jai shri krishna Mar 18, 2019

मित्रो आज सोमवार है, भगवान भोलेनाथ का का दिन,आज हम आपकोग्यारह वस्तुओं के बारे में बतायेंगे जो भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं,,,, भगवान शिव तुरंत और तत्काल प्रसन्न होने वाले देवता हैं। इसीलिए उन्हें आशुतोष कहा जाता है। आइए जानते हैं भगवान शिव को प्रिय 11 ऐसी सामग्री जो अर्पित करने से भोलेनाथ हर कामना पूरी करते हैं। यह 11 सामग्री हैं : जल, बिल्वपत्र, आंकड़ा, धतूरा, भांग, कर्पूर, दूध, चावल, चंदन, भस्म, रुद्राक्ष ..... जल :शिव पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ही स्वयं जल हैं शिव पर जल चढ़ाने का महत्व भी समुद्र मंथन की कथा से जुड़ा है। अग्नि के समान विष पीने के बाद शिव का कंठ एकदम नीला पड़ गया था। विष की ऊष्णता को शांत करके शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए समस्त देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिव पूजा में जल का विशेष महत्व है। बिल्वपत्र : भगवान के तीन नेत्रों का प्रतीक है बिल्वपत्र। अत: तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र शिव जी को अत्यंत प्रिय है। प्रभु आशुतोष के पूजन में अभिषेक व बिल्वपत्र का प्रथम स्थान है। ऋषियों ने कहा है कि बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना एवं 1 करोड़ कन्याओं के कन्यादान का फल एक समान है। भगवान के तीन नेत्रों का प्रतीक है बिल्वपत्र। आंकड़ा : शास्त्रों के मुताबिक शिव पूजा में एक आंकड़े का फूल चढ़ाना सोने के दान के बराबर फल देता है। धतूरा : भगवान शिव को धतूरा भी अत्यंत प्रिय है। इसके पीछे पुराणों मे जहां धार्मिक कारण बताया गया है वहीं इसका वैज्ञानिक आधार भी है। भगवान शिव को कैलाश पर्वत पर रहते हैं। यह अत्यंत ठंडा क्षेत्र है जहां ऐसे आहार और औषधि की जरुरत होती है जो शरीर को ऊष्मा प्रदान करे। वैज्ञानिक दृष्टि से धतूरा सीमित मात्रा में लिया जाए तो औषधि का काम करता है और शरीर को अंदर से गर्म रखता है। जबकि धार्मिक दृष्टि से इसका कारण देवी भागवत‍ पुराण में बतया गया है। इस पुराण के अनुसार शिव जी ने जब सागर मंथन से निकले हलाहल विष को पी लिया तब वह व्याकुल होने लगे। तब अश्विनी कुमारों ने भांग, धतूरा, बेल आदि औषधियों से शिव जी की व्याकुलता दूर की। उस समय से ही शिव जी को भांग धतूरा प्रिय है। शिवलिंग पर केवल धतूरा ही न चढ़ाएं बल्कि अपने मन और विचारों की कड़वाहट भी अर्पित करें। भांग : शिव हमेशा ध्यानमग्न रहते हैं। भांग ध्यान केंद्रित करने में मददगार होती है। इससे वे हमेशा परमानंद में रहते हैं। समुद्र मंथन में निकले विष का सेवन महादेव ने संसार की सुरक्षा के लिए अपने गले में उतार लिया। भगवान को औषधि स्वरूप भांग दी गई लेकिन प्रभु ने हर कड़वाहट और नकारात्मकता को आत्मसात किया इसलिए भांग भी उन्हें प्रिय है। भगवान् शिव को इस बात के लिए भी जाना जाता हैं कि इस संसार में व्याप्त हर बुराई और हर नकारात्मक चीज़ को अपने भीतर ग्रहण कर लेते हैं और अपने भक्तों की विष से रक्षा करते हैं। कर्पूर : भगवान शिव का प्रिय मंत्र है कर्पूरगौरं करूणावतारं.... यानी जो कर्पूर के समान उज्जवल हैं। कर्पूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध और पवित्र बनाती है। भगवान भोलेनाथ को इस महक से प्यार है अत: कर्पूर शिव पूजन में अनिवार्य है। दूध: श्रावण मास में दूध का सेवन निषेध है। दूध इस मास में स्वास्थ्य के लिए गुणकारी के बजाय हानिकारक हो जाता है। इसीलिए सावन मास में दूध का सेवन न करते हुए उसे शिव को अर्पित करने का विधान बनाया गया है। चावल : चावल को अक्षत भी कहा जाता है और अक्षत का अर्थ होता है जो टूटा न हो। इसका रंग सफेद होता है। पूजन में अक्षत का उपयोग अनिवार्य है। किसी भी पूजन के समय गुलाल, हल्दी, अबीर और कुंकुम अर्पित करने के बाद अक्षत चढ़ाए जाते हैं। अक्षत न हो तो शिव पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। यहां तक कि पूजा में आवश्यक कोई सामग्री अनुप्लब्ध हो तो उसके एवज में भी चावल चढ़ाए जाते हैं। चंदन : चंदन का संबंध शीतलता से है। भगवान शिव मस्तक पर चंदन का त्रिपुंड लगाते हैं। चंदन का प्रयोग अक्सर हवन में किया जाता है और इसकी खुशबू से वातावरण और खिल जाता है। यदि शिव जी को चंदन चढ़ाया जाए तो इससे समाज में मान सम्मान यश बढ़ता है। भस्म : इसका अर्थ पवित्रता में छिपा है, वह पवित्रता जिसे भगवान शिव ने एक मृत व्यक्ति की जली हुई चिता में खोजा है। जिसे अपने तन पर लगाकर वे उस पवित्रता को सम्मान देते हैं। कहते हैं शरीर पर भस्म लगाकर भगवान शिव खुद को मृत आत्मा से जोड़ते हैं। उनके अनुसार मरने के बाद मृत व्यक्ति को जलाने के पश्चात बची हुई राख में उसके जीवन का कोई कण शेष नहीं रहता। ना उसके दुख, ना सुख, ना कोई बुराई और ना ही उसकी कोई अच्छाई बचती है। इसलिए वह राख पवित्र है, उसमें किसी प्रकार का गुण-अवगुण नहीं है, ऐसी राख को भगवान शिव अपने तन पर लगाकर सम्मानित करते हैं। एक कथा यह भी है कि पत्नी सती ने जब स्वयं को अग्नि के हवाले कर दिया तो क्रोधित शिव ने उनकी भस्म को अपनी पत्नी की आखिरी निशानी मानते हुए तन पर लगा लिया, ताकि सती भस्म के कणों के जरिए हमेशा उनके साथ ही रहे। रुद्राक्ष : भगवान शिव ने रुद्राक्ष उत्पत्ति की कथा पार्वती जी से कही है। एक समय भगवान शिवजी ने एक हजार वर्ष तक समाधि लगाई। समाधि पूर्ण होने पर जब उनका मन बाहरी जगत में आया, तब जगत के कल्याण की कामना वाले महादेव ने अपनी आंख बंद कीं। तभी उनके नेत्र से जल के बिंदु पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं से रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए और वे शिव की इच्छा से भक्तों के हित के लिए समग्र देश में फैल गए। उन वृक्षों पर जो फल लगे वे ही रुद्राक्ष हैं।

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jai shri krishna Mar 18, 2019

. 💥"#भक्ति_दिखावे_का_विषय_नहीं"💥 #एक_व्यक्ति_था_जो_नियमित_मंदिर_जाता_था परंतु एकांत मे तो चुपचाप रहता कोई भजन कीर्तन ना करता और जैसे ही भीड़ बढ़ने लगती खूब ज़ोर ज़ोर से जयकारा लगाके कीर्तन आदि करने लगता। #सभी_लोग_उसे_बहुत_भगत_मानते_थे_और_भगत जी का संबोधन करते थे इससे उस व्यक्ति को बहुत आत्म संतुष्टि मिलती। आम जीवन मे भी उसका ज़ोर इसी बात पर रहता की उसे मान कैसे मिले और इसलिए हमेशा ही दूसरों मे कमियाँ निकालता रहता। यहाँ तक की मंदिर मे भी जाता तो सबको उपदेश दिया करता और खुद भूले से भी भगवान को याद नही करता। आरती भी करता तो उसका ज़ोर दूसरों को दिखाके चिल्लाने पर रहता परंतु ये भाव उसे नही आता कि भगवान सामने खड़े हैं। इसी तरह कई दिन बीत गये और वहाँ एक संत और भी आने लगे। कभी कभी उस व्यक्ति की उनसे भेंट भी हो जाती लेकिन वो उनसे कुछ भी ज्ञान की बात नही पूछता क्यूंकी उसे लगता की लोग समझेंगे की उसे कुछ मालूम नही तभी तो वो इन संत से पूछ रहा है। बल्कि वो व्यक्ति संत महाराज को ही बताने लगता की आप अकेले मे तो इतना भजन करते हैं लोगों के सामने चुप क्यूँ हो जाते हैं, अरे! भगवान का भजन तो सबके साथ मिलके ही किया जाता है। #वो_संत_मुस्कुराते_और_आँखें_बंद_कर_लेते।उस व्यक्ति को लगता कि कदाचित् संत महाराज भी मेरी बात से सहमत है। एक दिन उस आदमी ने एक नयी चप्पल खरीदी और मंदिर के बाहर हमेशा की तरह उतार कर अंदर आ गया। परंतु उसका मन बार बार चप्पल पर जाए की कहीं कोई चोरी ना कर ले। ये सब देखकर भगवान को बहुत दुख हुआ। रात उस व्यक्ति ने स्वप्न देखा की कोई अलौकिक पुरुष उसी मंदिर के बाहर उसकी चप्पल के पास खड़ा है, तुरंत ही उसकी नींद टूट गयी वो घबराके बैठ गया। उसने विचार किया की इसका अर्थ किससे पूछा जाए क्यूंकी उसने कभी कोई प्रश्न किसी से पूछा नही की लोग उसे अज्ञानी ना समझे। बहुत सोच विचार कर उसने सोचा एकांत मे उसी संत से पूछूँगा जो मंदिर आते हैं क्यूंकी वो धीरे बोलते हैं और अधिक लोगों से बातचीत भी नही करते। उस दिन वो मंदिर गया और उसने अपनी बात संत के सामने रखी। उसकी बात सुनते ही संत की आखों मे आँसू आ गये और वो भाव समाधि मे चले गये। कुछ देर बाद जब उनकी आखें खुली तो उस व्यक्ति ने फिर अपना प्रश्न दोहराया की इस स्वप्न का क्या अर्थ है ? संत बोले, वो महापुरुष जो आपकी चप्पल के पास खड़े थे स्वयं प्रभु थे जिनकी मूर्ति इस मंदिर मे विराजमान है और वो आपको ऐसा करके यही संकेत दे रहे थे की तुम मंदिर मे रहके भी मुझे स्मरण नही करते और मैं मंदिर मे होते हुए भी तुम्हारे चप्पल की रखवाली करता हूँ। ये सुनते ही उस व्यक्ति की भी आँखें भीग गयीं उसने संत के चरण पकड़ लिए और बोला महाराज अब मैं समझा की आप एकांत मे इतने भाव से क्यूँ भजन गाते और भीड़ के साथ क्यूँ चुप हो जाते क्यूंकी आप हमेशा प्रभु प्रेम मे रहते हैं और प्रभु भक्ति दिखावे का नही भाव का विषय है। कृपया करके मुझे क्षमा कर दें जो मैने अज्ञान वश आपको कभी अपमानित किया हो ये कहकर वो व्यक्ति भाव विभोर हो गया, संत ने आगे बढ़के उसे गले से लगा लिया। उस दिन भी उस व्यक्ति ने भीड़ के साथ हमेशा की तरह ज़ोर ज़ोर से भजन किया परंतु उसकी आखें बंद थीं और उनसे अश्रु निकल रहे थे। ❖▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬▬▬❖ 💫✨💞#जय_जय_श्री_राधे💞✨💫

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jai shri krishna Mar 18, 2019

भगवान का भोग..... एक भक्त था, भगवान कृष्ण के मंदिर में बड़ी सेवा किया करता था। मगर उसकी पत्नी इस बात से हमेशा चिढ़ती थी कि हर बात में वह पहले भगवान को लाता। भोजन हो, वस्त्र हो या हर चीज पहले भगवान को समर्पित करता। एक दिन घर में लड्डू बने, भक्त ने लड्डू लिए और भोग लगाने चल दिया। पत्नी इससे नाराज हो गई, और कहने लगी कोई पत्थर की मूर्ति जिंदा होकर तो खाएगी नहीं जो हर चीज लेकर मंदिर की तरफ दौड़ पड़ते हो। अबकी बार बिना खिलाए न लौटना, देखती हूं कैसे भगवान खाने आते हैं। बस भक्त ने भी पत्नी के ताने सुनकर ठान ली कि बिना भगवान को खिलाए आज मंदिर से लौटना नहीं है। मंदिर में जाकर भक्त ने धूनि लगा ली, भगवान के सामने लड्डू रखकर विनती करने लगा। एक घड़ी बीती, आधा दिन बीता, न तो भगवान आए न भक्त हटा। आसपास देखने वालों की भीड़ लग गई। सभी कौतुकवश देखने लगे कि आखिर होना क्या है। मक्खियां भिनभिनाने लगी भक्त उन्हें उड़ाता रहा। मीठे की गंध से चीटियां भी लाईन लगाकर चली आईं, भक्त ने उन्हें भी हटाया। फिर मंदिर के बाहर खड़े कुत्ते भी ललचाकर आने लगे, भक्त ने उनको भी खदेड़ा। लड्डू पड़े देख मंदिर के बाहर बैठे भिखारी भी आए गए। एक तो चला सीधे लड्डू उठाने तो भक्त ने जोर से थप्पड़ रसीद कर दिया। दिन ढल गया, शाम हो गई न भगवान आए, न भक्त उठा। शाम से रात हो गई। लोगों ने सोचा भक्त पागल हो गया हैं, भगवान तो आने से रहे, धीरे-धीरे सब घर चले गए। भक्त को भी गुस्सा आ गया उसने लड्डू उठाकर बाहर फेंक दिए। भिखारी, कुत्ते, चीटी, मक्खी तो दिनभर से ही इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे, सब टूट पड़े। उदास भक्त भगवान को कोसता हुआ घर लौटने लगा। इतने सालों की सेवा बेकार चली गई कोई फल नहीं मिला। वह भक्त अपनी पत्नी के ताने सुनकर सो गया। रात को सपने में भगवान आए और बोले-तेरे लड्डू खाए थे मैंने। बहुत बढिय़ा थे, लेकिन अगर सुबह ही खिला देता तो ज्यादा अच्छा होता। कितने रूप धरने पड़े तेरे लड्डू खाने के लिए, मक्खी, चीटी, कुत्ता, भिखारी पर तुने हाथ नहीं धरने दिया दिनभर इंतजार करना पड़ा। आखिर में लड्डू खाए लेकिन जमीन से उठाकर खाने में थोड़ी मिट्टी लग गई थी। अगली बार लाए तो अच्छे से खिलाना। यह कहकर भगवान चले गए। भक्त की नींद खुल गई उसे एहसास हो गया भगवान तो आए थे खाने लेकिन मैं ही उन्हें पहचान नहीं पाया। बस, ऐसे ही हम भी भगवान के संकेतों को समझ नहीं पाते

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jai shri krishna Mar 17, 2019

💐💐अक्षयवट की कहानी 💐💐 ************ मत्स्य पुराण में वर्णन है कि जब प्रलय आता है, युग का अंत होता है. पृथ्वी जलमग्न हो जाती है और सब कुछ डूब जाता है. उस समय भी चार वटवृक्ष नही डूबते. उनमें सबसे महत्वपूर्ण है वह वटवृक्ष, जो प्रयागराज नगरी में यमुना के तट पर अवस्थित है. मान्यता है कि ईश्वर इस वृक्ष पर बालरूप में रहते हैं और प्रलय के बाद नई सृष्टि की रचना करते हैं. अपनी इसी विशिष्टता के कारण यह वटवृक्ष अक्षयवट के नाम से जाना जाता है. ऐसा वट जिसका क्षय नही हो सकता. बीते 10 जनवरी, 2019 को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस वटवृक्ष को हिन्दू श्रद्धालुओं के लिये खोल दिया है. इसके साथ ही सरस्वती कूप में देवी सरस्वती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी की गई. जैन मत में यह मान्यता है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी ने इसी वटवृक्ष के नीचे तपस्या की थी. बौद्ध मत में भी इस वृक्ष को पवित्र माना गया है. वाल्मीकि रामायण और कालिदास रचित ‘रघुवंश’ में भी इस वृक्ष की चर्चा है. आशा और जीवन का संदेश देता यह वटवृक्ष भारतीय संस्कृति का एक प्रतीक है. किंतु प्रश्न है कि इतने महत्वपूर्ण वटवृक्ष से हिंदुओं को 425 वर्षों से दूर क्यों रखा गया था? अकबर जिस कथित गंगा जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाना चाहता था, उसके लिए प्रयागराज जैसी नगरी में उसके सत्ता की धमक होनी जरूरी थी. ऐसे में अकबर ने वहाँ एक किला बनाने का निर्णय लिया. किले के लिए वो जगह चुनी गई जो हिंदुओं के लिए सर्वाधिक पवित्र थी. अक्षयवट वृक्ष और अन्य दर्जनों मन्दिर इस किले के अंदर आ गए. लेकिन अपने जीवन के उत्तरकाल में अकबर अपने पूर्ववर्ती शासकों और आने वाले उत्तराधिकारियों की तरह क्रूर नही था. इसलिए उसने किले के क्षेत्र में आने वाले मन्दिरों को तो नष्ट किया लेकिन मूर्तियों को छोड़ दिया. ये मूर्तियाँ और अक्षयवट वृक्ष का एक तना स्थानीय पुजारियों को सौंप दिया गया जिसे वे अन्यत्र पूज सकें. इन्ही मूर्तियों और शाखाओं से पातालपुरी मन्दिर बना जहाँ पिछले 425 वर्षों से हिन्दू श्रद्धालू दर्शन करते आ रहे थे जबकि असली अक्षयवट वृक्ष किले में हिंदुओं की पहुँच से दूर कर दिया गया. वास्तव में यह वृक्ष जिस तरह सनातनता का विचार देता है, वह अत्यंत विपरीत समयकाल में भी हिंदुओं को भविष्य के लिये आशा का प्रतीक था. अकबर इसे एक चुनौती मानता था. इसीलिए उसके आदेश पर वर्षों तक गर्म तेल इस वृक्ष के जड़ों में डाला गया लेकिन यह वृक्ष फिर भी नष्ट नही हुआ. अकबर के बेटे जहाँगीर के शासनकाल में पहले अक्षयवट वृक्ष को जलाया गया. फिर भी वृक्ष नष्ट नही हुआ. इसके बाद जहाँगीर के आदेश पर इस वृक्ष को काट दिया गया. लेकिन जड़ो से फिर से शाखायें निकल आई. जहाँगीर के बाद भी मुगल शासन में अनेकों बार इस वृक्ष को नष्ट करने का प्रयास हुआ. लेकिन यह वृक्ष हर बार पुनर्जीवित होता रहा. ऐसा प्रतीत होता है मानो यह पवित्र वह वृक्ष बारम्बार पुनर्जीवित होकर इस्लामिक आक्रांताओं को यह कठोर संदेश देता रहा कि तुम चाहे जितने प्रयास कर लो किन्तु सनातन धर्म को समाप्त नही कर सकोगे. साथ ही अपने आस्तित्व को मिली हर चुनौती से सफलतापूर्वक निबटकर यह सनातनधर्मियों में नवीन आशा का संचार करता रहा. मुगलों के बाद यह किला अंग्रेजों के पास रहा और उन्होंने भी मुगलों द्वारा लगाए प्रतिबन्ध को जारी रखा. स्वतंत्रता के पश्चात यह किला भारतीय सेना के नियंत्रण में है. यहाँ आम श्रद्धालुओं का आना सम्भव नही था. श्रद्धालुओं और सन्तों की लगातार मांग के बाद भी किसी सरकार ने इस वृक्ष के दर्शन के लिए सुलभ बनाने में रुचि नही दिखाई. किन्तु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से यह सम्भव हो सका है जिसके लिए वह साधुवाद के पात्र हैं.आज तक किसी ने क्यों किन कारणों से नहीं किया आप सोचें या वो खुद जाने 💐💐जय सनातन💐💐

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