जन्म कुंडली के दशम (पिता व कर्म) भाव मे गुरु का संभावित फल 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ (पिता व कर्म भाव)👉 गुरु यहां नैसर्गिक रूप से केन्द्राधिपति दोष से दूषित है परन्तु यदि गुरु की सेवा की जाये अथवा आवश्यकता होने पर रत्न धारण किया जाये तो जातक अवश्य ही धनवान, राज्य में सम्मान प्राप्त करने वाला, अच्छे चरित्र का तथा अपने साथ पिता के नाम को भी यश देता है। ऐसा जातक स्वयं के पुरुषार्थ से ही सभी प्रकार की सुविधायें प्राप्त करता है। उसके पास उच्च स्तर के वाहन तथा सभी प्रकार की सुविधायें होती हैं। यहां पर कुछ ज्ञानियों के मत अलग हैं। यहां तक तो सबका मत एक ही है कि जातक अत्यधिक सुविधा सम्पन्न तथा धनी होता यहां तकता। परंतु यह सब उसको अपने पिता से प्राप्त होता है यहा का गुरु जातक को सत्कार्य ये युक्त पुण्यात्मा धार्मिक स्वभाव का, प्रत्येक क्षेत्र में लाभ प्राप्त करने के साथ जातक अपने माता-पिता का भक्त होता है। शत्रु भी उससे भय खाते हैं लेकिन उसमें एक कमी यह होती है कि वह प्रत्येक क्षेत्र में अपने विचार रखता है अर्थात् स्वतंत्र विचारों वाला होता है। ऐसा व्यक्ति अहिंसा प्रिय, अति महत्त्वाकांक्षी तथा अपने रहन-सहन को सदैव उच्च स्तरीय रखता है। मैंने अपने अनुभव में देखा है कि उपरोक्त सभी बातें गुरु के शुभ प्रभाव में होने पर होती हैं। यदि गुरु किसी पाप प्रभाव में हो तो जातक को अपने भाइयों तक से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है। जातक का गुरु किसी भी स्थिति में हो, लेकिन वह अपनी माता को देवी समान पूजता है। मैंने अपने शोध में एक बात और देखी है कि गुरु यदि कर्क, मिथुन, तुला, कुंभ अथवा वृश्चिक राशि में हो तो बचपन से ही जातक के कन्धों पर जिम्मेदारी आ जाती है अर्थात् कम आयु में ही उसके पिता का देहान्त हो जाता है। मैंने यह योग 85 प्रतिशत घटित होते देखा है। अगर पिता की पत्रिका के आधार पर वह जीवित रहे तो फिर उसका अपने पुत्र से विवाद रखता है। इस पर भी यदि किसी अन्य शुभ योग से उनमें विवाद न हो तो दोनों यदि एक साथ कोई कार्य करें तो उसमें वह असफल रहते हैं। उनके किसी कार्य से उन्हें राजदण्ड अथवा बदनामी भी मिल सकती है। अलग-अलग होते ही वह सफल होने लगते हैं। यहां पर गुरु यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुभ) में हो तो जातक के संतान कम होती है। स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में गुरु के प्रभाव से संतान अधिक हो सकती है। ऐसे जातक यदि सरकारी ठेके जिनमें उच्च अधिकारी की मदद की आवश्यकता होती है अथवा शिक्षा के क्षेत्र, स्वतंत्र व्यवसाय के साथ आयात-निर्यात में भी सफल हो सकते हैं। मैंने अपने शोध में इस भाव के गुरु में भी देखा है कि हमें यदि गुरु से उपरोक्त लाभ प्राप्त करने हैं तो अवश्य ही गुरु रत्न धारण करना होगा अथवा गुरु की पूजा-अर्चना करनी होगी अन्यथा हानि के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। क्रमशः.... अगले लेख में हम गुरु के एकादश (आय भाव) मे होने पर मिलने वाले प्रभावों के विषय मे चर्चा करेंगे। पं देवशर्मा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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नारीरूप धरकर राधाजी की परीक्षा लेने आए थे नंदलाल 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 लीलाधारी भगवान कृष्ण की लीला अद्भुत है एक बार तो श्रीराधाजी की प्रेम परीक्षा लेने के लिए नारी बन उनके महल में पहुंच गए. श्रीगर्ग संहिता से सुंदर कृष्ण कथा शाम को श्रीराधाजी अपने राजमंदिर के उपवन में सखियों संग टहल रही थीं तभी बागीचे के द्वार के पास मणिमंडप में एक अनजान पर बेहद सुंदर युवती को खड़े देखा. वह बेहद सुंदर थी. उसके चेहरे की चमक देख श्रीराधा की सभी सहेलियां अचरज से भर गईं. श्रीराधा ने गले लगाकर स्वागत किया और पूछा- सुंदरी सखी तुम कौन हो, कहां रहती हो और यहां कैसे आना हुआ? श्रीराधा ने कहा- तुम्हारा रूप तो दिव्य है. तुम्हारे शरीर की आकृति मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण जैसी है. तुम तो मेरे ही यहां रह जाओ. मैं तुम्हारा वैसे ही ख्याल रखूंगी जैसे भौजाई, अपनी ननद का रखती है. यह सुनकर युवती ने कहा- मेरा घर गोकुल के नंदनगर में नंदभवन के उत्तर में थोड़ी ही दूरी पर है. मेरा नाम गोपादेवी है. मैंने ललिता सखी से तुम्हारे रूप-गुण के बारे में बहुत सुन रखा था इसलिए तुम्हें देखने के लोभ से चली आई. थोड़ी ही देर में गोपदेवी श्रीराधा और बाकी सखियों से साथ घुल-मिलकर गेंद खेलने और गीत गाने के बाद बोली- मैं दूर रहती हूं. रास्ते में रात न हो जाए इसलिए मैं अब जाती हूं. उसके जाने की बात सुन श्रीराधा की आंख से आंसू बहने लगे. वह पसीने-पसीने हो वहीं बैठ गईं. सखियों ने तत्काल पंखा झलना शुरू किया और चंदन के फूलों का इत्र छिड़कने लगी. यह देख गोपदेवी बोली- सखि राधा मुझे जाना ही होगा. पर तुम चिंता मत करो सुबह मैं फिर आ जाउंगी. अगर ऐसा न हो तो मुझे गाय, गोरस और भाई की सौगंध है. यह कह वह सुंदरी चली गई. सुबह थोड़ी देर से गोपादेवी श्रीराधाजी के घर फिर आयी तो वह उसे भीतर ले गयीं और कहा- मैं तुम्हारे लिए रात भर दुखी रही. अब तुम्हारे आने से जो खुशी हो रही है उसकी तो पूछो नहीं. श्रीराधाजी की प्रेम भरी बातें सुनने के बावजूद जब गोपादेवी ने कोई जवाब नहीं दिया और अनमनी बनी रही तो श्री राधाजी ने गोपादेवी की इस खामोशी की वजह पूछा. गोपादेवी बोली- आज मैं दही बेचने निकली. संकरी गलियों के बीच नन्द के श्याम सुंदर ने मुझे रास्ते में रोक लिया और लाज शरम ताक पर रख मेरा हाथ पकड़ कर बोला कि मैं कर (टैक्स) लेने वाला हूं. मुझे कर के तौर पर दही का दान दो. मैंने डपट दिया. चलो हटो, अपने आप ही कर लेने वाला बन कर घूमने वाले लंपट मैं तो कतई तुम्हें कोई कर न दूंगी. उसने लपक कर मेरी मटकी उतारी और फोड़कर दही पीने के बाद मेरी चुनरी उतार कर गोवर्धन की ओर चल दिया. इसी से मैं क्षुब्ध हूं. श्रीराधेजी इस बात पर हंसने लगीं तो गोपदेवी बोली- सखी यह हंसने की बात नहीं है. वह कला कलूटा, ग्वाला, न धनवान, न वीर, आचरण भी अच्छे नहीं, मुझे तो वह निर्मोही भी लगता है. सखी ऐसे लड़के से तुम कैसे प्रेम कर बैठी. मेरी मानो तो उसे दिल से निकाल दो. श्रीराधा जी बोलीं- तुम्हारा नाम गोपदेवी किसने रखा? वह ग्वाला है इसलिए सबसे पवित्र है. सारा दिन पवित्र पशु गाय की चरणों की धूल से नहाता है. तुम उन्हें निर्धन ग्वाला कहती हो? जिनको पाने को लक्ष्मी तरस रही हैं. ब्रह्माजी, शिवजी भी श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं. उनको काला कलूटा और उसे निर्बल बताती हो जिसने बकासुर, कालिया नाग, यमलार्जुन, पूतना जैसों का चुटकी में वध कर ड़ाला. जो अपने भक्तों के पीछे पीछे इसलिए घूमते हैं कि उनकी चरणों की धूल मिल जाये. उसे निर्दयी कहती है. गोपदेवी बोली- राधे तुम्हारा अनुभव अलग है और मेरा अलग. किसी अकेली युवती का हाथ पकड जबरन दही छीनकर पी लेना क्या सज्जनों के गुण हैं? श्रीराधे ने कहा- इतनी सुंदर होकर भी उनके प्रेम को नहीं समझ सकी! बड़ी अभागिन है. यह तो तेरा सौभाग्य था पर तुमने उसको गलत समझ लिया. गोपदेवी बोली- अच्छा तो मैं अपना सौभाग्य समझ के सम्मान भंग कराती. अब बात बढ़ गई थी. आखिर में गोपदेवी बोली- अगर तुम्हारे बुलाने से श्रीकृष्ण यहां आ जाते हैं तो मैं मान लूंगी कि तुम्हारा प्रेम सच्चा है और वह निर्दयी नहीं है. और यदि नहीं आये तो…? इस पर राधा रानी बोलीं कि यदि नहीं आये तो मेरा सारा धन, भवन तेरा. शर्त लगाकर श्रीराधा आंख मूंद ध्यान में बैठ श्रीकृष्ण का एक-एक नाम लेकर पुकारने लगीं. जैसे जैसे श्रीराधा का ध्यान और दिल से की जाने वाली पुकार बढ रही थी सामने बैठी गोपदेवी का शरीर कांपता जा रहा था. श्रीराधा के चेहरे पर अब आंसुओं की झड़ी दिखने लगी. माया की सहायता से गोपदेवी का रूप लिए भगवान श्रीकृष्ण समझ गये कि प्रेम की ताकत के आगे अब यह माया नहीं चलने वाली, मेरा यह रूप छूटने वाला है. वे रूप बदलकर श्री राधे-राधे कहते प्रकट हो गए और बोले- राधारानी आपने बुलाया. मैं भागता चला आ गया. श्रीराधाजी चारों ओर देखने लगीं तो श्रीकृष्ण ने पूछा, अब किसको देख रही हैं. वे बोली- गोपदेवी को बुलाओ, वह कहाँ गई? श्रीकृष्ण बोले- जब मैं आ रहा था तो कोई जा रही थी, कौन थी? राधा रानी ने उन्हें सारी बातें बतानी शुरू की और श्रीकृष्ण सुनने चले गए. मंद-मंद मुस्काते हुए श्रीकृष्ण ने कहा- आप बहुत भोली हैं. ऐसी नागिनों को पास मत आने दिया करें. (स्रोत: श्रीगर्ग संहिता) ॐ जय श्री श्याम ॐ 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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शनि दोष निवारण के उपाय (भाव/लग्न अनुसार) 🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹 कुंडली के प्रत्येक भाव/लग्न में उपस्तिथ शनि के कष्ट निवारण के उपाय 🔹 👉 प्रथम भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय :- 1👉 अपने ललाट पर प्रतिदिन दूध अथवा दही का तिलक लगाए। 2👉 शनिवार केदिन न तो तेल लगाए और न ही तेल खाए। 3👉 तांबे के बने हुए चार साँप शनिवार के दिन नदी में प्रवाहित करे। 4👉 भगवान शनिदेव या हनुमान जी के मंदिर में जाकर यह प्रथना करे की प्रभु ! हमसे जो पाप हुए हैं, उनके लिए हमे क्षमा करो, हमारा कल्याण करो। 5👉 जब भी आपको समय मिले शनि दोष निवारण मंत्र का जाप करे। 🔹दूसरे भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 शराब का त्याग करे और मांसाहार भी न करे। 2👉 साँपो को दूध पिलाए कभी भी साँपो को परेशान न करे , न ही मारे। 3👉 दो रंग वाली गाय / भैस कभी भी न पालें। 4👉 अपने ललाट पर दूध / दही का तिलक करे। 5👉 रोज शनिवार को कडवे तेल का दान करें। 6👉 शनिवार के दिन किसी तालाब, नदी में मछलियों को आटा डाले। 7👉 सोते समय दूध का सेवन न करें। 8👉 शनिवार के दिन सिर पर तेल न लगाएं। 🔹तीसरे भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 आपके घर का मुख्य दरवाजा यदि दक्षिण दिशा की ओर हो तो उसे बंद करवा दे। 2👉 रोज शनि चालीसा पढ़ें तथा दूसरों को भी शनि चालीसा भेंट करें। 3👉 शराब का त्याग करे और मांसाहार भी न करे। 4👉 गले में शनि यंत्र धारण करें। 5👉 मकान के आखिर में एक अंधेरा कमरा बनवाएँ। 6👉 अपने घर पर एक काला कुत्ता पाले तथा उस का ध्यान रखें। 7👉 घर क अंदर कभी हैंडपम्प न लगवाएँ। 🔹चतुर्थ भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 रात में दूध न पिये। 2👉 पराई स्त्री से अवैध संबंध कदापि न बनाएँ। 3👉 कौवों को दना खिलाएँ। 4👉 सर्प को दूध पिलाएँ। 5👉 काली भैस पालें। 6👉 कच्चा दूध शनिवार दिन कुएं में डालें। 7👉 एक बोतल शराब शनिवार के दिन बहती नदी में प्रवाहित करें 🔹पंचम भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय👇 1👉 पुत्र के जन्मदिन पर नमकीन वस्तुएं बांटनी चाहिए, मिठाई आदि नहीं। 2👉 माँस और शराब का सेवन न करें। 3👉 काला कुत्ता पालें और उसका पूरा ध्यान रखें। 4👉 शनि यंत्र धारण करें। 5👉 शनिदेव की पुजा करें। 6👉 शनिवार के दिन अपने भार के दसवें हिस्से के बराबर वजन करके, बादाम नदी में प्रवाहित करने का कार्य करें। 🔹छठवे भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 चमड़े के जूते , बैग , अटैची आदि काप्रयोग न करें। 2👉 शनिवार का व्रत करें। 3👉 चार नारियल बहते पानी में प्रवाहित करें। ध्यान रहे, गंदे नाले मे नहीं करें, परिणाम बिल्कुल उल्टा होगा। 4👉 हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी नियमित रूप से खिलाएँ। 5👉 शनि यंत्र धारण करें। 🔹सप्तम भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 पराई स्त्री से अवैध संबंध कदापि न बनाएँ। 2👉 हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी नियमितरूप से खिलाएँ। 3👉 शनि यंत्र धारण करें। 4👉 मिट्टी के पात्र में शहद भरकर खेत में मिट्टी के नीचे दबाएँ। खेत की जगह बगीचे में भी दबा सकते हैं। 5👉 अपने हाथ में घोड़े की नाल का शनि छल्ला धारण करें। 🔹अष्टम भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 गले में चाँदी की चेन धारण करें। 2👉 शराब का त्याग करे और मांसाहार भी न करे। 3👉 शनिवार के दिन आठ किलो उड़द बहती नदी में प्रवाहित करें। उड़द काले कपड़े में बांध कर ले जाएँ और बंधन खोल कर ही प्रबहित करें। 4👉 सोमवार के दिन चावल का दान करना आपके लिए उत्तम हैं। 5👉 काला कुत्ता पालें और उसका पूरा ध्यान रखें। 🔹नवम भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 पीले रंग का रुमाल सदैव अपने पास रखें। 2 👉 साबुत मूंग मिट्टी के बर्तन में भरकर नदी में प्रवाहित करें। 3👉 सवा 6 रत्ती का पुखराज ज्योतिषी से पूछ कर गुरुवार को धारण करें। 4👉 कच्चा दूध शनिवार दिन कुएं में डालें। 5👉 हर शनिवार के दिन काली गाय को घी से चुपड़ी हुई रोटी नियमितरूप से खिलाएँ। 6👉 शनिवार के दिन किसी तालाब, नदी में मछलियों को आटा डाले। 🔹दशम भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 1👉 पीले रंग का रुमाल सदैव अपने पास रखें। 2👉 आप अपने कमरे के पर्दे , बिस्तर का कवर , दीवारों का रंग आदि पीला रंग की करवाए यह आप के लिए उत्तम रहेगा। 3👉 पीले लड्डू गुरुवार के दिन बाँटे। 4👉 आपने नाम से मकान न बनवाएँ। 5👉 अपने ललाट पर प्रतिदिन दूध अथवा दही का तिलक लगाए। 6👉 शनि यंत्र धारण करें। 7👉 जब भी आपको समय मिले शनि दोष निवारण मंत्र का जाप करे। 🔹एकादश भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय👇 1👉 शराब और माँस से दूर रहें। 2👉 मित्र के वेश मे छुपे शत्रुओ से सावधान रहें। 3👉 सूर्योदय से पूर्व शराब और कड़वा तेल मुख्य दरवाजे के पास भूमि पर गिराएँ। 4👉 परस्त्री गमन न करें। 5👉 शनि यंत्र धारण करें। 6👉 कच्चा दूध शनिवार के दिन कुएं में डालें। 7👉 कौवों को दाना खिलाएँ। 🔹द्वादश भाव में शनि हो तो कष्ट निवारण के उपाय 👇 1👉 जातक झूठ न बोले। 2👉 शराब और माँस से दूर रहें। 3👉 चार सूखे नारियल बहते पानी में प्रवाहित करें। 4👉 शनि यंत्र धारण करें। 5👉 शनिवार के दिन काले कुत्ते ओर गाय को रोटी खिलाएँ। 6👉 शनिवार को कडवे तेल , काले उड़द का दान करे। 7👉 सर्प को दूध पिलाएँ। 🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹

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पत्नी वामांगी क्यों कहलाती है? 〰️〰️🔸〰️🔸〰️🔸〰️〰️ शास्त्रों में पत्नी को वामंगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है बाएं अंग का अधिकारी। इसलिए पुरुष के शरीर का बायां हिस्सा स्त्री का माना जाता है। इसका कारण यह है कि भगवान शिव के बाएं अंग से स्त्री की उत्पत्ति हुई है जिसका प्रतीक है शिव का अर्धनारीश्वर शरीर। यही कारण है कि हस्तरेखा विज्ञान की कुछ पुस्तकों में पुरुष के दाएं हाथ से पुरुष की और बाएं हाथ से स्त्री की स्थिति देखने की बात कही गयी है। शास्त्रों में कहा गया है कि स्त्री पुरुष की वामांगी होती है इसलिए सोते समय और सभा में, सिंदूरदान, द्विरागमन, आशीर्वाद ग्रहण करते समय और भोजन के समय स्त्री पति के बायीं ओर रहना चाहिए। इससे शुभ फल की प्राप्ति होती। वामांगी होने के बावजूद भी कुछ कामों में स्त्री को दायीं ओर रहने के बात शास्त्र कहता है। शास्त्रों में बताया गया है कि कन्यादान, विवाह, यज्ञकर्म, जातकर्म, नामकरण और अन्न प्राशन के समय पत्नी को पति के दायीं ओर बैठना चाहिए। पत्नी के पति के दाएं या बाएं बैठने संबंधी इस मान्यता के पीछे तर्क यह है कि जो कर्म संसारिक होते हैं उसमें पत्नी पति के बायीं ओर बैठती है। क्योंकि यह कर्म स्त्री प्रधान कर्म माने जाते हैं। यज्ञ, कन्यादान, विवाह यह सभी काम पारलौकिक माने जाते हैं और इन्हें पुरुष प्रधान माना गया है। इसलिए इन कर्मों में पत्नी के दायीं ओर बैठने के नियम हैं। क्या आप जानते हैं????? सनातन धर्म में पत्नी को पति की वामांगी कहा गया है, यानी कि पति के शरीर का बांया हिस्सा, इसके अलावा पत्नी को पति की अर्द्धांगिनी भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पत्नी, पति के शरीर का आधा अंग होती है, दोनों शब्दों का सार एक ही है, जिसके अनुसार पत्नी के बिना पति अधूरा है। पत्नी ही पति के जीवन को पूरा करती है, उसे खुशहाली प्रदान करती है, उसके परिवार का ख्याल रखती है, और उसे वह सभी सुख प्रदान करती है जिसके वह योग्य है, पति-पत्नी का रिश्ता दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है, चाहे सोसाइटी कैसी भी हो, लोग कितने ही मॉर्डर्न क्यों ना हो जायें, लेकिन पति-पत्नी के रिश्ते का रूप वही रहता है, प्यार और आपसी समझ से बना हुआ। हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ महाभारत में भी पति-पत्नी के महत्वपूर्ण रिश्ते के बारे में काफी कुछ कहा गया है, भीष्म पितामह ने कहा था कि पत्नी को सदैव प्रसन्न रखना चाहिये, क्योंकि, उसी से वंश की वृद्धि होती है, वह घर की लक्ष्मी है और यदि लक्ष्मी प्रसन्न होगी तभी घर में खुशियां आयेगी, इसके अलावा भी अनेक धार्मिक ग्रंथों में पत्नी के गुणों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया गया है। आज हम आपको गरूड पुराण, जिसे लोक प्रचलित भाषा में गृहस्थों के कल्याण की पुराण भी कहा गया है, उसमें उल्लिखित पत्नी के कुछ गुणों की संक्षिप्त व्याख्या करेंगे, गरुण पुराण में पत्नी के जिन गुणों के बारे में बताया गया है, उसके अनुसार जिस व्यक्ति की पत्नी में ये गुण हों, उसे स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिये, कहते हैं पत्नी के सुख के मामले में देवराज इंद्र अति भाग्यशाली थे, इसलिये गरुण पुराण के तथ्य यही कहते हैं। सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता।। गरुण पुराण में पत्नी के गुणों को समझने वाला एक श्लोक मिलता है, यानी जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है, गृह कार्य में दक्ष से तात्पर्य है वह पत्नी जो घर के काम काज संभालने वाली हो, घर के सदस्यों का आदर-सम्मान करती हो, बड़े से लेकर छोटों का भी ख्याल रखती हो। जो पत्नी घर के सभी कार्य जैसे- भोजन बनाना, साफ-सफाई करना, घर को सजाना, कपड़े-बर्तन आदि साफ करना, यह कार्य करती हो वह एक गुणी पत्नी कहलाती है, इसके अलावा बच्चों की जिम्मेदारी ठीक से निभाना, घर आये अतिथियों का मान-सम्मान करना, कम संसाधनों में भी गृहस्थी को अच्छे से चलाने वाली पत्नी गरुण पुराण के अनुसार गुणी कहलाती है, ऐसी पत्नी हमेशा ही अपने पति की प्रिय होती है। प्रियवादिनी से तात्पर्य है मीठा बोलने वाली पत्नी, आज के जमाने में जहां स्वतंत्र स्वभाव और तेज-तरार बोलने वाली पत्नियां भी है, जो नहीं जानती कि किस समय किस से कैसे बात करनी चाहियें, इसलिए गरुण पुराण में दिए गए निर्देशों के अनुसार अपने पति से सदैव संयमित भाषा में बात करने वाली, धीरे-धीरे व प्रेमपूर्वक बोलने वाली पत्नी ही गुणी पत्नी होती है। पत्नी द्वारा इस प्रकार से बात करने पर पति भी उसकी बात को ध्यान से सुनता है, व उसके इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करता है, परंतु केवल पति ही नहीं, घर के अन्य सभी सदस्यों या फिर परिवार से जुड़े सभी लोगों से भी संयम से बात करने वाली स्त्री एक गुणी पत्नी कहलाती है, ऐसी स्त्री जिस घर में हो वहां कलह और दुर्भाग्य कबीनहीं आता। पतिपरायणा यानी पति की हर बात मानने वाली पत्नी भी गरुण पुराण के अनुसार एक गुणी पत्नी होती है, जो पत्नी अपने पति को ही सब कुछ मानती हो, उसे देवता के समान मानती हो तथा कभी भी अपने पति के बारे में बुरा ना सोचती हो वह पत्नी गुणी है, विवाह के बाद एक स्त्री ना केवल एक पुरुष की पत्नी बनकर नये घर में प्रवेश करती है, वरन् वह उस नये घर की बहु भी कहलाती है, उस घर के लोगों और संस्कारों से उसका एक गहरा रिश्ता बन जाता है। इसलिए शादी के बाद नए लोगों से जुड़े रीति-रिवाज को स्वीकारना ही स्त्री की जिम्मेदारी है, इसके अलावा एक पत्नी को एक विशेष प्रकार के धर्म का भी पालन करना होता है, विवाह के पश्चात उसका सबसे पहला धर्म होता है कि वह अपने पति व परिवार के हित में सोचे, व ऐसा कोई काम न करे जिससे पति या परिवार का अहित हो। गरुण पुराण के अनुसार जो पत्नी प्रतिदिन स्नान कर पति के लिए सजती-संवरती है, कम बोलती है, तथा सभी मंगल चिह्नों से युक्त है, जो निरंतर अपने धर्म का पालन करती है तथा अपने पति का ही हीत सोचती है, उसे ही सच्चे अर्थों में पत्नी मानना चाहियें, जिसकी पत्नी में यह सभी गुण हों, उसे स्वयं को देवराज इंद्र ही समझना चाहियें। जय श्री राम! जय महादेव! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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स्वरविज्ञान और ज्योतिष शास्त्र 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ मानव-शरीर पंचतत्त्वों का बना हुआ ब्रह्माण्ड का ही एक छोटा स्वरूप है। ईश्वर की असीम कृपा से जन्म के साथ ही मानव को स्वरोदय-ज्ञान मिला है। यह विशुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिक ज्ञान-दर्शन है, प्राण ऊर्जा है, विवेक शक्ति है। संसार के सब जीवों में से मनुष्य ही एकमात्र कर्म योनि है। शेष सब भोग योनियाँ हैं। स्वर-साधना से ही हमारे ऋषि-मुनियों आदि ने अनुभव से भूत, भविष्य और वर्तमान को जाना है। अब यह मनुष्य के हाथों में है कि इस स्वरोदय- विज्ञान का कितना उपयोग और उपभोग करता है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र में अंक-ज्योतिष, स्वप्न-ज्योतिष, स्वरोदय-ज्योतिष, शकुन-ज्योतिष, सामुद्रिक-हस्तज्योतिष, शरीरसर्वांगलक्षण ज्योतिष आदि पर अनेकानेक ग्रन्थ हैं। इन सबमें अति प्राचीन, तत्काल प्रभाव और परिणाम देने वाला स्वरोदय-विज्ञान है।मनुष्य की नासिका में दो छिद्र हैं-दाहिना और बायाँ। दोनों छिद्रों में से केवल एक छिद्र से ही वायु का प्रवेश और बाहर निकलना होता रहता है। दूसरा छिद्र बन्द रहता है। जब दूसरे छिद्र से वायु का प्रवेश और बाहर निकलना प्रारम्भ होता है तो पहला छिद्र स्वत ही स्वाभाविक रूप से बन्द हो जाता है अर्थात् एक चलित रहता है तो दूसरा बन्द हो जाता है। इस प्रकार वायुवेग के संचार की क्रिया-श्वास-प्रश्वास को ही स्वर कहते हैं। स्वर ही साँस है। साँस ही जीवन का प्राण है। स्वर का दिन-रात २४ घंटे बना रहना ही जीवन है। स्वर का बन्द होना मृत्युका प्रतीक है। स्वर का उदय सूर्योदय के समय के साथ प्रारम्भ होता है। साधारणतया स्वर प्रतिदिन प्रत्येक अढ़ाई घड़ी पर अर्थात एक-एक घंटे के बाद दायाँ से बायाँ और बायाँ से दायाँ बदलते हैं और इन घड़ियों के बीच स्वरोदय के साथ पाँच तत्त्व-पृथ्वी (20 मिनट), जल (16 मिनट), अग्नि (12 मिनट), वायु (8 मिनट), आकाश (4 मिनट) भी एक विशेष समय-क्रम से उदय होकर क्रिया करते रहते हैं। प्रत्येक (दाहिना-बायाँ) स्वर का स्वाभाविक गति से 1 घंटा-900 श्वास संचार का क्रम होता है और पाँच तत्त्व 60 घड़ी में 12 बार बदलते हैं। एक स्वस्थ व्यक्तिकी श्वास-प्रश्वास-क्रिया दिन-रात अर्थात् 24 घंटे में 21600 बार होती है। नासिका के दाहिने छिद्र को दाहिना स्वर या सूर्यस्वर या पिंगला नाडी-स्वर कहते हैं और बायें छिद्र को बायाँ स्वर या चन्द्रस्वर या इडा नाडी-स्वर कहते हैं। इन स्वरों का आत्मानुभव व्यक्ति स्वयं मन से ही करता है कि कौन-सा स्वर चलित है, कौन-सा स्वर अचलित है। यही स्वरविज्ञान ज्योतिष है। कभी-कभी दोनों छिद्रों से वायु-प्रवाह एक साथ निकलना प्रारम्भ हो जाता है, जिसे सुषुम्ना नाड़ी-स्वर कहते हैं । इसे उभय-स्वर भी कहते हैं । शरीर की रीढ़की - हड्डी में ऊपर मस्तिष्क से लगाकर मूलाधारचक्र (गुदद्वार) तक सुषुम्ना नाड़ी रहती है। इस नाड़ी के बायीं ओर चन्द्रस्वर नाड़ी और दायीं ओर सूर्यस्वर नाड़ी रहती है। स्वर-संचार-क्रिया में अनेकानेक प्राणवाही नाड़ियाँ होती हैं, जिसमें प्रमुख इडा, पिंगला और सुषुम्ना ही हैं। हमारे शरीरमें 72 हजार नाड़ियों (धमनियों, शिराओं, कोशिकाओं) का जाल फैला हुआ होता है, जिसका नियन्त्रण-केन्द्र मस्तिष्क है। मस्तिष्क से उत्पन्न मन के शुभ-अशुभ : विचारों का प्रभाव नाड़ी तन्त्र पर पड़ता है, जिससे स्वरों की संचार गति धीमी और तेज हो जाती है। इसका प्रभाव मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठानचक्र, मणिपूरचक्र, अनाहतचक्र, विशुद्धचक्र, आज्ञाचक्र और सहस्त्रारचक्र पर भी पड़ता है। इससे शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों एवं घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। यही स्वरोदय ज्योतिष है। स्वरोदय-विज्ञान में चन्द्रमा को अधिष्ठात्री माना गया है। वर्षभर की अनुकूलता-प्रतिकूलता के सन्तुलन का पता चैत्रशुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक स्वर-संचार गति को देखकर मालूम किया जाता है कि वर्ष कैसा रहेगा? इन तीन दिनों की तिथि में सूर्योदय के समय शय्यात्याग के साथ प्रातःकाल चन्द्रस्वर (बायाँ स्वर)-का उदय-संचार अनुकूल-शुभ माना जाता है, जबकि सुर्यस्वर का उदय-संचार प्रतिकूल-अशुभ माना गया है। चन्द्रमा की गति के अनुसार प्रत्येक मास में पन्द्रह-पन्द्रह दिनों के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। इनमें तिथियों की गणना सुर्योदय के समय से ही दिन-रात 24 घंटे की मानी जाती है। सुर्योदय के साथ स्वर और तिथियों का नैसर्गिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। स्वस्थ पुरुष का स्वरोदय दोनों पक्षों में निम्न प्रकार है। शुक्लपक्ष में स्वरोदय👉 शुक्लपक्षमें 1, 2, 3, 7, 8, 9, 13, 14, 15 (पूर्णिमा) तिथियों तक प्रात: काल सूर्योदय काल में शय्या त्याग के साथ चन्द्रस्वर (बायें स्वर) का संचार होता है और इसी प्रकार 4, 5, 6, 10,11, 12 तिथियों को सूर्यस्वर (दायें स्वर) का संचार होता है। कृष्ण पक्ष में स्वरोदय👉 कृष्णपक्षमें 1, 2, 3, 7, 8, 9, 13, 14, 15 (अमावस्या) तिथियों में सूर्योदयकाल में प्रात:काल शय्यात्याग के साथ सूर्यस्वर (दाहि ने स्वर)- का संचार होता है। इसी प्रकार 4, 5, 6, 10, 11, 12 तिथियों को चन्द्रस्वर का संचार होता है। कभी-कभी तिथि के घटनेपर 2 दिन में और बढ़ने पर 4 दिन में स्वर स्वत: बदल जाते हैं। स्वरों के गुण, धर्म, प्रकृति और कार्य👉 (1) चन्द्रस्वर में सभी प्रकार के स्थिर, सौम्य और शुभ कार्य करने चाहिये। यह स्वर साक्षात् देवी स्वरूप है। यह स्वर शीतल प्रकृति का होने से गर्मी और पित्तजनित रोगोंसे रक्षा करता है। (2) सूर्यस्वर में सभी प्रकार के चलित, कठिन कार्य करने से सफलता मिलती है। यह स्वर साक्षात् शिवस्वरूप है। उष्ण प्रकृति का होने से सर्दी, कफजनित रोगों से रक्षा करता है। इस स्वर में भोजन करना, औषधि बनाना, विद्या और संगीत का अभ्यास आदि कार्य सफल होते हैं। (3) सुषुम्ना स्वर साक्षात् कालस्वरूप है। इसमें ध्यान, धारणा, समाधि, प्रभु-स्मरण और कीर्तन श्रेयस्कर है। स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता-आरोग्यता के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मनुष्य बड़ा उदासीन है। वह यम-नियम, आहार-विहार, आचार-विचार रहन-सहन, जल्दी सोना, जल्दी उठना आदि अनेकानेक नियमों तथा सिद्धान्तों का पालन करता दिखायी नहीं देता। इसके विपरीत देर से सोने तथा देर से उठने का फैशन बन गया है। इसके परिणामस्वरूप स्वरों की गति-चाल में अनियमितता पैदा होने से व्यक्ति बीमार हो जाता है, रोगग्रस्त हो जाता है। वह चिकित्सा में धन और समय दोनों का व्यय करता है। जबकि स्वरोदय सरल, सुबोध, सस्ती, अहिंसक और अनौषधि चिकित्सा पद्धति है। इसमें किसी भी प्रकारका आर्थिक व्यय और समय नष्ट नहीं होता है। व्यक्ति स्वयं ही स्वरोदय-चिकित्सा द्वारा दमा, बुखार, सिरदर्द, पेटदर्द, अजीर्ण, रक्तचाप आदि अनेकानेक बीमारियों को दूर भगा सकता है। इसके लिये स्वर-परिवर्तन विधियों की जानकारी होना आवश्यक है। स्वर की अमूल्य निधि का सही उपयोग करने वाला सर्वदा सुखी और स्वस्थ रहता है। स्वर-परिवर्तन की विधियाँ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ (1) जो स्वर चलाना चाहो, उसके विपरीत करवट बदलकर उसी हाथ का तकिया बनाकर लेट जाओ। थोड़ी देर में स्वर बदल जायगा। जैसे यदि सूर्यस्वर चल रहा है और चन्द्रस्वर चलाना है तो दाहिनी करवट लेट जाओ। (2) कपड़े की गोटी बनाकर या हाथ के अंगूठे से नासिका का एक छिद्र बन्द कर दो। जो स्वर चलाना हो, उसे खुला रखो, स्वर बदल जायगा। (3) बगल में तकिया दबाकर रखने से भी स्वर बदल जाते हैं। (4 ) अनुलोम-विलोम, नाडीशोधन, प्राणायाम, पूरक, रेचक, कुम्भक, आसन तथा वज्रासन से भी स्वर- परिवर्तन हो जाता है। स्वर-परिवर्तन में मुँह बन्द रखना चाहिये। नासिका से स्वर-साधन करे।। चलित स्वरकी प्रधानता में कार्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ (1) प्रात:काल सूर्योदयकाल के बाद भी चलित स्वरवाली करवट से उठो और बैठकर उसी तरफ की हथेली के दर्शन कर मुँह पर घुमाओ। फिर दोनों हथेलियों को देखकर, मिलाकर रगड़ो, फिर चेहरे पर घुमाओ, फिर सारे शरीर के हाथ-पैर पर घुमाओ। इसके बाद मंत्र बोलो- "कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम" अर्थात्👉 हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में ब्रह्माका निवास है। ऐसे पवित्र हाथों का प्रात:काल स्वर के साथ दर्शन करना चाहिये। कर्म का प्रतीक हाथ ही है। कुछ भी प्राप्त करने के लिये कर्म जरूरी है। इसके बाद बिस्तर त्यागने के साथ जिस ओर का स्वर चल रहा हो, उसी ओर का पैर पृथ्वी पर बढ़ायें और मन्त्र बोलें। "समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते। विष्णुपनि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥" अर्थात्👉 समुद्ररूपी वस्त्रों को धारण करने वाली पर्वतरूपी स्तनों से मण्डित भगवान् विष्णु की पत्नी पृथ्वीदेवि! आप मेरे पादस्पर्श को क्षमा करें। इस मन्त्र से सिद्ध होता है कि भारतीय संस्कृति में जड़ वस्तुओं में चेतन को देखने की क्षमता है। तत्पश्चात् चलित स्वर के अनुसार कदम बढ़ाये। यदि चन्द्रस्वर है तो 2, 4, 6 सम में और सूर्यस्वर है तो 1, 3, 5 विषम में कदम बढ़ाये। ऐसा करने से दिन का प्रारम्भ शुभ होता है और इच्छित कार्य में सफलता मिलती है। आरोग्यता के साथ मनोकामना सिद्ध होती है। (2) चलित स्वर की ओर से हाथ-पैर डालकर कपड़े पहनने से प्रसन्नता बनी रहती है। (3) दूसरे को देने में, उससे ग्रहण करने में, घर से बाहर जाने पर जिस तरफ का स्वर चलित हो उसी हाथ तथा पैर को आगे करके कार्य करने में सफलता मिलती है। ऐसा करने से व्यक्ति सर्वदा सुखी और उपद्रवों से बचा रहता है। (4) चलित स्वरोंके अंगोंको प्रधानता देकर हर स्थिति में कार्य किया जा सकता है और सफलता प्राप्त होती है। स्वर-ज्योतिष की जानकारी से मनुष्य शरीर और मन को नियन्त्रित कर रोग, कलह, हानि. कष्ट और असफलता को दूर कर सकता है, इसके साथ ही वह जीवन को आनन्दमय बनाकर परलोक को भी सुधारकर कल्याणको प्राप्त हो सकता है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय पं देवशर्मा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण) (सत्ताईसवां दिन) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः काल का प्रभाव और मानव-जीवन की अनित्यता...(भाग 2) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीरामचंद्र जी कहते है-महामुने! देश भी विदेश-सा हो जाता है और पर्वत भी बिखर-कर ढह जाते हैं। फिर मेरे-जैसे मनुष्य की स्थिरता में क्या विश्वास है । सत्तामात्र ही जिसका स्वरूप है, वह काल आकाश को भी खा जाता है । चौदहों भुवनों को भी अपना भोजन बना लेता है । पृथ्वी भी विनाश को प्राप्त हो जाती है। फिर मेरे-जैसे मनुष्य की स्थिरता पर क्या विश्वास किया जा सकता है । कालवश समुद्र भी सूख जाते हैं,तारे भी टूटकर बिखर जाते हैं, सिद्ध भी नष्ट हो जाते हैं। फिर मेरे-जैसे मनुष्य की स्थिरतापर क्या आस्था हो सकती है ! बड़े-बड़े दानव भी विदीर्ण हो जाते हैं।ध्रुव भी अधुव जीवी बन जाते हैं और अमर भी मरण को प्राप्त होते हैं। फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरता पर क्या विश्वास हो सकता है ! काल अपने अगणित मुखों से इन्द्रको भी चबा जाता है, यमराज को भी वश में कर लेता है और उसी के प्रभाव से वायु भी अवायु हो जाता है - अपना अस्तित्व खो बैठता है; फिर मुझ-जैसे मनुष्य की स्थिरतापर क्या विश्वास हो सकता है ! सोम ( चन्द्रमा ) भी कालवश व्योम (आकाश) में विलीन हो जाता है । मार्तण्ड (सूर्य) के भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं और अग्नि भी भग्नता (विनाश) को प्राप्त हो जाती है। फिर मुझ-जैसे मनुष्य की स्थरता पर क्या आस्था की जा सकती है ! जो काल ( मृत्यु ) को भी कवलित कर लेता है, नियति को भी टाल देता है और अनन्त आकाश को भी अपने आप में विलीन कर लेता है, उस महाकाल के होते हुए मुझ जैसे मनुष्य की स्थिरता पर क्या विश्वास किया जा सकता है। जिसका कानो से श्रवण, वाणी से वर्णन और नेत्रों से दर्शन नहीं होता, ऐसे अज्ञात स्वरूप एवं माया के उत्पादक किसी सूक्ष्म तत्व के द्वारा चौदहाँ भुवन अपने-आप में ही माया द्वारा दिखाये जा रहे हैं । वह तत्त्व निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है। समष्टि अहंकार रूप कला को प्राप्त होकर सबके भीतर निवास करने वाला वह काल का भी कालरूप परमात्मतत्व सबसे महान् है। तीनों लोकों में ऐसा कोई पदार्थ नहीं. जो उसके द्वारा नष्ट न किया जा सके । वर्ग में देवता, भूतलपर मनुष्य और पाताल में सर्पो की सृष्टि उसी ने की है। वही अपने संकल्पमात्र से इन सबको जर्जर दशा में पहुँचा देता है । अनुरागयुक्त कामिनियों ने अपने चञ्चल लोचनों द्वारा कटाक्ष पूर्वक जिसकी ओर देखा है, उस पुरुष के मन को महान् विवेक भी स्वस्थ नहीं कर पाता। जो दूसरों का उपकार करने वाली है और दूसरों की पीड़ा देखकर संतप्त हो. उठती है, अपनी आत्मा को शान्ति प्रदान करने वाली उस शीतल बुद्धि से युक्त ज्ञानी महात्मा ही सुखी है-ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे समुद्र में उत्पन्न हो बड़वाग्नि के मुँह में गिरकर नष्ट होने वाली असंख्य लहरों को कोई गिन नहीं सकता, उसी तरह संसार में उत्पन्न हो काल के मुँह में पड़ने वाले अनन्त प्राणियों की गणना कौन कर सकता है। जैसे झाड़ियों में बैठे हुए मृग या पक्षी अपनी जिह्वा की लोलुपता के कारण मोहवश जल में पड़कर नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह दुराशा-पाश में बँधे हुए सभी मनुष्य दोषरूपी झाड़ियों के मृग बने हुए हैं। सब-के-सब मोह-जाल में फँसकर पुनर्जन्म रूपी जंगल में नष्ट हो जाते हैं। इस संसार में लोगों की आयु विभिन्न जन्मों में किये गये कुकर्मों से नष्ट हो रही है। यदि आकाश में वृक्ष हो, उस वृक्ष लता हो और उस लता से गले में फाँसी लगाकर मनुष्य को लटका दिया जाय तो उससे जो दु:ख होगा, वैसा ही दु:खमय फल उन कुकर्मों का भी बताया गया है । उस दुःख की निवृत्ति के लिये उपाय करना तो दूर की बात है, उस उपाय का विचार करने वाले लोग भी यहाँ हैं या नहीं, हमें इसी का पता नहीं है। मुनीश्वर ! इस संसार में लोगों की बुद्धि चञ्चल और मृदु है । उसी बुद्धि से युक्त मनुष्य व्यर्थ ही अनेक संकल्प विकल्पों का जाल रचते हुए कहते हैं- 'आज उत्सव है ।' यह बड़ी सुहावनी ऋतु है, इसमें यात्रा करनी चाहिये, वे लोग हमारे भाई-बन्धु हैं और यह सुख विशिष्ट भोगों से युक्त है, इन्हीं संकल्पों में पड़े-पड़े वे सब लोग एक दिन कालके गाल में चले जाते हैं। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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