हरसिंगार के लाभ 〰️〰️🔸〰️〰️ नारंगी डंडी वाले सफेद खूबसूरत - महकते फूलों को आपने जरूर देखा होगा ! लेकिन क्या आपने कभी हरसिंगार की पत्तियों से बनी चाय पी है ... ? इसके फूल - बीज - छाल का प्रयोग स्वास्थ्य - सौंदर्य उपचार के लिए क्या है ..? हरसिंगार के चमत्कारी औषधीय गुण ... ! हरसिंगार के फूलों से लेकर पत्त‍ियां - छाल एवं बीज भी बेहद उपयोगी हैं ! इसकी चाय न केवल स्वाद में बेहतरीन होती है - सेहत के गुणों से भी भरपूर है ! इस चाय को आप अलग - अलग तरीकों से बना सकते हैं और सेहत व सौंदर्य के कई फायदे पा सकते हैं ! विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के लिए इसके लाभ और चाय बनाने का तरीका ! वि‍धि 1 👇 हरसिंगार की चाय बनाने के लिए इसकी दो पत्तियां और एक फूल के साथ तुलसी की कुछ पत्त‍ियां लीजिए और इन्हें 1 गिलास पानी में उबालें ! जब यह अच्छी तरह से उबल जाए तो इसे छानकर गुनगुना या ठंडा करके पी लें ! आप चाहें तो स्वाद के लिए शहद या मिश्री भी डाल सकते हैं ! यह खांसी में फायदेमंद है ! वि‍धि 2 👇 हरसिंगार के दो पत्ते और चार फूलों को पांच से 6 कप पानी में उबालकर - 5 कप चाय आसानी से बनाई जा सकती है ! इसमें दूध का इस्तेमाल नहीं होता - यह स्फूर्तिदायक होती है ! चाय के अलावा भी हरसिंगार के वृक्ष के कई औषधीय लाभ हैं !!! कौन - कौन सी बीमारियों में कैसे करें इसका इस्तेमाल ... ? जोड़ों में दर्द 👇 हरसिंगार के 6 से 7 पत्ते तोड़कर इन्हें पीस लें - पीसने के बाद इस पेस्ट को पानी में डालकर तब तक उबालें जब तक कि इसकी मात्रा आधी न हो जाए ! अब इसे ठंडा करके प्रतिदिन सुबह खाली पेट पिएं ! नियमित रूप से इसका सेवन करने से जोड़ों से संबंधित अन्य समस्याएं भी समाप्त हो जाएगी ! खांसी 👇 खांसी हो या सूखी खांसी - हरसिंगार के पत्तों को पानी में उबालकर पीने से बिल्कुल खत्म की जा सकती है ! आप चाहें तो इसे सामान्य चाय में उबालकर पी सकते हैं या फिर पीसकर शहद के साथ भी प्रयोग कर सकते हैं ! बुखार 👇 किसी भी प्रकार के बुखार में हरसिंगार की पत्तियों की चाय पीना बेहद लाभप्रद होता है ! डेंगू से लेकर मलेरिया या फिर चिकनगुनिया तक - हर तरह के बुखार को खत्म करने की क्षमता इसमें होती है ! साइटिका 👇 दो कप पानी में हरसिंगार के लगभग 8 से 10 पत्तों को धीमी आंच पर उबालें और आधा रह जाने पर इसे अंच से उतार लें ! ठंडा हो जाने पर इसे सुबह शाम खाली पेट पिएं ! एक सप्ताह में आप फर्क महसूस करेंगे ! बवासीर 👇 हरसिंगार को बवासीर या पाइल्स के लिए बेहद उपयोगी औषधि माना गया है ! इसके लिए हरसिंगार के बीज का सेवन या फिर उनका लेप बनाकर संबंधित स्थान पर लगाना फायदेमंद है ! त्वचा के लिए 👇 हरसिंगार की पत्त‍ियों को पीसकर लगाने से त्वचा संबंधी समस्याएं खत्‍म होती हैं - इसके फूल का पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाने से चेहरा उजला और चमकदार हो जाता है ! हृदय रोग 👇 हृदय रोगों के लिए हरसिंगार का प्रयोग बेहद लाभकारी है ! इस के 15 से 20 फूलों या इसके रस का सेवन करना हृदय रोग से बचाने में कारगर है ! दर्द 👇 हाथ - पैरों की मांसपेशियों में दर्द व खिंचाव होने पर हरसिंगार के पत्तों के रस में बराबर मात्रा में अदरक का रस मिलाकर पीने से फायदा होता है ! अस्थमा 👇 सांस संबंधी रोगों में हरसिंगार की छाल का चूर्ण बनाकर पान के पत्ते में डालकर खाने से लाभ होता है ! इसका प्रयोग सुबह और शाम को किया जा सकता है ! प्रतिरोधक क्षमता 👇 हरसिंगार के पत्तों का रस या फिर इसकी चाय बनाकर नियमित रूप से पीने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर हर प्रकार के रोग से लड़ने में सक्षम होता है ! इसके अलावा पेट में कीड़े होना - गंजापन - स्त्री रोगों में भी बेहद फायदेमंद है ! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) त्रयोदश दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ।।18।। शरीर में तथा अन्यों के शरीर में स्थित भगवान् से ईष्र्या और वास्तविक धर्म की निन्दा करने लगते हैं। सज्जनों, आसुरी वयक्ति भगवान् की श्रेष्ठता का विरोधी होने के कारण शास्त्रों में विश्वास करना पसन्द नहीं करता,ऐसे लोग शास्त्रों तथा भगवान् के अस्तित्व दोनों से ही ईष्र्या करते हैं, यह ईष्र्या उनकी तथाकथित प्रतिष्ठा तथा धन शक्ति के संग्रह से उत्पन्न होती हैं, ऐसे आसुरी लोग यह नहीं जानते कि वर्तमान जीवन अगले जीवन की तैयारी हैं, इस बात को नहीं जानने के कारण ऐसे लोग अपने प्रति तथा अन्यों के प्रति भी द्वेष करता हैं, ऐसे लोग अन्य जीवों की तथा स्वयं अपनी भी हिंसा करता हैं, आसुरी भगवान् के परम नियन्त्रण की चिन्ता नहीं करता, क्योंकि उसे ज्ञान नहीं होता। शास्त्रों तथा भगवान् से ईष्र्या करने के कारण आसुरी ईश्वर के अस्तित्व के विरूद्ध झूठे तर्क प्रस्तुत करता हैं और शास्त्रीय प्रमाणों को अस्वीकार करता हैं, वह प्रत्येक कार्य में अपने को स्वतन्त्र तथा शक्तिमान समझता है, ऐसे आसुरी सोचते है कि कोई भी शक्ति, बल या सम्पत्ति में उसकी समता नहीं कर सकता,अत: वह चाहे जिस तरह कर्म करे, उसे कोई रोक नहीं सकता, यदि उसका कोई शत्रु उसे ऐन्द्रिय कार्यों में आगे बढ़ने से रोकता है तो वह अपनी शक्ति से छिन्न-भिन्न करने की योजनायें बनाता है। तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ।।19।। जो लोग ईष्र्यालु तथा क्रूर हैं और नराधर्म हैं उन्हें मैं निरन्तर विभिन्न आसुरी योनियों में डालता रहता हूँ। सज्जनों! इस श्लोक में स्पष्ट इंगित होता है कि किसी जीव को किसी विशेष शरीर में रखने का परमेश्वर को विशेष अधिकार पराप्त हैं, आसुरी लोग भले ही भगवान् की श्रेष्ठता को न स्वीकार करें और वे अपनी निजी सनकों के अनुसार कर्म करें, लेकिन उनका अगला जन्म भगवान् के निर्णय पर निर्भर करेगा,उन पर नहीं, श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध में कहा गया है कि मॄत्यु के बाद जीव को माता के गर्भ में रखा जाता है, जहाँ उच्च शक्ति के निरीक्षण में जीव विशेष प्रकार का शरीर प्राप्त होता हैं। यही कारण है कि संसार में जीवों की इतनी योनियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे- पशु, पक्षी, कीट, पतंगे, मनुष्य या वनस्पति आदि, ये सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं कोई अकस्मात् नहीं,जहाँ तक असुरों की बात हैं, यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि ये असुरों के गर्भ में निरन्तर रखे जाते हैं, इस प्रकार ये ईष्र्यालु बने रहते है और मानवता से रहित और अधर्मी होते हैं, ऐसे आसुरी योनि वाले मनुष्य सदैव काम से पूरित रहते हैं, ऐसे लोग उग्र, घृणास्पद तथा अपवित्र होते हैं, मांसाहार करने वाले मनुष्य आसुरी योनि से सम्बन्धित माने जाते हैं। सज्जनों, भगवान् श्रीकॄष्ण ने गीता का ज्ञान युद्ध के मैदान में दिया और उस धुरन्धर से किया, जिसकी प्रत्यंचा मात्र से सारा संसार कम्पित हो जाता था, महाभारत का समय तो अब नहीं हैं, सन्दर्भ भले ही बदल गये हों, लेकिन हर शख़्स के भीतर महाभारत होते हुये मैं साफ-साफ देख रहा हूँ, सबके भीतर महाभारत मचा हुआ हैं, उथल-पुथल मचा हुआ हैं, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। हर वयक्ति के भीतर दुर्योधन बैठा है, जो सबकुछ अकेला ही हडपना चाहता हैं, एक दु:शासन बैठा है जो द्रोपदी का चीरहरण करना चाहता हैं, एक कंस भी रहता है जो अपनी रक्षा और समृद्धि के लिये औरों के साथ खिलवाड़ करता हैं, अन्दर बैठा हुआ एक शिशुपाल अपने अभिमान, अपने घमण्ड को औरों पर छाँटनें के लिये उनकी उपेक्षा कर रहा है, भगवद्गीता की सार्थकता इसी में हैं कि हम अपने भीतर के महाभारत को पहचानें, द्वापरयुग के वे घटनाक्रम आज भी दोहराये जा रहे हैं। हम सबके भीतर एक शैतान, एक दु:शासन बैठा है जो औरों की इज्जत लेने में ही अपनी प्रतिष्ठा समझता है, एक शकुनि आसीन है जो स्वार्थ, छल, प्रपंच के दुश्चक्र चला रहा है, इसलिये गीता की प्रासंगिकता आज भी है और भविष्य में भी तब तक रहेगी, जब तक मनुष्य के भीतर स्वार्थ के शकुनी और दुश्चक्र के दुर्योधन बने रहेंगे, गीता हमें लड़ने की बात नहीं, अपितु स्वार्थ और दुश्चक्र से युद्ध करने की बात सिखाती है, गीता निश्चित तौर पर योद्धाओं का मार्ग हैं, जब तक हम स्वयं योद्धा नहीं बनते तब तक गीता को सुनना व पढ़ना सार्थक कहाँ हैं। भाई-बहनों! गीता को सुनने या पढ़ने के लिये रग-रग में, नस-नस में योद्धा जैसी हुँकार चाहिये,ऐसे क्षत्रियत्व का रक्त चाहिये, जिस पर गीता के वे सन्देश प्रभावी हो सकें, भारत देश की यह माटी कितनी ही शान्त क्यों न हो, पर जब-जब भी यह माटी जागती है, तब-तब अहिंसा को मानने वाला यह देश रणबांकुरों की धरती बन जाता है, मैं चाहता हूँ कि रणबांकुरों की यह धरती औरों से लड़ने के लिये नहीं, बल्कि औरों का दिल जीतने के लिये आगे आयें। मैं एक ऐसे युद्ध की प्रेरणा दे रहा हूँ जो हिंसा का नहीं, स्वयं हिंसा से लड़ने का युद्ध है, जो आतंक का, अपराध का युद्ध नहीं, स्वयं अपराध और आतंक से लड़ने का युद्ध है, एक ऐसा युद्ध जो अभय का वातावरण बनाये, जिससे विवेकानन्दजी जैसो का जन्म हो, आज का मनुष्य अपने आप से ही पलायन करता जा रहा है और मुझे उसी आज के मनुष्य को सम्बोधित करना हैं, इसलिये मुझे लिखने में सुनार और लुहार दोनों का काम करना पड़ता हैं, इसलिये हो सकता है कि मेरी लेखनी किसी को अच्छी न भी लगें। शेष जारी ॰॰॰ जय श्री कॄष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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राधारानी जी को सौ वर्षों का वियोग 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ जब श्रीदामा जी को श्राप लगा तो भगवान कृष्ण श्रीदामा जी से बोले- कि तुम एक अंश से असुर होगे और वैवत्सर मनमंतर में द्वापर में अवतार लूगाँ और मै गोपियों के साथ रास करूगाँ, तो तुम अवहेलना करोगे, तो मै वध करूगाँ. इस प्रकार श्री दामा जी यक्ष के यहाँ शंखचूर्ण नाम के दैत्य हो गए. कुबेर के सेवक हो गए. जब द्वापर में भगवान ने अवतार लिए ब्रज की लीलाओं में भगवान ने रासलीला की तो यही शंखचूर्ण नामक दैत्य जो कंस का मित्र था उस समय वह कंस से मिलकर लौट रहा था, बीच में रास मंडल देखा उस समय राधा कृष्ण की अलौकिक शोभा है. गोपियाँ चवर डूला रही है.भगवान के एक हाथ में बंशी है .सिर पर मोर मुकुट है. गले में मणी है, पैरों में नुपर है. उसी समय ये शंखचूर्णने गोपियों को हरने की सोची उसका मुख बाघ के समान है, शरीर से काला है. उसे देखकर गोपियाँ भागने लगी, तो उनमे से एक गोपी शतचंद्र्नना को उसने पकड़ा, और पूर्व दिशा में ले जाने लगा,गोपी कृष्ण-कृष्ण पुकारने लगी. तो भगवान कृष्ण भी शाल का वृक्ष हाथ में लेकर उसकी ओर दोडे. अब डर से उसने गोपी को तो छोड़ दिया और भगवान को आते देख अपने प्राण बचाने के लिए भागने लगा. और हिमालय की घाटी पर पहुँच गया तो भगवान ने एक ही मुक्के में उसमें सिर को तोड दिया और उसकी चूडामणी निकाल ली, शंखचूड़ के शरीर से एक दिव्य ज्याति निकली और भगवान के सखा श्रीदामा जी में विलीन हो गई तो शंखचूर्ण का वध करके भगवान ब्रज में आ गए. ये राक्षस श्रीदामा जी के अंश् था इसलिए शंख चूड़ की आत्मज्योति निकलकर श्री दामा में ही समां गई. यहाँ जो श्राप श्री राधा रानी जी ने श्री दामा जी को दिया था वह तो पूर्ण हो गया, अब जो श्राप राधा रानी जो को श्री दामा जी ने दिया था उसका समय भी निकट आ गया था और श्राप वश राधाजी केा सौ वर्ष का विरह हुआ. तो भगवान ने कहा कि मै अपने भक्त का संकल्प कभी नहीं छोड सकता है. इसलिए राधा जी को तो वियोग होना ही है. फिर जब भगवान मथुरा चले गए तो वो लौट के नहीं आए सौ वर्ष बाद कुरूक्षेत्र में सारे गोप ग्वालों की भगवान से भेंट हुई राधा जी से मिले. गौलोक धाम का प्राकट्य सबसे पहले विशालकाय शेषनाग का प्रादुर्भाव हुआ, जो कमलनाल के समान श्वेतवर्ण के है. उन्ही की गोद में लोकवंदित महालोक “गोलोक” प्रकट हुआ. जिसे पाकर भक्ति युक्त पुरुष फिर इस संसार में नहीं लौटता. फिर असंख्य ब्रह्माण्डो के अधिपति गोलोक नाथ भगवान श्रीकृष्ण के चरणारविन्द से“त्रिपथा गंगा” प्रकट हुई. आगे जब भगवान से ब्रह्माजी प्रकट हुए, तब उनसे देवर्षि नारद का प्राकट्य हुआ.वे भक्ति से उन्मत होकर भूमंडल पर भ्रमण करते हुए भगवान के नाम पदों का कीर्तन करने लगे. ब्रह्माजी ने कहा – नारद ! क्यों व्यर्थ में घूमते फिरते हो ? प्रजा की सृष्टि करो. इस पर नारद जी बोले – मै सृष्टि नहीं करूँगा,क्योकि वह “शोक और मोह” पैदा करने वाली है. बल्कि मै तो कहता हूँ आप भी इस सृष्टि के व्यापार में लगकर दुःख से अत्यंत आतुर रहते है,अतःआप भी इस सृष्टि को बनाना छोड़ दीजिये. इतना सुनते ही ब्रह्मा जी को क्रोध आ गया और उन्होंने नारद जी को श्राप दे दिया,ब्रह्मा जी बोले -हे दुर्मति नारद तु एक कल्प तक गाने-बजाने में लगे रहने वाले गन्धर्व हो जाओ. नारद जी गन्धर्व हो गए,और गन्धर्वराज के रूप में प्रतिष्ठित हो गए. स्त्रियों से घिरे हुए एक दिन ब्रह्मा जी के सामने वेसुर गाने लगे,फिर ब्रह्मा जी ने श्राप दिया तू शूद्र हो जा! दासी के घर पैदा होगा. और इस तरह नारदजी दासी के पुत्र हुए, और सत्संग के प्रभाव से उस देह हो छोड़कर फिर से ब्रह्मा जी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए,और फिर भूतल पर विचरण करते हुए वे भगवान के पदों का गान व कीर्तन करने लगे. एक दिन बिभिन्न लोको का दर्शन करते हुए,“वेद-नगर” में गए,नारद जी ने देखा वहाँ सभी अपंग है. किसी के हाथ नहीं किसी के पैर नहीं, कोई कुबड़ा है, किसी के दाँत नहीं है,बड़ा आश्चर्य हुआ. उन्होंने पूँछा – बड़ी विचित्र बात है ! यहाँ सभी बड़े विचित्र दिखायी पड़ते है? इस पर वे सब बोले – हम सब “राग-रगनियाँ” है ब्रह्मा जी का पुत्र है -“नारद” वह वेसमय धुवपद गाता हुआ इस पृथ्वी पर विचरता है इसलिए हम सब अपंग हो गए है,(जब कोई गलत राग,पद गाता है तो मानो राग रागनियो के अंग-भंग हो जाते है) नारद जी बोले – मुझे शीघ्र बताओ ! नारद को किस प्रकार काल और ताल का ज्ञान होगा ? राग-रागनियाँ – यदि सरस्वती शिक्षा दे, तो सही समय आने पर उन्हें ताल का ज्ञान हो सकता है. नारद जी ने सौ वर्षों तक तप किया. तब सरस्वती प्रकट हुई और संगीत की शिक्षा दी, नारद जी ज्ञान होने पर विचार करने लगे की इसका उपदेश किसे देना चाहिये? तब तुम्बुरु को शिष्य बनाया, दूसरी बात मन में उठी, कि किन लोगो के सामने इस मनोहर राग रूप गीत का गान करना चाहिये? खोजते-खोजते इंद्र के पास गए, इंद्र तो विलास में डूबे हुए थे, उन्होंने ध्यान नहीं दिया, शंकरजी के पास गए,वे नेत्र बंद किये ध्यान में डूबे हुए थे. तब अंत में नारदजी “गोलोक धाम” में गए,जब भगवान श्रीकृष्ण के सामने उन्होंने स्तुति करके भगवान के गुणों का गान करने लगे, और वाद्य यंत्रो को दबाकर देवदत्त स्वरामृतमयी वीणा झंकृत की. तब भगवान बड़े प्रसन्न हुए और अंत में प्रेम के वशीभूत हो, अपने आपको देकर भगवान जल रूप हो गए. भगवान के शरीर से जो जल प्रकट हुआ उसे “ब्रह्म-द्रव्य”के नाम से जानते है. उसके भीतर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड राशियाँ लुढकती है, जिस ब्रह्माण्ड में सभी रहते है, उसे “पृश्निगर्भ” नाम से प्रसिद्ध है जो वामन भगवान के पाद-घात से फूट गया. उसका भेदन करके जो ब्रह्म-द्रव्य का जल आया, उसे ही हम सब गंगा के नाम से जानते है,गंगा जी को धुलोक में “मन्दाकिनी”,पृथ्वी पर “भागीरथी”,और अधोलोक पाताल में “भोगवर्ती” कहते है. इस प्रकार एक ही गंगा को त्रिपथ गामिनी होकर तीन नामो से विख्यात हुई. इसमें स्नान करने के लिए प्रणत-भाव से जाते हुए मनुष्य के लिए पग-पग पर राजसूर्य और अश्वमेघ यज्ञो का फल दुर्लभ नहीं रह जाता. फिर भगवान के “बाये कंधे” से सरिताओ में श्रेष्ठ – “यमुना जी” प्रकट हुई,भगवान के दोनों “गुल्फो से” दिव्य “रासमंडल” और “दिव्य श्रृंगार” साधनों के समूह का प्रादुर्भाव हुआ. भगवान की “पिंडली” से “निकुंज” प्रकट हुआ. जो सभा, भवनों, आंगनो गलियों और मंडलों से घिरा हुआ था. “घुटनों” से सम्पूर्ण वनों में उत्तम “श्रीवृंदावन” का आविर्भाव हुआ. “जंघाओं” से “लीला-सरोवर” प्रकट हुआ. “कटि प्रदेश” से दिव्य रत्नों द्वारा जड़ित प्रभामायी “स्वर्ण भूमि” का प्राकट्य हुआ. उनके “उदर” में जो रोमावालिया है, वे विस्तृत “माधवी लताएँ”बन गई. गले की “हसुली” से “मथुरा-द्वारका” इन दो पूरियो का प्रादुर्भाव हुआ, दोनों “भुजाओ” से “श्रीदामा”आदि. आठ श्रीहरि के “पार्षद” उत्पन्न हुए. “कलाईयों” से “नन्द” और “कराग्र-भाग” से “उपनंद” प्रकट हुए. “भुजाओ” के मूल भागो से “वृषभानुओं” का प्रादुर्भाव हुआ. समस्त गोपगण श्रीकृष्ण के “रोम” से उत्पन्न हुए. भगवान के “बाये कंधे” से एक परम कान्तिमान गौर तेज प्रकट हुआ, जिससे “श्री भूदेवी”,”विरजा” और अन्यान्य “हरिप्रियाये”आविभूर्त हुई. फिर उन श्रीराधा रानीजी के दोनों भुजाओ से “विशाखा” “ललिता” इन दो सखियों का आविभार्व हुआ, और दूसरी सहचरी गोपियाँ है वे सब राधा के रोम से प्रकट हुई, इस प्रकार मधुसूदन ने गोलोक की रचना की हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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