🌷 ॐ नमः शिवाय🌷हर हर महादेव🌷हर हर गंगे🌷 धर्म यात्रा मे आईये आज चलते है ||| 🙏🙏🙏गढ़वाल, उत्तरांचल में हिमालय पर्वतों के तल में बसा ऋषिकेश में नीलकंठ महादेव मंदिर प्रमुख पर्यटन स्थल है। नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूज्य मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकला विष ग्रहण किया गया था। उसी समय उनकी पत्नी, पार्वती ने उनका गले पर अपना हाथ रखा था जिससे कि विष उनके पेट तक नहीं पहुंचे। इस तरह, विष उनके गले में बना रहा। विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। गला नीला पड़ने के कारण ही उन्हें नीलकंठ नाम से जाना गया था। अत्यन्त प्रभावशाली यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण मंदिर के दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।

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आज का मिठा मोती एक प्यारे भजन के साथ,🙏🙏🙏 🌹🌹 जय श्री राधे कृष्णा जी 🌹🌹 🙏🙏 गुरुमंत्र 🙏🙏 एक बार एक पहुंचें हुए महात्मा के पास तिन मित्र गुरु मंत्र लेने पहुंचे| तीनो मित्रों ने बड़े ही नम्र भाव से गुरुवर को प्रणाम कर अपनी जिज्ञासा प्रकट की| महात्मा ने तीनों को अपना शिष्य बनाने से पहले तीनों की परीक्षा लेने के मन से तीनों मित्रों से एक प्रश्न पुछा,- “बताओ कान और आँख में कितना अंतर है ?” एक ने उत्तर दिया – “केवल पांच अंगुल का गुरुवर” महात्मा ने उसे एक और खड़ा करके, दुसरे से उत्तर देने के लिए कहा| दुसरे ने उत्तर दिया, – “महाराज, आँख देखने का काम करती है और कान सुनने का इसलिए प्रमाणिकता की दृष्ठि से देखा जाए तो आँख का महत्त्व अधिक माना जाएगा| महात्मा ने उसको भी एक और खड़ा कर दिया और तीसरे को अपना उत्तर देने के लिए कहा| महात्मा की आज्ञा पाकर तीसरे ने उत्तर दिया, -” भगवन! कान का महत्त्व आँख से अधिक है, क्यों कि आँख केवल लोकिक और द्रश्यमान संसार को ही देख पाती है| लेकिन कान को इस संसार के साथ-साथ परलौकिक संसार का ज्ञान प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त है| इसीलिए कान का महत्त्व आँख से कई गुना अधिक माना जा सकता है| महात्मा तीसरे की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने तीसरे को अपने पास रोकते हुए बाकि दोनों को कर्म और उपासना का उपदेश देते हुए अपनी विचार शक्ति को बढ़ाने हेतु संसार भ्रमण की आज्ञा देकर विदा कर दिया|

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आईयें आज की धर्म यात्रा मे जानेगें श्री शनिदेव जी के कुछ मंदिरो के बारे मे || कहते है जिस व्यक्ति पर शनिदेव की कृपा हो जाती है वह रंक से राजा बन जाता है। यहां शनिदेव के कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में बताया गया है जिनके दर्शन करने से व्यक्ति को शनि दोषों से मुक्ति मिलती है।  शनि मंदिर कोसीकलां दिल्ली से 128 कि.मी. दूर कोसीकलां पर भगवान शनिदेव का मंदिर स्थित हैं। इसके आस-पास नंदगांव, बरसाना और श्री बांकेबिहारी मंदिर भी है। कहा जाता है कि यहां की परिक्रमा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। माना जाता है कि यहां पर शनिदेव को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दर्शन दिए थे अौर वरदान दिया था कि जो भी भक्त इस वन की परिक्रमा करेगा उसे शनिदेव कभी भी कष्ट नहीं पहुंचाएंगे।  कष्टभंजन हनुमान मंदिर गुजरात में भावनगर के सारंगपुर में रामभक्त हनुमान का मंदिर स्थित है। इसे कष्टभंजन हनुमानजी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में हनुमान जी के साथ शनिदेव विराजित हैं। शनिदेव स्त्री रूप में हनुमान जी के चरणों में बैठे दिखाई देते हैं। यदि कुंडली में शनि दोष हो तो कष्टभंजन हनुमान के दर्शन और पूजा-अर्चना करने मात्र से सभी दोष खत्म हो जाते हैं। इसी वजह से इस मंदिर में साल भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। शनि मंदिर, इंदौर इंदौर के जूनी इंदौर में भगवान शनिदेव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर शनिदेव के अन्य मंदिरों से भिन्न है। यहां भगवान शनिदेव का 16 श्रृंगार किया जाता है। अन्य मंदिरों में शनिदेव की प्रतिमा पर कोई श्रृंगार नहीं किया जाता। लेकिन यहां शनिदेव को रोज शाही कपड़े भी पहनाए जाते हैं।  शनिश्चरा मंदिर ग्वालियर मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में शनिदेव का प्राचीन मंदिर स्थित है। माना जाता है कि हनुमान जी ने लंका से शनिदेव को यहां फेंका था। तभी से शनिदेव यहां पर विराजमान हैं। यहां पर शनिदेव को तेल अर्पित करने के बाद गले मिलने की प्रथा भी है। यहां आने वाले भक्त प्यार से शनिदेव के गले मिलकर उनसे अपनी तकलीफें बांटते हैं। कहा जाता है कि ऐसा करने से सनिदेव उनकी सारी तकलाफें दूर कर देते हैं।🙏🌹जय शनिदेव🌹🙏

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धर्म यात्रा मे आज की कडी़ मे आईयें आपको ले चलते है उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित कसारदेवी मंदिर के दर्शन हेतु ll इस मंदिर की 'असीम' शक्ति से नासा के वैज्ञानिक भी हैरान हैं। दुनिया में तीन पर्यटक स्थल ऐसे हैं जहां कुदरत की खूबसूरती के दर्शन तो होते ही हैं, साथ ही मानसिक शांति भी महसूस होती है। ये अद्वितीय और चुंबकीय शक्ति का केंद्र भी हैं। इनमें से एक भारत के उत्तराखंड में अल्मोड़ा स्थिति कसारदेवी शक्तिपीठ है। इन तीनों धर्म स्थलों पर हजारों साल पहले सभ्यताएं बसी थीं। नासा के वैज्ञानिक चुम्बकीय रूप से इन तीनों जगहों के चार्ज होने के कारणों और प्रभावों पर शोध कर रहे हैं। पर्यावरणविद डॉक्टर अजय रावत ने भी लंबे समय तक इस पर शोध किया है। उन्होंने बताया कि कसारदेवी मंदिर के आसपास वाला पूरा क्षेत्र वैन एलेन बेल्ट है, जहां धरती के भीतर विशाल भू-चुंबकीय पिंड है। इस पिंड में विद्युतीय चार्ज कणों की परत होती है जिसे रेडिएशन भी कह सकते हैं। पिछले दो साल से नासा के वैज्ञानिक इस बैल्ट के बनने के कारणों को जानने में जुटे हैं। इस वैज्ञानिक अध्ययन में यह भी पता लगाया जा रहा है कि मानव मस्तिष्क या प्रकृति पर इस चुंबकीय पिंड का क्या असर पड़ता है। अब तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि अल्मोड़ा स्थित कसारदेवी मंदिर और दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के स्टोन हेंग में अद्भुत समानताएं हैं। इन तीनों जगहों पर चुंबकीय शक्ति का विशेष पुंज है। डॉ. रावत ने भी अपने शोध में इन तीनों स्थलों को चुंबकीय रूप से चार्ज पाया है। उन्होंने बताया कि कसारदेवी मंदिर के आसपास भी इस तरह की शक्ति निहित है।🙏🙏 जय माता दी 🙏🙏 माँ की मेहर आप पर सदैव बनी रहे,🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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भगवान गणपति के चमत्कारों की कई कहानियां पुराणों में हैं, लेकिन उनके चमत्कार आज भी देखे जा सकते हैं। इन्हीं में एक चमत्कार चित्तूर का कनिपक्कम गणपति मंदिर में हर दिन देखने को मिलता है। भगवान गणेश का यह मंदिर कई कारणों से अपने आप में अनूठा और अद्भुत है। कहा जाता है कि इस मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति का आकार हर दिन बढ़ता जा रहा है। आंध्रप्रदेश के चित्तूर में बाहुदा नदी के बीचों-बीच बने इस मंदिर में भगवान गणेश की मूर्ति विराजमान है। मान्यता के अनुसार, यहां आने वाले भक्तों के कष्टों को भगवान गणपति तुरंत दूर करते हैं। रोज बढ़ रही है भगवान गणेश की मूर्ति कहते हैं कि इस मंदिर में मौजूद गणेश की मूर्ति का आकार हर दिन बढ़ता ही जा रहा है। इस बात का प्रमाण उनका पेट और घुटना है, जो बड़ा आकार लेता जा रहा है। कहा जाता है कि भगवान गणेश की एक भक्त श्री लक्ष्माम्मा ने उन्हें एक कवच भेंट किया था, लेकिन प्रतिमा का आकार बढने की वजह से अब वह कवच भगवान को नहीं पहनाया जाता।🌹🌹🌹 🕉 गं गणपतये नमो नमः🌹🌹🌹

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कहा जाता हैं कि भगवान श्री जगन्नाथ जी के मंदिर को समुद्र ने 3 बार तोड़ दिया था, श्री जगन्नाथ मंदिर के इतिहास में ऐसा उल्लेक मिलता हैं कि महाप्रभु जगन्नाथ जी ने समुद्र से मंदिर की रक्षा के लिए श्रीराम भक्त महाबली श्री हनुमानजी को नियुक्त किया था, तब से ही हनुमान जी पुरी नगर के द्वार पर रक्षा करने लगे, लेकिन हनुमान जी को जब भी भगवान जगन्नाथ जी, बलराम जी एवं देवी श्री सुभद्रा जी के दर्शनों की इच्छा होती थी तो वे प्रभु के दर्शनों के लिए पुरी नगर में प्रवेश कर जाते थे, ऐसे में समुद्र भी उनके पीछे पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था, इससे श्री भगवान जी एवं नगर वासियों को परेशानी होने लगती थी । महाबली हनुमान जी की इस आदत से परेशान होकर महाप्रभु जगन्नाथ जी ने श्री हनुमान जी को समुद्र के तट पर सोने की जंजीर (बेड़ी) से बांध दिया था, जब से महाबली हनुमान जी को समुद्र तट पर भगवान द्वारा बांधा गया तब से समुद्र पुरी नगरी में कभी भी प्रवेश नहीं करता । आज भी जगन्नाथपुरी के समुद्र तट पर बेदी हनुमान का प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है, जो भक्त भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन करने आते वे बेड़ी में जगड़े हनुमान जी के दर्शन करने जाते ही हैं । 🙏🙏 जय श्री राम जी, जय श्री हनुमान जी🙏🙏

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भारत में कुछ ऐसे मंदिर हैं जो अपने आप में एक खास महत्व रखते हैं। ये मंदिर आज भी लोगों के लिए रहस्य बने हुए हैं। आज हम आपको भारत में मौजूद एक ऐसे शिव जी के मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपनी अद्भुत शक्ति के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इस मंदिर में स्थित शिवलिंग दिन मे तीन बार रंग बदलता है || हम बात कर रहे हैं एक ऐसे शिवलिंग की जो राजस्थान के धौलपुर जिले में स्थित है। इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है, जिसे देखने के लिए भक्त दूर-दूर से आते हैं। आइए जानते हैं इस रहस्यमयी मंदिर के बारे में कुछ और बातें। राजस्थान के धौलपुर जिले में चंबल नदी पर स्थित इस अचलेश्वर महादेव मंदिर में मौजूद शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। इस शिवलिंग का रंग सुबह लाल, दोपहर में केसरिया और शाम को सांवला हो जाता है। हजारों साल पुराने इस मंदिर के रहस्य को अभी तक कोई समझ नहीं पाया है। विज्ञान भी अभी तक इस रहस्य को सुलझा नहीं पाया है। इसके अलावा इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग के छोर का भी अभी तक कोई पता नहीं लगा पाया है। इसके साथ इस मंदिर का एक रहस्य यह भी है कि शिवलिंग को चढ़ाया जाने वाला जल कहां जाता है। पुरातत्व विभाग की टीम भी अभी तक मंदिर के इस रहस्य को समझ नहीं पाई है। शिवलिंग के नीचे बने प्राकृतिक पाताल खड्डे में कितना भी पानी डाल लो वो नहीं भरता। 2,500 साल पहले बने इस मंदिर में पंच धातु की बनी नंदी की एक विशाल प्रतिमा है, जोकि करीब चार टन की है। बीहड़ों मे स्थित इस मंदिर तक जाने का रास्ता बहुत ही पथरीला है। इसलिए यहां कम लोग ही जा पाते है। माउण्ट आबू के पहाड़ों में बने इस मंदिर से आप खूबसूरत नही और पहाड़ देख सकते है। अगर आप अचलेश्वर मंदिर जाते हैं तो अचलगढ़ की पहाड़ियों पर स्थित हिल स्टेशन माउंट आबू भी जा सकते हैं। घूमने के लिए यह जगह बहुत ही खूबसूरत है।

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धर्म यात्रा की इस बार की कडी़ मे हम आपको ले कर चलते है राजस्थान के प्राचीन मंदिरों में से एक है झाल्ररापाटन का सूर्य मंदिर | कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण नाग भट्ट द्वितीय ने विक्रम संवत 872 में करवाया था तदनुसार इसका निर्माण ईस्वी सन 815 में हुवा होगा |इस मंदिर को पद्मनाभ मंदिर , बड़ा मंदिर, सात सहेलियों के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है| इस मंदिर को देख कर आपको कोणार्क के सूर्य मंदिर तथा खजुराहो के मंदिरों की याद आ सकती है|मंदिर का निर्माण सूर्य के रथ की भाति हुवा है जिसमे सात घोड़े जुते हुवे होते है उसी तरह इस मंदिर की आधारशिला भी सात घोड़े जुते हुवे जैसी मालुम होती है| मंदिर के गर्भ गृह में चतुर्भुज विष्णु भगवान की मूर्ति है| कर्नल जेम्सटॉड ने भी इसे चतुर्भुज मंदिर का नाम ही दिया था|  मंदिर में प्रवेश हेतु तीन तरफ से तोरण द्वार बने हुवे है | मध्य में मंडप है जो विशाल स्तंभों पर टिका हुवा है| स्तंभों पर की गई तक्षण कला अद्भुत है | मंदिर के गर्भ गृह के बाहर पीछे तीनो तरफ और मंदिर के शिखर पर उकेरी गई मुर्तिया हिन्दुस्तान के मंदिर स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण है|मंदिर का शिखर भूमि तल से तक़रीबन 97 फीट ऊँचा है | सबसे अद्भुत है मंदिर के ऊपर चारो तरफ विराजित साधुओ की मुर्तिया, इन मूर्तियों का अंग विन्यास इतना सुन्दर है की ये मुर्तिया एकदम जीवंत लगती है ऐसा लगता है मानो सचमुच में कोई साधू माला फेर रहे हो | मूर्तियों के पाँव के अंगूठे और हाथो की उंगलिया देखने लायक है | मूर्तियों के केश विन्यास, जटा, पगड़ी और मुखाकृतिया भी एकदम सजीव मालुम पड़ती है |  मंदिर के बाह भाग में नायिकाओं की मुर्तिया इतनी मनमोहक भाव लिए हुवे है की आपको इनके संगतराशो पर हैरत होने लगती है की उन्होंने इस मंदिर की मूर्तियों को छेनी और हथोडी से बनाया या जादू से ? मंदिर के बाह्य भाग पर उकेरी गई नायिकाओं की मुर्तियो का सौन्दर्य आपको अभिभूत कर देता है | मुर्तिया का अंग सौष्ठव इतना नापा तुला बन पड़ा है और भाव भंगिमाए भी इतनी जीवंत है की आप को लगता है की शायद रात को ये सब जिन्दी हो जाती होगी | मंदिर के चारो तरफ सारा संसार उकेरा हुवा है मूर्तिकारो ने | शायद मूर्तिकार अपने प्राणों को ही प्रतिष्ठित करते होंगे मूर्तियों को बनाते समय|||🙏🌹ॐ सुर्याय नमः 🌹🙏

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