भगवान् श्रीहरि के अवतारों की कोई गणना नहीं कर सकता! अनेकों जन्मों तपस्या के फल स्वरूप ये सम्भव है पृथ्वी की रज कणों को गिन ले किंतु श्रीहरि के नाम,अवतार और लीलाओं को नहीं गिन सकता ! किंतु भगवान वेद व्यास जी ने भगवान् के २४ प्रमुख अवतार बताए हैं ! किंतु २२ अवतारों का ही सही क्रम दे पाते हैं ! कोई २४ अवतारों को पूर्ण करने के लिए हंय,हयग्रीव तो कोई हरि,प्रश्निगर्भ आदि अवतारों बीच में जो कर २४ की गणना करते हैं ! किंतु ऐसा करने पर एक तो क्रम गड़बड़ हो जाता है दूसरा भगवान् व्यासजी जैसे त्रिकालदर्शी पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं ! जवकि भगवान् व्यासजी ने स्पष्ट २४ अवतारों का उल्लेख किया है! आद्यावतार "एष ह्येशेषसत्त्वानामात्मांश: परमात्मन:! आद्योSवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते!! अर्थात् -यह विराट पुरूष ही प्रथम जीव होने के कारण समस्त जीवों का आत्मा ,जीव रूप होने के कारण भगवान् का आदि-अवतार है! यह सम्पूर्ण भूत समुदाय इसी में प्रकाशित होता है!! (भा ०३/६/८) द्वितीय अवतार तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णु: प्रावीविशत्सर्वगणावभासम् ! तस्मिन् स्वयं वेदमयो विधाता स्वयम्भुवं यं स्म वदन्ति सोSभूत्! " सम्पूर्ण गणों को प्रकाशित करने वाले उस सर्व लोकमय कमल में वे विष्णु भगवान् ही अन्तर्यामी रूप से प्रविष्ट हो गये! तब उसमें से बिना पढाये ही स्वयं सम्पूर्ण वेदों के जानने वाले साक्षात् वेदमूर्ति श्रीब्रह्माजी प्रकट हुए,जिन्हें लोग स्वयम्भू कहते हैं!! (भा०३/८/१५) ये भगवान् के २ अवतार हैं जो आद्यावतार ओर गुणावतार(ब्रह्माजी को हिरण्यगर्भ अवतार कहा जाता है ) हैं इसके वाद क्रमश: २२ लीलावतार हैं १ लीलावतार - स एव प्रथमं देव: कौमारं सर्गमास्थित: ! चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम्!! "उन्हीं प्रभु ने पहले कौमार सर्ग में सनक,सनन्दन,सनातन और सनत्कुमार -इन चार ब्राह्मणों के रूपमें अवतार ग्रहण करके अत्यन्त कठिन अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया!! (भा १/३/६) २ अवतार द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम्! उद्धरिष्यन्नुपादत्त यज्ञेश : सौकरं वपु: !! "दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिए समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान् ने ही रसातल में गयी हुई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर रूप ग्रहण किया!! (भा १/३/७) ३ *अवतार तृतीयमृषिसर्गं च देवर्षित्वमुपेत्य स: ! तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यत: !! " ऋषियोंकी सृष्टिमें उन्होंने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततन्त्रका (नारद-पाञ्चरात्र )उपदेश किया , उसमें कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्मबन्धन से मुक्ति मिलती है ,इसका वर्णन है (भा ०१/३/८) ४ अवतार तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी! भूत्वाSSत्मोपशमोपेतकरोद् दुश्चरं तप: !! "धर्म पत्निमूर्ति के गर्भ से उन्होंने नर-नारायण के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया! इस अवतार में उन्होंने ऋषिबनकर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम करके बडी कठोर तपस्या की!! (भा०१/३/९) ५ अवतार पञ्चम: कपिलो नाम सिद्धेश: कालविप्लुतम्! प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् !! "पाँचवें अवतार में वे सिद्धों के स्वामी कपिल के रूप में प्रकट हुए और तत्त्वों का निर्णय करने वाले सांख्य-शास्त्र का ,जो समय के फेर के साथ लुप्त हो गया था ,आसुरि नामक ब्राह्मणों को उपदेेश किया! (भा ०१/३/१०) ६ अवतार षष्ठे अत्रेरपत्यत्वं वृत: प्राप्तोSनसूयया! आन्वीक्षिकीमलर्काय. प्रह्रादादिभ्य ऊचिवान् !! "अनुसूया के वर मांगने पर छठे अवतार में वे अत्रि की संतान -दत्तात्रेय हुए! इस अवतार में उन्होंने अलर्क एवं प्रह्लार्द आदि को ब्रह्मज्ञान का उपदेश किया !!(भा०१/३/११) ७ अवतार तत: सप्तम आकूल्यां रूचेर्यज्ञोSभ्यजायत ! स यामाद्यै: सुरगणैरपात्स्वायम्भुवान्तरम्!! "सातवीं बार रुचि प्रजापति की आकूति नामक पत्नी से यज्ञ के रूप में उन्होंने अवतार ग्रहण किया और अपने पुत्र याम आदि देवताओं के साथ स्वयम्भुव मन्वन्तरकी रक्षा की !!"(भा०१/३/१२) ८ अवतार अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रम: ! दर्शयन् वर्त्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम्!! "राजा नाभिकी पत्नी मेरु देवीके गर्भसे ऋषभदेव के रूप में भगवान् आठवाँ अवतार ग्रहण किया ! इस रूप में उन्होंने परमहंसों का वह मार्ग ,जो सभी आश्रमियों के लिए वन्दनीय है ,दिखाया! "(भा०१/३/१३) ९अवतार ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपु: ! दुग्धेमामोषधीर्विप्रास्तेनायं स उशत्तम: !! " ऋषियों की प्रार्थना पर नवीं बार वे राजा पृथु के रूप में अवतीर्ण हुए! शौनकादि ऋषियो! इस अवतार में उन्होंने पृथ्वीसे समस्त ओषधियों का दोहन किया था ,इससे यह अवतार सबके लिए बडा कल्याण कारी हुआ!! "(भा०१/३/१४) १०अवतार रूपं स जगृहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसम्प्लवे ! नाव्यारोप्य महीमय्यामपाद्वैवस्वतं मनुम् !! "चाक्षुष मन्वन्तर के अन्त में जब सारी त्रिलोकी समुद्रमें डूब रही थी,तब उन्होंने मत्स्य के रूप में दसवां अवतार ग्रहण किया और पृथ्वी रूपी नौका पर बैठा कर अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की!! (भा०१/३/१५) ११अवतार सुरासुराणामुुदधिं मथ्नतां मन्दराचलम्! दध्रे कमठरूपेण पृष्ठ एकादशेे विभु: !! "जिस समय देवता और दैत्य समुद्र-मन्थन कर रहे थे ,उस समय ग्यारहवाँ अवतार धारण कर कच्छपरूप से भगवान् ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया !!(भा०१/३/१६) १२-१३अवतार धान्वन्तरं द्वादशमं त्रयोदशमेव च ! अपाययत्सुरानन्यान्मोहिन्या मोहयन् स्त्रिया!! "बारहवीं बार धन्वन्तरिके रूप में अमृत लेकर समुद्र से प्रकट हुए और तेरहवीं बार मोहिनी रूप धारण करके दैत्यों को मोहित करके देवताओं को अमृत पिलाया!! "(भा०१/३/१७) १४ चतुर्दशं नारसिंहं बिभ्रद्दैत्येन्द्रमूर्जितम्! ददार करजैर्वक्षस्येरकां कटकृद्यथा !! "चौदहवें अवतारमें उन्होंने नरसिंहरूप धारण किया ओर अत्यन्त बलवान् दैत्यराज हिरण्यकश्यपु की छाती अपने नखों से अनायास इस प्रकार फाड़ डाली,जैसे चटाई बनाने वाला सींकको चीर डालता है!! "(भा०१/३/१८ १५अवतार पञ्चदशं वामनकं कृत्वागादध्वरंं बले: ! पदत्रयं याचमान: प्रत्यादित्सुस्त्रिविष्टपम्!! "पंद्रहवीं बार वामनका रूप धारण करके भगवान् दैत्यराज बलिके यज्ञमें गये ! वे चाहते तो थे त्रिलोकीका राज्य,परन्तु माँगी उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी !!"(भा०१/३/१९) १६ अवतार अवतारे षोडशमे पश्यन् ब्रह्मद्रुहो नृपान् ! त्रि: सप्तकृत्व: कुपितो नि:क्षत्रामकरोन्महीम् !! "सोलहवें परशुराम अवतार में जब उन्होंने देखा कि राजालोग ब्राह्मणों के द्रोही हो गये हैं ,तब क्रोधित होकर उन्होंने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से शून्य कर दिया!! "(भा०१/३/२०) १७ अवतार तत: सप्तदशे जात: सत्यवत्यां पराशरात् ! चक्रे वेदतरो: शाखा दृष्ट्वा पुंसोSल्पमेधस: !! "इसके बाद सत्रहवें अवतार में सत्यवती के गर्भसे पराशरजीके द्वारा वे व्यासके रूप में अवतीर्ण हुए,उस समय लोंकों की समझ और धारणाशक्ति कम देख कर आपने वेद रूप वृक्ष की कई शाखाएँ बना दीं !! "(भा०१/३/२१) १८अवतार नरदेवत्वमापन्न: सुरकार्यचिकीर्षया ! समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यत: परम् !! "अठारहवी बार देवताओं का कार्य सम्पन्न करने की इच्छा से उन्होंने राजाके रूप में श्रीरामचन्द्रजी का अवतार ग्रहण किया और सेतु-बन्धन,रावणवध आदि वीरता पूर्ण बहुत -लीलाएं कीं! (भा०१/३/२२) १९-२०अवतार एकोनविंशे विशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी! रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम्!! "उन्नीसवें और बीसवें अवतारों में उन्होंने यदुवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के नामसे प्रकट होकर पृथ्वी का भार उतारा!! "(भा०१/३/२३) २१अवतार तत: कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्! बुद्धो नाम्नाजनसुत: कीकटेषु भविष्यति!! "उसके बाद कलियुग आ जाने पर मगधदेश में देवताओं के द्वेषी दैत्यों को मोहित करने के लिए अजनके पुत्र के रूप में आपका बुद्धावतार होगा !!"(भा०१/३/२४) २२अवतार अथासौ युगसंध्यायां दस्युप्रायेषु राजसु ! जनिता विष्णुयशसो नाम्ना कल्किर्जगत्पति: !! "इसके भी बहुत पीछे जब कलियुगका अंत समीप होगा और राजा लोग प्राय: लुटेरे हो जायँगे ,तब जगत् के रक्षक भगवान् विष्णुयश नामक ब्राह्मण के घर कल्किरूप में अवतीर्ण होंगे !!"(भा०१/३/२५) एते चांशकला: पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ! इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे!! "ये सब अवतार तो भगवान् के अंशावतार या कलावतार हैं ,परंतु भगवान् श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान् (अवतारी)ही हैं !जब लोग दैत्यों के अत्याचार. से व्याकुल हो उठते हैं ,तब युग-युग में अनेक रूप धारण करके भगवान् उनकी रक्षा करते हैं !!"(भा०१/३/२८)

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मन वचन और काया से किसी को भी पीड़ा न देना ही यज्ञ है जो बिना कारण ही दिल जलाता है , वह आत्मघात कर रहा है सदा सर्वदा प्रसन्न रहना भी यज्ञ ही है । सत्कर्म के बिना चित्तशुद्धि नहीँ होती और चित्तशुद्धि के ज्ञान नहीँ टिकता । सत्कर्म से सभी इन्द्रियाँ शुद्ध होगी । जिसका मन कलुषित है , उसे परमात्मा का अनुभव नहीँ हो सकता । मानव शरीर एक गगरी है इसमेँ नौ छिद्र हैँ यदि गगरी छिद्र वाली है तो उसे कभी भरा नहीँ जा सकता । प्रत्येक छिद्र से ज्ञान बह जाता है । ज्ञान प्राप्त होना कठिन है ज्ञान आता तो है किन्तु वह रह नही पाता विकार वासना के वेग मे वह कई बार बह जाता है । वैसे तो सबकी आत्मा ज्ञानमय है , अतः अज्ञानी तो कोई नहीँ है किन्तु ज्ञान को सतत् बनाए रखने हेतु इन्द्रियोँ के द्वारा बही जाती हुई बुद्धि शक्ति को रोकना है ज्ञानी इन्द्रियोँ के विषय की ओर नहीँ जाने देता जबकि वैष्णव इन्द्रियोँ को प्रभु के मार्ग की ओर मोड़ता है । ज्ञान टिक नहीँ पाता , क्योँकि मनुष्य का जीवन विलासी हो गया है । सारा का सारा ज्ञान पुस्तक मेँ ही पड़ा रहता है , मस्तक मेँ जाता ही नहीँ । जो पुस्तकोँ के पीछे दौड़े वह विद्वान है और जो भक्तिपूर्वक परमात्मा के पीछे दौड़े वह सन्त है । विद्वान शास्त्र के पीछे दौड़ता है जबकि शास्त्र संत के पीछे दौड़ते हैँ । शास्त्र पढ़कर जो बोले वह विद्वान है , प्रभु को प्रसन्न करके उसी मेँ पागल होकर जो बोलता है वह सन्त है । गीता मेँ भगवान ने अर्जुन से कहा है > अर्जुन ! ज्ञान तो तुझी मे है । हृदय मेँ सात्विक भाव जाग्रत हो , मन शुद्ध हो जाय तो हृदय मेँ ज्ञान अपने आप ही प्रकट होता है ।। ज्ञान का शत्रु है हिरण्याक्ष अर्थात् लोभ । ज्ञान को बुद्धि मेँ स्थिर रखना है तो हिरण्याक्ष रुपी लोभ को मारना होगा । अपने मन से पूछो कि मुझे जो सुख सम्पत्ति मिली है , उसके लिए मैँ पात्र भी हूँ या नहीँ । उत्तर नकारात्मक ही होगा । लोभ को संतोष से मारना चाहिए । ज्यादा पाने की इच्छा नही करना चाहिए । पाप इसलिए होता है कि मनुष्य मानता है कि प्रभू ने मुझे जो दिया है वह बहुत कम है । पाप नहीँ होगा तो इन्द्रियो की शुद्धि होगी और तभी इन्द्रियोँ मेँ ज्ञान-भक्ति टिक पायेगी । यज्ञादि सत्कर्म से चित्त शुद्धि होगी तभी ब्रह्मज्ञान बुद्धि मेँ टिक पायेगी !!! स्वान्तः सुखाय ************ श्रीहरिशरणम ************

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