।।। एक कहानी जीवन की ।।। *💐💐बुजुर्ग महिला और बस कंडक्टर💐💐* एक बार एक गांव में जगत सिंह नाम का व्यक्ति अपने परिवार के साथ रहता था। वह अपने गांव से शहर की ओर जाने वाली डेली बस में कंडक्टर का काम करता था। वह रोज सुबह जाता था और शाम को अंतिम स्टेशन पर उतरकर घर वापिस चला आता था एक दिन की बात है कि जब शाम को बस का अंतिम स्टेशन आ गया तो उसने देखा कि बस के सभी यात्री उतर चुके हैं, परंतु अंतिम सीट पर एक बुजुर्ग महिला एक पोट्ली लिये हुए अभी तक बैठी हुई है । जगत सिंह ने उस महिला के पास जाकर कहा,” माता जी, यह अंतिम स्टेशन आ गया है। गाड़ी आगे नहीं जाएगी इसलिये आप उतर जाइए।“ यह सुनते ही वह बुजुर्ग महिला उदास हो गयी और कहने लगी,” बेटा मैं कहॉ जाउंगी? मेरा कोई नहीं घर नही और कोइ सगा भी नही।” जगत सिह ने उसके परिवार/अता-पता पूछा लेकिन महिला कुछ भी बता नही पा रही थी। जब काफी देर हो गयी तो जगत सिह ने सोचा कि इस बुजुर्ग बेसहारा महिला को अपने साथ घर ले चलूं। फिर उसने कहा,” माता जी आप मेरे घर चलो। यह सुनकर महिला अपनी पोट्ली साथ लेकर चल पडी। घर जाकर जगत सिह ने पत्नी को सारा किस्सा सुनाया। पहले तो उसकी पत्नि सुलोचना उस बुजुर्ग महिला को घर पर रखने को तैयार न थी लेकिन जगत सिह के समझाने के बाद वह मान गयी। अब घर पर एक कमरा जो खाली था, उसी में वह बुजुर्ग महिला रहने लगी। जगत सिंह और सुलोचना दोनो उसका ख्याल रखने लगे। सुलोचना प्रतिदिन उसे खाना देती थी, उसकी सेवा करती थी। इस तरह वे नि:स्वार्थ भाव से उसकी सेवा करते रहे। इस तरह दो साल बीत गये और फिर एक दिन उस बुजुर्ग महिला की मृत्यु हो ग़यी। उस महिला के पास जो पोट्ली थी, उसे अभी तक किसी ने खोला नही था। बुजुर्ग महिला का अंतिम संस्कार कररने के बाद जब जगत सिह ने पोट्ली को खोला तो उसकी आंखे फटी रह गयी। वह पोट्ली नोटों से भरी थी। जब नोट गिने तो दस लाख रुपये निकले। जगत सिह और उसकी पत्नि को यकीन ही नही हो रहा था कि जिस बुजुर्ग महिला को वह बेसहारा समझ कर बिना किसी स्वार्थ के सेवा कर रहे थे, वह उनके लिये इतना धन छोड कर जायेगी। *मनुष्य द्वारा समाज व देश में समय-समय पर अनेक प्रकार की सेवाएं की जाती हैं लेकिन उनमें यदि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप कहीं स्वार्थ छुपा हुआ है तो वह सेवा, सेवा नहीं कहलाती । धर्मग्रन्थों के अनुसार अपने तन-मन-धन का अभिमान त्याग कर निष्काम व निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही फलदायी साबित होती है। निस्वार्थ भाव की सेवा ही प्रभु भक्ति का उत्कृष्ट नमूना है। जो सेवा स्वार्थ भाव से की जाए तो स्वार्थपूर्ती होते ही उस सेवा का फल भी समाप्त हो जाता है। निस्वार्थ सेवा करते रहिए शायद आप का रंग औरों पर भी चढ़ जाये,जिसे भी आवश्यकता हो निःस्वार्थ सेवा भाव से उसकी मदद करें। आपको एक विशिष्ट शांति प्राप्त होगी।*

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*👉🌷 भगवान का घर 🌷👈* कल दोपहर मैं बैंक में गया था! वहाँ एक बुजुर्ग भी अपने काम से आये थे! वहाँ वह कुछ ढूंढ रहे थे! मुझे लगा शायद उन्हें पेन चाहिये! इसलिये उनसे पुछा तो, वह बोले *"बिमारी के कारण मेरे हाथ कांप रहे हैं और मुझे पैसे निकालने की स्लीप भरनी है उसके लिये मैं देख रहा हूँ कि कोई मदद कर दे!"* मैं बोला *"आपको कोई हर्ज न हो तो मैं आपकी स्लीप भर देता हूँ!"* उन्होंने मुझे स्लीप भरने की अनुमति दे दी! मैंने उनसे पुछकर स्लीप भर दी! रकम निकाल कर उन्होंने मुझसे पैसे गिनने को कहा मैंने पैसे भी गिन दिये! हम दोनों एक साथ ही बैंक से बाहर आये तो, बोले *"साॅरी तुम्हें थोडा कष्ट तो होगा परन्तु मुझे रिक्षा करवा दो इस भरी दोपहरी में रिक्षा मिलना बडा़ कष्टकारी होता है!"* मैं बोला *"मुझे भी उसी तरफ जाना है, मैं तुम्हें कार से घर छोड देता हूँ!"* वह तैयार हो गये। हम उनके घर पहूँचे! '60' × 100' के प्लाट पर बना हुआ घर क्या बंगला कह सकते हो! घर में उनकी वृद्ध पत्नी थीं! वह थोडी डर गई कि इनको कुछ हो तो नहीं गया जिससे उन्हें छोडने एक अपरिचित व्यक्ति घर तक आया हैं! फिर उन्होंने पत्नी के चेहरे पर आये भावों को पढकर कहा कि "चिंता की कोई बात नहीं यह मुझे छोडने आये हैं!" फिर बातचीत में वह बोले "इस *भगवान के घर* में हम दोनों पति-पत्नी ही रहते हैं! हमारे बच्चे तो विदेश में रहते हैं।" मैंने जब उन्हें *भगवान के घर* के बारे में पुछा तो उन्होंने बताया कि "हमारे परिवार में *भगवान का घर* कहने की पुरानी परंपरा है! इसके पीछे की भावना हैं कि यह घर भगवान का है और हम उस घर में रहते हैं! *जबकि लोग कहते हैं कि "घर हमारा है और भगवान हमारे घर" में रहते है!*" मैंने विचार किया कि दोनों कथनों में कितना अंतर है! तदुपरांत वह बोले... *"भगवान का घर"* बोला तो अपने से कोई *"नकारात्मक कार्य नहीं होते और हमेशा सदविचारों से ओत प्रेत रहते हैं।"* बाद में मजाकिया लहजे में बोले ... *"लोग मृत्यु उपरान्त भगवान के घर जाते हैं परन्तु हम तो जीते जी ही भगवान के घर का आनंद ले रहे हैं!"* यह वाक्य ही जैसे भगवान ने दिया कोई प्रसाद ही है! भगवान ने ही मुझे उनको घर छोडने की प्रेरणा दी! *"घर भगवान का और हम उनके घर में रहते हैं"* यह वाक्य बहुत दिनों तक मेरे दिमाग में घुमता रहा, सही में कितने अलग विचार थे! हमको उपरोक्त प्रसंग से प्रेरित होकर अगर हम इस पर अमल करेंगे तो हमारे और आनेवाली पीढियों के विचार भी वैसे ही हौंगे! *अच्छे कार्य का प्रारंभ जबसे भी करो वही नई सुबह है!* मुझे यह प्रसंग किसी ने शेयर किया था,! आपसे भी अनुरोध है कि अगर उचित लगे तो आपभी शेयर करना! अपने १०% भाईयों ने भी अगर *मेरा/हमारा घर* को *भगवान का घर* कहना/अपनाया तो आप इसके अन्दर छिपे अर्थ/स्वरूप को समझें! *🙏🙏*

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जय श्री राधे कृषणा 🌹🌹 *- मन की दशा-* एक बार एक सेठ जी ने पंडित जी को भोजन हेतु निमंत्रण दिया पर पंडित जी का एकादशी का व्रत था तो पंडित जी नहीं जा सके, पर उन्होंने अपने दो शिष्यों को सेठ के यहाँ भोजन के लिए भेज दिया.जब दोनों शिष्य वापस लौटे, तो एक शिष्य दुखी और दूसरा प्रसन्न था.पंडित जी को आश्चर्य हुआ,उन्होंने पूछा ~ बेटा, दुखी क्यों हो ? क्या सेठ ने भोजन में अंतर कर दिया ? नहीं , गुरुजी !क्या सेठ ने आसन में अंतर कर दिया ? नहीं , गुरुजी !क्या सेठ ने दक्षिणा में अंतर कर दिया ?नहीं , गुरुजी ! बराबर दक्षिणा दी.2 रुपये मुझे और 2 रुपये दूसरे को.अब तो गुरुजी को और भी आश्चर्य हुआ.और पूछा ~ फिर क्या कारण है,जो तुम दुखी हो ?तब दुखी चेला बोला ~ गुरु जी !मैं तो सोचता था,सेठ बहुत बड़ा आदमी है.कम से कम 10 रुपये दक्षिणा त़ो देगा,पर उसने 2 रुपये ही दिये.इसलिए मैं दुखी हू अब दूसरे से पूछा ~ तुम क्यों प्रसन्न हो ?तो दूसरा बोला ~ गुरु जी !मैं जानता था, सेठ बहुत कंजूस है.आठ आने से ज्यादा दक्षिणा नहीं देगा,पर उसने 2 रुपए दे दिये तो मैं प्रसन्न हूँ. बस यही हमारे मन का हाल है.संसार में घटनाएं समान रूप से घटती हैं पर कोई उन्हीं घटनाओं से सुख प्राप्त करता है, कोई दुखी होता है.पर असल में न दुख है , न सुख.ये हमारे मन की स्थिति पर निर्भर है. इसलिए .. मन को प्रभु चरणों मे लगाओ.कामना पूरी न हो, तो दुख .. और कामना पूरी हो जाये, तो सुख लेकिन यदि कोई कामना ही न हो,तो आनंद ही आनंद..!! *🙏🏻🙏🏾🙏🏽जय जय श्री राधे*🙏🏼🙏🏿🙏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐बेईमान दूधवाला💐💐 एक गाँव में एक दूधवाला रहता है।उसके पास 4 गायें थी, जिनका दूध निकाल कर वह शहर जाकर बेचा करता था। शहर जाने के लिए दूधवाले को गाँव की नदी पार करनी पड़ती थी। वह नाव से नदी पार कर शहर जाता था और अपने ग्राहकों को दूध बेचकर नाव से ही वापस गाँव आ जाता था। दूधवाला एक बेईमान व्यक्ति था।नदी पार करते समय वह रोज़ दूध में नदी का पानी मिला देता और पानी मिला दूध अपने ग्राहकों को बेचा करता था। इस तरह वह बहुत मुनाफ़ा कमाया करता था। एक दिन ग्राहकों से दूध के पैसे इकठ्ठे कर दूधवाला शहर के बाज़ार चला गया। कुछ ही दिनों में उसके बेटे का विवाह था। उसने बाज़ार से ढेर सारे कीमती कपड़े, गहनें और आवश्यक सामग्रियाँ ख़रीदी। ख़रीददारी करते-करते उसे शाम हो गई। शाम को सारा सामान लेकर वह गाँव लौटने के लिए नाव से नदी पार करने लगा। नाव में लदे सामान का भार अधिक था, जिसे नाव झेल नहीं पाई और असंतुलित होकर पलट गई। दूधवाले ने जैसे-तैसे अपनी जान बचा ली। किंतु कीमती सामानों को नहीं बचा पाया। सारा सामान नदी की तेज धार में बह गया। कीमती सामान से हाथ धो देने के बाद दूधवाला दु:खी हो गया और नदी किनारे बैठकर जोर-जोर से विलाप करने लगा। तभी नदी से एक आवाज़ आई, “रोते क्यों हो भाई? तुमने वही गंवाया है, जो धोखा देकर कमाया था. दूध में पानी मिलाकर जो तुमने कमाया, वो पानी में ही चला गया। अब रोना बंद करो। ये तुम्हारी बेईमानी का फ़ल था।” सीख :- अपने काम में सदा ईमानदारी रखे। बेईमानी से कमाया हुआ धन कभी नहीं टिकता। सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। 🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐लोक कल्याण💐💐 पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एफक पत्र और सुरमे की एक छोटी सी डिबिया भेजी। पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे। उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, पर सुरमे की मात्रा बस इतनी थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके। राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था। तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था। राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी। राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। आप पुन: देखने लग जाएंगे। ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। फिर उसने बचा- खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। यह देखकर राजा चकित रह गया। उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी। लोग आपको काना कहेंगे।’ मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’ राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, ‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा..!! सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। 🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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🔆💥 शुभ रात्रि🔆💥 *प्रलोभन-चरित्र-मित्रता का मूल्य* एक नगर में रहने वाले एक पंडित जी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गाँव में स्थित मंदिर के पुजारी का आकस्मिक निधन होने की वजह से, उन्हें वहाँ का पुजारी नियुक्त किया गया था। एक बार वे अपने गंतव्य की और जाने के लिए बस में चढ़े, उन्होंने कंडक्टर को किराए के रुपये दिए और सीट पर जाकर बैठ गए। कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए तो पंडित जी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं। पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। कुछ देर बाद मन में विचार आया कि बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है। आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते हैं, बेहतर है इन रूपयों को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। वह इनका सदुपयोग ही करेंगे। मन में चल रहे विचारों के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया। बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके, उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा, भाई तुमने मुझे किराया काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे। कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी है पंडित जी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला, मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी, आपको बस में देखा तो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूँ तो आप क्या करते हो... अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है। जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए: बोलते हुए, कंडक्टर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। पंडितजी बस से उतरकर पसीना-पसीना थे। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया कि हे प्रभु! आपका लाख-लाख शुक्र है, जो आपने मुझे बचा लिया, मैने तो दस रुपये के लालच में आपकी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी। पर आपने सही समय पर मुझे सम्भलने का अवसर दे दिया। *कभी कभी हम भी तुच्छ से प्रलोभन में, अपने जीवन भर की चरित्र पूँजी दाँव पर लगा देते हैं..!!* 🔆🔆🔆🔆🔆🔆🔆 जब कंधार के तत्तकालीन शासक अमीर अली खान पठान को मजबूर हो कर जैसलमेर राज्य में शरण लेनी पड़ी। तब यहां के महारावल लूणकरण थे।वे महारावल जैतसिंह के जेष्ठ पुत्र होने के कारण उनके बाद यहां के शासक बने। वैसे उनकी कंधार के शासक अमीर अली खान पठान से पहले से ही मित्रता थी और विपत्ति के समय मित्र ही के काम आता है ये सोचते हुए उन्होंने सहर्ष अमीर अली खान पठान को जैसलमेर का राजकीय अतिथि स्वीकार कर लिया। लम्बें समय से दुर्ग में रहते हुए अमीर अली खान पठान को किले की व्यवस्था और गुप्त मार्ग की सारी जानकारी मिल चुकी थी।उस के मन में किले को जीत कर जैसलमेर राज्य पर अधिकार करने का लालच आने लगा और वह षड्यंत्र रचते हुए सही समय की प्रतीक्षा करने लगा। इधर महारावल लूणकरण भाटी अपने मित्र अमीर अली खान पठान पर आंख मूंद कर पूरा विश्वास करते थे। वो स्वप्न में भी ये सोच नहीं सकते थे कि उनका मित्र कभी ऐसा कुछ करेगा। इधर राजकुमार मालदेव अपने कुछ मित्रों और सामंतों के साथ शिकार पर निकल पड़े। अमीर अली खान पठान बस इस मौके की ताक में ही था। उसने महारावल लूणकरण भाटी को संदेश भिजवाया कि वो आज्ञा दे तो उनकी पर्दानशी बेगमें रानिवास में जाकर उनकी रानियों और राजपरिवार की महिलाओं से मिलना चाहती है। फिर क्या होना था? वही जिसका अनुमान पूर्व से ही अमीर अली खान पठान को था। महारावल ने सहर्ष बेगमों को रानिवास में जाने की आज्ञा दे दी। इधर बहुत सारी पर्दे वाली पालकी दुर्ग के महल में प्रवेश करने लगी किन्तु अचानक महल के प्रहरियों को पालकियों के अंदर से भारी भरकम आवाजें सुनाई दीं तो उन्हें थोड़ा सा शक हुआ। उन्होंने एक पालकी का पर्दा हटा कर देखा तो वहां बेगमों की जगह दो-तीन सैनिक छिपे हुए थे। जब अचानक षड्यंत्र का भांडा फूटते ही वही पर आपस में मार-काट शुरू हो गई। दुर्ग में जिसके भी पास जो हथियार था वो लेकर महल की ओर महारावल और उनके परिवार की रक्षा के लिए दौड़ पडा। चारों ओर अफरा -तफरी मच गई किसी को भी अमीर अली खान पठान के इस विश्वासघात की पहले भनक तक नहीं थी। कोलाहल सुनकर दुर्ग के सबसे ऊंचे बुर्ज पर बैठे प्रहरियों ने संकट के ढोल-नगाड़े बजाने शुरू कर दिए जिसकी घुर्राने की आवाज दस-दस कोश तक सुनाई देने लगी। महारावल ने रानिवास की सब महिलाओं को बुला कर अचानक आए हुए संकट के बारे में बताया। अब अमीर अली खान पठान से आमने-सामने युद्ध करने के सिवाय और कोई उपाय नहीं था। राजकुमार मालदेव और सांमत पता नहीं कब तक लौटेंगे। दुर्ग से बाहर निकलने के सारे मार्ग पहले ही बंद किए जा चुके थे। राजपरिवार की स्त्रियों को अपनी इज्जत बचाने के लिए जौहर के सिवाय कुछ और उपाय नहीं दिखाई दे रहा था। अचानक से किया गया आक्रमण बहुत ही भंयकर था और महल में जौहर के लिए लकड़ियां भी बहुत कम थी। इसलिए सब महिलाओं ने महारावल के सामने अपने अपने सिर आगे कर दियें और सदा सदा के लिए बलिदान हो गई। महारावल केसरिया बाना पहन कर युद्ध करते हुए रणभूमि में बलिदान हो गए । महारावल लूणकरण भाटी को अपने परिवार सहित चार भाई, तीन पुत्रों के साथ को कई विश्वास पात्र वीरों को खो कर मित्रता की कीमत चुकानी पड़ी। इधर रण दुंन्दुभियों की आवाज सुनकर राजकुमार मालदेव दुर्ग की तरफ दौड़ पड़े। वे अपने सामंतों और सैनिकों को लेकर महल के गुप्त द्वार से किले में प्रवेश कर गए और अमीर अली खान पठान पर प्रचंड आक्रमण कर दिया। अमीर अली खान पठान को इस आक्रमण की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। अंत में उसे पकड़ लिया गया और चमड़े के बने कुड़िए में बंद करके दुर्ग के दक्षिणी बुर्ज पर तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया। *इतिहास की कई सैकड़ों ऐसी घटनाएं है जिससे हम वर्तमान में बहुत कुछ सीख सकते है। आज अफगान संकट को देखते हुए कई लोग ये कह रहे हैं हमें इन्हें यहां शरण देनी चाहिए पर उससे क्या होगा कल ये ही अगर यहां कहते हुए हमें दिखाई दे कि हिन्दुस्तान तुम्हारे बाप का नहीं तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होना।* *जय श्री राम* *सदैव प्रसन्न रहिये* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है* *जिसका मन मस्त है* *उसके पास समस्त है!!*

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🚩अकेलापन : एक सजा🚩 *मेरी पत्नी ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिये और एक छोटा-सा बगीचा बना लिया।* *पिछले दिनों मैं छत पर गया, तो.. ये देखकर हैरान रह गया कि कई गमलों में फूल खिल गये हैं। नींबू के पौधे में दो नींबू भी लटके हुए हैं और दो-चार हरी मिर्च भी लटकी हुई नज़र आयीं।* *मैंने देखा कि पिछले हफ्ते उसने बाँस का जो पौधा गमले में लगाया था, उस गमले को घसीटकर दूसरे गमले के पास कर रही थी।* *मैंने कहा- "तुम इस भारी गमले को क्यों घसीट रही हो?" पत्नी ने मुझसे कहा- "यहाँ ये बाँस का पौधा सूख रहा है.., इसे खिसकाकर इस पौधे के पास कर देते हैं।"* *मैं हंस पड़ा और कहा- "अरे.. पौधा सूख रहा है तो खाद डालो, पानी डालो। इसे खिसकाकर किसी और पौधे के पास कर देने से क्या होगा?"* *पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा-"ये पौधा यहाँ अकेला है, इसलिए मुरझा रहा है। इसे इस पौधे के पास कर देंगे तो ये फिर लहलहा उठेगा..। पौधे अकेले में सूख जाते हैं, लेकिन उन्हें अगर.. किसी और पौधे का साथ मिल जाए तो जी उठते हैं।"* *यह बहुत अजीब-सी बात थी।* *एक-एक कर कई तस्वीरें आखों के आगे बनती चली गयीं। माँ की मौत के बाद.. पिताजी कैसे एक ही रात में बूढ़े.., बहुत बूढ़े हो गये थे। हालांकि माँ के जाने के बाद वो सोलह साल तक रहे, लेकिन.. सूखते हुए पौधे की तरह..!* *माँ के रहते हुए पिताजी को मैंने कभी उदास नहीं देखा था.., वो माँ के जाने के बाद खामोश से हो गये थे।* मुझे पत्नी के विश्वास पर पूरा "विश्वास" हो रहा था। लग रहा था कि सचमुच.. पौधे अकेले में सूख जाते होंगे।* *बचपन में.. मैं एक बार बाज़ार से एक छोटी-सी रंगीन मछली खरीदकर लाया था और उसे शीशे के जार में पानी भरकर रख दिया था। मछली सारा दिन गुमसुम रही। मैंने उसके लिए खाना भी डाला, लेकिन.. वो चुपचाप इधर-उधर पानी में अनमनी-सी घूमती रही।* *सारा खाना जार की तलहटी में जाकर बैठ गया.., मछली ने कुछ नहीं खाया। दो दिनों तक वो ऐसे ही रही, और.. एक सुबह मैंने देखा कि वो पानी की सतह पर उल्टी पड़ी थी।* *आज.. मुझे घर में पाली वो छोटी-सी मछली याद आ रही थी।* *बचपन में किसी ने मुझे ये नहीं बताया था। अगर.. मालूम होता तो कम-से-कम दो, तीन या ढ़ेर सारी मछलियां खरीद लाता और मेरी वो प्यारी मछली यूँ तन्हा न मर जाती।* *बचपन में.. मेरी माँ से सुना था कि लोग मकान बनवाते थे और कमरे में रौशनी के लिए दीपक रखने के लिए दीवार में दो मोखे बनवाते थे, क्योंकि.. माँ का कहना था कि बेचारा अकेला मोखा गुमसुम और उदास हो जाता है।* *मुझे लगता है कि संसार में किसी को भी अकेलापन पसन्द नहीं।* *आदमी हो या पौधा.., हर किसी को किसी न किसी के साथ की जरूरत होती है।* *आप अपने आसपास झांकिए..; अगर.. कहीं कोई अकेला दिखे तो.. उसे अपना साथ दीजिए,* *उसे मुरझाने से बचाइए। और अगर.. आप अकेले हों, तो आप भी किसी का साथ लीजिए। आप खुद को भी अपने-आपको मुरझाने से रोकिए।* *"अकेलापन" संसार में सबसे बड़ी सजा है। गमले के पौधे को तो हाथ से खींचकर एक-दूसरे पौधे के पास किया जा सकता है, लेकिन..* *आदमी को करीब लाने के लिए जरूरत होती है रिश्तों को समझने की.., सहेजने की.. और समेटने की..! और.. अगर मन के किसी कोने में आपको लगे कि ज़िन्दगी का रस सूख रहा है.., जीवन मुरझा रहा है, तो.. उस पर रिश्तों के प्यार का रस डालिए; खुश रहिए और मुस्कुराइए।* *कोई यूँ ही किसी और की गलती से आपसे दूर हो गया हो तो.. उसे अपने करीब लाने की कोशिश कीजिए और हो जाइए हरा-भरा..!* 🙏🙏

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐सारस की शिक्षा💐💐 एक गांव के पास एक खेत में सारस पक्षी का एक जोड़ा रहता था | वहीं उनके अंडे थे | अंडे बड़े और समय पर उनसे बच्चे निकले | लेकिन बच्चों के बड़े होकर उड़ने योग्य होने से पहले ही खेत की फसल पक गयी | सारस बड़ी चिंता में पड़े किसान खेत काटने आवे, इससे पहले ही बच्चों के साथ उसे वहां से चले जाना चाहिए और बच्चे उड़ सकते नहीं थे | सारस ने बच्चों से कहा -” हमारे न रहने पर यदि कोई खेत में आवे तो उसकी बात सुनकर याद रखना |” एक दिन जब सारस चारा लेकर शाम को बच्चों के पास लौटा तो बच्चों ने कहा – ” आज किसान आया था | वह खेत के चारों ओर घूमता रहा एक दो स्थानों पर खड़े होकर देर तक खेत को घूरता था | वह कहता था, कि खेत अब काटने के योग्य हो गया है | आज चलकर गांव के लोगों से कहूंगा कि वह मेरा खेत कटवा दें |” सारस ने कहा – ” तुम लोग डरो मत! खेत अभी नहीं कटेगा अभी खेत कटने में देर है |” कई दिन बाद जब एक दिन सारस शाम को बच्चों के पास आए तो बच्चे बहुत घबराए थे- ” वे कहने लगे | अब हम लोगों को यह खेत झटपट छोड़ देना चाहिए | आज किसान फिर आया था, वह कहता था, कि गांव के लोग बड़े स्वार्थी हैं | वह मेरा खेत कटवाने का कोई प्रबंध नहीं करते | कल मैं अपने भाइयों को भेजकर खेत कटवा लूंगा | सारस बच्चों के पास निश्चिंत होकर बैठा और बोला – ” अभी तो खेत कटता नहीं दो-चार दिन में तुम लोग ठीक-ठीक उड़ने लगोगे अभी डरने की आवश्यकता नहीं है |” कई दिन और बीत गए सारस के बच्चे उड़ने लगे थे और निर्भय हो गए थे| एक दिन शाम को सारस से वे कहने लगे – ” यह किसान हम लोगों को झूठ-मूठ डराता है | इसका खेत तो कटेगा नहीं, वह आज भी आया था | और कहता था | कि मेरे भाई मेरी बात नहीं सुनते सब बहाना करते हैं | मेरी फसल का अन्न सुखकर झर रहा है | कल बड़े सवेरे में आऊंगा और खेत काट लूंगा | सारस घबराकर बोला – ” चलो जल्दी करो ! अभी अंधेरा नहीं हुआ है | दूसरे स्थान पर उड़ चलो | कल खेत अवश्य कट जाएगा | बच्चे बोले – ” क्यों ? इस बार खेत कट जाएगा यह कैसे ?” सारस ने कहा – ” किसान जब तक गांव वालों और भाइयों के भरोसे था | खेत के कटने की आशा नहीं थी | जो दूसरों के भरोसे कोई काम छोड़ता है | उसका काम नहीं होता, लेकिन जो सवयं काम करने को तैयार होता है | उसका काम रुका नहीं रहता | किसान जब सवयं कल खेत काटने वाला है, तब तो खेत कटेगा ही |” अपने बच्चों के साथ सारस उसी समय वहां से उड़कर दूसरे स्थान पर चला गया ” मित्रों" जो दूसरों के भरोसे कोई काम छोड़ता है | उसका काम नहीं होता, लेकिन जो सवयं काम करने को तैयार होता है | उसका काम रुका नहीं रहता |” सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। 🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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