#बड़ा_पापी_कौन ================================= एक संत के दो शिष्य उनसे मिलने जा रहे थे। पूरे दिन का सफर था। चलते-चलते रास्ते में एक नदी पड़ी। उन्होंने देखा कि उस नदी में एक स्त्री डूब रही है। शिष्य के लिए स्त्री का स्पर्श वर्जित माना जाता है। ऐसी दशा में क्या हो? उन दोनों शिष्यों में से एक ने कहा- “हमें धर्म की मर्यादा का पालन करना चाहिए। स्त्री डूब रही है तो डूबे! हमें क्या!” लेकिन दूसरा शिष्य अत्यंत दयावान था। उसने कहा- “हमारे रहते कोई इस तरह मरे यह तो मैं सहन नहीं कर सकता।” इतना कहकर वह पानी में कूद पड़ा डूबती स्त्री को पकड़ लिया और कंधे का सहारा देकर किनारे पर ले आया। दूसरे शिष्य ने उसकी बड़ी भर्त्सना की, रास्ते भर वह कहता रहा कि- “मैं जाकर गुरु जी से कहूंगा कि आज इसने मर्यादा का उल्लंघन करके कितना बड़ा पाप किया है।” दोनों संत के सामने पहुंचे तो................ दूसरे शिष्य ने एक सांस में सारी बातें कह सुनाईं- “गुरुवर! मैंने इसको बहुतेरा रोका, पर यह माना ही नहीं। बड़ा भयंकर पाप किया है इसने।” संत ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी, फिर पूछा- “इस शिष्य को उस स्त्री को कंधे पर बाहर लाने में कितना समय लगा होगा? कम-से-कम पंद्रह मिनट तो लग ही गए होंगे। अच्छा! संत ने फिर पूछा- “इस घटना के बाद यहां आने में तुम लोगों को कितना समय लगा?” शिष्य ने हिसाब लगाकर उत्तर दिया- “यही कोई छ: घंटे!” संत ने कहा- “भले आदमी! इस बेचारे ने तो उस स्त्री की प्राण रक्षा के लिए उसे सिर्फ पंद्रह मिनट ही अपने कंधे पर रखा लेकिन तू तो उसे छ: घंटे से अपने मन में बिठाए हुए है, वह भी इसलिए कि मुझसे इसकी शिकायत कर सके। बोल दोनों में बड़ा पापी कौन है?” बेचारा शिष्य निरुत्तर हो गया। वह समझ गया कि पाप सिर्फ शरीर से ही नही मन से भी होता है, मनुष्य बड़ा पापी मन से होता है

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त्रियुगीनारायण मंदिर जहां हुआ था शिव-पार्वती का शुभ विवाह!!!!!! 🔱🚩 क्या आप जानते हैं कि इसी पृथ्वी पर विद्यमान है वह जगह जहां साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर ही वह पवित्र और विशेष पौराणिक मंदिर है। इस मंदिर के अंदर सदियों से अग्नि जल रही है। शिव-पार्वती जी ने इसी पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया था। यह स्थान रुद्रप्रयाग जिले का एक भाग है। त्रियुगीनारायण मंदिर के बारे में ही कहा जाता है कि यह भगवान शिव जी और माता पार्वती का शुभ विवाह स्थल है। मंदिर के अंदर प्रज्वलित अग्नि क ई युगों से जल रही है इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया यानी अग्नि जो तीन युगों से जल रही है। त्रियुगीनारायण हिमावत की राजधानी थी। यहां शिव पार्वती के विवाह में विष्णु ने पार्वती के भाई के रूप में सभी रीतियों का पालन किया था। जबकि ब्रह्मा इस विवाह में पुरोहित बने थे। उस समय सभी संत-मुनियों ने इस समारोह में भाग लिया था। विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रहम शिला कहा जाता है जो कि मंदिर के ठीक सामने स्थित है। इस मंदिर के महात्म्य का वर्णन स्थल पुराण में भी मिलता है। विवाह से पहले सभी देवताओं ने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुंड बने हैं जिन्हें रुद्र कुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्मा कुंड कहते हैं। इन तीनों कुंड में जल सरस्वती कुंड से आता है। सरस्वती कुंड का निर्माण विष्णु की नासिका से हुआ था और इसलिए ऐसी मान्यता है कि इन कुंड में स्नान से संतानहीनता से मुक्ति मिल जाती है। जो भी श्रद्धालु इस पवित्र स्थान की यात्रा करते हैं वे यहां प्रज्वलित अखंड ज्योति की भभूत अपने साथ ले जाते हैं ताकि उनका वैवाहिक जीवन शिव और पार्वती के आशीष से हमेशा मंगलमय बना रहे। वेदों में उल्लेख है कि यह त्रियुगीनारायण मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है। जबकि केदारनाथ व बदरीनाथ द्वापरयुग में स्थापित हुए। यह भी मान्यता है कि इस स्थान पर विष्णु भगवान ने वामन देवता का अवतार लिया था। पौराणिक कथा के अनुसार इंद्रासन पाने के लिए राजा बलि को सौ यज्ञ करने थे, इनमें से बलि 99 यज्ञ पूरे कर चुके थे तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर रोक दिया जिससे कि बलि का यज्ञ भंग हो गया। यहां विष्णु भगवान वामन देवता के रूप में पूजे जाते हैं। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने शिवपार्वती विवाह के बारे लिखा है,,,,,,, *जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥ गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥ भावार्थ:-वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने वह सभी रीति करवाई। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी को समर्पण किया॥ *पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥ बेदमन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥ भावार्थ:-जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब (इन्द्रादि) सब देवता हृदय में बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे॥ हर हर महादेव हर हर शंभु जय माँ पार्वती 👏👏

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🌿🌹🙏ॐ नमः शिवाय जी 🙏🌹🌿 ⛳🌷🙏हर हर महादेव जी 🙏🌷⛳ ॥ शिवपञ्चाक्षर स्तोत्र॥ शिव पञ्चाक्षर मंत्र है 'नमः शिवाय'। इस स्तोत्र के पाँचों पद क्रमशः पञ्चाक्षर मंत्र के एक एक अक्षर से प्रारम्भ होने वाले भगवान् शिव के सम्बोधनों से युक्त हैं, पर प्रचलित पञ्चाक्षर स्तोत्र में कही कमियाँ भाषित होती थीं, जैसे सम्बद्ध अक्षर वाले शिव के सम्बोधन हर पद में कम ही थे, गण दोष के कारण गायन में लय भी बाधित होती थी। उन कमियों को दूर करते हुए यह स्तोत्र 'वेद विभाग, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, गायत्रीकुञ्ज - शान्तिकुञ्ज' ने प्रस्तुत किया है। आशा है, यह स्तोत्र शिव भक्तों को रुचेगा। नागेन्द्रहाराय नगेश्वराय, न्यग्रोधरूपाय नटेश्वराय। नित्याय नाथाय निजेश्वराय, तस्मै 'न' काराय नमः शिवाय॥ १॥ मृत्युञ्जयायादि- महेश्वराय, मखान्तकायागमवन्दिताय। मत्स्येन्द्रनाथाय महीधराय, तस्मै 'म' काराय नमः शिवाय॥ २॥ शिवाय सौराष्ट्रशुभेश्वराय, श्रीसोमनाथाय शिवाप्रियाय। शान्ताय सत्यं शशिशेखराय,तस्मै 'शि' काराय नमः शिवाय॥ ३॥ वेदाय विश्वार्चनवेङ्कटाय, विश्वाय विष्णोरपिवन्दिताय। व्यालाय व्याघ्राय वृषध्वजाय, तस्मै 'व' काराय नमः शिवाय॥ ४॥ यज्ञस्वरूपाय युगेश्वराय, योगीन्द्रनाथाय यमान्तकाय। यूनां यविष्ठाय यतीश्वराय, तस्मै 'य' काराय नमः शिवाय॥ ५॥

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फाल्गुन अमावस्या: करें ये काम, कर्ज का मर्ज नहीं करेगा परेशान  2020: रविवार23 फरवरी, 2020 को फाल्गुन माह की अमावस्या तिथि है। हिंदू पंचांग के अनुसार ये साल की आखिरी अमावस्या है। ये महाशिवरात्रि पर्व के बाद आती है। इस अमावस्या का खास महत्व है। धार्मिक तीर्थों पर स्नान करने से शुभ लाभ मिलता है और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है। ये है फाल्गुन अमावस्या का शुभ मुहूर्त 22 फरवरी को अमावस्या तिथि का शुभ आरंभ 19 बजकर 4 मिनट पर होगा। 23 फरवरी को अमावस्या तिथि  21 बजकर 3 मिनट पर समाप्त होगी। फाल्गुन अमावस्या पर करें ये काम  अमावस्या के दिन पीली त्रिकोण आकृति की पताका विष्णु मंदिर में ऊंचाई वाले स्थान पर इस तरह लगाएं कि वह लहराता रहे। कर्ज का मर्ज नहीं करेगा परेशान। इसके अतिरिक्त प्रति रविवार को भैरव स्त्रोत का पाठ मंदिर में बैठकर करें तो अत्यंत लाभप्रद रहेगा। कभी-कभी व्यक्ति रोजगार-व्यापार चलाने के लिए व्यक्ति विशेष बैंक से ऋण लेता है। किसी भी वजह से रोजगार-व्यापार न चले तो यह प्रयोग अमावस्या से आरंभ करके नियमित रूप से चालीस दिन तक करें। एक सेर भुने चावल, एक पाव शक्कर और आधा पाव घी इन सबको मिलाकर प्रात:काल के समय निम्न मंत्र पढ़ते हुए चींटी के बिल पर डालें। मंत्र- ॐ नमो नमन चींटि महावीर, हूंपूरो तोरी आशा तू पूरो मेरी आशा। रोगों से मुक्ति के लिए सूर्य देव को अर्घ्य दें, सूर्य चालीसा का पाठ करें और विधि-विधान से उनकी पूजा करें। नमक न खाएं।  पितरों की तृप्ति और उनकी आत्मा की शांति के लिये इस दिन दान, तर्पण और श्राद्ध करने का विधान हैं। कहते हैं की शरीर छोड़ने के बाद आत्मा पितृ लोक जाती है। जब तक यमराज उनके प्रति कोई निर्णय नहीं लेते तब तक उन्हें यहां कुछ समय के लिए रहना पड़ता है। इस दौरान वे गहरे दर्द से गुजरते हैं क्योंकि उनमें कुछ भी ग्रहण करने की क्षमता नहीं होती। अमावस्या तिथि पर इन आत्माओं के सगे-संबंधी, नाते-रिश्तेदार, वंशज या कोई भी उनका अपना उनके लिये श्राद्ध, दान अथवा तर्पण करता है। जिससे उनकी आत्मा को शांति मिलती है। पितरों को प्रसन्न और तृप्त करने के लिए ये दिन बहुत सौभाग्यशाली माना गया है। पितृ दोष दूर करने के लिए लाल मीठी चीजों का दान करें।

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फाल्गुन अमावस्या की कथा 🚩🚩 फाल्गुन अमावस्या के दिन पवित्र नदियों और संगम पर देवताओं का निवास होता है. इस दिन भक्त नदियों में डुबकी लगाते हैं और ऐसा मानते हैं कि इससे उनके सारे पापों का विनाश हो जाएगा. इस दिन गंगा, जमुना ,सरस्वती स्नान का विशेष महत्व माना गया है. यदि फागुन अमावस्या सोमवार के दिन पड़ती है और इस दिन महा कुंभ स्नान का योग भी हो तो यह अनंत गुना फलदाई होता है. फाल्गुन मास हिन्दू पंचांग का 12वां महीना है.इस मास में भगवान शिव और श्रीकृष्ण की उपासना की जाती है, इसलिए इस मास का पौराणिक, आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है.इस मास में न अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक सर्दी होती है . इसे भी पढ़ें⇒दर्श अमावस्या का महत्व फागुन अमावस्या की कथा इस प्रकार से है – दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर हो गए, तो दैत्यो ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और उन्हें परास्त कर दिया. तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और सारी कथा सुनाई. इसे भी पढ़ें⇒मौनी अमावस्या की कथा तथा महत्व भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यो के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी . तब सब देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के लिए यत्न करने लगे. अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र जयंत अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गए. इसे भी पढ़ें⇒सर्वपितृ अमावस्या पर अपने पितरों की शांति के लिए अंतिम दिन क्या?करें और क्या?ना करें दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश अनुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लाने के लिए जयंत का पीछा किया और कठिन परिश्रम के बाद जयंत को रास्ते में पकड़ लिया. अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक युद्ध चलता रहा. इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक पर कलश से अमृत की बूंदे गिरी .अमृत की बूंदें गंगा, यमुना के संगम में गिरने से यह संगम पवित्र हो गया.

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🌺🙏🏻सब वेदों का सार है राधा🙏🏻🌺 🦚🌿🦚🌿🦚🌿🦚🌿🦚🌿🦚🌿🦚🌿🦚आज कान्हा जी की मुस्कान रोके नहीं रुक रही अकेले ही महल की छत पर बैठे हुए कृष्ण दूर आकाश में चाँद को.निहारते जा रहे हैं.और मंद मंद मुस्कुराते जा रहे हैं ! कान्हा जी बार बार पीछे मुड़ के देख भी लेते हैं की कोई उन्हें देख तो नहीं रहा और फिर अनायास ही , अपने ख्यालों में.खोकर मुस्कुराने लगते है ! और उसी समय अर्जुन वहां पर आ गये अपने सखा कृष्ण को.अकेले में मुस्कुराता देखकर अर्जुन ने उनके आनंद में विघ्न डालना उचित ना.समझा और चुपचाप एकांत में खड़े होकर.भगवान् के दर्शन करने लगे ! अर्जुन सोचने लगे आखिर भगवान् को इस चाँद में.ऐसा.क्या नज़र आ रहा है.जो ये इतना मुस्कुरा रहे हैं और फिर अर्जुन ने गौर से चाँद को ओर देखा तो आश्चर्यचकित रह गए ! चाँद में अर्जुन को साक्षात श्री राधारानी के दर्शन होने लगे श्रीराधे भी यमुना के किनारे बैठी यमुना की श्याम वर्ण लहरों में अपने सांवरे के दर्शन कर रही थी ! और मुस्कुराती भी जाती थीं और कान्हा जी से बातें भी करती जाती थी ! “देख रहे हो कान्हा जी ! आपके सखा अर्जुन चुप चाप हमारी बातें सुन रहे हैं ” श्रीराधे यमुना की लहरों में अपना हाथ लहराते हुई बोली ! “अर्जुन से तो कुछ छुपा नहीं है राधे ! वो तो बस मेरे आनंद में विघ्न उत्पन्न करना नहीं चाहता ”कान्हा जी गोरे चाँद की तरफ निहारते हुए बोले ! “अगर ऐसा है आपको अर्जुन इतने ही प्रिय हैं तो आपने गीता का ज्ञान देते समय अर्जुन से एक बात छुपा के क्यूँ रक्खी ?” राधे इठलाती हुई बोलीं ! . “वो इसलिए राधे की उस बात को सुनने के बाद अर्जुन को वहीँ समाधि लग जाती और वो युद्ध आदि कुछ भी नहीं कर पाता !” कृष्ण जी महल की छत के एक किनारे से दूसरे किनारे को जाते हुए बोले ! “ठीक है कान्हा जी अब हम कल बात करेंगे। अर्जुन आपके निकट आ रहे हैं !” श्रीराधे ने ऐसा कहते हुए अपना आँचल यमुना के शांत जल में लहराया जिस से जल में विक्षोभ उत्पन्न हुआ और वहां से कान्हा जी की छवि अदृश्य हो गयी ! उधर कान्हा जी ने चाँद के सामने हाथ फेरकर उसे बादलों से ढँक दिया और राधे की छवि वहां से अदृश्य हो गयी ! अर्जुन हिम्मत करके कृष्ण के सम्मुख आये और हाथ जोड़कर बोले - “क्षमा करें प्रभु ! लेकिन ऐसी कौन सी बात है जो आपने गीता के ज्ञान में से मुझे नहीं बताई ?” कृष्णा मुस्कुराते हुए बोले - “याद है अर्जुन ? मैंने तुमसे कहा था की मै फिर तुमसे उस ज्ञान को कहूँगा जिसको जान लेने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता और जिसे जान लेने के बाद मानव का वेदों से उतना ही प्रयोजन रह जाता है जितना सागर मिलने के बाद छोटे तालाब से और इतना कहकर मै चुप रह गया था !” “हाँ प्रभु मुझे याद है आप वेदों का सार बताते बताते चुप रह गए थे !” अर्जुन ने विस्मित होकर कहा ! श्रीकृष्ण ने आकाश की और देखा चाँद पूरी तरह छिप चुका था और फिर अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर बोले - “राधानाम ही सब वेदों का सार है अर्जुन ! श्रीराधे की कृपा से ये जान लेने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता बस राधे ही एक मात्र जानने योग्य हैं ! राधा नाम जपने मात्र से ही मनुष्य सब वेदों का पार पा लेता है !” और इस प्रकार गीता के पूर्ण ज्ञान को पाकर अर्जुन समाधि के योग्य हुए !! *श्रीराधे ! सब वेदों का सार !!* *‼।।जपे जा राधे राधे ।।‼*

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