Aghori Ram May 28, 2020

चंद्रज्योत्सना अप्सरा साधना प्रयोग उच्चकोटि कि अप्सराओं कि श्रेणी में चंद्रज्योत्सना का प्रथम स्थान है, जो शिष्ट और मर्यादित मणि जाती है, सौंदर्य कि दृष्टि से अनुपमेय कही जा सकती है | शारीरिक सौंदर्य वाणी कि मधुरता नृत्य, संगीत, काव्य तथा हास्य और विनोद यौवन कि मस्ती, ताजगी, उल्लास और उमंग ही तो चंद्रज्योत्सना है | जिसकी साधना से वृद्ध व्यक्ति भी यौवनवान होकर सौभाग्यशाली बन जाता है | जिसकी साधना से योगी भी अपनी साधनाओं में पूर्णता प्राप्त करता है | अभीप्सित पौरुष एवं सौंदर्य प्राप्ति के लिए प्रतेक पुरुष एवं नारी को इस साधना में अवश्य रूचि लेनी चाहिए | सम्पूर्ण प्रकृति सौंदर्य को समेत कर यदि साकार रूप दिया तो उसका नाम चंद्रज्योत्सना होगा | सुन्दर मांसल शारीर, उन्नत एवं सुडौल वक्ष: स्थल, काले घने और लंबे बाल, सजीव एवं माधुर्य पूर्ण आँखों का जादू मन को मुग्ध कर देने वाली मुस्कान दिल को गुदगुदा देने वाला अंदाज यौवन भर से लदी हुई चंद्रज्योत्सना बड़े से बड़े योगियों के मन को भी विचिलित कर देती है | जिसकी देह यष्टि से प्रवाहित दिव्य गंध से आकर्षित देवता भी जिसके सानिध्य के लिए लालायित देखे जाते हैं | सुन्दरतम वर्स्त्रलान्कारों से सुसज्जित, चिरयौवन, जो प्रेमिका या प्रिय को रूप में साधक के समक्ष उपस्थित रहती है | साधक को सम्पूर्ण भौतिक सुख के साथ मानसिक उर्जा, शारीरिक बल एवं वासन्ती सौंदर्य से परिपूर्ण कर देती है | इस साधना के सिद्ध होने पर वह साधक के साध छाया के तरह जीवन भर सुन्दर और सौम्य रूप में रहती है तथा उसके सभी मनोरथों को पूर्ण करने में सहायक होती है | चंद्रज्योत्सना साधना सिद्ध होने पर सामने वाला व्यक्ति स्वंय खिंचा चला आये यही तो चुम्बकीय व्यक्तिव है| साधना से साधक के शरीर के रोग, जर्जरता एवं वृद्धता समाप्त हो जाती है | यह जीवन कि सर्वश्रेष्ठ साधना है | जिसे देवताओं ने सिद्ध किया इसके साथ ही ऋषि मुनि, योगी संन्यासी आदि ने भी सिद्ध किया इस सौम्य साधना को | इस साधना से प्रेम और समर्पण के कला व्यक्ति में स्वतः प्रस्फुरित होती है | क्योंकि जीवन में यदि प्रेम नहीं होगा तो व्यक्ति तनावों में बिमारियों से ग्रस्त होकर समाप्त हो जायेगा | प्रेम को अभिव्यक्त करने का सौभाग्य और सशक्त माध्यम है चंद्रज्योत्सना साधना | जिन्होंने चंद्रज्योत्सना साधना नहीं कि है, उनके जीवन में प्रेम नहीं है, तन्मयता नहीं है, प्रस्फुल्लता भी नहीं है | साधना विधि सामग्री – प्राण प्रतिष्ठित चंद्रज्योत्सनात्कीलन यंत्र, चंद्रज्योत्सना माला, सौंदर्य गुटिका | यह रात्रिकालीन २७ दिन कि साधना है | इस साधना को किसी भी पूर्णिमा को, शुक्रवार को अथवा किसी भी विशेष दिन प्रारम्भ करें | साधना प्रारम्भ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि स्नान आदि से निवृत होकर अपने सामने चौकी पर गुलाबी वस्त्र बिछा लें, पीला या सफ़ेद किसी भी आसान पर बैठे, आकर्षक और सुन्दर वस्त्र पहनें | पूर्व दिशा कि ओर मुख करके बैठें | घी का दीपक जला लें | सामने चौकी पर एक थाली या पलते रख लें, दोनों हाथों में गुलाब कि पंखुडियां लेकर रम्भा का आवाहन करें | || ओम ! चंद्रज्योत्सने अगच्छ पूर्ण यौवन संस्तुते || यह आवश्यक है कि यह आवाहन कम से कम १०१ बार अवश्य हो प्रत्येक आवाहन मन्त्र के साथ एक गुलाब के पंखुड़ी थाली में रखें | इस प्रकार आवाहन से पूरी थाली पंखुड़ियों से भर दें | अब अप्सरा माला को पंखुड़ियों के ऊपर रख दें इसके बाद अपने बैठने के आसान पर ओर अपने ऊपर इत्र छिडके | चंद्रज्योत्सनात्कीलन यन्त्र को माला के ऊपर आसान पर स्थापित करें | गुटिका को यन्त्र के दाँयी ओर तथा यन्त्र के बांयी ओर स्थापित करें | सुगन्धित अगरबती एवं घी का दीपक साधनाकाल तक जलते रहना चाहिए | सबसे पहले गुरु पूजन ओर गुरु मन्त्र जप कर लें | फिर यंत्र तथा अन्य साधना सामग्री का पंचोपचार से पूजन सम्पन्न करें |स्नान, तिलक, धुप, दीपक एवं पुष्प चढावें | इसके बाद बाएं हाथ में गुलाबी रंग से रंग हुआ चावल रखें, ओर निम्न मन्त्रों को बोलकर यन्त्र पर चढावें || ॐ दिव्यायै नमः || || ॐ प्राणप्रियायै नमः || || ॐ वागीश्वये नमः || || ॐ ऊर्जस्वलायै नमः || || ॐ सौंदर्य प्रियायै नमः || || ॐ यौवनप्रियायै नमः || || ॐ ऐश्वर्यप्रदायै नमः || || ॐ सौभाग्यदायै नमः || || ॐ धनदायै चंद्रज्योत्सने नमः || || ॐआरोग्य प्रदायै नमः || इसके बाद उपरोक्त चंद्रज्योत्सना माला से निम्न मंत्र का ११ माला प्रतिदिन जप करें | मंत्र : ||ॐ हृीं चंद्रज्योत्सने ! आगच्छ आज्ञां पालय मनोवांछितं देहि ऐं ॐ नमः || प्रत्येक दिन अप्सरा आवाहन करें, ओर हर शुक्रवार को दो गुलाब कि माला रखें, एक माला स्वंय पहन लें, दूसरी माला को रखें, जब भी ऐसा आभास हो कि किसी का आगमन हो रहा है अथवा सुगन्ध एक दम बढने लगे अप्सरा का बिम्ब नेत्र बंद होने पर भी स्पष्ट होने लगे तो दूसरी माला सामने यन्त्र पर पहना दें | २७ दिन कि साधना प्रत्येक दिन नये-नये अनुभव होते हैं, चित्त में सौंदर्य भव भाव बढने लगता है, कई बार तो रूप में अभिवृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है | स्त्रियों द्वारा इस साधना को सम्पन्न करने पर चेहरे पर झाइयाँ इत्यादि दूर होने लगती हैं | साधना पूर्णता के पश्चात मुद्रिका को अनामिका उंगली में पहन लें, शेष सभी सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें | यह सुपरिक्षित साधना है | पूर्ण मनोयोग से साधना करने पर अवश्य मनोकामना पूर्ण होती ही है | निश्चय ही अगर साधना पूर्ण मनोभाव और समर्पण के साथ कि जाये तो साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगते है.और जीवन को एक नविन दिशा मिलती ही है.तो अब देर कैसी आज ही संकल्प ले और साधना के लिए आगे बड़े. चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट (रजि.) किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 28, 2020

आदिशक्ति कामाख्या की साधना मित्रों आज माता आदिशक्ति कामाख्या की साधना बता रहा हु ये साधना हर क्षेत्र मे कार्य पुर्ण करने वाली और प्रेम प्रसंगो मे बहुत लाभ देने वाली है इस साधना को स्त्री पुरुष दोनो कर सकते है . जिसके प्रेम विवाह मे अड़चन आ रही हो पति या पत्नी किसी और के प्रेम मे हो या वैवाहिक जीवन उदासीन हो ऐसे स्त्री पुरुषों के लिए ये साधना बहुत लाभकारी है ये साधना अति तीव्र फल देने वाली है इस साधना मै कोई बंधन नहीं है ना कोई दिनो का बंधन है। बस अपने कार्य का संकल्प करे और माता कामाख्या से प्रार्थना करे कार्य सफलता के लिये . इस मे जाप करते समय अपने सामने केवल शुद्ध घी का दीपक जलाएं और उसमे थोडी शराब मिला ले जाप रात्रि में करना है 10 बजे के बाद या सुबह 4 बजे से या दुपहेर को 1बजे माला मोती की या स्फाटिक की ले दिशा का कोई बंधन नही है ना वस्त्र और ना ही आसन का एक माला मंत्र जप रोज करना है जव तक कार्य मे सफलता ना मिले मंत्र l त्रीं त्रीं त्रीं हूँ हूँ स्त्रीं स्त्रीं कामाख्ये प्रसीद स्त्रीं स्त्रीं हूँ हूँ त्रीं त्रीं त्रीं स्वाहा ll सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट (रजि.) . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 27, 2020

दिव्य अष्टलक्ष्मी मंत्र साधना. हिंदू देवी-देवताओं में श्री लक्ष्मीजी को धन की देवी माना जाता हैं.इस लिये जिन लोगो पर देवी लक्ष्मी की कृपा हो जाती हैं, उन्हें जीवन में कभी किसी तरह के अभावो या कमीयों का सामना नहीं करना पड़ता. व्यक्ति का जीवन सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य से भरा होता हैं. विद्वानो के मतानुशार शास्त्रों में लक्ष्मीजी के आठ रूपो का उल्लेख मिलता हैं.इस लिये जिन लोगो पर अष्ट लक्ष्मी की कृपा हो जाती है. उनका जीवन सभी प्रकार के सुख-समृद्धि-ऎश्चर्य एवं संपन्नता से युक्त रहता हैं.ऎसा शास्त्रोक्त विधान हैं, इस में लेस मात्र संशय नहीं हैं. यदि मनुष्य को जीवन में लक्ष्मी को प्राप्त करना है तो अष्टलक्ष्मी रहस्य जानना आवश्यक है और इनकी उपासना करना आवश्यक है.इसका शास्त्रों में वर्णन एवं मंत्र निम्नलिखित रूप में प्राप्त होते हैं: 1. धन लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की आराधना करने से रूपये पैसे के रूप में लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तथा स्थिति ऐसी बनती है कि रूपये पैसे का आगमन होता है तथा इस रूपये पैसे में बरकत होती है व्यर्थ में व्यय नहीं होता है. 2. यश लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति को समाज में सम्मान, यश, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, इनकी आराधना करने से व्यक्ति में विद्वत्ता, विनम्रता आती है,अन्य लोग जो शत्रुता रखते हो उनका भी व्यवहार प्रेममय हो जाता है. 3. आयु लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति दीर्घायु को प्राप्त करता है और रोगो से बचाव होता है.यदि व्यक्ति सदैव रोगग्रस्त या मानसिक रूप से परेशान हो तो उसे इस लक्ष्मी की आराधना अवश्य करनी चाहिये. 4. वाहन लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस रूप की पूजा करने से व्यक्ति के घर में वाहन इत्यादि रखने की इच्छा पूर्ण होती है. इसी के साथ-साथ इन वाहनों का समुचित प्रयोग भी होता है क्योंकि कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि घर में वाहन तो है पर उनका प्रयोग नहीं हो पाता है. 5. स्थिर लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से घर धन-धान्य से भरा रहता है. वास्तव में यह अन्नपूर्णा देवी की घर में स्थाई निवास की पद्धति है. 6. सत्य लक्ष्मी : लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से मनोनुकूल पत्नी की प्राप्ति होती है या यदि पत्नी पूर्व से हो तो वह व्यक्ति के मनोनुकूल हो जाती है और वह मित्र, सलाहकार बनकर जीवन में पूर्ण सहयोग देती है. 7. संतान लक्ष्मी: इस लक्ष्मी की पूजा करने से संतानहीन दंपत्ति को संतान की प्राप्ति होती है.इसी के साथ-साथ यदि पूर्व से संतान हो पर वह दुष्ट, अशिक्षित, परेशान करने वाली हो तो सुधर जाती है. 8. गृह लक्ष्मी: इस लक्ष्मी की पूजा करने से जिनके पास अपने स्वयं के घर न हो उनको घर की प्राप्ति होती है या घर हो पर उसमे रह न पा रहे हों या उनके निर्माण में कठिनाई हो रही हो इससे मुक्ति मिलती है. शुक्रवार के दिन इन आठों लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हुये प्रत्येक लक्ष्मी मंत्र के 108 पाठ कमलगट्टे की माला से करें.अष्टलक्ष्मी की कृपा वर्ष भर बनी रहेगी. ॐ धनलक्ष्म्यै नम: ॐ यशलक्ष्म्यै नम: ॐ आयुलक्ष्म्यै नम: ॐ वाहनलक्ष्म्यै नम: ॐ स्थिरक्ष्म्यै नम: ॐ सत्यलक्ष्म्यै नम: ॐ संतानक्ष्म्यै नम: ॐ गृहक्ष्म्यै नम: साधना सामग्री:- 1.सिद्ध श्रीयंत्र ,पाट,पीला वस्त्र ,ताम्बे की थाली, गाय के घी के ९(नौ) दीपक, गुलाब अगरबत्ती, लाल/पीले फूलो की माला, पीली बर्फी,शुद्ध अष्टगंध. 2.माला:-स्फटिक/कमलगट्टा. जप संख्या रोज 11 माला जाप 21 दिन करे. 3.आसन:-पीला,वस्त्र पीले,समय शुक्रवार रात नौ बजे के बाद कभी भी. 4.दिशा:-उत्तराभिमुख होकर बैठे. दिव्य अष्टमंत्र मंत्र:- ll ॐ ह्रीं स्थिर अष्टलक्ष्मै स्वाहा ll 5.विधान :- बाजोट पर पिला वस्त्र बिछा कर उस पर सिद्ध श्री यन्त्र स्थापित करे,पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर बैठे श्री यन्त्र पर अष्टगंध का छीट्काव कर खुद अस्ट्गंध का तिलक करे उसके बाद ताम्बे की थाली में गाय के घी से नौ दीपक जलाये,गुलाब अगरबत्ती लगाये,प्रस्साद में पीली बर्फी रखे श्री यन्त्र पर फूल माला चढ़ाये उसके बाद मन्त्र जप करे.और माँ की कृपा को प्राप्त करे ... माँ भगवती आप सभी को सुख समृद्धि से पूर्ण करे..और मंत्र का नित्य जीवन मे 1,3,5,7,9 या 11 बार रोज जाप करते रहे. चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट रजि किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 27, 2020

पारद प्रयोग इतरयोनी बाधा से मुक्ति हेतू पारद प्रयोग यह अनंत ब्रह्माण्ड में हम अकेले नहीं है इस तथ्य को अब विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है. आधुनिक विज्ञान में भी कई प्रकार के परीक्षण इससे सबंधित होने लगे है तथा एसी कई शक्तियां है जिनके बारे में विज्ञान आज भी मौन हो जाता है क्यों की विज्ञान की समज के सीमा के दायरे के बाहर वह कुछ है. खेर, आधुनिक विज्ञान का विकास और परीक्षण अभी कुछ वर्षों की ही देन है लेकिन इस दिशा में हमारे ऋषि मुनियों ने सेंकडो वर्षों तक कई प्रकार के शोध और परिक्षण किये थे तथा सबने अपने अपने विचार प्रस्तुत किये थे, मुख्य रूप से सभी महर्षियों ने स्वीकार किया था की ब्रह्माण्ड में मात्र मनुष्य योनी नहीं है, मनुष्य के अलावा भी कई प्रकार के जिव इस ब्रहमाड में मौजूद है, निश्चय ही मनुष्य से तात्विक द्रष्टि में अर्थात शरीर के तत्वों के बंधारण में ये भिन्न है लेकिन इनका अस्तित्व बराबर बना रहता है. इसी क्रम में मनुष्य के अंदर के आत्म तत्व जब मृत्यु के समय स्थूल शरीर को छोड़ कर दूसरा शरीर धारण कर लेता है तो वह भी मनुष्य से अलग हो जाता है. वस्तुतः प्रेत, भूत, पिशाच, राक्षश, आदि मनुष्य के ही आत्म तत्व के साथ लेकिन वासना और दूसरे शरीरों से जीवित है. इसके अलावा लोक लोकान्तरो में भी अनेक प्रकार के जिव का अस्तित्व हमारे आदि ग्रन्थ स्वीकार करते है जिनमे यक्ष, विद्याधर, गान्धर्व आदि मुख्य है. अब यहाँ पर बात करते है मनुष्य के ही दूसरे स्वरुप की. जब मनुष्य की मृत्यु अत्यधिक वासनाओ के साथ हुई है तब मृत्यु के बाद उसको सूक्ष्म की जगह वासना शरीर की प्राप्ति होती है क्यों की मृत्यु के समय जिव या आत्मा उसी शरीर में स्थित थी. जितनी ही ज्यादा वासना प्रबल होगी मनुष्य की योनी इतनी ही ज्यादा हिन् होती जायेगी. जेसे की भुत योनी से ज्यादा प्रेत योनी हिन् है. यह विषय अत्यंत वृहद है लेकिन यहाँ पर विषय को इतना समजना अनिवार्य है. अब इन्ही वासनाओ की पूर्ति के लिए या अपनी अधूरी इच्छाओ की पूर्ति के लिए ये ये जिव एक निश्चित समय तक एक निश्चित शरीर में घूमते रहते है, निश्चय ही इनकी प्रवृति और मूल स्वभाव हीनता से युक्त होता है और इसी लिए उनको यह योनी भी प्राप्त होती है. कई बार यह अपने जीवन काल के दरमियाँ जो भी कार्यक्षेत्र या निवास स्थान रहा हो उसके आसपास भटकते रहते है, कई बार ये अपने पुराने शत्रु या विविध लोगो को किसी न किसी प्रकार से प्रताडित करने के लिए कार्य करते रहते है. इनमे भूमि तथा जल तत्व अल्प होता है इस लिए मानवो से ज्यादा शक्ति इसमें होती है. कई जीवो में यह सामर्थ्य भी होता है की वह दूसरों के शरीर में प्रवेश कर अपनी वासनाओ की पूर्ति करे. इस प्रकार के कई कई किस्से आये दिन हमारे सामने आते ही रहते है. इन इतरयोनी से सुरक्षा प्राप्ती हेतु तंत्र में भी कई प्रकार के विधान है लेकिन साधक को इस हेतु कई बात विविध प्रकार की क्रिया करनी पड़ती है जो की असहज होती है, साथ ही साथ ऐसे प्रयोग के लिए स्थान जेसे की स्मशान या अरण्य या फिर मध्य रात्री का समय आदि आज के युग में सहज संभव नहीं हो पता. प्रस्तुत विधान एक दक्षिणमार्गी लेकिन तीव्र विधान है जिसे व्यक्ति सहज ही सम्प्पन कर सकता है तथा अपने और अपने घर परिवार के सभी सदस्यों को इस प्रकार की समस्या से मुक्ति दिला सकता है तथा अगर समस्या न भी हो तो भी उससे सुरक्षा प्रदान कर सकता है. यह पारदशिवलिंग से सबंधित भगवान रूद्र का साधना प्रयोग मूलतः इसमें पारद शिवलिंग ही आधार है पुरे प्रयोग का, इस लिए पारद शिवलिंग विशुद्ध पारद से निर्मित हो तथा उस पर पूर्ण तंत्रोक्त प्रक्रिया से प्राणप्रतिष्ठा और चैतन्यकरण प्रक्रिया की गई हो यह नितांत आवश्यक है. अशुद्ध और अचेतन पारद शिवलिंग पर किसी भी प्रकार की कोई भी साधना सफलता नहीं दे सकती है. यह प्रयोग साधक किसी भी सोमवार को कर सकता है. साधक रात्रीकाल में यह प्रयोग करे तो ज्यादा उत्तम है, वैसे अगर रात्री में करना संभव न हो तो इस प्रयोग को दिन में भी किया जा सकता है. साधक स्नान आदि से निवृत हो कर लाल वस्त्रों को धारण करे तथा लाल आसान पर बैठ जाए. साधक का मुख उत्तर की तरफ हो. साधक अपने सामने पारदशिवलिंग को स्थापित करे. साधक गुरु तथा पारद शिवलिंग का पूजन करे तथा गुरुमंत्र का जाप करे और फिरं निम्न मंत्र की ११ माला मंत्र जाप पारदशिवलिंग के सामने करे. यह जाप रुद्राक्ष माला से करना चाहिए. ॐ नमो भगवते रुद्राय भूत वेताल त्रासनाय फट् (OM NAMO BHAGAWATE RUDRAAY BHOOT VETAAL TRAASANAAY PHAT) मंत्र जाप के बाद साधक पारद शिवलिंग को किसी पात्र में रख कर उस पर पानी का अभिषेक उपरोक्त मंत्र को बोलते हुवे करे. यह क्रिया अंदाज़े से १० मिनिट करनी चाहिए. इसके बाद साधक उस पानी को अपने पुरे घर परिवार के सदस्यों पर तथा पुरे घर में छिड़क दे. इस प्रकार यह क्रिया साधक मात्र ३ दिन करे. अगर साधक को कोई समस्या नहीं हो तथा मात्र उपरी बाधा से तथा तंत्र प्रयोग से सुरक्षा प्राप्ति के लिए भी अगर यह प्रयोग करना चाहे तो भी यह प्रयोग किया जा सकता है. माला का विसर्जन करने की आवश्यकता नहीं है, साधक इसका उपयोग कई बार कर सकता है. चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट रजि किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 26, 2020

गृह दोष बाधा निवारण साधना मनुष्य का जीवन निरंतर कम ही होता जा रहा है, इसी में उसे अनेक या बड़े लक्ष्य को प्राप्त करना है और यदि इस लक्ष्य की प्राप्ति में निरंतर बाधाएं, अडचने, कठिनाइयाँ आती रहें तो वह पूर्ण रूप से परगति नहीं कर पाता और जीवन नीरस सा लगने लगता है | पूरी मेहनत और ईमानदारी और लगन से भी कार्य करने पर भी निरंतर असफलता और कभी निराशा का सामना करना पड़े तो जीवन निरर्थक लगने लगता है, प्रत्येक कार्य बनते बनते बिगड़ जाना या घर में रोग, आर्थिक संकट, कोर्ट कचहरी, या अपमान कर्ज आदि समस्याएं जब बढती ही जाए तो समझ लीजिये कि गृह दोष बाधा है, और यदि गृह बाधा है तो तांत्रिक बाधा बड़ी सहजता से संपन्न हो जाती है, क्योंकि ग्रहों का चक्र देखते हुए हि तंत्र क्रियाएं भी संपन्न की जाती हैं | हमरे देश में ही नहीं बल्कि विश्व के सभी देशों में प्राचीनकाल से हि ग्रहों की स्तिथि, गति और प्रभावों की गणना और अध्ययन होता चला आया है और सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि मानव जीवन पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता ही है | कुछ ग्रहों का प्रभाव तो स्पष्ट देखा जा सकता है, जो प्रकृति पर दृष्टिगोचर है, उदाहरन स्वरुप चंद्रमा जल का प्रतिनिधित्व करता है और समुद्र में ज्वारभाटा आना इसका प्रत्यक्ष उदहारण है, और चूँकि मनुष्य के शरीर में अस्सी प्रतिशत जल की मात्रा होती है अतः चन्द्रमा के प्रभाव से उसका उद्वेलन होना भी निश्चित ही है, मानसिक रोगियों पर पूर्णिमा के दिन ज्यादा प्रभाव अनुभव होना, और कई तरह की घटनाओं का घटना चन्द्रम के प्रभाव को स्पष्ट करता है | इसी तरह बाकी ग्रहों का भी प्रभाव मानव जीवन पर किसी न किसी तरह दृष्टिगोचर होता ही है | गृह अशुभ और शुभ प्रभाव देने में समर्थ हैं | जीवन में संकटों का आना या अचानक प्रगति का होना इन्ही ग्रहों के प्रभाव का होना है | इन ग्रहों के कुप्रभावों से बचने के लिए शास्त्रानुसार दो प्रयोग दिये गए हैं, एक तो सम्बंधित गृह का मन्त्र जप या दूसरा सम्बंधित गृह का रत्न या धारण करने का विधान | मेरा अनुभूत प्रयोग है वो ये है--- विधान- ये विधान नौ ग्रहों है इसे किसी भी अमावश्या से कर सकते हैं,अमावश्य के दिन यंत्रो का पूजन कर लें और फिर किसी भी रविवार से प्रारम्भ का सकते हैं या शुक्ल पक्ष के रविवार से प्रारम्भ किया जा सकता है, इस साधना में प्रत्येक गृह के अनुसार मन्त्र जप करने हैं, और वैसे ही वस्त्र धारण करने हैं तथा दिशा, आसन भी तथानुसार होंगे इसलिए इसकी तैयारी भी दो चार दिन पहले ही कर लेना चाहिए | उपयुक्त सामग्री- एक नवग्रह यंत्र, नव रत्न माला/ या नवरत्न अंगूठी/ या नवरत्न लाकेट, साथ ही प्रत्येक जप के लिए तदनुसार माला, वैसे दो या तीन माला तो जरुरी हैं ही साथ ही वस्त्र और आसन भी अलग होते हैं अतः उतने रंग के कपड़े खरीद लेने चाहिए, जो आसन पर बिछाकर काम चल सकता है | १- सूर्य के लिए गुलाबी वस्त्र, आसन और स्फटिक माला | ११ माला २- चन्द्र के लिए सफ़ेद वस्त्र, आसन और मोती माला | ११ माला ३- मंगल के लिए लाल वस्त्र, आसन और मूंगा माला | ११ माला ४- बुध के लिए हरा वस्त्र, आसन और हरे हक़ीक माला | ११ माला ५- गुरु के लिए पीले वस्त्र, आसन और पीली हक़ीक या हल्दी माला | ११ माला ६- शुक्र के लिए सफ़ेद वस्त्र, आसन और स्फटिक माला , (पहले वाली माला और वस्त्र उपयोग कर सकते हैं) | ११ माला ७- शनि हेतु काले वस्त्र, आसन और काली हक़ीक माला | १८ माला ८- राहू के लिए ------------------------------------------------ | १९ माला ९- केतु के लिए ----------------------------------------------- | १९ माला जप कालीन समय -- सूर्य जप साधना प्रातः ६ से ७ के बीच प्रारम्भ करना है और दिशा पूर्व | चन्द्र साधना हेतु रात में ९ से १० बजे के बीच, दिशा पूर्व मंगल बुध गुरु और शुक्र की प्रातः ९ से ११ के बीच मंगल के दक्षिण, बुध के लिए नैरित्य, गुरु के लिए उत्तर शुक्र के लिए पश्चिम दिशा निर्धारित है | शनि राहू केतु भी ११ बजे के पूर्व साधना हो जनि चाहिए | शनि के लिए भी पश्चिम राहू केतु के लिए दक्षिण दिशा होगी | ये साधना मूलतः अमावश्या से प्रारम्भ करनी है अमावश्या के दिन दो पाटे पर एक सफ़ेद वस्त्र और दुसरे पर पीला वस्त्र बिछाकर अपने सामने स्थापित करें, अब एक बड़ी स्टील, ताम्बे या कांसे की थाली लें अब नौ मिटटी के दिए जिसमे आठ दीयों में तेल जो कोई भी हो सकता है, तथा एक में घी का दीपक लगावें | थाली में कुमकुम से स्वास्तिक बनावें, और उस पर चावल की ढेरी बनाकर उस पर नवग्रह यंत्र को पहले पंचामृत से धोकर फिर गंगा जल से धो कर स्थापित करें, ऐसे हि जो भी माला लाकेट या अंगूठी है उसे भी साफ कर यंत्र के ऊपर स्थापित करें | तथा चारो तरफ आठ दिए तेल के और अपने सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें तथा सफ़ेद वस्त्र वाले पट्टे पर थाली स्थापित करें | अब दुसरे पाटे पर चावल से स्वास्तिक बनावें और उस पर नवग्रहों की स्थापना करें | ये प्रतीक मात्र होंगे | सामने भूमि पर कलश स्थापन करें और उसका पूजन कर गुरु, गणेश पूजन सम्पन्न करें | तथा संकल्प लेकर नवग्रह का और यंत्र का पंचोपचार पूजन करें | ‘ब्रह्ममुरारिस्त्रिपुरान्त्कारी भानु शशि भूमौ सुतबुधश्च गुरु शुक्र, शनि राहू-केतवे मुन्था सहिताय सर्वे ग्रहा शान्तिकरा भवन्तु ||’ इस मन्त्र का रुद्राक्ष माला से एक माला मन्त्र करें --- स्नेही स्वजन ! J है ना अद्भुत प्रयोग........ इस तरह पूजन सम्पन्न करने से आपका यंत्र और सारी मालायें नवग्रह मन्त्र से चैतन्य हो जाएँगी और आप भी इस साधना हेतु तैयार हो जायेंगे-------- यदि पूर्ण विधि विधान और श्रद्धा पूर्वक इस साधना को कोई भी संपन्न कर लेता है तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसे समस्त बाधाओं से मुक्ति न मिले------ अब इसके बाद आप रविवार से इस साधन को प्रारम्भ कर सकते हैं अपनी सुविधा नुसार----- कुछ महत्वपूर्ण सावधानी---- जो कि प्रत्येक साधना में बरतनी चाहिए , जैसे- ब्रह्मचारी व्रत का दृढ़ता से पालन, भूमि शयन पूर्ण शुद्ध और शाकाहारी भोजन व्यवस्था, और गुरु और मन्त्र के प्रति पूर्ण आस्था रखते हुए साधना सम्पन्न करें और देखें चमत्कारी परिणाम-------- नव ग्रह एवं उनसे सम्बन्धित मन्त्र १. सूर्य : ॐ ह्रां ह्रीं सः | २. चन्द्रमा : ॐ घौं सौं औं सः | ३. मंगल : ॐ ह्रां ह्रीं ह्रां सः | ४. बुध : ॐ ह्रौं ह्रौं ह्रां सः | ५. गुरु : ॐ औं औं औं सः | ६. शुक्र : ॐ ह्रौं ह्रीं सः | ७. शनि : ॐ शौं शौं सः | ८. रहू : ॐ छौं छां छौं सः | ९. केतु : ॐ फौं फां फौं सः | प्रत्येक दिन प्रत्येक गृह के मन्त्र जप के बाद निम्न स्त्रोत के पांच पाठ अति आवश्यक हैं | विनियोग : ॐ अस्य जगन्मंगल्कारक ग्रह कवचस्य श्री भैरव ऋषि: अनुष्टुप् छन्द : | श्री सूर्यादि ग्रहाः देवता | सर्व कामार्थ संसिद्धिये पाठे विनियोगः | पार्वत्युवाच : श्री शान ! सर्व शास्त्रज्ञ देव्ताधीश्वर प्रभो | अक्षयं कवचं दिव्यं ग्रहादि-दैवतं विभो || पुरा संसुचितम गुह्यां सुभ्त्ताक्षय-कारकम् | कृपा मयि त्वास्ते चेत् कथय् श्री महेश्वर || शिव उवाच : श्रृणु देवि प्रियतमे ! कवचं देव दुर्लभम् | यद्धृत्वा देवता : सर्वे अमरा: स्युर्वरानेन | तव प्रीति वशाद् वच्मि न देयं यस्य कस्यंचित् | ग्रह कवच स्तोत्र : ॐ ह्रां ह्रीं सः मे शिरः पातु श्री सूर्य ग्रह पति : | ॐ घौं सौं औं में मुखं पातु श्री चन्द्रो ग्रह राजकः | ॐ ह्रां ह्रीं ह्रां सः करो पातु ग्रह सेनापतिः कुज: | पायादंशं ॐ ह्रौं ह्रौं ह्रां सः पादौ ज्ञो नृपबालक: | ॐ औं औं औं सः कटिं पातु पायादमरपूजित: | ॐ ह्रौं ह्रीं सः दैत्य पूज्यो हृदयं परिरक्षतु | ॐ शौं शौं सः पातु नाभिं मे ग्रह प्रेष्य: शनैश्चर: | ॐ छौं छां छौं सः कंठ देशम श्री राहुर्देवमर्दकः | ॐ फौं फां फौं सः शिखी पातु सर्वांगमभीतोऽवतु | ग्रहाश्चैते भोग देहा नित्यास्तु स्फुटित ग्रहाः | एतदशांश संभूताः पान्तु नित्यं तु दुर्जनात् | अक्षयं कवचं पुण्यं सुर्यादी गृह दैवतं | पठेद् वा पाठयेद् वापी धारयेद् यो जनः शुचिः | सा सिद्धिं प्राप्नुयादिष्टां दुर्लभां त्रिदशस्तुयाम् | तव स्नेह वशादुक्तं जगन्मंगल कारकम् गृह यंत्रान्वितं कृत्वाभिष्टमक्षयमाप्नुयात् | तो हो जाइये तैयार एक महत्वपूर्ण साधना हेतु------ जादा जानकारी और समाधान और उपाय या रत्न विश्लेषण समाधान प्राप्त के लिए सम्पर्क करे। जन्म कुंडली देखने और समाधान बताने की दक्षिणा - 201 मात्र . paytm number - 9958417249 . विशेष किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें. महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट (रजि.) किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 26, 2020

टोटके जिससे लोग सबसे ज्‍यादा डरते हैं हमारे देश में जब भी किसी को गंभीर बीमारी हो जाती है, डॉक्‍टर जवाब दे देते हैं, तो लोग बाबा, मुल्‍ला, मौलवी, तांत्रिक आदि की शरण में चले जाते हैं। वो तमाम तरह के टोने-टोटके करने की सलाह देते हैं, इत्‍तेफाक से जब वो सफल हो जाते हैं, तो टोना करने वाला व्‍यक्ति पीड़ित के लिए भगवान से कम नहीं होता। देश में तमाम लोग ऐसे भी हैं, जो इन बातों पर विश्‍वास नहीं करते, लेकिन यह बात सच है कि आप विश्‍वास करें या न करें, इन बातों को लेकर डर जरूर लगता है। यहां हम उन्‍हीं टोटाकों की बात करेंगे जिनसे आदमी सबसे ज्‍यादा डरता है- ये वो टोटके हैं जो प्रायः हमें किसी भी चौराहों, सुनसान जगह, प्रमुख स्थानों के आस पास देखने को मिल जाते हैं। ये वो टोटके हैं, जो केवल और केवल अंधविश्वास और नकारात्मक उर्जाओं की उपज हैं, अमूमन आदमी इन टोटको का प्रयोग कार्यसिद्धि के लिए करता है जहां इन टोटको के माध्यम से व्यक्ति को ये उम्मीद होती है की उसके रुके हुए काम पूरे हो जायंगे और उसका बिगड़ा भाग्य सुधर जायगा। इन टोटकों को आम बोल चाल की भाषा में काला जादू भी कहा जाता है। यहां हमारा मकसद न तो किसी की भावना और विश्वास को ठेस पहुंचना है और न ही आपको अंधविश्वासी बनाना है। सड़क पर सुई से गुदा हुआ नींबू देखना चौराहों या सुनसान जगहों पर अकसर ऐसा देखने को मिलता है कि सुई से गुदा हुआ एक नींबू पड़ा है। दूसरी दिशा से एक व्यक्ति अपनी गाडी से उसी ओर तेजी से चला आ रहा है गाड़ी की स्पीड चाहे कितनी ही तेज हो नींबूदेखके वो डगमगा ही जाती है। या फिर व्यक्ति हर संभव यही कोशिश करता है की उस पड़े हुए नींबूसे बच के निकल जाये। अब सवाल ये है की आखिर ऐसा क्यों होता है? चलिए हम आपको बताते हैं की ऐसे टोटके करने की मुख्य वजह क्या है। आम जन मानस में ये धारणा है की यदि किसी व्यक्ति पर भूत, पिशाच, जिन, चुड़ैल का साया है तो उस व्यक्ति को इस साए से दूर करने के लिए तंत्र विद्या में इसका प्रयोग किया जाता है। लोगों का ये मानना है की यदि कोई व्यक्ति व्यक्ति इस नींबूको अपनी गाड़ी या फिर अपने पैरों से कुचल दे तो उनकी परेशानी दूर हो जायगी और पीड़ित व्यक्ति ठीक हो जायगा। लोगों का ये भी मानना है की यदि किसी को भयंकर बीमारी हो तो एक नींबूमें पतली पिन से छेद करके उसे सात बार व्यक्ति के ऊपर से नांग कर ठीक रात्रि 12 बजे बीच चौराहे पर रख दे और फिर यदि कोई उस नींबू को नांग लेता है तो उस पीड़ित व्यक्ति की सारी बीमारियां उस व्यक्ति पर आ जाती है जिसने उसे नांगा है। अमूमन सड़क पर नींबू वो लोग भी रखते है जो अपने व्यापार में भारी नुक्सान का सामना कर रहे होते हैं। ऐसे में ये धारणा होती है की यदि व्यक्ति को भोर के समय सड़क या प्रमुख चौराहे पर रख दे तो जल्द ही उसका आर्थिक संकट दूर होगा। यदि कोई महिला गर्भवती है और वो इस नींबू को नांग दे तो ये उसके लिए शुभ नहीं होता। लोगों का मानना है की इस तरह उसका गर्भपात हो सकता है। नींबू का टोटका वो टोटका है जो बड़े बड़ों के कदम डगमगा देता है। जिस कारण व्यक्ति इनसे बहुत डरता है प्रायः ये देखा जाता है हर इंसान को अपने जीवन से बड़ा ही मोह रहता है और इन सब चीजों को देखकर उसे लगता है कि कहीं उसका जीवन संकट में न पड़ जाये। अंत में हम फिर से बताना चाहेंगे कि यह सब महज अंधविश्‍वास है। चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट रजि . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249 .किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249' व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 23, 2020

मातंगी साधना वर्तमान युग में मानव जीवन के प्रारम्भिक पड़ाव से अन्तिम पड़ाव तक भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है। व्यक्ति जब तक भौतिक जीवन का पूर्णता से निर्वाह नहीं कर लेता है, तब तक उसके मन में आसक्ति का भाव रहता ही है और जब इन इच्छाओं की पूर्ति होगी, तभी वह आध्यात्मिकता के क्षेत्र में उन्नति कर सकता है। मातंगी महाविद्या साधना एक ऐसी साधना है, जिससे आप भौतिक जीवन को भोगते हुए आध्यात्म की ऊँचाइयों को छू सकते हैं। मातंगी महाविद्या दस महाविद्याओं में नवम् स्थान पर अवस्थित होकर श्रीकुल के अन्तर्गत मानी जाने वाली महाविद्या है। इनकी साधना अत्यन्त सौभाग्यप्रद मानी जाती है, क्यूँकि यह केवल साधना ही नहीं अपितु सही अर्थों में पूरे जीवन को ही आमूलचूल परिवर्तित कर देने की ऐतिहासिक घटना है। मातंगी महाविद्या साधना से साधक को पूर्ण गृहस्थ-सुख, शत्रुओं का नाश, भोग-विलास, अपार सम्पदा, वाक्-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण ,अपार सिद्धियाँ, काल-ज्ञान, इष्ट-दर्शन आदि प्राप्त होते ही हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मातंगी साधना पूर्णता की साधना है । जिसने माँ मातंगी को सिद्ध कर लिया, फिर उसके जीवन में कुछ अन्य सिद्ध करना शेष नहीं रह जाता। माँ मातंगी आदि सरस्वती है, जिस पर माँ मातंगी की कृपा होती है, उसे स्वतः ही सम्पूर्ण वेदों, पुराणों, उपनिषदों आदि का ज्ञान हो जाता है, उसकी वाणी में दिव्यता आ जाती है, फिर साधक को मन्त्र एवं साधना याद करने की जरुरत नहीं रहती, उसके मुख से स्वतः ही धाराप्रवाह मन्त्र उच्चारण होने लगता है। जब वह बोलता है तो हजारों-लाखों की भीड़ मन्त्र मुग्ध-सी उसके मुख से उच्चारित वाणी को सुनती रहती है। साधक की ख्याति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैल जाती है। कोई भी उससे शास्त्रार्थ में विजयी नहीं हो सकता, वह जहाँ भी जाता है विजय प्राप्त करता ही है। मातंगी साधना से वाक्-सिद्धि की प्राप्ति होती है, प्रकृति साधक के सामने हाथ जोड़े खडी रहती है, साधक जो बोलता है वो सत्य होता ही है। माँ मातंगी साधक को वह विवेक प्रदान करती है कि फिर साधक पर कुबुद्धि हावी नहीं होती, उसे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और ब्रह्माण्ड के समस्त रहस्य साधक के सामने प्रत्यक्ष होते ही हैं। माँ मातंगी को उच्छिष्ट चाण्डालिनी भी कहते हैं, इस रूप में माँ साधक के समस्त शत्रुओं एवं विघ्नों का नाश करती है, फिर साधक के जीवन में ग्रह या अन्य बाधा का कोई असर नहीं होता। जिसे संसार में सब ठुकरा देते हैं, जिसे संसार में कहीं पर भी आसरा नहीं मिलता, उसे माँ उच्छिष्ट चाण्डालिनी अपनाती है और साधक को वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे ब्रह्माण्ड की समस्त सम्पदा साधक के सामने तुच्छ-सी नजर आती है। महर्षि विश्वमित्र ने यहाँ तक कहा है कि ”मातंगी साधना में बाकि नौ महाविद्याओं का समावेश स्वतः ही हो गया है”। माँ मातंगी जी की साधना जो साधक कर लेता है, वह तो गर्व से कह सकता है कि मेरा यह आध्यात्मिक जीवन व्यर्थ नहीं गया। अतः आप भी माँ मातंगी की साधना को करें, जिससे आप जीवन में पूर्ण बन सके। साधना विधि :---------- यह साधना मातंगी जयन्ती, मातंगी सिद्धि दिवस अथवा किसी भी सोमवार के दिन से शुरू की जा सकती है। यह साधना रात्रिकालीन है और इसे रात्रि में ९ बजे के बाद शुरु करना चाहिए। सर्वप्रथम साधक स्नान आदि से निवृत्त होकर लाल वस्त्र पहिनकर पश्चिम दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठ जाए। अपने सामने बाजोट पर लाल वस्त्र बिछा ले। इस साधना में माँ मातंगी का चित्र, यन्त्र और लाल मूँगा माला का महत्व बताया गया है, परन्तु सामग्री उपलब्ध ना हो तो किसी ताँबे की प्लेट में स्वास्तिक बनाए और उस पर एक सुपारी स्थापित कर दे और उसे ही यन्त्र मानकर स्थापित कर दे। आपके पास मातंगी का चित्र ना हो तो आप ''माताजी'' का ही मातंगी स्वरुप में पूजन करे, माताजी तो स्वयं ही ''जगदम्बा'' है और माला के विषय में स्फटिक माला, लाल हकीक माला, मूँगा माला, रुद्राक्ष माला में से किसी भी माला का उपयोग हो सकता है। सबसे पहले साधक शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर धूप-अगरबत्ती भी लगा दे। फिर सामान्य गुरुपूजन सम्पन्न करे और गुरुमन्त्र का चार माला जाप कर ले। फिर सद्गुरुदेवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करे। इसके बाद साधक संक्षिप्त गणेशपूजन सम्पन्न करे और "ॐ वक्रतुण्डाय हूं" मन्त्र की एक माला जाप करे। फिर भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करे। फिर साधक संक्षिप्त भैरवपूजन सम्पन्न करे और "ॐ हूं भ्रं हूं मतंग भैरवाय नमः" मन्त्र की एक माला जाप करे। फिर भगवान मतंग भैरवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करे। इसके बाद साधक को साधना के पहिले दिन संकल्प अवश्य लेना चाहिए। साधक दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि “मैं अमुक नाम का साधक गोत्र अमुक आज से श्री मातंगी साधना का अनुष्ठान आरम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य २१ दिनों तक ५१ माला मन्त्र जाप करूँगा। माँ ! मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे मन्त्र की सिद्धि प्रदान करे तथा इसकी ऊर्जा को मेरे भीतर स्थापित कर दे।” इसके बाद साधक भगवती मातंगी का सामान्य पूजन करे। कुमकुम, अक्षत, पुष्प आदि से पूजा करके कोई भी मिष्ठान्न भोग में अर्पित करे। फिर साधक निम्न विनियोग का उच्चारण कर एक आचमनी जल भूमि पर छोड़ दे --- विनियोग :----- ॐ अस्य मन्त्रस्य दक्षिणामूर्ति ऋषिः विराट् छन्दः मातंगी देवता ह्रीं बीजं हूं शक्तिः क्लीं कीलकं सर्वाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः। ऋष्यादिन्यास :----- ॐ दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि। (सिर को स्पर्श करें) विराट् छन्दसे नमः मुखे। (मुख को स्पर्श करें) मातंगी देवतायै नमः हृदि। (हृदय को स्पर्श करें) ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये। (गुह्य स्थान को स्पर्श करें) हूं शक्तये नमः पादयोः। (पैरों को स्पर्श करें) क्लीं कीलकाय नमः नाभौ। (नाभि को स्पर्श करें) विनियोगाय नमः सर्वांगे। (सभी अंगों को स्पर्श करें) करन्यास :----- ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः। (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें) ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें) ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें) हृदयादिन्यास :----- ॐ ह्रां हृदयाय नमः। (हृदय को स्पर्श करें) ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें) ॐ ह्रूं शिखायै वषट्। (शिखा को स्पर्श करें) ॐ ह्रैं कवचाय हूं। (भुजाओं को स्पर्श करें) ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। (नेत्रों को स्पर्श करें) ॐ ह्रः अस्त्राय फट्। (सिर से घूमाकर तीन बार ताली बजाएं) ध्यान :----- फिर हाथ जोड़कर माँ भगवती मातंगी का ध्यान करें ----- ॐ श्यामांगी शशिशेखरां त्रिनयनां वेदैः करैर्बिभ्रतीं, पाशं खेटमथांकुशं दृढमसिं नाशाय भक्तद्विषाम्। रत्नालंकरणप्रभोज्ज्वलतनुं भास्वत्किरीटां शुभां, मातंगी मनसा स्मरामि सदयां सर्वार्थसिद्धिप्रदाम्।। इस प्रकार ध्यान करने के बाद साधक निम्न मन्त्र का ५१ माला जाप करे ----- मन्त्र :----------- ।। ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा ।। OM HREEM KLEEM HOOM MAATANGYEI PHAT SWAAHAA. यह साधना दिखने में ही साधारण हो सकती है, परन्तु यह मन्त्र साधना अत्यन्त तीव्र है। मातंगी महाविद्या साधना विश्व की सर्वश्रेष्ठ साधना है, जो साधक के दुर्भाग्य को भी बदलकर उसे भाग्यवान बना देती है। आज तक इस साधना में किसी को असफलता नहीं मिली है। मन्त्र जाप के पश्चात मातंगी कवच का एक पाठ अवश्य ही करे। मातंगी कवच श्रीदेव्युवाच साधु-साधु महादेव! कथयस्व सुरेश्वर! मातंगी कवचं दिव्यं सर्वसिद्धिकरं नृणाम्।।१।। श्री ईश्वर उवाच श्रृणु देवि! प्रवक्ष्यामि मातंगीकवचं शुभम्। गोपनीयम् महादेवि! मौनी जापं समाचरेत्।।२।। विनियोगः----- ॐ अस्य श्रीमातंगीकवचस्य श्री दक्षिणामूर्तिः ऋषिः विराट् छन्दो मातंगी देवता चतुर्वर्ग सिद्धये जपे विनियोगः। मूल कवच ॐ शिरो मातंगिनी पातु भुवनेशी तु चक्षुषी। तोडला कर्ण युगलं त्रिपुरा वदनं मम।।३।। पातु कण्ठे महामाया हृदि माहेश्वरी तथा। त्रिपुष्पा पार्श्वयोः पातु गुदे कामेश्वरी मम।।४।। ऊरुद्वये तथा चण्डी जंघयोश्च हरप्रिया। महामाया पादयुग्मे सर्वांगेषु कुलेश्वरी।।५।। अंगं प्रत्यंगकं चैव सदा रक्षतु वैष्णवी। ब्रह्मरन्ध्रे सदा रक्षेन्मातंगीनामसंस्थिता।।६।। रक्षेन्नित्यं ललाटे सा महापिशाचिनीति च। नेत्रयोः सुमुखी रक्षेद्देवी रक्षतु नासिकाम्।।७।। महापिशाचिनीं पायान्मुखे रक्षतु सर्वदा। लज्जा रक्षतु मां दन्ताञ्चोष्ठौ सम्मार्जनीकरा।।८।। चिबुके कण्ठदेशे च ठकारत्रितयं पुनः। स-विसर्गं महादेवि! हृदयं पातु सर्वदा।।९।। नाभिं रक्षतु मां लोला कालिकावतु लोचने। उदरे पातु चामुण्डा लिंगे कात्यायनी तथा।।१०।। उग्रतारा गुदे पातु पादौ रक्षतु चाम्बिका। भुजौ रक्षतु शर्वाणीं हृदयं चण्डभूषणा।।११।। जिह्वायां मातृका रक्षेत्पूर्वे रक्षतु पुष्टिका। विजया दक्षिणे पातु मेधा रक्षतु वारुणे।।१२।। नैर्ऋत्यां सुदया रक्षेद्वायव्यां पातु लक्ष्मणा। ऐशान्यां रक्षेन्मां देवी मातंगी शुभकारिणी।।१३।। रक्षेत्सुरेशी चाग्नेये बगला पातु चोत्तरे। ऊर्घ्वं पातु महादेवि देवानां हितकारिणी।।१४।। पाताले पातु मां नित्यं वशिनी विश्वरूपिणी। प्रणवं च ततो माया कामबीजं च कूर्चकं।।१५।। मातंगिनी ङेयुतास्त्रं वह्निजाया वधिर्मनुः। सार्द्धैकादशवर्णा सा सर्वत्र पातु मां सदा।।१६।। फलश्रुति इति ते कथितं देवि! गुह्याद्गुह्यतरं परम्। त्रैलोक्यमंगलं नाम कवचं देवदुर्लभम्।।१७।। यः इदं प्रपठेन्नित्यं जायते सम्पदालयम्। परमैश्वर्यमतुलं प्राप्नुयान् नात्र संशयः।।१८।। गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं प्रपठेद् यदि। ऐश्वर्यं सु-कवित्वं च वाक्सिद्धिं लभते ध्रुवम्।।१९।। नित्यं तस्यं तु मातंगी महिला मंगलं चरेत्। ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ये देवाः सुरसत्तमाः।।२०।। ब्रह्मराक्षसवेतालाः ग्रहाद्यां भूतजातयः। तं दृष्टवा साधकं देवि! लज्जायुक्ता भवन्ति ते।।२१।। कवचं धारयेद्यस्तु सर्वासिद्धिं लभेदध्रुवम्। राजानोऽपि च दासत्वं षट्कर्माणि च साधयेत्।।२२।। सिद्धो भवति सर्वत्र किमन्यैर्बहुभाषितैः। इदं कवचमज्ञात्वा मातंगीं यो भजेन्नरः।।२३।। अल्पायुर्निर्धनो मूर्खो भवत्येव न संशयः। गुरौ भक्तिः सदा कार्या कवचे च दृढा मतिः।।२४।। तस्मै मातंगिनी देवी सर्वसिद्धिं प्रयच्छति।।२५।। मन्त्र जाप के पश्चात समस्त जाप एक आचमनी जल भूमि पर छोड़कर माँ भगवती मातंगी को ही समर्पित कर दें। साधक को यह साधना क्रम नित्य २१ दिनों तक करना चाहिए। २१ वें दिन कम से कम घी की १०८ आहुति अग्नि में अर्पित करे। इस तरह से यह साधना पूर्ण होती है। इस तरह यह साधना सम्पन्न होती है। कुछ दिनों में ही आप साधना का प्रभाव स्वयं अनुभव करने लग जाएंगे। तो देर किस बात की, साधना करे तथा जीवन को पूर्णता प्रदान करे। आपकी साधना सफल हो और माँ भगवती मातंगी का आपको आशीष प्राप्त हो। मैं सद्गुरुदेव भगवानजी से ऐसी ही प्रार्थना करता हूँ। इसी कामना के साथ चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट रजि . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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Aghori Ram May 22, 2020

सिद्धि श्री बीसा यंत्र कहावत प्रसिद्ध है कि जिसके पास हो बीसा उसका क्या करे जगदीशा,अर्थात साधकों ने इस यंत्र के माध्यम से दुनिया की हर मुश्किल आसान होती है,और लोग मुशीबत में भी मुशीबत से ही रास्ता निकाल लेते हैं। इसलिये ही इसे लोग बीसा यंत्र की उपाधि देते हैं। नवार्ण मंत्र से सम्पुटित करते हुये इसमे देवी जगदम्बा का ध्यान किया जाता है। यंत्र में चतुष्कोण में आठ कोष्ठक एक लम्बे त्रिकोण की सहायता से बनाये जाते हैं,त्रिकोण को मन्दिर के शिखर का आकार दिया जाता है,अंक विद्या के चमत्कार के कारण इस यंत्र के प्रत्येक चार कोष्ठक की गणना से बीस की संख्या की सिद्धि होती है। इस यंत्र को पास रखने से ज्योतिषी आदि लोगों को वचन सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। भूत प्रेत और ऊपरी हवाओं को वश में करने की ताकत मिलती है,जिन घरों में भूत वास हो जाता है उन घरों में इसकी स्थापना करने से उनसे मुक्ति मिलती है। आपकी कुंडली से आपको कौन सा यंत्र फ़ायदा देगा आप हमसे पूछ सकते है चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें महायोगी राजगुरु जी 《 अघोरी रामजी 》 तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट रजि . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 09958417249 व्हाट्सप्प न०;- 9958417249

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