पशु और पक्षी ही वाहन क्यों? अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक कारणों से भारतीय मनीषियों ने भगवानों के वाहनों के रूप पशु-पक्षियों को जोड़ा है। यह भी माना जाता है कि देवताओं के साथ पशुओं को उनके व्यवहार के अनुरूप जोड़ा गया है। देवी-देवताओं ने अपने वाहन के रूप में कुछ पशु या पक्षियों को चुना है, तो इसके पीछे उनकी विशिष्ठ योग्यता ही रही है। प्रकृति की रक्षा हेतु अगर पशुओं को भगवान के साथ नहीं जोड़ा जाता तो शायद पशु के प्रति हिंसा का व्यवहार और ज्यादा होता। भारतीय मनीषियों ने प्रकृति और उसमें रहने वाले जीवों की रक्षा का एक संदेश दिया है। हर पशु किसी न किसी भगवान का प्रतिनिधि है, उनका वाहन है। इसलिए इनकी हिंसा नहीं करनी चाहिए। श्रीगणेश जी और मूषक मूषक शब्द संस्कृत के मूष से बना है जिसका अर्थ है लूटना या चुराना। मूषक अर्थात चूहा जो कि समस्त विकारों व अविवेक का प्रतीक हैं। बिना जाने कि वह चीज कीमती है, अनमोल हैं, वह उसे नष्ट कर देता हैं। इसी तरह बुद्धिहीन और कुतर्की व्यक्ति भी बिना सोचे समझे, अच्छे बुरे हर काम में बांधा उत्पन्न करते हैं l गणेशजी की मूषक पर सवारी अर्थात उन्होंने इन सभी मूषक रूपी कमजोरियों पर विजय प्राप्त कर ली हैं। मनुष्य का दिमाग मूषक, चुराने वाले यानी चूहे जैसा ही होता है। यह स्वार्थ भाव से घिरा होता है। गणेशजी का चूहे पर बैठना इस बात का संकेत है कि उन्होंने स्वार्थ पर विजय पाई है और जनकल्याण के भाव को अपने भीतर जाग्रत किया है। शिवजी और नंदी नंदी अर्थात बैल बहुत ताकतवर व शक्तिशाली होने के बावजूद शांत रहते हैं l बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह महादेवजी के स्वभाव को दर्शाता है l शिव भोलेनाथ सर्वशक्तिवान होने के बावजूद परमशांत व संयमित हैं। नंदी सफेद रंग का होता है जो स्वच्छता और पवित्रता का ज्ञान करवाता हैं। शिवजी के मंदिरों के सामने बैठे नंदी को जो दर्शाया गया है वास्तव में वह ब्रह्मा बाबा का प्रतीक है जिनके शरीर रुपी रथ पर सवार होकर शिव परमात्मा हम आत्माओं को श्रृंगारित कर सतयुग तक पहुँचाने का परम कर्तव्य करते हैं। माँ दुर्गा देवी और सिंह दुर्गा स्वरुप अर्थात दुर्गुणों को दूर करने वाली व अपने अवगुणों को समाप्त कर सदगुण धारण करने वाली। सबकी इच्छाओं को पूर्ण कर उनको शक्ति प्रदान करने वाली। सिंह जो वाहन के रूप में है उसका तात्पर्य है कि सिंह अर्थात जो पल में दानवो का संहार कर दे। बाघ अदम्य साहस, क्रूरता, आक्रामकता और शौर्यता का प्रतीक है। यह तीनों विशेषताएं मां पार्वती के आचरण में भी देखने को मिलती है। देवी की विभिन्न भुजाओ में अस्त्र-शस्त्र दिखाये हैं। देवी को अष्ट भुजाधारी दुर्गा कहा जाता है। अष्ट भुजाएं आत्मा की अष्ट शक्तियों का प्रतीक हैं---- 1. सहन शक्ति 2. समाने की शक्ति 3. परखने की शक्ति 4. निर्णय लेने की शक्ति 5. सामना करने की शक्ति 6. सहयोग की शक्ति 7.विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति 8. समेटने की शक्ति आत्मा का अपना मूल सतोगुणी स्वरुप ज्ञान, पवित्रता, शान्ति, प्रेम, सुख, आनन्द, शक्ति को याद करने हेतु हम सात कन्याओं का पूजन करते है। माँ सरस्वती और हंस हंस पवित्र, जिज्ञासु और समझदार पक्षी होता है। यह जीवनपर्यन्त एक हंसनी के ही साथ रहता है। परिवार में प्रेम और एकता का यह सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। सरस्वती जी विद्या एवं वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। सरस्वती जी का वाहन हंस है। ‘हन्’ धातु से हंस बना है। नीर-क्षीर-विवेक, दूध का दूध और पानी का पानी कर देना हंस की ही विशेषता है। मानसरोवर में उसका निवास माना गया है। मोती चुगना उसका प्राथमिक कर्तव्य है। श्रेष्ठ पक्षी के रुप में वह सर्व पूज्य है। श्रीलक्ष्मी जी और उल्लू उल्लू सबसे बुद्धिमान‍ निशाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भूत और भविष्‍य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है। उल्लू शुभता व संपति का भी प्रतीक है l ऐसा माना जाता है कि वह एक बुद्धु प्राणी हैं। अर्थात् अत्यधिक धन संपदा को प्राप्त कर व्यक्ति बुद्धिहिन होकर भौतिकता की ओर बढ़ता जा रहा हैं। अध्यात्मिक दृष्टि से अंधता का प्रतीक है। सांसारिक जीवन में लक्ष्मी यानि धन-दौलत के पीछे बिना सोचे-समझे भागने वाला इंसान आत्मज्ञान रूपी सूर्य को नहीं देख पाता है। उल्लू में पांच प्रमुख गुण होते हैं---- पहला गुण उल्लू की दृष्टि तेज होती है। दूसरा गुण उसकी नीरव उड़ान। तीसरा गुण शीतऋतु में भी उड़ने की क्षमता। चौथा गुण उसकी विशिष्ट श्रवण-शक्ति। पांचवा गुण अति धीमे उड़ने की भी योग्यता। उल्लू के ऐसे ऐसे गुण हैं जो अन्य किसी पक्षियों में नहीं है। विष्णुजी व गरूड़ गरुड़ पक्षी के एक तो पंख विशाल होते हैं और वह बहुत ऊँचाई पर उड़ता है l दूसरा उसकी दृष्टि तीक्ष्ण होती है। भगवान विष्णु भी अपनी अवस्था बहुत ऊँची और दृष्टि दूरगामी रख चक्रवर्ती राजा बन पूरी सृष्टि का पालन करते हैं l गरुड़ ही वेद का प्रतीक है। इसमें कायाकल्प करने की अद्भुत क्षमता है। कार्तिकेय जी और मोर कार्तिकेय जी को उनकी तपस्याओं व साधक क्षमताओं से प्रसन्न होकर स्वयं परमात्मा ने यह वाहन भेंट किया था। मोर भी पवित्रता का साधक व तपस्वी है। कलयुग में भी वह योगबल से पूरी पवित्रता को धारण करते हुए जीवन व्यतीत करता है। मयूर का मान चंचल होता है। चंचल मन को साधना बड़ा ही मुश्‍किल होता है। कार्तिकेय ने अपने मन को साथ रखा था। श्रीकृष्ण जी और उनकी साथी गाय कृष्ण जी की हर तस्वीर में गाय भी जरूर नजर आती हैं। गाय का स्वभाव एकदम शांत होता है जो शांति का प्रतीक हैं l उनके चार पैर चार युगो को दर्शाते हैं। उनके द्वारा दिया गया दूध सम्पन्नता का प्रतीक है। साथ में कृष्ण जी, यह सब सतयुगी साम्राज्य को दर्शाते हैं। देवी गंगा और मगर माँ गंगा का वाहन मगरमच्छ माना गया है। जलीय प्राणियों में सर्वाधिक शक्तिशाली और परम वेगवान माना गया है। मकर या मगरमच्छ एक प्रतीक है। जो बताता है हमें जल में रहने वाले हर प्राणी की रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि जल में रहने वाला हर प्राणी पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है और उसकी अनुपस्थिति में पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ जाएगा। इंद्रदेव और हाथी इंद्र देवता का वाहन हाथी दिखाया है। हाथी सूक्ष्मता का प्रतीक है। हाथी शांत, समझदार और तेज बुद्धि का प्रतीक है। यमराज और भैंसा भैंसा एक सामाजिक प्राणी होता है। सभी भैंसे मिलकर एक दूसरे की रक्षा करते हैं। यह एकता का प्रतीक है। भैंसा अपनी शक्ति और फूर्ति के लिए भी जाना जाता है। भैंसा अपनी शक्ति का कभी दुरुपयोग नहीं करता। भैंसा अपनी आत्मरक्षा में ही किसी पर हमला करता है। भैंसे का रूप जिस तरह से भयानक होता है उसी तरह यमराज का रूप भी भयानक है। मृत्यु के देवता यमराज का वाहन भैंसा दिखने में बहुत खतरनाक है लेकिन बिना वजह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता हैं। इसे प्रेत का प्रतिरूप मानने के कारण इसे देखना अशुभ माना गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि धर्मराज की भूमिका कितनी भी खतरनाक हो यदि हम सम्पूर्ण बन चुके है तो धर्मराज भी हमें बिना रोके आगे बढ़ा देगें। शनि और कौवा कौआ एक बुद्धिमान प्राणी है। कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। कौए को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पहले से ही आभास हो जाता है। भैरव और कुत्ता कुत्ता एक रहस्यमयी प्राणी है। कुछ धर्मों में इसे शैतानी माना गया है तो ‍हिन्दू धर्म में इसे कुशाग्र बुद्धि और रहस्यों को जानने वाला प्राणी माना गया है। कई मामलों में यह मनुष्यों की रक्षा करता है। भगवान भैरव ने इसे अपना वाहन तो नहीं बनाया लेकिन वे हमेशा इसे अपने साथ रखते हैं। कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जो भविष्‍य में होने वाली घटनाओं और माध्यम (सूक्ष्म जगत) की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है। कुत्ता कई किलोमीटर तक की गंध सूंघ सकता है। कुत्ते को हिन्दू धर्म में एक रहस्यमय प्राणी माना गया है। लेकिन इसको भोजन कराने से हर तरह के संकटों से बचा जा सकता है। मान्यता है कि देवी-देवता में जिस तरह के गुण होते हैं, उन्हें उसी गुण वाला कोई पशु या पक्षी वाहन के रूप में दिया गया है। यही कारण है कि उनके वाहन भी अलग-अलग।

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श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष स्तोत्र भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं, स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्। सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं, अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्॥ व्रजभूमि के एकमात्र आभूषण, समस्त पापों को नष्ट करने वाले तथा अपने भक्तों के चित्त को आनन्द देने वाले नन्दनन्दन को सदैव भजता हूँ, जिनके मस्तक पर मोरमुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है तथा जो प्रेम-तरंगों के सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं, विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्। करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं, महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्ण वारणम्॥ कामदेव का मान मर्दन करने वाले, बड़े-बड़े सुन्दर चंचल नेत्रों वाले तथा व्रजगोपों का शोक हरने वाले कमलनयन भगवान को मेरा नमस्कार है, जिन्होंने अपने करकमलों पर गिरिराज को धारण किया था तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्र का मान-मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्रीकृष्ण भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं, व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्। यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया, युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्॥ जिनके कानों में कदम्बपुष्पों के कुंडल हैं, जिनके अत्यन्त सुन्दर कपोल हैं तथा व्रजबालाओं के जो एकमात्र प्राणाधार हैं, उन दुर्लभ भगवान कृष्ण को नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजी के सहित अति प्रसन्न यशोदाजी से युक्त हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं, उन गोपनायक गोपाल को नमस्कार करता हूँ। सदैव पादपंकजं मदीय मानसे निजं, दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम्। समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं, समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम्॥ जिन्होंने मेरे मनरूपी सरोवर में अपने चरणकमलों को स्थापित कर रखा है, उन अति सुन्दर अलकों वाले नन्दकुमार को नमस्कार करता हूँ तथा समस्त दोषों को दूर करने वाले, समस्त लोकों का पालन करने वाले और समस्त व्रजगोपों के हृदय तथा नन्दजी की वात्सल्य लालसा के आधार श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं, यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम्। दृगन्तकान्तभंगिनं सदा सदालिसंगिनं, दिने-दिने नवं-नवं नमामि नन्दसम्भवम्।। भूमि का भार उतारने वाले, भवसागर से तारने वाले कर्णधार श्रीयशोदाकिशोर चित्तचोर को मेरा नमस्कार है। कमनीय कटाक्ष चलाने की कला में प्रवीण सर्वदा दिव्य सखियोंसे सेवित, नित्य नए-नए प्रतीत होने वाले नन्दलाल को मेरा नमस्कार है। गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं, सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनं। नवीन गोपनागरं नवीनकेलि-लम्पटं, नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्।। गुणों की खान और आनन्द के निधान कृपा करने वाले तथा कृपा पर कृपा करने के लिए तत्पर देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले गोपनन्दन को मेरा नमस्कार है। नवीन-गोप सखा नटवर नवीन खेल खेलने के लिए लालायित, घनश्याम अंग वाले, बिजली सदृश सुन्दर पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। समस्त गोप मोहनं, हृदम्बुजैक मोदनं, नमामिकुंजमध्यगं प्रसन्न भानुशोभनम्। निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं, रसालवेणुगायकं नमामिकुंजनायकम्।।७।। समस्त गोपों को आनन्दित करने वाले, हृदयकमल को प्रफुल्लित करने वाले, निकुंज के बीच में विराजमान, प्रसन्नमन सूर्य के समान प्रकाशमान श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण अभिलिषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले, वाणों के समान चोट करने वाली चितवन वाले, मधुर मुरली में गीत गाने वाले, निकुंजनायक को मेरा नमस्कार है। विदग्ध गोपिकामनो मनोज्ञतल्पशायिनं, नमामि कुंजकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम्। किशोरकान्ति रंजितं दृगंजनं सुशोभितं, गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम्।। चतुरगोपिकाओं की मनोज्ञ तल्प पर शयन करने वाले, कुंजवन में बढ़ी हुई विरह अग्नि को पान करने वाले, किशोरावस्था की कान्ति से सुशोभित अंग वाले, अंजन लगे सुन्दर नेत्रों वाले, गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त करने वाले, श्रीजी के साथ विहार करने वाले श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ। यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा, मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्। प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान्, भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान।। प्रभो! मेरे ऊपर ऐसी कृपा हो कि जहां-कहीं जैसी भी परिस्थिति में रहूँ, सदा आपकी सत्कथाओं का गान करूँ। जो पुरुष इन दोनों-राधा कृपाकटाक्ष व श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष अष्टकों का पाठ या जप करेगा, वह जन्म-जन्म में नन्दनन्दन श्यामसुन्दर की भक्ति से युक्त होगा और उसको साक्षात् श्रीकृष्ण मिलते हैं।

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"भारतीय संस्कृति’" संस्कृति क्या है ? संस्कृति शब्द संस्कार से जुड़ा है। संस्कार का अर्थ है---- सुधार करना,संशोधन और परिष्कार करना। अंग्रेजी भाषा में उसके लिए ‘कल्चर’ शब्द है, जिसका अर्थ पैदा करना, सुधार करना है। संस्कार व्यक्ति तथा समाज दोनों के होते हैं। जातीय संस्कारों को संस्कृति कहते हैं। किसी देश की जलवायु के अनुसार रहन-सहन की विधियों तथा विचार – परम्पराओं से जातीय संस्कार बनते हैं। ये परम्परा से प्राप्त होते हैं तथा व्यक्ति के पारिवारिक और सामाजिक जीवन में दिखाई देते हैं। संस्कृति के दो पक्ष होते हैं--- बाह्य तथा आन्तरिक। संस्कृति किसी देश-विशेष के भौतिक वातावरण तथा विचारों से जुड़ी होती है। "भाषा और संस्कृति" भाषा का सम्बन्ध किसी देश की जातीय संस्कृति से होता है। कुशल---- शब्द पूजा के लिए कुश लाने। प्रवीण---- शब्द वीणा बजाने से जुड़े हैं। ‘गोधूलि, गवेषणा, गोष्ठी, गवाक्ष, गुरसी आदि शब्द गौ’ से सम्बन्धित हैं। गौ अर्थात गाय का हमारी संस्कृति में विशेष महत्त्व है। "संस्कृति का बाह्य स्वरूप" भारतीय संस्कृति में जमीन पर बैठना, हाथ से खाना, नहाकर खाना, लम्बे ढीले कपड़े पहनना, बेसिले कपड़े पहनना अच्छा माना जाता है। यह भारत की जलवायु तथा आवश्यकता के अनुकूल है। यहाँ हर समय तथा स्थान पर जूते पहनने की मान्यता नहीं है। नहाने को धर्म का अंग माना जाता है। बिना सिले कपड़े धोने में सुविधा की दृष्टि से पवित्र माने जाते हैं। सिर ढकना अच्छा माना जाता है। मांगलिक वस्तुओं का विधान देश के वातावरण तथा रुचि के अनुरूप है। फूलों में कमल को विशेष महत्त्व प्राप्त है। कमल शारीरिक सौन्दर्य का उपमान है---- "नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्।” आम, कदली, दूर्वादल, पूगीफल(सुपाड़ी),श्रीफल को पूजा-पाठ में स्थान दिया गया है। अश्वत्थ (पीपल) को वृक्षों में विशेष महत्ता प्राप्त है। हिमालय, गंगा, गरुड़, बसन्त ऋतु तथा कीर्ति ,वाणी, स्मृति, बुद्धि ,धृति, आदि गुणों को प्राप्त महत्ता भारत की जातीय मनोवृत्ति की परिचायक है। "संस्कृति के आंतरिक अंग" भारतीय संस्कृति में धृति, क्षमा, दया, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध ये दस (मनुस्मति में) धर्म के लक्षण बताये गये हैं। "धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।" सभ्य तथा शिष्ट मनुष्यों में इन लक्षणों के साथ अभय, स्थित-प्रज्ञता, सात्विकता आदि का होना भी जरूरी है। दान देना, मितभाषी होना, यश के लिए विजय प्राप्त करना, पितृऋण चुकाने के लिए गृहस्थ बनना आदि जीवन के आवश्यक कर्तव्य हैं। बचपन में विद्याध्ययन, यौवन में धनोपार्जन तथा सुखभोग, वृद्धावस्था में मुनि वृत्ति धारण करना तथा योग द्वारा शरीर त्यागना भी भारतीय संस्कृति में बताया गया है। 1.आध्यात्मिकता---- इसमें सत्य, अहिंसा, समस्त जीवों को अपने समान समझना, सबका हित चाहना, ईश्वर के न्याय तथा परलोक में विश्वास, आवागमन की मान्यता, नश्वर शरीर का तिरस्कार इत्यादि बातें सम्मिलित हैं। नश्वर शरीर का मोह न होने के कारण भारतीय बड़े से बड़े बलिदानों के लिए तैयार रहे हैं। हमारे यहाँ त्याग, तप तथा संयम की महत्ता रही है। 2.समन्वय बुद्धि ---- आत्मा की एकता के कारण भारत में अनेकता में एकता देखी गई है। इसी से मिलती-जुलती समन्वय की भावना है। भारतीय विचारकों ने सभी वस्तुओं में सत्य के दर्शन किए हैं। हमारे यहाँ धर्म-परिवर्तन को महत्त्व नहीं दिया गया। तुलसीदास ने शैव और वैष्णव, ज्ञान और भक्ति, अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का समन्वय किया था। प्रसाद की कामायनी में ज्ञान, इच्छा और क्रिया का समन्वय हुआ है। 3.वर्णाश्रम----- भारतीय संस्कृति में चार वर्णों तथा चार आश्रमों की व्यवस्था है। इसके अन्तर्गत कार्य विभाजन को महत्त्व दिया गया है। स्वार्थ वश कुछ लोगों ने सामाजिक विभाजन को संकुचित और अपरिवर्तनीय बना दिया। हमारे सभी प्रचारकों तथा सुधारकों ने इसका विरोध किया है। पुरुषसूक्त ने चारों वर्णों को एक ही विराट शरीर का अंग माना है---- "सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्राक्ष: सहस्रपात् । स भूमि सर्वत: स्पृत्वाSत्यतिष्ठद्द्शाङ्गुलम् ।। ततो विराडजायत विराजोSअधि पूरुषः। स जातोSअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः।। ब्राह्मणोSस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्या शूद्रोSअजायत।।" एक ही शरीर के अंगों में कोई ऊँचा-नीचा नहीं होता। 4.अहिंसा, करुणा, मैत्री और विनय----- अहिंसा को हमारी संस्कृति में विशेष महत्व प्राप्त है। करुणा,मैत्री तथा विनय के मूल में अहिंसा की भावना है। "अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥" किसी की हत्या करना ही हिंसा नहीं है, उसका जी दुखाना भी हिंसा है। भारत में सत्य बोलने किन्तु प्रिय बोलने की शिक्षा दी गई है--- "सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ,न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रूयात् , एष धर्मः सनातन:।।" करुणा छोटों के प्रति, मैत्री बराबर वालों के साथ तथा विनय बड़ों के प्रति होती है, किन्तु सभी के प्रति शिष्टता का व्यवहार अपेक्षित है। विद्या से पूर्व विनय आवश्यक है। विनय भारतीय संस्कृति की विशेषता है। 5.प्रकृति-प्रेम---- भारत पर प्रकृति की विशेष कृपा रही है। भारत में विभिन्न ऋतुएँ सुखद तथा आकर्षक रही हैं। यहाँ की पुरियां मोक्षदायिनी ----- "अयोध्या-मथुरामायाकाशीकांचीत्वन्तिका। पुरी द्वारावतीचैव सप्तैते मोक्षदायिकाः।।' नदियाँ मोक्षदायिनी हैं----- "गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु।।" हिमालय प्रेरणा का स्रोत है---- "अनन्तरत्न प्रभवस्य यस्य हिमं, न सौभाग्यविलोपि जातम्। एको हि दोषो गुणसन्निपाते, निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः॥" प्रकृति मानव जीवन का अंग तथा साथी रही है। महर्षि कण्व शकुंतला के पति के घर जाते समय तपोवन के पशु-पक्षियों, लताओं और वृक्षों से उसकी विदाई की आज्ञा चाहते हैं---- "पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या , नादत्ते प्रिय मण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। आद्ये वः कुसुमुप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः , सेयं याति शकुन्तला पति-गृहं सर्वे रनुज्ञायताम्।।" 6.अन्य----- भारतीय संस्कृति में विश्व को एक परिवार माना गया है। अतिथि को देवता मानते हैं--- "अतिथि देवो भव" शोक के स्थान पर आनन्द को अधिक महत्व प्राप्त है। धार्मिक कार्यों में एकान्त साधना को महत्व प्राप्त है। यद्यपि सामूहिक प्रार्थना भी अमान्य नहीं है। हमारे यहाँ सामाजिकता की तुलना में पारिवारिकता का विशेष महत्व है। सम्मिलित परिवार की प्रथा को व्यक्तित्व के विकास में बाधक नहीं बनने देता है किन्तु व्यक्ति वयोवृद्धों के आदर तथा पारिवारिक एकता का विरोधी भी नहीं बनने देता है। 7.समन्वय की आवश्यकता----- भारत में विभिन्न संस्कृतियों का पारस्परिक सम्पर्क हुआ है। इनसे उत्पन्न समस्या का समन्वय द्वारा समाधान करना ही उचित है। किन्तु समन्वय का अर्थ अपना खो देना नहीं है। दूसरी संस्कृतियों की उन्हीं चीजों को स्वीकार करना चाहिए, जिनको अपनाकर हमारी संस्कृति समृद्ध हो सके। भाषा, पोशाक, रहन-सहन आदि में अपनी चीजों को त्यागना जातीय व्यक्तित्व को हानि पहुँचायेगा।

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"रहस्य भरा बाल गीत" अटकन बटकन दही चटाकन, लउहा लाटा बन के काटा । तुहुर-तुहुर पानी गिरय, सावन में करेला फुटय। चल चल बेटा गंगा जाबो, गंगा ले गोदावरी जाबो। आठ नगर पागा गुलाब सिंह राजा,पाका-पाका बेल खाबो बेल के डारा टुटगे भरे कटोरा फुटगे।। इस बाल गीत मे कितना बड़ा सन्देश छिपा है------ 1- अटकन अर्थ---- जीर्ण शरीर हुआ जीव जब भोजन उचित रूप से निगल तक नहीँ पाता अटकने लगता है। 2- बटकन अर्थ--- मृत्युकाल निकट आते ही जब पुतलियाँ उलटने लगती हैं। 3-दही चटाकन अर्थ --- उसके बाद जब जीव जाने के लिए आतुर काल में होता है तो लोग कहते हैं गंगाजल पिलाओ। 4-लउहा लाटा बन के काटा अर्थ----- जब जीव मर गया तब श्मशान भूमि ले जाकर लकड़ियों से जलाना अर्थात जल्दी जल्दी लकड़ी लाकर जलाया जाना । 6-तुहुर-तुहुर पानी गिरय अर्थ---- जल रही चिता के पास खड़े हर जीव की आँखों में आंसू होते हैं। 7-सावन में करेला फुटय अर्थ---- अश्रुपूरित होकर कपाल क्रिया कर मस्तक को फोड़ना । 8-चल चल बेटा गंगा जाबो अर्थ----- अस्थि संचय पश्चात उसे विसर्जन हेतु गंगा ले शजाना। 9-गंगा ले गोदावरी जाबो अर्थ- अस्थि विसर्जित के लिए तीर्थ यात्रा कर घर लौटना। 10-आठ नगर पागा गुलाब सिंह राजा अर्थ----पगबंदी (पगड़ी बांधना) अन्य अन्य गांव से आने वाले पगबंदी करते हैं और आशीर्वाद देते हैं कि आज से आप इस घर के मुखिया हो या राजा हो। 11- पाका-पाका बेल खाबो अर्थ---- घर में पक्वान्न (तेरहवीं अथवा दस गात्र में) खाना और खिलाना। धन संपत्ति बिना महन्त के मिलना। 12-बेल के डारा टुटगे अर्थ---- हमारे परिवार के एक सदस्य कम हो गया। 13- भरे कटोरा फुटगे अर्थ------ उस जीव का इस संसार से नाता छूट गया। भरा पूरा परिवार बिखर गया। यह प्रतीकात्मक बाल गीत इतना बड़ा सन्देश देता रहा और अर्थ समझने में इतने वर्ष लग गए।

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।। सीता राम चरन रति मोरें ।। भगवान के चरणारविन्दों की महिमा उनके चिन्हों की कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है ------ ये चरण चिह्न संत महात्माओं तथा भक्तों के सदा सहायक एवं रक्षक हैं। भक्तमाल ग्रन्थ में महात्मा नाभादास जी की स्वीकृति है – "सीतापति पद नित बसत, एते मंगलदायका। चरण चिन्ह रघुबीर के संतन सदा सहायका।।" श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं------ जो चिह्न श्रीराम के दक्षिण पद में है वे भगवती सीता के वाम पद में है और जो उनके वाम पद में हैं, वे ही श्रीजानकी के दक्षिण पद में हैं--- "यानि चिन्हानि रामस्य चरणे दक्षिणे प्रिये। तानि सर्वाणि जानक्या: पादे तिष्ठन्ति वामके।। यानि चिन्हानि जानक्या दक्षिणे चरणे शिवे । तानि सर्वाणि रामस्य पादे तिष्ठन्ति वामके।।" (महारामायण ४८ । १३-१४) श्री यामुनाचार्य जी के आलवंदारस्तोत्र में----- "कदा पुन: शंखरथांग कल्पक, ध्वजरविंदाङ्कुुशवज्र लाञ्छनम् । त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्द्धानमलंकरिष्यति।।" (आलवन्दारस्तोत्र ३४) गोस्वामी तुलसीदासजी की रामचरितमानस मे – "जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनि पतिनी तरी। नख निर्गता मुनि अंहिसा, त्रैलोक पावनि सुरसरी।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत, बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेंस नित्य भजामहे।।" (उत्तरकाण्ड १२ । छं ४) श्री गोस्वामी जी की गीतावली में ------- "रामचरन अभिराम कामप्रद तीरथ राज बिराजै। संकर हृदय भगति भूतलपर प्रेम अछयबट भ्राजै।। स्यामबरन पद पीठ अरुन तल, लसति बिसद नखस्त्रेनी । जनु रबि सुता सारदा सुरसरि मिलि चली ललित त्रिबेनी।। अंकुस कुलिस कमल धुज सुंदर भँवर तरंग बिलासा । मज्जहि सुर सज्जन मुनिजन मन मुदित मनोहर बासा।। बिनुबिराग जप जाग जोग ब्रत, बिनुतप, बिनु तनु त्यागे । सब सुख सुलभ सद्य तुलसी प्रभु पद प्रयाग अनुरागे।।" आशय यह है कि--- "सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान् राम के मनोहर चरण कमल मानो साक्षात् तीर्थराज होकर विराजमान है । श्री शंकर के हृदय की भक्ति रुप भूमि पर प्रेम मय अक्षय वट सुशोभित है । चरणों का पृष्ठभाग श्यामवर्ण है, तलवे अरुण है तथा उनमें शुक्लवर्ण नखावली शोभित है, मानो यमुना, सरस्वती और गंगा जी ,तीनों मिलकर सुन्दर त्रिवेणी के रूपमें बह चली हों।" तुलसीदास जी का कथन है कि प्रभुके चरणरूप प्रयाग में प्रेम करने से वैराग्य, जप, यज्ञ, रोग, व्रत, तप और शरीर त्याग के बिना ही समस्त सुख तत्काल सुलभ हो जाते है । नाभादास जी के भक्तमाल मे -------- "अंकुस अंबर कुलिस कमल जव धुजा धेनुपद। संख चक्र स्वस्तिक जंबूफल कलस सुधाहृद।। अर्धचंद्र षटकोन मीन बिंदु ऊरधरेखा। अष्टकोन त्रयकोन इंद्रधनु पुरुषविशेषा।। सीतापति पद नित बसत एते मंगलदायका। चरन चिह्न रघुबीर के संतन सदा सहायका।।" (भक्तमाल) श्री राम के दक्षिण पद कमल के और श्री जानकी के वाम पद कमल के चिह्न ------ (१)ऊर्ध्व रेखा (दक्षिण चरण) ---- इसका रंग अरुण-गुलाबी है। इसके अवतार सनक, सनन्दन, सनातन और सनत है। इस चिह्न के ध्यान से महायोग की सिद्धि होती है। ध्यान करने वाले भवसागर से पार हो जाते है। (२)स्वस्तिक ----- इसका रंग पीला है। इसके अवतार श्री नारद मुनि है। यह मङ्गलकारक है, कल्याणप्रद है। श्री शंकर का पार्वती जी से कथन है – "स्वस्तिकादेव संजातं कल्याणं सर्वत: प्रिये।" (महारामायण ४८ । ४०) (३)अष्टकोण----- यह लाल और सफ़ेद रंग का है। यह यन्त्र है। इसके अवतार श्री कपिल मुनि है। इसके ध्यान से अष्टसिद्धि की प्राप्ति होती है । (४)श्री लक्ष्मी जी---- इनका रंग अरुणोदय काल की लालिमा के सदृश है। बडी ही मनोहर है। अवतार साक्षात् लक्ष्मी जी ही है। इनके ध्यान से ऐश्वर्य और समृद्धि मिलती है । (५)हल-- इसका रंग श्वेत है। इसका अवतार श्री बलराम जी का हल है। यह विजयप्रद है। इससे विमल विज्ञान की उपलब्धि होती है। (६)मूसल----- यह धूम्र रंग का है। अवतार मूसल है। इसके ध्यान से शत्रु का नाश होता है । (७) सर्प( शेष )------ इसका रंग श्वेत है। अवतार शेषनाग है। इस चिन्ह का ध्यान करनेवाले को भगवद्भक्ति और शान्ति की प्राप्ति होती है । (८)शर(बाण)----- इसका रंग श्वेत,पीत,अरूण-गुलाबी और हरा है । इसका अवतार बाण है। इसका ध्यान करने वाले के शत्रु नष्ट होते है । (९)अम्बर-वस्त्र----- इसका रंग आसमानी अथवा नीला और बिजली के रंगके समान है। अवतार श्री वराह भगवान् है। इस चिन्ह के ध्यान से भय का नाश होता है। यह भक्तों को दुख देने वाली जड़ता रूपी शीत का हरण करता है । (१०)कमल----- यह लाल- गुलाबी रंग का है। इसका अवतार विष्णु कमल है। इसका ध्यान करने से ध्यानी भगवद्भक्ति पाता है, उसका यश बढता है और मन प्रसन्न रहता है । (११)रथ ----- यह चार घोडों का है। अवतार पुष्पक विमान है। इसका रंग विचित्र - अनेक तरह का है तथा घोड़े सफ़ेद रंग के है। इसका ध्यान करने वाला विशेष पराक्रम से सम्पन्न होता है। (१२) वज्र ---- इसका रंग बिजली के रंग के समान है। इसका अवतार इन्द्र का वज्र है । यह पापों का नाशक तथा बलदायक है । (१३)यव---- इसके अवतार कुबेर हैं । इससे समस्त यज्ञों की उत्पत्ति होती है। इसका रंग श्वेत है। यव के ध्यान से मोक्ष मिलता है, पापका नाश होता है । यह सिद्धि, विद्या, सुमति, सुगति और संपत्ति का निवास स्थान है । (१४) कल्पवृक्ष ---- अवतार कल्पवृक्ष है। इसका रंग हरा है। इससे अर्थ,धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है, समस्त मनोरथ पूरे होते हैं। (१५) अंकुश----- इसका रंग श्याम है। इससे समस्त लोकों के मल का नाश करने वाला ज्ञान उत्पन्न होता है। इसके ध्यान का फल मनोनिग्रह है । (१६)ध्वजा ---- इसका रंग लाल है। यह विचित्र वर्णका भी कहा जाता है। इससे विजय – कीर्ति की प्राप्ति होती है। (१७)मुकुट ----- इसका अवतार दिव्यभूषण है। इसका रंग सुनहला है। इस चिन्ह के ध्यान से परमपद मिलता है । (१८)चक्र ----- अवतार सुदर्शन चक्र है। इसका रंग तपाये हुए सोने की तरह है। यह शत्रु नाश करता है। (१९) सिंहासन ----- अवतार श्रीराम का सिंहासन है। रंग सुनहला है। यह विजयप्रद है,सम्मान प्रदान करता है--- "सिंहासनेन सम्भूतं रामसिंहासनं परम्" (महारामायण ४८ । ४९) (२०) यमदण्ड ------ इसके अवतार धर्मराज है। यह काँसे के रंगका है। इसके ध्यान से यम यातना का नाश होता है,ध्यानी निर्भयता प्राप्त करता है । (२१)चामर ----- इसका रंग सफ़ेद है। अवतार श्रीहयग्रीव हैं। यह राज्य एवं ऐश्वर्य प्रदान करता है। इसके ध्यान से हृदय में निर्मलता आती है, विकार नष्ट होते हैं चन्द्रमा की चंद्रिका के समान प्रकाश उदय होता है। (२२) छत्र ----- अवतार कल्कि है। इसका रंग शुक्ल है। इसका ध्यान करने वाला राज्य तथा ऐश्वर्य पाता है। यह तीनों (दैहिक ,दैविक, भौतिक) तापोंसे रक्षा करता है। मन मे दया भाव लाता है । (२३)नर- पुरुष ------ अवतार दत्तात्रेय है। पुरुष परमेश्वर अथवा ब्रह्म का वाचक है। रंग उज्जवल (गौर) है। इसके ध्यान से भक्ति, शन्ति और सत्वगुण की प्राप्ति होती है। इस चिह्न का रंग सितलोहित भी कहा जाता है । (२४)जयमाला ----- यह बिजली के रंग का है अथवा इसका चित्र विचित्र रंग भी कहा जाता है। इस चिह्न के ध्यान से भगवद्विग्रह के श्रृंगार तथा उत्सव आदि मे प्रीति बढ़ती है । श्रीराम के वाम पद कमल के और श्री जानकी के दक्षिण पद कमल के चिह्न------ (१)सरयू ------ अवतार विरजा-गंगा आदि है। इसका रंग श्वेत है इसके ध्यान से भगवान् राम की भक्ति मिलती है,कलिमूल का नाश होता है। (२) गोपद ----- अवतार कामधेनु है। इसका रंग सफेद और लाल है। इसके ध्यान से प्राणी भवसागर के पार हो जाता है। यह पुण्यप्रद है। इससे भगवद्भक्ति मिलती है । (३)भूमि( पृथ्वी)------ अवतार कमठ है। इसका रंग पीला और लाल है। इसका ध्यान करने से मन में क्षमा भाव बढ़ता है । (४)कलश ---- यह सुनहरा और श्याम है, श्वेत भी कहा जाता है। अवतार अमृत है। इसका ध्यान भक्ति, जीवन्मुक्ति तथा अमरता प्रदान करता है । (५)पताका --- इसका रंग विचित्र है। इसके ध्यान से मन पवित्र होता है। इस ध्वजा चिन्ह से कलि का भय नष्ट होता है । (६)जम्बूफल ------ इसके अवतार गरुड़ हैं। इसका रंग श्याम है। यह मङ्गलकारक है। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष इसके ध्यान के फल है । इससे मनोकामना पूरी होती है । (७)अर्धचन्द्र ----- इसका रंग उज्जवल है। इसके अवतार वामन भगवान् है। इसके ध्यान से भक्ति, शान्ति और प्रकाश की प्राप्ति होती है। मन के दोष नष्ट होते है। तापत्रय का नाश होता है और प्रेमभक्ति बढती है। (८)शंख ----- इसके अवतार वेद, हंस, शंख आदि है। इसका रंग अरुण और श्वेत है। इसका ध्यान करने वाला दम्भ-कपट के मायाजाल से छूट जाता है, उसे विजय प्राप्त होती है तथा उसकी बुद्धि बढ़ती है। यह अनाहत -अनहद नाद का कारण है । (९) षट्कोण ----- अवतार श्री कार्तिकेय है। इसका रंग श्वेत है, लाल भी कहा जाता है। इसका ध्यान करने से षड्विकार ---- "काम, क्रोध, लेभ, मोह, मद और मत्सर का नाश होता है" यह यन्त्ररूप है। इसके ध्यान से षट्सम्पत्ति---- "शम,दम,उपरति,तितिक्षा,श्रद्धा और समाधान की प्राप्ति होती है" (१०)त्रिकोण ----- इसके अवतार परशुरामजी और श्रीहयग्रीव हैं । इसका रंग लाल होता है। यह यन्त्ररूप है। इसके ध्यानसे योग की प्राप्ति होती है । (११) गदा ----- अवतार महाकाली और गदा है। इसका रंग श्याम है। यह दुष्टों का नाश करके ध्यान करनेवाले को जय देता है। (१२) जीवात्मा ----- अवतार जीव है। इसका रंग प्रकाशमय है। इसके ध्यान से शुद्धता बढती है । (१३) बिन्दु ------ अवतार सूर्य और माया है। इसका रंग पीला है। यह वशीकरण तिलकरूप है । इसके ध्यान से भगवान् भक्तके वश में हो जाते है । उसके समस्त पुरुषार्थो की सिद्धि होती है । इसका स्थान अंगूठा है । इससे पाप नष्ट होता है । (१४) शक्ति ------ अवतार मूलप्रकृति, शारदा, महामाया है। इस चिह्न का रंग लाल गुलाबी और पीला है। रक्त -श्याम -सित वर्ण का भी कहा जाता है। इससे श्री शोभा और संपत्ति की उपलब्धि होती है । (१५) सुधाकुण्ड ------ यह सफेद और लाल है। इसके ध्यान से अमृत -अमरता की प्राप्ति होती है। (१६) त्रिवली ------ इसके अवतार श्रीवामन है। इसका रंग हरा, लाल और धवल अर्थात त्रिवेणी का रंग है। इसका यह चिह्न वेदरूप है । ध्यान करने वाला कर्म, उपासना और ज्ञान से संपन्न होता है। उसे भक्ति रस का आस्वादन सुलभ हो जाता है । (१७) मीन ------ इसका रंग रुपहला है, उज्जवल है। यह जगत को वश मे करने वाले कामदेव की ध्वजा है । यह वशीकरण है। इसके ध्यान का फल श्री भगवान् के प्रेम की प्राप्ति है । (१८)पूर्णचन्द्र ----- अवतार चन्द्रमा है। इसका रंग पूर्ण धवल है। यह मोहरुपी तम को हरकर तीनों तापों का नाश करता है। ध्यान करने वाले के मन में सरलता, शान्ति और प्रकाश की वृद्धि होती है । (१९) वीणा –----- इसके अवतार श्रीनारद जी है। इसका रंग पीला, लाल और उज्जवल है। ध्यान करने वाले को राग -रागिनी में निपुणता मिलती है । वह भगवत् यशोगान करता है । (२०) वंशी (वेणु)----- अवतार महानाद है। इसका रंग चित्र-विचित्र है। इसके ध्यान से मधुर शब्द से मन मोहित हो जाता है । मुनियों का मन भी वश मे नहीं रहता । (२१)धनुष ------ अवतार पिनाक और शारंग हैं। इसका रंग हरा, पीला और लाल है। इसके ध्यान से शत्रु का नाश होता है, मृत्यु भय का निवारण होता है । (२२) तूणीर ----- अवतार परशुराम जी हैं। इसका रंग चित्र विचित्र है। इसके ध्यान से भगवान् के प्रति सख्यरस बढता है। ध्यान का फल सप्तभूमि ज्ञान है । (२३) हंस ------ अवतार हंसावतार है। रंग सफ़ेद और गुलाबी है। इसके ध्यान का फल विवेक और ज्ञान की प्राप्ति है। हंस का ध्यान संत महात्माओ के लिये सुखद है । (२४)चंद्रिका ----- इसका रंग सफेद,पीला और लाल है। यह सर्वरंग मय कहा जाता है। इस चिह्न के ध्यान से कीर्ति मिलती है । भगवान् श्रीराम के चरण-चिह्न चिन्तन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके चरण समस्त विभूतियो, ऐश्वर्यो तथा भक्ति मुक्ति और भुक्ति की अक्षय निधि है । भगवद्भक्ति में मग्न भक्त जन्म जन्म तक श्रीराम पद की ही रति-भक्ति चाहते हैं---- "अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम-जनम रति राम पद यह वरदानु न आन॥" जिन प्राणियों को श्रीराम के चरण पंकज चिह्नों का ध्यान और चिन्तन प्रिय है, उनका जीवन सफल और पुण्यमय है। "सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।"

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।। सीता राम चरन रति मोरें ।। भगवान के चरणारविन्दों की महिमा उनके चिन्हों की कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है ------ ये चरण चिह्न संत महात्माओं तथा भक्तों के सदा सहायक एवं रक्षक हैं। भक्तमाल ग्रन्थ में महात्मा नाभादास जी की स्वीकृति है – "सीतापति पद नित बसत, एते मंगलदायका। चरण चिन्ह रघुबीर के संतन सदा सहायका।।" श्रीशंकर जी पार्वती जी से कहते हैं------ जो चिह्न श्रीराम के दक्षिण पद में है वे भगवती सीता के वाम पद में है और जो उनके वाम पद में हैं, वे ही श्रीजानकी के दक्षिण पद में हैं--- "यानि चिन्हानि रामस्य चरणे दक्षिणे प्रिये। तानि सर्वाणि जानक्या: पादे तिष्ठन्ति वामके।। यानि चिन्हानि जानक्या दक्षिणे चरणे शिवे । तानि सर्वाणि रामस्य पादे तिष्ठन्ति वामके।।" (महारामायण ४८ । १३-१४) श्री यामुनाचार्य जी के आलवंदारस्तोत्र में----- "कदा पुन: शंखरथांग कल्पक, ध्वजरविंदाङ्कुुशवज्र लाञ्छनम् । त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्द्धानमलंकरिष्यति।।" (आलवन्दारस्तोत्र ३४) गोस्वामी तुलसीदासजी की रामचरितमानस मे – "जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनि पतिनी तरी। नख निर्गता मुनि अंहिसा, त्रैलोक पावनि सुरसरी।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत, बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेंस नित्य भजामहे।।" (उत्तरकाण्ड १२ । छं ४) श्री गोस्वामी जी की गीतावली में ------- "रामचरन अभिराम कामप्रद तीरथ राज बिराजै। संकर हृदय भगति भूतलपर प्रेम अछयबट भ्राजै।। स्यामबरन पद पीठ अरुन तल, लसति बिसद नखस्त्रेनी । जनु रबि सुता सारदा सुरसरि मिलि चली ललित त्रिबेनी।। अंकुस कुलिस कमल धुज सुंदर भँवर तरंग बिलासा । मज्जहि सुर सज्जन मुनिजन मन मुदित मनोहर बासा।। बिनुबिराग जप जाग जोग ब्रत, बिनुतप, बिनु तनु त्यागे । सब सुख सुलभ सद्य तुलसी प्रभु पद प्रयाग अनुरागे।।" आशय यह है कि--- "सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान् राम के मनोहर चरण कमल मानो साक्षात् तीर्थराज होकर विराजमान है । श्री शंकर के हृदय की भक्ति रुप भूमि पर प्रेम मय अक्षय वट सुशोभित है । चरणों का पृष्ठभाग श्यामवर्ण है, तलवे अरुण है तथा उनमें शुक्लवर्ण नखावली शोभित है, मानो यमुना, सरस्वती और गंगा जी ,तीनों मिलकर सुन्दर त्रिवेणी के रूपमें बह चली हों।" तुलसीदास जी का कथन है कि प्रभुके चरणरूप प्रयाग में प्रेम करने से वैराग्य, जप, यज्ञ, रोग, व्रत, तप और शरीर त्याग के बिना ही समस्त सुख तत्काल सुलभ हो जाते है । नाभादास जी के भक्तमाल मे -------- "अंकुस अंबर कुलिस कमल जव धुजा धेनुपद। संख चक्र स्वस्तिक जंबूफल कलस सुधाहृद।। अर्धचंद्र षटकोन मीन बिंदु ऊरधरेखा। अष्टकोन त्रयकोन इंद्रधनु पुरुषविशेषा।। सीतापति पद नित बसत एते मंगलदायका। चरन चिह्न रघुबीर के संतन सदा सहायका।।" (भक्तमाल) श्री राम के दक्षिण पद कमल के और श्री जानकी के वाम पद कमल के चिह्न ------ (१)ऊर्ध्व रेखा (दक्षिण चरण) ---- इसका रंग अरुण-गुलाबी है। इसके अवतार सनक, सनन्दन, सनातन और सनत है। इस चिह्न के ध्यान से महायोग की सिद्धि होती है। ध्यान करने वाले भवसागर से पार हो जाते है। (२)स्वस्तिक ----- इसका रंग पीला है। इसके अवतार श्री नारद मुनि है। यह मङ्गलकारक है, कल्याणप्रद है। श्री शंकर का पार्वती जी से कथन है – "स्वस्तिकादेव संजातं कल्याणं सर्वत: प्रिये।" (महारामायण ४८ । ४०) (३)अष्टकोण----- यह लाल और सफ़ेद रंग का है। यह यन्त्र है। इसके अवतार श्री कपिल मुनि है। इसके ध्यान से अष्टसिद्धि की प्राप्ति होती है । (४)श्री लक्ष्मी जी---- इनका रंग अरुणोदय काल की लालिमा के सदृश है। बडी ही मनोहर है। अवतार साक्षात् लक्ष्मी जी ही है। इनके ध्यान से ऐश्वर्य और समृद्धि मिलती है । (५)हल-- इसका रंग श्वेत है। इसका अवतार श्री बलराम जी का हल है। यह विजयप्रद है। इससे विमल विज्ञान की उपलब्धि होती है। (६)मूसल----- यह धूम्र रंग का है। अवतार मूसल है। इसके ध्यान से शत्रु का नाश होता है । (७) सर्प( शेष )------ इसका रंग श्वेत है। अवतार शेषनाग है। इस चिन्ह का ध्यान करनेवाले को भगवद्भक्ति और शान्ति की प्राप्ति होती है । (८)शर(बाण)----- इसका रंग श्वेत,पीत,अरूण-गुलाबी और हरा है । इसका अवतार बाण है। इसका ध्यान करने वाले के शत्रु नष्ट होते है । (९)अम्बर-वस्त्र----- इसका रंग आसमानी अथवा नीला और बिजली के रंगके समान है। अवतार श्री वराह भगवान् है। इस चिन्ह के ध्यान से भय का नाश होता है। यह भक्तों को दुख देने वाली जड़ता रूपी शीत का हरण करता है । (१०)कमल----- यह लाल- गुलाबी रंग का है। इसका अवतार विष्णु कमल है। इसका ध्यान करने से ध्यानी भगवद्भक्ति पाता है, उसका यश बढता है और मन प्रसन्न रहता है । (११)रथ ----- यह चार घोडों का है। अवतार पुष्पक विमान है। इसका रंग विचित्र - अनेक तरह का है तथा घोड़े सफ़ेद रंग के है। इसका ध्यान करने वाला विशेष पराक्रम से सम्पन्न होता है। (१२) वज्र ---- इसका रंग बिजली के रंग के समान है। इसका अवतार इन्द्र का वज्र है । यह पापों का नाशक तथा बलदायक है । (१३)यव---- इसके अवतार कुबेर हैं । इससे समस्त यज्ञों की उत्पत्ति होती है। इसका रंग श्वेत है। यव के ध्यान से मोक्ष मिलता है, पापका नाश होता है । यह सिद्धि, विद्या, सुमति, सुगति और संपत्ति का निवास स्थान है । (१४) कल्पवृक्ष ---- अवतार कल्पवृक्ष है। इसका रंग हरा है। इससे अर्थ,धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है, समस्त मनोरथ पूरे होते हैं। (१५) अंकुश----- इसका रंग श्याम है। इससे समस्त लोकों के मल का नाश करने वाला ज्ञान उत्पन्न होता है। इसके ध्यान का फल मनोनिग्रह है । (१६)ध्वजा ---- इसका रंग लाल है। यह विचित्र वर्णका भी कहा जाता है। इससे विजय – कीर्ति की प्राप्ति होती है। (१७)मुकुट ----- इसका अवतार दिव्यभूषण है। इसका रंग सुनहला है। इस चिन्ह के ध्यान से परमपद मिलता है । (१८)चक्र ----- अवतार सुदर्शन चक्र है। इसका रंग तपाये हुए सोने की तरह है। यह शत्रु नाश करता है। (१९) सिंहासन ----- अवतार श्रीराम का सिंहासन है। रंग सुनहला है। यह विजयप्रद है,सम्मान प्रदान करता है--- "सिंहासनेन सम्भूतं रामसिंहासनं परम्" (महारामायण ४८ । ४९) (२०) यमदण्ड ------ इसके अवतार धर्मराज है। यह काँसे के रंगका है। इसके ध्यान से यम यातना का नाश होता है,ध्यानी निर्भयता प्राप्त करता है । (२१)चामर ----- इसका रंग सफ़ेद है। अवतार श्रीहयग्रीव हैं। यह राज्य एवं ऐश्वर्य प्रदान करता है। इसके ध्यान से हृदय में निर्मलता आती है, विकार नष्ट होते हैं चन्द्रमा की चंद्रिका के समान प्रकाश उदय होता है। (२२) छत्र ----- अवतार कल्कि है। इसका रंग शुक्ल है। इसका ध्यान करने वाला राज्य तथा ऐश्वर्य पाता है। यह तीनों (दैहिक ,दैविक, भौतिक) तापोंसे रक्षा करता है। मन मे दया भाव लाता है । (२३)नर- पुरुष ------ अवतार दत्तात्रेय है। पुरुष परमेश्वर अथवा ब्रह्म का वाचक है। रंग उज्जवल (गौर) है। इसके ध्यान से भक्ति, शन्ति और सत्वगुण की प्राप्ति होती है। इस चिह्न का रंग सितलोहित भी कहा जाता है । (२४)जयमाला ----- यह बिजली के रंग का है अथवा इसका चित्र विचित्र रंग भी कहा जाता है। इस चिह्न के ध्यान से भगवद्विग्रह के श्रृंगार तथा उत्सव आदि मे प्रीति बढ़ती है । श्रीराम के वाम पद कमल के और श्री जानकी के दक्षिण पद कमल के चिह्न------ (१)सरयू ------ अवतार विरजा-गंगा आदि है। इसका रंग श्वेत है इसके ध्यान से भगवान् राम की भक्ति मिलती है,कलिमूल का नाश होता है। (२) गोपद ----- अवतार कामधेनु है। इसका रंग सफेद और लाल है। इसके ध्यान से प्राणी भवसागर के पार हो जाता है। यह पुण्यप्रद है। इससे भगवद्भक्ति मिलती है । (३)भूमि( पृथ्वी)------ अवतार कमठ है। इसका रंग पीला और लाल है। इसका ध्यान करने से मन में क्षमा भाव बढ़ता है । (४)कलश ---- यह सुनहरा और श्याम है, श्वेत भी कहा जाता है। अवतार अमृत है। इसका ध्यान भक्ति, जीवन्मुक्ति तथा अमरता प्रदान करता है । (५)पताका --- इसका रंग विचित्र है। इसके ध्यान से मन पवित्र होता है। इस ध्वजा चिन्ह से कलि का भय नष्ट होता है । (६)जम्बूफल ------ इसके अवतार गरुड़ हैं। इसका रंग श्याम है। यह मङ्गलकारक है। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष इसके ध्यान के फल है । इससे मनोकामना पूरी होती है । (७)अर्धचन्द्र ----- इसका रंग उज्जवल है। इसके अवतार वामन भगवान् है। इसके ध्यान से भक्ति, शान्ति और प्रकाश की प्राप्ति होती है। मन के दोष नष्ट होते है। तापत्रय का नाश होता है और प्रेमभक्ति बढती है। (८)शंख ----- इसके अवतार वेद, हंस, शंख आदि है। इसका रंग अरुण और श्वेत है। इसका ध्यान करने वाला दम्भ-कपट के मायाजाल से छूट जाता है, उसे विजय प्राप्त होती है तथा उसकी बुद्धि बढ़ती है। यह अनाहत -अनहद नाद का कारण है । (९) षट्कोण ----- अवतार श्री कार्तिकेय है। इसका रंग श्वेत है, लाल भी कहा जाता है। इसका ध्यान करने से षड्विकार ---- "काम, क्रोध, लेभ, मोह, मद और मत्सर का नाश होता है" यह यन्त्ररूप है। इसके ध्यान से षट्सम्पत्ति---- "शम,दम,उपरति,तितिक्षा,श्रद्धा और समाधान की प्राप्ति होती है" (१०)त्रिकोण ----- इसके अवतार परशुरामजी और श्रीहयग्रीव हैं । इसका रंग लाल होता है। यह यन्त्ररूप है। इसके ध्यानसे योग की प्राप्ति होती है । (११) गदा ----- अवतार महाकाली और गदा है। इसका रंग श्याम है। यह दुष्टों का नाश करके ध्यान करनेवाले को जय देता है। (१२) जीवात्मा ----- अवतार जीव है। इसका रंग प्रकाशमय है। इसके ध्यान से शुद्धता बढती है । (१३) बिन्दु ------ अवतार सूर्य और माया है। इसका रंग पीला है। यह वशीकरण तिलकरूप है । इसके ध्यान से भगवान् भक्तके वश में हो जाते है । उसके समस्त पुरुषार्थो की सिद्धि होती है । इसका स्थान अंगूठा है । इससे पाप नष्ट होता है । (१४) शक्ति ------ अवतार मूलप्रकृति, शारदा, महामाया है। इस चिह्न का रंग लाल गुलाबी और पीला है। रक्त -श्याम -सित वर्ण का भी कहा जाता है। इससे श्री शोभा और संपत्ति की उपलब्धि होती है । (१५) सुधाकुण्ड ------ यह सफेद और लाल है। इसके ध्यान से अमृत -अमरता की प्राप्ति होती है। (१६) त्रिवली ------ इसके अवतार श्रीवामन है। इसका रंग हरा, लाल और धवल अर्थात त्रिवेणी का रंग है। इसका यह चिह्न वेदरूप है । ध्यान करने वाला कर्म, उपासना और ज्ञान से संपन्न होता है। उसे भक्ति रस का आस्वादन सुलभ हो जाता है । (१७) मीन ------ इसका रंग रुपहला है, उज्जवल है। यह जगत को वश मे करने वाले कामदेव की ध्वजा है । यह वशीकरण है। इसके ध्यान का फल श्री भगवान् के प्रेम की प्राप्ति है । (१८)पूर्णचन्द्र ----- अवतार चन्द्रमा है। इसका रंग पूर्ण धवल है। यह मोहरुपी तम को हरकर तीनों तापों का नाश करता है। ध्यान करने वाले के मन में सरलता, शान्ति और प्रकाश की वृद्धि होती है । (१९) वीणा –----- इसके अवतार श्रीनारद जी है। इसका रंग पीला, लाल और उज्जवल है। ध्यान करने वाले को राग -रागिनी में निपुणता मिलती है । वह भगवत् यशोगान करता है । (२०) वंशी (वेणु)----- अवतार महानाद है। इसका रंग चित्र-विचित्र है। इसके ध्यान से मधुर शब्द से मन मोहित हो जाता है । मुनियों का मन भी वश मे नहीं रहता । (२१)धनुष ------ अवतार पिनाक और शारंग हैं। इसका रंग हरा, पीला और लाल है। इसके ध्यान से शत्रु का नाश होता है, मृत्यु भय का निवारण होता है । (२२) तूणीर ----- अवतार परशुराम जी हैं। इसका रंग चित्र विचित्र है। इसके ध्यान से भगवान् के प्रति सख्यरस बढता है। ध्यान का फल सप्तभूमि ज्ञान है । (२३) हंस ------ अवतार हंसावतार है। रंग सफ़ेद और गुलाबी है। इसके ध्यान का फल विवेक और ज्ञान की प्राप्ति है। हंस का ध्यान संत महात्माओ के लिये सुखद है । (२४)चंद्रिका ----- इसका रंग सफेद,पीला और लाल है। यह सर्वरंग मय कहा जाता है। इस चिह्न के ध्यान से कीर्ति मिलती है । भगवान् श्रीराम के चरण-चिह्न चिन्तन से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके चरण समस्त विभूतियो, ऐश्वर्यो तथा भक्ति मुक्ति और भुक्ति की अक्षय निधि है । भगवद्भक्ति में मग्न भक्त जन्म जन्म तक श्रीराम पद की ही रति-भक्ति चाहते हैं---- "अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम-जनम रति राम पद यह वरदानु न आन॥" जिन प्राणियों को श्रीराम के चरण पंकज चिह्नों का ध्यान और चिन्तन प्रिय है, उनका जीवन सफल और पुण्यमय है। "सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।"

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विश्व के प्रथम सन्यासी भगवान श्री हरि विष्णु के अवतार "सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार" थे। जिनकी आयु हमेशा 5 वर्ष की ही रहती हैं, न घटती हैं न बढ़ती हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में लोकपितामह ब्रह्मा ने विविध लोकों को रचने की इच्छा से तपस्या (उद्योग) की । लोकस्रष्टा के उस अखण्ड तप से प्रसन्न होकर विश्वाधार परमप्रभु ने ‘तप’ अर्थवाले ‘सन’ नाम से युक्त होकर - "सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार" इन चार निविृत्ति परायण ऊध्र्वरेता मुनियों के रूप में (ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में) अवतार ग्रहण किया । जब ब्रह्मा जी ने इन्हे उत्पन्न करके निर्देश दिए की जाओ और प्रजाबृद्धि करो। तब चारों ऋषि कुमारो ने यह कहकर इंकार कर दिया कि "श्री हरि विष्णु की आराधना" के आलावा इन्हे कोई अन्य कार्य उचित नहीं लगता। अतः हम केवल हरि भजन ही करेंगे अन्य कोई कार्य नहीं, यह कहकर चारों वहाँ से चले गए। वे जहां भी जाते एक साथ जाते, और वें हमेशा हरि भक्ति में लीन रहते। चारों भाइयों ने एक साथ ही शास्त्रों का अध्ययन किया, उसके कुछ समय पश्चात् भगवान विष्णु ने हंसावतार धारण करके उन चारों ऋषि कुमारों को ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दी। इन चारों कुमारों ने अपना पहला उपदेश देवर्षि नारद को दिया, जिसके बाद नारद से अन्य ऋषियों ने प्राप्त किया, वास्तव में चारों वेद इन्ही चारों कुमारों का स्वरूप हैं, और यही चारों ऋषि ही वेद सामान माने गए हैं, क्योंकि आदिकाल में प्रलय के समय जो वेद लुप्त हो गए थे, उन वेदों को इन्ही चारों ऋषि कुमारों ने हंसावतार से प्राप्त किया। इन्हे आत्मतत्व का सम्पूर्ण ज्ञान था, यही चार कुमार सनातन धर्म के प्रवर्तक आचार्य बने, और सनकादि नाम से प्रसिद्द हुए, सनकादिक नाम से विख्यात चारों कुमारों के नाम में ‘सन’ शब्द हैं। जिस का अर्थ है--- सनक ---- पुरातन। सनन्दन----हर्षित, सनातन----जीवंत सनत् ------चिर तरुण। बुद्धि को अहंकार से मुक्ति का उपाय सनकादि से अभिहित हैं, केवल चैतन्य ही शाश्वत हैं। चैतन्य मनुष्य के शरीर में चार अवस्थाएं----- जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय या प्राज्ञ विद्यमान रहती हैं। इस कारण मनुष्य देह चैतन्य रहता हैं। इन्हीं चारों अवस्थाओं में विद्यमान रहने के कारण चैतन्य मनुष्य को--- सनक सनन्दन सनातन सनत् से संकेतित किया गया हैं। ये चारों कुमार किसी भी प्रकार की अशुद्धि के आवरण से रहित हैं। परिणाम स्वरूप इन्हें दिगंबर वृत्ति वाले जो नित्य नूतन और एक समान रहते हैं---- “कुमार” कहा जाता है। और तत्त्वज्ञ----तत्व ज्ञान से युक्त योगनिष्ठ---योग में निपुण सम-द्रष्टा----सभी को एक सामान देखना तथा ब्रह्मचर्य से युक्त होने के कारण इन्हें ब्राह्मण----- ब्रह्मा-नन्द में निमग्न कहा जाता है।

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"शश्रूषस्व गुरून् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने, भर्तुर्विप्रकृताSपि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गम:। भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी, यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा: कुलस्याधय:।।" अर्थ------- ससुराल में जाकर तुम इन बातों का पालन करना,जो पत्नियाँ इन बातों का पालन करती हैं, वे ‘गृहिणी’ के सम्मान जनक स्थान को प्राप्त करती हैं और जो इनका पालन नहीं करतीं वे उस घर में क्लेश या मानसिक रोग रुप सिद्ध होती हैं। प्रसिद्ध चक्रवर्ती सम्राट भरत की माता शकुन्तला ऋषि कण्व की पालिता पुत्री थी राजा दुष्यन्त से विवाह होने के उपरान्त कण्व ने उसे जो उपदेश दिया है। उसी का उल्लेख महाकवि कालिदास ने "अभिज्ञानशाकुन्तलम्" में किया है। वह उपदेश वधु के लिये गृहस्थाश्रम में पत्नी के कर्तव्यों का ज्ञान कराने वाला साररुप वर्णन है । ऋषि कण्व के उपदेश को कालिदास जी ने एक श्लोक के द्वारा प्रस्तुत किया है जो आज भी प्रासंगिक है ---- 1.गुरुन् शश्रूषस्व------ ससुराल में सास-ससुर आदि बड़ों की सेवा- संभाल करना। 2. सपत्नीजने प्रियसखीवृत्तिं कुरु------ यदि पति की अन्य पत्नियाँ हों तो उनके साथ सहेली के समान मित्रता का व्यव्हार करना । कालिदास जी के समय में राजा कई-कई विवाह कर लेते थे । अतः उस स्थिति में वधू का क्या कर्त्तव्य है, इसका उल्लेख कालिदासजी ने किया है । 3.भर्तुर्विप्रकृता अपि रोषणतया प्रतीपं मा स्म गम: ----- पति के द्वारा कभी उपेक्षा किये जाने के कारण क्रोध में आकर उसके प्रतिकूल (उल्टा बोलना, बदले का व्यव्हार करना, हठ करना, रुष्ट होना आदि) आचरण मत करना। ऐसी स्थिति में सहनशक्ति का प्रदर्शन करके, पति के शांत होने पर उसे समझाना अधिक फलदायक और व्यावहारिक होता है। 4.परिजने भूयिष्ठं दक्षिणा भव------- सेवक और सेविकाओं के प्रति उदारता और दया का भाव रखना। 5. भाग्येषु अनुत्सेकिनी------ सौभाग्य में अथवा धन-ऐश्वर्य की अधिकता में अभिमान न करना। ऐसी पत्नी पति को प्रिय और अन्य सभी के सम्मान की पात्र बनती है।

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