एक बार एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ कुम्भ के मेले का भ्रमण कर रहे थे। वहां विचरण करते समय उन्होंने एक साधु को माला फेरते और साधना करते देखा। उन्होंने पाया कि साधु बार-बार आंखे खोलकर देख लेता कि लोगों ने कितना दान दिया है। वो हंसे और आगे बढ़े।  थोड़ी दूर जाकर देखा कि एक पंडितजी भागवत वाचन रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर शब्दों के कोई भाव नहीं थे। वे तो बस यंत्रवत बोले जा रहे थे और चेलों की जमात उनके पास बैठी थी। इस पर महात्मा खिलखिलाकर हंस पड़ेे। वे थोड़ा-सा आगे बढ़े ही थे कि देखते हैं एक युवक बड़ी मेहनत और लगन से रोगियों की सेवा कर रहा है। उनके घावों पर मरहम लगा रहा है और उन्हें बड़े प्रेमभाव से सांत्वना दे रहा है।  महात्मा ने उसे देखा तो उनकी आंखें भर आईं और वे भावुक हो गए। जैसे ही महात्मा अपने शिष्यों के साथ अपने आश्रम पहुंचे तो शिष्यों ने गुरु से पहले दो जगह हंसने और एक जगह भावुक होने का कारण पूछा।  गुरु ने कहा, पहली दो जगहों पर तो मात्र आडंबर ही था लेकिन भगवान की प्राप्ति के लिए केवल एक ही आदमी था जो व्याकुल दिखाई दे रहा था। वही व्यक्ति था जो पूरे मनोयोग के साथ लोगों की सेवा कर रहा था। उसकी सेवा भावना को देखकर मेरा मन द्रवित हो गया और मैं सोचने लगा कि जाने कब जनमानस धर्म के सच्चे स्वरूप को समझेगा। मात्र वही एक व्यक्ति था, जो धर्म का महत्व और उसके मर्म को समझ रहा था। साधु बोले कि धर्म की सेवा का कोई विज्ञान या परिभाषा नहीं होती, मानव सेवा ही सही मायनों में धर्म और समाज की सेवा है। 🙏🙏🌹जय श्री हरि विष्णु🌹🙏🙏

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वैसे तो हिंदू धर्म में कोई भी शुभ काम करने से पहले भगवान गणेश की पूजा अच्छा शगुन माना जाता है, लेकिन राजस्थान में तो एक गणेश मंदिर ऐसा भी है जहां उनको हर शुभ काम से पहले बाकायदा चिट्ठी भेजकर निमंत्रित किया जाता है। इस गणेश मंदिर में हर समय भगवान के चरणों में चिठ्ठियों और निमंत्रण पत्रों का ढेर लगा रहता है। राजस्थान के सवाई माधौपुर से लगभग 10 कि.मी. की दूरी पर रणथंभौर के किले में बना यह गणेश मंदिर अपनी इसी बात के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग घर में कोई भी मांगलिक कार्यक्रम हो तो रणथंभौर वाले गणेश जी के नाम कार्ड भेजना नहीं भूलते। यही नहीं देश के कई स्थानों से लोग अपने घर में होने वाले हर मांगलिक आयोजन का बुलावा यहां भगवान गणेश जी नाम भेजते हैं। जिसके चलते सम्पूर्ण भारत से यहां भगवान के नाम डाक आती है। कार्ड पर पता लिखा जाता हैं- श्री गणेश जी, रणथंभौर का किला, जिला- सवाई माधौपुर (राजस्थान)। डाकिया भी इन चिट्ठियों को बड़े ही सम्मान से मंदिर में पहुंचा देता है। जहां पुजारी इस डाक को भगवान गणेश के चरणों में रख देते हैं। मान्याता है कि इस मंदिर में भगवान गणेश को निमंत्रण भेजने से सारे काम निर्विघ्न पूरे हो जाते हैं।🌹🕉 गं गणपतये नमो नमः🌹

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कवर्धा के भोरमदेव मंदिर में करें शिवलिंग के दर्शन, कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में 10वीं सदी के भोरमदेव मंदिर में शिवलिंग के दर्शन के बाद सुकून मिलता है। मंदिर देवताओं और मानव आकृतियों की उत्कृष्ट नक्काशी के साथ मूर्तिकला के चमत्कार के कारण सभी की आंखों का तारा है। यहां पूजन करने के लिए हर वर्ष देश ही नहीं विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। भगवान शिव को स्थानीय बोलचाल की भाषा में भोरमदेव भी कहते हैं। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा शिवलिंग की है। भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 130 किमी दूर और कवर्धा जिले से 17 किमी दूरी पर स्थित है। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर का नाम भगवान शिव पर है। यह मंदिर प्राकृतिक परिवेश में बसा हुअ है, इसलिए यहां के नजारे का स्वर्ग-सा आकर्षण है। मैकल की पहाड़ियां यहां एक शानदार पृष्ठभूमि का निर्माण करता है |🙏 🕉नमः शिवाय🙏

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🙏🙏 जय माता दी🙏🙏🌹 जय माता दी 🌹🌹 रायपुर. छत्तीसगढ़ में पहाड़ों से घिरा हुआ है डोंगरगढ़। डोंगरगढ़ एक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां हजारों वर्षों पुराना माँ बम्लेश्वरी का मंदिर है , जो हजारों फीट की ऊंचाई पर है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालु हजारों सीढ़िया चढ़कर माता के दर्शन करने आते है। कहा जाता है कि मां बम्लेश्वरी शक्तिपीठ का इतिहास 2000 वर्ष पुराना हैं। प्राचीन समय में डोंगरगढ़ वैभवशाली कामाख्या नगरी के रूप में जाना जाता था। डोंगरगढ़ का ये बम्लेश्वरी मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है। यहां माता के 2 मंदिर है। जिनमे से एक 1 हजार 6 सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित है। जिसे बड़ी बम्लेश्वरी कहा जाता है। वही नीचे भी माता का एक स्वरुप विराजमान है। समतल का ये मंदिर छोटी बम्लेश्वरी के नाम से विख्यात है। ऊपर और नीचे स्थित मां के रूप को बड़ी और छोटी बहन के रूप में जाना जाता है। बम्लेश्वरी माता के अलावा यहां बजरंगबली मंदिर, नाग वासुकी मंदिर, शीतला और दादी मां जैसे और भी मंदिर स्थित है। हजारों सीढ़िया चढ़ने के बाद होती है माता से मुलाकात 1600 सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर में माता के दर्शन के लिये लगभग 1100 सीढ़िया चढ़नी पड़ती है। इस मंदिर का पट सुबह 4 बजे से ही खुल जाता है। दोपहर में 1 से 2 के बीच माता के द्वार का पट बंद किया जाता है। 2 बजे के बाद इसे रात के 10 बजे तक दर्शन के लिए खुला रखा जाता है। नवरात्री में ये मंदिर 24 घंटे खुला रहता है।

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