🌺🇮🇳🌺 वंदे मातरम 🌺🇮🇳🌺 💙 ‼ श्री शिव ‼ 💙 🌺🇮🇳🌺 जय हिन्द 🌺🇮🇳🌺 🧡💥🧡 कैलाशपति श्री भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा और आशीर्वादों से भरे दिन सोमवार का आप सभी 🧡💥🧡🙏🏻आदरणीयो को सादर प्रणाम 🙏🏻🧡💥🧡 💜💜💜 पार्वती पतये श्री शिव शंकर भोलेनाथ 💜💜💜 💛❣💛 ... सोमवार_विशेष ... 💛❣💛 💚✍... शिवजी_क्यों_कहलाएं_पंचमुखी ? ...✍💚 💞✍... शिवजी ने उत्पन्न किया जीवन, इसलिए कहलाएं पंचमुखी सृष्टि के आरंभ में जब कुछ नहीं था। तब प्रथम देव शिवजी ने ही सृष्टि की रचना के लिए पंच मुख धारण किएं। त्रिनेत्रधारी शिव के पांच मुख से ही पांच तत्वों जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। इसलिए श्री शिव के ये पांच मुख पंचतत्व माने गए हैं। 💞✍... जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए जिनमें उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार प्रमुख हैं। ये ही भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां हैं । 💞✍... भगवान शिव का विष्णुजी से अनन्य प्रेम है । शिव तामसमूर्ति हैं और विष्णु सत्त्वमूर्ति हैं, पर एक-दूसरे का ध्यान करने से शिव श्वेत वर्ण के और विष्णु श्याम वर्ण के हो गये। 💞✍... ऐसा माना जाता है कि एक बार भगवान विष्णु ने अत्यन्त मनोहर किशोर रूप धारण किया। उस मनोहर रूप को देखने के लिए चतुरानन ब्रह्मा, बहुमुख वाले अनन्त, सहस्त्राक्ष इन्द्र आदि देवता आए। उन्होंने एकमुख वालों की अपेक्षा भगवान के रूपमाधुर्य का अधिक आनन्द लिया। यह देखकर भगवान शिव सोचने लगे कि यदि मेरे भी अनेक मुख व नेत्र होते तो मैं भी भगवान के इस किशोर रूप का सबसे अधिक दर्शन करता। भगवान शिव के मन में इस इच्छा के उत्पन्न होते ही वे पंचमुख हो गए। 💖👉... पांच मुखों के कारण शिव कहलाते हैं #पंचानन_और_पंचवक्त्र !!!!! भगवान शिव के पांच मुख—सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान हुए और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र बन गए। तभी से वे ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे। भगवान शिव के पांच मुख चारों दिशाओं में और पांचवा मध्य में है। भगवान शिव के पश्चिम दिशा का मुख सद्योजात है। यह बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध व निर्विकार हैं। उत्तर दिशा का मुख वामदेव है। वामदेव अर्थात् विकारों का नाश करने वाला। दक्षिण मुख अघोर है। अघोर का अर्थ है कि निन्दित कर्म करने वाला। निन्दित कर्म करने वाला भी भगवान शिव की कृपा से निन्दित कर्म को शुद्ध बना लेता है। भगवान शिव के पूर्व मुख का नाम तत्पुरुष है। तत्पुरुष का अर्थ है अपने आत्मा में स्थित रहना। ऊर्ध्व मुख का नाम ईशान है। ईशान का अर्थ है स्वामी। भगवान शंकर के पांच मुखों में ऊर्ध्व मुख ईशान दुग्ध जैसे रंग का, पूर्व मुख तत्पुरुष पीत वर्ण का, दक्षिण मुख अघोर नील वर्ण का, पश्चिम मुख सद्योजात श्वेत वर्ण का और उत्तर मुख वामदेव कृष्ण वर्ण का है। शिवपुराण में भगवान शिव कहते हैं—सृष्टि, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह—मेरे ये पांच कृत्य (कार्य) मेरे पांचों मुखों द्वारा धारित हैं। भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां (मुख) विभिन्न कल्पों में लिए गए उनके अवतार हैं,जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए जिनमें उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार प्रमुख हैं। ये ही भगवान शिव की पांच विशिष्ट मूर्तियां (मुख) हैं। अपने पांच मुख रूपी विशिष्ट मूर्तियों का रहस्य बताते हुए भगवान शिव माता अन्नपूर्णा से कहते हैं—‘ब्रह्मा मेरे अनुपम भक्त हैं । उनकी भक्ति के कारण मैं प्रत्येक कल्प में दर्शन देकर उनकी समस्या का समाधान किया करता हूँ।' श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में ब्रह्मा सृष्टि रचना के ज्ञान के लिए परब्रह्म का ध्यान कर रहे थे। तब भगवान शंकर ने उन्हें अपने पहले अवतार ‘सद्योजात रूप’ में दर्शन दिए। इसमें वे एक श्वेत और लोहित वर्ण वाले शिखाधारी कुमार के रूप में प्रकट हुए और ‘सद्योजात मन्त्र’ देकर ब्रह्माजी को सृष्टि रचना के योग्य बनाया। रक्त नामक बीसवें कल्प में रक्तवर्ण ब्रह्मा पुत्र की कामना से परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे। उसी समय उनसे एक पुत्र प्रकट हुआ जिसने लाल रंग के वस्त्र-आभूषण धारण किये थे। यह भगवान शंकर का ‘वामदेव रूप’ था और दूसरा अवतार था जो ब्रह्माजी के जीव-सुलभ अज्ञान को हटाने के लिए तथा सृष्टि रचना की शक्ति देने के लिए था। भगवान शिव का ‘तत्पुरुष’ नामक तीसरा अवतार पीतवासा नाम के इक्कीसवें कल्प में हुआ। इसमें ब्रह्मा पीले वस्त्र, पीली माला, पीला चंदन धारण कर जब सृष्टि रचना के लिए व्यग्र होने लगे तब भगवान शंकर ने उन्हें ‘तत्पुरुष रूप’ में दर्शन देकर इस गायत्री-मन्त्र का उपदेश किया। तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रयोदयात् ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ इस मन्त्र के अद्भुत प्रभाव से ब्रह्मा सृष्टि की रचना में समर्थ हुए ! ’शिव’ नामक कल्प में भगवान शिव का ‘अघोर’ नामक चौथा अवतार हुआ। ब्रह्मा जब सृष्टि रचना के लिए चिन्तित हुए, तब भगवान ने उन्हें ‘अघोर रूप’ में दर्शन दिए। भगवान शिव का अघोर रूप महाभयंकर है जिसमें वे कृष्ण-पिंगल वर्ण वाले, काला वस्त्र, काली पगड़ी, काला यज्ञोपवीत और काला मुकुट धारण किये हैं तथा मस्तक पर चंदन भी काले रंग का है। भगवान शंकर ने ब्रह्माजी को ‘अघोर मन्त्र’ दिया जिससे वे सृष्टि रचना में समर्थ हुए। विश्वरूप नामक कल्प में भगवान शिव का ‘ईशान’ नामक पांचवा अवतार हुआ। ब्रह्माजी पुत्र की कामना से मन-ही-मन शिवजी का ध्यान कर रहे थे, उसी समय सिंहनाद करती हुईं सरस्वती सहित भगवान ‘ईशान’ प्रकट हुए जिनका स्फटिक के समान उज्ज्वल वर्ण था। भगवान ईशान ने सरस्वती सहित ब्रह्माजी को सन्मार्ग का उपदेश देकर कृतार्थ किया। भगवान शिव के इन पंचमुख के अवतार की कथा पढ़ने और सुनने का बहुत माहात्म्य है। यह प्रसंग मनुष्य के अंदर शिव-भक्ति जाग्रत करने के साथ उसकी समस्त मनोकामनाओं को पूरी कर परम गति देने वाला है । 🌷 जय पंचमुखी परमेश्वर 🌷

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⚜🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳⚜ 🌞🇮🇳 ओम सूर्याय नमः 🇮🇳🌞 ⚜🇮🇳 वंदे मातरम 🇮🇳⚜ 💞💓💞 जय श्री कृष्ण 💞💓💞 💜💥💜 सूर्य देव की प्रकाशमयी 💜💥💜 रविवार की सुबह का 💜💥💜 आप सभी आदरणीयो को ❤🙏🏻❤ सादर प्रणाम ❤🙏🏻❤ -••¤⚜¤○●□❣□●○¤⚜¤••-- 💔💖💔 आपका दिन शुभ एवं मंगलमय रहें 💔💖💔 ❤💛❤💛❤💛❤🔱🔱🔱❤💛❤💛❤💛❤ ----•••~~•••○○⚜○○¤¤○○⚜○○•••~~•••--- 💞✍... वृषभान और किर्तीदा को विवाह हुए 15 वर्ष हो चुके। अभी तक वह दोनों संतान सुख से वंचित है। नित्य ही ईश्वर से प्रार्थना करते कि उन्हें इस जन्म संतान सुख की प्राप्ति हो। मगर 15 वर्षो से ईश्वर से प्रार्थना करते करते अब उनके विश्वास ने उनका साथ छोड़ना शुरू कर दिया था। परंतु कल एकाएक किर्तीदा को चक्कर आ गए। बहुत घबराहट भी महसूस होने लगी। उन्हें लगा सुबह से तेज धूप में काम कर रही थी शायद इसीकारण ऐसा हुआ। मगर शाम को दोबारा चक्कर आने लगे। रात में भोजन करने कि भी इच्छा नहीं हुई। जब वृषभान जी को यह सब ज्ञात हुआ तो झटपट वैध जी को बुला लिया। 💞✍... " मुबारक हो ! वृषभान जी। जिस खुशी का आप बर्षों से इंतजार कर रहे थे उसने आपके द्रार पर दस्तक दे दी है ".... " रानी जी उम्मीद से है। शीघ्र ही आपके घर किलकारियां गूंजेगी। " .... वैद्य जी की बात सुनकर तो वृषभान फुले न समाए। उन्होंने दही शक्कर से वैध जी का मुंह मीठा करवाया। 💞✍... " तुम ठीक कह ती हो कीर्ति। मुझे अपने आवेश पर संयम रखना होगा। किन्तु तुम भी अषना पूरा ख्याल रख़ना अब से। मैं वैध जी को बाहर तक पहुंचाकर आता हूं। " कहते हुए वृषभान कक्ष से बाहर निकल गए वैध के साथ। और किर्तीदा आंखें मुंदकर ईश्वर को कोटि कोटि प्रणाम और धन्यवाद करने लगी। 💞✍...काल की गति ऐसी निराली होती है। यूं तो पल पल बीतता भारी लगता है। और यूं पीछे मुड़कर देखो तो लगता है समय कितनी शीध्र निकल गया। नौ महीने बीत गए। कीर्ति का पेट अब तक बहुत बढ़ गया था। कुछ नीचे झुका हुआ। नाभि के पास से एक तिरछी रेखा पेट पर से गुजर रही थी। कीर्ति रोज उसे देखती। और सोचती .... " मेरे नन्हे बालक, तुम कब मेरी गोद में आओगे। गर्भ में तुम्हें और देर सम्भाल पाना मेरे लिए निरंतर कष्टदायक होता जा रहा है। नौ मास आज पूरे हुए। दसवां माह आरम्भ हो चुका है।.... अब अपनी माता की बात मानो और इस संसार में प्रवेश करो। " 💞✍... अपनी माता की आज्ञा से दो दिन बाद ही शिशु ने गर्भ से बाहर आने का प्रयास आरम्भ किया। माता की चीख से पिता शीध्र ही उनके पास पहुंचे। दाई को कीर्ति के साथ रहने के लिए पहले ही नियुक्त किया जा चुका था। एक प्रहर असीम दर्द से जूझने के पश्चात कीर्ति ने एक सुन्दर स्वस्थ कन्या को जन्म दिया। दाई ने उसे गोद में लिया तो उसे अनंत सुख की अनुभूति हुई। किन्तु यह क्या ? कन्या को जन्म लिए इतना समय हो गया, उसने अबतक अपनी आंखें नहीं खोली। इस बात की जानकारी के साथ ही भवन में शोक का आविर्भाव हो गया। वृषभान को यह ज्ञात हुआ तो वह भी बहुत दुखी हुए। उन्होंने प्रण किया वो कहीं भी जायेंगे, परंतु अपनी गुड़िया का इलाज करवाएगे। समस्या क्या है। उसकी आंखों में कोई खराबी तो नहीं लगती, ऐसा ही प्रतीत होता है बस उसकी आंखें बंद है। जब 100 - 150 वैद्यो से भी इस समस्या का हल न मिला, ना ही यह निष्कर्ष निकला की राधा की आंखों में ज्योति है ही नहीं, तब वृषभान ने ज्योतिषियों को बुलाया। उन सभी ने एक ही बात कही, " राधा की जन्मकुण्डली में सूर्य का स्थान सही नहीं है। सूर्य उस घर में जा बैठा है जहां प्राय वह किसी कुंडली में नहीं मिलता। साथ ही उस पर राहु की संगति से उसका दुष्प्रभाव बढ़ गया है। इसी कारण राधा आंखें मूंदे है। परन्तु यह स्थिति सदा ऐसी नहीं रहेगी। शीध्र ही उसके जीवन में रोशनी आयेगी।" 💞✍... शीध्र ही एक वर्ष बीत गया। गोकुल में नंद यशोदा के घर कृष्ण का जन्म हुआ। जिसके दर्शन की प्रतीक्षा में राधा अब तक आंखे मूंदे थी। अपने माता पिता के भी दर्शन ना किए उसने। क्युकी उसे प्रतीक्षा थी, अपने युगों युगों के प्रेमी, अपने स्वामी, श्री कृष्ण के दर्शन का। जिनके साथ वो अनंतकाल से गोलोक मे निवास करती थी। किन्तु एक श्राप के कारण उन्हें धरती पर आना पड़ा। अपने स्वामी से दूर होना पड़ा। पर अब वह भी धरती पर आ चुके थे। 💞✍... पूतना, जो उन्हें मारने आई थी, उसी के स्तन का दूध पीते हुए वह बरसाना पहुंच गए। अपनी प्रेमिका के पास। उनके सामने आते ही राधा ने अपनी आंखें खोल दी। अपने स्वामी को नमस्कार किया। कीर्ति और वृषभान को ज्ञात हुआ कि अचानक उनकी पुत्री ने आंखें खोल दी, तो वह बहुत प्रसन्न हुए। गांव भर में दूध बताशे बांटे। साथ ही जो नन्हा बालक उनके आंगन में आसमान से आ गिरा था उसके माता पिता की खोज भी शुरु कर दी। पूतना का पीछा करते हुए गोकुल से नंद बाबा सहित अन्य गोकुल वासी भी बरसाना पहुंच गए। वहां कान्हा को सकुशल देखकर उन्हें बहुत संतोष हुआ। फिर वृषभान और नंद जी तो पुराने सखा थे। कुछ देर वही समय बिता कर नंद जी कृष्ण के साथ वहां से वापस चले गए। राधा, जिसने वर्ष भर मोहन की प्रतीक्षा की थी, इस पल भर के सूक्ष्म मिलन के बाद और उदास हो गई। दो दिन उसने कुछ खाया पिया नहीं। किन्तु रोया करती! भले ही वह लोकाधिनाथ के ह्रदय की स्वामिनी हो, पर अब वह धरती पर थी। इस देह के साथ ही उस पर जिन ग्रहों का प्रभाव पड़ना था उनके असर से बंधी थी। इस सृष्टि के स्वामी नारायण भी नर के रुप में उनसे उपर न थे। नियती को यही मंजूर था। राधाकृष्ण एक दूसरे के होकर भी एक दूसरे के न हो सकते थे। 💞✍... और आठ वर्ष बीत गए। राधा कृष्ण एक दूसरे को याद तो करते, मगर संसार के बंधनों में बंधे अपने सगे संबंधियों का ख्याल करके सांसारिक गतिविधियों में बंधे रहते। कृष्ण राधा को याद करके बंसी बजाया करते। राधा... कृष्ण की याद में धंटो नाचा करती। 💞✍... उधर कंस को यह शंका हो गई की उसका काल गोकुल में है। उसने पूरे गांव को आग के हवाले करवा दिया। किसी तरह सब गोकुल वासी वहां से जान बचाकर निकले और बरसाना में शरण ली। यह राधा कृष्ण के जीवन का स्वर्णिम काल था वह रोज़ एक दूसरे से मिलते। अपने हाथ से एकदूसरे को माखन मिस्र खिलाते। साथ ही खेलते, साथ ही रहते। जब गोकुल वासियों ने वृंदावन में रहने की व्यवस्था कर ली, तब भी कभी कृष्ण अपनी मित्र मंडली के साथ बरसाने आते तो कभी राधा रानी अपनी सखियों के साथ वृंदावन जाती। हंसते खेलते यह समय भी रेत की तरह फिसलता गया राधा कृष्ण यौवन की सीढ़ी चढ़ चुके थे। उनकी आयु सोलह और पंद्रह वर्ष की हो गई थी। इस अवधि में वह तो भूल ही गए थे कि उनके भाग्य में संयोग नहीं, केवल वियोग लिखा है। 💞✍... कृष्ण के लिए मथुरा से बुलावा आ गया। वहां जाकर न सिर्फ कृष्ण ने कंस का वध ही किया, अपितु एक राजकुमार के रुप में उन्हें वहीं निवास करना पड़ा। आगे आगे जीवन ने ऐसे मोड़ लिए, की उन्होंने कई राक्षसों से युद्ध किया। पोंड्रिक से लेकर जरासंघ तक। ना जाने कितने शुरवीर को उन्होंने सबक सिखाया। फिर देवी रुक्मिणी से विवाह। महाभारत का युद्ध, अन्य सात देवियों से विवाह। और नरकासुर के वध के बाद सोलह हजार एक सो स्त्रियों से विवाह। इतनी रानियां, मगर कृष्ण के ह्रदय की वास्तविक रानी राधा .... 💞✍... कृष्ण के वृंदावन से चले जाने के बाद राधा तो टूट ही गई थी। राधा एक देवी का अवतार थी। अपनी ग्रह दशा से भली भांति परिचित थी। पूर्वकाल में जो उसे श्राप मिला था, उसके कारण उसका जन्म उसी नक्षत्र और उसी ग्रहदशाओं में हुआ जहां उसे जीवन में कभी पति सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती थी। वो युग और मन्वंतर तो क्षणों कि भांति बीत गए थे। जिनमें राधा को अपने प्रिय का साथ मिला था। पर यह क्षण तो युगों से भी विकट थे, जब प्रिय का वियोग उसे सहना पड़ता था। 💞✍... कई माह बीत गए, राधा न किसीसे बात करने में कोई रुचि दिखती नहीं थी न उत्सवों में शामिल होती थी। उसकी दशा देख उसके माता पिता शोकाकुल हो जाते थे। उन्होंने बहुत प्रयास किया कि राधा सब भूल जाए। परन्तु हर प्रयास विफल हो जाता। किर्तीदा ने राधा को बहुत समझाया, " बिटिया, कृष्ण मथुरा का राजकुमार है। उंचे घराने वाला तू गांव की छोरी। तेरा और कृष्ण का कोई मेल नहीं है। फिर तु जानती ही है, पिछले माह कृष्ण का विवाह देवी रुक्मिणी से हो गया है। वह स्वयं रथ लेकर देवी को लेने पहुंचा। उनके भाई से कैसा भयंकर युद्ध भी किया। तुझसे उसे प्रेम होता तो क्या वह तुझे लेने नहीं आता ?... तु भी उसे भूल जा बेटी। तु हमारी आंखों का तारा है। तेरे लिए एक से एक वर देखेंगे हम। अपनी सामर्थ्य के अनुसार तेरे लिए योग्य वर का चयन करेगें हम। भुल जा तू कृष्ण को।" माता के लिए यह सब कहना सरल था। पुत्री के लिए उसे निभाना बेहद कठिन । कृष्ण को सोलह हजार एकसो आठ स्त्रियों से मिलना सरल था, राधा से मिलना बेहद कठिन था। राधा के लिए जीवन भर वियोगिनी बने रहना सरल था, किसी अन्य की पत्नी बनना कठिन। किन्तु इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की कहां चलती है ? होना वहीं था जो राधा के पिता वृषभान को मंजूर था। जैसे जैसे कृष्ण के विवाहों की सुचना आती, राधा और टूट जाती। उसे देख उसके पिता उसके विवाह की तैयारीयां और तेज कर देते। आखिरकार उन्होंने राधा के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश पूर्ण कर ही ली। लड़का छेल छबीला था। सुन्दर ह्र्ष्ट पुष्ट शरीर का स्वामी। घर में हजारों गाय भेंस थी। विशाल भूमि का स्वामी था। महलनुमा आवास था उसका। वृषभान को वह युवक बहुत पसंद आया। उससे राधा के विवाह की बात चलाई गई। बात पक्की भी हो गई। लेकिन राधा इस विवाह के लिए तैयार न थी। रो रोकर उसकी आंखें सुज गई थी। 💞✍... कृष्ण से खिन्न थी ही, माता पिता से भी रुष्ट हो गई। और युवक, जिस से उसका विवाह निर्धारित हुआ था उसे तो दिल से नफरत करने लगी। फिर भी, पिता के आगे उसकी एक नहीं चली। वृषभान ने उस युवक से राधा का विवाह करवा दिया। परंतु वह भुल गये थे, राधा की कुंडली में उसके पति सुख स्थान को सभी ग्रह वक्र दृष्टि से देख रहें है। वह सुख राधा के जीवन में था ही नहीं। क्युकी कृष्ण उसके जीवन में नहीं था। विवाह के पहले ही दिन राधा ने अपने पति से साफ कह दिया, " यह विवाह मेरी इच्छा से नहीं हुआ है, मेरे मन मंदिर के स्वामी सिर्फ कृष्ण है। मैं उन्हीं की अर्धागीनी हूं। उनके सिवा मैंने अपने मन में किसी को स्थान नहीं दिया। वही मेरे पति है। और मैं उसकी पतिव्रता स्त्री हूं। यदि तुमने मुझे छुआ भी, तो तुम मेरे तप से जलकर भस्म हो जाओगे। " 💞✍... इसके बाद उनके पति ने कभी न उन्हें छुआ, न उनके करीब आने का प्रयास किया उन्होंने पूरा जीवन कृष्ण को समर्पित कर दिया था। दिन रात उन्ही का नाम जपा। इतनी दूरियों के बाद भी, कृष्ण को अपने ह्रदय में बसाए रखा। और अंतकाल में जब धरती से विदा हुई तो गोलोक जाकर द्वारिकाधीश की आने की प्रतीक्षा की। जब द्वारिकाधीश ने मृत्युलोक से विदा ली, तब अपने अर्धांग से मिलकर राधा पूर्ण हुई। 💖💓💖 जय श्री राधे राधे जी 💖💓💖

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आदि शंकराचार्य जयंती : आदि शंकराचार्य कौन थे, चार मठों की अहम जानकारी सनातन संस्कृति के उत्थान और हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार का श्रेय आदि गुरु शंकराचार्य को दिया जाता है। धर्मगुरू और प्रचारक उन्हे शिव अवतार भी मानते हैं। वेद-शास्त्रों के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने देशभऱ की यात्रा की और जनमानस को हिंदू धर्म और संस्कारों के बारे में बताया। उनके दर्शन ने सनातन संस्कृति को एक नई पहचान दी और भारतवर्ष के कोने कोने तक उन्होंने लोगों को वेदों के अहम ज्ञान से अवगत कराया। इससे पहले धर्मविरोधी यह भ्रामक प्रचार कर रहे थे कि वेदों का कोई प्रमाण नहीं है और तीर्थाटन से कोई धर्म लाभ नहीं होता है इस तरह के दुष्प्रचार से सनातन धर्मावलंबियों में धर्म का असर तो कम हुआ ही साथ ही लोग धर्म से दूर होने लगे थे, जिससे सनातन संस्कृति का वजूद संकट में पड़ गया था । यज्ञ, पूजा-पाठ, हवन, तीर्थयात्रा आदि बंद होने लग गए थे। ऐसे मुश्किल हालात में केरल में एक अद्भुत बालक शंकर का जन्म हुआ जो बाद में आद्यशंकराचार्य के नाम से जगत में प्रसिद्ध हुआ। मान्यता है कि जगदगुरू आदिशंकराचार्य का जन्म ढाई हजार वर्ष पूर्व हुआ था। आद्यशंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि अष्टवर्षे चतुर्वेदी, द्वादशे सर्वशास्त्रविद् । षोडषे कृतवान भाष्यं, द्वात्रिशे मुनिरभ्यगात ।। आठ वर्ष की उम्र में चार वेदों का ज्ञान, बारह वर्षों में सभी शास्त्रों का ज्ञान, सोलह वर्षों में भाष्य रचना और बत्तीस वर्ष की उम्र में महाप्रयाण । शंकराचार्य का जीवनकाल सिर्फ 32 साल का था। इस छोटी सी उम्र में उन्होंने तीर्थ, वर्ण, आश्रम आदि सनातन संस्कृति की व्यवस्थाओं को स्थापित कर वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की । उनकी बनाई गई व्यवस्था अभी भी संतों और हिंदू समाज का मार्गदर्शन करती है। देश के चार कोनों में की चार पीठों की स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने देश के चार कोनों में शंकराचार्य की चार पीठों की स्थापना की थी। इन चार पीठों पर चार शंकराचार्य भी नियुक्त किए गए। इसके लिए उन्होंने कुछ शास्त्रोक्त नियमों को बनाया था। आज भी शंकराचार्य के पद पर किसी संत की नियुक्ति करते समय इन नियमों का कुछ हद तक ख्याल रखा जाता है। शंकराचार्य का पद धारण करने के लिये संन्यासी को सनातन संस्कृति का प्रकांड विद्वान होना चाहिये । संन्यासी को जितेंद्रीय होने के साथ उनके पास वैदिक में पीएचडी या आचार्य की डिग्री होना आवश्यक है । वेद, पुराण, उपनिषदों और शास्त्रोक्त ग्रंथों की विस्तृत जानकारी होना चाहिये । शंकराचार्य के पद पर पहुंचने के लिए कठोर कसौटियों पर से खरा उतरना होता है। कठिन तपस्या और त्याग को तो परखा ही जाता है साथ ही गहन शास्त्रार्थ से भी गुजरना होता है। कठोर नियम है शंकराचार्य के पद के शंकराचार्य का शास्त्रार्थ विभिन्न शास्त्रीय विधाओं में महारत रखने वाले 14 विद्वानों के समक्ष होता है । शास्त्रार्थ में निपुणता से ही शंकराचार्य पद का मार्ग प्रशस्त होता है ।ये 14 विद्वान व्याकरण, वेद, निरुक्त, छंद, साहित्य, न्यास, मीमांसा, योग, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद, श्रीमद्भागवत जैसी विधाओं के प्रकांड पंडित होते हैं । शंकराचार्य परंपरा का मुख्य केंद्र काशी है जहां पर मान्यता है कि ढाई हजार वर्ष पूर्व आद्य शंकराचार्य और वेदव्यास के बीच 16 दिन तक शास्त्रार्थ हुआ था । ऋग्वेद में देवताओं की स्तुति की गई है और विश्व की शक्तियों की विस्तृत विवेचना की गई है । यजुर्वेद में कर्म का गुणगान किया गया है और श्रेष्ठतम कर्म का आदेश है । इसलिये इसको कर्मकांड का वेद कहा गया है ।सामवेद में पूजा और आराधना की जानकारी दी गई है इसलिये इसको उपासना काण्ड का वेद बताया गया है । अथर्ववेद में ज्ञान, कर्म और उपासना का मेल है इसलिये इसको ब्रह्मवेद की उपमा दी गई है । आद्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा और प्रसार के लिए देश की चार दिशाओं में चार पीठ की स्थापना की थी। चारों पीठों के प्रमुख शंकराचार्य होते हैं। मठान्मय ग्रंथ के अनुसार चारों पीठों की परंपराए इस प्रकार है। शारदा मठ - द्वारका दिशा - पश्चिम पारंपरिक संप्रदाय - तीर्थ और आश्रम वर्तमान में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 79वें शंकराचार्य के रूप में गद्दी पर आसीन। दशनामी में वे सरस्वती संप्रदाय से हैं जबकि इस पीठ पर तीर्थ और आश्रम संप्रदाय के शंकराचार्य की परंपरा रही है। ज्योतिर्मठ - बद्रिका दिशा - उत्तर पारंपरिक संप्रदाय - गिरि,पर्वत व सागर वर्तमान में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती इस पीठ के शंकराचार्य है। गोवर्धन मठ - पुरी दिशा - पूर्व पारंपरिक संप्रदाय - अरण्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती इस पीठ के शंकराचार्य है। निश्चलानंदजी सरस्वती संप्रदाय से हैं। श्रृंगेरी मठ - रामेश्वरम् दिशा - दक्षिण पारंपरिक संप्रदाय - सरस्वती, भारती व पुरी वर्तमान में इस पीठ पर स्वामी भारतीकृष्ण 36वें शंकराचार्य हैं।

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🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳 🔱 !! जय माता दी !! 🔱 🇮🇳 वंदे मातरम 🇮🇳 💙💙 आद्य शक्ति माँ भवानी की भक्ति मय दिन शुक्रवार का आप सभी आदरणीयो को ❤🙏🏻 सादर प्रणाम 🙏🏻❤ 💙💙 💥💛💥 आपका दिन शुभ एवं मंगलमय रहें 💥💛💥 💞❣💞 जय महालक्ष्मी माँ 💞❣💞 💚💥💚.... " स्वार्थी " ....💚💥💚 💛✍... कैसी माँ हो तुम? अपने ही बेटे बहू और पोते को घर से बाहर निकाल रही हो। बिल्कुल भी दया नहीं आई कि इस मुश्किल की घड़ी में जबकि तुमने अपना पति खोया है तो उसने भी अपना पिता खोया है और तुम हो कि उसे ढांढस बंधाने के बजाय घर से निकाल रही हो। सविता अब आलोक के जाने के बाद तुम्हारा बेटा सुधीर ही तो तुम्हारा ख्याल रखेगा। " भाई साहब मुझे समझाते जा रहे थे।" तुम इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हो? अभी आलोक को गुजरे 15 दिन ही हुए है और और तुम कैसी बातें करने लगी हो ? तुम्हें पता है कै ना कि इस घर को बनवाते वक्त आलोक ने हर चीज में सुधीर की पसंद का कितना ख्याल रखा था ? वो तो हमेशा से ही यही कहता कि भाई साहब हमने तो अपनी जिन्दगी गुजार दी अब जब सुधीर को ही आगे इस घर में रहना है तो उसकी पसंद भी मायने रखती है ना और तुम उसी सुधीर को अपने बेटे को उसी घर से बाहर निकाल रही हो। आखिर हो क्या गया है तुम्हें? बुढ़ापे में जब माँ बाप बच्चों को अपने पास रखने के लिए तरसते है तुम हो कि उसे खुद से इस घर से दूर कर रही हो तुमसे ये उम्मीद नहीं थी सविता " भाई साहब अब भी मुझे समझाने की कोशिश कर रहे थे।" स्वार्थी हो रही हूं मै। यही कहा ना भाई साहब आपने " मैने चिल्लाते हुए कहा " हां हूं मै स्वार्थी और अगर आलोक भी थोडे स्वार्थी होते तो शायद आज हमारे बीच होते जिंदा । " सभी मेरा चेहरा देख रहे थे। " आप लोग जानना चाहते है कि क्यों मैं निकलना चाहती हूं मेरे इकलौते बेटे को इस घर से ? तो सुनिए सारी जिंदगी निकाल दी आलोक और मैने अपने बेटे को एक अच्छा जीवन देने के लिए। अपनी हर ख्वाहिश को मारा इसकी इक इच्छा पूरी करने के लिए। बचपन में जब ये कुछ भी मांगता था ना तो आलोक जबतक उसे वो चीज लिकर नहीं देते तबतक आलोक को चैन नहीं पडता। हमने हमेशा खुद को भूल कर इसे खुशी देनी चाही। इसके बचपन से लेकर जवानी तक हम दोनो ने ही सुधीर में ही अपना जीवन जीया। आप जानते है कि आलोक अपने गाँव में एक स्कूल बनवाना चाहते थे वो रिटायरमेन्ट के बाद वही जिन्दगी जीना चाहते थे लेकिन सुधीर की विदेश जाने की जिद के आगे हार मान कर उन्होंने गाँव की जमीन बेच दी ताकि सुधीर का सपना ना टूटे। आलोक हमेशा यही कहते कि " देखना मेरा प्यार सुधीर को वापस ले आयेगा। " लेकिन वो ये भूल गए थे कि हमारा सुधीर अब हमारा नहीं रहा वो तो सिर्फ अपने लिए जीने लगा था। उसने वहीं अपनी पसंद की लड़की से शादी कर ली हमें पूछा तक नही। पूछना तो छोडिये बताया तक नहीं और बताया भी कब ? जब उसे वहां अपने परिवार के लिए घर खरीदने के लिए पैसे चाहिए थे। मैं आलोक को कितना समझाती थी अपनी सारी जमा पूंजी सुधीर पर मत लुटाओ क्योंकि मुझे यकीन हो गया था कि सुधीर अब अपने बारे में सोचने लगा है वो स्वार्थी हो गया है लेकिन आलोक नहीं माने उन्होंने अपनी सारी जमा पूंजी दे दी इसे ताकि वे घर खरीद सके। ऐसा घर जिसमें मेरे और आलोक के लिए भी जगह हो लेकिन भाई साहब जब उसके दिल में ही हमारे लिए जगह नहीं बची थी तो घर में कहाँ से होगी? खैर फिर भी हम अपनी जिंदगी जी रहे थे लेकिन दो साल पहले जब पते चला कि आलोक को कैंसर तो वो टूट गये वो सिर्फ़ ऐसी मुश्किल घड़ी में सुधीर को अपने पास चाहते थे लेकिन इसके पास समय ही कहाँ था ? जब मैने इससे इलाज के लिए पैसे मांगे तो याद है सुधीर तुने क्या कहा था " माँ इस बीमारी से कोई बच पाया है अब तक ? इतने महंगे इलाज पर पैसे खर्च करना फिजूल है। वैसे भी यहां मेरे खर्च ही पूरे नहीं हो पाते। मैं पैसे नहीं दे सकता।" अरे जिसने तेरी जिन्दगी संवारने के लिए अपने आप बर्बाद कर लिया तेरा भविष्य बनाने के लिए अपना आज और कल दोनों तुझ पर कुर्बान कर दिये और तु ...अहसान फरामोश अपने बाप के आखिरी दिनों में भी अपने बारे में सोच रहा था अगर आलोक सारी जमा पूंजी तेरे पर खर्च नहीं करते ना तो उनका अच्छा इलाज हो जाता।" मै जैसे आज सब कुछ बोल देना चाहती थी। मैने सुधीर की तरफ अपना रुख किया। " ये जो आज इस घर में रहना चाहता है ना वो इस लिए नहीं की इसे घर की या मेरी चिंता है बल्कि इसलिए है क्योंकि इसे उस विदेश ने भी स्वीकार नहीं किया। जब वहां से निकाल दिया तो इसे हमारी याद आ गई।" भय्या मैं नहीं भूल सकती आलोक की वो दरवाजे को ताकती आंखे जो हर पल यही उम्मीद लगा रही थी कि बस अब इस पल उनका सुधीर उनके पास आयेगा लेकिन हर पल बढ़ती मायूसी ने औनकी जीने की इच्छा ही खत्म कर दी। आलोक को बीमारी ने नहीं मारा उन्हें उनके अपने बेटे की बेरुखी ने मारा है। अब मैने फैसला कर लिया है इस घर को बेच कर जो पैसे मिलेंगे उनसे आलोक की इच्छा पूरी करुंगी गांव में स्कूल बनवाने की इच्छा और मैं भी अपनी बची हुई सारी जिन्दगी वहीं बिताऊंगी। अगर बच्चे अपने लिए सोचते है, स्वार्थी बन जाते है और वो गलत नहीं माने जाते तो हम माँ बाप को भी हक है स्वार्थी होने का और मैं वही बन गई हूँ " स्वार्थी " 🌺🌺 शुभ मंगल कामनाओ सहित 🌺🌺

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कांची कैलासनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है जो पश्चिमी सीमा पर तमिलनाडु के कांचीपुरम में वेदवती नदी के तट पर स्थित है। यह मंदिर हिंदू धर्म के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। बता दें कि वैसे तो इस मंदिर में पूरे वर्ष बड़ी संख्या में भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि के समय भक्तों की संख्या में भारी वृद्धि होती है। मंदिर का प्रमुख आकर्षण सोलह शिव लिंगम है जो मुख्य मंदिर में काले ग्रेनाइट से बने हैं। कांची कैलासनाथ मंदिर सुंदर चित्रों और शानदार मूर्तियों से सजा हुआ है जिसकी यह किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है। कांची कैलासनाथ मंदिर तमिलनाडु का एक बेहद प्राचीन मंदिर है और उन मंदिरों में सबसे पुराना है जो 685 ईस्वी और 705 ईस्वी के दौरान बनाए गए थे। इस आकर्षक मंदिर का निर्माण पल्लव शासक राजसिंह द्वारा शुरू किया गया था और उनके पुत्र महेंद्र वर्मा पल्लव ने पूरा किया था। कांची कैलासनाथ मंदिर द्रविड़ शैली की वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, इसे बलुआ पत्थर से तराश कर बनाया गया है। यह मंदिर इतना आकर्षक है कि इसकी स्थापत्य सुंदरता तमिलनाडु के अन्य सभी मंदिरों से अलग है। अगर आप कांची कैलासनाथ मंदिर के बारे में अन्य जानकारी चाहते हैं तो इस लेख को अवश्य पढ़ें। इस लेख के माध्यम से हम आपको मंदिर की धार्मिक यात्रा पर ले जा रहें हैं। पल्लव वंश ने कांचीपुरम में अपना राज्य स्थापित किया था जिसे कांची या शिव विष्णु कांची के नाम से जाना जाता है। सम्राट नरसिंहवर्मन प्रथम के द्वारा कई मंदिर का निर्माण किया गया था जिसमें से तिरु परमेस्वर विन्नगरम और कांची कैलाशनाथर मंदिर सबसे ज्यादा आकर्षक है। कांची कैलासनाथ मंदिर का निर्माण 685 A.D से 705 A.D के दौरान हुआ था। यह मंदिर नरसिंहवर्मन प्रथम द्वारा दक्षिण भारत में बनाया गया पहला संरचनात्मक मंदिर है, जिसे राजसिम्हा पल्लवेश्वरम् के नाम से भी जाना जाता है। बाद में उनके बेटे महेंद्रवर्मन तृतीय मंदिर के सामने के हिस्से और टॉवर का निर्माण पूरा किया। कांची कैलासनाथ मंदिर का निर्माण पारंपरिक द्रविड़ शैली की शैली में किए गया है जो देखने में बेहद आकर्षक है। मंदिर की नींव ग्रेनाइट से बनी है। कैलासनाथ मंदिर की बाहरी संरचना और नक्काशी सभी बलुआ पत्थर से निर्मित है। मंदिर में अड़तालीस छोटे छोटे मंदिर हैं, जो मुख्य मंदिर को घेरने वाली दीवार से लगे हुए हैं। यहां मुख्य मंदिर में देवी पार्वती और भगवान शिव की विभिन्न नृत्य रूपों में नक्काशी की गई है। छोटे मंदिरों के अलावा यहां परिसर में एक मुख्य हॉल, एक प्रवेश द्वार भी देखा जा सकता है जिसे गोपुरम के रूप में जाना जा सकता है। इसके अलावा मंदिर के स्तंभों पर शेरों की मूर्तियाँ देखी जा सकती है जो अपने पैरों पर खड़ी हैं। मुख्य मंदिर या गर्भगृह में काले ग्रेनाइट में बने 16 शिवलिंग हैं।

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🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳 !! जय श्री गणेश!! 🇮🇳 वंदे मातरम 🇮🇳 ❤❤ प्रथम पूजनीय श्री गौरी पूत्र गणेश जी के दिन बुधवार का आप सभी को ❤❤ 🙏🏻 स्नेहिल वंदन जी 🙏🏻 ❤❤ 💙💙💙 आप और आपके परिवार पर श्री अष्टविनायक की कृपा और आशीर्वाद सदैव बना रहें 💙💙💙 💗❣💗 आपका हर पल प्रसन्नता भरा एवं सुखमय रहें 💗❣💗 💛⚜💛 ओम गं गणपतये नमः 💛⚜💛 ❤🌷❤ जय श्री राधे कृष्ण जी ❤🌷❤ --▪︎▪︎¤¤○○●●□□●●○○¤¤••-- 💝👉- किसी रिश्ते में निखार, 💝👉- सिर्फ अच्छे समय में हाथ 💝👉- मिलाने से नहीं आता। 💞✍.... " बल्कि " ....✍💞 💝👉- नाज़ुक समय में हाथ 💝👉- थामने से आता है। 💝👉- कुछ लोग “ ज़िन्दगी ” होते हैं, 💝👉- कुछ लोग “ ज़िन्दगी ” में होते हैं। 💝👉- कुछ लोगों से “ ज़िन्दगी ” होती है, 💞✍.... “ पर ” ....✍💞 💝👉- कुछ “ लोग होते " हैं तो " जिंदगी ”होती है। 💞... जब श्री कृष्ण महाभारत के युद्ध पश्च्यात लौटे तो रोष में भरी रुक्मिणी ने उनसे पूछा.... 💞..." बाकी सब तो ठीक था किंतु आपने द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसै धर्म परायण लोगों के वध में क्यों साथ दिया ? " 💞... श्री कृष्ण ने उत्तर दिया ... " यह सही है कि उन दोनों ने जीवन पर्यंत धर्म का पालन किया किन्तु उनके किये पाप ने उनके सारे पुण्यों को हर लिया" 💞... वो कौन से पाप थे ? 💞...श्री कृष्ण ने कहा :- " जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था तब यह दोनों भी वहां उपस्थित थे, और बड़े होने के नाते ये दुशासन को आज्ञा भी दे सकते थे किंतु इन्होंने ऐसा नहींकिया... इनका इस एक पाप से बाकी धर्मनिष्ठा छोटी पड गई " 💞... रुक्मणी ने पूछा, " और कर्ण ? वो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था, कोई उसके द्वार से खाली हाथ नहीं गया उसकी क्या गलती थी ? " 💞... श्री कृष्ण ने कहा :- " वस्तुत: वो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध था और उसने कभी किसी कोना नहीं कहा, किंतु जब अभिमन्यु सभी युद्घवीरों को धूल चटाने के बाद युद्धक्षेत्र में आहत हुआ भूमि पर पड़ा था तो उसने कर्ण से, जो उसके पास खड़ा था, पानी माँगा कर्ण जहाँ खड़ा था उसके पास पानी का एक गड्ढा था किंतु कर्ण ने मरते हुए अभिमन्यु को पानी नहीं दिया! इसलिए उसका जीवन भर दानवीरता से कमाया हुआ पुण्य नष्ट हो गया। बाद में उसी गड्ढे में उसके रथ का पहिया फंस गया और वो मारा गया " --•••▪︎▪︎▪︎¤¤¤《□💛□》¤¤¤▪︎▪︎▪︎•••-- 💛✍...अक्सर ऐसा होता है कि हमारे आसपास कुछ गलत हो रहा है और हम कुछ नहीं करते। 💛✍... हम सोचते है की इस पाप के भागी हम नहीं है किंतु मदद करने की स्थिति में होते हुए भी कुछ ना करने से हम उस पाप के उतने ही हिस्सेदार हो जाते है। 💛✍...हमारे अधर्म का एक क्षण सारे जीवन के कमाये धर्म को नष्ट कर सकता है। 💝💖💝 ‼ जय श्री कृष्ण ‼💝💖💝

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एक बार शरद पूर्णिमा की शरत-उज्ज्वल चाँदनी में वंशीवट यमुना के किनारे श्याम सुंदर साक्षात मन्मथनाथ की वंशी बज उठी। श्रीकृष्ण ने छ: मास की एक रात्रि करके मन्मथ का मानमर्दन करने के लिए महारास किया था। जब महारास की गूंज सारी त्रिलोकी में गई तो हमारे भोले बाबा के कानों में भी महारास की गूंज गई। मनमोहन की मीठी मुरली ने कैलाश पर विराजमान भगवान श्री शंकर को मोह लिया, समाधि भंग हो गयी। बाबा वृंदावन की ओर बावरे होकर चल पड़े।  पार्वती जी भी मनाकर हार गयीं, किंतु त्रिपुरारि माने नहीं। भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त श्री आसुरि मुनि, पार्वती जी, नन्दी, श्रीगणेश, श्रीकार्तिकेय के साथ भगवान शंकर वृंदावन के वंशीवट पर आ गये। वंशीवट जहाँ महारास हो रहा था, वहाँ गोलोकवासिनी गोपियाँ द्वार पर खड़ी हुई थीं। पार्वती जी तो महारास में अंदर प्रवेश कर गयीं, किंतु द्वारपालिकाओं ने श्रीमहादेवजी और श्रीआसुरि मुनि को अंदर जाने से रोक दिया, बोलीं, श्रेष्ठ जनोंश्रीकृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष इस एकांत महारास में प्रवेश नहीं कर सकता। श्री शिवजी बोले: देवियों! हमें भी श्रीराधा-कृष्ण के दर्शनों की लालसा है, अत: आप ही लोग कोई उपाय बतलाइये, जिससे कि हम महाराज के दर्शन पा सकें? ललितानामक सखी बोली: यदि आप महारास देखना चाहते हैं तो गोपी बन जाइए। मानसरोवर में स्नान कर गोपी का रूप धारण करके महारास में प्रवेश हुआ जा सकता है। फिर क्या था, भगवान शिव अर्धनारीश्वर से पूरे नारी-रूप बन गये। श्रीयमुना जी ने षोडश श्रृंगार कर दिया, तो सुन्दर बिंदी, चूड़ी, नुपुर, ओढ़नी और ऊपर से एक हाथ का घूँघट भी भगवान शिव का कर दिया। साथ में युगल मन्त्र का उपदेश भगवान शिव के कान में किया हैं। प्रसन्न मन से वे गोपी-वेष में महारास में प्रवेश कर गये। श्री शिवजी मोहिनी-वेष में मोहन की रासस्थली में गोपियों के मण्डल में मिलकर अतृप्त नेत्रों से विश्वमोहन की रूप-माधुरी का पान करने लगे। नटवर-वेषधारी, श्रीरासविहारी, रासेश्वरी, रसमयी श्रीराधाजी एवं गोपियों को नृत्य एवं रास करते हुए देख नटराज भोलेनाथ भी स्वयं ता-ता थैया कर नाच उठे। मोहन ने ऐसी मोहिनी वंशी बजायी कि सुधि-बुधि भूल गये भोलेनाथ। बनवारी से क्या कुछ छिपा है।  भगवान कृष्ण शिव के साथ थोड़ी देर तो नाचते रहे लेकिन जब पास पहुंचे तो भगवान बोले की रास के बीच थोड़ा हास-परिहास हो जाएं तो रास का आनंद दोगुना हो जायेगा। भगवान बोले की अरी गोपियों तुम मेरे साथ कितनी देर से नृत्य कर रही हो लेकिन मैंने तुम्हारा चेहरा देखा ही नहीं हैं। क्योंकि कुछ गोपियाँ घूंघट में भी हैं। गोपियाँ बोली की प्यारे आपसे क्या छुपा हैं? आप देख लो हमारा चेहरा। लेकिन जब भगवान शंकर ने सुना तो भगवान शंकर बोले की ये कन्हैया को रास के बीच क्या सुझा, अच्छा भला रास चल रहा था मुख देखने की क्या जरुरत थी। ऐसा मन में सोच रहे थे की आज कन्हैया फजती पर ही तुला हैं। भगवान कृष्ण बोले की गोपियों तुम सब लाइन लगा कर खड़ी हो जाओ। और मैं सबका नंबर से दर्शन करूँगा। भगवान शिव बोले अब तो काम बन गया। लाखों करोड़ों गोपियाँ हैं। मैं सबसे अंत में जाकर खड़ा हो जाऊंगा। कन्हैयाँ मुख देखते देखते थक जायेगा। और मेरा नंबर भी नही आएगा। सभी गोपियाँ एक लाइन में खड़ी हो गई। और अंत में भगवान शिव खड़े हो गए। जो कन्हैया की दृष्टि अंत में पड़ी तो कन्हैया बोले नंबर इधर से शुरू नही होगा नंबर उधर से शुरू होगा। भगवान शिव बोले की ये तो मेरा ही नंबर आया। भगवान शिव दौड़कर दूसरी और जाने लगे तो भगवान कृष्ण गोपियों से बोले गोपियों पीछे किसी गोपी का मैं मुख दर्शन करूँगा पहले इस गोपी का मुख दर्शन करूँगा जो मुख दिखने में इतनी लाज शर्म कर रही हैं। इतना कहकर भगवान शिव दौड़े और दौड़कर भगवान शिव को पकड़ लिया। और घूँघट ऊपर किया और कहा आओ गोपीश्वर आओ। आपकी जय हो। बोलिए गोपेश्वर महादेव की जय। शंकर भगवान की जय।। श्रीराधा आदि श्रीगोपीश्वर महादेव के मोहिनी गोपी के रूप को देखकर आश्चर्य में पड़ गयीं। तब श्रीकृष्ण ने कहा: राधे, यह कोई गोपी नहीं है, ये तो साक्षात् भगवान शंकर हैं। हमारे महारास के दर्शन के लिए इन्होंने गोपी का रूप धारण किया है।  तब श्रीराधा-कृष्ण ने हँसते हुए शिव जी से पूछा, भगवन! आपने यह गोपी वेष क्यों बनाया? भगवान शंकर बोले: प्रभो! आपकी यह दिव्य रसमयी प्रेमलीला-महारास देखने के लिए गोपी-रूप धारण किया है।  इस पर प्रसन्न होकर श्रीराधाजी ने श्रीमहादेव जी से वर माँगने को कहा तो श्रीशिव जी ने यह वर माँगा: हम चाहते हैं कि यहाँ आप दोनों के चरण-कमलों में सदा ही हमारा वास हो। आप दोनों के चरण-कमलों के बिना हम कहीं अन्यत्र वास करना नहीं चाहते हैं। इसके बाद सुन्दर महारास हुआ हैं। भगवान कृष्ण ने कत्थक नृत्य किया हैं और भगवान शिव ने तांडव। जिसका वर्णन अगर माँ सरस्वती भी करना चाहे तो नहीं कर सकती हैं। खूब आनंद आया हैं। भगवान कृष्ण ने ब्रह्मा की एक रात्रि ले ली हैं। लेकिन गोपियाँ इसे समझ नही पाई। केवल अपनी गोपियों के प्रेम के कारण कृष्ण ने रात्रि को बढाकर इतना दीर्घ कर दिया। गोपियों ने एक रात कृष्ण के साथ अपने प्राणप्रिय पति के रूप में बिताई हैं लेकिन यह कोई साधारण रात नही थी। ब्रह्मा की रात्रि थी और लाखों वर्ष तक चलती रही। आज भी वृन्दावन में निधिवन में प्रतिदिन भगवान कृष्ण रास करते हैं। कृष्ण के लिए सब कुछ करना संभव हैं। क्योंकि वो भगवान हैं। इस प्रकार भगवान ने महारास लीला को किया हैं। शुकदेव जी महाराज परीक्षित से कहते हैं राजन जो इस कथा को सुनता हैं उसे भगवान के रसमय स्वरूप का दर्शन होता हैं। उसके अंदर से काम हटकर श्याम के प्रति प्रेम जाग्रत होता हैं। और उसका ह्रदय रोग भी ठीक होता हैं। रास पंचाध्यायी का आखिरी श्लोक इस बात की पुष्टि भी करता है। विक्रीडितं व्रतवधुशिरिदं च विष्णों: श्रद्धान्वितोऽनुुणुयादथवर्णयेघः भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वहिनोत्यचिरेण धीरः भगवान श्रीकृष्ण ने तथास्तु कहकर कालिन्दी के निकट निकुंज के पास, वंशीवट के सम्मुख भगवान महादेवजी को श्रीगोपेश्वर महादेव के नाम से स्थापित कर विराजमान कर दिया। श्रीराधा-कृष्ण और गोपी-गोपियों ने उनकी पूजा की और कहा कि ब्रज-वृंदावन की यात्रा तभी पूर्ण होगी, जब व्यक्ति आपके दर्शन कर लेगा। आपके दर्शन किये बिना यात्रा अधूरी रहेगी। भगवान शंकर वृंदावन में आज भी गोपेश्वर महादेव के रूप में विराजमान हैं और भक्तों को अपने दिव्य गोपी-वेष में दर्शन दे रहे हैं। गर्भगृह के बाहर पार्वतीजी, श्रीगणेश, श्रीनन्दी विराजमान हैं। आज भी संध्या के समय भगवान का गोपीवेश में दिव्य श्रृंगार होता है।

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