बृहस्पतिवार व्रत कथा    प्राचीन समय की बात है। भारत में एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा प्रतापी तथा दानी था। वह नित्यप्रति मन्दिर में भगवददर्शन करने जाता था। वह ब्राह्मण और गुरु की सेवा किया करता था। उसके द्वार से कोई भी आचंक निराश होकर नहीं लौटता था। वह प्रत्येक गुरुवार को व्रत रखता एवं पूजन करता था। हर दिन गरीबों की सहायता करता था। परन्तु यह सब बातें उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न व्रत करती और न किसी को एक भी पैसा दान में देती थी। वह राजा से भी ऐसा करने को मना किया करती थी।   एक समय की बात है कि राजा शिकार खेलने वन को चले गए। घर पर रानी और दासी थीं। उस समय गुरु बृहस्पति साधु का रूप. धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा माँगने आए। साधु ने रानी से भिक्षा माँगी तो वह कहने लगी-“हे साधु महाराज! मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूँ। इस कार्य के लिए तो मेरे पतिदेव ही हुक हैं।अब आप ऐसी कृपा करें कि सारा धन नष्ट हो जाए तथा मैं आराम से रह सकूँ।”   साधु रूपी बृहस्पतिदेव ने कहा-“हे देवी! तुम बड़ी विचित्र हो। सन्‍तान और धन से कोई दुःखी नहीं होता हैं, इसको सभी चाहते हैं। पापी भी पुत्र और धन की इच्छा करता है। अगर तुम्हारे पास धन अधिक है तो भूखे मनुष्यो को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, धर्मशालाएँ बनवाओ, कुआँ-तालाब  बावड़ी बाग-बगीचे आदि का निर्माण कराओ तथा निर्धनों की कुंआरी कन्याओं का विवाह कराओ, साथ ही यज्ञादि करो। इस प्रकार के कर्मों से आपके कुल का और आपका नाम परलोक में भी सार्थक होगा एवं तुम्हें भी स्वर्ग की प्राप्ति होगी।” परन्तु रानी साधु की इन बातों से खुश नहीं हुई। उसने कहा-“हे साधु महाराज! मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं जिसको मैं अन्य लोगों को दान देती फिरूँ तथा जिसको रखने और सम्हालने में ही मेरा सारा समय नष्ट हो जाए ।”   साधु ने कहा-“हे देवी! यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो जैसा में तुम्हे बताता हूँ तुम वैसा ही करना । बुहस्पतिवार के दिन घर आंगन को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से कहना वह हजामत करवाए, भोजन में मांस-मदिरा खाना, कपड़े धोबी के यहाँ धुलने देना। इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा।” यह कहकर साधु महाराज रूपी बृहस्पतिदेव अन्तर्धान हो गए। रानी ने साधु के कहने के अनुसार सात बृहस्पतिवार तक वैसा ही करने का विचार किया। साथु के बताए अनुसार कार्य करते हुए केवल तीन बृहस्पतिवर ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-सम्पत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए दोनों समय परिवार तरसने लगा तथा सांसारिक भोगों से दुःखी रहने लगा। तब राजा रानी से कहने लगा कि हे रानी! तुम यहाँ पर रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ क्योंकि यहां पर मुझे सभी मनुष्य जानते हैं, इसलिए मैं यहाँ पर कोई काम नहीं कर सकता। मैं अब परदेश जा रहा हूँ। वहाँ कोई काम-धन्धा करूँगा। शायद हमारे -भाग्य बदल जाएँ। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। बह वहाँ जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह जीवन व्यतीत करने लगा।   इधर राजा के बिना रानी और दासियाँ दुःखी रहने लगीं, किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन जल पीकर ही रह जातीं। एक समय रानी और दासियों को सात दिन बिना भोजन के व्यतीत करने पड़े , तो रानी ने अपनी दासी से कहा-“हे दासी! यहाँ पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है। की वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और वहाँ से पाँच सेर बेझर माँगकर लेआ, जिससे कुछ समय के लिए गुजारा हो जाएगा।” दासी रानी की बहन के पास गईं रानी की बहन उस समय पूजा कर रही थी। बृहस्पतिवार का दिन था। दासी ने रानी की बहन से कहा-“हे रानी! मुझे आपकी बहन ने भेजा है। मुझे पाँच सेर बेझर दे दो।” दासी ने यह बात अनेक बार कही , परन्तु रानी की बहन ने कोई उत्तर नही दिया, क्योंकि वह उस समय बृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी। जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई। उसे क्रोध भी आया। वह लौटकर रानी से बोली-“हे रानी! आपकी बहन बहुत ही घमण्डी है। वह छोटे लोगों से बात भी नहीं करती। मैंने उससे कहा तो है| उसने कोई उत्तर नहीं दिया। मैं वापस चली आई।” रानी बोली-“हे दासी! इसमे उसका कोई दोष नहीं है जब बुरे दिन आते हैं तब कोई सहारा नही देता। अच्छे-बुरे का पता विपत्ति में ही लगता है। जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा। यह सब हमारे भाग्य का दोष है।” उधर रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आईं थी, परन्तु मैं उससे नही बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी। अतः कथा सुन और विष्णु भगवान का पूजन समाप्त कर वह अपनी बहन के घर आईं और कहने लगी-“हे बहन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रहीं थी। तुम्हारी दासी हमारे घर गई थी, परन्तु जब तक कथा होती है तब तक हम लोग न उठते हैं और न बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो, दासी क्‍यों गई थी?” रानी बोली-“बहन! हमारे घर अनाज नहीं था। वैसे तुमसे कोई बात छिपी नहीं है। इस कारण मैंने दासी को तुम्हारे पास पाँच सेर बेझर लेने के लिए भेजा था।“    रानी की बहन बोली-“बहन देखो! बृहस्पति भगवान्‌ सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में ही अनाज रखा हो।” यह सुनकर दासी घर के अन्दर गई तो वहां उसे एक घड़ा बेझर का भरा मिल गया। उसे बड़ी हैरानी हुईं, क्योंकि उसने एक-एक बर्तन देख लिया था। उसने बाहर आकर रानी को बताया। दासी अपनी रानी से कहने लगी-“हे रानी! देखो, वैसे हमको जब अन्न नहीं मिलता तो हम रोज ही  ब्रत करते हैं। अगर इनसे इस व्रत की विधि और कथा पूछ ली जाए तो उसे हम भी कर लिया करेंगे।” दासी के कहने पर रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार ब्रत के बारे में पूछ। उसकी बहन ने बताया-“हे रानी बहन! बृहस्पतिवार को सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करके बृहस्पतिदार का व्रत करना चाहिए। लेकिन उस दिन सिर नहीं धोना चाहिए। बृहस्पतिवार के ब्रत में चने की दाल और मुनककों से विष्णु भगवान्‌ का केले के वृक्ष की जड़ से पूजन करें तथा दीपक जलावें। उस दिन एक ही समय भोजन करें। भोजन पीले खाद्य पदार्थ  का करें तथा कथा सुनें। इस प्रकार करने. से गुरु भगवान्‌ प्रसन्‍न होते हैं। अन्न, पुत्र, धन देते हैं। इस तरह व्रत और पूजन की विधि बताकर रानी की बहन अपने घर लौट गई।   रानी और दासी दोनों ने निश्चंय किया कि वे बृहस्पतिदेव भगवान्‌ का पूजन जरूर करेंगी। सात दिन बाद 'जब बृहस्पतिवार आया तो उन्होंने ब्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन लाईं तथा उसकी दाल से केले की जड़ में विष्णु भगवान्‌ का पूजन किया। अब भोजन कहाँ से आए। दोनों बड़ी दुःखी हुईं  परन्तु उन्होंने व्रत किया था इस कारण बृहस्पतिदेव भगवान्‌ प्रसन्‍न थे। वे एक साधारण व्यक्ति के रूप में दो थालों में सुर पीला भोजन लेकर आए और दासी को देकर बोले-“हे दासी! यह भोजन तुम्हारे और रानी के लिए है, तुम दोनों करना।” दासी भोजन पाकर बड़ी प्रसन्‍न हुई और रानी से बोली-“रानी जी, भोजन कर लो।” रानी को भोजन आने के बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए वह दासी से बोली-“जा, तू ही भोजन कर क्योंकि तू हमारी व्यर्थ में हँसी उड़ाती है।” दासी बोली-“एक व्यक्ति अभी भोजन दे गया है।” रानी कहने लगी-“वह भोजन तेरे ही लिए दे गया है, तू ही भोजन कर।” दासी ने कहा-“बह व्यक्ति हम दोनों के लिए दो थालों में भोजन दे गया है। इसलिए मैं और आप दोनों ही साथ-साथ भोजन करेंगी।” फिर दोनों ने गुरु भगवान्‌ को नमस्कार कर भोजन प्रारम्भ किया।   उसके बाद से वे प्रत्येक बृहस्पतिवार को गुरु भगवान्‌ का ब्रत और पूजन करने लगीं। बृहस्पति भगवान्‌ की कृपा से उनके पास धन हो गया। परन्तु रानी फिर पहले की तरह से आलस्य करने लगी। तब दासी बोली- “देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थीं, तुम्हें धन के रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया। अब गुरु भगवान्‌ की कृपा से धन मिला है तो फिर तुम्हें आलस्य होता है?बड़ी मुसीबतो के बाद हमने यह धन पाया है। इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए। तुम भूखे मनुष्यों को भोजन 'कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, कुआँ-तालाब-बावड़ी आदि का निर्माण करबाओ, मन्दिर पाठशाला बनवाकर दान दो, कुँवारी कन्‍याओं का विवाह करवाओ, धन को शुभ कार्यों में खर्च करो, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़े तथा स्वर्ग प्राप्त हो और पितृ प्रसन्‍न हों।” दासी की बात मानकर रानी ने इसी प्रकार के कर्म करने प्रारंभ किए,जिससे उनका काफी यश फैलने लगा ।   एक दिन रानी और दासी आपस में विचार करने लगीं कि न जाने राजा किस दशा में होंगे, उनकी कोई खोज-खबर नहीं है। गुरु भगवान्‌ से उन्होंने प्रार्थना की और भगवान्‌ ने रात्रि में राजा को स्वप्न में कहा-“हे राजा उठ! तेरी रानी तुझको याद करती है। अब  अपने देश को लौट जा।” राजा प्रातःकाल उठकर ,.जंगल से लकड़्याँ काटकर  लाने के लिए जंगल की ओर चल पड़ा। जंगल से गुजरते हुए वह सोचने लगा-“रानी की गलती से कितने दुःख भोगने पड़े। राजपाट छोड़कर उसे जगल में आकर रहना पड़ा। जंगल से लकड़ियाँ काटकर उन्हें बेचकर गुजारा करना पड़ा,उसी समय, उस वन में बृहस्पतिदेव एक साधु के रूप में आए। और राजा के पास आकर बोले-“हे लकड़हारे! तुम इस सुनसान जंगल में किस चिन्ता में बैठे हो, मुझे बतलाओ? ” यह सुन राजा के नेत्रों में जल भर आया और साधु की वन्दना कर बोला-“हे प्रभो! आप सब कुछ जानने वाले हैं।” इतना कहकर राजा ने साधु को अपनी सम्पूर्ण कहानी सुना दी। महात्मा तो स्वाभाव से ही दयालु होते हैं। वे राजा से बोले-“हे राजा! तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पतिदेव के प्रति अपराध किया था जिसके कारण तुम्हारी यह दशा हुईं। अब तुम किसी प्रकार की चिंता मत करो । भगवान्‌ तुम्हें पहले से अधिक धन देंगे। देखो, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पतिवार का ब्रत॑ करना प्रारम्भ कर दिया है। अब तुम भी बृहस्पतिवार का व्रत करके चने की दाल व गुड़ और जल को लोटे में               डालकर केले के पत्ते से भगवान्‌ विष्णु का पूजन करो। फिर कथा कहो या सुनो ॥ भगवान्‌ तुम्हारी सब कामनाओं को पूर्ण करेंगे।” साथु को प्रसन्‍न देखकर राजा बोला-“हे प्रभो! मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा भी नहीं बचता जिससे भोजन करने के उपरान्त कुछ बचा सकेँ। मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है मेरे पास कोई साधन नहीं जिससे समाचार जान सूकूँ। फिर मैं बृहस्पतिवार की कौन सी कहानी कहूँ या सुनूं। मुझको तो कुछ भी मालूम नहीं है।” साधु ने कहा- “हे राजा! तुम किसी बात की चिन्ता मत करो। बृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियाँ लेकर शहर में जाओ। तुम्हें रोज से दोगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भाँति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ ज़ाएगा।” बृहस्पतिदेव की कथा इस   प्रकार है-   बृहस्पतिदेव की कथा   प्राचीन काल में एक बहुत ही निर्धन ब्राह्मण था। उसके कोई सन्‍्तान नहीं थी। वह नित्य पूजा-पाठ करता, परन्तु उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी। वह न स्नान करती और न किसी देवता का पूजन करती। प्रात:काल उठते ही सर्वप्रथम भोजन करती, बाद में कोई अन्य कार्य करती। ब्राह्मण देवता बहुत दुःखी रहंते थे। पत्नी को बहुत समझाते, किन्तु उसका कोई परिणाम न निकलता।   भगवान्‌ की अनुकम्पा से एक समय उस ब्राह्मण की पत्नी गर्भवती हुईं और दसवें महीने एक सुन्दर कन्या को जन्म दिया। निर्धन ब्राह्मण कन्या के जन्म से बहुत दुखी हुआ। धीरे-धीरे ब्राह्मण की कन्या बड़ी होने लगी। बचपन से ही उस कन्या की रुचि भगवान्‌ विष्णु की पूजा में थी। वह प्रातः उठते ही स्नानादि करके भगवान्‌ विष्णु की पूजा करने मंदिर मे जाती थी। बृहस्पतिवार को व्रत करके विधिवत्‌ पूजा-पाठ करती थी। पूजा-पाठ के बाद वह पढ़ने के लिए पाठशाला में जाती थी। घर से चलते हुए वह मुट्ठी भर जौ साथ लेकर जाती और पाठशाला के रास्ते में थोड़े-थोड़े जौ गिराती जाती थी। जब वह पाठशाला से घर लौटती तो जौ के वह दाने सोने में बदले हुए मिलते थे। लड़की सभी सोने के दाने बीन लाती थी।   एक दिन जब वह सोने के दानों को साफ कर रहीं थी तो उसकी माँ ने कहा, “बेटी ! सोने के दाने साफ करने के लिए सोने का सूप भी होना चाहिए।” अगले दिन बृहस्पतिवार था। उसने भगवान्‌ बृहस्पतिदेव की पूजा करते हुए प्रार्थना की, “हे भगवान! यदि मैंने आपका व्रत विधिवत्‌ किया हो तो मुझे सोने का सूप दे दो।” भगवान्‌ बृहस्पतिदेव ने उसकी मनोकामना पूरी करने का वचन दिया। पाठशाला से लौटते समय उसे रास्ते में सोने का सूप पड़ा हुआ मिला। घर लौटकर सोने का सूप अपनी माँ को दिखाकर वह सोने के दाने स्फ करने लगी। उसी समय नगर का राजकुमार उसके घर के पास से गुजरा। उस सुन्दर लड़की को सोने के सूप में जौ साफ करते देख राजकुमार उस पर मोहित हो गया। महल में लौटकर राजकुमार ने राजा से उस लड़की से विवाह करने की इच्छा प्रकट की तो राजा ने ब्राह्मण को महल में बुलाकर राजकुमार से उसकी लड़की के विवाह की बात कही। ब्राह्मण तैयार हो गया। धूमधाम से उस लड़की का विवाह राजकुमार से हो गया। दुल्हन बनकर ब्राह्मण की लड़की महल में चली गई। लड़की के चले जाने से ब्राह्मण फिर निर्धन हो गया। उसे कई-कई दिन भोजन भी नही मिलता था। बहुत दुखी होकर ब्राह्मण एक दिन अपनी लड़की के पास गया। अपने पिता से निर्धनता का समाचार सुनकर उसे बहुत-सा धन देकर पिता को विदा किया। उस धन से ब्राह्मण के कुछ दिन तो आराम से गुजर गए। लेकिन जल्दी ही फिर  भूखों मरने  की हालत हो गई। ब्राम्हण अपनी लड़की से धन लेने के लिए फिर महल में पहुँचा। लड़की ने  पिता की बुरी हालत देखकर कहा,पिताजी ! आखिर आप कब तक मुझसे धन लेकर जीवन-यापन करेंगे। आप कोई ऐसा उपाय क्‍यों नहीं करते जिससे आपका घर धन-सम्पत्ति से भर जाए।”   ब्राह्मण ने कहा, “मैंने तेरी माँ को बहुत समझा लिया , पर उसकी समझ में कुछ नहीं आता। उसका फूहड़पन नष्ट हो तो घर की निर्धनता भी दूर हो जाए।” तब कुछ सोचकर लड़की ने पिता से कहा, “पिताजी! आप कुछ दिनों के लिए माँ को मेरे पास छोड़ जाओ।” तब कुछ सोचकर ब्राह्मण पत्नी को लड़की के पास महल में छोड़ आया। लड़की ने अपनी माँ से कहा, “माँ, तुम कल प्रात: उठकर स्तानादि करके भगवान्‌ बृहस्पतिदेव (विष्णुजी ) की पूजा अवश्य करना। पूजा करने से तुम्हारी निर्धनता अवश्य दूर हो जाएगी।” लेकिन उसकी माँ ने उसकी कोई बात नहीं मानी। तब क्रोधित होकर लड़की ने अपनी माँ को एक कक्ष में बंद कर दिया। सूर्योदय के समय माँ को उठाकर , जबरदस्ती उसे स्नान कराया और फिर मंदिर में ले जाकर भगवान्‌ बृहस्पतिदेव की पूजा कराई। कुछ दिनों तक ऐसा करने से माँ की बुद्धि में परिर्वतन हुआ और वह स्वयं बृहस्पतिवार का व्रत रखने लगी। उसके ब्रत रखने से ब्राह्मण के घर में भगवान्‌ विष्णु की अनुकम्पा से धन की वर्षा होने लगी। दोनों पति-पत्नी धन-सम्पत्ति पाकर आनंदपूर्वक जीवन-यापन करते हुए विष्णुधाम को चले गए। लकड़हारा बने राजा ने उन साथु से भगवान्‌ बृहस्पतिदेव की यह कथा सुनकर बृहस्पतिवार का व्रत करके भगवान्‌ विष्णु की पूजा की। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हो गए। लेकिन अगले बृहस्पतिवार को कामकाज में अधिक व्यस्त रहने के कारण उसने भगवान्‌ बृहस्पतिदेवजी का व्रत नहीं किया। भगवान बृहस्पतिदेव लकड़हारे से क्रोधित हो गए और उसे भूल की सजा दी। उस दिन नगर के राजा ने नगर में घोषणा करके सबको सूचित किया, “प्रत्येक नागरिक मेरे महल में भोजन करने आए। जो नहीं आएगा, उसे अपराधी मानकर भारी दण्ड दिया जाएगा।” लकड्हारा बने राजा ने उसर नगर के राजा की घोषणा तो सुनी, लेकिन जंगल से लकड़ी काटकर लाने और उन्हें बेचने में देर हो जाने के कारण वह समय पर महल में भोजन करने नहीं जा सका; अत: राजा के सैनिक लकड़हारे को पकड़कर महल मे ले गए। राजा ने उसे महल के एक कक्ष में बैठाकर भोजन कराया। उस कक्ष में एक खूँटी पर रानी का सोने का हार लटका हुआ था। लकड्हारा अकेला उस कक्ष में भोजन कर रहा था। तभी उसने एक आश्चर्यजनक घटना घटती देखी। देखते-ही देखते वह खूँटी हार को निगल गई। थोड़ी देर के बाद राजा ने हार को गायब देखा तो लकड्हारे को कारावास में डलवा दिया। लकड़हारा मन-ही-मन अपने भाग्य को कोसने लगा। तभी उसे जंगल में मिले साधु का स्मरण हो आया। थोड़ी देर में भगवान्‌ बृहस्पतिदेव सन्‍यासी के रूप में उसके सामने प्रकट हुए और कहा, “हे लकड़हारे! तूने भगवान्‌ बृहस्वतिदेव की पूजा नहीं की , इसी कारण तुम्हें कष्ट हुआ है। लेकिन अब चिन्ता मत करो। बृहस्पतिवार के दिन कारागार के दरवाजे पर तुम्हें कुछ पैसे पड़े हुए मिलेंगे। उन पैसों से भगवान्‌ बृहस्पतिदेव का व्रत करके उनकी पूजा करोगे तो तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जाएंगे। बृहस्पतिवार के दिन दरवाजे पर पड़े मिले पैसों से चने और गुड़ मंगाकर लकड़्हारे ने बृहस्पतिवार की कथा कही तो भगवान्‌ बृहस्वतिदेव ने प्रसन्‍त्र होकर उस नगर के राजा को स्वपन में लकड़हारे को कारागार से मुक्त करने को कहा । सुबह राजा ने अपने कक्ष में आकर देखा तो खूंटी पर रानी का हार टगा हुआ था। राजा ने लकड़हारे को मुक्त कर दिया और उसे धन और आभूषण देकर विदा किया | लकड़हारा बना राजा उस नगर से चल के अपने नगर में पहुँचा तो उस नगर में कुएँ, धर्मशाला, बाग-बगीचे देखकर बहुत प्रसन्‍त हुआ। राजा ने किसी से पूछा, “ये कुएँ धर्मशालाएँ किसने बनवाई हैं? ” सबने उसे बताया कि ये सब रानी और उसकी दासी ने बनवाए हैं।   राजा महल में पहुँचा तो रानी ने उसका भव्य स्वागत किया। तब राजा ने 'निएचय किया कि सप्ताह में एक बार तो सभी बृहस्वतिदेव का व्रत तथा पूजन करते हैं, परन्तु मैं प्रतिदिन व्रत किया करूँगा तथा दिन में तीन बार कथा कहा करूँगा। अब राजा हर समय दुशाले में चने की दाल बाँथे रहता तथा दिन में तीन बार बृहस्पतिदेव की कथा कहता। कुछ दिनों के बाद राजा को अपनी बहन की याद आई। एक दिन घोड़े पर सवार होकर राजा अपनी बहन से मिलने चल दिया। अभी राजा नगर के बाहर पहुँचा ही था कि उसने कुछ लोगों को एक शव को ले जाते हुए देखा। राजा को स्मरण हो आया कि आज उसने कसी को बृहस्पतिवार की व्रत -कथा नहीं सुनाई है। राजा ने उन लोंगों को रोककर कहा, “भाइयो! आप शव को ले जाने से पहले मुझसे बृहस्पतिवार की कथा सुन लें।” लोगों ने राजा पर क्रोधित होते हुए कहा, “तुम पागल तो नहीं हो।” लेकिन कुछ बड़े-बूढ़े लोगों ने कहा, “अच्छा भाई, साथ में चलते-चलते तुम अपनी कथा भी सुना लो।” राजा ने चलते हुए आधी कथा ही सुनाई थी कि शव हिलने लगा। राजा के पूरी कथा सुनाते ही शव उठकर बैठ गया। लोगों ने हैरानी से दाँतो तले उँगली दबाई और अगले बृहस्पतिवार से भगवान्‌ बृहस्पतिदेव का व्रत करने व कथा सुनने का निश्चय कर लिया। अब घोड़े पर सवार राजा चलते हुए एक किसान के पास पहुँचा। किसान अपने खेत में हल चला रहा आ, राजा ने कहा, “अरे भाई! मुझसे बृहस्पतिवार की कथा सुन लो।” किसान झुँझलाकर बोला, “अरे भाई !  देख नहीं रहे। जितनी देर तक तुम्हारी कथा सुनूंगा, उतनी देर में तो पूरे खेत में हल चला लूँगा ।” राजा निराश होकर चलने लगा। तभी किसान के बैल लड़खड़ाकर जमीन पर जा गिरे। किसान के पेट में भी जोरों का दर्द होने लगा । उस किसान की पत्नी जब खाना लेकर आई तो उसने किसान से इस बारे में पूछा। किसान ने  घुड़सवार की पूरी कहानी सुनाई । किसान की पत्नी दौड़ती हुई राजा के पास पहुंचकर हाथ जोड़कर बोली, भैया! मैं तुम्हारी कथा सुनने को तैयार हूं ।“ राजा ने से उसके साथ खेत पर पहुंचकर बृहस्पतिवार की कथा सुनाई । तभी बैल उठकर खड़े हो गए । किसान के पेट का दर्द भी तुरन्त ठीक हो गया। राजा अपनी बहन के घर पहुँचा तो उसकी बहुत आव-भगत हुई। अगले दिन सुबह उठकर राजा ने देखा, घर के सभी लोग भोजन कर रहे हैं। किसी भूखे को बृहस्पतिबवार की कथा सुनाए बिना राजा भोजन नहीं करता था। उसने बहन से कहा, “बहन! क्‍या घर में कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसनें अभी तक भोजन न किया हो।” उसकी बहन बोली, “भैया! हमारे घर में तो क्या आपको पूरे नगर में कोई ऐसा व्यक्ति नही मिलेगा जिसने सुबह-सुबह भोजन नहीं किया हो।” तब राजा ने बहन के घर से निकलकर उस नगर में बिना भोजन किए व्यक्ति की तलाश की। एक गड़रिए के घर में उसका बेटा बीमार होने के कारण भूखा रह गया था। राजा ने उसको जाकर बृहस्पतिवार की कथा सुनाई। कथा सुनते-सुनते गड़रिए का बीमार बेटा बिल्कुल ठीक हो गया। सबने राजा की बहुत प्रशंसा की।   एक दिन दिर राजा ने अपनी बहन से कहा, “बहन! अब हम अपने घर जाना चाहते हैं। तुम भी हमारे साथ चलो। कुछ दिन वहाँ रहकर लौट आना।” राजा की बहन ने अपनी सास से पूछा, तो सास ने ताने देते हुए कहा, “बहू! मायके जाना हो तो अकेली जाना! मेरे पोतों को नही ले जाना। तुम्हारे भाई के कोई सन्तान नहीं है । कही तुम्हारी भाभी मेरे पोतों पर कोई जादू-टोना न कर दे।” दूसरे कक्ष में बहन की सास की बातें सुनकर राजा दुखी मन से अकेला ही अपने नगर को लौट गया। रानी ने राजा से कहा, “आप तो अपनी बहन को साथ लाने की बात कहकर गए थे फिर बहन को साथ क्‍यों नहीं लाए?” तब राजा ने दुखी होते हुए कहा,“ रानी! हम निसंतान हैं , इसलिए कोई हमारे घर आना पसंद नहीं करता।” रानी ने राजा को समझाया, “हे प्राणनाथ! हमें बृहस्पतिदेव ने सब कुछ दिया है। अब भगवान्‌ बृहस्पतिदेव हमें सन्‍तान भी अवश्य देंगे॥” बृहस्पतिवार को विधिवत्‌ व्रत करते हुए राजा-रानी ने भगवान्‌ बृहस्पतिदेव से सन्‍तान के लिए प्रार्थना की। कुछ दिनों के बाद उन्होंने स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा, “हे राजन! तेरी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।” एक सप्ताह बाद ही रानी गर्भवती हो गई। दसवें महीने रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। राजा-रानी जीवनपर्यन्त बृहस्पतिवार का व्रत करते रहे। उनके घर में धन की वर्षा होती रही। इस तरह आनंदपूर्वक जीवन-यापन करते हुए राजा-रानी भगवान बृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से मोक्ष को प्राप्त करके सीधे बैकुंठ धाम पहुंच गए बृहस्पतिवार को विधिवत्‌ व्रत करके जो स्त्री-पुरुष भगवान्‌ विष्णु की पूजा करते हैं, भगवान्‌ उनकी सभी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं

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आज हम आपको बताएंगे कैसे करें श्रीगणेश का ध्यान,जिससे मिले विद्या और बुद्धि का वरदान!!!!!!!! श्रीगणेश बुद्धि के देवता हैं । अक्षरों को ‘गण’ कहा जाता है, उनके ईश होने के कारण इन्हें ‘गणेश’ कहा जाता है । इसलिए श्रीगणेश ‘विद्या-बुद्धि के दाता’ कहे गये हैं । आदिकवि वाल्मीकि ने श्रीगणेश की वन्दना करते हुए कहा है—‘गणेश्वर ! आप चौंसठ कोटि विद्याओं के दाता तथा देवताओं के आचार्य बृहस्पतिजी को भी विद्या प्रदान करने वाले हैं । कठ को भी अभीष्ट विद्या देने वाले आप है (अर्थात् कठोपनिषद् के दाता है) । आप द्विरद हैं, कवि हैं और कवियों की बुद्धि के स्वामी हैं; मैं आपको प्रणाम करता हूँ ।’ श्रीगणेश असाधारण बुद्धि व विवेक से सम्पन्न होने के कारण अपने भक्तों को सद्बुद्धि व विवेक प्रदान करते हैं । इसीलिए हमारे ऋषियों ने मनुष्य के अज्ञान को दूर करने, बुद्धि शुद्ध रखने व काम में एकाग्रता प्राप्त करने के लिए बुद्धिदाता श्रीगणेश की सबसे पहले पूजा करने का विधान किया है । श्रीगणेश की कृपा से कैसे मिलता है तेज बुद्धि का वरदान ? श्रीगणेश की कृपा से तीव्र बुद्धि और असाधारण प्रतिभा कैसे प्राप्त होती है, इसको योग की दृष्टि से समझा जा सकता है । योगशास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर में छ: चक्र होते हैं । इनमें सबसे पहला चक्र है ‘मूलाधार चक्र’ है जिसके देवता हैं—श्रीगणेश । प्रत्येक मनुष्य के शरीर में रीढ़ की हड्डी के मूल में, गुदा से दो अंगुल ऊपर मूलाधार चक्र है । इसमें सम्पूर्ण जीवन की शक्ति अव्यक्त रूप में रहती है । इसी चक्र के मध्य में चार कोणों वाली आधारपीठ है जिस पर श्रीगणेश विराजमान हैं । यह ‘गणेश चक्र’ कहलाता है, इसी के ऊपर कुण्डलिनी शक्ति सोयी रहती है । श्रीगणेश का ध्यान करने मात्र से कुण्डलिनी जग कर (प्रबुद्ध होकर) स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र में प्रविष्ट होकर सहस्त्रार चक्र में परमशिव के साथ जा मिलती है जिसका अर्थ है सिद्धियों की प्राप्ति । अत: मूलाधार के जाग्रत होने का फल है असाधारण प्रतिभा की प्राप्ति । इस प्रकार गणेशजी की आकृति का ध्यान करने से मूलाधार की सिद्धि प्राप्त हो जाती है । ध्यान योग के द्वारा योगियों को इसका दर्शन होता है । श्रीगणेश का ध्यान करने से भ्रमित मनुष्य को सुमति और विवेक का वरदान मिलता है और श्रीगणेश का गुणगान करने से सरस्वती प्रसन्न होती हैं । तीव्र बुद्धि और स्मरण-शक्ति के लिए श्रीगणेश का करें प्रात:काल ध्यान!!!!!! विद्या प्राप्ति के इच्छुक मनुष्य को प्रात:काल इस श्लोक का पाठ करते हुए श्रीगणेश के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए— प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम् उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड- माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम् ।। अर्थात्—जो अनाथों के बन्धु हैं, जिनके दोनों कपोल सिन्दूर से शोभायमान हैं, जो प्रबल विघ्नों का नाश करने में समर्थ हैं और इन्द्रादि देव जिनकी वन्दना करते हैं, उन श्रीगणेश का मैं प्रात:काल स्मरण करता हूँ । विद्या प्राप्ति और तीव्र स्मरण-शक्ति के लिए बुधवार को करें श्रीगणेश के ये उपाय !!!!!! ▪️बुध ग्रह भी बुद्धि देने वाले हैं । बुधवार के दिन गणेशजी की पूजा बहुत फलदायी होती है । श्रीगणेश अपनी संक्षिप्त अर्चना से ही संतुष्ट हो भक्त को ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कर देते हैं । गणेशजी को प्रसन्न करना बहुत ही सरल है । इसमें ज्यादा खर्च की आवश्यकता नही है । ▪️स्नान आदि करके पूजा शुद्ध पीले वस्त्र पहन कर करें । ▪️पूजा-स्थान में गणेशजी की तस्वीर या मूर्ति पूर्व दिशा में विराजित करें । श्रीगणेश को रोली, चावल आदि चढ़ाएं । कुछ न मिले तो दो दूब ही चढ़ा दें । घर में लगे लाल (गुड़हल, गुलाब) या सफेद पुष्प (सदाबहार, चांदनी) या गेंदा का फूल चढ़ा दें । ▪️श्रीगणेश को सिंदूर अवश्य लगाना चाहिए । ▪️श्रीगणेश को बेसन के लड्डू बहुत प्रिय हैं यदि लड्डू या मोदक न हो तो केवल गुड़ या बताशे का भोग लगा देना चाहिए । ▪️एक दीपक जला कर धूप दिखाएं और हाथ जोड़ कर छोटा-सा एक श्लोक बोल दें– तोहि मनाऊं गणपति हे गौरीसुत हे । करो विघ्न का नाश, जय विघ्नेश्वर हे ।। विद्याबुद्धि प्रदायक हे वरदायक हे । रिद्धि-सिद्धिदातार जय विघ्नेश्वर हे ।। ▪️एक पीली मौली गणेशजी को अर्पित करते हुए कहें—‘करो बुद्धि का दान हे विघ्नेश्वर हे’ । पूजा के बाद उस मौली को माता-पिता, गुरु या किसी आदरणीय व्यक्ति के पैर छूकर अपने हाथ में बांध लें। ▪️श्रीगणेश पर चढ़ी दूर्वा को अपने पास रखें, इससे एकाग्रता बढ़ती है । ▪️‘ॐ गं गणपतये नम:’ इस गणेश मन्त्र का १०८ बार जाप करने से बुद्धि तीव्र होती है । ▪️गणपति अथर्वशीर्ष में कहा गया है—‘जो लाजों (धान की खील) से श्रीगणेश का पूजन करता है, वह यशस्वी व मेधावी होता है ।’ अत: गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करने से भी विद्या, बुद्धि, विवेक व एकाग्रता बढ़ती है । बुद्धि के सागर और शुभ गुणों के घर गणेशजी का स्मरण करने से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। जय श्री गणेश देव जी।

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#प्रेरणादायक_कहानियां ~~~~~~~~~~~~~~ प्रत्येक भारतीय अगर विदुला को स्मरण रखता, तो धर्म की हानि कभी नही होती ।। प्राचीनकाल मे विदुला नाम की महान स्त्री हुई है ...एक बार हुआ यूं ... की विदुला के पुत्र संजय , सिंधुराज से परास्त होकर, दीन हीन भाव से, अपने कक्ष में विश्राम करने लगे .... संजय सोचने लगा की जो कुछ उसने हारा है, वह उसे वापस कभी नही जीत सकता । संजय की हालत ठीक आज के हिंदुओं जैसी ही थी । अपना राज्य हारकर भी, आज के हिंदुओं की तरह, संजय ने भी हार पर संतोष कर लिया .... लेकिन संजय की माता विदुला से यह अकर्मण्यता सहन नही हुई, ओर उन्होंने अपने पुत्र को ऐसे वचन कहें, जो कि बाद इतिहास बन गए ।। जब भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर आते है, ओर कुंती से मिलते है,----- श्रीकृष्ण कुंती से कहते है " बुआजी, आपके पुत्रो को कोई संदेश देना हो, तो बता दीजिए... उस समय कुंती ने पांडवो के लिए वही कथा भेजी, जो वचन विदुला ने अपने पुत्र को कहे थे ... ●विदुला अपने पुत्र से कहती है :- अरे !! तू मेरे गर्भ से जन्म हुआ, लेकिन मुझे आनंदित करने वाला नही है, इसलिए में अब यह समझने लगी हूँ, की मेने तुझे पैदा ही नही किया, तू तेरे पिता का पुत्र नही है, हमारे घर मे तेरे जैसा कायर कहाँ से आ गया ... ●तू सर्वथा क्रोध शून्य है, क्षत्रियो में गणना करने योग्य नही है, तू नाममात्र का पुरुष है, तेरे मन् आदि सभी साधन नपुंसको के है ।। क्या तू जीवनभर के लिए निराश हो गया ? अरे अब तो उठ, ओर कल्याण के लिए पुनः युद्ध का भार ग्रहण कर ।। ●अपने को दुर्बल मानकर स्वयं ही अपनी अवहेलना न् कर, इस आत्मा का थोड़े से धन से भरण पोषण न् कर, मन को परमकल्याणमय बनाकर , उसे शुभ संकल्पो से सम्पन्न करके निडर हो जा , भय को सर्वथा त्याग दे ।। ●अरे ओ कायर !! उठ, खड़ा हो, इस तरह शत्रु से पराजित होकर उद्योगशून्य न् हो, ऐसा करके तो तू अपने शत्रुओं को ही आनंद दे रहा है , ओर मान प्रतिष्ठा से वंचित होकर बंधु बांधवों को शोक में डाल रहा है ।। ●जैसे छोटी नदी थोड़े से जल से भर जाती है, और चूहे की अंजली थोड़े से अन्न से ही भर जाती है, उसी प्रकार कायर को संतोष दिलवाना बहुत सुगम है । वह थोड़े से , से ही संतुष्ठ हो जाता है ।। ●पुत्र !! तू शत्रुरूपी सांप के दांत तोड़ता हुआ, आगे बढ़ अगर प्राण जाने का भय हो, तो भी शत्रु के सामने पराक्रम का प्रदर्शन ही कर ।। आकाश में निशंक होकर उड़ने वाले पक्षी की भांति रणभूमि में निर्भय विचरता हुआ तु गर्जना करके, या शांत रहकर, शत्रु के छिद्र देखते जा ।। ●तू दीनहीन होकर अस्त न् हो, अपने शौर्य से प्रसिद्धि प्राप्त कर, तू मध्यम, अधम, तथा निकृष्ट भाव का सहारा मत ले, बल्कि युद्ध भूमि में सिंहनाद करके डट जा । ●तू तिन्दूक की जलती हुई लकड़ी के समान दो घड़ी के लिए ही प्रज्वलित होकर उठ ( थोड़ी देर के लिए ही सही, शत्रु के सामने महान पराक्रम प्रकट कर ।। किंतु जीने की इच्छा से भूसी की ज्वालारहित आग के समान केवल धुँवा न् कर, दो घड़ी तक प्रज्वलित रहना अच्छा, परंतु दीर्घकाल तक धुँवा छोड़ते हुए सुलगना ठीक नही , किसी भी राजा के घर मे अत्यंत कठोर अथवा अत्यंत कोमल स्वभाव का पुरुष न् जन्मे .... ●विद्धवान पुरुष को अभीष्ठ फल की प्राप्ति हो, या नही हो, वह दुःखी नही होता, वह जब तक प्राण रहते है, तबतक अपने प्रयास करते रहता है, ओर वह अपने लिए धन या सुख की इच्छा भी नही करता ।। ●बेटा , या तो धर्म को आगे रखकर या तो पराक्रम प्रकट कर, अथवा मृत्यु को प्राप्त हो जा, ऐसे तो तू किसके लिए जी रहा है ?? तेरे इस्ट ओर आपूर्त कर्म नष्ठ हो गए, सारी कीर्ति धुल में मिल गयी, और भोग का मूल साधन राज्य भी छीन गया, अब तू किसके लिए जी रहा है ?? ●मनुष्य डूबते समय, अथवा ऊंचे से नीचे गिरते समय भी, शत्रु की टांग अवश्य पकड़े, ओर यदि ऐसा करते समय उसका मूलोच्छेद हो जाएं, तब भी किसी प्रकार का विषाद न् करें । अच्छी जाति के घोड़े न् तो थकते है, न् ही शिथिल होते है।। ●बेटा !! तू धैर्य और स्वाभिमान का अवलंबन कर, अपने पुरुषार्थ को जान, और तेरे कारण डूबे हुए इस वंश का , तू खुद ही उद्धार कर ।। ●जिसके महान और अद्भुत पुरुषार्थ एवं चरित्र की सब लोग चर्चा नही करते है, वह मनुष्य अपने द्वारा जनसंख्या की वृद्धि करने वाला है, मेरी नजर में वह न् तो पुरुष है, और न ही स्त्री। । ●दान तपस्या सत्यभाषण, विद्या तथा धनोपार्जन में जिसके सुयश का सर्वत्र बखान नही होता, वह मनुष्य अपनी माता का पुत्र नही, मल-मूत्रमात्र ही है ।। ●जो शास्त्रज्ञान, तपस्या, धनसम्पत्ति अथवा पराक्रम के द्वारा दूसरे लोगो को पराजित कर देता है, वह उसी श्रेष्ठकर्म के द्वारा " पुरुष " कहलाता है । ●जिस दुर्बल मनुष्य का शत्रुपक्ष के लोग अभिनंदन करते हो, जो सब लोगो के द्वारा अपमानित होता हो, जिसके आसन तथा वस्त्र निकृष्ट श्रेणी के हो, जो थोड़े से लाभ से ही संतुष्ठ होकर विस्मय प्रकट करता हो, जो सब प्रकार से हीन, क्षुद्र जीवन बिताने वाला और ओछे स्वभाव का हो, ऐसे बंधु हो पाकर उसके भाई बंधु सुखी नही होते ।। ●जो शत्रु का सामना करके उसके वेग को सह लेता है, उस पुरुषार्थ के कारण ही व्यक्ति पुरुष कहलाता है, ●यदि बढ़े हुए तेज, और उत्साहवाला शूरवीर एवं सिंह के समान पराक्रमी राजा युद्ध मे दैववश वीरगति को प्राप्त हो जाएं, तो भी उसके राज्य में प्रजा सुखी ही रहती है ।। माता के ऐसे ओजस्वी वचन सुनकर विदुला का पुत्र संजय बोला :- माँ ! यदि तू मुझे न् देखें, तो यह सारी पृथ्वी मिल जाने पर भी तुझे क्या सुख मिलेगा, मेरे न् रहने पर तुझे क्या आभूषणों की आवश्यकता भी पड़ेगी ?? भांति भांति के भोगों और जीवन से भी क्या तेरा प्रयोजन सिद्ध होगा ?? ●बेटा !! आज भोजन क्या होगा, इस प्रकार की चिंता में पड़े हुए दरिद्रो के जो लोक है, वह लोक हमारे शत्रुओं को प्राप्त हो, ओर सर्वत्र सम्मानित होने वाले पुण्यात्मा पुरुषों के जो लोक है ,उनमें हमारे हितेषी सुह्रद पधारे ।। ●बेटा !! भृत्यहीन , दुसरो के अन्न पर जीने वाले , दीन दुर्बल मनुष्यो की वृति का अनुसरण नही कर, जैसे सब जीव प्राणियों की जीविका मेघ के अधीन है, जैसे सब देवता इंद्र से आश्रित होकर जीवन धारण करते है, उसी प्रकार ब्राह्मण तथा हितेषी मित्र तेरे सहारे जीवन निर्वाह करें । ●जैसे इंद्र के पराक्रम से सभी सुखी रहते है, ठीक उसी प्रकार शूरवीर पुरुष के बल और पुरुषार्थ से उसके भाई बंधु सुखपूर्वक उन्नति करते है, इस संसार मे ऐसे लोगो का ही जीवन श्रेष्ठ है ।। ●जो मनुष्य बाहुबल का आश्रय लेकर उत्कृष्ट जीवन व्यतीत करता है, वह इस लोक, ओर परलोक् दोनो में उत्तम गति को प्राप्त होता है ।। ●अगर तू इस दशा में पौरुष का त्याग करता है, तो शीघ्र ही नीच पुरुषों के मार्ग पर जा गिरेगा । जो क्षत्रिय अपने जीवन के लोभ से यथाशक्ति पराक्रम प्रगट करके अपने तेज का परिचय नही देता, सब लोग उसे चोर मानते है ।। ●जैसे मरणासन्न व्यक्ति को कोई दवा नही लगती, उसी प्रकार से यह युक्तियुक्त, गुणकारी, और सार्थक वचन भी , तेरे ह्रदय तक नही पहुंच पाते है , यह कितने दुःख की बात है ।। ●देख सिंधुराज की प्रजा उससे संतुष्ठ नही है, तथापि तेरी दुर्बलता के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उदासीन बैठी हुई है, और सिंधुराज पर विपदा आने की बाट जो रही है । ●दूसरे राजा भी तेरा पुरुषार्थ देखकर इधर उधर से विशेष चेस्टापूर्ण सहायक साधनों की वृद्धि करके सिंधुराज के शत्रु हो सकते है ।। ●तू उन सबके साथ मैत्री करके यथासमय अपने शत्रु सिंधुराज पर विपत्ति आने की प्रतीक्षा करता हुआ पर्वतों की दुर्गम गुफाओ में विचरता रह, क्यो की सिंधुराज कोई अजर अमर तो है नही ।। ●पुत्र संजय !! हम क्षत्रियः है, हमे युद्ध मे हानि लाभ से मतलब नही है, हमे तो केवल युद्ध मे मन लगाना है, यही हमारा कर्तव्य है, अतः तू युद्ध बन्द नही कर ।। ●पुत्र जिसका नाम दरिद्रता है, उसे पुत्र एवं पति के वध से भी अधिक दुखदाई बताया गया है, दरिद्रता(गरीबी) म्रत्यु का समानार्थी शब्द है ।। ऐसे वचन सुनकर संजय वापस युद्धभूमि में लौटा, ओर विजयश्री प्राप्त की ।।

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पितृपक्ष में करें गीता के सातवें अध्याय का पाठ सातवें अध्याय का माहात्म्य भगवान शिव कहते हैं–'पार्वती ! अब मैं सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाता हूँ, जिसे सुनकर कानों में अमृत-राशि भर जाती है। पाटलिपुत्र नामक एक दुर्गम नगर है, जिसका गोपुर (द्वार) बहुत ही ऊँचा है। उस नगर में शंकुकर्ण नामक एक ब्राह्मण रहता था, उसने वैश्य-वृत्ति का आश्रय लेकर बहुत धन कमाया, किंतु न तो कभी पितरों का तर्पण किया और न देवताओं का पूजन ही। वह धनोपार्जन में तत्पर होकर राजाओं को ही भोज दिया करता था। एक समय की बात है। उस ब्राह्मण ने अपना चौथा विवाह करने के लिए पुत्रों और बन्धुओं के साथ यात्रा की। मार्ग में आधी रात के समय जब वह सो रहा था, तब एक सर्प ने कहीं से आकर उसकी बाँह में काट लिया। उसके काटते ही ऐसी अवस्था हो गई कि मणि, मंत्र और औषधि आदि से भी उसके शरीर की रक्षा असाध्य जान पड़ी। तत्पश्चात कुछ ही क्षणों में उसके प्राण पखेरु उड़ गये और वह प्रेत बना। फिर बहुत समय के बाद वह प्रेत सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ। उसका चित्त धन की वासना में बँधा था। उसने पूर्व वृत्तान्त को स्मरण करके सोचा–'मैंने घर के बाहर करोड़ों की संख्या में अपना जो धन गाड़ रखा है उससे इन पुत्रों को वंचित करके स्वयं ही उसकी रक्षा करूँगा।' साँप की योनि से पीड़ित होकर ब्राह्मण ने एक दिन स्वप्न में अपने पुत्रों के समक्ष आकर अपना मनोभाव बताया। तब उसके पुत्रों ने सवेरे उठकर बड़े विस्मय के साथ एक-दूसरे से स्वप्न की बातें कही। उनमें से मंझला पुत्र कुदाल हाथ में लिए घर से निकला और जहाँ उसके पिता सर्पयोनि धारण करके रहते थे, उस स्थान पर गया। यद्यपि उसे धन के स्थान का ठीक-ठीक पता नहीं था तो भी उसने चिह्नों से उसका ठीक निश्चय कर लिया और लोभबुद्धि से वहाँ पहुँचकर बाँबी को खोदना आरम्भ किया। तब उस बाँबी से बड़ा भयानक साँप प्रकट हुआ और बोला–'ओ मूढ़ ! तू कौन है ? किसलिए आया है ? यह बिल क्यों खोद रहा है ? किसने तुझे भेजा है ? ये सारी बातें मेरे सामने बता।' पुत्र बोला–'मैं आपका पुत्र हूँ। मेरा नाम शिव है। मैं रात्रि में देखे हुए स्वप्न से विस्मित होकर यहाँ का सुवर्ण लेने के कौतूहल से आया हूँ।' पुत्र की यह वाणी सुनकर वह साँप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोला–'यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं अपने पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिए सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।' पुत्र ने पूछा–'पिता जी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताईये, क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।' पिता बोला–'बेटा ! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र ! मेरे श्राद्ध के दिन गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स ! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ वेदविद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।' सर्पयोनि में पड़े हुए पिता के ये वचन सुनकर सभी पुत्रों ने उसकी आज्ञानुसार तथा उससे भी अधिक किया। तब शंकुकर्ण ने अपने सर्पशरीर को त्यागकर दिव्य देह धारण किया और सारा धन पुत्रों के अधीन कर दिया। पिता ने करोड़ों की संख्या में जो धन उनमें बाँट दिया था, उससे वे पुत्र बहुत प्रसन्न हुए। उनकी बुद्धि धर्म में लगी हुई थी, इसलिए उन्होंने बावली, कुआँ, पोखरा, यज्ञ तथा देवमंदिर के लिए उस धन का उपयोग किया और अन्नशाला भी बनवायी। तत्पश्चात सातवें अध्याय का सदा जप करते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। हे पार्वती ! यह तुम्हें सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया, जिसके श्रवणमात्र से मानव सब पातकों से मुक्त हो जाता है।' ~~~०~~~ *************************************************

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*श्राद्ध में 'क्या करें' और 'क्या न करें* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ पितरों के कार्य में बहुत सावधानी रखनी चाहिए, अत: श्राद्ध में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए- वर्ष में दो बार श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिस तिथि पर व्यक्ति की मृत्यु होती है, उस तिथि पर वार्षिक श्राद्ध करना चाहिए। पितृपक्ष में मृत व्यक्ति की जो तिथि आए, उस तिथि पर मुख्यरूप से पार्वणश्राद्ध करने का विधान है। मनु ने श्राद्ध में तीन चीजों को अत्यन्त पवित्र कहा है- कुतप मुहूर्त (दोपहर के बाद कुल 24 मिनट का समय)-ब्रह्माजी ने पितरों को अपराह्नकाल दिया है। असमय में दिया गया अन्न पितरों तक नहीं पहुंचता है। सायंकाल में दिया हुआ कव्य राक्षस का भाग हो जाता है।तिल, श्राद्ध की जगह पर तिल बिखेर देने से वह स्थान शुद्ध व पवित्र हो जाता है।दौहित्र (लड़की का पुत्र)। पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र न हो तो पत्नी कर सकती है। श्राद्ध में पवित्रता का बहुत महत्व है। पितृकार्य में वाक्य और कार्य की शुद्धता बहुत जरुरी है और इसे बहुत सावधानी से करना चाहिए। श्राद्धकर्ता को क्रोध, कलह व जल्दबाजी नही करनी चाहिए। श्राद्धकर्म करने वाले को पितृपक्ष में पूरे पन्द्रह दिन क्षौरकार्य (दाढ़ी-मूंछ बनाना, नाखून काटना) नहीं करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। श्राद्ध में सात्विक अन्न-फलों का प्रयोग करने से पितरों को सबसे अधिक तृप्ति मिलती है। काला उड़द, तिल, जौ, सांवा चावल, गेहूँ, दूध, दूध के बने सभी पदार्थ, मधु, चीनी, कपूर, बेल, आंवला, अंगूर, कटहल, अनार, अखरोट, कसेरु, नारियल, तेन्द, खजूर, नारंगी, बेर, सुपारी, अदरक, जामुन, परवल, गुड़, मखाना, नीबू आदि अच्छे माने जाते हैं। कोदो, चना, मसूर, कुलथी, सत्तू, काला जीरा, टेंटी, कचनार, कैथ, खीरा, लौकी, पेठा, सरसों, काला नमक व कोई भी बासी, गला-सड़ा, कच्चा व अपवित्र फल और अन्न श्राद्ध में प्रयोग नहीं करना चाहिए। श्राद्ध-कर्म में इन फूलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए-कदम्ब, केवड़ा, बेलपत्र, कनेर, मौलसिरी, लाल व काले रंग के पुष्प और तेज गंध वाले पुष्प। इन पुष्पों को देखकर पितरगण निराश होकर लौट जाते हैं। श्राद्ध में अधिक ब्राह्मणों को निमन्त्रण नहीं देना चाहिए। पितृकार्य में एक या तीन ब्राह्मण पर्याप्त होते हैं। ज्यादा ब्राह्मणों को निमन्त्रण देकर यदि उनके आदर-सत्कार में कोई कमी रह जाए तो वह अकल्याणकारी हो सकता है। श्राद्ध के लिए उत्तम ब्राह्मण को निमन्त्रित करना चाहिए जो योगी, वैष्णव, वेद-पुरान का ज्ञाता, विद्या, शील व तीन पीढ़ी से ब्राह्मणकर्म करने वाला व शान्त स्वभाव का हो। श्राद्ध में केवल अपने मित्रों और गोत्र वालों को खिलाकर ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। अंगहीन, रोगी, कोढ़ी, धूर्त, चोर, नास्तिक, ज्योतिषी, मूर्ख, नौकर, काना, लंगड़ा, जुआरी, अंधा, कुश्ती सिखाने वाले व मुर्दा जलाने वाले ब्राह्मण को श्राद्ध-भोजन के लिए नहीं बुलाना चाहिए। श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मण को आदर से बैठाकर पाद-प्रक्षालन (पैर धोना) चाहिए। श्राद्धकर्ता हाथ में पवित्री (कुशा से बनाई गई अंगूठी) धारण किए रहे। ब्राह्मण-भोजन से श्राद्ध की सम्पन्नता-ब्राह्मणों को भोजन कराने से वह पितरों को प्राप्त हो जाता है। मृत व्यक्तियों की तिथियों पर केवल ब्राह्मण-भोजन कराने की परम्परा है। किसी कारणवश ब्राह्मण-भोजन न करा सकें तो मन में संकल्प करके केवल सूखे अन्न, घी, चीनी, नमक आदि वस्तुओं को श्राद्ध-भोजन के निमित्त किसी ब्राह्मण को दे दें। यदि इतना भी न कर सकें तो कम-से-कम दो ग्रास निकालकर गाय को श्राद्ध के निमित्त खिला देना चाहिए। श्राद्ध में हविष्यान्न के दान से एक मास तक और खीर के दान से एक वर्ष तक पितरों की तृप्ति बनी रहती है। यदि कुछ भी न बन सके तो केवल घास ले आकर पितरों की तृप्ति के निमित्त से गौओं को अर्पित करे या जल और तिल से पितरों का तर्पण करे। यदि पत्नी रजस्वला है तो ब्राह्मण को केवल दक्षिणा देकर श्राद्ध-कर्म करे। तुलसी से पिण्डार्चन करने पर पितरगण प्रलयपर्यन्त तृप्त रहते हैं। भोजन करते समय ब्राह्मणों से 'भोजन कैसा बना है?' यह नहीं पूछना चाहिए; इससे पितर अप्रसन्न होकर चले जाते हैं। श्राद्ध में भोजन करने व कराने वाले को मौन रहना चाहिए। यदि कोई ब्राह्मण उस समय हंसता या बात करता है तो वह हविष्य राक्षस का भाग हो जाता है। श्राद्ध-कर्म में ताम्रपात्र का बहुत महत्व है। परन्तु लोहे के पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। केवल रसोई में फल, सब्जी काटने के लिए उनका प्रयोग कर सकते हैं। श्राद्ध में भोजन कराने के लिए चांदी, तांबे और कांसे के बर्तन उत्तम माने जाते है। इन बर्तनों के अभाव में पत्तलों में भोजन कराना चाहिए किन्तु केले के पत्ते पर श्राद्धभोजन नहीं कराना चाहिए। श्राद्ध की रात्रि में यजमान और ब्राह्मण दोनों को ब्रह्मचारी रहना चाहिए। पितरों से क्या मांगना चाहिए? ~~~~~~~~~~~~~~~~ महर्षि वेदव्यास ने 'पितरों से क्या-क्या मांगना चाहिए' का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है। श्राद्ध के अंत में पितररूप ब्राह्मणों से यह आशीर्वाद मांगना चाहिए- दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदा: सन्ततिरव च। श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति।। (अग्निपुराण) अर्थात्-'पितरगण आप ऐसा आशीर्वाद प्रदान करें कि हमारे कुल में दान देने वाले दाताओं की वृद्धि हो, नित्य वेद और पुराण का स्वाध्याय करने वालों की वृद्धि हो, हमारी संतान-परम्परा लगातार बढ़ती रहे, सत्कर्म करने में हमारी श्रद्धा कम न हो और हमारे पास दान देने के लिए बहुत-सा धन-वैभव हो। ।। जय श्री हरि ।। ~~~~~~~~~

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20 सितंबर भाद्रपद पूर्णिमा से आरंभ हो रहे हैं श्राद्ध, पितृ पक्ष में इन बातों का रखना चाहिए ध्यान, नहीं तो पितृ होते हैं नाराज 2021: 20 सितंबर 2021, सोमवार से पितृ पक्ष यानि श्राद्ध शुरू हो रहे हैं. पितृ पक्ष में श्राद्ध की तिथियों और सावधानियों के बारे में आइए जानते हैं. पितृ पक्ष 2021 2021: पंचांग के अनुसार 20 सितंबर 2021, सोमवार को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष आरंभ हो रहा है. हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व बताया गया है. पितृ पक्ष में पितरों को याद किया जाता है और उनके प्रति श्राद्धा और आभार व्यक्त किया जाता है. पितृ पक्ष में पितरों का आशीर्वाद लिया जाता है. मान्यता है कि पितृ प्रसन्न होते हैं तो जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-शांति प्राप्त होती है.  पितृ पक्ष का महत्व मान्सता के अनुसार पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण करने की परंपरा है. पितृ पक्ष में श्राद्ध करने की भी परंपरा है. शास्त्रों में श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा से बताया गया है. 20 सितंबर से पितृ पक्ष आरंभ हो रहे हैं. पितृ पक्ष का समापन 6 अक्टूबर 2021, बुधवार को आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को होगा. इस दिन को आश्विन अमावस्या, बड़मावस और दर्श अमावस्या भी कहा जाता है. इस वर्ष यानि 2021 में 26 सितंबर, को श्राद्ध की तिथि नहीं है. पितृ पक्ष में श्राद्ध की तिथियां  20 सितंबर 2021, सोमवार: पूर्णिमा श्राद्ध  21 सितंबर 2021, मंगलवार: प्रतिपदा श्राद्ध  22 सितंबर 2021, बुधवार: द्वितीया श्राद्ध  23 सितंबर 2021, बृहस्पतिवार: तृतीया श्राद्ध  24 सितंबर 2021, शुक्रवार: चतुर्थी श्राद्ध  25 सितंबर 2021, शनिवार: पंचमी श्राद्ध  27 सितंबर 2021, सोमवार: षष्ठी श्राद्ध  28 सितंबर 2021, मंगलवार: सप्तमी श्राद्ध  29 सितंबर 2021, बुधवार: अष्टमी श्राद्ध  30 सितंबर 2021, बृहस्पतिवार:  नवमी श्राद्ध  1 अक्तूबर 2021, शुक्रवार: दशमी श्राद्ध  2 अक्तूबर 2021, शनिवार: एकादशी श्राद्ध  3 अक्तूबर 2021, रविवार: द्वादशी, सन्यासियों का श्राद्ध, मघा श्राद्ध  4 अक्तूबर 2021, सोमवार: त्रयोदशी श्राद्ध  5 अक्तूबर 2021, मंगलवार: चतुर्दशी श्राद्ध 6 अक्तूबर 2021, बुधवार: अमावस्या श्राद्ध श्राद्ध में इन बातों का रखना चाहिए पितृ पक्ष में लोहे के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना गया है. पितृ पक्ष में क्रोध, अहंकार का त्याग करना चाहिए. हर प्रकार की बुराइयों से बचना चाहिए. पितृ पक्ष में दान का विशेष महत्व है. पशु-पक्षियों को भोजन करना चाहिए. इस दौरान किसी का भी अपमान नहीं करना चाहिए. पितरों के कार्यों को याद कर उनका आभार व्यक्त करना चाहिए.

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