा कि वे निराश ना हों, सब व्यवस्था हो चुकी है। उन्होंने कहा कि 360 से अधिक श्रद्धालुओं को छोटी-सी कुटिया में बिठा सकते हो. उनके कहे अनुसार ही भंडारा में अतिरिक्त भोजन और बैठने की व्यवस्था के साथ निर्विघ्न आयोजन संपन्न हुआ। भैरव नाथ ने स्वीकार किया कि बालिका में अलौकिक शक्तियां थीं और आगे और परीक्षा लेने का निर्णय लिया। उसने त्रिकुटा पहाड़ियों तक उस दिव्य बालिका का पीछा किया। 9 महीनों तक भैरव नाथ उस रहस्यमय बालिका को ढूँढ़ता रहा, जिसे वह देवी मां का अवतार मानता था। भैरव से दूर भागते हुए देवी ने पृथ्वी पर एक बाण चलाया, जिससे पानी फूट कर बाहर निकला. यही नदी बाणगंगा के रूप में जानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि बाणगंगा (बाण: तीर) में स्नान करने पर, देवी माता पर विश्वास करने वालों के सभी पाप धुल जाते हैं। नदी के किनारे, जिसे चरण पादुका कहा जाता है, देवी मां के पैरों के निशान हैं, जो आज तक उसी तरह विद्यमान हैं। इसके बाद वैष्णो देवी ने अधकावरी के पास गर्भ जून में शरण ली, जहां वे 9 महीनों तक ध्यान-मग्न रहीं और आध्यात्मिक ज्ञान और शक्तियां प्राप्त कीं. भैरव द्वारा उन्हें ढूंढ़ लेने पर उनकी साधना भंग हुई। जब भैरव ने उन्हें मारने की कोशिश की, तो विवश होकर वैष्णो देवी ने महा काली का रूप लिया। दरबार में पवित्र गुफ़ा के द्वार पर देवी मां प्रकट हुईं. देवी ने ऐसी शक्ति के साथ भैरव का सिर धड़ से अलग किया कि उसकी खोपड़ी पवित्र गुफ़ा से 2.5 कि॰मी॰ की दूरी पर भैरव घाटी नामक स्थान पर जा गिरी. भैरव ने मरते समय क्षमा याचना की। देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी। उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान भी दिया कि भक्त द्वारा यह सुनिश्चित करने के लिए कि तीर्थ-यात्रा संपन्न हो चुकी है, यह आवश्यक होगा कि वह देवी मां के दर्शन के बाद, पवित्र गुफ़ा के पास भैरव नाथ के मंदिर के भी दर्शन करें.इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था। अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे। उन्होंने कई विधियों से 'पिंडों' की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली। देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं. वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया. तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जनजागृति हेतु संदेश को साझा अवश्य करें...!!⛳ *वन्दे मातरम्*🚩

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Akash Saxena Apr 8, 2020

देवी की पूजा में ज्योति क्यों जगायी जाती है ? बह् वृचोपनिषद् में कहा गया है–‘सृष्टि के आदि में एक देवी ही थी, उसने ही ब्रह्माण्ड उत्पन्न किया; उससे ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र उत्पन्न हुए । अन्य सब कुछ उससे ही उत्पन्न हुआ । वह ऐसी पराशक्ति (महाशक्ति) है ।’ सारा जगत अनादिकाल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्ति की उपासना में लगा हुआ है । महाशक्ति ही सर्वोपरि है । ब्रह्म भी शक्ति के साथ पूजे जाते हैं । जैसे पुष्प से गंध अलग नहीं की जा सकती है, गंध ही चारों ओर फैल कर पुष्प का परिचय कराती है; उसी तरह शक्ति ही ब्रह्म का बोध कराती है । सभी जगह शक्ति का ही आदर और बोलबाला है क्योंकि शक्तिहीन वस्तु जगत में टिक ही नहीं सकती है । देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी ने धारण किया ज्योति-अवतार!!!!!!! देवी (माता) की पूजा में ज्योति जगाने (जलाने) का सम्बन्ध देवी के ज्योति-अवतार से है । देवी के ज्योति-अवतार की कथा इस प्रकार से है— एक बार देवताओं और दैत्यों में युद्ध छिड़ गया । इस युद्ध में देवता विजयी हुए । इससे देवताओं के मन में अहंकार हो गया । सभी देवता अपने मन में कहते—‘यह विजय मेरे कारण हुई है, यदि मैं न होता तो विजय नहीं हो सकती थी ।’ मां जगदम्बा बड़ी कृपालु हैं । वे देवताओं के अहंकार को समझ गयीं । उनको पता था कि यह अहंकार देवताओं को ‘देवता’ नहीं रहने देगा । अहंकार के कारण ही असुर ‘असुर’ कहलाते हैं । देवताओं में वही अहंकार जड़े जमा रहा है, इसके कारण संसार को फिर कष्ट का सामना करना पड़ेगा। देवताओं के अहंकार के नाश के लिए देवी एक ऐसे तेज:पुंज के रूप में उनके सामने प्रकट हो गयीं, वैसा तेज:पुंज आज तक किसी ने देखा न था । उस तेज:पुंज को देखकर सभी देवता हक्के-बक्के रह गये और एक-दूसरे से पूछने लगे—‘यह क्या है ? देवताओं को आश्चर्यचकित करने वाली यह माया किसके द्वारा रची गयी है ?’ भ्रमित हुए देवराज इन्द्र ने वायुदेव को उस तेज:पुंज के बारे में पता लगाने के लिए भेजा । घमण्ड से भरे हुए वायुदेव ने उस तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने पूछा—‘तुम कौन हो ?’ वायुदेव ने कहा—‘मैं वायु हूँ । मातरिश्वा हूँ । सबका प्राणस्वरूप हूँ । मैं ही सम्पूर्ण जगत का संचालन करता हूँ ।’ तेज:पुंज ने वायुदेव के सामने एक तिनका रखकर कहा—‘यदि तुम सब कुछ संचालन कर सकते हो तो इस तिनके को चलाओ ।’ वायुदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर तिनका टस-से-मस न हुआ । वे लज्जित होकर इन्द्रदेव के पास लौट आए और कहने लगे कि ‘यह कोई अद्भुत शक्ति है, इसके सामने तो मैं एक तिनका भी न उड़ा सका ।’ देवराज इन्द्र ने फिर अग्निदेव को बुलाकर कहा—‘अग्निदेव ! चूंकि आप ही हम लोगों के मुख हैं इसलिए वहां जाकर यह मालूम कीजिए कि ये तेज:पुंज कौन है ? ‘ इन्द्र के कहने पर अग्निदेव तेज:पुंज के पास गए । तेज:पुंज ने अग्निदेव से पूछा —‘तुम कौन हो ? तुममें कौन-सा पराक्रम है, मुझे बतलाओ ?’ अग्निदेव ने कहा—‘ मैं जातवेदा हूँ, अग्नि हूँ । सारे संसार को दग्ध करने की ताकत मुझमें है ।’ तेज:पुंज ने अग्निदेव से उस तिनके को जलाने के लिए कहा । अग्निदेव ने अपनी सारी शक्ति लगा दी पर वे उस तिनके को जला न सके और मुंह लटकाकर इन्द्रदेव के पास लौट आये । तब सभी देवता बोले—‘झूठा गर्व और अभिमान करने वाले हम लोग इस तेज:पुंज को जानने में समर्थ नहीं है, यह तो कोई अलौकिक शक्ति ही प्रतीत हो रही है । इन्द्रदेव ! आप हम सब के स्वामी हैं, अत: आप ही इस तेज:पुंज के बारे में पता लगाइए ।’ तब सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र स्वयं उस तेज:पुंज के पास पहुंचे । इन्द्र के पहुंचते ही वह तेज:पुंज गायब हो गया । यह देखकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए । तेज:पुंज के उनसे बात तक न करने के कारण वे अपने-आप को मन में छोटा समझने लगे । वे सोचने लगे कि अब मैं देवताओं को क्या मुंह दिखाऊंगा । मान ही महापुरुषों का धन है, जब मान ही न रहा तो इस शरीर का त्याग करना ही उचित है । इन्द्रदेव का सारा अहंकार नष्ट हो गया । तभी गगनमण्डल में आकाशवाणी हुई कि—‘इन्द्रदेव ! तुम पराशक्ति का ध्यान करो और उन्हीं की शरण में जाओ ।’ इन्द्रदेव पराशक्ति की शरण में आकर मायाबीज का जप करते हुए ध्यान करने लगे। एक दिन चैत्रमास की नवमी तिथि को मां पराम्बा (महाशक्ति) ने अपना स्वरूप प्रकट किया । वे अत्यन्त सुन्दरी थीं, लाल रंग की साड़ी पहने उनके अंग-अंग से नवयौवन फूट रहा था । उनमें करोड़ों चन्द्रमाओं से बढ़कर आह्लादकता थी । करोड़ों कामदेव उनके रूप पर न्यौछावर हो रहे थे । उन्होंने चमेली की माला व वेणी व लाल चंदन धारण किया हुआ था । देवी बोलीं—‘मैं ही परब्रह्म हूँ, मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही प्रणवरूपिणी हूँ । मेरी ही कृपा और शक्ति से तुम लोगों ने असुरों पर विजय पायी है । मेरी ही शक्ति से वायुदेव बहा करते हैं और अग्निदेव जलाया करते हैं । तुम लोग अहंकार छोड़कर सत्य को जानो ।’ देवी के वचन सुनकर देवताओं को अपनी भूल ज्ञात हो गयी और वे अहंकार रूपी असुर से ग्रस्त होने से बच गये । उन्होंने क्षमा मांगकर देवी से प्रसन्न होने की प्रार्थना की और कहा कि आप हम पर ऐसी कृपा करें कि हममें कभी अहंकार न आए । तब से देवी की पूजा—अष्टमी, नवरात्र व जागरण आदि में माता के ज्योति अवतार के रूप में ज्योति या अखण्ड ज्योति जगायी जाती है । नवरात्र में प्रतिदिन देवी की ज्योति जगाकर उसमें लोंग का जोड़ा, बताशा, नारियल की गिरी, घी, हलुआ-पूरी आदि का भोग लगाया जाता है । तेरी ज्योति में वो जादू है, तकदीर बना देती है, जगमग जगती जब ज्योति तेरी, अंधकार मिटा देती है ।। जनजागृति हेतु संदेश को साझा अवश्य करें...!!⛳ *वन्दे मातरम्*🚩

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Akash Saxena Apr 8, 2020

मृत संजीवनी मंत्र 🌼🍃🌼🍃🌼 हिंदू धर्म में दो मंत्रों महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी भारी महिमा बताई गई हैं। कहा जाता है कि इन दोनों मंत्रों में किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवन की बड़ी से बड़ी इच्छा को पूरा किया जा सकता है चाहे वो अमीर आदमी बनने की इच्छा हो या अपना पूरा भाग्य ही बदलना हो। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मुर्दा को भी जिंदा करना संभव है बशर्ते गुरू से इसका सही प्रयोग सीख लिया जाए। हालांकि भारतीय ऋषि-मुनि इस मंत्र के जाप के लिए स्पष्ट रूप से मना भी करते हैं। क्या है महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्रयंबकंयजामहे ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना निम्न रूप में की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सकें। महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें (1) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं। (2) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। (3) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए। (4) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए। (5) जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए। महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप का अभ्यास केवल गुरु के सानिध्य में ही करना चाहिये। आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। नतीजतन आदमी या तो कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। इसीलिए इन सभी चीजों से बचने के लिए इस मंत्र की साधना किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए। मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् सानुवाद 〰🍃〰🍃〰🍃〰🍃〰 एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं ।मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥१॥ गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकरकी विधिपूर्वक आराधना करनेके पश्र्चात भक्तको सदा मृतसञ्जीवन नामक कवचका सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये ॥१॥ सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ २॥ महादेव भगवान् शङ्करका यह मृतसञ्जीवन नामक कवचका तत्त्वका भी तत्त्व है, पुण्यप्रद है गुह्य और मङ्गल प्रदान करनेवाला है ॥२॥ समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥३॥ [आचार्य शिष्यको उपदेश करते हैं कि – हे वत्स! ] अपने मनको एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवचको सुनो । यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है । इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना ॥३॥ वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः । मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥४॥ जरासे अभय करनेवाले, निरन्तर यज्ञ करनेवाले, सभी देवतओंसे आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव ! आप पर्व-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥४॥ दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥५॥ अभय प्रदान करनेवाली शक्तिको धारण करनेवाले, तीन मुखोंवाले तथा छ: भुजओंवाले, अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥५॥ अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥६॥ अट्ठारह भुजाओंसे युक्त, हाथमें दण्ड और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिण-दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥६॥ खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥७॥ हाथमें खड्ग और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, धैर्यशाली, दैत्यगणोंसे आराधित रक्षोरुपी महेश नैर्ऋत्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥७॥ पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः । वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥८॥ हाथमें अभयमुद्रा और पाश धाराण करनेवाले, शभी रत्नाकरोंसे सेवित, वरुणस्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम- दिशामें मेरी सदा रक्षा करें ॥८॥ गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥९॥ हाथोंमें गदा और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, प्राणोमके रक्षाक, सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्यकोणमें मेरी सदा रक्षा करें ॥९॥ शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥१०॥ हाथोंमें शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओंके मध्यमें मेरी रक्षा करें ॥१०॥ शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥११॥ हाथोंमें शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले, सभी विद्याओंके स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें ॥११॥ ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु । शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥१२॥ ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभागमें तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभागमें मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिरकी और चन्द्रशेखर मेरे ललाटकी रक्षा करें ॥१२॥ भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥१३॥ मेरे भौंहोंके मध्यमें सर्वलोकेश और दोनों नेत्रोंकी त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौंहोंकी रक्षा गिरिश एवं दोनों कानोंको रक्षा भगवान् महेश्वर करें ॥१३॥ नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥१४॥ महादेव मेरी नासीकाकी तथा वृषभध्वज मेरे दोनों ओठोंकी सदा रक्षा करें । दक्षिणामूर्ति मेरी जिह्वाकी तथा गिरिश मेरे दाँतोंकी रक्षा करें ॥१४॥ मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥१५॥ मृत्युञ्जय मेरे मुखकी एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठकी रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथोंकी तथा त्रिशूली मेरे हृदयकी रक्षा करें ॥१५॥ पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः । नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥१६॥ पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनोकी और जगदीश्वर मेरे उदरकी रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभिकी और पार्वतीपति पार्श्वभागकी रक्षा करें ॥१६॥ कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः । गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥१७॥ गिरीश मेरे दोनों कटिभागकी तथा प्रमथाधिप पृष्टभागकी रक्षा करें । महेश्वर मेरे गुह्यभागकी और भैरव मेरे दोनों ऊरुओंकी रक्षा करें ॥१७॥ जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥१८॥ जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनोंकी, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघोकी तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरोंकी रक्षा करें ॥१८॥ गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥१९॥ गिरीश मेरी भार्याकी रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रोंकी रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयुकी गणनायक मेरे चित्तकी रक्षा करें ॥१९॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥२०॥ कालोंके काल सदाशिव मेरे सभी अंगोकी रक्षा करें । [ हे वत्स ! ] देवताओंके लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवचका वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥२०॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥२१॥ महादेवजीने मृतसञ्जीवन नामक इस कवचको कहा है । इस कवचकी सहस्त्र आवृत्तिको पुरश्चरण कहा गया है ॥२१॥ यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥२२॥ जो अपने मनको एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथावा दूसरोंको सुनाता है, वह अकाल मृत्युको जीतकर पूर्ण आयुका उपयोग करता है ॥ २२॥ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥२३॥ जो व्यक्ति अपने हाथसे मरणासन्न व्यक्तिके शरीसका स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवचका पाठ करता है, उस आसन्नमृत्यु प्राणीके भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होतीं ॥२३॥ कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥२४॥ यह मृतसञ्जीवन कवच कालके गालमें गये हुए व्यक्तिको भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणोंसे युक्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है ॥२४॥ युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं । युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥२५॥ युद्ध आरम्भ होनेके पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवचका २८ बार पाठ करके रणभूमिमें उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुऔंसे अदृश्य रहता है ॥२५॥ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥२६॥ यदि देवतऔंके भी साथ युद्ध छिड जाय तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है ॥२६॥ प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं । अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥२७॥ जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोकमें भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥२७॥ सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥२८॥ वह सम्पूर्ण व्याधियोंसे मुक्त हो जाता है, सब प्रकारके रोग उसके शरीरसे भाग जाते हैं । वह अजर-अमर होकर सदाके लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥२८॥ विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥२९॥ इस लोकमें दुर्लभ भोगोंको प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करता रहता है । इसलिये इस महागोपनीय कवचको मृतसञ्जीवन नामसे कहा है ॥२९॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥३०॥ यह देवतओंके लिय भी दुर्लभ है ॥३०॥ ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥ 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 जनजागृति हेतु संदेश को साझा अवश्य करें...!!⛳ *वन्दे मातरम्*🚩

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