. “विशुद्ध प्रेम" जहाँ प्रेम केवल प्रेम के लिये होता है वहाँ प्रेम की विशुद्धि बनी रहती है। जहाँ प्रेम किसी दूसरे आधार पर उपस्थित हो गया और किसी दूसरे को वह चाहने लगा तब वह प्रेम कलंकित हो जाता है और प्रेम का केवल प्रेम नाम रह जाता है। एक कथा है। समर्थ रामदासजी शिवाजी के गुरु थे। शिवाजी ने अपना सारा राज्य समर्थ गुरु रामदासजी को समर्पित कर दिया था। रामदासजी ने उसे स्वीकार किया था और भगवा झण्डा उस राज्य का निशान था। रामदासजी ने राज्य के अमात्य के रुप में शिवाजी को नियुक्त करके राज्य का संचालन उन्हें सौंप दिया। उन्होंने कहा कि तुम राजा के प्रतिनिधि के रूप में राज्य का संचालन करो। वे संचालन करने लगे। रामदासजी महाराज बड़े सिद्ध पुरुष थे। वे महात्मा थे, सन्त थे। सन्तों के पास जब भीड़ लगती है तो वह भीड़ केवल प्रेमियों की ही नहीं होती। न जाने कितनी-कितनी भावना से लोग आते हैं। किसी को धन चाहिये, किसी को बीमारी से मुक्ति चाहिये, किसी को पुत्र चाहिये, किसी को उपाधि चाहिये, किसी को पाप-नाश चाहिये, किसी का पुण्य उदय होना चाहिये, किसी पर कोई देवता प्रसन्न हो जायँ, किसी को कहीं लाभ हो जाय, इस प्रकार न मालूम कितने लोग इकट्ठे हो जाते हैं। यह सब मैं अनुभव की बात कह रहा हूँ। इन भावनाओं से जमा लोग तभी तक रहते हैं जबतक मिलने की आशा होती है नहीं तो सब भाग जाते हैं। जो रह जाते हैं वे सत्य होते हैं। एक महात्मा ने मुझे एक सच्ची घटना सुनायी। उन्होंने कहा-- एक महात्मा थे। उनके बहुत भक्त थे। वे कहते थे हम तो आपके चरणों की पूजा करेंगे। हम तो आपके चरण का अँगुठा धोया पीयेंगे। सब अँगूठा पीने के लिये आतुर। उनको कोढ़ हो गया। शरीर से मवाद चूने लगा। अब वहाँ एक बचा बाकी निकल गये। उसने कहा कि जैसे मैंने स्वस्थ और सुन्दर चरणों का चरणोदक पान किया है उसी प्रकार आपकी अस्वस्थता में भी पान करूँगा। वह पान करने से कोढ़ी हो गया। दोनों कोढ़ी हो गये। अब लोगों ने कहा हम तो बुद्धिमान निकले, बच गये। परन्तु उन दोनों का कोढ़ तो मायिक था निकल गया। वैसे आने वाले सभी चले गये। इसी प्रकार की एक घटना रामदासजी के जीवन में भी एक बार हुई। रामदासजी के पास भीड़ लग गयी। सुबह से रात दो बजे तक रामदासजी महाराज न सो सके न उठ सके। सब भगवान् का भजन करें और सभी कहें कि हम बड़े प्रेमी--हम बड़े प्रेमी हैं। प्रेमी तो कोई था नहीं, परन्तु कोई रंचमात्र भी अपना प्रेम कम नहीं मानता था। सब मानते कि हमारा उससे अधिक है, परन्तु यह कोई नहीं मानता कि मेरे में प्रेम कम है, और यदि कभी कहता तो व्यंग्य में कहता कि हमारा तो कम रिश्ता है आपके प्रति। वहाँ पर सभी प्रेम का दावा करने लगे। अब रामदासजी को मुश्किल हो गयी। रामदासजी ने सोचा इस परेशानी से कैसे छुटकारा मिले ? वे महात्मा थे। उन्होंने एक युक्ति सोची। एक दिन उनका पैर फूल गया। पैरों में सूजन आ गयी। उन्होंने पैरों में पट्टी बाँध ली और करहाने लगे। लोग इक्ट्ठा हो गये और बोले-- महाराज ! दर्द बहुत है। क्या करें ? डॉक्टर, बैद्य बुलायें ? लोग दवा लाने लगे, धन लगाने लगे कि येन-केन- प्रकारेण महाराज का दर्द समाप्त होना चाहिये। हमारे प्राण चलें जायँ, परन्तु आपका दर्द मिट जाय, आपका पैर ठीक हो जाय। महाराज जी सब सुनते रहे। दूसरे दिन मंडली बैठी थी। सारे त्याग करने क़ तैयार थे। लोगों ने सोचा कि आखिर महाराजजी कौन सा त्याग यहाँ पर माँगेंगे ? महाराजजी बड़े दक्ष थे, उन्होंने कहा-- मैंने इसकी दवा सोच ली है। किसी और उपाय से तो यह अच्छा होगा नहीं। इस पैर के अँगूठे में मवाद भर गयी है। इस मवाद को कोई भक्त मुँह लगाकर चूसे, उसे फेंके नहीं बल्कि पी जाय तब वह तो मर जायेगापरन्तु मेरा पैर अच्छा हो जायेगा। एक ने कहा-- महाराज ! यह बात तो आपने ठीक कही है। शेष में से लोगों ने सोचा कि किसीतरह से यहाँ से भागें फिर यहाँ कौन आयेगा। अब किसी को लघुशंका लगी, किसी ने कान पर यज्ञोपवीत लगाया, किसी को खाँसी आ गयी, किसी के घर का आदमी आ गया और किसी को कुछ समाचार आ गया वे निकल गये। किसी ने कहा-- महाराज ! क्या करें, मैं तो बीमार रहता हूँ सबके सब चल दिये। आश्रम खाली हो गया। केवल एक भक्त बचा। उसने कहा महाराज ! आपने जैसा सोचा है, मैं वैसा ही करूँगा। उन्होंने कहा-- मर जाओगे। वह बोला--मर ही तो जायेंगे, आपका यह पैर तो अच्छा हो जायेगा। उन्होंने कहा--हाँ पैर तो अच्छा हो जायेगा। रामदासजी ने पुनः कहा-- फिर चूसो और सबको बुला दो। उसने सबको बुलाया और अँगूठा चसने लगा। अब सब लोग आने लगे धीरे-धीरे कि यह तो चूस रहा है ; अब अपना नम्बर तो आयेगा ही नहीं। लोग आकर कहने लगे कि मैं तो आ ही रहा था परन्तु यह कार्य आ गया अन्यथा मैं तैयार था। यह इसके भाग्य में था। मेरे भाग्य में ऐसा कहाँ ? मैं चाहता था कि यह पुण्य मुझे मिले, यह सेवा मुझे मिले परन्तु मेरा भाग्य ही ऐसा था कि अमुक कार्य में फँस गया। अब सबके सब श्रेय लेने को तैयार थे। यह बिल्कुल मनोवैज्ञानिक तथ्य है। वहाँ था क्या ? रामदासजी को तो भीड़ हटानी थी। इसलिए उन्होंने एक पका हुआ तोतापुरी आम अपने अँगूठे में बाँध लिया था। आम का मुँह सामने था। वह ऊपर हे ऊँचा और आखिर में नीचा चोंचदार था। आम रस भरा मीठा था। वह भक्त जब चूसने लगा तो उसको स्वाद आने लगा और मजे में पूरा चूस गया। फिर बोला-- महाराज ! यह मवाद नहीं है। यह तो बहुत मीठा है। गुरुजी ने कहा-- गुरु की मवाद ऐसी ही होती है, जो चूस लेता है उसी को पता लगता कि वह कैसी है। आम चूसने के बाद सिर्फ गुठली बची। महाराजजी ने जाकर गुठली फेंक दी। उनका पैर अच्छा हो गया ; अच्छा तो था ही।.उन्होंने पैर साफ कर लिये। लोगों ने कहा महाराज !हम भी ऐसा कर लेते। उन्होंने कहा-- तुम लोग यहाँ से भागो। जिसने मवाद चूसी है सिर्फ वही रहेगा। शेष तुम लोग चले जाओ। उन सबको भागना ही था, वे भाग गये। इस प्रकारका प्रेम, प्रेम होता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************* 🎀💐🎀💐🎀💐🎀💐🎀💐🎀💐🎀💐🎀💐

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (सैनतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः शरीर और संसार की अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपता का वर्णन...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीराम ! जिस प्रकार डरपोक मनुष्य भी अपने कल्पित मनोराज्य के हाथी, बाघ आदि को देखकर भयभीत नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि यह मेरी कल्पना के सिवा और कुछ नहीं है, वैसे ही यथार्थ ज्ञानी पुरुष इस संसार को कल्पित समझकर भयभीत नहीं होता; क्योंकि ये भूत, भविष्य, वर्तमान-- तीनों जगत् प्रतीतिमात्र ही हैं। वे वास्तव में नहीं हैं, इसलिये सत् नहीं है और उनकी प्रतीति होती है, इसलिये उनको सर्वथा असत् भी नहीं कह सकते; अतएव अन्य कल्पनाओं का अभाव ही परमात्मा का यथार्थ ज्ञान है । इस संसार में व्यवहार करने वाले सभी मनुष्यों को अनेक प्रकार की आपदाएँ स्वाभाविक ही प्राप्त हुआ करती हैं। क्योंकि यह जगत्-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्र में बुद्बुदों = का समूह; फिर इस विषय में शोक ही क्या । परमात्मा जो सत्य वस्तु है, वह सदा सत्य ही है और यह दृश्य जो असत्य वस्तु है, वह सदा असत्य ही है; इसलिये ■ मायारूप विकृति के वैचित्र्य से प्रतीयमान इस प्रपञ्च में ऐसी दूसरी कौन वस्तु है, जिसके विषय में शोक किया जाय ! इसलिये असत्यभूत इस संसार में तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि जैसे रज्जु से बैल दृढ़ बैंध जाता है, वैसे ही आसक्ति से यह मनुष्य दृढ़ बँध जाता है अतः निष्पाप श्रीराम ! 'यह सब ब्रह्मरूप ही है? इस प्रकार समझकर तुम आसक्तिरहित हुए इस संसार में विचरण करो । मनुष्य को विवेक-बुद्धि से आसक्ति और अनासक्ति का परित्याग करके अनायास ही शास्त्रविहित कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये, शास्त्रनिषिद्ध कर्मों का कभी नहीं । अर्थात् उनकी सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये । यह दृश्यमान प्रपश्च केवल प्रतीतिमात्र है, वास्तव में कुछ नहीं है—यों जिस मनुष्य को भलीभाँति अनुभव हो जाता है, वह अपने भीतर परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है । अथवा 'मैं और यह सारा प्रपञ्च चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है' – इस प्रकार अनुभव करने पर अनर्थकारी यह व्यर्थ जगद्रूपी आडम्बर प्रतीत नहीं होता । श्रीराम ! जो कुछ भी आकाश में या स्वर्ग में या इस संसार में सर्वोत्तम परमात्म-वस्तु है, वह एकमात्र राग-द्वेष आदि के विनाश से ही प्राप्त हो जाती है। किंतु राग-द्वेष आदि दोषों से आक्रान्त हुई बुद्धि के द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह सब कुछ मूढों के लिये तत्काल ही विपरीत रूप ( दुःखरूप ) हो जाता है। जो पुरुष शास्त्रों में निपुण, चतुर एवं बुद्धिमान् होकर भी राग-द्वेष आदि से परिपूर्ण हैं, वे संसार में शृगाल के तुल्य है। उन्हें धिक्कार है । धन, बन्धुवर्ग, मित्र- ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं; इसलिये उनमें बुद्धिमान् पुरुष क्या अनुराग करेगा । कभी नहीं, उत्पत्ति-विनाशशील भोग-पदार्थों से परिपूर्ण संसार की रचनारूप यह परमेश्वर की माया आसक्त पुरुषों को ही अनर्थ गर्तों में ढकेल देती है। राघव ! वास्तव में धन, जन और मन सत्य नहीं हैं, किंतु मिंध्या ही दीख पड़ते हैं। क्योंकि आदि और अन्त में सभी पदार्थ असत् हैं और बीच में भी क्षणिक एवं दुःखप्रद हैं; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आकाश-वृक्ष के सदृश कल्पित इस संसार से कैसे प्रेम करेगा । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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. "व्रज के भक्त-01" श्रीसखीचरणदास बाबाजी (राधाकुण्ड) मणिपुर प्रान्त के लोगों का व्रज से विशेष सम्बन्ध रहा है। राधाकुण्ड में बहुत दिनों तक मणिपुरिया महात्माओं की ही प्रधानता रही है। आज भी यहाँ बहुत-से भजन-निष्ठ मणिपुरिया महात्मा भजन करते हैं। इसका एक इतिहास है। श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के समय से मणिपुर के राजा और प्रजा श्रीमन्महाप्रभु के सम्प्रदाय की नरोत्तम ठाकुर महाशय की शाखा के अनुगत रहे हैं। अंग्रेज जब भारत में अपने प्रभाव का विस्तार कर रहे थे, उस समय श्रीकुलचन्द्र महाराज मणिपुर के राजा थे। वे भी गौड़ीय भक्त थे। वे बड़े पराक्रमी थे। आक्रमणकारी अंग्रेज सेनाओं को उनके सामने कई बार मुँह की खानी पड़ी थी। अन्त में उन्हें पराजित करने के लिए उन्हें एक चाल चलनी पड़ी थी। वे जानते थे कि राजा गो-भक्त हैं। किसी परिस्थिति में भी गो-हत्या करना उनके लिए सम्भव नहीं। इसलिए उन्होंने अन्तिम बार गाय-बछड़ों के समूह को आगे कर उनके ऊपर आक्रमण किया। उन्होंने गो-हत्या करने के बजाय पराजय स्वीकार की। अंग्रेज उन्हें और उनके कर्मचारियों को बन्दी बनाकर दिल्ली ले गये। राजा से अंग्रेजों ने पूछा-'आप कहाँ रहना पसन्द करेंगे ?' उन्होंने राधाकुण्ड में रहने की इच्छा प्रकट की। तभी अंग्रेजों ने राधाकुण्ड में गोपकुआँ के पास राजा के रहने के उपयुक्त एक मकान और मन्दिर का निर्माण कर दिया। राजा अपने कुछ कर्मचारियों के साथ वहाँ रहने लगे। तभी से राधाकुण्ड मणिपुरी भक्तों के लिए भजन का प्रमुख स्थान बन गया। मणिपुरके बहुत से परिवारों में अब भी यह प्रथा है कि १०-१२ वर्ष की अवस्था में ही वे अपने बालकों को श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के परिवार में दीक्षित करा देते हैं। श्रीसखीचरण बाबा के साथ भी ऐसा ही हुआ। वि० संवत् १९४२ फाल्गुनी कृष्णा त्रयोदशी को उनका जन्म हुआ। जब वे १०-१२ वर्ष के थे, उनके माता-पिता ने उन्हें श्रीनरोत्तम ठाकुर महाशय के परिवार के किसी व्यक्ति से दीक्षित करवा दिया। पर उनके साथ यह घटना एक लौकिक रीति के रूप में ही घटकर नहीं रह गयी। उन्होंने तभी घर-द्वार छोड़ वृन्दावन जाकर भजन करने का निश्चय कर लिया। तभी से उन्हें उसके लिए उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में श्रीनरोत्तम ठाकुर का यह पद बार-बार गाते सुना जाने लगा-- आर की ए मन दशा हब, सब छाड़ि वृन्दावन जाब॥ आर कबे श्रीरासमण्डले। गड़ागड़ि दिब कुतूहले॥ आर कबे गोवर्धन गिरि। देखिब नयनयुग भरि॥ श्यामकुण्डे राधाकुण्डे स्नान करि कबे जुड़ाब परान॥ आर कबे जमुना जले। मज्जनै हइब निरमले॥ साधु संगे वृन्दावन बास। नरोत्तमदास करे आश॥ 'हाय ! कब मेरी वह दशा होगी, जब मैं सब छोड़-छाड़ वृन्दावन जाऊँगा ? कब रासमण्डल में जाकर लोटा-पीटा करूँगा ? कब गिरि गोवर्धन नयन भर दर्शन करूँगा ? कब श्यामकुण्ड और राधाकुण्ड में स्नानकर प्राणों को शीतल करूँगा ? कब यमुना में स्नानकर निर्मल होऊँगा ? कब साधु-जनों के साथ श्रीवृन्दावन-वास की मेरी आशा पूर्ण होगी ?' तभी से वे वृन्दावन में वैराग्याश्रम ग्रहणकर भजन करने के उद्देश्य से वैराग्य का अभ्यास भी करने लगे। अपना आहार दिन-पर-दिन कम करने लगे। ग्रन्थ-पाठ, सत्संग और कृष्ण-लीला-कीर्तनादि में अधिकांश समय व्यतीत करने लगे। लीला-कीर्तन-मण्डली के एक सुनिपुण नायक के रूप में चारो ओर लोग उनकी प्रशंसा करने लगे। शकाब्द १८४२ में ३५ वर्ष की अवस्था में वे गृह त्यागकर व्रज चले गये। राधाकुण्ड में श्रीजीवगोस्वामी के घेरे में रहकर भजन करने लगे। विरक्त-वेश ग्रहण करने के लिए उपयुक्त गुरु की खोज भी उन्होंने तत्काल प्रारम्भ कर दी। पर किसको गुरु रूप में वरण करें, यह वे बहुत दिनों तक निर्णय न कर सके। अन्त में उन्होंने राधारानी की शरण ली। दिन-रात उनसे प्रार्थना करते हुए उनके निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। बहुत दिनों तक उनकी ओर से भी किसी प्रकार का संकेत न मिला। उनकी धारणा थी कि वेशाश्रय के बिना भजन में तीव्र गति से अग्रसर होना सम्भव नहीं। भजन में प्रगति बिना जीवन का कोई मूल्य नहीं। इसलिए जब राधारानी ने भी गुरु के सम्बन्ध में उन्हें कोई संकेत नहीं दिया, तब वे क्या करते ? उन्होंने अनशन द्वारा जीवन समाप्त करने का निश्चय किया। अन्न-जल सब त्याग दिया। सात दिन बिना अन्न-जल के व्यतीत हो गये। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया। मानसिक स्थिति ऐसी हो गयी कि निद्रा और जागरण एक से प्रतीत होने लगे। उसी समय, कहना मुश्किल है कि स्वप्न में या जागरण में, राधारानी ने दर्शन देकर राधाकुण्ड में गोपीनाथजी के मन्दिर के सेवाध्यक्ष श्रीभगवानदास बाबाजी मे वेश ग्रहण करने का आदेश दिया। सखीचरण ने भगवानदास बाबाजी के चरणों में आत्म-समर्पण किया। वेश ग्रहण करने के पश्चात उनसे अष्टकालीन भजन-शिक्षा देने के लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा - 'मुझे मन्दिर के सेवा-कार्य तो अवकाश मिलता नहीं। तुम्हें भजन सिखाऊँ तो कैसे सिखाऊँ ? तुम ऐसा करो खदिरवन (खैरा) में थोलोकनाथ गोस्वामी की भजन-कुटीमें श्रीनरोत्तमदासजी महाराज और पिसाए की कदम्बखण्डी में श्रीराधिकादासजी महाराज रहते हैं। यह दोनों मणिपुर के उच्चकोटि के भजनशील व्यक्ति हैं। दोनों सिद्ध कृष्णदास बाबा की भजनशैली मे भजन करते हैं। दोनों जैसे एक प्राण, दो देह हैं। तुम इन दोनों से कृष्णदास बाबा की गुटिका के अनुसार भजन की पद्धति सीख लो।' सखीचरण बाबा ने ऐसा ही किया। पर उनसे भजन-पद्धति सीखने में उन्हें बड़ा कष्ट उठाना पड़ा। वे रात दो बजे से उठकर भजन करते थे। राधाकुण्ड से अपना आसन छोड़कर रात में कहीं न जाने का उन्होंने संकल्प कर रखा था। यदि वे कहीं जाने भी तो रात होते-होते राधाकुण्ड अवश्य लौट आते। उस समय राधाकुण्ड से खदिरवन जाने के लिए गाँव-गाँव में होते हए १५-१६ मील का चक्कर लगाना पड़ता था। खदिरवन से कदम्बखण्डी और भी दो-तीन मील आगे थी। सखीचरण बाबा पैदल चलकर इतनी दूर जाते और रात होने से पहले लौट आते। कभी-कभी भजन करते-करते रात में २ या ३ बजे उन्हें कोई शंका होती, तो उसी समय उनके स्थान को चल पड़ते। उन्होंने सिद्ध बाबाकी गुटिका पूरी कण्ठ कर ली। पर उन्हें उससे सन्तोष न हुआ, क्योंकि श्रीनरोत्तमदासजी महाराज के पास जो गुटिका थी, वह बिलकुल शुद्ध नहीं थी। सखीचरण बाबा शुद्ध गुटिका की खोज में लग गये। किसी ने उनसे कहा कि काम्यवन में सिद्ध कृष्णदास बाबा के एक नाती चेला हैं। उनके पास बहुत-सी प्राचीन गुटिकाएँ हैं। उन्होंने राधाकुण्ड से २६ मील दूर जाकर उनसे एक अच्छी गुटिका देने की प्रार्थना की और उसकी नकलकर उसे शीघ्र लौटा देने को कहा। उन्होंने कहा- मैं ले जाने को नहीं दूँगा। तुम यहीं बैठकर नकल कर सकते हो।' बाबा ने कहा-'मेरा नियम है रात्रि में राधाकुण्ड छोड़कर अन्य किसी स्थान पर न रहने का। आप करुणामय हैं। जिससे मेरे नियम की रक्षा हो, ऐसा करने की कृपा करें। काम्यवन के बाबा ने कहा-'अच्छा दो-तीन दिन बाद आना। मैं निकाल रखूँगा।' दो-तीन दिन बाद फिर उन्होंने काम्यवन की लम्बी यात्रा की और गुटिका ले आये। पर उसमें भी सन्देह होने के कारण, उसे लौटा आये। उनसे अनुनय-विनयकर उससे अच्छी दूसरी गुटिका ले आये। उससे भी सन्तोष न हुआ, तो फिर जाकर उससे और अच्छी गुटिकाके लिए प्रार्थना की। काम्यवन के बाबा ने कहा-'अच्छा, तो तुम सबसे अच्छी प्रति चाहते हो! उसे मैं किसी को देता नहीं। तुम्हारी उत्कण्ठा देख तुम्हें दे रहा हूँ। १५ दिन भीतर लौटा अवश्य देना।' सखीचरण बाबा गुटिका ले आये। १२ दिन में उसकी नकलकर उसे लौटा आये। बाबाका वैराग्यमय शरीर बहुत कृश और दुर्बल था। उनका केवल सात घरों से मधुकरी माँगने का नियम था। व्रज की प्रथा के अनुसार प्रत्येक घर से रोटी का एक टूक ही मिलता था। किसी-किसी घर से वह भी नहीं। इतना स्वल्पाहार करते हुए, इतने दुर्बल शरीर से बाबा के लिए बार-बार खदिरवन और काम्यवनादि की लम्बी यात्रा कर उसी दिन लौट आना और फिर नित्य-नियमादि कर मधुकरी को जाना असम्भव था। साधारण रूप से इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनकी असाधारण भजन-निष्ठ और भक्ति की अचिंत्य शक्ति के कारण ही यह सम्भव हो सका। इतने कष्ट से अष्टकालीन-लीला की गुटिका का संग्रहकर बाबा बड़े उत्साह और लगन के साथ अष्टकालीन लीला-स्मरण में संलग्न रहने लगे राधा-कृष्ण की मानसिक-सेवा में संलग्न रहते हुए भी उन्होंने वाह्य सेवा की अवहेलना नहीं नी। मणिपुर के श्रीचूडाचांद ने राधाकुण्ड में एक नये मन्दिर का निर्माणकर सेवा-भार उनके ऊपर छोड़ रखा था। वे विधिवत् मन्दिर में ठाकुर-सेवा करते हुए मानसिक सेवा में तल्लीन रहते। बीच-बीच में अपने शिक्षा-गुरु श्रीनरोत्तमदास बाबा और श्रीराधिकादास बाबा का खदिरवन और कदम्बखण्डी जाकर सत्संग करते। इस प्रकार बाह्य और अन्तर साधन में एक साथ लगे रहकर बाबा भजनानन्द का पूर्णरूप से अनुभव कर रहे थे, उसी समय उनके ऊपर एक वज्राघात हुआ। १८५१ शकाब्द, भाद्र शुक्ला नवमी को उनके शिक्षागुरु श्रीनरोत्तमदासबाबा अचानक नित्य लीला में प्रवेश कर गये। उनके अभिन्न प्राण श्रीराधिकादास बाबाजी उनके देह से लिपटकर रो-रोकर कहने लगे-'हाय बन्धु ! तुम मुझे बिना बताये ही मुझे छोड़कर चले गये। तुम्हारे बिना मैं अब इस शरीर को लेकर क्या करूँगा ?' उन्होंने उनके विरह में अन्न-जल त्याग दिया और दो दिन बाद में वे भी नित्य-लीला में प्रवेश कर गये। दोनों शिक्षा-गुरुओं के सहसा अन्तर्धान के पश्चात् गुरु-विरह रूप महादावानल सखीचरण बाबा के हृदय को दग्ध करने लगा। वे भी उनके बिना जीना निरर्थक जान अन्न-जल त्यागकर राधारानी से प्रार्थना करने लगे-'स्वामिनी ! मेरे गुरुवर्ग को जब तुमने अपने चरणों में ले लिया, तो इस दीन पर भी कृपा करो। वे दोनों मुझे अपराधी जान छोड़कर चले गये हैं। मैं अब इस अपराधी शरीर को लेकर क्या करूँगा ? मुझे भी अपने चरणों में स्थान देने की कृपा करो, स्वामिनी।' वे एक मास तक नित्य केवल एक चम्मच गिरिधारी का चरणामृत लेकर स्वामिनी से इस प्रकार प्रार्थना करते रहे। उनका शरीर अति जीर्ण और शुष्क होकर मरणासन्न हो गया। संगी-साथी उनकी प्राण त्यागने की अन्तिम अवस्था जान कीर्तनादि की व्यवस्था करने लगे। उसी समय करुणामय स्वामिनी स्वर्ण के थाल में विभिन्न प्रकार के प्रसाद लेकर आयीं और बोलीं-'लो यह प्रसाद ग्रहण करो। उपवास छोड़ दो।' सखीचरण बाबा ने कहा-'स्वामिनी ! मैं अब इस अपराधी शरीर को नहीं रखना चाहता। मुझे अपने चरणों में लेने की कृपा करो।' 'नहीं, अभी नहीं। अभी भजन करो' स्वामिनी ने कहा, और उन्हें भोजन करा अन्तर्धान हो गयीं। स्वामिनी की आज्ञा से बाबा ने अनशन छोड़ दिया और पूर्ववत् भजन करने लगे। एक वर्ष पीछे शिक्षा-गुरुओं की विरह-तिथि पर उन्हें फिर गुरु-विरह-ताप ने जर्जरित किया। उससे निस्तार पाना उनके लिए असम्भव हो गया। उन्होंने फिर अनशन द्वारा प्राण त्यागकर उनके निकट जाने का दृढ़ संकल्प किया। अनशन करते एक मास बीत गया। मरणासन्न अवस्था प्राप्त होने पर उन्होंने सहसा देखा दिव्य वृन्दावन का रमणीय दृश्य और राधारानी को सोने के थाल में प्रसाद के साथ उनकी ओर मन्द, मनोहर गति से आते हुए। उन्होंने कहा-'बाबा लो, प्रसाद ग्रहण करो। अभी कुछ दिन और भजन करो, तब तुम्हें ले जाऊँगी।' बाबा ने कहा--'स्वामिनी ! मैं कितना अशक्त हो गया है। इस देह को लेकर रहना कितना मुश्किल हो गया है मेरे लिए। सेवक भी मेरे पास कोई नहीं है। कुएँ से जल तक मुझे स्वयं ही लाना पड़ता है। ऐसी दशा में मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता। मुझे अपने चरणों में अंगीकार कर लो। 'चिन्ता न करो। तुम्हें कोई असुविधा न होगी। एक सेवक तुम्हारे पास आ जायगा। एक कुआँ भी तुम अपनी कुटिया के सामने खुदवा लेना।' 'कुएँ के लिए मेरे पास पैसे कहाँ हैं ?' 'उसकी भी चिन्ता न करो। वह धूम्रराय करवा देगा।' इतना कह स्वामिनी ने बाबा को प्यार से भोजन कराया और अन्तर्धान हो गयीं। धूम्रराय सखीचरण बाबा के भानजे थे। वे रेलवे कमिश्नर थे। उन्होंने बहुत दिनों से मामा के दर्शन नहीं किये थे। उनके दर्शन की उत्कण्ठा ले वे वृन्दावन आये। बाबा को पानी का कष्ट देख उन्होंने एक कुआँ उनकी कुटिया के सामने खुदवा दिया। राधारानी की कृपा से कुएँ का जल भी मीठा निकला, जबकि आस-पास के कुओं को देखते हुए उसका जल मीठा निकलने की कोई सम्भावना ही न थी। एक सेवक भी इसी बीच बाबा के पास आ गया। अब उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न रही। उनका भजन-साधन सुचारु रूप से चलने लगा। पर भजनमें तृप्ति कहाँ ? साधक भजन में जितनी प्रगति करता है, उतनी ही उसकी उत्कण्ठा और बढ़ती जाती है उसका एक पल भी यदि भजन के बिना जाता है, तो उसे असह्य दुःख होता है। बाबा ने पहले ही अपना आहार और निद्रा बहुत कम कर रखे थे, जिससे वे अधिक-से-अधिक समय भजन कर सकें। वे केवल सात घरों से भिक्षा करते थे। उसी में जितने टूक रोटी के मिलते उन्हें खाकर पानी पी लेते थे। दिन-रात भजन करते थे। केवल रात ११ बजे से २ बजे तक का समय निद्रा में अतिवाहित करते थे। उन्होंने अब निद्रा का समय और भी कम करना चाहा। निद्रा और आहार में घना सम्बन्ध है। आहार जितना अधिक होता है, उतनी ही निद्रा अधिक होती है। इसलिए उन्होंने अब मधुकरी और भी कम कर दी। सात घरों के बजाय केवल पाँच में मधुकरी को जाने लगे। कुछ दिनों बाद मधुकरी और भी घटाकर केवल तीन घरों तक सीमित कर दी। तीन घरों में से भी कभी-कभी किसी घर से मधुकरी न मिलती, तो एक या दो घरों से प्राप्त रोटी के एक या दो टूक खाकर ही रह जाते। कभी ऐसा भी होता कि तीनों घरों से, जहाँ वे मधुकरी के लिए जाते, खाली लौटना पड़ता। तव राधाकुण्ड का जल पीकर ही रह जाते। जब ऐसा होता तब वे किसी प्रकार का दुःख न मानकर उलटे सुख ही मानते, क्योंकि जब वे केवल राधाकुण्ड का जल पीकर रह जाते, तब उन्हें भजन में और अधिक स्फूति होती। ऐसा वे अपने शिष्यों से पीछे कहा करते। एक दिन जब बाबा किसी ब्रजवासी के घर मधुकरी को गये, तो उसने कहा-'बाबा, आज रोटी अभी तक बनी नहीं है। थोड़ी देर में फिर आने की कृपा करें।' एक ही घर में दो बार मधुकरी के लिए जाने का बाबा का नियम नहीं था। वे उस घर में फिर नहीं गये। दूसरे घर में भी उन्हें मधुकरी नहीं मिली, क्योंकि वहाँ अशौच था। तीसरे घर में किसी महोत्सव का आयोजन चल रहा था। भोग अभी नहीं लगा था। ब्रजवासी ने कहा-'बाबा, आज मेरा अनुरोध मानना होगा। थोड़ी देर में भोजन करके जाना होगा।' 'तुम तो जानते हो।' मैं भोजन कहीं नहीं करता, बाबा ने कहा। 'तो बाबा प्रसाद ही लेकर जायें। अभी थोड़ी देर में भोग लग जायगा।' 'नहीं, मुझे विलम्ब हो रहा है। अभी मैंने मध्याह्न-नियम नहीं किया है। आज रहने दो। फिर किसी दिन मधुकरी ले जाऊँगा।' 'ऐसा नहीं हो सकता बाबा। इतनी-सी बात तो मेरी माननी ही होगी। मैं बिना प्रसाद लिये नहीं जाने दूँगा।' बाबा को उसका अनुरोध मानना पड़ा। प्रसाद लेकर जब वे कुटिया को लौटे, तब विलम्ब बहुत हो गया था। भूख बहुत लग आयी थी। पर प्रसाद ग्रहण करने के पूर्व मध्याह्न-नियम तो करना ही था। वे नियम करने बैठे, तब उनका मन प्रसादी पुओं के लिए चंचल हो उठा। मन का भजन की अपेक्षा पुओं में अभिनिवेश अधिक देख उन्हें उस पर क्रोध आया। उन्होंने पुए झोले से निकाल कुटिया के बाहर बन्दरों को डाल दिये। मन से बोले-'अब खा, क्या खायेगा ?' मन सीधा हो गया। उसकी चंचलता जाती रही। शान्त मन से मध्याह्न-भजन का नियम पूरा करने के पश्चात् वे राधाकुण्ड का जल पानकर तृप्त हुए। कुछ दिन बाद कार्तिक मास की नियम-सेवा के उद्देश्य से कलकत्ते के श्रीसत्यनारायण पाल का राधाकुण्ड आना हुआ। वे बाबा के दर्शन कर बहुत प्रभावित हुए। उन्हें बाबा का कृश शरीर और अति सूक्ष्म आहार देखकर चिन्ता हुई। उन्होंने सोचा कि वे केवल तीन घरों से मधुकरी का अपना नियम तो छोड़ेंगे नहीं। यदि मधुकरी के अतिरिक्त कुछ दूध भी ले लिया करें तो अच्छा हो। उन्होंने बाबा से दूध लेने का आग्रह किया और स्वयं दूध के लिए खर्चे की व्यवस्था कर देने का वचन दिया। बाबा ने उनका आग्रह स्वीकार कर लिया। पर बाबा के सोचने की दिशा दूसरी थी। उन्होंने सोचा कि वे दूध लेना आरम्भ कर देंगे और मधुकरी को जाना बन्द कर देंगे। इस प्रकार उन्हें भजन के लिए और अधिक समय मिल जाया करेगा। पाल महाशय बाबा के लिए गाय के आधा सेर दूध की व्यवस्था कर कलकत्ते चले गये। बाबा का दुग्धपान आरम्भ हुआ। साथ ही मधुकरी को जाना बन्द हो गया। वे पाव भर दूध मध्याह्न भजन के पश्चात् दिन में लेते, पाव भर रात १० बजे। तीन-चार दिन में एक बार शौच को जाते। यह व्यवस्था उनके भजन के लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हुई और अन्त तक चलती रही। पर दूध में ग्वाला कभी-कभी पानी मिला देता, जिसके कारण उनके भजन में विघ्न पड़ता। उन्हें भजन करते-करते कई बार उठकर लघुशंका को जाना पड़ता। यह समस्या भी आसानी से हल हो गयी। कुछ ही दिन पूर्व श्रीमदनमोहनदास बाबा ने उनके चरणों में आत्म-समर्पण कर उनसे कुछ सेवा बताने का आग्रह किया था। बाबा ने उन्हें अपने सामने ग्याले के घर से दूध दुहा लाने की सेवा सौंप दी। इस प्रकार आहार और निद्रापर पूर्ण नियन्त्रण के साथ बाबा का अष्टकालीन लीला-स्मरण सुचारु रूप से चलने लगा। कालान्तर में उन्हें लीला-स्मरण में सिद्धि प्राप्त हुई। लोग उनके पास अष्टकालीन-लीला-स्मरण की शिक्षा-दीक्षा के लिए आने लगे। श्रीअच्युतदास बाबा, श्रीब्रजमोहनदास बाबा, श्रीमदनमोहनदास बाबा, पण्डित श्रीकृष्णचरण-दास बाबा और श्रीकृष्णदास बाबा उनके प्रधान शिष्य हुए। एक दिन बाबा ने मदनमोहनदास बाबा को पास बुलाकर कहा- 'तुमसे एक गोपनीय बात कहूँ, किसी से पहना नहीं। मैं अब शीघ्र स्वामिनी-के पास जाऊँगा। तुम दुःख न करना। तुम्हें भजन के विषय में सब कुछ बता दिया है। एकान्त चित्त से सुखपूर्वक भजन करना। गुटिका में जो त्रुटियाँ अब भी रह गयी हैं, उनका मेरे बताये अनुसार संशोधन कर लेना।' मदनमोहन बाबा के पैरों के नीचे से धरती खिसक गयी। एकाएक बाबा के मुख ने उनके प्रयाण की बात सुन उन्हें लगा कि जैसे उनके प्राण भी अब नहीं रहेंगे। शरविद्ध पक्षी की भांति उनके प्राण छटपट करने लगे। अश्रुविसर्जन करते हुए वे उनके चरणों में गिर पड़े और कातर स्वर से बोले- 'बाबा ! यदि इस समय मुझे छोड़कर चले जायेंगे, तो मेरी क्या गति होगी। मैंने तो अभी दीक्षा भर ली है। भजन-पद्धति की रूप-रेखा मात्र जानी है। भजन करते-करते अवश्य कुछ शंकाएँ उठेंगी। उनका समाधान कैसे होगा ? आप और कुछ दिन रहकर मुझे भजन-पद्धति में परिपक्व करने की कृपा करें।' 'स्वामिनी की कृपा से तुम्हारा सब समाधान हो जायेगा। चिन्ता न करो। मुझे स्वामिनी के निकट जाने दो।' बाबा ने आग्रह सहित कहा। मदनमोहन बाबा ने तब हाथ जोड़कर निवेदन किया-'यदि आप जायेंगे ही, तो मुझे यह बताने की कृपा करें कि आपके पीछे किनका संग करूँ, जिससे मेरे भजन में उन्नति हो ? शंकाएँ होने पर किनके पास जाकर उनका समाधान करूँ ?' कुछ देर चिन्ता कर बाबा बोले-'किसको बताऊँ ? कोई तो मनोमत दीखता नहीं।' 'तब तो बाबा आपको रहना ही होगा। नहीं तो यह दास भी आपका अनुसरण करेगा।' मदनमोहन बाबा ने व्याकुल भाव से आग्रह किया। 'अच्छा, तो मैं दो वर्ष और रहूँगा। इस बीच तुम सब समाधान कर लेना।' बाबा ने मदनमोहन बाबा को आश्वस्त करते हुए कहा। दो वर्ष सखीचरण बाबा ने राधारानी के विरह में जैसे-जैसे व्यतीत किये। उनकी विरह-ज्वाला निरन्तर बढ़ती गयी। लोगों से मिलना-जुलना उन्होंने बन्द कर दिया। कुटिया का ताला भीतर से बन्दकर रहने लगे, जिससे सेवक भी उसे खोल न सके। दो वर्ष व्यतीत होने पर उन्होंने मदनमोहन बाबा से कहा-'अब मैं जाऊँगा।' मदनमोहन बाबा ने कहा-'कुछ दिन और रुक जायें बाबा।' पर बाबा मौन रहे। दूसरे दिन से वे दूध की मात्रा कम करने लगे। एक महीने में सूखकर अस्थियों का पिंजर जैसे हो गये। बाह्यज्ञान-शून्य अवस्था में वे शय्या पर लेटे रहते। पर उनका भजन ठीक चलता रहता। उस समय उनके शिष्य श्रीगोपालदासजी डागा भी उनकी सेवा में थे। वे जब उनके कान में मुँह लगाकर पूछते-'बाबा, इस समय कौन-सी लीला चल रही है,' तो वे समयोचित लीला का ठीक संकेत कर देते। बीच-बीच में कहने लगते-'जले गेलौ, जले गेलौ,' अर्थात्, 'शरीर जला जा रहा है, जला जा रहा है, जिससे पता चलता कि उनका विरह-ताप कितना बढ़ता जा रहा है। एक दिन अन्त समय निकट जान लोगों ने उनके निकट नाम-कीर्तन आरम्भ कर दिया। उस समय मध्याह्न था। मध्याह्न-लीला में बाबा का विशेष आवेश रहा करता था। उस समय वे समाधिस्थ अवस्था में देख रहे थे कि सखियाँ उन्हें दिव्य राधाकुण्ड में ले जाने के लिए मंजरीरूप में सजा रही हैं। बाह्यज्ञान होने पर उन्होंने कीर्तनकारी भक्तो से कहा-'मुझे सखियाँ राधाकुण्ड ले जाने को सजा रही थीं। तुम लोगों ने शब्द करके मुझे यहाँ बुला लिया। तुम अभी कीर्तन न करो। अभी मेरा लीला-स्मरण ठीक चल रहा है। कीर्तन के शब्द से लीला-आवेश भंग हो जाता है। जब लीला-स्मरण बन्द हो जाय, तब नाम-कीर्तन आरम्भ करना। दूसरे दिन, सम्वत् २०२२, आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदा को प्रातःकाल उन्होंने कहा-'मुझे रज पर लिटा दो।' समाधिस्थ अवस्था में रजपर लेटे-लेटे कीर्तन-ध्वनि के बीच उन्होंने मध्याह्न १ बजे राधाकृष्ण की मध्याह्न-लीला में प्रवेश किया। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************* 🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺

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श्री लिंग पुराण में आज योग सिद्धि प्राप्त साधु पुरुष के लक्षण तथा शिव से साक्षात्कार कराने वाले उपायों का वर्णन सूतजी बोले - हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! जिनके ऊपर भगवान शंकर कृपा करते हैं उनको बताता हूँ। महेश्वर भगवान, सज्जनों पर, आत्मा को जीतने वालों पर, द्विजातियों (ब्राह्मणों, क्षत्री, वैश्य) पर, धर्म के जानने वाले पर, साधु पुरुषों पर, आचार में श्रेष्ठ आचार्यों पर, आत्मा में शिव को जानने वालों पर, दयालु पुरुषों पर, तपस्वियों पर, संन्यासियों पर, ज्ञानियों पर, आत्मा को वश में करने वालों पर, योग में तत्पर रहने वाले पुरुष पर, श्रुति स्मृति को जानने में श्रेष्ठ तथा हे द्विजो! श्रौत स्मार्त कर्म के जो विरोधी न हों, ऐसे मनुष्यों पर कृपा करते हैं । अब इन सबकी अलग अलग व्याख्या करते हुए सूतजी कहते हैं कि हे द्विजो! जो श्रेष्ठ पुरुष ब्रह्म के पास ले जाये अथवा जायें वे सन्त कहे हैं। दशों इन्द्रियों के विषयों को दूर करके आठों प्रकार के लक्षणों से युक्त जो पुरुष हैं तथा जो सामान्य स्थिति में और धन की कमी व अधिकता में न क्रोध करते हैं, न हर्ष करते हैं, वे जितात्मा पुरुष कहे जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य में युक्त पुरुष द्विजाती कहलाते हैं। वर्ण आश्रमों में युक्त ये द्विजाती जन सुख से करने वाले हैं। श्रौत स्मार्त के धर्म का ज्ञान करना ही धर्मज्ञ कहा है। विद्या के साधन के द्वारा तथा ब्रह्मचारी और गुरु की सेवा में रहने वाला पुरुष साधु है। क्रिया की साधना के द्वारा गृहस्थ भी साधु है, ऐसा कहा है। तपस्या की साधना करने के कारण वन में रहने वाला वखान सभी साधु कहा गया है । यत्न करने वाला यति भी साधु ही है। क्योंकि वह योग साधना करता है। इस प्रकार धर्म आश्रमों के साधन करने वाले को साधु कहा गया है। चाहे वह गृहस्थ हो, ब्रह्मचारी हो, वानप्रस्थ हो या यति हो । धर्म अधर्म शब्दों को समझाकर जो कर्म में तत्पर होता है तथा क्रियाशील होता है उस धर्मज्ञ को आचार्य कहना चाहिए। कार्य को कुशलपूर्वक करना धर्म तथा अकुशलता से करना ही अधर्म है। धारण करने योग्य कर्मों को करने के कारण ही उसे धर्म कहा गया है। अधारण करने योग्य कर्म ही अधर्म कहे गए हैं। धर्म के द्वारा इष्ट की प्राप्ति आचार्यों द्वारा उपदेश की गई है तथा अधर्म से अनिष्ट की प्राप्ति बताई गई है। वृद्ध, जो लोलुप न हों, आत्म ज्ञानी हों, अदम्भी हों, अच्छी प्रकार विनीत हों, सरल हों आदि गुण सम्पन्न जन आचार्य कहे गए हैं। अपने आप भी जो धर्म आचरण करते हैं तथा दूसरों में भी आचार स्थापित करते हैं, शास्त्र और उनके धर्मों का भली भाँति आचरण करने वाले आचार्य कहलाते हैं । श्रवण करने से जो कर्म किया जाता है उसे श्रौत तथा स्मरण करने से जो कर्म है उसे स्मार्त कहा जाता है । वेद विहित जो यज्ञ आदि कर्म हैं, वे श्रौत कर्म हैं तथा वर्ण आश्रमों को बताये हुए जो कर्म हैं, वे स्मार्त कर्म हैं। देखे हुए अनुरूप अर्थ को तथा पूछे गए अर्थ को जो कभी नहीं छिपाते तथा जो देखा है वही सत्य कह देते हैं तथा जो ब्रह्मचर्य से रहते हों, निराहारी हों, अहिंसा और शान्ति में सर्वथा तत्पर रहते हों, उसे तप कहा गया है । जो हित, अनहित समझ कर सभी प्राणियों में अपने समान ही बर्ताव करता है उस पुण्यमयी वृत्ति को ही दया कहते हैं । जो हव्य उचित न्याय पूर्वक आया हो और वह गुणवान को दिया जाए, वह दान का लक्षण कहा है। छोटा, बीच का तथा बड़ा इस प्रकार का ही कहा है। करुणा पूर्वक सभी प्राणियों को बराबर भागों में बाँट दिया जाए, उसे मध्यम यानी बीच का दान कहा है। श्रुति स्मृति के द्वारा बताया गया तथा वर्ण आश्रमों को बताया गया माया और कर्म के फल को त्याग देने वाला योगी ही शिवात्मा है अर्थात् वह अपने अन्दर ही शिव को देखता है। सभी दोषों को त्याग देने वाला पुरुष ही युक्त योगी कहा गया है। जो पुरुष असंयमी न हो तथा विषयों में आसक्त न हो, विचारवान हो, लोभी न हो, वही सच्चा संयमकारी है। अपने लिए अथवा दूसरों के लिए अपनी इन्द्रियों को समान रूप से प्रयोग करता है तथा कभी झूठ में अपनी आत्मा को प्रवेश नहीं होने देता, यह शम के लक्षण हैं। अनिष्ट में कभी भयभीत नहीं होता हो तथा इष्ट में कभी प्रसन्न न होता हो, ताप तथा विषाद निवृत्ति और विरक्ति से सदा अलग रहे वह संन्यास का लक्षण है। कर्मों से आसक्ति न रखना अर्थात् कर्मों से अलग रहना ही संन्यास है। चेतना तथा अचेतना का विशेष ज्ञान ही वास्तव में ज्ञान कहा है। इसी प्रकार के ज्ञान युक्त तथा श्रद्धायुक्त योगी पर भगवान शंकर की कृपा होती है। उसी पर वे प्रसन्न होते हैं। इसमें संशय नहीं है। हे ब्राह्मणो! वास्तव में यही धर्म है किन्तु परमेश्वर के विषय में गुह्य (छुपा हुआ) जो रहस्य है उसे सब जगह प्रकट न करे। शिव की भक्ति ऐसे पुरुष को बिना संदेह के ही मुक्ति प्रदान कर देती है। भगवान शिव अपने भक्त के वश में रहते हैं चाहे वे अयोग्य ही क्यों न हो। उसे अनेक प्रकार के अन्धकार से छुड़ाकर उस पर प्रसन्न होते हैं। उसे ज्ञान अध्ययन ( पढ़ना), पढ़ाना, हवन करना, ध्यान, तप, वेद शास्त्र पढ़ना या सुनना, दान देना तथा हजारों चन्द्रायण व्रत करना तथा और भी अनेक प्रकार के व्रतादि रखना भक्त के लिए जरूरी नहीं है उस पर तो शिव सदा प्रसन्न रहते हैं । हे श्रेष्ठ मुनियो ! जो लोग भगवान शिव की भक्ति नहीं करते वे इस पर्वत की गुफा के समान संसार में गिरते हैं और भक्त भगवान के द्वारा उठा लिए जाते हैं । हे ब्राह्मणो! जब मनुष्य इस संसार में भक्तों के दर्शन मात्र से ही स्वर्ग आदि लोकों को प्राप्त कर लेते हैं तो भक्तों के लिए तो दुर्लभ ही क्या है | भक्त लोग भगवान शिव की कृपा से ब्रह्मा, विष्णु तथा देवताओं के राजा इन्द्र तथा और भी अन्य उत्तम स्थानों व पदों को प्राप्त कर लेते हैं। भक्ति से मुनि लोगों को बल एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है । हे ब्राह्मणो! प्राचीन समय में बनारस के अविमुक्त क्षेत्र में विराजमान भगवान श्री महेश्वर जो रुद्र हैं उनसे भगवती पार्वती ने जो बात पूछी थी और जो भगवान रुद्र ने रुद्राणी देवी पार्वती को जो बताया था वह सुनाता हूँ। वाराणसी पुरी में भगवान रुद्र को प्राप्त कर भगवती इस प्रकार पूछने लगीं। देवी बोली- हे प्रभो ! हे महादेव जी! आप किस उपाय या पूजा के द्वारा वश में हो जाते हो ? विद्या के द्वारा या तपस्या के द्वारा अथवा योग के द्वारा, सो मुझे आप कृपा करके बतलाइये। सूतजी कहने लगे – हे ऋषियो! इस प्रकार भगवती के वचनों को सुनकर शिवजी ने पार्वती जी को देखा। फिर बाल चन्द्रमा के तिलक को धारण करने वाले शिवजी पूर्ण चन्द्रमा के समान सुन्दर मुख वाली पार्वती जी से हँसते हुए इस प्रकार बोले- हे देवि ! इस सुन्दर पुरी को प्राप्त करके बहुत ही सुन्दर प्रश्न तुमने पूछा है । हे पार्वती जी ! इसी प्रकार का प्रश्न बहुत समय पहले हिमालय की पत्नी मैना ने हिमालय से किया था, उसका मुझे स्मरण हो रहा है। हे विलासिनि ! जो तुमने आज पूछा है, वह पूर्व काल में पितामह ब्रह्मा जी ने पूछा था । हे कल्याणी ! ब्रह्मा ने मुझे श्वेत नामक कल्प में श्वेत वर्ण का देखा तथा सद्योजात नामक मेरे अवतार को देखा, रक्त कल्प में मुझे लाल रङ्ग का देखा, ईशान कल्प में विश्वरूपाख्य को देखा। इस प्रकार से मुझ विश्व रूप शिव को देखकर ब्रह्मा जी बोले हे वामदेव! हे तत्पुरुष! हे अघोर! हे दयानिधे ! देवाधिदेव महादेव जी आप मुझे गायत्री के साथ दीखे हैं और हे प्रभो! आप किस प्रकार वश में हो जाते हो और किस प्रकार आपका ध्यान करना चाहिए अथवा आप कहाँ ध्यान किये जाते हैं, आप कहाँ देखे जाते हैं तथा कहाँ पूजे जाते हैं, सो आप हमें कृपापूर्वक बताइये । क्योंकि आप बताने में सब प्रकार समर्थ हैं। भगवान बोले- हे कमल से पैदा होने वाले ब्रह्मा जी! मैं तो केवल श्रद्धा से ही वश में होता हूँ। मैं लिङ्ग में हमेशा ध्यान करने योग्य हूँ तथा क्षीर समुद्र में विष्णु के द्वारा देखा गया हूँ और इस पंचरूप के द्वारा पाँच ब्राह्मणों से पूज्य हूँ। मेरे ऐसा कहने पर ब्रह्मा जी बड़े भाव से बोले हे जगतगुरो ! वास्तव में आप मुझे आज भी भक्ति से ही दीखे हो। ऐसा कहकर मेरे लिए अधिक श्रद्धा भाव दिखाया । सो हे पार्वती जी! मैं श्रद्धा से वश में होता हूँ और लिङ्ग में ही पूज्य हूँ। श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों के द्वारा मेरी पूजा करनी चाहिए। क्योंकि श्रद्धा में ही परम धर्म है, श्रद्धा ही सूक्ष्म ज्ञान, तप, हवन है, श्रद्धा ही मोक्ष स्वर्ग आदि सभी है और श्रद्धा से ही सदा मैं दर्शन देता हूँ । *🙏🌹हर हर महादेव🌹🙏*

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श्री भागवत महापुरण में आज की कथा चतुर्थ स्कन्ध-छब्बीसवाँ अध्याय राजा पुरञ्जनका शिकार खेलने वनमें जाना और रानीका कुपित होना श्रीनारदजी कहते हैं—राजन् ! एक दिन राजा पुरञ्जन अपना विशाल धनुष, सोनेका कवच और अक्षय तरकस धारणकर अपने ग्यारहवें सेनापतिके साथ पाँच घोड़ोंके शीघ्रगामी रथमें बैठकर पञ्चप्रस्थ नामके वनमें गया। उस रथमें दो ईषादण्ड (बंब), दो पहिये, एक धुरी, तीन ध्वजदण्ड, पाँच डोरियाँ, एक लगाम, एक सारथि, एक बैठनेका स्थान, दो जुए, पाँच आयुध और सात आवरण थे। वह पाँच प्रकारकी चालोंसे चलता था तथा उसका साज-बाज सब सुनहरा था ॥ १—३ ॥ यद्यपि राजाके लिये अपनी प्रियाको क्षणभर भी छोडऩा कठिन था, किन्तु उस दिन उसे शिकारका ऐसा शौक लगा कि उसकी भी परवा न कर वह बड़े गर्वसे धनुष-बाण चढ़ाकर आखेट करने लगा ॥ ४ ॥ इस समय आसुरीवृत्ति बढ़ जानेसे उसका चित्त बड़ा कठोर और दयाशून्य हो गया था, इससे उसने अपने तीखे बाणोंसे बहुत-से निर्दोष जंगली जानवरोंका वध कर डाला ॥ ५ ॥ जिसकी मांसमें अत्यन्त आसक्ति हो, वह राजा केवल शास्त्रप्रदॢशत कर्मोंके लिये वनमें जाकर आवश्यकतानुसार अनिषिद्ध पशुओंका वध करे; व्यर्थ पशुहिंसा न करे। शास्त्र इस प्रकार उच्छृङ्खल प्रवृत्तिको नियन्त्रित करता है ॥ ६ ॥ राजन् ! जो विद्वान् इस प्रकार शास्त्रनियत कर्मोंका आचरण करता है, वह उस कर्मानुष्ठानसे प्राप्त हुए ज्ञानके कारणभूत कर्मोंसे लिप्त नहीं होता ॥ ७ ॥ नहीं तो, मनमाना कर्म करनेसे मनुष्य अभिमानके वशीभूत होकर कर्मोंमें बँध जाता है तथा गुण-प्रवाहरूप संसारचक्रमें पडक़र विवेकबुद्धिके नष्ट हो जानेसे अधम योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ८ ॥ पुरञ्जनके तरह-तरहके पंखोंवाले बाणोंसे छिन्न-भिन्न होकर अनेकों जीव बड़े कष्टके साथ प्राण त्यागने लगे। उसका वह निर्दयतापूर्ण जीव-संहार देखकर सभी दयालु पुरुष बहुत दुखी हुए। वे इसे सह नहीं सके ॥ ९ ॥ इस प्रकार वहाँ खरगोश, सूअर, भैंसे, नीलगाय, कृष्णमृग, साही तथा और भी बहुत-से मेध्य पशुओंका वध करते-करते राजा पुरञ्जन बहुत थक गया ॥ १० ॥ जब वह भूख-प्याससे अत्यन्त शिथिल हो वनसे लौटकर राजमहलमें आया। वहाँ उसने यथायोग्य रीतिसे स्नान और भोजनसे निवृत्त हो, कुछ विश्राम करके थकान दूर की ॥ ११ ॥ फिर गन्ध, चन्दन और माला आदिसे सुसज्जित हो सब अङ्गोंमें सुन्दर-सुन्दर आभूषण पहने। तब उसे अपनी प्रियाकी याद आयी ॥ १२ ॥ वह भोजनादिसे तृप्त, हृदयमें आनन्दित, मदसे उन्मत्त और कामसे व्यथित होकर अपनी सुन्दरी भार्याको ढूँढऩे लगा; किन्तु उसे वह कहीं भी दिखायी न दी ॥ १३ ॥ प्राचीनबर्हि ! तब उसने चित्तमें कुछ उदास होकर अन्त:पुरकी स्त्रियोंसे पूछा, ‘सुन्दरियो ! अपनी स्वामिनीके सहित तुम सब पहलेकी ही तरह कुशलसे हो न ? ॥ १४ ॥ क्या कारण है आज इस घरकी सम्पत्ति पहले-जैसी सुहावनी नहीं जान पड़ती ? घरमें माता अथवा पतिपरायणा भार्या न हो, तो वह घर बिना पहियेके रथके समान हो जाता है; फिर उसमें कौन बुद्धिमान् दीन पुरुषोंके समान रहना पसंद करेगा ॥ १५ ॥ अत: बताओ, वह सुन्दरी कहाँ है, जो दु:ख-समुद्रमें डूबनेपर मेरी विवेक-बुद्धिको पद-पदपर जाग्रत् करके मुझे उस सङ्कटसे उबार लेती है ?’ ॥ १६ ॥ स्त्रियोंने कहा—नरनाथ ! मालूम नहीं आज आपकी प्रियाने क्या ठानी है। शत्रुदमन ! देखिये, वे बिना बिछौनेके पृथ्वीपर ही पड़ी हुई हैं ॥ १७ ॥ श्रीनारदजी कहते हैं—राजन् ! उस स्त्रीके सङ्गसे राजा पुरञ्जनका विवेक नष्ट हो चुका था; इसलिये अपनी रानीको पृथ्वीपर अस्त-व्यस्त अवस्थामें पड़ी देखकर वह अत्यन्त व्याकुल हो गया ॥ १८ ॥ उसने दु:खित हृदयसे उसे मधुर वचनोंद्वारा बहुत कुछ समझाया, किन्तु उसे अपनी प्रेयसीके अंदर अपने प्रति प्रणय-कोपका कोई चिह्न नहीं दिखायी दिया ॥ १९ ॥ वह मनानेमें भी बहुत कुशल था, इसलिये अब पुरञ्जनने उसे धीरे-धीरे मनाना आरम्भ किया। उसने पहले उसके चरण छूए और फिर गोदमें बिठाकर बड़े प्यारसे कहने लगा ॥ २० ॥ पुरञ्जन बोला—सुन्दरि ! वे सेवक तो निश्चय ही बड़े अभागे हैं, जिनके अपराध करनेपर स्वामी उन्हें अपना समझकर शिक्षाके लिये उचित दण्ड नहीं देते ॥ २१ ॥ सेवकको दिया हुआ स्वामीका दण्ड तो उसपर बड़ा अनुग्रह ही होता है । जो मूर्ख हैं, उन्हींको क्रोधके कारण अपने हितकारी स्वामीके किये हुए उस उपकारका पता नहीं चलता ॥ २२ ॥ सुन्दर दन्तावली और मनोहर भौंहोंसे शोभा पानेवाली मनस्विनि ! अब यह क्रोध दूर करो और एक बार मुझे अपना समझकर प्रणय-भार तथा लज्जासे झुका हुआ एवं मधुर मुसकानमयी चितवनसे सुशोभित अपना मनोहर मुखड़ा दिखाओ। अहो ! भ्रमरपंक्तिके समान नीली अलकावली, उन्नत नासिका और सुमधुर वाणीके कारण तुम्हारा वह मुखारविन्द कैसा मनोमोहक जान पड़ता है ॥ २३ ॥ वीरपत्नि ! यदि किसी दूसरेने तुम्हारा कोई अपराध किया हो तो उसे बताओ; यदि वह अपराधी ब्राह्मणकुलका नहीं है, तो मैं उसे अभी दण्ड देता हूँ। मुझे तो भगवान्‌के भक्तोंको छोडक़र त्रिलोकीमें अथवा उससे बाहर ऐसा कोई नहीं दिखायी देता जो तुम्हारा अपराध करके निर्भय और आनन्दपूर्वक रह सके ॥ २४ ॥ प्रिये ! मैंने आजतक तुम्हारा मुख कभी तिलकहीन, उदास, मुरझाया हुआ, क्रोधके कारण डरावना, कान्तिहीन और स्नेहशून्य नहीं देखा; और न कभी तुम्हारे सुन्दर स्तनोंको ही शोकाश्रुओंसे भीगा तथा बिम्बाफलसदृश अधरोंको स्निग्ध केसरकी लालीसे रहित देखा है ॥ २५ ॥ मैं व्यसनवश तुमसे बिना पूछे शिकार खेलने चला गया, इसलिये अवश्य अपराधी हूँ। फिर भी अपना समझकर तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ; कामदेवके विषम बाणोंसे अधीर होकर जो सर्वदा अपने अधीन रहता है, उस अपने प्रिय पतिको उचित कार्यके लिये भला कौन कामिनी स्वीकार नहीं करती ॥ २६ ॥ जय श्री हरि जय श्री राधे जय श्री कृष्ण 🌋🌸🌋🌸🌋🌸🌋🌸🌋🌸🌋🌸🌋🌸🌋🌸

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श्री कालिका महापुरण में आज आभूषणों के नाम व प्रकार आदि भूषण बताये जाते हैं, किरीट शिरोरत्न, कुण्डल, ललाटिक, ताल पत्र, हार, ग्रैवैषक, उर्मिका, प्रालम्बिका, रत्न सूत्र, उत्तुंग, तक्ष मालिका, पार्श्वद्योत, नखद्योत, अंगुलीच्छादक, अंगद, बाहुवलय, शिखाभूषण, इंगिका, प्राग्दण्वन्ध, नीवी, मुष्टिबन्ध, प्रकीर्णक, पादांद, हंसक, भूपुर, क्षुद्रघण्टिका, मुखपट्ट, ये परम सुशोभन अलंकार कहे गए हैं ये कुल चालीस होते हैं जो देवलोक में सौम्य के प्रदान करने वाले हैं। अलंकारों के प्रदान करने चारों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) वर्गों का प्रसाधन होता है । इसका पूजन करके ही इष्ट की सिद्धि के लिए समर्पण करना चाहिए। विचक्षण पुरुष को उनके दैवत का उच्चारण करके ही पूजन करना चाहिए । अथवा शिरोगत सौवर्णों को सर्वदा समर्पित करना चाहिए । हे भैरव! चूड़ारत्न आदि भूषण ग्रैवेयक से आदि लेकर हंस के अन्त तक सब सुवर्ण से निर्मित हों अथवा रजत (चाँदी) से रचित होने चाहिए । इन्हीं को देवताओं के लिए समर्पित करना चाहिए और अन्य तेजस अर्थात् धातुओं से विरचितों को निवेदित नहीं करना चाहिए । रीति रंग आदि से निर्मित पात्र और उपकरण आदि ही होने चाहिए । इन भूषणों की बीच में इससे उपभूषण देवे। सब ताम्रमय जो कुछ भी भूषण आदि हैं उन्हें निवेदित करे । सर्वत्र ताम्र आभूषण भी स्वर्ण की ही तरह से दे और अर्घ्य पात्र में अधिक देना चाहिए। पूजा का अर्घ्य पात्र, नैवेद्य का आधार पात्र, पालक है। भगवान् विष्णु के लिए सदा उदुम्बर (गूलर वृक्ष) से निर्मित प्रीति तथा सन्तोष देने वाले होते हैं । ताम्रपात्र में देवगण प्रसन्न हुआ करते हैं क्योंकि ताम्र में देव सदा स्थित रहा करते हैं । ताम्र सबके लिए प्रीति का करने वाला हुआ करता है । अतएव ताम्र का प्रयोग करना चाहिए। हे भैरव! अपने उपयोग में भी ताम्र का ही प्रयोग करे और देवगणों के भी उपयोग में इसका प्रयोग करना चाहिए। ग्रीवा के ऊपर के भाग में कभी भी रौप्य (चाँदी का भूषण का प्रयोग न करे ) । अब उपभूषण बताये जाते हैं। प्रावार, दान पात्र, गण्डक और गृह हैं । पर्य्यक आदि जो और दूसरे है। वे सब आभूषण हैं । जो सौम्य परिपूर्ण के बिना और काँसे के बिना भूषण होता है वह सुवर्ण और रौप्य के अभाव में शरीर में नीचे नियोजित करना चाहिए। इन भूषण आदि में जो भी नरों के द्वारा दिया जा सकता है, वही सम्भव होने पर सब ही देना चाहिए । इस प्रकार से भूषण चतुर्वर्ग का दाता और सब सौख्य का प्रदान करने वाला हुआ करता है । अपनी शक्ति के ही अनुसार तुष्टि और पुष्टि के करने वाला भूषण कहा गया है हे पुत्रों ! हे वेताल और भैरव! अब भली भाँति गन्ध का श्रवण कीजिए । यह गन्ध पाँच प्रकार का होता है, जो देवों की प्राप्ति को प्रदान करने वाला है । चूर्णीकृत, घृष्ट अर्थात् घिसा हुआ, दाह को आकर्षित करने वाला, सम्मर्दन से समुत्पन्न रस अथवा प्राणी के अंग से उद्मन ये ही पाँच भेद हैं । गन्ध का चूर्ण, गन्ध पत्र, पुष्पों का चूर्ण प्रशस्त गन्ध से युक्तों के पत्रों का चूर्ण जो है वे सब गन्ध वह होते हैं । घृष्ट मलय से समुत्पन्न गन्ध है जो मेरु के द्वारा चूर्णीकृत हैं । अगुरु प्रति भी गन्ध है जिसका पंक प्रदान किया जाया करता है । घिस कर भी अघृष्ट गन्ध प्रियादि का जो दग्ध करके ग्रहण किया जाता है वह दाह से समुत्पन्न रस हैं । दाह के साथ आकर्षित गन्ध तीसरा कहा जाता है वह निपीड़न करके ही परिग्रहीत किया जाया करता है । वही सम्मर्द से उत्पन्न गन्ध सम्मर्द से, इस नाम से अभीष्ट हुआ करता । मृग की नाभि से समुत्पन्न, उसके कोप उद्धृत गन्ध प्राणी के अंग से जायमान कहा गया है जो स्वर्ग के निवासियों का भी मोह देनेवाला । कर्पूर गन्ध, साराद्यक्षोद के धृष्टि होने पर संस्थित होते हैं । चन्द्र भाग आदि भी रस में और पंक में संगत हैं । गन्धसार, सर्वरस और गन्धादि में प्रयुक्त किया जाता है । मृग नाभि और घृष्ट, चूर्ण भी अन्य के योग से होता है । रीति से सभी जगह पर गन्ध पाँच प्रकार का होता है । जो मलराज गन्ध है वह दैव कार्य और पितृगण के कार्य में सम्मत होता है। उसका पंकरस अथवा चूर्ण भी भगवान् विष्णु की तुष्टि प्रदान करने वाला होता है। समस्त गन्धों में मलय से समुत्पन्न गन्ध परम प्रशस्त होता है इस प्रकार होता है । इस कारण सम्पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए । हे भैरव ! कर्पूर के सहित कृष्ण अगुरु मलयोद्भूत के साथ वैष्णवी प्रीति का देने वाला होता है तथा यह गन्ध चण्डी देवी के लिए भी प्रशस्त माना जाता है। साधक को चाहिए कि देवता के उद्देश्य के पूर्व में गन्ध का सम्पूजन करे फिर अपने इष्टदेव के लिए उसका वितरण करे तो यह सदा समस्त सिद्धियों के प्रदान करने वाला हुआ करता है । गन्ध के द्वारा मनुष्य अपनी कामनाओं का भला किया करता है और गन्ध सदा ही धर्म देने वाला होता है । गन्ध अर्थों का भी साधन हुआ करता है और गन्ध में मोक्ष भी प्रतिष्ठित है । हे वेताल और भैरव! यह गन्ध आप दोनों को बता दिया गया है । अब वैष्णवी देवी के परम प्रिय जो पुष्प हैं उनके विषय में श्रवण कीजिए । वैष्णवी देवी, कामाख्यादेवी तथा त्रिपुरा देवी का अर्चन निम्नांकित पुष्पों द्वारा करना चाहिए । वकुल, मन्दार, कुन्द, कुरुण्टक, करवीर, अर्क, शाल्मल, अपराजित, दमन, सिन्धुवार, सुरभी, कुरुवक, ब्रह्मावृक्ष की लता, कोमल दुर्वा के अंकुर, दशाओं की मञ्जरी, सुशोभव विल्वपत्र, इनसे यजन करे और अन्य जो भगवान् शिव की प्रीति के लिए पुष्पों की जातियाँ होती हैं । हे वैताल भैरव! उनका भी अब आप श्रवण कीजिए जो मेरे द्वारा अभी कही जा रही है। मल्लिका, मालती, जाती, यूथिका, माधवी, पाटला, करवीर, जवा, तार्परिका, कुब्जक, नगर, कर्णिकार, रोचना, चम्पक, आम्रतक, वाण, वर्वरामल्लिका, अशोक, लोध्र, तिलक, अष्टरूप, शिरीष, शमी, द्रोण, पद्म, उत्पल, वकारुण, श्रेतारुण, विसन्ध्य, पलाश, खादिर, वनमाला सेवन्ती, कुमुद कदम्ब, चक्र कोकन्द, तण्डिल, गिरिकर्णिका, नागकेशर, पुन्नाग, केतकी, अञ्जलिका, दोहदा, बीजापुर, नमेरु, शाल, त्रपुषी, चण्डविल, झिठरी पाँचों प्रकार की ऐवमादि कथित पुष्पों के द्वारा वरदा शिवा का अर्चन करना चाहिए। अपामार्ग के पत्र, भृंगार के पत्र, गन्धिनी के पत्र, वलाहक इससे भी पर हैं। खदिर का पत्र, वञ्जुलान्तवक, आम्र, कवगच्छ इससे भी पर जम्बु का पत्र, बीजपुर का पत्र, इससे भी पर कुश पत्र है । इससे भी पर दूर्वा का अंकुर कहा गया है। इससे पर शमी का पत्र इससे अमालक पत्र और उससे अन्त में आमल पत्र है। सबसे अधिक प्रीति करने वाला देवी को विल्व पत्र होता है । सबसे अधिक प्रीति करने वाला देवी को विल्व पत्र होता है । कोकनद पुष्प, पद्म, जवा, बन्धूक, इन सबसे विल्व पत्र वैष्णवी देवी की तुष्टि देनेवाला माना गया है । सब पुष्पों की जातियों में रक्त पद्म अतीव उत्तम होता है । एक सहस्त्र पद माला की रचना करके जो महादेवी को समर्पित किया करता है और भक्ति की भावना से युक्त रहा करता है उसका ! जो पुण्य फल हुआ करता है उसको सुनिए । एक सहस्त्र करोड़ और सौ करोड़ कल्पों तक वह मानव मेरे पुत्र में स्थित रहकर फिर वह श्रीमान् भूमण्डल में राजा हुआ करता है। सभी पत्रों में विल्व पत्र देवी की परमाधिक प्रीति करने वाला माना गया है। उन विल्व पत्रों की एक सहस्त्र की बनाई हुई माला पूर्व की ही भाँति फल देने वाली हुआ करती है । इस विषय में बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है। साधारण रूप से यही कहा जाता है कि कहे हुए तथा न कहे हुए पुष्पों में समुत्पन्न जल तथा सब पत्रों से जो भी जैसा लाभ होता है वह सर्वोषधियों के समुदाय से भी होता है। सभी वन में समुत्पन्न पुष्पों से और पत्रों के द्वारा भी शिवा का यजन करना चाहिए। पुष्पों के अभाव में पत्रों के द्वारा भी पूजन करना चाहिए। यदि पत्रों का भी अभाव हो तो अवसर में तृण, गुल्म और औषध आदि के द्वारा यजन करे । इनके अभाव में सरसों से जो सित हों उनमें पूजन करे । सित के भी न प्राप्त होने पर मानसी भक्ति का समाचरण करना चाहिए । वाजिदन्तक पत्रों से और पुष्पों की राशि के द्वारा पूजन करे । तुलसी के कुसुमों अर्थात् मञ्जरियों से और तुलसी दलों से श्री की वृद्धि के लिए अर्चन करे । पुरश्चरण के कार्यों में विल्व पत्रों से युक्त तिल, अक्षत अथवा घृत से शिवा का उद्देश्य लेकर यत्नपूर्वक काम की वृद्धि के लिए संस्कार की हुई अग्नि में हवन करना चाहिए । कामना की वृद्धि के लिए संख्या से जो जप संकल्प किया गया है उसके अन्त में पूजन किया है वह द्विजों के द्वारा करना चाहिए । श्रेष्ठ द्विजों ने जिसको पुरश्चरण के नाम से कीर्तित किया हैं उसमें पूर्व में पुराण पूर्वोक्त और विस्तार से वर्णित विधानों के द्वारा कामाख्या और वैष्णवी देवी का पूजन करे । जहाँ तक भी सम्भव हो साधक को यहाँ पर सोलह उपचार समर्पित करने ही चाहिए। उसी भाँति षोडश पूर्वोक्त उपचारों का और विधान के कृत्यों का लंघन नहीं करना चाहिए । सम्पूर्ण पूजन करके कल्पोक्त का सौ बार जप करे । जाप के अन्त में अग्नि में होम करे और होम के अन्त में तीन बलि दे। तीन जाति के बलियों का वितरण करे तथा इसके उपरान्त नृत्य गीत करना चाहिए । पत्नी स्वयं अथवा भाई या गुरु, अपना पुत्र अथवा शिष्य नैवेद्य आदि का विनियोजन करना चाहिए । यज्ञ की समाप्ति पर श्री गुरुदेव को शुभ दक्षिणा देनी चाहिए । सुवर्ण, तिल, गौएं दक्षिणा में देवे और इनके देने की शक्ति न हो तो केवल चेटक ही निवेदित करे । मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में ब्रह्मचर्य रखने वाला तथा इन्द्रियों को जीत लेने वाला रहे और नवमी में अथवा चतुर्दशी में महादेवी का पुरश्चरण करे। है भैरव ! श्री गुरुदेव के मुख से आदान करना करना चाहिए। जो भी विधि और विस्तार कल्प में कहा गया हो उससे इन उक्त तिथियों में भली भाँति पूजन करे । सम्पूर्ण पूजा को न करके ईप्सित मन्त्र को नहीं देना चाहिए अथवा पुरश्चरण भी नहीं करे । यदि ऐसा करता है तो अवसाद प्राप्त किया करता है। जो नित्य पूजा है, यदि की जा सकती है तो सम्पूर्ण पूजा करे और उस समय में अतीन्द्रिय होकर की कल्प में वर्णित पूजन करना चाहिए । हे भैरव ! यदि विस्तार से देवी की पूजा करना न हो तो कल्प में कथित अन्य देव की पूजा करे । अर्घ्य पात्र में आठ बार जप कर उपचारों का प्रसेचन करना चाहिए । आधार शक्ति के प्रमुख मूल वर्गों का प्रयोग करे और हृदय में संस्थित देवता का ध्यान करके और वायु के द्वारा बाहर करके मण्डल में आरेहण करके विधि के अनुसार उपचारों को देना चाहिए । अंगों का पूजन करके उसी भाँति दल देवताओं का यजन करे । फिर तीन पुष्पांजलियों को देकर, जप करके, स्तवन करके और प्रणाम करे । देवता के सामने मुद्रा को प्रदर्शित करके पीछे विसर्जन करना चाहिए। सभी देवताओं की यह ही विधि कही गई है । यदि कल्प में कही हुई पूजा भली भाँति नहीं की जा सकती है तो उपचारों को उस भाँति देने के लिए उस समय में इन पाँचों को सदा वितरित करे । गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्य, ये पाँच हैं । अभाव में पुष्प और दीप के द्वारा करे, इनके भी अभाव में भक्ति की भावना से ही करना चाहिए । यह संक्षेप पूजा कह दी गई है । *🙏🌹जय भगवती जय महामाया🌹🙏*

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घर में कभी नहीं होगी संपत्ति की कमी,अगर करेंगे इन वास्तु नियमों का पालन। आमतौर पर ऐसा होता है कि हम काफी मेहनत करते हैं लेकिन फिर भी धन-संपत्ति के मामले में हमेशा कमियों से जूझते रहते हैं। ऐसे में आपको घर की कुछ बातों पर ध्यान देने की जरुरत है। आप देखना चाहिए कि कहीं आपके घर में वास्तु दोष तो नहीं है। आइए, जानते हैं वास्तु के नियम से जुड़ी कुछ खास बातें- जिस कमरे में लॉकर बनवा रहे हैं, वह अन्य कमरों की तरह ही चौकोर हो और दूसरे कमरे की तरह सामान्य ऊंचाई का होना चाहिए। लॉकर रूम घर के कोने पर होना उत्तम माना जाता है। दूसरे कमरे या जगह जाने के लिए इस रूम से होकर कोई रास्ता नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे कि लॉकर रूम को कभी भी स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल नहीं करें। लॉकर रूम में किसी देवता की तस्वीर की जगह कांच रखा जाना अधिक उपयुक्त माना जाता है। नैऋत्य कोण यानि दक्षिणी-पश्चिमी कोना से जुड़े कुछ अन्य बातों का ध्यान जरूर रखें जिससे घर में धन और संपत्ति का भंडार हमेशा भरा रहेगा। इस कोने में पृथ्वी तत्व का प्रभाव रहता है। इस कोने के कमरे का फर्श सभी कमरों से ऊँचा हो तो अच्छा है। छोटे बच्चे इस कमरे में न सोएं एवं नौकर को भूल से भी इस कोने का कमरा न दें। इस कोने में घर का टॉयलेट, बेडरूम या स्टोर रूम बनाना चाहिए। यह घर का दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र होता है। घर का वजनी सामान भी यहाँ रखा जा सकता है लेकिन बेकार सामान यहाँ नहीं रखना चाहिए। इस कोण में घर का मेन गेट नहीं बनाना चाहिए। 💫🥀💫🥀💫🥀💫🥀💫🥀💫🥀💫🥀💫🥀

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रविवार के दिन सुबह उठते ही करें ये काम जीवन में कई बार ऐसा होता है, कि हम बहुत मेहनत करते हैं लेकिन उसका परिणाम नहीं निकलता। ऐसे में जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की जरुरत होती है, जिसे आप वास्तु और ज्योतिष शास्त्र के छोटे-छोटे उपायों द्वारा ला सकते हैं।हम आपको ज्योतिष शास्त्र अनुसार ऐसे उपाय बताने जा रहे हैं, जिसे सुबह उठते ही आपको करना चाहिए- सबसे आसान और प्रसिद्ध उपाय है सूर्य को जल चढ़ाना। उगते सूर्य को तांबे के लोटे से जल चढ़ाते समय सूर्यमंत्रों का जाप करें। रविवार के दिन बाजार से 3 झाड़ू खरीदें और अगले दिन ब्रम्ह मुहूर्त में उठकर इन झाडुओं को घर के पास स्थिित किसी मंदिर में रख आएं। बस ध्यान रखें कि ऐसा करते हुए आपको कोई देख न पाए। रविवार की रात को सिरहाने दूध का गिलास रखकर सोएं और सुबह उस दूध को बबूल के पेड़ के जड़ में डाल दें। इस दिन अपनी मनोकामना को बरगद के पत्ते पर लिखकर कहीं बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। रविवार के दिन शाम को पीपल के पेड़ के नीचे चार मुख वाला दीपक बनाकर जलाएं। इससे यश, धन और समृद्धि प्राप्त होगी। 🌿🐚🌿🐚🌿🐚🌿🐚🌿🐚🌿🐚🌿🐚🌿🐚

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