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सोमवार, १७जून २०१९ ,ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, विक्रम संवत २०७६ सूर्योदय: ०५:४१ सूर्यास्त: १९:१४ हिन्दु सूर्योदय: ०५:४५ हिन्दु सूर्यास्त: १९:१० चन्द्रोदय: १९:१८ चन्द्रास्त: चन्द्रास्त नहीं सूर्य राशि: मिथुन चन्द्र राशि: वृश्चिक - १०:४३ तक सूर्य नक्षत्र: मॄगशिरा द्रिक अयन: उत्तरायण द्रिक ऋतु: ग्रीष्म वैदिक अयन: उत्तरायण वैदिक ऋतु: ग्रीष्म हिन्दु लूनर दिनांक शक सम्वत: १९४१ विकारी चन्द्रमास: ज्येष्ठ - अमांत ज्येष्ठ - पूर्णिमांत विक्रम सम्वत: २०७६ परिधावी गुजराती सम्वत: २०७५ पक्ष: शुक्ल पक्ष तिथि: पूर्णिमा - १४:०० तक नक्षत्र, योग तथा करण नक्षत्र: ज्येष्ठा - १०:४३ तक योग: शुभ - १९:३० तक प्रथम करण: बव - १४:०० तक द्वितीय करण: बालव - २६:११+ तक अशुभ समय दुर्मुहूर्त: १२:५४ - १३:४८ १५:३५ - १६:२९ वर्ज्य: १९:०६ - २०:४६ ०९:०५ - १०:४३ राहुकाल: ०७:२५ - ०९:०६ गुलिक काल: १४:०८ - १५:४९ यमगण्ड: १०:४७ - १२:२७   शुभ समय अभिजित मुहूर्त: १२:०० - १२:५४ अमृत काल: २९:०९+ - ३०:४९+ पञ्चक रहित मुहूर्त एवं उदय-लग्न आज के दिन के लिए पञ्चक रहित मुहूर्त: ०५:४५ - ०७:५१ अग्नि पञ्चक ०७:५१ - १०:०७ शुभ मुहूर्त १०:०७ - १०:४३ रज पञ्चक १०:४३ - १२:१९ शुभ मुहूर्त १२:१९ - १४:०० चोर पञ्चक १४:०० - १४:३० शुभ मुहूर्त १४:३० - १६:४४ रोग पञ्चक १६:४४ - १९:०० शुभ मुहूर्त १९:०० - २१:०६ मृत्यु पञ्चक २१:०६ - २२:५२ अग्नि पञ्चक २२:५२ - २४:२५+ शुभ मुहूर्त २४:२५+ - २५:५६+ रज पञ्चक २५:५६+ - २७:३६+ अग्नि पञ्चक २७:३६+ - २९:३४+ शुभ मुहूर्त २९:३४+ - २९:४५+ रज पञ्चक आज के दिन के लिए उदय-लग्न मुहूर्त: ०५:४५ - ०७:५१ मिथुन ०७:५१ - १०:०७ कर्क १०:०७ - १२:१९ सिंह १२:१९ - १४:३० कन्या १४:३० - १६:४४ तुला १६:४४ - १९:०० वृश्चिक १९:०० - २१:०६ धनु २१:०६ - २२:५२ मकर २२:५२ - २४:२५+ कुम्भ २४:२५+ - २५:५६+ मीन २५:५६+ - २७:३६+ मेष २७:३६+ - २९:३४+ वृषभ २९:३४+ - २९:४५+ मिथुन

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मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के प्रथम अवतार है। मछली के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु ने एक ऋषि को सब प्रकार के जीव-जन्तु एकत्रित करने के लिये कहा और पृथ्वी जब जल में डूब रही थी, तब मत्स्य अवतार में भगवान ने उस ऋषि की नाव की रक्षा की। इसके पश्चात ब्रह्मा ने पुनः जीवन का निर्माण किया। एक दूसरी मन्यता के अनुसार एक राक्षस ने जब वेदों को चुरा कर सागर की अथाह गहराई में छुपा दिया, तब भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों को प्राप्त किया और उन्हें पुनः स्थापित किया। मत्स्य अवतार की कथा एक बार ब्रह्माजी की असावधानी के कारण एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा लिए जाने के कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया। इसकी विस्मयकारिणी कथा इस प्रकार है- कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था। सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। दूसरे दिन मछली सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरा स्थान ढूंढ़िए, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया। यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है। तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय के चक्र में फिर जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा। भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुँचेगी। आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइएगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूँगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया।

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