. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 209 स्कन्ध - 10 अध्याय - 01 इस अध्याय में:- भगवान के द्वारा पृथ्वी को आश्वासन, वसुदेव-देवकी का विवाह और कंस के द्वारा देवकी के छः पुत्रों की हत्या राजा परीक्षित ने पूछा - भगवन! आपने चन्द्रवंश और सूर्यवंश के विस्तार तथा दोनों वंशों के राजाओं का अत्यंत अद्भुत चरित्र वर्णन किया है। भगवान के परम प्रेमी मुनिवर! आपने स्वभाव से ही धर्मप्रेमी यदुवंश का भी विशद वर्णन किया। अब कृपा करके उसी वंश में अपने अंश श्री बलराम जी के साथ अवतीर्ण हुए भगवान श्रीकृष्ण का परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये। भगवान श्रीकृष्ण समस्त प्राणियों के जीवनदाता एवं सर्वात्मा हैं। उन्होंने यदुवंश में अवतार लेकर जो-जो लीलायें कीं, उनका विस्तार से हम लोगों को श्रवण कराइये। जिनकी तृष्णा की प्यास सर्वदा के लिए बुझ चुकी हैं, वे जीवन मुक्त महापुरुष जिसका पूर्ण प्रेम से अतृप्त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनों के लिए जो भवरोग की रामबाण औषध है तथा विषयी लोगों के लिए भी उनके कान और मन को परम आह्लाद देने वाला है, भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले, गुणानुवाद से पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्य के अतिरिक्त और ऐसा कौन है जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे ? (श्रीकृष्ण तो मेरे कुलदेव ही हैं।) जब कुरुक्षेत्र में महाभारत-युद्ध हो रहा था और देवताओं को भी जीत लेने वाले भीष्म पितामह आदि अतिरथियों से मेरे दादा पाण्डवों का युद्ध हो रहा था, उस समय कौरवों की सेना उनके लिए अपार समुद्र के सामान थी - जिसमें भीष्म आदि वीर बड़े-बड़े मच्छों को भी निगल जाने वाले तिमिंगिल मच्छों की भाँति भय उत्पन्न कर रहे थे। परन्तु मेरे स्वनामधन्य पितामह भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों की नौका का आश्रय लेकर उस समुद्र को अनायास ही पार कर गए - ठीक वैसे ही जैसे कोई मार्ग में चलता हुआ स्वभाव से ही बछड़े के खुर का गड्ढा पार कर जाय। महाराज! मेरा यह शरीर - जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशों का एकमात्र सहारा था, अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान की शरण में गयीं, तब उन्होंने हाथ में चक्र लेकर मेरी माता के गर्भ में प्रवेश किया और मेरी रक्षा की। वे समस्त शरीरधारियों के भीतर आत्मारूप से रहकर अमृत्व का दान कर रहे हैं और बाहर काल रूप से रह कर मृत्यु का। मनुष्य के रूप में प्रतीत होना, यह तो उनकी एक लीला है। आप उन्हीं के ऐश्वर्य और माधुर्य से परिपूर्ण लीलाओं का वर्णन कीजिये। भगवन! आपने अभी बतलाया था कि बलराम जी रोहिणी के पुत्र थे। इसके बाद देवकी के पुत्रों में भी आपने उनकी गणना की। दूसरा शरीर धारण किये बिना दो माताओं का पुत्र होना कैसे सम्भव है? असुरों को मुक्ति देने वाले और भक्तों को प्रेम वितरण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण अपने वात्सल्य-स्नेह से भरे हुए पिता का घर छोड़कर ब्रज में क्यों चले गये? यदुवंश शिरोमणि भक्त वत्सल प्रभु ने नन्द आदि गोप-बंधुओं के साथ कहाँ-कहाँ निवास किया? ब्रह्मा और शंकर का भी शासन करने वाले प्रभु ने ब्रज में तथा मधुपुरी में रहकर कौन-कौन सी लीलाएँ कीं? और महाराज! उन्होंने अपनी माँ के भाई मामा कंस को अपने हाथों क्यों मार डाला? वह मामा होने के कारण उनके द्वारा मारे जाने योग्य तो नहीं था। मनुष्याकार सच्चिदानन्दमय विग्रह प्रकट करके द्वारकापुरी में यदुवंशियों के साथ उन्होंने कितने वर्षों तक निवास किया? और उन सर्वशक्तिमान प्रभु की पत्नियाँ कितनी थीं? मुने! मैंने श्रीकृष्ण की जितनी लीलाएँ पूछी हैं और जो नहीं पूछीं हैं, वे सब आप मुझे विस्तार से सुनाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं और मैं बड़ी श्रद्धा के साथ उन्हें सुनना चाहता हूँ। भगवन! अन्न की तो बात ही क्या, मैंने जल का भी परित्याग कर दिया है। फिर भी वह असह्य भूख-प्यास मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमल से झरती हुई भगवान की सुधामयी लीला-कथा का पान कर रहा हूँ। सूत जी कहते हैं - शौनक जी! भगवान के प्रेमियों में अग्रगण्य एवं सर्वज्ञ श्री शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित का ऐसा समीचीन प्रश्न सुनकर उनका अभिनन्दन किया और भगवान श्रीकृष्ण की उन लीलाओं का वर्णन प्रारम्भ किया, जो समस्त कलिमलों को सदा के लिए धो डालती है। श्री शुकदेव जी कहते हैं - भगवान की लीला-रस के रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्ण की लीला-कथा श्रवण करने में तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है। भगवान श्रीकृष्ण की कथा के सम्बन्ध में प्रश्न करने से ही वक्ता, प्रश्नकर्ता और श्रोता तीनों ही पवित्र हो जाते हैं - जैसे गंगा जी का जल या भगवान शालिग्राम का चरणामृत सभी को पवित्र कर देता है। परीक्षित! उस समय लाखों दैत्यों के दल ने घमंडी राजाओं का रूप धारण कर अपने भारी भार से पृथ्वी को आक्रान्त कर रखा था। उससे त्राण पाने के लिए वह ब्रह्मा जी की शरण में गयी। पृथ्वी ने उस समय गौ का रूप धारण कर रखा था। उसके नेत्रों से आँसू बह-बहकर मुँह पर आ रहे थे। उसका मन तो खिन्न था ही, शरीर भी बहुत कृश हो गया था। वह बड़े करुण स्वर से रँभा रही थी। ब्रह्मा जी के पास जाकर उसने उन्हें अपनी पूरी कष्ट-कहानी सुनायी। ब्रह्मा जी ने बड़ी सहानुभूति के साथ उसकी दुःख-गाथा सुनी। उसके बाद वे भगवान शंकर, स्वर्ग के अन्य प्रमुख देवता तथा गौ के रूप में आयी हुई पृथ्वी को अपने साथ लेकर क्षीर सागर के तट पर गये। भगवान देवताओं के भी आराध्यदेव हैं। वे अपने भक्तों की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं और उनके समस्त क्लेशों को नष्ट कर देते हैं। वे ही जगत के एक मात्र स्वामी हैं। क्षीर सागर के तट पर पहुँच कर ब्रह्मा आदि देवताओं ने ‘पुरुषसूक्त’ के द्वारा परम पुरुष सर्वान्तर्यामी प्रभु की स्तुति की। स्तुति करते-करते ब्रह्मा जी समाधिस्थ हो गए। उन्होंने समाधि-अवस्था में आकाशवाणी सुनी। इसके बाद जगत के निर्माणकर्ता ब्रह्मा जी ने देवताओं से कहा - ‘देवताओं! मैंने भगवान की वाणी सुनी है। तुम लोग भी उसे मेरे द्वारा अभी सुन लो और फिर वैसा ही करो। उसके पालन में विलम्ब नहीं होना चाहिए। भगवान को पृथ्वी के कष्ट का पहले से ही पता है। वे ईश्वरों के भी ईश्वर हैं। अतः अपनी कालशक्ति के द्वारा पृथ्वी का भार हरण करते हुए वे जब तक पृथ्वी पर लीला करें, तब तक तुम लोग भी अपने-अपने अंशों के साथ यदुकुल में जन्म लेकर उनकी लीला में सहयोग दो। वसुदेव जी के घर स्वयं पुरुषोत्तम भगवान प्रकट होंगे। उनकी और उनकी प्रियतमा (राधा) की सेवा के लिए देवांगनाएँ जन्म ग्रहण करें। स्वयंप्रकाश भगवान शेष भी, जो भगवान की कला होने कारण अनंत हैं और जिनके सहस्र मुख हैं, भगवान के प्रिय कार्य करने के लिए उनसे पहले ही उनके बड़े भाई के रूप में अवतार ग्रहण करेंगे। भगवान की वह ऐश्वर्यशालिनी योगमाया भी, जिसने सारे जगत को मोहित कर रखा है, उनकी आज्ञा से उनकी लीला के कार्य सम्पन्न करने के लिए अंशरूप से अवतार ग्रहण करेंगी। श्री शुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! प्रजापतियों के स्वामी भगवान ब्रह्मा जी ने देवताओं को इस प्रकार आज्ञा दी और पृथ्वी को समझा-बुझा कर ढाढ़स बंधाया। इसके बाद वे अपने परम धाम को चले गए। प्राचीन काल में यदुवंशी राजा थे सूरसेन। वे मथुरापुरी में रहकर माथुरमण्डल और शूरसेनमण्डल का राज्यशासन करते थे। उसी समय से मथुरा ही समस्त यदुवंशी नरपतियों की राजधानी हो गयी थी। भगवान श्रीहरि सर्वदा यहाँ विराजमान रहते हैं। एक बार मथुरा में शूर के पुत्र वसुदेव जी विवाह करके अपनी नव-विवाहिता पत्नी देवकी के साथ घर जाने के लिए रथ पर सवार हुए। उग्रसेन का लड़का था कंस। उसने अपनी चचेरी बहिन देवकी को प्रसन्न करने के लिए उसके रथ के घोड़ों की रास पकड़ ली। वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोने के बने हुए रथ चल रहे थे। देवकी के पिता थे देवक। अपनी पुत्री पर उनका बड़ा प्रेम था। कन्या को विदा करते समय उन्होंने उसे सोने के हारों से अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हज़ार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर-सुन्दर दासियाँ दहेज में दीं। विदाई के समय वर-वधू के मंगल के लिए एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं। मार्ग में जिस समय घोड़ों की रास पकड़कर कंस रथ हाँक रहा था, उस समय आकाशवाणी ने उसे सम्बोधन करके कहा- ‘अरे मूर्ख! जिसको तू रथ में बैठाकर लिए जा रहा है, उसकी आठवें गर्भ की संतान तुझे मार डालेगी।' कंस बड़ा पापी था। उसकी दुष्टता की सीमा नही थी। वह भोजवंश का कलंक ही था। आकाशवाणी सुनते ही उसने तलवार खींच ली और अपनी बहिन की चोटी पकड़कर उसे मारने के लिए तैयार हो गया। वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप-कर्म करते-करते निर्लज्ज भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शांत करते हुए बोले - वसुदेव जी ने कहा- 'राजकुमार! आप भोजवंश के होनहार वंशधर तथा अपने कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले हैं। बड़े-बड़े शूरवीर आपके गुणों की सराहना करते हैं। इधर यह तो एक स्त्री, दूसरे आपकी बहिन और तीसरे यह विवाह का शुभ अवसर! ऐसी स्थिति में आप इसे कैसे मार सकते हैं ? वीरवर! जो जन्म लेते हैं, उनके शरीर के साथ ही मृत्यु भी उत्पन्न होती है। आज हो या सौ वर्ष के बाद- जो प्राणी है, उसकी मृत्यु होगी ही। जब शरीर का अंत हो जाता है, तब जीव अपने कर्म के अनुसार दूसरे शरीर को ग्रहण करके अपने पहले शरीर को छोड़ देता है। उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है।' जैसे चलते समय मनुष्य एक पैर जमाकर ही दूसरा पैर उठाता है जैसे जोंक किसी अगले तिनके को पकड़ लेती है, तब पहले के पकड़े हुए तिनके को छोड़ती है - वैसे जीव भी अपने कर्म के अनुसार किसी शरीर को प्राप्त करने के बाद ही इस शरीर को छोड़ता है। जैसे कोई पुरुष जाग्रत-अवस्था में राजा के ऐश्वर्य को देखकर और इन्द्रादि के ऐश्वर्य को सुनकर उसकी अभिलाषा करने लगता है और उसका चिन्तन करते-करते उन्हीं बातों में घुल-मिलकर एक हो जाता है तथा स्वप्न में अपने को राजा या इन्द्र के रूप में अनुभव करने लगता है, साथ ही अपने दरिद्रावस्था के शरीर को भूल जाता है। कभी-कभी जाग्रत अवस्था में ही मन-ही-मन उन बातों का चिन्तन करते-करते तन्मय हो जाता है और उसे स्थूल शरीर की सुधि नहीं रहती। वैसे ही जीव कर्मकृत कामना और कामनाकृत कर्म के वश होकर दूसरे शरीर को प्राप्त हो जाता है और अपने पहले शरीर को भूल जाता है। जीव का मन अनेक विकारों का पुंज है। देहान्त के समय वह अनेक जन्मों के संचित और प्रारब्ध कर्मों की वासनाओं के अधीन होकर माया के द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरों में से जिस किसी शरीर के चिन्तन में तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि 'यह मैं हूँ', उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है। जैसे सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीली वस्तुएँ जल से भरे हुए घड़ों में या तेल आदि तरल पदार्थों में प्रतिबिम्बित होती हैं और हवा के झोंके से उनके जल आदि में हिलने-डोलने पर उनमें प्रतिबिम्बित वस्तुएँ भी चंचल जान पड़ती हैं - वैसे ही जीव अपने स्वरूप के अज्ञान द्वारा रचे हुए शरीर में राग करके उन्हें अपना आप मान बैठता है और मोहवश उनके आने-जाने को अपना आना-जाना मानने लगता है। इसलिए जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसी से द्रोह नहीं नहीं करना चाहिए; क्योंकि जीव कर्म के अधीन हो गया है और जो किसी से भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवन में शत्रु से और जीवन के बाद परलोक से भयभीत होना ही पड़ेगा । कंस! यह आपकी छोटी बहिन अभी बच्ची और बहुत दीन है। यह तो आपकी कन्या के सामान है। इस पर, अभी-अभी इसका विवाह हुआ है, विवाह के मंगलचिह्न भी इसके शरीर से नहीं उतरे हैं। ऐसी दशा में आप-जैसे दीनवत्सल पुरुष को इस बेचारी का वध करना उचित नहीं है। श्री शुकदेव जी कहते हैं - परीक्षित! इस प्रकार वसुदेवजी ने प्रशंसा आदि सामनीति और भय आदि भेदनीति से कंस को बहुत समझाया। परन्तु वह क्रूर तो राक्षसों का अनुयायी हो रहा था; इसलिए उसने अपने घोर संकल्प को नहीं छोड़ा। वसुदेव जी ने कंस का विकट हठ देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिए। तब वे इस निश्चय पर पहुँचे। ‘बुद्धिमान पुरुष को, जहाँ तक उसकी बुद्धि और बल साथ दें, मृत्यु को टालने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रयत्न करने पर भी वह न टल सके, तो फिर प्रयत्न करने वाले का कोई दोष नहीं रहता। इसलिए इस मृत्युरूप कंस को अपने पुत्र दे देने की प्रतिज्ञा करके मैं इस दीन देवकी को बचा लूँ। यदि मेरे लड़के होंगे तब तक यह कंस स्वयं नहीं मर जायगा, तब क्या होगा? सम्भव है, उल्टा ही हो। मेरा लड़का ही इसे मार डाले! क्योंकि विधाता के विधान का पार पाना बहुत कठिन है। मृत्यु सामने आकर भी टल जाती है और टली हुई भी लौट आती है। जिस समय वन में आग लगती है, उस समय कौन-सी लकड़ी जले और कौन-सी न जले, दूर की जल जाय और पास की बची रहे - इन सब बातों में अदृष्ट के सिवा और कोई कारण नहीं होता। वैसे ही किस प्राणी का कौन-सा शरीर बना रहेगा और किस हेतु से कौन-सा शरीर नष्ट हो जायेगा - इस बात का पता लगा लेना बहुत ही कठिन है। अपनी बुद्धि के अनुसार ऐसा निश्चय करके वसुदेव जी ने बहुत सम्मान के साथ पापी कंस की बड़ी प्रशंसा की। परीक्षित! कंस बड़ा क्रूर और निर्ल्लज था; अतः ऐसा करते समय वसुदेव जी के मन में बड़ी पीड़ा भी हो रही थी। फिर भी उन्होंने ऊपर से अपने मुखकमल को प्रफुल्लित करके हँसते हुए कहा। वसुदेवजी ने कहा- 'सौम्य! आपको देवकी से तो कोई भय है नहीं, जैसा कि आकाशवाणी ने कहा है। भय है पुत्रों से, सो इसके पुत्र मैं आपको लाकर सौंप दूँगा।' श्री शुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! कंस जानता था कि वसुदेव जी के वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है। इसलिए उसने अपनी बहिन देवकी को मारने का विचार छोड़ दिया। इससे वसुदेव जी बहुत प्रसन्न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये। देवकी बड़ी सती-साध्वी थी। सारे देवता उसके शरीर में निवास करते थे। समय आने पर देवकी के गर्भ से प्रतिवर्ष एक-एक करके आठ पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई। पहले पुत्र का नाम था कीर्तिमान। वसुदेव जी ने उसे लाकर कंस को दे दिया। ऐसा करते समय उन्हें कष्ट तो अवश्य हुआ, परन्तु उससे भी बड़ा कष्ट उन्हें इस बात का था कि कहीं उनके वचन झूठे न हो जायँ। परीक्षित! सत्यसन्ध पुरुष बड़े-से-बड़ा कष्ट भी सह लेते हैं, ज्ञानियों को किसी बात की अपेक्षा नहीं होती, नीच पुरुष बुरे-से-बुरे काम भी कर सकते हैं और जो जितेन्द्रिये हैं - जिन्होंने भगवान को हृदय में धारण कर रखा है, वे सब कुछ त्याग सकते हैं। जब कंस ने देखा कि वसुदेव जी का अपने पुत्रों के जीवन और मृत्यु में समान भाव है एवं वे सत्य में पूर्ण निष्ठावान भी हैं, तब वह प्रसन्न हुआ और उनसे हँसकर बोला- वसुदेवजी! आप इस नन्हे-से सुकुमार बालक को ले जाइये। इससे मुझे कोई भय नहीं है, क्योंकि आकाशवाणी ने तो ऐसा कहा था कि देवकी के आठवें गर्भ से उत्पन्न सन्तान के द्वारा मेरी मृत्यु होगी। वसुदेवजी ने कहा - ‘ठीक है’ और उस बालक को लेकर वापस लौट आये। परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथ में नहीं है। वह किसी भी क्षण बदल सकता है। इसलिए उन्होंने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया । परीक्षित! इधर भगवान नारद कंस के पास आये और उससे बोले कि ‘कंस! ब्रज में रहने वाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंश की स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनों के सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं। उन्होंने यह भी बतलाया कि दैत्यों के कारण पृथ्वी का भार बढ़ गया है, इसलिए देवताओं की ओर से अब उनके वध की तैयारी की जा रही है। जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंस को यह निश्चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकी के गर्भ से विष्णु भगवान ही मुझे मारने के लिए पैदा होने वाले हैं। इसलिए उसने देवकी और वसुदेव को हथकड़ी-बेड़ी से जकड़ कर क़ैद में डाल दिया और उन दोनों से जो-जो पुत्र होते गए, उन्हें मारता गया। उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालक के रूप में न आ गया हो। परीक्षित! पृथ्वी में यह बात प्रायः देखी जाती है कि अपने प्राणों का ही पोषण करने वाले लोभी राजा अपने स्वार्थ के लिए माता-पिता भाई-बन्धु और अपने अत्यन्त हितैषी इष्ट-मित्रों की भी हत्या कर डालते हैं। कंस जानता था कि मैं पहले कालनेमि असुर था और विष्णु ने मुझे मार डाला था। इससे उसने यदुवंशियों से घोर विरोध ठान लिया। कंस बड़ा बलवान था। उसने यदु, भोज और अन्धक वंश के अधिनायक अपने पिता उग्रसेन को क़ैद कर लिया और शूरसेन- का राज्य वह स्वयं करने लगा। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" ********************************************* 🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿🌼🌿

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हवन में आहुति देते समय क्यों कहते है ‘स्वाहा’ ?* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *अग्निदेव की दाहिकाशक्ति है ‘स्वाहा’* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ *अग्निदेव में जो जलाने की तेजरूपा ( दाहिका ) शक्ति है, वह देवी स्वाहा का सूक्ष्मरूप है। हवन में आहुति में दिए गए पदार्थों का परिपाक ( भस्म ) कर देवी स्वाहा ही उसे देवताओं को आहार के रूप में पहुंचाती हैं, इसलिए इन्हें ‘परिपाककरी’ भी कहते हैं।* सृष्टिकाल में परब्रह्म परमात्मा स्वयं ‘प्रकृति’ और ‘पुरुष’ इन दो रूपों में प्रकट होते हैं। ये प्रकृतिदेवी ही मूलप्रकृति या पराम्बा कही जाती हैं। ये आदिशक्ति अनेक लीलारूप धारण करती हैं। इन्हीं के एक अंश से देवी स्वाहा का प्रादुर्भाव हुआ जो यज्ञभाग ग्रहणकर देवताओं का पोषण करती हैं। *स्वाहा के बिना देवताओं को नहीं मिलता है भोजन* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ सृष्टि के आरम्भ की बात है, उस समय ब्राह्मण लोग यज्ञ में देवताओं के लिए जो हवनीय सामग्री अर्पित करते थे, वह देवताओं तक नहीं पहुंच पाती थी। देवताओं को भोजन नहीं मिल पा रहा था इसलिए उन्होंने ब्रह्मलोक में जाकर अपने आहार के लिए ब्रह्माजी से प्रार्थना की, देवताओं की बात सुनकर ब्रह्माजी ने भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान किया। भगवान के आदेश पर ब्रह्माजी देवी मूलप्रकृति की उपासना करने लगे। इससे प्रसन्न होकर देवी मूलप्रकृति की कला से देवी ‘स्वाहा’ प्रकट हो गयीं और ब्रह्माजी से वर मांगने को कहा। ब्रह्माजी ने कहा–’आप अग्निदेव की दाहिकाशक्ति होने की कृपा करें। आपके बिना अग्नि आहुतियों को भस्म करने में असमर्थ हैं। आप अग्निदेव की गृहस्वामिनी बनकर लोक पर उपकार करें।’ ब्रह्माजी की बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण में अनुरक्त देवी स्वाहा उदास हो गयीं और बोलीं–’परब्रह्म श्रीकृष्ण के अलावा संसार में जो कुछ भी है, सब भ्रम है। तुम जगत की रक्षा करते हो, शंकर ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है। शेषनाग सम्पूर्ण विश्व को धारण करते हैं। गणेश सभी देवताओं में अग्रपूज्य हैं। यह सब उन भगवान श्रीकृष्ण की उपासना का ही फल है।’ यह कहकर वे भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए तपस्या करने चली गयीं और वर्षों तक एक पैर पर खड़ी होकर उन्होंने तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हो गए। देवी स्वाहा के तप के अभिप्राय को जानकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा–’तुम वाराहकल्प में मेरी प्रिया बनोगी और तुम्हारा नाम ‘नाग्नजिती’ होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्ति से सम्पन्न होकर अग्निदेव की पत्नी बनो और देवताओं को संतृप्त करो। मेरे वरदान से तुम मन्त्रों का अंग बनकर पूजा प्राप्त करोगी। जो मानव मन्त्र के अंत में तुम्हारे नाम का उच्चारण करके देवताओं के लिए हवन-पदार्थ अर्पण करेंगे, वह देवताओं को सहज ही उपलब्ध हो जाएगा।’ *देवी स्वाहा बनी अग्निदेव की पत्नी-* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से अग्निदेव का देवी स्वाहा के साथ विवाह-संस्कार हुआ। शक्ति और शक्तिमान के रूप में दोनों प्रतिष्ठित होकर जगत के कल्याण में लग गए। तब से ऋषि, मुनि और ब्राह्मण मन्त्रों के साथ ‘स्वाहा’ का उच्चारण करके अग्नि में आहुति देने लगे और वह हव्य पदार्थ देवताओं को आहार रूप में प्राप्त होने लगा। जो मनुष्य स्वाहायुक्त मन्त्र का उच्चारण करता है, उसे मन्त्र पढ़ने मात्र से ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। स्वाहाहीन मन्त्र से किया हुआ हवन कोई फल नहीं देता है। *देवी स्वाहा के सिद्धिदायक सोलह नाम* 1. स्वाहा, 2. वह्निप्रिया, 3. वह्निजाया, 4. संतोषकारिणी, 5. शक्ति, 6. क्रिया, 7. कालदात्री, 8. परिपाककरी, 9. ध्रुवा, 10. गति, 11. नरदाहिका, 12. दहनक्षमा, 13. संसारसाररूपा, 14. घोरसंसारतारिणी, 15. देवजीवनरूपा, 16. देवपोषणकारिणी। *इन नामों के पाठ करने वाले मनुष्य का कोई भी शुभ कार्य अधूरा नहीं रहता। वह समस्त सिद्धियों व मनोकामनाओं को प्राप्त कर लेता है। 🐚🎀🐚🎀🐚🎀🐚🎀🐚🎀🐚🎀🌸🎀🐚🎀

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"मीरा चरित" (पोस्ट-017) मीरा श्याम कुन्ज में अपने गिरधर के समक्ष बैठी उन्हें अश्रुसिक्त नेत्रों से निहोरा कर रही थी। "बाईसा ! बाईसा हुकम !" केसर दौड़ी हुई आयी। उसका मुख प्रसन्नता से खिला हुआ था। "बाईसा जिन्होंने आपको गिरधरलाल बख्शे थे न, वे संत नगर मन्दिर में पधारे हैं।" एक ही सांस में केसर ने सब बतलाया। "ठाकुर ने बड़ी कृपा की जो इस समय संत दर्शन का सुयोग बनाया।" मीरा ने प्रसन्नतापूर्वक कहा। "जा केसर उन्हें राजमन्दिर में बुला ला ! मैं तेरा अहसान मानूँगी।" "अहसान क्या बाईसा हुकम ! मैं तो आपकी चरण रज हूँ। मैं तो अपने घर से आ रही थी तो वे मुझे रास्ते में मिले, उन्होंने मुझसे सब बात कहकर यह प्रसादी तुलसी दी और कहा कि मुझे एक बार मेरे ठाकुर जी के दर्शन करा दो। अपने ठाकुर जी का नाम लेते ही उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। बाईसा ! उनका नाम भी गिरधरदास है।" मीरा शीघ्रता से उठकर महल में भाई जयमल के पास गई और उनसे सारी बात कही। "उन संत को आप कृपया कर श्याम कुन्ज ले पधारिये भाई।" "जीजा ! किसी को ज्ञात हुआ तो गजब हो जायेगा। आजकल तो राजपुरोहित जी नगर के मन्दिर से ही आने वाले संतो का सत्कार कर विदा कर देते हैं। सब कहते हैं, इन संत बाबाओं ने ही मीरा को बिगाड़ा है।" "म्हूँ आप रे पगाँ पड़ू भाई ! मीरा रो पड़ी।" भगवान आपरो भलो करेला।" "आप पधारो जीजा ! मैं उन्हें लेकर आता हूँ। किन्तु किसी को ज्ञात न हो। पर जीजा, मैंने तो सुना है कि आप जीमण (खाना) नहीं आरोगती, आभूषण नहीं धारण नहीं करती। ऐसे में मैं अगर साधु ले आऊँ और आप गाने-रोने लग गई तो सब मुझ पर ही बरस पड़ेगें।" "नहीं भाई ! मैं अभी जाकर अच्छे वस्त्र आभूषण पहन लेती हूँ। और गिरधर का प्रसाद भी रखा है। संत को जीमा कर मैं भी पा लूँगी। और आप जो भी कहें, मैं करने को तैयार हूँ।" "और कुछ नहीं जीजा ! बस विवाह के सब रीति रिवाज सहज से कर लीजिएगा। आपको पता है जीजा आपके किसी हठ की वजह से बात युद्ध तक भी पहुँच सकती है। आपका विवाह और विदाई सब निर्विघ्न हो जाये- इसकी चिन्ता महल में सबको हो रही है।" "बहन-बेटी इतनी भारी होती है भाई ? मीरा ने भरे मन से कहा।" "नहीं जीजा !" जयमल केवल इतना ही बोल पाये। "आप उन संत को ले आईये भाई ! मैं वचन देती हूँ कि ऐसा कुछ न करूँगी, जिससे मेरी मातृभूमि पर कोई संकट आये अथवा मेरे परिजनों का मुख नीचा हो। आप सबकी प्रसन्नता पर मीरा न्यौछावर है। बस अब तो आप संत दर्शन करा दीजिये भाई !" गिरधरदास जी ने जब श्याम कुन्ज में प्रवेश किया तो वहाँ का दृश्य देखकर वे चित्रवत रह गये। चार वर्ष की मीरा अब पन्द्रह वर्ष की होने वाली थी। सुन्दर वस्त्र आभूषणों से सज्जित उसका रूप खिल उठा था। सुन्दर साड़ी के अन्दर काले केशों की मोटी नागिन सी चोटी लटक रही थी। अधरों पर मुस्कान और प्रेममद से छके नयनों में विलक्षण तेज था। श्याम कुन्ज देवागंना जैसे उसके रूप से प्रभासित था। गिरधर दास उसे देखकर ठाकुर जी के दर्शन करना भूल गये। संत को प्रणाम करने जैसे ही मीरा आगे बढ़ी, उसके नूपुरों की झंकार से वे सचेत हुये। वर रूप में सजे गिरधर गोपाल के दर्शन कर उन्हें लगा - मानों वह वृन्दावन की किसी निभृत निकुन्ज में आ खड़े हुये हैं। उन्हें देखकर जैसे एकाएक श्याम सुन्दर ने मूर्ति का रूप धारण कर लिया और कोई ब्रजवनिता अचकचाकर वैसे ही खड़ी रह गई हो। उनकी आँखों में आँसू भर आये। श्याम कुन्ज का वैभव और उस दिव्यांगना प्रेम पुजारिन को देख कर उन्होंने ठाकुर जी से कहा -"इस रमते साधु के पास सूखे टिकड़ और प्रेमहीन ह्रदयकी सेवा ही तो मिलती थी तुम्हें ! अब यहाँ आपका सुख देखकर जी सुखी हुआ। किन्तु लालजी ! इस प्रेम वैभव में इस दास को भुला मत देना।" अपने गिरधर के, ह्रदय नेत्र भर दर्शन कर लेने के पश्चात बाबा वस्त्र-खंड से आँसू पौंछते हुये बोले, "बेटी ! तुम्हारी प्रेम सेवा देख मन गदगद हुआ। मैं तो प्रभु के आदेश से द्वारिका जा रहा हूँ। यदि कभी द्वारिका आओगी तो भेंट होगी अन्यथा ...। लालजी के दर्शन की अभिलाषा थी, सो मन तृप्त हुआ।" "गिरधर गोपाल की बड़ी कृपा है महाराज ! आशीर्वाद दीजिये कि सदा ऐसी ही कृपा बनाए रखें। ये मुझे मिले या न मिले, मैं इनसे मिली रहूँ। आप बिराजे महाराज !" उसने केसर से प्रसाद लाने को कहा और स्वयं तानपुरा लेकर गाने लगी - साँवरा................... , साँवरा, म्हाँरी प्रीत निभाज्यो जी। मीरा ने सदा की तरह गीत के माध्यम से अपने भाव गिरधर के समक्ष प्रस्तुत किये... साँवरा ................, साँवरा म्हाँरी प्रीत निभाज्यो जी। थें छो म्हाँरा गुण रा सागर, औगण म्हाँरा मति जाज्यो जी। लोकन धीजै म्हाँरो मन न पतीजै, मुखड़ा रा सबद सुणाज्यो जी॥ म्हें तो दासी जनम जनम की, म्हाँरे आँगण रमता आज्यो जी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बेड़ा पार लगाजयो जी॥ भजन की मधुरता और प्रेम भरे भावों से गिरधरदास जी तन्मय हो गये। कुछ देर बाद आँखें खोलकर उन्होंने सजल नेत्रों से मीरा की ओर देखा। उसके सिर पर हाथ रखकर अन्तस्थल से मौन आशीर्वाद दिया। केसर द्वारा लाया गया प्रसाद ग्रहण किया और चलने को प्रस्तुत हुये। जाने से पहले एक बार फिर मन भर कर अपने ठाकुर जी की छवि को अपने नेत्रों में भर लिया। प्रणाम करके वे बाहर आये। मीरा ने झुककर उनके चरणों में मस्तक रखा तो दो बूँद अश्रु संत के नेत्रों से निकल उसके मस्तक पर टपक पड़े। "अहा ! संतों के दर्शन और सत्संग से कितनी शांति -सुख मिलता है ? यह मैं इन लोगों को कैसे समझाऊँ ? वे कहते है कि हम भी तो प्रवचन सुनते ही है पर हमें तो कथा में रोना-हँसना कुछ भी नहीं आता। अरे, कभी खाली होकर बैठें, तब तो कुछ ह्रदय में भीतर जायें। बड़ी कृपा की प्रभु ! जो आपने संत दर्शन कराये। और जो हो, सो हो, जीवन जिस भी दिशा में मुड़े, बस आप अपने प्रियजनों-निजजनों-संतों-प्रेमियों का संग देना प्रभु ! उनके अनुभव, उनके मुख से झरती तुम्हारे रूप, गुण, माधुरी की चर्चा प्राणों में फिर से जीने का उत्साह भर देती है, प्राणों में नई तरंग की हिल्लोर उठा देती है। जगत के ताप से तप्त मन-प्राण तुम्हारी कथा से शीतल हो जाते है। "मैं तो तुम्हारी हूँ। तुम जैसा चाहो, वैसे ही रखो। बस मैनें तो अपनी अभिलाषा आपके चरणों में अर्पण कर दी है।" ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" ********************************************* 🌸📿🌸📿🌸📿🌸📿🌸🚩🌸🚩🌸🚩🌸🚩

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. "व्रज के भक्त-02" श्रीगोपालदास बाबाजी 'उत्सवी' (वृन्दावन) गङ्गा-तटपर एक निर्जन स्थान में श्रीमद्भागवत की कथा बैठी है। वक्ता हैं एक महात्मा, जिनके शरीर पर एक लंगोटी के सिवा और कुछ नहीं है। श्रोता हैं स्वयं गङ्गा महारानी। महात्मा तन्मय हो गङ्गा माता को लक्ष्य कर उच्च स्वर से कथा कह रहे हैं। गङ्गा कल-कल करती हुँकारें भर रही हैं। और कोई श्रोता वहाँ नहीं है। किसीको निमन्त्रण भी नहीं है। पर भ्रमर निमन्त्रण की प्रतीक्षा कब करता है ? जहाँ भी पुष्प खिलता है, वहाँ पहुँच जाता है। पुष्प के सौरभ को पवन दिक्-विदिक् ले जाता है। उसी को भ्रमर निमन्त्रण मान लेता है। श्रीमद्भागवत की कथा में भी कुछ ऐसा ही दिव्य आकर्षण है। कथा की स्वर-लहरी से स्पन्दित आकाश के अणु-परमाणुओं ने जाकर स्पर्श किया कहीं दूर ध्यानमग्न बैठे परमहंस वृत्ति के एक महात्मा को। वे वहाँ आ विराजे कथा के दूसरे श्रोता के रूप में। तीसरे श्रोता स्वयं श्रीनन्दनन्दन तो अलक्षित रूप से वहाँ रहे होंगे ही। उन्होंने कहा जो है-'मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद-हे नारद ! मेरे भक्त जहाँ मेरा गुणगान करते हैं, मेरी लीला-कथा कहते हैं, वहाँ मैं जा बैठता हूँ।' उन्हीं को लक्ष्य कर परमहंसजी ने कहा-'जिनकी कथा हो रही है, उनके लिए कुछ भोग तो रखा नहीं। उन्हें माखन-मिश्री बहुत प्रिय हैं। उसी समय शुभ्र वस्त्र धारण किये एक वृद्धा माखन-मिश्री लेकर वहाँ लायीं। नन्दनन्दन को माखन-मिश्री का भोग लगाया गया। कथा के पश्चात् दोनों महात्माओं ने उसका सेवन किया। उसके अलौकिक स्वाद और गंध से दोनों चमत्कृत हो गये। उसे ग्रहण करने के पश्चात् सात दिन तक उन्हें भूख नही लगी। एक दिव्य मस्ती बराबर छायी रही। दोनों ने समझ लिया कि माखन-मिश्री लाने वाली वृद्धा स्वयं गङ्गा महारानी ही थीं, अन्य कोई नहीं। गङ्गा महारानी में इतनी निष्ठा रखने वाले और उन्हें श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने वाले यह महात्मा थे निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीमत् स्वभू-रामदेवाचार्य की परम्परा में जूनागढ़ के गोदाबाव स्थान के महन्त श्रीमत-सेवादासजी महाराज के शिष्य श्रीगोपालदासजी। टीकमगढ़के निकट किसी ग्राम में गौड़ ब्राह्मण कुल में सम्वत् १८६८ में उनका प्रादुर्भाव हुआ। बाल्यकाल में ही जूनागढ़ के श्रीसेवादासजी महाराज से दीक्षा ले वे चारों धाम की यात्रा को निकल पड़े। यात्रा समाप्त कर व्रज के अन्तर्गत कामवन में रहने लगे। परसरामद्वारे के पण्डित रघुवरदासजी से श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों का अध्ययन किया। भगवत्कथादि में आसक्ति के साथ-साथ उनका वैराग्य दिन-पर-दिन बढ़ता गया। कुछ दिन बाद वे केवल एक लंगोटी लगाये, बगल में श्रीमद्भागवत दबाये गंगा-तट पर चले गये। गङ्गा के किनारे-किनारे जहाँ-तहाँ विचरते रहे और गङ्गाजी को श्रीमद्भागवत सुनाते रहे। गंगा महारानी का आशीर्वाद ले व्रज लौट आये और वृन्दावन में रहने लगे। वृन्दावनमें वे उदरपूर्ति मधुकरी द्वारा करते और आत्मपूर्ति भगवान् कघ लीला-कथाओं द्वारा। राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं के मनन और कीर्तन में ही उनका सारा समय व्यतीत होता। उनकी श्रीमद्भागवत की कथा वृन्दावन में कहीं-न-कहीं होती रहती। कथा बड़ी रसमय होती। शुक सम्प्रदाय के रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरीजी भी कथा में आया करते। वैष्णव सेवा में उनकी बड़ी निष्ठा थी। कथाओं में जो भेंट आती, उससे महावन के निकट दाऊजी के मन्दिर में जाकर वैष्णव-सेवा कर दिया करते एक बार दाऊजी ने स्वप्न में वृन्दावन में ही वैष्णव-सेवा करते रहने का आदेश दिया। तब से वे वृन्दावन में सेवा करने लगे। उन्हें प्रेरणा हुई श्रीनिम्बार्काचार्य का जन्मोत्सव मनाने की। उन्होंने इस उत्सव की प्रथा डाली, जो आज तक चली आ रही है। प्रतिवर्ष वे श्रीनिम्बार्काचार्य की जन्म-तिथि पर विशाल शोभायात्रा, श्रीमद्भागवत-सप्ताह, रास-लीला, समाज-गान और ब्राह्मण-वैष्णव-भोजन आदि की व्यवस्था करते। बड़ी धूमधाम से सारा उत्सव मनाते। उसके लिए उनके प्रभाव से धन भी पर्याप्त मात्रा में आ जाता। उसका एक-एक पाई खर्च कर अन्त में अपने लंगोटी और करुआ ले किनारे हो जाते। संचय एक पैसा भी न करते। एक बार इस उत्सव के अवसर पर उन्होंने २०० ब्राह्मणों द्वारा श्रीमद्भागवत-पाठ की व्यवस्था की। पर उन्हें ज्वर हो आया। अतः धन की समुचित व्यवस्था न हो सकी। पाठ आरम्भ हो गया। वे चिन्ता में पड़ गये कि ब्राह्मणों को दक्षिणा कहाँ से दी जायगी। तब प्रियाजी ने स्वप्न में दर्शन दे ढाढ़स बंधाया। दूसरे दिन एक परदेसी साहूकार आया। उसने उत्सव का सारा भार अपने ऊपर ले लिया। कई दिन तक कथा-कीर्तन, रास और वैष्णव-भोजनादि का दौर आनन्दपूर्वक चलता रहा। अन्त में साहूकार ने मोहरों की दक्षिणा दे ब्राह्मणों को तृप्त किया। इन उत्सवों के कारण ही गोपालदासजी का नाम ‘उत्सवीजी' पड़ गया। गोपालदासजी भक्तमाल की कथा भी बहुत सुन्दर कहते। जिस शैली में भक्तमाल की कथा का आज प्रचलन है, उसका सूत्रपात्र उन्हीं से हुआ। उन्ही से प्रसिद्ध भक्तमाली टोपीकुञ्ज के श्रीमाधवदास बाबाजी ने भत्तमाल का अध्ययन किया। उनकी जैसी कथनी थी, वैसी ही करनी थी। इसलिए उनकी वाणी में ओज था। उसका लोगों पर स्थायी और गंभीर प्रभाव पड़ता था। बहुत-से लोगों में उससे चमत्कारी परिवर्तन हुआ। बहुत-से उनसे मन्त्र-दीक्षा ग्रहण कर भक्ति-पथ के पथिक बने। उनके शिष्यों में प्रधान थे बाबा हंसदासजी, बाबा श्यामदासजी, बाबा कारे कृष्णदासजी, बाबा किशोरीदासजी, बाबा राधिकादासजी, राजा भवानीसिंहजी और श्रीमती गोपाली बाई। इनके अतिरिक्त श्रीसुदर्शनदासजी (ललित प्रियाजी) जैसे बहुत-से रसिक महानुभावों ने उनसे भजन-प्रणाली- की शिक्षा ग्रहण की। सम्वत् १९५२ में उन्हें निकुञ्ज-प्राप्ति हुई। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************* 🥀🚩🥀🚩🥀🚩🥀💃🥀💃🥀💃🥀💃🥀🚩

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (अड़तीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः संसार-चक्र के अवरोध का उपाय, शरीर की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्त के त्याग का वर्णन तथा श्रीमहादेवजी के द्वारा श्रीवसिष्ठजी के प्रति निर्गुण निराकार परमात्मा की पूजा का प्रतिपादन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं रघुनन्दन ! जब केवल संकल्प रूपी नाभि का भली प्रकार अवरोध कर दिया जाता है, तभी यह संसाररूपी चक्र घूमने से रुक जाता है। किंतु संकल्पात्मक मनोरूप नाभि को राग-द्वेष आदि से क्षोभित करने पर यह संसाररूपी चक्र रोकने की चेष्टा करने पर भी वेग के कारण चलता ही रहता है । इसलिये परम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर श्रवण, मनन, निदिध्यासन की युक्तियों के द्वारा ज्ञानरूपी बल से चित्तरूपी संसार-चक्र की नाभि का अवश्य अवरोध करना चाहिये । क्योंकि कहीं पर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्य से परिपूर्ण शास्त्र सम्मत परम पुरुषार्थ से प्राप्त न की जा सके । श्रीराम ! आधि और व्याधि से निरन्तर दुःखित, अधु आदि से भिन्न तथा स्वयं विनाशशील इस शरीर में उस प्रकार की भी स्थिरता नहीं रहती, जिस प्रकार की चित्रलिखित पुरुष में रहती है । चित्रित मनुष्य की यदि भलीभाँति रक्षा की जाय तो वह दीर्घ - कालतक सुशोभित रहता है; किंतु उसका बिम्बरूप शरीर तो अनेक यत्नों से रक्षित होने पर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। स्वप्न आदि का शरीर स्वप्नकालीन संकल्प से जनित होने के कारण दीर्घकालीन सुख-दु:खों से आक्रान्त नहीं होता । यह शरीर तो दीर्घकालीन संकल्प से उत्पन्न होने के कारण दीर्घकाल के दुःखों से आक्रान्त रहता है । संकल्पमय यह शरीर स्वयं भी नहीं है और न आत्मा के साथ इसका सम्बन्ध ही है; अतः इस शरीर के लिये यह अज्ञानी जीव निरर्थक क्लेश का भाजन क्यों बनता है ! अर्थात् इसमें एकमात्र अज्ञान ही हेतु है। जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुष का क्षय या विनाश हो जाने पर बिम्बरूप देह की हानि नहीं होती, उसी प्रकार संकल्प जनित पुरुष का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती । जिस प्रकार मनोराज्य में उत्पन्न शरीर आदि पदार्थों का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्न में उत्पन्न पदार्थों का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णि का-नदी के जल का क्षय या विनाश हो जाने पर चास्तविक जल की कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र संकल्प से उत्पन्न स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्र का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती । अतः शरीर के लिये शोक करना निरर्थक ही है । चित्त संकल्प से कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देह अलंकारों से भूषित या आधि-व्याधि से दूषित हो जाने पर चेतन आत्मा की कुछ भी हानि नहीं है । श्रीराम ! देह का विनाश होने पर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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अक्षय तृतीया..... *इस साल 14 मई को अक्षय तृतिया है। इस दिन से चंदन लेप लगाकर सरकार को लाड़ लड़ाने की रीत है।* *गोपाल जी को इन तपती गर्मी के दिनों में चंदन लगाकर श्रृंगार किया जाता है जिससे उन्हें ठंडक पहुंचें ।* *तरह तरह के ठंडी वस्तुएं भोग में चढ़ाई जाती है।* *जैसे की सत्तू , ठंडाई, आदि* *आप भी अपने गोपाल जी को मस्तक पर ,कर कमलों पर , या पूरे श्री अंगो में भी जैसे आपको रुचे चंदन* *लगाना न भूलें* 🙏 *चंदन लेप परंपरा का इतिहास* मान्यता है कि स्वयं भगवान् जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम्न को इस उत्सव को मानाने के लिए आदेश दिया था । एक बार गोपाल जी ने माधवेन्द्र पुरी को सपने में जमीन खोदकर प्रकट करने का अनुरोध किया। माधवेन्द्र पुरी ने गांव वालों की मदद से उस स्थान को खोदा और वहां मिले गोपाल जी के अर्चाविग्रह को गोवर्धन पर्वत पर स्थापित किया। कुछ दिन बाद गोपाल ने कहा कि जमीन में बहुत समय तक रहने के कारण उनका शरीर जल रहा है। सो वे जगन्नाथ पुरी से चंदन लाकर उसके लेप से उनके शरीर का ताप कम करें।महीनो पैदल चलकर वह जगन्नाथ पूरी धाम पोहचते है। ओडिशा व बंगाल की सीमा पर वे रेमुन्ना पहुंचे जहां गोपीनाथ जी का मंदिर था। रात को उस मंदिर में गोपीनाथ को खीर का भोग लगाते देख पुरी ने सोचा कि अगर वे उस खीर को खा पाते तो वैसी ही खीर अपने गोपाल को भी खिलाते। ऐसा सोचकर वे रात को सो गए। उधर भगवान गोपीनाथ ने पुजारी को रात में स्वप्न में बताया कि मेरा एक भक्त यहां आया है, उसके लिए मैंने खीर चुराई है, उसे वह दे दो। भगवान की भक्त के लिए यह चोरी इतनी प्रसिद्ध हुई कि उनका नाम ही खीरचोर गोपीनाथ पड़ गया। जगन्नाथ पुरी में माधवेन्द्र पुरी ने भगवान जगन्नाथ के पुजारी से मिलकर अपने गोपाल के लिए चंदन मांगा। पुजारी ने पुरी को महाराजा पुरी से मिलवा दिया और महाराजा ने अपने क्षेत्र की एक मन ‘40 किलो, विशेष चंदन लकड़ी अपने दो विश्वस्त अनुचरों के साथ पुरी को दिलवा दी। जब पुरी गोपीनाथ मंदिर के पास पहुंचते तो गोपाल फिर उनके स्वप्न में आए और कहा कि वो चंदन गोपीनाथ को ही लगा दें क्योंकि गोपाल और गोपीनाथ एक ही हैं। माधवेन्द्र पुरी ने गोपाल के निर्देशानुसार चंदन गोपीनाथ को ही लगा दिया। तब से इस लीला के सम्मान में चंदन यात्रा उत्सव आरंभ हुआ। 🌼🍋🌼🍋🌼🍋🌼🍋🌼🍋🌼🍋🌼🍋🌼🍋

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यहीं हुआ था माँ पार्वती और भगवान शिव जी का विवाह!!!!!!! हिंदू धर्म शास्त्रों में भोले भंण्डारी भगवान शंकर जी एवं माता पार्वती के विवाह की महिमा उल्लेख अनेक रूपों में मिलता है, कहा जाता हैं कि इनका विवाह बड़े ही भव्य तरीके से संपन्न हुआ था । माता पार्वती के परिवार की तरफ से अनेक उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार विवाह में शामिल थे । परंतु भूत भावन भगवान शंकर की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, कहा जाता हैं कि शिवजी अजन्में है और उनका कोई परिवार नहीं हैं बल्कि वे स्वंय सभी के परिवार के कहे जाते है । शिवजी के रिस्तेदारों के रूप में शिव बारात में श्री ब्रह्माजी, श्री विष्णजी सहित सभी देवि देवता, सुर असुरों ने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक साथ भोले बाबा के विवाह में उनके नाते रिस्तेदार बनकर पहुंचे थे । शिव पशुपति हैं, मतलब सभी प्राणियों के देवता भी हैं, इसलिए समस्त जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीवजंतुओं के अलावा भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी विवाह में शिवजी की तरफ से पहुंचे थे । इस जगह हुआ था विवाह- रुद्रप्रयाग में स्थित 'त्रियुगी नारायण' एक पवित्र जगह है, माना जाता है कि सतयुग में जब भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था तब यह ‘हिमवत’ की राजधानी था, इस जगह पर आज भी हर साल देश दुनियां भर से लोग संतान प्राप्ति के लिए इकट्ठा होते हैं। विवाह मंडप की अग्नि आज भी प्रज्वलित है- मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए त्रियुगीनारायण मंदिर से आगे गौरी कुंड कहे जाने वाले स्थान माता पार्वती ने तपस्या की थी, और बाद भगवान शंकर ने इसी मंदिर में माता पार्वती जी से विवाह किया था, कहते हैं कि उस हवन कुंड में आज भी वही अखण्ड अग्नि जल रही है । संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती हैं,संतान प्राप्ति की इच्छा वाले दम्पत्ति इस अग्नि का आशीर्वाद लेने के लिए देश ही नहीं बल्कि दुनियां भर के लोग लोग आते हैं, ऐसी मान्यता है कि भगवान केदारनाथ की यात्रा से पहले यहां दर्शन करने से ही माता पार्वती एवं शिवजी प्रसन्न होते हैं। 📿🙏📿🙏📿🙏📿🙏📿🙏📿🙏📿🙏📿🙏

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अष्ट-दिक्पाल..👑👑👑👑👑👑👑👑 पुराणानुसार दसों दिशाओं का पालन करनेवाला देवताओं को #दिक्पाल की संज्ञा दी गई है। भगवान ब्रह्मा जी के द्वारा ८ दिशाओं का कार्य-संचालन भिन्न देवताओं व यक्षों को दिया गया तो २ दिशा का दायित्व स्वयं रख लिया गया, इसलिये इन्हें "अष्ट-दिक्पाल" के रूप में संज्ञा दी गई है। यथा-पूर्व के इन्द्र, अग्निकोण के वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्यकोण के नैऋत, पश्चिम के वरूण, वायु कोण के मरूत्, उत्तर के कुबेर, ईशान कोण के ईश, ऊर्ध्व दिशा के ब्रह्मा और अधो दिशा के अनंत (शेषनाग) दिक्पाल सुनिश्चित किऐ गए। दिक्पाल की संख्या ८ ही मानी गई है, शेष दो दिशा का स्वामित्व ब्रह्मा जी के अधिकार में है। वाराह पुराण के अनुसार इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है। सृष्टि रचना काल प्रथम स्वयंभू मन्वंतर से पूर्व भगवान विष्णु के आदेशानुसार जिस समय भगवान ब्रह्मा सृष्टि करने के विचार में चिंतनरत थे उस समय उनके कान से दस कन्याएँ - (1) पूर्वा, (2) आग्नेयी, (3) दक्षिणा, (4) नैऋती, (5) पश्चिमा (6) वायवी, (7) उत्तरा, (8) ऐशानी, (9) ऊद्ध्व और (10) अधस्‌ उत्पन्न हुईं जिनमें मुख्य 6 और 4 गौण थीं। सभी कन्याओं ने ब्रह्मा का नमन कर उनसे रहने का स्थान और उपयुक्त पतियों की याचना की। ब्रह्मा ने कहा तुम सभों को जिस ओर जाने की इच्छा हो जा सकती हो। शीघ्र ही तुम लोगों को अनुरूप पति भी दूँगा। इसके अनुसार उन कन्याओं ने एक एक दिशा की ओर प्रस्थान किया। १. पूर्वा: जो पूर्व दिशा कहलाई। २. आग्नेयी: जो आग्नेय दिशा कहलाई। ३. दक्षिणा: जो दक्षिण दिशा कहलाई। ४. नैऋती: जो नैऋत्य दिशा कहलाई। ५. पश्चिमा: जो पश्चिम दिशा कहलाई। ६. वायवी: जो वायव्य दिशा कहलाई। ७. उत्तर: जो उत्तर दिशा कहलाई। ८. ऐशानी: जो ईशान दिशा कहलाई। ९. उर्ध्व: जो उर्ध्व दिशा कहलाई। १०. अधस्‌: जो अधस्‌ दिशा कहलाई। इसके पश्चात्‌ ब्रह्मा ने आठ दिक्पालों की सृष्टि की और अपनी कन्याओं को बुलाकर प्रत्येक दिक्पाल को एक एक कन्या प्रदान कर दी। इसके बाद वे सभी दिक्पाल उन कन्याओं में दिशाओं के साथ अपनी दिशाओं में चले गए। इन दिक्पालों के नाम पुराणों में दिशाओं के क्रम से निम्नांकित है (1) पूर्व के #इंद्र देव, (2) दक्षिणपूर्व के #अग्नि देव, (3) दक्षिण के #यम, (4) दक्षिण पश्चिम के #सूर्य देव, (5) पश्चिम के #वरुण देव, (6) पश्चिमोत्तर के #वायु देव, (7) उत्तर के #कुबेर और (8) उत्तरपूर्व के #सोम देव। (कुछ पुराणों में इनके नामों में थोड़ी भिन्नता भी पायी जाती है।) शेष दो दिशाओं अर्थात्‌ ऊर्ध्व या आकाश की ओर वे स्वयम्‌ चले गए और नीचे की ओर उन्होंने शेष या अनंत को प्रतिष्ठित किया। दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं। हिन्दू धर्मानुसार प्रत्येक दिशा का एक देवता नियुक्त किया गया है जिसे 'दिक्पाल' कहा गया है अर्थात दिशाओं के पालनहार। दिशाओं की रक्षा करने वाले। १० दिशा के १० दिग्पाल : उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत। १. उर्ध्व दिशा : उर्ध्व दिशा के देवता ब्रह्मा हैं। इस दिशा का सबसे ज्यादा महत्व है। आकाश ही ईश्वर है। जो व्यक्ति उर्ध्व मुख होकर प्रार्थना करते हैं उनकी प्रार्थना में असर होता है। वेदानुसार मांगना है तो ब्रह्म और ब्रह्मांड से मांगें, किसी और से नहीं। उससे मांगने से सब कुछ मिलता है। वास्तु : घर की छत, छज्जे, उजालदान, खिड़की और बीच का स्थान इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। आकाश तत्व से हमारी आत्मा में शांति मिलती है। इस दिशा में पत्थर फेंकना, थूकना, पानी उछालना, चिल्लाना या उर्ध्व मुख करके अर्थात आकाश की ओर मुख करके गाली देना वर्जित है। इसका परिणाम घातक होता है। २. ईशान दिशा : पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान दिशा कहते हैं। वास्तु अनुसार घर में इस स्थान को ईशान कोण कहते हैं। भगवान शिव का एक नाम ईशान भी है। चूंकि भगवान शिव का आधिपत्य उत्तर-पूर्व दिशा में होता है इसीलिए इस दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। इस दिशा के स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु माने गए हैं। वास्तु अनुसार : घर, शहर और शरीर का यह हिस्सा सबसे पवित्र होता है इसलिए इसे साफ-स्वच्छ और खाली रखा जाना चाहिए। यहां जल की स्थापना की जाती है जैसे कुआं, बोरिंग, मटका या फिर पीने के पानी का स्थान। इसके अलावा इस स्थान को पूजा का स्थान भी बनाया जा सकता है। इस स्थान पर कूड़ा-करकट रखना, स्टोर, टॉयलेट, किचन वगैरह बनाना, लोहे का कोई भारी सामान रखना वर्जित है। इससे धन-संपत्ति का नाश और दुर्भाग्य का निर्माण होता है। ३. पूर्व दिशा : ईशान के बाद पूर्व दिशा का नंबर आता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह ईशान से ही निकलता है, पूर्व से नहीं। इस दिशा के देवता इंद्र और स्वामी सूर्य हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है। वास्तु : घर की पूर्व दिशा में कुछ खुला स्थान और ढाल होना चाहिए। शहर और घर का संपूर्ण पूर्वी क्षेत्र साफ और स्वच्छ होना चाहिए। घर में खिड़की, उजालदान या दरवाजा रख सकते हैं। इस दिशा में कोई रुकावट नहीं होना चाहिए। इस स्थान में घर के वरिष्ठजनों का कमरा नहीं होना चाहिए और कोई भारी सामान भी न रखें। यहां सीढ़ियां भी न बनवाएं। ४. आग्नेय दिशा : दक्षिण और पूर्व के मध्य की दिशा को आग्नेय दिशा कहते हैं। इस दिशा के अधिपति हैं अग्निदेव। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। वास्तु : घर में यह दिशा रसोई या अग्नि संबंधी (इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। आग्नेय कोण का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। आग्नेय कोण में शयन कक्ष या पढ़ाई का स्थान नहीं होना चाहिए। इस दिशा में घर का द्वार भी नहीं होना चाहिए। इससे गृहकलह निर्मित होता है और निवासियों का स्वास्थ्य भी खराब रहता है। ५. दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा के अधिपति देवता हैं भगवान यमराज। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख, संपन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है। वास्तु : वास्तु के अनुसार दक्षिण दिशा में मुख्‍य द्वार नहीं होना चाहिए। इस दिशा में घर का भारी सामान रखना चाहिए। इस दिशा में दरवाजा और खिड़की नहीं होना चाहिए। यह स्थान खाली भी नहीं रखा जाना चाहिए। इस दिशा में घर के भारी सामान रखें। शहर के दक्षिण भाग में आपका घर है तो वास्तु के उपाय करें। ६. नैऋत्य दिशा : दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा नैऋत देव के आधिपत्य में है। इस दिशा के स्वामी राहु और केतु हैं। वास्तु : इस दिशा में पृथ्वी तत्व की प्रमुखता है इसलिए इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। नैऋत्य दिशा में द्वार नहीं होना चाहिए। इस दिशा में गड्ढे, बोरिंग, कुएं इत्यादि नहीं होने चाहिए। इस दिशा में क्या होना चाहिए, यह किसी वास्तुशास्त्री से पूछकर तय करें। ७. पश्चिम दिशा : पश्चिम दिशा के देवता, वरुण देवता हैं और शनि ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। यह दिशा प्रसिद्धि, भाग्य और ख्याति की प्रतीक है। इस दिशा में घर का मुख्‍य द्वार होना चाहिए। वास्तु : पश्‍चिम दिशा में द्वार है तो वास्तु के उपाय करें। द्वार है तो द्वार को अच्छे से सजाकर रखें। द्वार के आसपास की दीवारों पर किसी भी प्रकार की दरारें न आने दें और इसका रंग गहरा रखें। घर के पश्चिम में बाथरूम, टॉयलेट, बेडरूम नहीं होना चाहिए। यह स्थान न ज्यादा खुला और न ज्यादा बंद रख सकते हैं। ८. वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है। वास्तु : यह दिशा पड़ोसियों, मित्रों और संबंधियों से आपके रिश्तों पर प्रभाव डालती है। वास्तु ज्ञान के अनुसार इनसे अच्छे और सदुपयोगी संबंध बनाए जा सकते हैं। इस दिशा में किसी भी प्रकार की रुकावट नहीं होना चाहिए। इस दिशा के स्थान को हल्का बनाए रखें। खिड़की, दरवाजे, घंटी, जल, पेड़-पौधे से इस दिशा को सुंदर बनाएं। ९. उत्तर दिशा : उत्तर दिशा के अधिपति हैं रावण के भाई कुबेर। कुबेर को धन का देवता भी कहा जाता है। बुध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं। उत्तर दिशा को मातृ स्थान भी कहा गया है। वास्तु : उत्तर और ईशान दिशा में घर का मुख्‍य द्वार हो तो अति उत्तम होता है। इस दिशा में स्थान खाली रखना या कच्ची भूमि छोड़ना धन और समृद्धिकारक है। इस दिशा में शौचालय, रसोईघर बनवाने, कूड़ा-करकट डालने और इस दिशा को गंदा रखने से धन-संपत्ति का नाश होकर दुर्भाग्य का निर्माण होता है। १०. अधो दिशा : अधो दिशा के देवता हैं शेषनाग जिन्हें अनंत भी कहते हैं। घर के निर्माण के पूर्व धरती की वास्तु शांति की जाती है। अच्छी ऊर्जा वाली धरती का चयन किया जाना चाहिए। घर का तलघर, गुप्त रास्ते, कुआं, हौद आदि इस दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वास्तु : भूमि के भीतर की मिट्टी पीली हो तो अति उत्तम और भाग्यवर्धक होती है। आपके घर की भूमि साफ-स्वच्छ होना चाहिए। जो भूमि पूर्व दिशा और आग्नेय कोण में ऊंची तथा पश्चिम तथा वायव्य कोण में धंसी हुई हो, ऐसी भूमि पर निवास करने वालों के सभी कष्ट दूर होते रहते हैं। 💐☄️💐☄️💐☄️💐☄️💐☄️💐☄️💐☄️💐☄️

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