शिव जटाजूट स्तुतिः ••••••••••••••••••••••••• स धूर्जटिजटाजूटो जायतां विजयाय वः। यत्रैककपलितभ्रान्तिं करोत्यद्यापि जाह्नवी।। जिस भगवान शंकर के जटाजूट में रहने वाली गंगाजी उनके जटाजूट में पके हुए बाल की भ्रांति आज भी पैदा कर रही हैं उन भगवान धूर्जटि का जटाजूट हम लोगों के विजय के लिए हो । चूडापीडकपालसंकुलगलन्मन्दाकिनीवारयो, विद्युत्प्रायललाटलोचनपुटज्योतिर्विमिश्रत्विषः। पान्तु त्वामकठोरकेतकशिखासंदिग्धमुग्धेन्दवो, भूतेशस्य भुजंगवल्लिवलयस्रङ्नद्धजूटा जटाः।। भगवान शिव के सिर की जटा भुजंग रुपी लताओं की वलय रुपी माला से बँधी हुई है । उससे शिरोभूषण एवं कपाल से व्याप्त मन्दाकिनी के जल की धारा निकल रही है । शिव के ललाट प्रदेश में स्थित नेत्र से बिजली की सी ज्योति छिटक रही है । उस अवस्था में सुन्दर चन्द्रमा में केतकी के छोटे से सुकोमल फूल का भ्रम हो जाता है । ऐसा भगवान शंकर का वह जटाजूट हम सबकी रक्षा करें। गङ्गावारिभिरुक्षिता फणिफणैरुत्पल्लवास्तच्छिखा- रत्नैः कोरकिताः सितांशुकलया स्मेरैकपुष्पश्रियः। आनन्दाश्रुपरिप्लुताक्षिहुतभुग्धूमैर्मिलद्दोहदा , नाल्पं कल्पलताः फलं ददतु वो$भीष्टं जटा धूर्जटेः।। धूर्जटि भगवान शंकर की जटा निरन्तर गंगाजल से अभिषिक्त हो रही है ,सापों के फणों के कारण जटा का अग्रभाग ऊपर उठे हुए पल्लवों की भांति प्रतीत हो रहा है, साँपो के फणों मे लगी हुई मणियों की ज्वाला जटाप्रदेश में विखरित हो रही है चन्द्रमा की किरणों के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो विकसित पुष्पों की छटा बिखरी हुई हो । आनन्दाश्रुओं से परिपूरित होने के कारण अग्नि रुपी नेत्र से निकलती हुई धूम्रशिखा के समान, कल्पलता सदृश समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली भगवान धूर्जटि (शिव)-- की जटा हम लोगों को समस्त अभीष्ट प्रदान करें।

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शिव जो धारण करते हैं, उनके व्यापक अर्थ हैं :-- ================================== जटाएं : ------- शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं। चंद्र :----- चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है। त्रिनेत्र : ---- शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं। सर्पहार : ---- सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है। त्रिशूल :------ शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है। डमरू : ----- शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है। मुंडमाला :---- शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है। छाल : ---- शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है। भस्म : ----- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है। वृषभ : ----- शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं। इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।

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यह संसार एक ऐसा अंधा कुँआ है जिसमे काटने के लिए सदैव एक सर्प घूमता रहता है । इस कुँए मे विषय भोगो की इच्छा वाले मनुष्य फँसे हुए हैं। मन पाप वासना से दूषित होकर कामवासना हेतु आतुर रहता है ,हर्ष-शोक, लोक-परलोक, धन, पत्नी, पुत्र आदि की चिन्ता मे डूबा रहता है। वह कामातुर एवं भयत्रस्त तथा अनेक इच्छाओ से दूषित और दुःखी है । मन तो--- "दुरितं दुष्टम् असाधुतीव्रम् कामातुरं हर्षशोकभयैषणार्त" है। मानव का विवाह पाँच स्त्रियो के साथ हुआ है । ये हमेशा अतृप्त ही रहती है । भोग से तृप्ति नहीं होती ,भोग से यदि तृप्ति हो सकती तो यह जीव कई जन्मो से भोगोपभोग करता आया है.फिर भी उसे तृप्ति नही हुई । तृप्ति तो त्याग से ही हो सकती है । यह जीभ बहुत नचाती है , यदि इसे प्रसन्न किया जाय तो आँखे सताने लगती है कि सिनेमा दिखा दो । क्या सिनेमा से मनोरंजन प्राप्त हो सकता है ? जब मन निर्विषय बनता है.और इन्द्रियाँ आत्मस्वरुप में लीन हो जाती है तभी सच्चा मनोरंजन होता है आनन्द मिलता है । आँखो को समझाने पर कान को संगीत सुननेकी इच्छा बलवती हो जाती है । मानव जीवन सफल बनाने वाले को श्रृंगारी गीत नही सुनना चाहिए । ये इन्द्रियाँ अनेक पत्नियों वाले पति के समान दुर्दशा कर देती हैं । हमेशा अतृप्त रहने वाली यह जीभ स्वादिष्ट रसों की ओर खींचती है ,जननेन्द्रिय विषयभोग के लिए सुन्दर स्त्री की ओर, त्वचा कोमल स्पर्श सुख की ओर , पेट भोजन की ओर , कान मधुर संगीत की ओर, नाक भीनी भीनी सुगंध की ओर ,चपल नेत्र सौन्दर्य की ओर आकर्षित करते रहते हैं । कर्मेन्द्रयाँ भी अपने अपने विषयो की आकर्षित करती हैं। पाँच इन्द्रियो के पाँच विषय सच्चे पति नही है , किन्तु पति होना चाहते है । इन पाँच इन्द्रियों के सच्चे पति तो परमात्मा ही है । इन्द्रियाँ परमात्मा के साथ ही रह सकती है , विषयो के साथ नहीं, तृप्ति भोग में नहीं त्याग में है । इन्द्रियों के आवेग को सहकर उसे नियंत्रित करने पर ही सुखी होनगे । भोग से वासना बढ़ती है । भोगोपभोग से इन्द्रियो की रक्षा नहीं, क्षय ही होता है। भक्तिरस से ही इन्द्रियाँ पुष्ट हो सकती है । विषयो का चिंतन करने से शक्ति का क्षय होता है। ईश्वरस्मरण से शक्ति प्राप्त होती है ।

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ईश्वर अंश जीव अविनाशी =============== संसार का हर जीव ईश्वर का ही अंश है यहां हर जीव में ईश्वर का ही अंश व्याप्त है, लेकिन मनुष्य परमात्मा की वह अद्भुत रचना है जो अपनी क्षमताओं को जागृत करता हुआ अपने उस अंशी को प्राप्त कर सकता है इसके लिए परमात्मा ने उसे विशेष रूप से तैयार किया है। यदि कोई भी मनुष्य अपनी क्षमताओं को जाग्रत करता हुआ अपने अंतिम लक्ष्य तक जिसे ध्यान में रखकर परमात्मा ने उसे बनाया था उस लक्ष्य तक यदि कोई भी मनुष्य पहुंच जाता है तो उसके समान संसार में कोई नहीं देवता भी नहीं । परंतु उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रकृति के पांच तत्व को प्रकट करना अनिवार्य है इन्हीं पांच तत्वों के द्वारा जीव की उत्पत्ति होती है इन्हीं पांच तत्वों के द्वारा परमात्मा ने ईश्वर ने सृष्टि की रचना किया है इन्हीं पंच तत्वों के द्वारा समस्त ब्रह्मांड की रचना हुई है। इन पांच तत्वों को भली-भांति देखना समझना और इनके गुणों का पूर्ण रूप से ज्ञान होना और इन को जागृत करना जागृति तभी होगा जो स्वयं परमात्मा चाहते हैं, अन्यथा कोई भी इन पंच तत्वों को जागृत नहीं कर सकता है । जिसने भी इन पंच तत्वों को जाग्रत किया वह इस सृष्टि में कहीं भी कुछ भी करने की क्षमता रखता है और जिसके पास यह क्षमता या गई उसी को समर्थ गुरु कहा जाता है। जिसके अधीन समस्त ब्रह्मांड समस्त सृष्टि सृष्टि का हर परमाणु जिसके अधीन हो जाता है यह पांच तत्व पृथ्वी अग्नि जल वायु और आकाश यह पांचों तत्व जब सम मात्रा में एकाकार होते हैं वहां अपने आप परमात्मा का प्रकाश उत्पन्न हो जाता है जिसे हम जीव कहते हैं जब तक पांच तत्व सम मात्रा में एकाकार नहीं होते तब तक उसमें परमात्मा की वह शक्ति उत्पन्न नहीं होती इसलिए कहा गया है कि ---- "सियाराम मय सब जग जानी" सिया का अर्थ होता है---- प्रकृति यह सृष्टि। राम का अर्थ होता है--- पुरुष। यानि परमात्मा और प्रकृति के मिलन से जो जीव उत्पन्न हुआ उसमें प्रकृति भी और परमात्मा भी दोनों समभाव में एकाकार होते हैं दोनों ने अपने अस्तित्व को छोड़ा तो एक नया अस्तित्व उत्पन्न होता है। वह जीव है और हर जीव प्रकृति और पुरुष के मिलन से ही उत्पन्न होता है ठीक वही बात सांसारिक प्राणियों में भी लागू होती है । परमात्मा ने इसी प्रकृति और पुरुष के अनुसार इस संसार में सृष्टि के समस्त जीवो का निर्माण किया है। परमात्मा का गुण है--- सत। प्रकृति का गुण है-- तम। सत और तम के मिलन से जो नया जीव उत्पन्न हुआ उसे रज कहते हैं। जीव रजोगुणी है जीव के अंदर रजोगुण ही होता है क्योंकि परमात्मा ने अपना सत्य छोड़ दिया प्रकृति ने अपना तम छोड़ दिया दोनों को जहां मिला दिया वहां पर एक तीसरा गुण उत्पन्न हो गया वह रजोगुण है वही जीव आत्मा होती है । जिसके अंदर सत और तम दोनों विद्यमान होते हैं लेकिन दोनों के ऊपर रजोगुण हावी होता है जीव रजोगुण और तमोगुण में ही भ्रमित रहता है सत की तरफ जा नहीं पाता है या जाना ही नहीं चाहता है। रजोगुण और तमोगुण उसको इतना आकर्षित करते हैं कि वह सतोगुण की तरफ देखना भी पसंद नहीं करता है। यही मनुष्य की सबसे बड़ी कमी है रजोगुण और तमोगुण संसार के चमक दमक हानि लाभ में इतना प्रेरित हो जाता है कि वह सतोगुण की तरफ कभी ध्यान देना चाहता ही नहीं यही तमोगुण और रजोगुण मैं बस जाता है सतोगुण की तरफ कभी ध्यान नहीं दे पाता है और अपने अंतिम लक्ष्य का कभी उसे पता भी नहीं चलता है जिसके द्वारा वह अपना सारा जीवन व्यर्थ ही निकाल देता है । मनुष्य का पहला कर्तव्य होता है कि--- वह सत्य को जाने पहचाने और उस सत्य की खोज करें इसकी खोज करते करते एक दिन उसको परमपिता परमात्मा के स्थान का पता चलता है और वह उस स्थान तक पहुंचने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर देता है। जैसे पहले के समय में बहुत सारी कहानियां मिलती है कि बड़े-बड़े राजाओं महाराजाओं ने अपने समस्त राज पाठ का त्याग करके ईश्वर का ध्यान करने तप करने जंगल में चले जाते थे उस में ऐसा क्या आनंद है जिस आनंद को पाने के लिए वह अपना संसार का सारा राजपाट छोड़कर चला जाता था। आनंद का एक झलक मात्र मिल जाए तो उस आनंद के सामने संसार के सारे आलम फीके पड़ जाते हैं वहीं लक्ष्य हमारी जिंदगी का अंतिम लक्ष्य है और उसी लक्ष्य को प्राप्त करना हमारा उद्देश्य है यही हमारा परम कर्तव्य है। इस परम कर्तव्य से जो भटक गया उसको बार-बार शरीर धारण करके संसार में आना है और जब तक वह अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता तब तक उसको आते ही रहना है यह क्रिया निरंतर चलती रहेगी जब तक मनुष्य अपने अंतिम लक्ष्य तक या यूं कहें कि जीव जब तक अपने अंशी यानी ईश्वर तक पहुंच नहीं जाता है । तब तक जन्म मरण का बंधन निरंतर चलता रहता है शरीर बहुत बदलती है बहुत योनियों में भटकना पड़ता है। जब तक मनुष्य अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच जाता है तब तक जन्म मरण के बंधन से सांसारिक कष्टों से उसको कभी मुक्ति नहीं मिल सकती है । कहने का सिर्फ इतना अर्थ है जीवन में सब कुछ करते हुए उस ईश्वर का ध्यान करते रहें, कम से कम 10-20 मिनट हम रोज ईश्वर से प्रार्थना तो कर ही सकते हैं क्योंकि प्रायश्चित ऐसी अग्नि है जो जीव के बड़े से बड़े पापों को नष्ट कर देती है प्रायश्चित करना हमारे बस में है। ईश्वर को प्राप्त करना हमारे बस में है लेकिन उसके लिए हमको मार्ग नहीं मिलता है यदि हम प्रायश्चित करना आज से ही चालू कर देते हैं तो निश्चित रूप से ईश्वर किसी ना किसी रूप में हमारे सामने आकर हमको अपने सही स्थान का पता बताएगें वहां तक पहुंचने का सही रास्ता दिखलाएगें, इसलिए संसार का हर काम पूरा करिए हर सुख सुविधा का आनंद लेते हुए यह मत भूलिए हम उस परमपिता परमेश्वर के पुत्र हैं हम जब से अलग हुए हैं। आज तक हम कभी भी अपने उस पिता का दर्शन नहीं कर पाए हैं हमें तो पता नहीं है लेकिन उस पिता को तो सब पता है कि मेरा बच्चा कब से हम से अलग हुआ है और कब तक हमसे अलग रहेगा एक खोए हुए पुत्र के पिता से पूछिए कि उसके ऊपर क्या गुजरती है जिसका पुत्र गायब हो गया हो संसार में नहीं मिल रहा हो ऐसे पुत्र को अगर यदि कोई उसके पिता से मिलवा देता है संसार का सबसे बड़ा पुण्य का काम होता है इसलिए संसार का हर कार्य करते हुए संसार का हर सुख दुख हर सुख सुविधा का आनंद लेते हुए परमात्मा को हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए। परमात्मा हमें अपनी याद दिलाता है क्योंकि परमात्मा ही हमारे जीवात्मा में बैठा हुआ है हमको सुलाता है हमको जगाता है हमको सारे दुख सुख का अनुभव करवाता है। हमारे सारे कर्मों को करवा रहा है हमारी युवा चेतना जिसके द्वारा हमारा शरीर चलाएं मान है हमारी सारी इंद्रियां चलाएं मान है हमारी आंख कार्य कर रही है,हमारे हाथ पैर इत्यादि सारी की सारी इंद्रियां जिस चेतना के कारण चैतन्य है वही चेतना शक्ति परमात्मा है , उस परमात्मा के हम इतने नजदीक होते हुए अपने आपको परमात्मा से कितना दूर देखते हैं कितना दूर समझ रहे हैं यही हमारा अज्ञान है जिसने हमको परमात्मा से दूर कर रखा है । एक स्थान पर पढ़ा था उसमें लिखा था---- "सब में वही व्यापक एक समान। मेहंदी में जिस भांति है लाली अन्तर्ध्यान।।" इसका सीधा अर्थ यही होता है जिस प्रकार मेहदीं के पत्तों में लाली हमको दिखाई नहीं देती है उसी प्रकार से परमात्मा भी हमारे अंदर ही है लेकिन हमको दिखाई नहीं देता है समय आएगा जैसे मेहंदी को दिया जाता है पीसने के बाद उसका लाली अपने आप प्रकट हो जाती है । उसी प्रकार से परमात्मा भी हमारे अंदर है और समय आने पर वह अपने आप प्रकट हो जाता है मेहंदी के पत्तों को तोड लिए फायदा लिए कितने टुकड़े कर लिए पर उसमें कहीं लाली दिखती नहीं है ठीक उसी प्रकार से हमारे शरीर को भी कितने भी जगह से चीर डालिए कहीं भी परमात्मा युवा करंट शक्ति कहीं दिखाई नहीं देती है। लेकिन वह शक्ति कार्यान्वित है कार्य कर रही है हम सुनते हैं देखते हैं बोलते हैं समझते हैं हमारा मन कार्य कर रहा है हमारी बुद्धि कार्य कर रही है हमारा अहंकार कर रहा है हमारा विवेक कार्य कर रहा है हमारे सारी की सारी इंद्रियां कार्य कर रही है इसको जो कार्य करवाने की जो क्षमता जो इनकी जो शक्ति जो हंसी आ रही है। वह परमात्मा से आ रही है वही परमात्मा का अपना स्थान है उसी परमात्मा के उसी स्थान तक जाना है वही हमारा अंतिम लक्ष्य जहां पहुंचकर हमें परमात्मा के दर्शन होते हैं परमात्मा हमको अपनी गोद में बिठा लेता है। हम परमात्मा का आलिंगन करते हैं हमारी बुद्धि हमारा मन हमारा यहां सब परमात्मा से एकाकार हो जाता है यहां तक कि हम स्वयं अपने अंदर ही पद परमात्मा को देखने लगते हैं।

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मकर संक्रांति का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• "भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते। तथैव भवतां तेजो. वर्धतामिति कामये।। मकर संक्रांतौ महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम। स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥" अर्थात जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन शुद्ध घी और कंबल का दान करता है, वह अपनी मृत्यु पश्चात जीवन-मरण के इस बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है। ‘रसो वै सः’ भारतीय तत्ववेत्ताओं ने जीवन को इसी रूप में परिभाषित किया है। रस यानि आनन्द-उल्लास, उमंग-उछाह। ये अवसर जीवन में बार-बार आएं, अनवरत आएं और सदा-सदा के लिए बने रहें, इसीलिए देव संस्कृति में पर्वों का सृजन किया गया। निर्मल आनन्द के पर्याय ये सभी पर्व लोक-जीवन को देव-जीवन की ओर उन्मुख करते हैं। इनमें भी मकर-संक्रान्ति के साथ ये अनुभूतियां कुछ अधिक ही गहराई के साथ जुड़ी हैं। यह जन-आस्था तथा लोकरुचि का पर्व है। इसे समूची सृष्टि में जीवन अनुप्राणित करने वाले भगवान सूर्य की उपासना का पर्व भी कहते हैं। इस अवसर पर उमड़ने वाले सात्विक भाव देश की सांस्कृतिक चेतना को पुष्ट करते हैं। लोक संस्कृति पर्व-मकर संक्रान्ति सम्पूर्ण भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रांति लगभग प्रतिवर्ष 14 जनवरी को ही पड़ती है। सूर्य के उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते जाने की अवधि को दक्षिणायन तथा दक्षिण से उत्तर की ओर के यात्रा काल को उत्तरायण कहते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा करते समय सूर्य जिस राशि में दिखाई देता है, वही सूर्य की राशि कही जाती है। संक्रांति बारह राशियों में सूर्य का संक्रमण है---- "रवेः संक्रमण राषौ संक्रान्तिरिति कथ्यते।" मकर संक्रान्ति नवम धनु राशि से दशम मकर राशि में संक्रमण है। चन्द्रमास साढ़े उन्तीस दिन का एवं चन्द्रवर्ष 354 दिन का होता है, परन्तु सौर-दिन 30 दिन का एवं सौर वर्ष 365 दिन 6 घण्टे का होता है, चन्द्रवर्ष निश्चित नहीं होता है, उसमें परिवर्तन आता रहता है। इसी परिवर्तन के कारण चार वर्षों में फरवरी उन्तीस दिन की होती है। सूर्य का संक्रमण एक निश्चित अवधि एवं समय में सम्पन्न होता है। इसी कारण मकर-संक्रान्ति प्रायः हर वर्ष 14 जनवरी को ही आती है। संक्रमण पर्व मकर संक्रान्ति का मकर शब्द का भी विशेष महत्व माना जाता है। इस महत्व को अलग-अलग भाषाओ के विद्वानो ने अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित किया है। हरीति ऋषि के अनुसार,मकर मत्स्य वर्ग के जल-जन्तुओं में सर्वश्रेष्ठ है--- "मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो।" इसीलिए यह गंगा का वाहन है। प्रायः सभी शास्त्रकारों ने गंगा को मकर वाहिनी माना है। कामदेव की पताका का प्रतीक मकर है। अतएव कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है। बिहारी सतसई में महाकवि बिहारी ने भगवान श्रीकृष्ण के कुण्डलों का आकार मकरकृत बताया है। "मकराकृत गोपाल कैं कुंडल सोहत कान । धंस्यौं मनौ हिय-घर समर ड्यौढ़ी लसत निसान।।" ज्योतिष गणना की बारह राशियों में से दसवीं राशि का नाम मकर है। पृथ्वी की एक अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार- सुमेरु पर्वत में उत्तर में दो पर्वत में से एक का नाम मकर पर्वत है। तमिल वर्ष में ‘तई’ नामक महिला का उल्लेख है, जो सूर्य के मकर रेखा में आने के कारण उसका नामकरण हुआ। पुराणों में मकर संक्रान्ति का काफी विस्तार से वर्णन मिलता है। पुराणकारों ने सूर्य के दक्षिण से ऊर्ध्वमुखी होकर उत्तरस्थ होने की वेला को संक्रान्ति पर्व एवं संस्कृति पर्व के रूप में स्वीकार किया है। पौराणिक विवरण के अनुसार, उत्तरायण देवताओं का एक दिन एवं दक्षिणायन एक रात्रि मानी जाती है। यह वैज्ञानिक सत्य है कि उत्तरायण में सूर्य का ताप शीत के प्रकोप को कम करता है। शास्त्रकारों ने भी मकर संक्रान्ति को सूर्य उपासना का विशिष्ट पर्व माना है। इस अवसर पर भगवान सूर्य की गायत्री महामंत्र के साथ पूजा-उपासना, यज्ञ-हवन का अलौकिक महत्व है। मकर संक्रान्ति पर्व के देवता सूर्य को देवों में विश्व की आत्मा कहकर अलंकृत किया गया है। आयुर्वेद के मर्मज्ञों का मानना है, शीतकालीन ठण्डी हवा शरीर में अनेक व्याधियों को उत्पन्न करती है। इसीलिए तिल-गुड़ आदि वस्तुओं का इस अवसर पर प्रयोग करने का विशेष विधान है। चरक संहिता स्पष्ट उल्लेख है---- ’शीते शीतानिलर्स्पषसंरुद्धो बलिनां बली। रसं हिन्स्त्यतो वायुः शीतः शीते प्रयुप्यति।।" इस प्रकोप के निवारण के लिए आयुर्विज्ञान विशेष घी-तेल, तिल-गुड़, गन्ना, धूप और गर्म पानी सेवन की सलाह देते हैं। सूर्य उत्तरायण होने पर भीष्मपितामह की मृत्यु ---------- उत्तरायण में मृत्यु का अर्थ है "ज्ञान की अथवा उत्तरावस्था में परिपक्व दशा मे मृत्यु।" कई पापी लोग तो वैसे भी उत्तरायण काल में मरते हैं , किन्तु फिर भी उनको सद्गति नही मिलती , और कई योगी जन दक्षिणायन मे मरते है फिर भी उनकी दुर्गति नही होती । दक्षिण दिशा मे यमपुरी है , नरक लोक है । नरक लोक का अर्थ है "अंधकार।" जिन्हें परमात्मा के स्वरुप का ज्ञान नहीं है , जिन्होंने परमात्मा का अनुभव नहीं किया है और वैसे ही मर जाते हैं उनकी मृत्यु दक्षिणायन कहलाती है । संतो का जन्म तो हमारी ही भाँति साधारण होता है किन्तु उनकी मृत्यु मंगलमय होती है। साधन भक्ति करते करते ही साध्य भक्ति सिद्ध होती है । जिसकी मृत्यु के समय देवगण बाजे बजाते हैं उसकी मृत्यु मंगलमय है । भीष्म के प्रयाण के समय देवों ने ऐसा ही किया था । ऐसे काम करना चाहिए---- "जब तुम आये जग में , तो वह हँसा तुम रोए । ऐसी करनी कर चलो , तुम हँसो जग रोए ।।" मानव जीवन की अन्तिम परीक्षा उसकी मृत्यु ही है । जिसका जीवन सुन्दर होगा , उसकी मृत्यु मंगलमय होगी। जिसका मरण बिगड़ा उसका जीवन भी व्यर्थ रहा। मरण तब सुधरता है जब मानव प्रत्येक क्षण को सुधारता है । जो प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करता है ईश्वर को प्रतिक्षण स्मरण करता है उसकी मृत्यु भी सुधरती है किन्तु जो प्रत्येक क्षण का दुरुपयोग करता है ईश्वर का स्मरण नहीं करता उसकी मृत्यु बिगड़ती है । भीष्म आजीवन संयमी रहे थे संयम बढ़ाकर प्रभू के सतत स्मरण की आदत होने से मरण सुधरेगा। जीवन का अंतकाल बड़ा कठिन है । उस समय प्रभू का स्मरण करना आसान नहीं है----- "जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।।" समस्त जीवन जिसकी लगन में बीता होगा वही अंतकाल में उसे याद आयेगा । ईश्वर तब तक कृपा नहीं करते जब तक मनुष्य स्वयं कोई प्रयत्न न करे । सारा जीवन भगवान के स्मरण में बीते और कदाचित वह अंतकाल में भगवान को भूल जाय तो भी भगवान उसे याद करेंगे । भगवान कहते है कि "भक्त मुझे भले ही भूल जाय किन्तु मै उसको नहीं भूल सकता।" अतः भीष्मपितामह की मृत्यु को उजागर करने के लिए ही द्वारिकाधीश भीष्म के पास पधारे थे। माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।। भावार्थ माघमासकी ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ-कहीं भी जल हो, वह गंगाजलके समान होता है। इस मास में शीतल जलके भीतर डुबकी लगानेवाले मनुष्य पापमुक्त हो जाते हैं। उत्तरायण पर्व मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएँ---

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विभिन्न योनियों में बन्दी जीव परमेश्वर के अंश हैं । मायावादी दार्शनिक जीव को परमात्मा समझने की भूल कर बैठते हैं । वास्तव में परमात्मा एक मित्र के रुप में जीव के साथ रहता है। श्रीभगवान का अन्तर्यामी पक्ष परमात्मा तथा जीवात्मा दोनों ही शरीर के अन्दर हैं अतएव कभी कभी यह समझने में भूल हो जाती है कि दोनो मेँ कोई अन्तर नहीं हैं। जीवात्मा तथा परमात्मा के मध्य एक निश्चित अन्तर है "वाराह पुराण" के अनुसार -'परमेश्वर के दो प्रकार के अंश होते है - जीव को विभिन्नांश कहते हैं , और परमात्मा अथवा परमेश्वर के पूर्ण अंश को स्वांश कहते है। श्रीभगवान का स्वांश , उन्हीं के समान ही शक्तिमान है। परम पुरुष तथा उनके पूर्ण अंश परमात्मा की शक्ति में रंचमात्र भी अन्तर नहीं है । किन्तु विभिन्नांश भगवान की शक्तियों के एक लघुतम अंश से ही युक्त है । नारद पांचरात्रानुसार --- परमात्मा की तटस्था -शक्ति- जीव आध्यात्मिक अस्तित्व की गुणवत्ता मे भगवान के समान ही है , किन्तु उसमे भौतिक गुण भी रहते है , भौतिक गुणो के प्रभाव का भागी होने के कारण सूक्ष्म जीवात्मा को जीव कहा जाता है । श्रीभगवान को शिव भी कहा जाता है । शिव का अर्थ सर्वकल्याणमय है । अतः शिव तथा जीव के मध्य यह अन्तर है कि सर्वकल्याणमय श्रीभगवान पर भौतिक गुण कभी भी कोई प्रभाव नही डालते है, जबकि श्रीभगवान के सूक्ष्म अंश(जीव) भौतिक गुणों से प्रभावित हो जाते है । किसी जीव विशेष के शरीर मे निवास करने वाले परमात्मा यद्यपि भगवान के एक अंश है , तथापि वे जीव द्वारा उपास्य है । अतः महर्षियों ने ध्यान प्रक्रिया की संरचना इस प्रकार की है , जिससे जीव परमात्मा के रुप (श्री विष्णु) के चरण कमलों पर अपना ध्यान एकाग्र कर सके । यही समाधि का वास्तविक रुप है । जीव अपने ही प्रयासो द्वारा भौतिक बन्धनो से मुक्त नही हो सकता है । अतः उसे परमेश्वर के चरणकमलो अथवा अपने अन्दर स्थित परमात्मा की भक्ति स्वीकार करना चाहिए । श्रीधर स्वामी कहते हैं ------ प्रिय भगवन् ! मै सनातन रुप से आपका अंश हूँ ,किन्तु आपसे ही विकीर्ण होने वाली भौतिक शक्तियो के बन्धनों मे बद्ध हो गया हूँ । समस्त कारणों के कारण रुप परमात्मा के रुप में आपने मेरे शरीर मे प्रवेश किया है और आपके साथ परमानन्द ज्ञान के जीवन का उपभोग करना मेरा अधिकार है । अतः हे भगवन् ! मुझे अपनी प्रेम सेवा का आदेश दीजिए , जिससे मैं पुनः दिव्यानन्द की अपनी स्थिति को प्राप्त कर सकूँ ।"

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श्रीकृष्ण जब तक गोकुल मे रहे , चार प्रकार के नियमों का पालन किया ----- 1.गोकुल मे उन्होने सिले हुए कपडे कभी नही पहने , क्योंकि उनके साथी गोप बालक बडे गरीब थे । 2.जब तक गोकुल मे रहे कोई शस्त्रास्त्र नही धारण किया, एक हाथ में माखन-मिसरी ,एक हाथ मे बाँसुरी । बाँसुरी की मधुर तान से ही सारे गोकुल को घायल कर देते थे । "श्याम तेरी बंशी घायल कर जाती है", जब तक कृष्ण के हाथो मे माखन - मिसरी एवं बाँसुरी रही प्रेम की वर्षा होती रही किन्तु जैसे ही बाँसुरी जगह शंख एवं माखन की जगह चक्र धारण किया महाभारत प्रारम्भ और विधर्मियो का सर्वनाश हुआ। 3. कन्हैया अपने सिर केश कभी नहीं उतारे । 4. कन्हैया कभी जूते नहीं पहने, उन्होंने माता यशोदा से कहा---- "मैं गोपाल हूँ , गायों का सेवक हूँ और सेवक कभी जूते पहन सकता है क्या ? बालकृष्ण पाँच बरस के हुए और उन्हे वृन्दावन जाने की इच्छा हुई । गोकुल मे उत्पात हो रहे थे सो चाचा उपनन्द ने सोचा कि बालकोन के साथ दूसरे गाँव में चले जाना चाहिए । अतः सबने वृन्दावन को रहने योग्य माना। " वनं वृन्दावनं नाम ।" "वृन्दा का अर्थ है भक्ति , सो भक्ति का वन वृन्दावन है" वालक के पाँच वर्ष के होने पर उसे गोकुल से वृन्दावन ले जाना चाहिए , अर्थात् लाड़ प्यार की अवस्था , प्राथमिक अवस्था , में से अब उसे भक्ति के वन ले जाना चाहिए । पाँच वर्ष समाप्त होने पर लाड़ प्यार मे कमी की जानी चाहिए। बालक को धर्मभीरु और संस्कारी बनाने के लिए बचपन से ही धार्मिक शिक्षा दी जानी चाहिए । एकादशी के दिन उसे अन्नाहार नही देना चाहिए । अपने बालको को अच्छे संस्कार न देने वाले माता पिता उसके बैरी है---- " माता बैरी , पिता शत्रुः। येन बालो न पाठितः ।। " भक्ति और धर्म की शिक्षा न देने वाले माता पिता उस बालक के शत्रु ही हैं । बालक का हृदय , मन बड़ा कोमल होता है। अतः उसे दिए गये संस्कार उसके मन में अच्छी तरह जम जाते हैं । उसे बचपन में अच्छे संस्कार देने से उसका यौवन भ्रष्ट नहीं होगा और जीवन भर वह संस्कारी बना रहेगा । चाचा उपनन्द श्रीकृष्ण को वृन्दावन ले गये । जिसे ज्ञानवृद्ध संत का सहारा हो , वह पतन के गर्त में नहीं गिर सकता। संतो का हाथ पकड़कर चलने से गिरने का डर नही रहता , ईश्वर के नामों का आश्रय लेकर चलना चाहिए । वृन्दावन में अकेले नहीं बल्कि वृन्द "समूह "मे जाना चाहिए , अर्थात् औरों को भी सत्कार्य की प्रेरणा देना चाहिए।

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"मुक्तिर्हित्वान्यथारूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति:" मुक्ति का अर्थ होता है अपने स्वरूप में स्थित हो जाना। अभी हम अपने स्वरूप से भिन्न किसी और ही स्थिति को प्राप्त हो गए हैं। इस अन्यथा स्थिति को छोड़कर अपने वास्तविक स्वरूप में, स्व-स्वरूप में स्थित हो जाने को ही ‘मुक्ति’ कहते हैं। मोक्ष के विषय में लोगों के मन में बड़ी विचित्र धारणाएँ होती हैं, भिन्न-भिन्न विचार होते हैं। कोई सोचता है स्वर्ग में जाना मोक्ष है। कोई सोचता है भगवान के लोक में, भगवान के पास जाना मोक्ष है, या फिर भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना अथवा भगवान के जैसा रूप प्राप्त करना मोक्ष है। किसी को लगता है जन्म-मरण के पिण्ड से छुटकारा पा जाना या पुनः जन्म नहीं लेना मोक्ष है। अपने आप को इस शरीर के साथ बाँध कर यह शरीर मैं हूँ ऐसा मान लिया है। यही दुःख का कारण है। वेदान्त कहता है- तुम पहले से ही मुक्त हो, लेकिन अज्ञानता वश अपने आप को बन्धन में डाल कर‚ फिर समझते रहते हो कि तुम बद्ध हो। तुम्हारा बन्धन वास्तविक नहीं है, वह तो माना हुआ है। "मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" मन से कल्पना करके ही तुम बन्धन में आ गये हो। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई बन्धन है ही नहीं। बन्धन क्या है यह भले ही हमारी समझ में न आता हो, लेकिन सभी को वह दुःख रूप में अनुभव में आता है। यदि किसी से कहें कि तुम बन्धन में हो, तो वह कहेगा, बन्धन कहाँ है? मैं तो स्वतंत्र हूँ। बन्धन माने कोई रस्सी से बँधा होगा नहीं होता। दुःखरूप में जो अनुभव में आता है वही बन्धन है। उसकी मुक्ति कैसे हो? उसके लिए मोक्ष क्या है? "हित्वा त्यक्त्वा अन्यथा रूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः", सुखी दुःखी होने वाला तो मन है। तुम मन हो क्या? यह शरीर तुम हो क्या? शरीर तुम्हारा है, तुम शरीर नहीं हो। मन भी तुम्हारा है, तुम स्वयं मन नहीं हो। मन के साथ तादात्म्य हो जाने के कारण ही जीवन में शोक-मोह आदि लगे रहते हैं। बुद्धि के साथ तादात्म्य करके ही लोग स्वयं को बड़ा ज्ञानी अथवा अज्ञानी मानते-समझते रहते हैं। ज्ञान का, अज्ञान का, सब का अभिमान करके बैठ जाते हैं। यह सब अन्यथा रूप है। यह सब हमारा ‘आपा’ अथवा ‘मैं’ नहीं है। इन सब का जो दृष्टा है, वही वास्तविक ‘मैं’ है। अपने शरीर को सब देखते-जानते हैं। जिस चीज को हम देखते हैं, जैसे किताब को देखते हैं, तो वह किताब हम थोड़े ही हो सकते हैं? इसी प्रकार जब हमारी देह को भी हम देखते हैं, जानते हैं तब यह देह हम कैसे हो सकते हैं? जैसे, किताब को देखने वाला किताब से भिन्न होता है, वैसे ही देह को देखने वाला भी देह से भिन्न होता है। वह स्वयं देह नहीं हो सकता। लेकिन हम सब यही मान बैठे हैं कि यह देह मैं हूँ। यही हमारा मूल बन्धन है। जो हमारा आपा नहीं, स्व नहीं, उसके साथ हमने प्रगाढ़ तादात्म्य कर लिया है कि यही मैं हूँ। इसी को बन्धन कहते हैं। स्वर्ग आदि में जाना मोक्ष नहीं है। किसी अन्य रूप को प्राप्त करना भी मोक्ष नहीं है। ऐश्वर्य प्राप्ति भी मोक्ष नहीं है। कोई नया ही अनुभव प्राप्त करना, आँखों से प्रकाश देखना अथवा आँखें बन्द करके कोई अन्य प्रकाश देखना, ये सब भी मोक्ष नहीं है। आँखें बन्द करके प्रकाश देखने की क्या आवश्यकता है? देखना ही है तो आँखे खोलकर देखो बाहर बड़ा अच्छा प्रकाश है। सूर्य का प्रकाश देख लो, चन्द्रमा का देख लो। लोग न जाने किस-किस चीज को मोक्ष समझते रहते हैं। श्री शुकदेव जी कहते हैं---- "अन्यथा रूपं हित्वा स्वरूपेण व्यवस्थितिः" जो मेरा अपना स्वरूप नहीं है वह अन्यथा रूप है। उसको छोड़ कर अपने स्वरूप में बैठ जाना है, स्थित हो जाना है। बस यही मोक्ष है। उसके लिए न तो दूसरे देश में (लोक-लोकान्तर में) जाना है, न दूसरे काल में, और न ही किसी दूसरी स्थिति को प्राप्त करना है। दूसरा और कुछ नहीं करना है। न ही अपने शरीर को बदलना है। अर्थात देशान्तरापत्ति, लोकान्तरापत्ति, कालान्तरापत्ति या अवस्थान्तरापत्ति- इन सबमें से कोई भी मोक्ष नहीं है। यहीं पर रहते-रहते, जब विवेक हो जाए, तब उसी समय हम मुक्त हैं। तब देह रहते हुए भी हम मुक्त हैं, देह के बिना मुक्त ही है। भगवान श्रीकृष्ण इस धरा पर आये थे धर्म की संस्थापना के लिए। जब तक वे अध्यात्म ज्ञान का उपदेश न करें, तब तक धर्म संस्थापना नहीं हो सकती थी। क्योंकि धर्म वह होता है जिससे सबकी धारणा हो। समाज की धारणा तभी हो सकती है जब प्रत्येक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से प्रेम हो। प्रेम के बिना धारणा नहीं हो सकती, संगठन नहीं हो सकता। हम लोग राष्ट्रीय एकता की, संगठन आदि की बहुत बातें करते हैं। लेकिन परस्पर द्वेष भी करते रहते हैं। राष्ट्रीय एकता के चाहे जितने नारे लगाते रहें, परन्तु एक दूसरे से प्रेम न कर सकें तो एकता कहाँ से होगी? धारणा कैसे होगी? जब तक हम औरों को जान नहीं लेते तब तक उनसे प्रेम नहीं होता। वे सब हमसे भिन्न कोई अन्य नहीं है, हमारा अपना स्व-स्वरूप ही उन सब के रूप में भासित हो रहा है, इस प्रकार का ज्ञान-अद्वैत ज्ञान हुए बिना प्रेम नहीं हो सकता। जब तक हम अपने आपको दूसरे में देख नहीं लेते तब तक उनसे प्रेम होता नहीं। प्रेम हुये बिना उनकी सेवा होती नहीं। तात्पर्य यही है कि अद्वैत का ज्ञानी ही धर्मसंस्थापना कर सकता है। महाभारत में भी हम देखते हैं कि वहाँ केवल युद्ध या काट-छाँट ही नहीं है, वहाँ भी भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म संस्थापना के लिए अर्जुन को भगवद् गीता का उपदेश दिया है। "राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्।।" गीता जी के प्रस्तुत श्लोक में भगवान ने उस अद्वय अज्ञान को अव्ययम् के साथ-साथ धर्म्य भी कहा है। उद्धव जी भगवान के बाल सखा थे, भगवान के भक्त भी थे। उन्हें भी भगवान ने वही ज्ञान दिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन काल में ये ही दो महत्त्वपूर्ण उपदेश दिये थे। एक अर्जुन को और दूसरा उद्धव जी को। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि हमारी जो एकादश उपाधियाँ हैं---- "पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण, इन्हीं के साथ तादात्म्य करके हम अपने स्वरूप से दूर हट गये हैं।" इसी बात को समझ कर उस तदात्म्य को समाप्त करना है,अपने स्वरूप में स्थित हो जाना है। यही मुक्ति है। इस मोक्ष की प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है। क्योंकि उसके लिए न तो किसी दूसरे देश में - देशान्तर में जाना है न ही दूसरे काल में,न ही उसके लिए कुछ और करना है। जो भी सब हो रहा है, बस उसका दृष्टा बन जाना है, कर्ता नहीं। यही मोक्ष का लक्षण है। कर्ता बनते ही, परिणाम स्वरूप हमें भोक्ता भी बनना ही पड़ता है। यह कर्ता-भोक्ता बनना ही बन्धन है। ज्यों ही दृष्टा बन जाते हैं, त्यों ही मुक्त हो जाते हैं।

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