आज के श्री गीता श्लोक में श्री भगवान दैवी गुण वाले मनुस्यों का वर्णन कर रहे है ,यह दैवी गुण क्या है ?आइये आज के श्री गीता ज्ञान में श्री भगवान जी की कृपा से इसे विस्तार से समंझते है ।🕉️🙏🕉️[4/28, 11:08] Ajay: श्री भगवद गीता अध्याय: 9 श्लोक 13 श्लोक: महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌॥ भावार्थ: परंतु हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं।। प्यारे भाइयों ,बहनों ,और मित्रोँ 🌹जय श्री कृष्णा🌹 श्री भगवान आप सभी को सदैव संकट मुक्त रखे यही विनती है जगत पिता से।।🙏🕉️ प्यारे भाइयों बहनों आज हम भगवान श्री कृष्ण जी की कृपा से श्री मद भगवद गीता के अध्याय 9 के श्लोक 13को सरल रूप में समझने का प्रयास करेंगे। प्यारे भाइयों अध्याय 9 के श्लोक 11 और 12 में भगवान श्री कृष्ण जी हम सभी को आसुरी प्रवर्ति वाले मनुस्य के विषय मे बताया है, कि मेरी सृस्टि में जब मनुष्य मन की कामनाओं का गुलाम होकर मन की इच्छा पूर्ति के कर्म विषय भोगो के सुखों को पाने की चाह में रत होकर करता है ,ऐसा मनुस्य मेरी ही त्रिगुनात्मक प्रकर्ति के तीन गुणों में से राजस और तामस गुणों से उत्तपन्न माया के प्रभाव में फंस कर अपने भीतर आसुरि प्रर्वति प्रबल कर लेता है और मुझ परमात्मा की भक्ति से दूर हो जाता है,और मेरे अवतार स्वरूप को ऐसा मनुस्य सधाहरन मनुस्य ही समझता है ,और अज्ञान में डूब व्यर्थ की आशा रख व्यर्थ कर कर्म करता है तथा व्यर्थ के ज्ञान में फंस इस सृस्टि चक्र में लाख 84 योनीयों में भृमण करता हुआ भटकता है। अब इससे आगे भगवान श्री कृष्ण जी यह गुढ़ रहस्य हम सभी को अर्जुन के माध्यम से बता रहे है कि हे कुन्तीपुत्र! मेरी इस सृस्टि में सात्विक गुण की प्रबलता के कारण मनुस्य में दैवी गुण प्रबल हो जाते है ,ऐसे मनुस्य दैवी गुण के प्रभाव से मनुस्य मुझ इस्वर के निर्गुण तथा सगुण स्वरूप की साधना सदैव निष्काम भाव मे करते है ,तथा मेरे ऐसे भक्त दैवी गुण के कारण मिले विवेक ज्ञान से यह सच जानते है कि मै वासु देव श्री कृष्ण जी ही अविनाशी इस्वर हूँ और समस्त ब्रह्मांड ,समस्त देवी देवताओँ ,तथा प्राणीयों की उतपति का एक सनातन कारण मै ही हूँ ,और इसलिए मेरे यह दैवी गुण वाले महात्मा भक्त सदैव मुझे अनयन और एक निष्ट श्रद्धा और निष्काम भाव मन से सदैव मुझे ही भजते है। प्यारे भाइयों परमात्मा की यह सृस्टि ,परमात्मा से उतपन उनकी तीन गुणों वाली त्रिगुनात्मक प्रकर्ति ही रचती है ,यह तीन गुण सत,रज,तम ही इस सृस्टि में अच्छाई बुराई कारण है । राजस और तामस गुण के प्रभाव में जीवन जीने वाले मनुस्य को श्री गीता में भगवान श्री कृष्ण जी ने आसुरि प्रवर्ति वाला बताया है ,क्योंकि इन दोनों गुणो में से राजस गुण की प्रबलता से मनुस्य में लोभ,औऱ स्वार्थ बुद्धि बढ़ती है,और तामस गुण के प्रभाव से ,आलस्य प्रमाद ,अज्ञान हिंसक प्रवत्ति तथा क्रोध ,तथा काम वासना बढ़ती है । आज कलयुग में यही आसुरी प्रवर्ति बढ़ाने वाले प्रकर्ति के गुण राजस और तामस गुण का ही बोल बाला है ,इसलिए आज सँसार ने परमात्मा के सगुन तथा निर्गुण स्वरूप के उपासक पूरी दुनिया की आबादी के मात्र 5%से भी कम ही है ,और आज कलयुग में 95% मनुस्य इन्ही राजस और तामस गुण से प्रबल आसुरी प्रवृति में ही व्यर्थ की आशा ,व्यर्थ के कर्म ,व्यर्थ के ज्ञान, में फंसकर कलयुग में आसुरी प्रवर्ति में जीवन जीते हुए इस संसार मे पाप तथा अधर्म ही बढ़ा रहा है। दैवी गुण सच्चा मानवीय गुण है यह गुण मनुस्य में सात्विक आहार विहार तथा निष्काम भक्ति तथा निष्काम भाव मे दूसरों के हित कर्मो से बढ़ता है और जब यह गुण मनुस्य में बढ़ता है तब उस मनुस्य को इस्वर अपनी कृपा से दैवी गुण देते है इस दैवी गुण से मनुस्य में विवेक ज्ञान बढ़ता है और निष्काम भावना बढ़तीहै । क्योंकि परमात्मा की इस सृस्टि में धर्म,अधर्म का पड़ला बराबर रहे , इसलिए इस सृस्टि में आसुरि तथा दैवी गुण वाले महात्मा जन भी सदैव से होते ही है ,दैवी गुण महात्मा जन परमात्मा की निष्काम उपासना में लगे सृस्टि में सच्चे सनातन धर्म की रक्षा करते हुए इस धर्म को सृस्टि में बनाये रखते है, क्योंकि गलती से अगर इस धरती से अगर सनातन धर्म समाप्त हुआ तो धरती समय से पहले प्रलय में समा जाएगी ,इसलिए परमात्मा की प्रकर्ति समय समय और आसुरि प्रवृति के मनुस्यों को छोटी छोटी आपदाओं द्वारा मृत्यु देकर उन्हें सात्विक बना संसार में भेजती रहती है जिससे सनातन धर्म का अस्तित्व कम ही सही मगर सदैव बना रहता है। सरल शब्दों में समझे तो मन की सांसारिक विषय भोगों के सुखों के भोग में ही आनंद पाने वाले मनुस्य सकाम कर्मो द्वारा आसुरी प्रवर्ति में जन्म दर जन्म गहराई तक फंसते हुए अंत मे मनुस्य यौनि त्याग पशु कीट योनि ने गिरते है ,जहाँ से लाख 84 योनियों के जन्म चक्र पूरा कर प्रकर्ति नियम द्वारा अंत के जन्मो में गाय और वृक्ष यौनि में जन्म के कारण वह जीवात्मा दुबारा सात्विक बन मनुस्य योनि पाती है ,मगर इस संसार की माया का प्रलोभन मनुस्य को ज्यादा दिन सात्विक नही रहने देता ,और मनुस्य मन की कामनाओं का गुलाम बना फिर से आसुरी प्रवर्ति में पहुंच सदैव लाख 84 योनि चक्र भटकता है,इसके विपरीत सात्विक रूप में जन्म लेकर जब मनुस्य सांसारिक विषय भोगो के सुखों से मन को विरक्त कर लेता तब मनुस्य अपने भीतर सात्विक गुण और प्रबल कर लेता है तब उस मनुस्य में इस्वर कृपा से दैवी गुण प्रबल होने लगते है, और उस मनुस्य के भीतर विवेक ज्ञान इस्वर कृपा से बढ़ने लगता है ,इसी ज्ञान से वह मनुस्य सभी जीवों में एक ही इस्वर को अनुभवः करते हुए सदैव सभी के हित मे निष्काम कर्म करते हुए अपने मन तथा बुद्धि से निष्काम भाव मे अपने भीतर ही मौजूद परमात्मा से जुड़ जाता है और कुछ ही जन्मो में लाख 84 के जन्म मरण चक्र को तोड़ परमात्मा के परम धाम में उनसे अपने आत्म स्वरूप में मिलन करता है । हम सभी मनुस्य अभी आसुरी प्रवृति में फंसे है इसलिए हमारी भक्ति भगवान को पाने के लिए नही है ,बल्कि भगवान की कृपा से सँसार के हमारे जीवन ने सुख आये तथा जीवन मे आये दुख हमसे दूर रहे इसी कामना वाली भक्ति है हमारी ,यह सकाम भक्ति है इस भक्ति से पुण्य मिलता है ,मगर विवेक ज्ञान नही मिलता और हम पुण्य जनीत सुखों को पाकर हम स्वम को धन्य समझने की भूल कर रहे है कि देखो मेरे पास सब कुछ है मेरे इस्वर की कितनी कृपा है हम यह नही जान पा रहे यह इस्वर की उनकी माया की कृपा है जो हमे परमात्मा की सच्ची कृपा से दूर किये हुए हमें लाख 84 जन्म मरण चक्र में फँसाये है। इस विर्ती को बदलने के लिए हमे जीवन मे आने वाले सुख दुखो की परवाह नही करते हुए निष्काम और सरल मन से भगवान श्री कृष्ण जी की या श्री राम जी की शरण मे उनका निश्चल प्रेम पाने के लिए जाना होगा ,और निष्काम सेवा कर्म से मन शुद्ध करना होगा ,इसी से हमारी बात बन सकती है अन्यथा यह परमात्मा की माया बहुत प्रबल है मेरे प्यारे भाइयों ,बहनों और मित्रों । 🌹जय श्री कृष्णा🌹।। 🌹ॐ श्री परम् परमात्मने नमः।।🌹🕉️🙏🌹🕉️

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