तारा रानी की कथा 〰️〰️🌼🌼〰️〰️ माता के जगराते में महारानी तारा देवी की कथा कहने व सुनने की परम्‍परा प्राचीन काल से चली आई है। बिना इस कथा के जागरण को सम्‍पूर्ण नहीं माना जाता है, यद्यपि पुराणों या ऐतिहासिक पुस्‍तकों में कोई उल्‍लेख नहीं है – तथापि माता के प्रत्‍येक जागरण में इसको सम्मिलित करने का परम्‍परागत विधान है। कथा इस प्रकार है 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ राजा स्‍पर्श मां भगवती का पुजारी था, दिन रात महामाई की पूजा करता था । मां ने भी उसे राजपाट, धन-दौलत, ऐशो-आराम के सभी साधन दिये था, कमी थी तो सिर्फ यह कि उसके घर में कोई संतान न थी, यही गम उसे दिन-रात सताता, वो मां से यही प्रार्थना करता रहता था कि मां मुझे एक लाल बख्‍श दो, ताकि मैं भी संतान का सुख भोग सकूं, मेरे पीछे भी मेरा नाम लेने वाला हो, मेरा वंश भी चलता रहे, मां ने उसकी पुकार सुन ली, एक दिन मां ने आकर राजा को स्‍वप्‍न में दर्शन दिये और कहा है, हे राजन, मैं तेरी भक्ति से बहुत प्रसन्‍न हूं, और तुझे वरदान देती हूं कि तेरे घर में दो कन्‍याएं जन्‍म लेंगी। कुछ समय के बाद राजा के घर में एक कन्‍या ने जन्‍म लिया, राजा ने अपने राज दरबारियों को बुलाया, पण्डितों व ज्‍योतिषों को बुलाया और बच्‍ची की जन्‍म कुण्‍डली तैयार करने का हुक्‍म दिया। पण्डित तथा ज्‍योतिषियों ने उस बच्‍ची की जन्‍म कुण्‍डली तैयार की और कहा हे राजन, यह कन्‍या तो साक्षात देवी है। यह कन्‍या जहां भी कदम रखेगी, वहां खुशियां ही खुशियां होंगी। यह कन्‍या भी भगवती की पुजारिन होगी, उस कन्‍या का नाम तारा रखा गया, थोड़े समय बाद राजा के घर वरदान के अनुसार एक और कन्‍या ने जन्‍म लिया। मंगलवार का दिन था, पण्डितों और ज्‍योतिषियों ने जब जन्‍म कुण्‍डली तैयार की तो उदास हो गये, राजा ने उदासी का करण पूछा तो वे कहने लगे, महाराज यह कन्‍या आपके लिये शुभ नहीं है, राजा ने उदास होकर ज्‍योतिषियों से पूछा कि मैने ऐसे कौन से बुरे कर्म किये हैं जो कि इस कन्‍या ने मेरे घर में जन्‍म लिया है, उस समय ज्‍योतिषियों ने अपनी ज्‍योतिष लगाकर बताया, कहने लगे कि ये दोनो कन्‍याएं जिन्‍होंने आपके घर में जन्‍म लिया है, पिछले जन्‍म में राजा इन्‍द्र की अप्‍सराएं थीं, इन्‍होंने सोचा कि हम भी मृत्‍युलोक में भ्रमण करें तथा देखें कि मृत्‍युलोक पर लोग किस तरह रहते हैं, दोनो ने मृत्‍युलोक पर आ एकादशी का व्रत रखा, बड़ी बहन का नाम तारा था, छोटी बहन का नाम रूक्‍मन, बड़ी बहन तारा ने अपनी छोटी बहन से कहा कि रूक्‍मन आज एकादशी का व्रत है, हम लोगों ने आज भोजन नहीं खाना, तू बाजार जाकर फल ले आ, रूक्‍मन बाजार फल लेने के लिये गई, वहां उसने मछली के पकोड़े बनते देखे। उसने अपने पैसों के तो पकोड़े खा लिये तथा तारा के लिये फल लेकर वापस आ गई, फल उसने तारा को दे दिये, तारा ने पूछा कि तू अपने लिये फल क्‍यों नहीं लाई, तो रूक्‍मन ने बताया कि उसने मछली के पकोड़े खा लिये हैं। उसी वक्‍त तारा ने शाप दिया, जा नीच, तूने एकादशी के दिन मांस खाया है, नीचों का कर्म किया है, जा मैं तुझे शाप देती हूं, तू नीचों की जून पाये। छिपकली बनकर सारी उम्र मांस ही ‘कीड़े-मकोड़े’ खाती रहे, उसी शहर में एक ऋषि गुरू गोरख अपने शिष्‍यों के साथ रहते थे, उनके शिष्‍यों में एक चेला तेज स्‍वभाव का तथा घमण्‍डी था, एक दिन वो घमण्‍डी शिष्‍य पानी का कमण्‍डल भरकर खुले स्‍थान में, एकान्‍त में, जाकर तपस्‍या पर बैठ गया, वो अपनी तपस्‍या में लीन था, उसी समय उधर से एक प्‍यासी कपिला गाय आ गई, उस ऋषि के पास पड़े कमण्‍डल में पानी पीने के लिए उसने मुंह डाला और सारा पानी पी गई, जब कपिता गाय ने मुंह बाहर निकाला तो खाली कमण्‍डल की आवाज सुनकर उस ऋषि की समाधि टूटी। उसने देखा कि गाय ने सारा पानी पी लिया था, ऋषि ने गुस्‍से में आ उस कपिला गाय को बहुत बुरी तरह चिमटे से मारा, वह गाय लहुलुहान हो गई, यह खबर गुरू गोरख को मिली, उन्‍होंने जब कपिला गाय की हालत देखी तो उस ऋषि को बहुत बुरा-भला कहा और उसी वक्‍त आश्रम से निकाल दिया, गुरू गोरख ने गाय माता पर किये गये पाप से छुटकारा पाने के लिए कुछ समय बाद एक यज्ञ रचाया, इस यज्ञ का पता उस शिष्‍य को भी चल गया, जिसने कपिला गाय को मारा था, उसने सोचा कि वह अपने अपमान का बदला जरूर लेगा, यज्ञ शुरू हो गया, उस चेले ने एक पक्षी का रूप धारण किया और चोंच में सर्प लेकर भण्‍डारे में फेंक दिया, जिसका किसी को पता न चला, एक छिपकली ‘जो पिछले जन्‍म में तारा देवी की छोटी बहन थी, तथा बहन के शाप को स्‍वीकार कर छिपकली बनी थी’ सर्प का भण्‍डारे में गिरना देख रही थी, उसे त्‍याग व परोपकार की शिक्षा अब तक याद थी, वह भण्‍डारा होने तक घर की दीवार पर चिपकी समय की प्रतीक्षा करती रही, कई लोगो के प्राण बचाने हेतु उसने अपने प्राण न्‍योछावर कर लेने का मन ही मन निश्‍चय किया, अब खीर भण्‍डारे में दी जाने वाली थी, बांटने वालों की आंखों के सामने वह छिपकली दीवार से कूदकर कढ़ाई में जा गिरी, नादान लोग छिपकली को बुरा-भला कहते हुये खीर की कढ़ाई को खाली करने लगे, उन्‍होंने उसमें मरे हुये सांप को देखा, तब सबको मालूम हुआ कि छिपकली ने अपने प्राण देकर उन सबके प्राणों की रखा की है, उपस्थित सभी सज्‍जनों और देवताओं ने उस छिपकली के लिए प्रार्थना की कि उसे सब योनियों में उत्‍तम मनुष्‍य जन्‍म प्राप्‍त हो तथा अन्‍त में वह मोक्ष को प्राप्‍त करे, तीसरे जन्‍म में वह छिपकली राजा स्‍पर्श के घर कन्‍या जन्‍मी, दूसरी बहन ‘तारा देवी’ ने फिर मनुष्‍य जन्‍म लेकर तारामती नाम से अयोध्‍या के प्रतापी राजा हरिश्‍चन्‍द्र के साथ विवाह किया। राजा स्‍पर्श ने ज्‍योतिषियों से कन्‍या की कुण्‍डली बनवाई ज्‍योतिषियों ने राजा को बताया कि कन्‍या आपके लिये हानिकारक सिद्ध होगी, शकुन ठीक नहीं है, अत: आप इसे मरवा दीजिए, राजा बोले लड़की को मारने का पाप बहुत बड़ा है, मैं उस पाप का भार नहीं बन सकता। तब ज्‍योतिषियों ने विचार करके राय दी, हे राजन । आप एक लकड़ी के सन्‍दूक में ऊपर से सोना-चांदी आदि जड़वा दें, फिर उस सन्‍दूक के भीतर लड़की को बन्‍द करके नदी में प्रवाहित कर दीजिए, सोने चांदी से जड़ा हुआ सन्‍दूक अवश्‍य ही कोई लालच से निकाल लेगा, और आपकी हत्‍या कन्‍या को भी पाल लेगा, आपको किसी प्रकार का पाप न लगेगा, ऐसा ही किया गया और नदी में बहता हुआ सन्‍दूक काशी के समीप एक भंगी को दिखाई दिया वह सन्‍दूक को नदी से बाहर निकाल लाया। उसने जब सन्‍दूक खोला तो सोने-चांदी के अतिरिक्‍त अत्‍यन्‍त रूपवान कन्‍या दिखाई दी, उस भंगी के कोई संतान नहीं थी, उसने अपनी पत्‍नी को वह कन्‍या लाकर दी तो पत्‍नी की प्रसन्‍नता का ठिकाना न रहा, उसने अपनी संतान के समान ही बच्‍ची को छाती से लगा लिया, भगवती की कृपा से उसके स्‍तनो में दूध उतर आया, पति-पत्‍नी दोनो ने प्रेम से कन्‍या का नाम ‘रूक्‍को’ रख दिया, रूक्‍को बड़ी हुई उसका विवाह हुआ। रूक्‍को की सास महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर सफाई आदि का काम करने जाया करती थी, एक दिन वह बीमार पड़ गई, रूक्‍को महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर काम करने के लिये पहुंच गई, महाराज की पत्‍नी तारामती ने जब रूक्‍को को देखा तो वह अपने पूर्व जन्‍म के पुण्‍य से उसे पहचान गई, तारामती ने रूक्‍को से कहा – हे बहन, तुम मेरे यहां निकट आकर बैठो, महारानी की बात सुनकर रूक्‍को बोली- रानी जी, मैं नीच जाति की भंगिन हूं, भला मैं आपके पास कैसे बैठ सकती हूं । तब तारामती ने कहा – बहन, पूर्व जन्‍म में तुम मेरी सगी बहन थी, एकादशी का व्रत खंडित करने के कारण तुम्‍हें छिपकली की योनि में जाना पड़ा जो होना था सो हो चुका, अ‍ब तुम अपने इस जन्‍म को सुधारने का उपाय करो तथा भगवती वैष्‍णों माता की सेवा करके अपना जन्‍म सफल बनाओ, यह सुनकर रूक्‍को को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और उसने उपाय पूछा, रानी ने बताया कि वैष्‍णों माता सब मनोरथों को पूरा करने वाली हैं, जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का पूजन व जागरण करते हैं, उनकी सब मनोकाना पूर्ण होती है । रूक्‍को ने प्रसन्‍न होकर माता की मनौती करते हुये कहा – हे माता, यदि आपकी कृपा से मुझे एक पुत्र प्राप्‍त हो गया तो मैं भी आपका पूजन व जागरण करवाऊंगी । माता ने प्रार्थना को स्‍वीकार कर लिया, फलस्‍वरूप दसवें महीने उसके गर्भ से एक अत्‍यन्‍त सुन्‍दर बालक ने जन्‍म लिया, परन्‍तु दुर्भाग्‍यवश रूक्‍को को माता का पूजन-जागरण कराने का ध्‍यान न रहा। जब वह बालक पांच वर्ष का हुआ तो एक दिन उसे माता (चेचक) निकल आई । रूक्‍को दु:खी होकर अपने पूर्वजन्‍म की बहन तारामती के पास आई और बच्‍चे की बीमारी का सब वृतान्‍त कह सुनाया। तब तारामती ने कहा – तू जरा ध्‍यान करके देख कि तुझसे माता के पूजन में कोई भूल तो नहीं हुई । इस पर रूक्‍को को छह वर्ष पहले की बात याद आ गई। उसने अपराध स्‍वीकार कर लिया, उसने फिर मन में निश्‍चय किया कि बच्‍चे को आराम आने पर जागरण अवश्‍य करवायेगी । भगवती की कृपा से बच्‍चा दूसरे दिन ही ठीक हो गया। तब रूक्‍को ने देवी के मन्दिर में ही जाकर पंडित से कहा कि मुझे अपने घर माता का जागरण करना है, अत: आप मंगलवार को मेरे घर पधार कर कृतार्थ करें। पंडित जी बोले – अरी रूक्‍को, तू यहीं पांच रूपये दे जा हम तेरे नाम से मन्दिर में ही जागरण करवा देंगे तू नीच जाति की स्‍त्री है, इसलिए हम तेरे घर में जाकर देवी का जागरण नहीं कर सकते। रूक्‍को ने कहा – हे पंडित जी, माता के दरबार में तो ऊंच- नीच का कोई विचार नहीं होता, वे तो सब भक्‍तों पर समान रूप से कृपा करती हैं। अत: आपको कोई एतराज नहीं होना चाहिए। इस पर पंडित ने आपस में विचार करके कहा कि यदि महारानी तुम्‍हारे जागरण में पधारें तब तो हम भी स्‍वीकार कर लेंगे। यह सुनकर रूक्‍को महारानी के पास गई और सब वृतान्‍त कर सुनाया, तारामती ने जागरण में सम्मिलित होना सहर्ष स्‍वीकार कर लिया, जिस समय रूक्‍को पंडितो से यह कहने के लिये गई महारानी जी जागरण में आवेंगी, उस समय सेन नाई वहां था, उसने सब सुन लिया और महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र को जाकर सूचना दी । राजा को सेन नाई की बात पर विश्‍वास नहीं हुआ, महारानी भंगियों के घर जागरण में नहीं जा सकती, फिर भी परीक्षा लेने के लिये उसने रात को अपनी उंगली पर थोड़ा सा चीरा लगा लिया जिससे नींद न आए । रानी तारामती ने जब देखा कि जागरण का समय हो रहा है, परन्‍तु महाराज को नींद नहीं आ रही तो उसने माता वैष्‍णों देवी से मन ही मन प्रार्थना की कि हे माता, आप किसी उपाय से राजा को सुला दें ताकि मैं जागरण में सम्मिलित हो सकूं । राजा को नींद आ गई, तारामती रोशनदान से रस्‍सा बांधकर महल से उतरीं और रूक्‍को के घर जा पहुंची। उस समय जल्‍दी के कारण रानी के हांथ से रेशमी रूमाल तथा पांव का एक कंगन रास्‍ते में ही गिर पड़ा, उधर थोड़ी देर बाद राजा हरिश्‍चन्‍द्र की नींद खुल गई। वह भी रानी का पता लगाने निकल पड़ा। उसने मार्ग में कंगन व रूमाल देखा, राजा ने दोनो चीजें रास्‍ते से उठाकर अपने पास रख लीं और जहां जागरण हो रहा था, वहां जा पहुंचा वह एक कोने में चुपचाप बैठकर दृश्‍य देखने लगा। जब जागरण समाप्‍त हुआ तो सबने माता की अरदास की, उसके बाद प्रसाद बांटा गया, रानी तारामती को जब प्रसाद मिला तो उसने झोली में रख लिया। यह देख लोगों ने पूछा आपने प्रसाद क्‍यों नहीं खाया ? यदि आप न खाएंगी तो कोई भी प्रसाद नहीं खाएगा, रानी बोली- तुमने प्रसाद दिया, वह मैने महाराज के लिए रख लिया, अब मुझे मेरा प्रसाद दे दें, अबकी बार प्रसाद ले तारा ने खा लिया, इसके बाद सब भक्‍तों ने मां का प्रसाद खाया, इस प्रकार जागरण समाप्‍त करके, प्रसाद खाने के पश्‍चात् रानी तारामती महल की तरफ चलीं। तब राजा ने आगे बढ़कर रास्‍ता रोक लिया, और कहा- तूने नीचों के घर का प्रसाद खा अपना धर्म भ्रष्‍ट कर लिया, अब मैं तुझे अपने घर कैसे रखूं ? तूने तो कुल की मर्यादा व प्रतिष्‍ठा का भी ध्‍यान नहीं रखा, जो प्रसाद तू अपनी झोली में मेरे लिये लाई है, उसे खिला मुझे भी तू अपवित्र करना चाहती है। ऐसा कहते हुऐ जब राजा ने झोली की ओर देखा तो भगवती की कृपा से प्रसाद के स्‍थान पर उसमें चम्‍पा, गुलाब, गेंदे के फूल, कच्‍चे चावल और सुपारियां दिखाई दीं यह चमत्‍कार देख राजा आश्‍चर्यचकित रह गया, राजा हरिश्‍चन्‍द्र रानी तारा को साथ ले महल लौट आए, वहीं रानी ने ज्‍वाला मैया की शक्ति से बिना माचिस या चकमक पत्‍थर की सहायता के राजा को अग्नि प्रज्‍वलित करके दिखाई, जिसे देखकर राजा का आश्‍चर्य और बढ़ गया। रानी बोली – प्रत्‍यक्ष दर्शन पाने के लिऐ बहुत बड़ा त्‍याग होना चाहिए, यदि आप अपने पुत्र रोहिताश्‍व की बलि दे सकें तो आपको दुर्गा देवी के प्रत्‍यक्ष दर्शन हो जाएंगे। राजा के मन में तो देवी के दर्शन की लगन हो गई थी, राजा ने पुत्र मोह त्‍याग‍कर रोहिताश्‍व का सिर देवी को अर्पण कर दिया, ऐसी सच्‍ची श्रद्धा एवं विश्‍वास देख दुर्गा माता, सिंह पर सवार हो उसी समय प्रकट को गईं और राजा हरिश्‍चन्‍द्र दर्शन करके कृतार्थ हो गए, मरा हुआ पुत्र भी जीवित हो गया। चमत्‍कार देख राजा हरिश्‍चन्‍द्र गदगद हो गये, उन्‍होंने विधिपूर्वक माता का पूजन करके अपराधों की क्षमा मांगी। इसके बाद सुखी रहने का आशीर्वाद दे माता अन्‍तर्ध्‍यान हो गईं। राजा ने तारा रानी की भक्ति की प्रशंसा करते हुऐ कहा हे – तारा तुम्‍हारे आचरण से अति प्रसन्‍न हूं। मेरे धन्‍य भाग, जो तुम मुझे पत्‍नी रूप में प्राप्‍त हुई। आयुपर्यन्‍त सुख भोगने के पश्‍चात् राजा हरिश्‍चन्‍द्र, रानी तारा एवं रूक्‍मन भंगिन तीनों ही मनुष्‍य योनि से छूटकर देवलोक को प्राप्‍त हुये। माता के जागरण में तारा रानी की कथा को जो मनुष्‍य भक्तिपूर्वक पढ़ता या सुनता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सुख-समृद्धि बढ़ती है, शत्रुओं का नाश होता है। इस कथा के बिना माता का जागरण पूरा नहीं माना जाता। ।। बोलो सांचे दरबार की जय ।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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अष्ट लक्ष्मी रूप एवं मंत्र 〰〰🌼〰🌼〰️〰️ माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये माँ लक्ष्मी के अष्टरुपों का नियमित स्मरण करना शुभ फलदायक माना गया है. अष्टलक्ष्मी स्त्रोत कि विशेषता है की इसे करने से व्यक्ति को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है. अगर कोई भक्त यदि माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रुप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि व धन में बढोतरी होती है। व्यापारिक क्षेत्रों में वृद्धि करने में अष्टलक्ष्मी स्त्रोत और श्री यंत्र कि पूजा विश्लेष लाभकारी रहती है. श्री लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रुप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है. पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है. इसे करते समय शास्त्रों में कहे गये सभी नियमों का पालन करना चाहिए और पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए. शुक्रवार के दिन से इसे आरंभ करते हुए जब तक हो सके करें। इसका प्रारम्भ करते समय इसकी संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए और संख्या पूरी होने पर उद्धापन अवश्य करना चाहिए. प्रात: जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए. जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर-स्थान में देवी लक्ष्मी निवास नहीं करती है. लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा और पूजा में रखने के लिये धन के रुप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए. श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पूजन विधि 〰〰🌼〰🌼〰🌼〰〰 स्त्रोत का पाठ करने के लिए घर को गंगा जल से शुद्ध करना चाहिए तथा ईशान कोण की दिशा में माता लक्ष्मी कि चांदी की प्रतिमा या तस्वीर लगानी चाहिए. साथ ही श्री यंत्र भी स्थापित करना चाहिए श्री यंत्र को सामने रख कर उसे प्रणाम करना चाहिए और अष्टलक्ष्मियों का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम करना चहिए, इसके पश्चात उक्त मंत्र बोलना चाहिए. पूजा करने के बाद लक्ष्मी जी कि कथा का श्रवण भी किया जा सकता है. माँ लक्ष्मी जी को खीर का भोग लगाना चाहिए और धूप, दीप, गंध और श्वेत फूलों से माता की पूजा करनी चाहिए. सभी को खीर का प्रसाद बांटकर स्वयं खीर जरूर ग्रहण करनी चाहिए. ॥ श्रीअष्टलक्ष्मीस्तुतिः ॥ आदिलक्ष्मीः 〰〰〰〰 सुमनोवन्दितसुन्दरि माधवि चन्द्रसहोदरि हेममयि मुनिगणकाङ्क्षितमोक्षप्रदायिनि मञ्जुलभाषिणि वेदनुते । पङ्कजवासिनि देवसुपूजिते सद्गुणवर्षिणि शान्तियुते जय जय हे मधुसूदनकामिनि आदिलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ धान्यलक्ष्मीः 〰〰〰 अयि कलिकल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमयि क्षीरसमुद्भवमङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते । मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रितपादयुगे जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ धैर्यलक्ष्मीः 〰〰〰 जय वरवर्णिनि वैष्णवि भार्गवि मन्त्रस्वरूपिणि मन्त्रमयि सुरगणविनुते अतिशयफलदे ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते । भवभयहारिणि पापविमोचिनि साधुसमाश्रितपादयुगे जय जय हे मधुसूदनकामिनि धैर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ गजलक्ष्मीः 〰〰〰 जय जय दुर्गतिनाशिनि कामिनि बहुदे शुभकलहंसगते रथगजतुरगपदादिसमावृतपरिजनमण्डितराजनुते । सुरवरधनपतिपद्मजसेविततापनिवारकपादयुगे जय जय हे मधुसूदनकामिनि गजलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ सन्तानलक्ष्मीः 〰〰〰〰 अयि खगवाहे मोहिनि चक्रिणि रागविवर्धिनि सन्मतिदे गुणगणवारिधे लोकहितैषिणि नारदतुम्बुरुगाननुते । सकलसुरासुरदेवमुनीश्वरभूसुरवन्दितपादयुगे जय जय हे मधुसूदनकामिनि सन्तानलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ विजयलक्ष्मीः 〰〰〰〰 कमलनिवासिनि सद्गतिदायिनि विज्ञानविकासिनि काममयि अनुदिनमर्चितकुङ्कुमभासुरभूषणशोभि सुगात्रयुते । सुरमुनिसंस्तुतवैभवराजितदीनजानाश्रितमान्यपदे जय जय हे मधुसूदनकामिनि विजयलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ ऐश्वर्यलक्ष्मीः 〰〰〰〰 प्रणतसुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमयि मणिगणभूषितकर्णविभूषणकान्तिसमावृतहासमुखि । नवनिधिदायिनि कलिमलहारिणि कामितवरदे कल्पलते जय जय हे मधुसूदनकामिनि ऐश्वर्यलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ धनलक्ष्मीः 〰〰〰 धिमिधिमिधिन्धिमिदुन्दुमदुमदुमदुन्दुभिनादविनोदरते बम्बम्बों बम्बम्बों प्रणवोच्चारशङ्खनिनादयुते । वेदपुराणस्मृतिगणदर्शितसत्पदसज्जनशुभफलदे जय जय हे मधुसूदनकामिनि धनलक्ष्मि परिपालय माम् ॥ ।इति श्रीअष्टलक्ष्मीस्तुतिः सम्पूर्णा। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 अष्टलक्ष्मी स्तुति 〰〰🌼〰〰 माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये माँ लक्ष्मी के अष्टरुपों का नियमित स्मरण करना शुभ फलदायक माना गया है. अष्टलक्ष्मी स्त्रोत कि विशेषता है की इसे करने से व्यक्ति को धन और सुख-समृ्द्धि दोनों की प्राप्ति होती है. घर-परिवार में स्थिर लक्ष्मी का वास बनाये रखने में यह विशेष रुप से शुभ माना जाता है. अगर कोई भक्त यदि माता लक्ष्मी के अष्टस्त्रोत के साथ श्री यंत्र को स्थापित कर उसकी भी नियमित रुप से पूजा-उपासना करता है, तो उसके व्यापार में वृद्धि व धन में बढोतरी होती है। व्यापारिक क्षेत्रों में वृद्धि करने में अष्टलक्ष्मी स्त्रोत और श्री यंत्र कि पूजा विश्लेष लाभकारी रहती है. श्री लक्ष्मी जी की पूजा में विशेष रुप से श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करना शुभ कहा गया है. पूजा में श्वेत वस्तुओं का प्रयोग करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है. इसे करते समय शास्त्रों में कहे गये सभी नियमों का पालन करना चाहिए और पूर्ण विधि-विधान से करना चाहिए. शुक्रवार के दिन से इसे आरंभ करते हुए जब तक हो सके करें। इसका प्रारम्भ करते समय इसकी संख्या का संकल्प अवश्य लेना चाहिए और संख्या पूरी होने पर उद्धापन अवश्य करना चाहिए. प्रात: जल्दी उठकर पूरे घर की सफाई करनी चाहिए. जिस घर में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता है, उस घर-स्थान में देवी लक्ष्मी निवास नहीं करती है. लक्ष्मी पूजा में दक्षिणा और पूजा में रखने के लिये धन के रुप में सिक्कों का प्रयोग करना चाहिए. श्री अष्टलक्ष्मी स्तोत्र पूजन विधि 〰〰🌼〰🌼〰🌼〰〰 स्त्रोत का पाठ करने के लिए घर को गंगा जल से शुद्ध करना चाहिए तथा ईशान कोण की दिशा में माता लक्ष्मी कि चांदी की प्रतिमा या तस्वीर लगानी चाहिए. साथ ही श्री यंत्र भी स्थापित करना चाहिए श्री यंत्र को सामने रख कर उसे प्रणाम करना चाहिए और अष्टलक्ष्मियों का नाम लेते हुए उन्हें प्रणाम करना चहिए, इसके पश्चात उक्त मंत्र बोलना चाहिए. पूजा करने के बाद लक्ष्मी जी कि कथा का श्रवण भी किया जा सकता है. माँ लक्ष्मी जी को खीर का भोग लगाना चाहिए और धूप, दीप, गंध और श्वेत फूलों से माता की पूजा करनी चाहिए. सभी को खीर का प्रसाद बांटकर स्वयं खीर जरूर ग्रहण करनी चाहिए। माँ लक्ष्मी के 8 रूप माने जाते है।हर रूप विभिन्न कामनाओ को पूर्ण करने वाला है। नवरात्रि दिवाली और हर शुक्रवार को माँ लक्ष्मी के इन सभी रूपों की वंदना करने से असीम सम्पदा और धन की प्राप्ति होती है। १) आदि लक्ष्मी या महालक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ माँ लक्ष्मी का सबसे पहला अवतार जो ऋषि भृगु की बेटी के रूप में है। मंत्र 〰️〰️ सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवी चन्द्र सहोदरीहेममये | मुनिगणमंडित मोक्षप्रदायिनी मंजुलभाषिणीवेदनुते || पंकजवासिनी देवसुपुजित सद्रुणवर्षिणी शांतियुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी आदिलक्ष्मी सदापलीमाम || २) धन लक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️ धन और वैभव से परिपूर्ण करने वाली लक्ष्मी का एक रूप भगवान विष्णु भी एक बारे देवता कुबेर से धन उधार लिया जो समय पर वो चूका नहीं सके , तब धन लक्ष्मी ने ही विष्णु जी को कर्ज मुक्त करवाया था। मंत्र 〰️〰️ धिमिधिमी धिंधिमी धिंधिमी धिंधिमी दुन्दुभी नाद सुपूर्णमये | घूमघूम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनाद सुवाद्यनुते || वेदपूराणेतिहास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी धनलक्ष्मी रूपेण पालय माम || ३) धान्य लक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️〰️ धान्य का मतलब है अनाज : मतलब वह अनाज की दात्री है। मंत्र 〰️〰️ अहिकली कल्मषनाशिनि कामिनी वैदिकरुपिणी वेदमये | क्षीरमुद्भव मंगलरूपिणी मन्त्रनिवासिनी मन्त्रनुते | | मंगलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रित पाद्युते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी धान्यलक्ष्मी सदा पली माम|| ४) गज लक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️〰️ उन्हें गज लक्ष्मी भी कहा जाता है, पशु धन की देवी जैसे पशु और हाथियों, वह राजसी की शक्ति देती है ,यह कहा जाता है गज - लक्ष्मी माँ ने भगवान इंद्र को सागर की गहराई से अपने खोए धन को हासिल करने में मदद की थी। देवी लक्ष्मी का यह रूप प्रदान करने के लिए है और धन और समृद्धि की रक्षा करने के लिए है। मंत्र 〰️〰️ जयजय दुर्गतिनाशिनी कामिनी सर्वफलप्रद शास्त्रमये | रथगज तुरगपदादी समावृत परिजनमंडित लोकनुते || हरिहर ब्रम्हा सुपूजित सेवित तापनिवारिणी पादयुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी गजलक्ष्मी रूपेण पलेमाम || ५) सनातना लक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सनातना लक्ष्मी का यह रूप बच्चो और अपने भक्तो को लम्बी उम्र देने के लिए है। वह संतानों की देवी है। देवी लक्ष्मी को इस रूप में दो घड़े , एक तलवार , और एक ढाल पकड़े , छह हथियारबंद के रूप में दर्शाया गया है ; अन्य दो हाथ अभय मुद्रा में लगे हुए है एक बहुत ज़रूरी बात उनके गोद में एक बच्चा है। मंत्र 〰️〰️ अहिखग वाहिनी मोहिनी चक्रनि रागविवर्धिनी लोकहितैषिणी स्वरसप्त भूषित गाननुते सकल सूरासुर देवमुनीश्वर || मानववन्दित पादयुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी संतानलक्ष्मी त्वं पालयमाम || ६) वीरा धैर्य लक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जीवन में कठिनाइयों पर काबू पाने के लिए, लड़ाई में वीरता पाने ले लिए शक्ति प्रदान करती है। मंत्र 〰️〰️ जयवरवर्णिनी वैष्णवी भार्गवी मन्त्रस्वरूपिणी मन्त्रम्ये | सुरगणपूजित शीघ्रफलप्रद ज्ञानविकासिनी शास्त्रनुते || भवभयहारिणी पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते | जय जय हे मधुसुदन कामिनी धैर्यलक्ष्मी सदापलेमाम || ७) विजया लक्ष्मी या जया लक्ष्मी : 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ विजया का मतलब है जीत। विजय लक्ष्मी जीत का प्रतीक है और उन्हें जाया लक्ष्मी भी कहा जाता है। वह एक लाल साड़ी पहने एक कमल पर बैठे, आठ हथियार पकडे हुए रूप में दिखाई गयी है । मंत्र 〰️〰️ जय कमलासनी सद्रतिदायिनी ज्ञानविकासिनी गानमये | अनुदिनमर्चित कुमकुमधूसर-भूषित वासित वाद्यनुते || कनकधस्तुति वैभव वन्दित शंकर देशिक मान्य पदे | जय जय हे मधुसुदन कामिनी विजयलक्ष्मी सदा पालय माम || ८) विद्या लक्ष्मी 〰️〰️〰️〰️〰️ विद्या का मतलब शिक्षा के साथ साथ ज्ञान भी है ,माँ यह रूप हमें ज्ञान , कला , और विज्ञानं की शिक्षा प्रदान करती है जैंसा माँ सरस्वती देती है। विद्या लक्ष्मी को कमल पे बैठे हुए देखा गया है , उनके चार हाथ है , उन्हें सफेद साडी में और दोनों हाथो में कमल पकड़े हुए देखा गया है , और दूसरे दो हाथ अभया और वरदा मुद्रा में है। मंत्र 〰️〰️ प्रणत सुरेश्वरी भारती भार्गवी शोकविनासिनी रत्नमये | मणिमयभूषित कर्णविभूषण शांतिसमवृत हास्यमुखे || नवनिधिदायिनी कलिमहरिणी कामित फलप्रद हस्त युते | जय जय हे मधुसुदन कामिनीविद्यालक्ष्मी सदा पालय माम || 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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*अनसुनी कथाएँ* (((((( जब माता सीता बन गई चण्डी )))))) 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 एक समय की बात है कि भगवान् श्री राम राज सभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहाँ पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हडबड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे – हे राम ! मुझे बचाइये, कुम्भकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है न लंका बचेगी और न मेरा राज पाठ। भगवान श्री राम द्वारा ढांढस बंधाये जाने और पूरी बात बताये जाने पर विभीषण ने बताया कि कुम्भकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था। इसलिये उस का नाम मूलकासुर रखा गया है। इसे अशुभ जानकर कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था। जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया। मूलकासुर बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या कर के ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया, अब उनके दिये वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राज पाट मुझे सौंप दिया है वह तब से भन्नाया हुआ है। भगवन आपने जिस दिन मुझे राज पाठ सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही वह पाताल वासियों के साथ लंका पहुँच कर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने छः महिने तक मुकाबला किया पर ब्र्ह्मा जी के वरदान ने उसे इतना ताकत वर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा। अपने बेटे, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिये भाग कर यहाँ पहुँचा हूँ। उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारुंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूँगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरन्त कीजिये। भक्त की पुकार सुन श्रीराम जी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े। मूलकासुर को श्री राम चंद्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिये लंका के बाहर आ डटा।भयानक युद्ध छिड़ गया और सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्री राम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे। हनुमान् जी भी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। सब कुछ होते हुये भी पर युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दीख रहा था अतः भगवान् चिन्ता में थे। विभीषण ने बताया कि रोजाना मूलकासुर तंत्र साधना करने गुप्त गुफा में जाता है। उसी समय ब्रह्मा जी वहाँ आये और भगवान से कहने लगे – ‘रघुनन्दन ! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जायेगा। श्री राम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदे मंद हो सकता है। जब इसके भाई-बंधु लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी हो कर कहा, ‘चण्डी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया – ‘दुष्ट ! तुने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया। यह देखकर बाकी मुनि उस के डर से चुप चाप खिसक गये। तो हे राम, अब कोई दूसरा उपाय नहीं है।अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहाँ बुला कर इसका वध करवाइये, इतना कह कर ब्रह्मा जी चले गये।भगवान् श्री राम ने हनुमान जी और गरुड़ को तुरन्त पुष्पक विमान से सीता जी को लाने भेजा। सीता देवी-देवताओं की मन्नत मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गा जी की पूजा करती कि विजयी श्री राम शीघ्र लौटें। तभी गरुड़ और हनुमान् जी उनके पास पहुँचे और राम जी का संदेश सुनाया। पति के संदेश को सुन कर सीता तुरन्त चल दीं। भगवान श्री राम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया । उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चण्डी के वेश में लंका की ओर बढ चलीं। इधर श्री राम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जा कर तहस नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंच कर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किट किटाता हुआ सब छोड़ छाड़ कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया। युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन ? अभी भाग जा, मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता। छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा, ‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ, तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मार कर उसका बदला चुकाउंगी। इतना कह कर छाया सीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाये। कुछ देर तक घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चला कर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया। वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा। राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौट कर सीता के शरीर में प्रवेश कर गयी। मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय जयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्री राम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आये। 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰

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