आज का पंचांग 31 मई : चंद्रमा द‍िन-रात कन्‍या राशि पर करेगा संचार, जानें शुभ-अशुभ योग कब से कब? 🙏 राष्ट्रीय मिति ज्येष्ठ 10, शक संवत् 1942, ज्येष्ठ, शुक्ला, नवमी, रविवार, विक्रम संवत् 2077। सौर ज्येष्ठ मास प्रविष्टे 18, शव्वाल 07, हिजरी 1441 (मुस्लिम) तदनुसार अंग्रेजी तारीख 31 मई सन् 2020 ई॰। सूर्य उत्तरायण, उत्तर गोल, ग्रीष्म ऋतु। राहुकाल सायं 04 बजकर 30 मिनट से 06 बजे तक। नवमी तिथि सायं 05 बजकर 37 मिनट तक उपरांत दशमी तिथि का आरंभ। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र अर्धरात्रोत्तर 03 बजकर 01 मिनट तक उपरांत हस्त नक्षत्र का आरंभ। वज्र योग सायं 04 बजकर 30 मिनट तक उपरांत सिद्धि योग का आरंभ। बालव करण प्रातः 06 बजकर 48 मिनट तक उपरांत गर करण का आरंभ। चंद्रमा पूर्वाह्न 10 बजकर 19 मिनट तक सिंह उपरांत कन्या राशि पर संचार करेगा। सूर्योदय का समय दिल्‍ली 31 मई : सुबह 05 बजकर 24 मिनट। सूर्यास्त का समय दिल्‍ली 31 मई : शाम 07 बजकर 15 मिनट। आज का शुभ मुहूर्तः अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 47 मिनट तक। विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 37 मिनट से दोपहर 03 बजकर 33 मिनट तक। गोधूलि मुहूर्त शाम 07 बजे से 07 बजकर 24 मिनट तक। आज का अशुभ मुहूर्तः राहुकाल शाम 04 बजकर 30 म‍िनट से 06 बजे तक। यमगंड दोपहर 12 बजकर 19 म‍िनट से दोपहर 02 बजकर 03 मिनट तक। गुल‍िक काल दोपहर 03 बजकर 47 मिनट से 05 बजकर 30 म‍िनट तक। आज के उपायः सूर्यदेव की पूजा-अर्चना करें। दिव्‍यांगजनों की यथाशक्ति मदद करें।-(आचार्य कृष्‍णदत्‍त शर्मा)

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*वाराणसी की कथा* 🕉️⛪🌹🙏🌹⛪🕉️ यह कथा द्वापरयुग की है जब भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र ने काशी को जलाकर राख कर दिया था। बाद में यह वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह कथा इस प्रकार हैः मगध का राजा जरासंध बहुत शक्तिशाली और क्रूर था। उसके पास अनगिनत सैनिक और दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे। यही कारण था कि आस-पास के सभी राजा उसके प्रति मित्रता का भाव रखते थे। जरासंध की अस्ति और प्रस्ति नामक दो पुत्रियाँ थीं। उनका विवाह मथुरा के राजा कंस के साथ हुआ था। कंस अत्यंत पापी और दुष्ट राजा था। प्रजा को उसके अत्याचारों से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया। दामाद की मृत्यु की खबर सुनकर जरासंध क्रोधित हो उठा। प्रतिशोध की ज्वाला में जलते जरासंध ने कई बार मथुरा पर आक्रमण किया। किंतु हर बार श्रीकृष्ण उसे पराजित कर जीवित छोड़ देते थे। एक बार उसने कलिंगराज पौंड्रक और काशीराज के साथ मिलकर मथुरा पर आक्रमण किया। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें भी पराजित कर दिया। जरासंध तो भाग निकला किंतु पौंड्रक और काशीराज भगवान के हाथों मारे गए। काशीराज के बाद उसका पुत्र काशीराज बना और श्रीकृष्ण से बदला लेने का निश्चय किया। वह श्रीकृष्ण की शक्ति जानता था। इसलिए उसने कठिन तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और उन्हें समाप्त करने का वर माँगा। भगवान शिव ने उसे कोई अन्य वर माँगने को कहा। किंतु वह अपनी माँग पर अड़ा रहा। तब शिव ने मंत्रों से एक भयंकर कृत्या बनाई और उसे देते हुए बोले-“वत्स! तुम इसे जिस दिशा में जाने का आदेश दोगे यह उसी दिशा में स्थित राज्य को जलाकर राख कर देगी। लेकिन ध्यान रखना, इसका प्रयोग किसी ब्राह्मण भक्त पर मत करना। वरना इसका प्रभाव निष्फल हो जाएगा।” यह कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए। इधर, दुष्ट कालयवन का वध करने के बाद श्रीकृष्ण सभी मथुरावासियों को लेकर द्वारिका आ गए थे। काशीराज ने श्रीकृष्ण का वध करने के लिए कृत्या को द्वारिका की ओर भेजा। काशीराज को यह ज्ञान नहीं था कि भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण भक्त हैं। इसलिए द्वारिका पहुँचकर भी कृत्या उनका कुछ अहित न कर पाई। उल्टे श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र उसकी ओर चला दिया। सुदर्शन भयंकर अग्नि उगलते हुए कृत्या की ओर झपटा। प्राण संकट में देख कृत्या भयभीत होकर काशी की ओर भागी। सुदर्शन चक्र भी उसका पीछा करने लगा। काशी पहुँचकर सुदर्शन ने कृत्या को भस्म कर दिया। किंतु फिर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ और उसने काशी को भस्म कर दिया। कालान्तर में वारा और असि नामक दो नदियों के मध्य यह नगर पुनः बसा। वारा और असि नदियों के मध्य बसे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ गया। इस प्रकार काशी का वाराणसी के रूप में पुनर्जन्म हुआ। जय श्री हरि शरणम्… 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃

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।। शनि शिंगणापुर से जुडी कथा ।। ॐ शं शनेश्चराय नमः 🙏🌺 शनिदेव की कृपा हम सब पर सदैव बनी रहे 🙏🙏 भारत में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्व प्रसिध्द इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ स्थित यहां पर शनि महाराज की कोई मूर्ति नहीं है बल्कि एक बड़ा सा काला पत्थर है जिसे शनि का विग्रह माना जाता है और वह बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है। शनि के प्रकोप से मुक्ति पाने के लिए देश विदेश से लोग यहां आते हैं और शनि विग्रह की पूजा करके शनि के कुप्रभाव से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माना जाता है कि यहां पर शनि महाराज का तैलाभिषेक करने वाले को शनि कभी कष्ट नहीं देते। शनि मराहाज के शिंगणापुर पहुंचने की बड़ी ही रोचक है। सदियों पहले शिंगणापुर में खूब वर्षा हुई। वर्षा के कारण यहां बाढ़ की स्थिति आ गई। लोगों को वर्षा प्रलय के समान लगने लग रही थी। इसी बीच एक रात शनि महाराज एक गांववासी के सपने में आए,शनि महाराज ने कहा कि मैं पानस नाले में विग्रह रूप में मौजूद हूं। मेरे विग्रह को उठाकर गांव में लाकर स्थापित करो। सुबह इस व्यक्ति ने गांव वालों को यह बात बताई। सभी लोग पानस नाले पर गए और वहां मौजूद शनि का विग्रह देखकर सभी हैरान रह गये। गांव वाले मिलकर उस विग्रह का उठाने लगे लेकिन विग्रह हिला तक नहीं, सभी हारकर वापस लौट आए। शनि महाराज फिर उस रात उसी व्यक्ति के सपने में आये और बताया कि कोई मामा भांजा मिलकर मुझे उठाएं तो ही मैं उस स्थान से उठूंगा। मुझे उस बैलगाड़ी में बैठाकर लाना जिसमें लगे बैल भी मामा-भांजा हो अगले दिन उस व्यक्ति ने जब यह बात बताई तब एक मामा भांजे ने मिलकर विग्रह को उठाया। बैलगाड़ी पर बिठाकर शनि महाराज को गांव में लाया गया और उस स्थान पर स्थापित किया जहां वर्तमान में शनि विग्रह मौजूद है। इस विग्रह की स्थापना के बाद गांव की समृद्घि और खुशहाली बढ़ने लगी शिंगणापुर के इस चमत्कारी शनि मंदिर में स्थित शनिदेव का विग्रह लगभग पाँच फीट नौ इंच ऊँचा व लगभग एक फीट छह इंच चौड़ा है। देश-विदेश से श्रध्दालु यहाँ आकर शनिदेव के इस दुर्लभ विग्रह का दर्शन लाभ लेते हैं। सुबह हो या शाम, सर्दी हो या गर्मी यहाँ स्थित शनि विग्रह के समीप जाने के लिए पुरुषों का स्नान कर पीताम्बर धोती धारण करना अत्यावश्क है। ऐसा किए बगैर पुरुष शनि विग्रह का स्पर्श नहीं पर सकते हैं। । प्रत्येक शनिवार, शनि जयंती व शनैश्चरी अमावस्या आदि अवसरों पर यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। इस हेतु यहाँ पर स्नान और वस्त्रादि की बेहतर व्यवस्थाएँ हैंखुले मैदान में एक टंकी में कई सारे नल लगे हुए हैं, जिनके जल से स्नान करके पुरुष शनिदेव के दर्शनों का लाभ ले सकते हैं। पूजनादि की सामग्री के लिए भी यहाँ आसपास बहुत सारी दुकानें हैं, जहाँ से पूजन सामग्री लेकर शनिदेव को अर्पित कर सकते है मंगलकारी हैं शनिदेव : आमतौर पर शनिदेव को लेकर हमारे मन में कई भ्रामक धारणाएँ हैं। जैसे कि शनिदेव बहुत अधिक कष्ट देने वाले देवता हैं वगैरह-वगैरह, लेकिन वास्तविक रूप मे ऐसा नहीं है। यदि शनि की आराधना ध्यानपूर्वक की जाए तो शनिदेव से उत्तम कोई देवता ही नहीं है। शनि की जिस पर कृपा होती है उस व्यक्ति के लिए सफलता के सारे द्वार खुल जाते हैं। शिंगणापुर की विशेषता : गौरतलब है कि कि शिंगणापुर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजोरी नहीं है। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज उसकी सजा स्वयं दे देते हैं। गाँव वालों पर शनिदेव की कृपा है व चोरी का भय ही नहीं है शायद इसीलिये दरवाजे, खिड़की, अलमारी व शिंगणापु मे नहीं है ।।

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आज का पंचांग 29 मई : चंद्रमा कर्क के बाद स‍िंह में, जान‍िए शुभ-अशुभ योग 🕉️ राष्ट्रीय मिति ज्येष्ठ 08, शक संवत् 1942, ज्येष्ठ, शुक्ला, सप्तमी, शुक्रवार, विक्रम संवत् 2077। सौर ज्येष्ठ मास प्रविष्टे 16, शव्वाल 05, हिजरी 1441 (मुस्लिम) तदनुसार अंग्रेजी तारीख 29 मई सन् 2020 ई॰। सूर्य उत्तरायण, उत्तर गोल, ग्रीष्म ऋतु। राहुकाल पूर्वाह्न 10 बजकर 30 मिनट से 12 बजे तक। सप्तमी तिथि रात्रि 09 बजकर 56 मिनट तक उपरांत अष्टमी तिथि का आरंभ। आश्लेषा नक्षत्र प्रातः 06 बजकर 58 मिनट तक उपरांत मघा नक्षत्र का आरंभ। व्याघात योग रात्रि 10 बजकर 06 मिनट तक उपरांत हर्षण योग का आरंभ। गर करण पूर्वाह्न 10 बजकर 42 मिनट तक उपरांत विष्टि करण का आरंभ। चन्द्रमा प्रातः 06 बजकर 58 मिनट तक कर्क उपरांत सिंह राशि पर संचार करेगा। सूर्योदय का समय दिल्‍ली 29 मई : सुबह 05 बजकर 25 मिनट। सूर्यास्त का समय दिल्‍ली 29 मई : शाम 07 बजकर 14 मिनट। आज का शुभ मुहूर्तः अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 51 मिनट से 12 बजकर 46 मिनट तक। विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 37 मिनट से दोपहर 03 बजकर 32 मिनट तक। गोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 59 मिनट से 07 बजकर 23 मिनट तक। आज का अशुभ मुहूर्तः राहुकाल सुबह 10 बजकर 30 म‍िनट से मध्‍याह्न 12 बजे तक। यमगंड दोपहर 03 बजकर 46 म‍िनट से शाम 05 बजकर 30 म‍िनट तक। आज के उपायः वैभव लक्ष्‍मीजी की पूजा-अर्चना करें। द‍िव्‍यांगजनों की यथाशक्ति मदद करें। -(आचार्य कृष्‍णदत्‍त शर्मा)

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