🥀🥀 May 7, 2021

*।।आज की बात।। ।।हम व्रत क्यों करते हैं, और क्या भूखे रहने से ही भगवान का भजन होता है। व्रत का अर्थ होता है संकल्प। वैष्णव तन्त्र नामक ग्रन्थ में शरणागति के जो लक्षण दिये हैं, उसमें पहला ही लक्षण है- 'आनुकूलस्य संकल्पः' अर्थात् जिन जिन क्रियायों से भक्त और भगवान प्रसन्न होते हैं, उन सभी कार्यों को करने का संकल्प लेना। एकादशी का व्रत रखने से भगवान श्रीकृष्ण बड़े प्रसन्न होते हैं, तो मैं भगवान की प्रसन्नता के लिए एकादशी व्रत करूंगा म/करूंगी, इस प्रकार का संकल्प ही एकादशी का उपवास कहलाता है। व्रत का एक और पर्यायवाची शब्द होता है - उपवास। उप + वास = उप का अर्थ होता है समीप, तथा वास का अर्थ होता है रहना। तो व्रत का एक और अर्थ हुआ, भगवान के अधिक से अधिक नज़दीक रहना। यानि की व्रत के दिन अधिक से अधिक समय भगवान के भक्तों के साथ, भगवान की चर्चा सुनते हुए, बोलते हुए, अथवा स्मरण करते हुए, व्यतीत करना चाहिये। इसलिए भक्त लोग, एकादशी आदि व्रत के दिन, तुलसी की माला पर अधिक हरे कृष्ण महामन्त्र का जाप करते हैं, व भक्तों के साथ अधिक समय तक संकीर्तन करते हैं। केवल मात्र भूखा रहना व्रत का तात्पर्य नहीं है। व्रत का मुख्य तात्पर्य अपने आप को भगवान से जोड़ना है। हमारे शास्त्रों में एकादशी आदि व्रत में अनुकल्प की व्यवस्था दी गयी है। अनुक्ल्प का अर्थ होता है विकल्प यानि कि व्रत में दाल, चावल, रोटी इत्यादि नहीं खाते हैं।(किसी प्रकार अन्न ) फिर यदि भूख लगे तो उसका विकल्प क्या है? उसका विकल्प है कि हम फल, दूध, दही, पानी , इत्यादि ले सकते हैं, बिमार होने पर दवाई भी ले सकते हैं। कहने का अर्थ केवल मात्र भूखे रहने से ही भगवान का भजन नहीं होता है, भगवान को प्रसन्न करने की चेष्टाओं को करने से ही भजन होता है। अन्त में हम इतना अवश्य कहना चाहेंगे की इस युग में शुद्ध भक्तों के साथ हरे कृष्ण महामन्त्र का संकीर्तन करने से तथा विभिन्न प्रकार के व्रतों में अपने मन को न उलझा कर, पूरी निष्ठा के साथ एकादशी का व्रत करने से, तथा भगवान के प्रेमी भक्तों की सेवा करने से भगवान जितना प्रसन्न होते हैं, और क्रियाओं से उतना प्रसन्न नहीं होते। अतः शुद्ध भक्तों के साथ हरे कृष्ण महामन्त्र का संकीर्तन करना, एकादशी व्रत करना, तथा भगवान के उच्च कोटी के भक्तों की सेवा करना ही सर्वोत्तम हरि भजन है। हरे कृष्ण हरे कृष्ण,कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम ,राम राम हरे हरे।। ।।इति।।*

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🥀🥀 May 7, 2021

*💦एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा में ये 11 चीजें चढ़ाने से वे प्रसन्न होंगे।* { राजेश जैन एस्ट्रोलॉजर वास्तुविद हस्तरेखा विशेषज्ञ } 1. पुष्प : अगस्त्य, पारिजात, कमल, जूही, केवड़ा, मालती और वैजयंती के फूल अर्पित करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं। 2. खीर : भगवान विष्णुजी को खीर का नैवेद्य बहुत पसंद है। खीर कई प्रकार से बनाई जाती है। 3. हलवा : सूजी का हलवा विष्णुजी को बहुत प्रिय है। 4. पंचामृत : पूजा-पाठ या आरती के बाद तुलसीकृत जलामृत व पंचामृत चढ़ाएं। 5. तुलसी का पत्ता : विष्णु के पूजन और नैवेद्य में तुलसी का पत्ता चढ़ाना अनिवार्य है। इससे वे बहुत ज्यादा प्रसन्न होते हैं। 6. केला : केला भगवान विष्णु को बहुत प्रिय हैं उनके नैवेद्य में केला होना भी जरूरी है। 7. श्रीफल : फल और फूल के साथ श्रीफल चढ़ाने से लक्ष्मीपति प्रसन्न होते हैं। 8. पीला वस्त्र : पीला रंग भगवान विष्णु को भी बहुत प्रिय है। उन्हें पितांबर वस्त्र पहनाया जाते हैं और पीले पाट पर पीला वस्त्र बिछाकर उन्हें विराजमान किया जाता है। 9. चंदन या गोरोचन : भगवान श्रीविष्णु को गोरोचन और चंदन प्रिय है। गोरोचन गाय के शरीर से प्राप्त होता है और चंदन का एक वृक्ष होता है। चंदन कई प्रकार के होते हैं। गोपी चंदन उन्हें सबसे प्रिय हैं। 10. अक्षत : अक्षत का अर्थ चावल है। चावल उनके मस्तक पर लगाते भी हैं और केसर भात बनाकर उन्हें चढ़ाते भी हैं। 11. तिल : कहते हैं कि काले और सफेद तिल विष्णुजी के शरी से ही उत्पन्न हुए थे। एक घी का दीपक जलाकर उसमें काले या सफेद तिल चढ़ाएं। *✍🏻राजेश जैन एस्ट्रोलॉजर वास्तुविद हस्तरेखा विशेषज्ञ मो.9416119298* *💥विशेष:- जो व्यक्ति ज्योतिषीय परामर्श चाहते हैं वे इस हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है ।।* *ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम🙏🙏* *जय श्री राधे राधे🙏🙏🚩🚩🚩* ________________________

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🥀🥀 May 4, 2021

तुलसी कंठी माला की कुछ जानकारी कृष्ण प्रिया तुलसी जीव का परम कल्याण करने वाली है। जिस मनुष्य के कंठ में तुलसी होती है, वह यम की त्रास नहीं पाते। ऐसे जीव गोलक को प्राप्त होते हैं। जन्म मरण के चक्कर से छूट जाते हैं और अंतत: नित्य लीला को प्राप्त करते हैं। तुलसी कंठ में धारण करते हुए स्नान करने वाले मनुष्य को संपूर्ण तीर्थों का फल प्राप्त होता है। जिस प्रकार सौभाग्यवती नारी का परम शृंगार है कुमकुम, मंगलसूत्र इत्यादि। यदि नारी की मांग में कुमकुम व गले में मंगलसूत्र होता है, तो वह उसके सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, *उसी प्रकार माथे पर तिलक और कंठ में तुलसी कंठी माला, वैष्णवो के सौभाग्य, समर्पण व सान्निध्य के प्रतीक हैं। जो मनुष्य कृष्ण को अपना सर्वस्व मानता है, वह तुलसी कंठी अवश्य धारण करता है। जिस तन पर तुलसी माला होती है वह भगवान का भोग हो जाता है। भगवान उसे सहजता से स्वीकार करते हैं। तुलसी धारण के नियम: ● तुलसी माला धारण करने वाले मनुष्य को सात्विक भोजन करना चाहिए अर्थात प्याज, लहसुन, मांसाहार का त्याग करना चाहिए। प्याज, लहसुन और मांसाहार से काम उत्तेजना को बढ़ावा मिलता है, इसलिए यह निषेध है। क्योंकि यह भक्ति में बाधा उत्पन्न करता है। चारों प्रकार के आश्रमों में निवास करने वाले मनुष्य ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, संन्यासी अथवा वानप्रस्थ चारों ही आश्रम के मनुष्य इसे सरलता व सुगमता से धारण कर सकते हैं। ● किसी भी उम्र में स्त्री या पुरुष चाहे आपकी दीक्षा हुई हो या नहीं आप तुलसी माला अवश्य धारण करें ● सबसे जरूरी नियम, तुलसी माला धारक को अधिक से अधिक नाम जाप करना चाहिए जो भी प्रभु का नाम आपको प्रिय हो जाप अवश्य करें ● परिवार में जन्म अथवा मृत्यु के समय में भी तुलसी माला का त्याग नहीं करना चाहिए अर्थात इसे अपनी देह से अलग नहीं करना चाहिए। ध्यान दें कि मनुष्य जब मृत्यु शैया पर होता है तो अंत समय में उसके मुख में भी तुलसी दल और गंगाजल डाला जाता है। इसी प्रकार जब कंठ में तुलसी की माला धारण की हुई होती है तो वह परम कल्याणकारी होती है। कंठ में तुलसी धारण करने से प्रत्येक क्षण भगवान को तुलसी दल अर्पण करने का फल प्राप्त होता है। तुलसी के नियम ही सात्विकता की ओर बढ़ने वाले कदम हैं जिससे सच्चा कल्याण होता है। तुलसी प्रत्येक प्रकार के वास्तुदोष को समाप्त करती है तथा सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है । तुलसी वायु प्रदूषण को रोकने में सहायक है इसलिए अधिक से अधिक तुलसी रोपण करनी चाहिए। जिस आंगन में तुलसी सिंचित होती है वहां सदैव कृष्ण का वास रहता है। जय श्री राधे राधे जी 🙏💕

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