Rajesh Agrawal 🌹 Oct 15, 2019

+409 प्रतिक्रिया 49 कॉमेंट्स • 111 शेयर
Rajesh Agrawal 🌹 Oct 13, 2019

🙏ॐ सुर्याय नमः 🙏 सभी श्रद्धालुओं को शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं🙏 धर्म यात्रा मे आज चलते है कोटा के सुर्यनारायण मंदिर दर्शनो हेतु ------ सभी के मन में कोई ना कोई ऐसी कामना होती है जिसे पूरा करने की हम दिन रात भगवान से प्रार्थना कर रहे होते हैं। कई बार ऐसी कामनाएं होती हैं जिनकी पूर्ति हम जल्द से जल्द चाहते हैं और इसके लिए ढोंगी बाबाओं की सलाह पर तरह-तरह के पाखंड करने से भी नहीं चूकते। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति भगवान सूर्य की स्तुति करता है, रविवार को व्रत रखता है और सुबह-सुबह उन्हें अर्घ्य देता है उसके जीवन में सुख और शांति तो आती ही है साथ ही उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं भी शीघ्र पूरी होती हैं। शास्त्रों में सूर्य को प्रत्यक्ष देव बताया गया है जिनके दर्शन हर कोई कर सकता है। सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है कि प्रतिदिन प्रात:काल तांबे के लोटे में जल लेकर और उसमें लाल फूल, चावल डालकर सूर्य मंत्र का जाप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। इससे भगवान सूर्य प्रसन्न होकर भक्त को दीर्घायु, आरोग्य, धन, धान्य, यश, विद्या, वैभव और सौभाग्य प्रदान करते हैं। रविवार सूर्य पूजा का दिवस होता है इसलिए यदि इस दिन व्रत रखकर भगवान सूर्य नारायण की स्तुति की जाये और उनकी कथा सुनी जाए तो असीम लाभ प्राप्त होता है।

+406 प्रतिक्रिया 60 कॉमेंट्स • 148 शेयर
Rajesh Agrawal 🌹 Oct 12, 2019

+401 प्रतिक्रिया 46 कॉमेंट्स • 107 शेयर
Rajesh Agrawal 🌹 Oct 11, 2019

🌺 जय माता दी 🌺 आईये धर्म यात्रा मे आज चलते है माँ के एक और पावन रुप के दर्शन हेतु 🌺 माँ श्री शाकंभरी भगवती का अति पावन प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठ शिवालिक पर्वतमाला के जंगलों में एक बरसाती नदी के किनारे है। जिसका वर्णन स्कंद पुराण,मार्कंडेय पुराण,भागवत आदि पुराणों मे मिलता है। माँ का यही शक्तिपीठ देवी का नित्य स्थान है। कहा जाता है कि माता यहाँ स्वयंभू स्वरूप मे प्रकट हुई थी। जनश्रुतियों के अनुसार जगदंबा के इस धाम के प्रथम दर्शन एक चरवाहे ने किये थे। जिसकी समाधि आज भी मंदिर परिसर मे बनी हुई है। शाकम्भरी देवी माँ के वैसे तो अनेक धाम है। लेकिन सहारनपुर की जंगली पहाडियों मे विराजमान सिद्ध भवन की छटा ही कुछ निराली है। पहाड़ी की तलहटी मे माँ का मंदिर है। पंद्रह-सौलह सीढियाँ चढने के पश्चात माँ के अद्भुत स्वरूप के दर्शन होते हैं। संगमरमर के चबुतरे पर जिस पर चांदी मढी हुई है माता अपने चारों स्वरूपों और बाल गणेश के साथ विराजमान है। माता के चारों रूप सुंदर पोशाकों सोने व चांदी के आभुषणो से अलंकृत है। माँ के दायीं और भीमा एवं भ्रामरी तथा बायीं और शताक्षी देवी प्रतिष्ठित है। देश मे ये एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ दुर्गा के चार रूपो के दर्शन एक साथ होते है।

+450 प्रतिक्रिया 81 कॉमेंट्स • 130 शेयर
Rajesh Agrawal 🌹 Oct 10, 2019

🙏 जय श्री लक्ष्मीनारायण जी 🙏 धर्म यात्रा मे आज दर्शन करेंगे चम्बा के प्राचीन मंदिरों की श्र्ंखला में लक्ष्मी नारायण मंदिर का कलात्मक दृष्टि से विषेश महत्व है । यह मंदिर चम्बा के मध्य शहरी भाग में निर्मित है । सामने की ओर से भीतर जाने के लिए दो गेट है । एक गेट से लोग दर्शननार्थ के लिए जाते है । इस गेट के बाहर रास्ते के दूसरी तरफ एक ऊँचा खंबा है जो पत्थर का बना है । इसके ऊपर एक सुन्दर बाज बैठा लक्ष्मी नारायण मंदिर की ओर मुँह किये दर्शाया गया है ।  गेट में प्रवेश होते ही इस परिसर में निर्मित 6 मंदिरो के समूह का पहला भव्य व विशाल मंदिर लक्ष्मी नारायण का है । भीतर पहुंचते ही भगवान् विष्णु की विशाल संगमरमर की प्रतिमा के दर्शन हो जाते है । विशाल सिंहासन पर निर्मित भगवान् विष्णु की भव्य संगमरमर की चतुर्भुज प्रतिमा अवलोकनीय है । सिंहासन के एक ओर भगवान् श्री गणेश ओर दूसरी तरफ भगवान् बुद्ध की प्रतिमा है । इस शैली में  इस मंदिर के बिलकुल साथ इस समूह का दूसरा मंदिर राधा कृष्ण का है । ये इस मंदिर से छोटे आकार का है । गर्भगृह में राधा व भगवान् कृष्ण की संगमरमर की सुन्दर प्रतिमाएं स्थापित है । ये प्रतिमाएं चांदी के पत्थरों से जड़े सिंहासन पर विद्यमान है । भगवान् कृष्ण की प्रतिमा चतुर्भुजी है ।  राधा कृष्ण मंदिर इस वर्ग का अपेक्षाकृत नवीन मंदिर है जिसे राजा चम्बा जीत सिंह की विधवा रानी शारदा ने बनवाया था ।  इस समूह का तीसरा मंदिर चन्द्रगुप्त महादेव का है । यह मंदिर लक्ष्मी नारायण मंदिर के साथ ही बनाया गया है । जो 10वीं व ग्याहरवीं शताब्दी का है । यह मंदिर उस समय भी विद्यमान था जब साहिल वर्मन ने यहाँ अन्य मंदिरों की स्थापना की थी । जलहरी में स्थापित शिवलिंग गर्भगृह में सुशोभित है । ऊपर चांदी का छत्तर है । शिव को समर्पित यह मंदिर इस समूह का प्राचीनतम मंदिर है । चौथा मंदिर भगवान् शिव को ही समर्पित गौरीशंकर महादेव का है । यह मंदिर प्राचीनता की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है । गर्भगृह में कांसे की भगवान् शिव को समर्पित मूर्ति , कला का अभूतपूर्व उदाहरण है । इसमें पीछे नंदी दिखाया गया है । बताया जाता है की प्रतिमा राजा साहिल वर्मन के पुत्र युगाकार वर्मन ने 11वीं शताब्दी में बनवायी थी । मूर्ति चतुर्भुजी है जिसके सामने शिवलिंग स्थापित है । पांचवा मंदिर अम्बकेश्वर महादेव को समर्पित है । इसे त्रिमुकतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है । इसके गर्भगृह में त्रिमुखी शिवलिंग स्थापित है । यह संगमरमर का है । शिखर पिरामिड के आकार का है । इसके पीछे दिवार के साथ कई छोटी छोटी प्रतिमाएं है ।  अंतिम छठा मंदिर लक्ष्मी दामोदर के नाम से विख्यात भगवान् विष्णु को समर्पित है । इसके गर्भगृह में  भगवान् विष्णु खड़ी की प्रतिमा संगमरमर की बनी है । यह चतुर्भुजी है । ये सभी मंदिर राजा साहिल वर्मन ने 10वीं शताब्दी में बनवाये जिनका 16वीं शताब्दी में राजा प्रताप सिंह ने पुनरुद्धार किया । ये मंदिर चम्बा नगर के इतिहास और धर्म के मूक दर्शक है । हिमाचल प्रदेश में शिखर और नगर शैली के मंदिरों में लक्ष्मी नारायण मंदिर विशाल माना जाता है । इस मंदिर में स्थापित भव्य संगमरमर की प्रतिमा के बारे में एक रोचक कथा कही जाती है । बताया जाता है कि जिन संगमरमर के पथरों से ये प्रतिमाएं बनाई गयी है उन्हें विंध्याचल पर्वत से राजा ने अपने नो पुत्रों द्वारा मंगवाया था । लेकिन जब मूर्ति निर्माण के समय उन पथरों को काटना प्रारम्भ किया तो उसमें मेंढक निकल आया । इसलिए विष्णु की प्रतिमा के निर्माण के लिए यह अपशगुन माना गया । इसलिए इन प्रतिमाओं से विष्णु की प्रतिमाएं न बनाकर अन्य प्रतिमाएं बनायीं गयी जिनमें भगवान् शिव की त्रिमुखी शिवलिंग , जो अम्बकेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित है , भगवान गणेश व लक्ष्मी माता की प्रतिमाएं प्रमुख है । इसके बाद  साहिल बर्मा ने पुनः अपने पुत्रों को संगमरमर के पत्थरों के लिए भेजा लेकिन उन्हें रास्ते में हो मौत के घाट उतार दिया गया । राजा ने फिर से अपने पुत्र युगाकार को इस कार्य के लिए नियुक्त किया । शत्रुओँ ने उसका भी घेराव किया लेकिन वो बड़ा बहादुर था । वो विंध्याचल पर्वत से चट्टानें लाने में सफल हो गया । इन पथरों को तराश कर भगवान् विष्णु की वह प्रतिमा बनायीं गयी जो पहले मंदिर में खड़ी हुई दर्शायी गयी है ।

+403 प्रतिक्रिया 46 कॉमेंट्स • 119 शेयर

🌺ॐ गं गणपतये नमो नमः 🌺 धर्म यात्रा मे आईये आज चलते है कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में भगवान गणेशजी का खूबसूरत मंदिर है, जिसे पंचमुखी गणेश मंदिर के नाम से जाना जाता है। बेंगलुरु के हनुमंतनगर में कुमारा स्वामी देवस्थान के पास पंचमुखी गणेश मंदिर स्थित है। मंदिर के पास में विश्वकर्मा अाश्रम भी है। आश्रम के छात्र मंदिर में होने वाले आयोजनों में अपनी सेवा देते हैं। 30 फीट ऊंचे गोपुरम पर है पंचमुखी गणेश मंदिर का गोपुरम 30 फीट ऊंचा है, जिस पर गणेशजी की पंचमुखी प्रतिमा बनी हुई है, यह स्वर्ण रंग की है। इस प्रतिमा के पांच में से 4 मुख चार दिशाओं में बने हुए हैं और पांचवा मुख इन चारों मुखों के ऊपर सामने की ओर है। इस पंचमुखी गणेश मंदिर भगवान का वाहन चूहा नहीं है। बल्की यहां पर भगवान गजानन शेर के साथ पूजे जाते हैं। मंदिर का निर्माण श्रीचक्र कमेटी द्वारा 2007 में किया गया था। इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि इसका निर्माण श्रीचक्र के आकार में किया गया है। गणेशजी के 32 रूपों के चित्र मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेश के 32 रूप के खूबसूरत चित्र देखे जा सकते हैं। प्रत्येक पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर में सत्यनारायण स्वामी की पूजा की जाती है। गुरु पूर्णिमा, संकष्टी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी के अवसर पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

+483 प्रतिक्रिया 62 कॉमेंट्स • 117 शेयर

दशहरा या विजयदशमी का त्योहार भगवान राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत का प्रतीक है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं उन जगहों के बारे में जहां का दशहरा, देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में फेमस है... बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे राज्यों में जहां दुर्गा पूजा के दौरान मूर्ति स्थापाना और पंडाल निर्माण पर जोर रहता है वहीं, उत्तर भारत के राज्यों जैसे यूपी, दिल्ली और आसपास के राज्यों में नवरात्रि के नौ दिनों में रामलीला का आयोजन और दशमी के दिन दशहरा और रावण वध की धूम रहती है। दशहरा या विजयदशमी का त्योहार भगवान राम की रावण पर और देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत का प्रतीक है। ऐसे में हम आपको बता रहे हैं उन जगहों के बारे में जहां का दशहरा, देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में फेमस है...  मैसूर का दशहरा मैसूर का दशहरा भी वर्ल्ड फेमस है। यहां दशहरे के मौके पर निकलने वाली झांकी को देखने के लिए दुनियाभर से पर्यटक यहां आते हैं। मैसूर का दशहरा सेलिब्रेशन 9 दिनों तक चलता है और आखिरी दिन यानीं दसवें दिन विजयदशमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान ग्रैंड प्रोसेशन निकाला जाता है औऱ सिर्फ मैसूर पैलेस ही नहीं बल्कि पूरा शहर दुल्हन की तरह सजाया जाता है। शहर के प्रमुख चामुंडेश्वरी मंदिर में भी दशहरा फेस्टिवल जोर शोर से मनाया जाता है। कुल्लू का दशहरा ऐसी मान्यता है कि कुल्लू का दशहरा सेलिब्रेशन 17वीं शताब्दी में शुरू हुआ था जब कुल्लू राजा-महाराजाओं का गढ़ माना जाता था। यहां का दशहरा सेलिब्रेशन भी अलग ही लेवल पर होता है जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने-अपने आराध्य देव की मूर्ति को डोली में बिठाकर झांकी निकाली जाती है और मंदिर मैदान में स्थित कुल्लू के मुख्य भगवान भगवान जगन्नाथ से मिलने पहुंचते हैं। यहां दशहरा का उत्सव 7 दिनों तक चलता है जिसमें नाच-गाने के साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन भी किया जाता है।  बस्तर का दशहरा  आपको जानकर हैरानी होगी कि बस्तर का दशहरा पूरे 75 दिनों तक चलता है। छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे खूबसूरत शहर है बस्तर जो अपनी प्राकृतिक और आदिवासी संस्कृति के साथ ही दशहरा सेलिब्रेशन के लिए भी मशहूर है। हालांकि बस्तर के दशहरे में भगवान राम या रामायण से जुड़ा को भी किरदार शामिल नहीं होता। ऐसी मान्यता है कि बस्तर या जगदलपुर के दशहरे की शुरुआत 13वीं शताब्दी में काकातिया राजा ने की थी जो यहां उस वक्त शासन करते थे। दशहरे के मौके पर रथ यात्रा भी निकाली जाती है।विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश  कृष्णा नदी के किनारे बने श्री कनका दुर्गा मंदिर से दशहरा की 10 दिनों की शुरूआत होती है। यहां कनक दुर्गा देवी को दस दिनों तक अलग-अलग अवतारों में सजाया जाता है। वहीं विजयवाड़ा कनक दुर्गा मंदिर की भी खास आभा देखते ही बनती है। यहां दशहरा के समय कई तरह की पूजा होती है जिसमेे सरस्वती पूजा की खास मान्यता है। इसके अलावा काफी संख्या में श्रद्धालु कृष्णा नदी में स्नान भी करते हैं।

+379 प्रतिक्रिया 67 कॉमेंट्स • 181 शेयर

नवरात्रि का आखिरी दिन माता सिद्धिदात्री को समर्पित होता है. मान्यता है कि माता के इस नौंवे स्वरूप की उपासना करने से व्यक्ति को यश, धन, मोक्ष और तमाम तरह की सिद्धियां प्राप्त होती हैं. नवरात्रि के दौरान 9 दिनों तक मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. ऐसे में नवरात्रि का आखिरी दिन माता सिद्धिदात्री को समर्पित होता है. मान्यता है कि माता के इस नौंवे स्वरूप की उपासना करने से व्यक्ति को यश, धन, मोक्ष और तमाम तरह की सिद्धियां प्राप्त होती हैं.  यही नहीं सभी देवी-देवताओं को भी मां सिद्धिदात्री से ही सिद्धियों की प्राप्ति हुई है. मां दुर्गा का यह स्वरूप कमल पर विराजित है और इनके हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं. सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं. मां सरस्वती ज्ञान की देवी के रूप में पूजी जाती हैं. देवीपुराण में कहा गया है कि, भगवान शिव को भी मां सिद्धिदात्री की ही कृपा से सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी. इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था. इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए.

+426 प्रतिक्रिया 68 कॉमेंट्स • 156 शेयर