. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 12 वैशाख की अक्षय तृतीया और द्वादशी की महत्ता, द्वादशी के पुण्यदान से एक कुतिया का उद्धार - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - श्रुतदेवजी कहते हैं- जो मनुष्य अक्षय तृतीया को सूर्योदय काल में प्रात:स्नान करते हैं और भगवान् विष्णु की पूजा करके कथा सुनते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं। जो उस दिन श्रीमधुसूदन की प्रसन्नता के लिये दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान् की आज्ञा से अक्षय फल देता है। वैशाख मास की पवित्र तिथियों में शुक्ल पक्ष की द्वादशी समस्त पापराशि का विनाश करने वाली है। शुक्ला द्वादशी को योग्य पात्र के लिये जो अन्न दिया जाता है, उसके एक-एक दाने में कोटि-कोटि ब्राह्मण-भोजन का पुण्य होता है। शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में जो भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये जागरण करता है, वह जीवन्मुक्त होता है। जो वैशाख की द्वादशी तिथि को तुलसी के कोमल दलों से भगवान् विष्णु की पूजा करता है, वह समूचे कुल का उद्धार करके वैकुण्ठलोक का अधिपति होता है। जो मनुष्य त्रयोदशी तिथि को दूध, दही, शक्कर, घी और शुद्ध मधु-इन पाँच द्रव्यों से भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये उनकी पूजा करता है तथा जो पंचामृत से भक्तिपूर्वक श्रीहरि को स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कुल का उद्धार करके भगवान् विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है। जो सायंकाल में भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये शर्बत देता है, वह अपने पुराने पाप को शीघ्र ही त्याग देता है। वैशाख शुक्ला द्वादशी में मनुष्य जो कुछ पुण्य करता है, वह अक्षय फल देने वाला होता है। प्राचीन काल में काश्मीर देश में देवव्रत नामक एक ब्राह्मण थे। उनके सुन्दर रूपवाली एक कन्या थी, जो मालिनी के नाम से प्रसिद्ध थी। ब्राह्मण ने उस कन्या का विवाह सत्यशील नामक बुद्धिमान् द्विज के साथ कर दिया। मालिनी कुमार्ग पर चलने वाली पुंश्चली होकर स्वच्छन्दता पूर्वक इधर उधर रहने लगी। वह केवल आभूषण धारण करने के लिये पति का जीवन चाहती थी, उसकी हितैषिणी नहीं थी। उसके घर में काम-काज करने के बहाने उपपति रहा करता था। सभी जाति के मनुष्य जार के रूप में उसके यहाँ ठहरते थे। वह कभी पति की आज्ञा का पालन करने में तत्पर नहीं हुई। इसी दोष से उसके सब अंगों में कीड़े पड़ गये, जो काल, अन्तक और यम की भाँति उसकी हड्डियों को भी छेदे डालते थे। उन कीड़ों से उसकी नाक, जिह्वा और कानों का उच्छेद हो गया, स्तन तथा अंगुलियाँ गल गयीं, उसमें पंगुता भी आ गयी। इन सब क्लेशों से मृत्यु को प्राप्त होकर वह नरक की यातनाएँ भोगने लगी। एक लाख पचास हजार वर्षों तक वह ताँबे के भाण्ड में रखकर जलायी गयी, सौ बार उसे कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ा। तत्पश्चात् सौवीर देश में पद्मबन्धु नामक ब्राह्मण के घर में वह अनेक दु:खों से घिरी हुई कुतिया हुई। उस समय भी उसके कान, नाक, पूँछ और पैर कटे हुए थे, उसके सिर में कीड़े पड़ गये थे और योनि में भी कीड़े भरे रहते थे। राजन्! इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये एक दिन वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पद्मबन्धु का पुत्र नदी में स्नान करके पवित्र हो भीगे वस्त्र से घर आया। उसने तुलसी की वेदी के पास जाकर अपने पैर धोये। दैवयोग से वह कुतिया वेदी के नीचे सोयी हुई थी। सूर्योदय से पहले का समय था, ब्राह्मण कुमार के चरणोदक से वह नहा गयी और तत्काल उसके सारे पाप नष्ट हो गये। फिर तो उसी क्षण उसे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण हो आया। पहले के कर्मो की याद आने से वह कुतिया तपस्वी के पास जाकर दीनता पूर्वक पुकारने लगी- 'हे मुने! आप हमारी रक्षा करें।' उसने पद्मबन्धु मुनि के पुत्र से अपने पूर्वजन्म के दुराचारपूर्ण वृत्तान्त सुनाये और यह भी कहा-'ब्रह्मन्! जो कोई भी दूसरी युवती पति के ऊपर वशीकरण का प्रयोग करती है, वह दुराचारिणी मेरी ही तरह ताँबे के पात्र में पकायी जाती है। पति स्वामी है, पति गुरु है और पति उत्तम देवता है। साध्वी स्त्री उस पति का अपराध करके कैसे सुख पा सकती है ? पति का अपराध करने वाली स्त्री सैकड़ों बार तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियोंकी योनि) - में और अरबों बार कीड़े की योनि में जन्म लेती है। इसलिये स्त्रियों को सदैव अपने पति की आज्ञा पालन करनी चाहिये। ब्रह्मन्! आज मैं आपकी दृष्टि के सम्मुख आयी हूँ। यदि आप मेरा उद्धार नहीं करेंगे, तो मुझे पुनः इसी यातनापूर्ण घृणित योनि का दर्शन करना पड़ेगा। अत: विप्रवर! मुझ पापाचारिणी को वैशाख शुक्ल पक्ष में अपना पुण्य प्रदान करके उबार लीजिये। आपने जो पुण्य की वृद्धि करने वाली द्वादशी की है, उसमें स्नान, दान और अन्न भोजन कराने से जो पुण्य हुआ है, उससे मुझ दुराचारिणी का भी उद्धार हो जायगा। महाभाग! दीनवत्सल! मुझ दु:खिया के प्रति दया कीजिये। आपके स्वामी जगदीश्वर जनार्दन दीनों के रक्षक हैं। उनके भक्त भी उन्हीं के समान होते हैं। दीनवत्सल! मैं आपके दरवाजे पर रहने वाली कुतिया हूँ। मुझ दीना के प्रति दया कीजिये, मेरा उद्धार कीजिये अन्तर में मैं आप द्विजेन्द्र को नमस्कार करती हूँ। उसका वचन सुनकर मुनि के पुत्र ने कहा- कुतिया! सब प्राणी अपने किये हुए कर्मो के ही सुख-दुःखरूप फल भोगते हैं। जैसे साँप को दिया हुआ शर्करा मिश्रित दूध केवल विष की वृद्धि करता है, उसी प्रकार पापी को दिया हुआ पुण्य उसके पाप में सहायक होता है। मुनिकुमार के ऐसा कहने पर कुतिया दुःख में डूब गयी और उसके पिता के पास जाकर आर्तस्वर से क्रन्दन करती हुई बोली - 'पद्मबन्धु बाबा ! मैं तुम्हारे दरवाजे की कुतिया हूँ। मैंने सदा तुम्हारी जूठन खायी है। मेरी रक्षा करो, मुझे बचाओ। गृहस्थ महात्मा के घर पर जो पालतू जीव रहते हैं, उनका उद्धार करना चाहिये, यह वेदवेत्ताओं का मत है। चाण्डाल, कौवे, कुत्ते- ये प्रतिदिन गृहस्थों के दिये हुए टुकड़े खाते हैं; अथःउनकी दया के पात्र हैं। जो अपने ही पाले हुए रोगादि से ग्रस्त एवं असमर्थ प्राणी का उद्धार नहीं करता, वह नरक में पड़ता है, यह विद्वानों का मत है। संसार की सृष्टि करने वाले भगवान् विष्णु एक को कर्ता बनाकर स्वयं ही पत्नी, पुत्र आदि के व्याज से समस्त जन्तुओं का पालन करते हैं; अत: अपने पोष्यवर्ग की रक्षा करनी चाहिये, यह भगवान् की आज्ञा है। दयालु होने के कारण आप मेरा उद्धार कीजिये।' दुःख से आतुर हुई कुतिया की यह बात सुनकर घर में बैठा हुआ मुनिपुत्र तुरंत घर से बाहर निकला। इसी समय दयानिधान पद्मबन्धु ने कुतिया से पूछा-'यह क्या वृत्तान्त है?' तब पुत्र ने सब समाचार कह सुनाया। उसे सुनकर पद्मबन्धु बोले-'बेटा ! तुमने कुतिया से ऐसा वचन क्यों कहा? साधु पुरुषों के मुँह से ऐसी बात नहीं निकलती। वत्स! देखो तो, सब लोग दूसरों का उपकार करने के लिये उद्यत रहते हैं। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, रात्रि, अग्नि, जल, चन्दन, वृक्ष और साधु पुरुष सदा दूसरों की भलाईमें लगे रहते हैं। देत्यों को महाबली जानकर महर्षि दधीचि ने देवताओं का उपकार करने के लिये दयापूर्वक उन्हें अपने शरीर की हड्डी दे दी थी। महाभाग! पूर्वकाल में राजा शिवि ने कबूतर के प्राण बचाने के लिये भूखे बाज को अपने शरीर का मांस दे दिया था। पहले इस पृथ्वी पर जीमूतवाहन नामक राजा हो गये हैं। उन्होंने एक सर्प का प्राण बचाने के लिये महात्मा गरुड़ को अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इसलिये विद्वान् ब्राह्मण को दयालु होना चाहिये; क्या इन्द्रदेव शुद्ध स्थान में ही वर्षा करते हैं, अशुद्ध स्थान में जल नहीं बरसाते ? क्या चन्द्रमा चाण्डालों के घर में प्रकाश नहीं करते ? अत: बार-बार प्रार्थना करने वाली इस कुतिया का मैं अपने पुण्यों से उद्धार करूँगा।' इस प्रकार पुत्र की मान्यता का निराकरण करके परम बुद्धिमान् पद्मबन्धु ने संकल्प किया- 'कुतिया! ले, मैंने द्वादशी का महापुण्य तुझे दे दिया। ब्राह्मण के इतना कहते ही कुतिया ने सहसा अपने प्राचीन शरीर का त्याग कर दिया और दिव्य देह धारणकर दिव्य वस्त्र- आभूषणों से विभूषित हो, दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई ब्राह्मण की आज्ञा ले स्वर्गलोक को चली गयी। वहाँ महान् सुखों का उपभोग करके इस पृथ्वी पर भगवान नर-नारायण के अंश से 'उर्वशी' नाम से प्रकट हुई। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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. 🌞 *आज का हिन्दू पंचांग* 🌞 🌞 *12 मई 2021 (अंग्रेजी तिथि)* 🌞 ☀️ *सूर्य उदय/अस्त* - 05:34 से 19:15 तक 🌞 *विक्रमी संवत 2078* 🌞 *वैशाख मास, शुक्ल पक्ष* 1️⃣ *तिथि* - प्रतिपदा 27:05 तक, द्वितीया 2️⃣ *नक्षत्र* - कृत्तिका 26:40 तक, रोहिणी 3️⃣ *योग* - शोभन 23:48 तक, अतिगंड 4️⃣ *करण* - किंस्तुघ्न 13:47 तक, बव 27:05 तक, बालव 5️⃣ *वार* - बुधवार ♨️ _*शुभ मुहूर्त*_ ♨️ ✅ *ब्रह्म मुहूर्त* - 04:11 से 04:53 तक ✅ *सर्वार्थ सिद्धि योग* - अहोरात्रि तक ✅ *अभिजीत मुहूर्त* - कोई नहीं ♨️ _*अशुभ मुहूर्त*_ ♨️ ❌ *राहुकाल* - 12:24 से 14:07 तक ❌ *दिशाशूल* - उत्तर दिशा में ♨️ _*व्रत / त्यौहार / विशेष*_ ♨️ 🚩 ♨️ _*आज का सुविचार*_ ♨️ *अनवस्थितकायस्य न जने न वने सुखम्।* *जनो दहति संसर्गाद् वनं संगविवर्जनात।।* *भावार्थ* : _अव्यवस्थित कर्म करने वाले व्यक्ति को न तो जनसमाज में सुख मिलता है और न वन में। जनसमाज में मनुष्यों का संसर्ग उसे जलाता है और वन में एकाकी रहने के कारण वह दुखी रहता है, पीड़ित होता है।।_ 🙏 *शुभ प्रभात* 🙏 🙏 *जय श्री राम* 🙏 🙏 *आपका दिन मंगलमय हो* 🙏

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 11 धर्मवर्ण की कथा, कलि की अवस्था का वर्णन, धर्मवर्ण और पितरों का संवाद एवं वैशाख की अमावास्या की श्रेष्ठता - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - मिथिलापति ने पूछा- ब्रह्मन्! इस वैशाख मास में कौन-कौन सी तिथियाँ पुण्यदायिनी हैं? श्रुतदेवजी बोले- सूर्य के मेष राशि पर स्थित होने पर वैशाख मास में तीसों तिथियाँ पुण्यदायिनी मानी गयी हैं। एकादशी में किया हुआ पुण्य कोटिगुना होता है। उसमें स्नान, दान, तपस्या, होम, देवपूजा, पुण्यकर्म एवं कथा का श्रवण किया जाय तो वह तत्काल मुक्ति देने वाला है। जो रोग आदिसे ग्रस्त और दरिद्रता से पीड़ित हो वह मनुष्य इस पुण्यमयी कथा को सुनकर कृतकृत्य होता है। वैशाख मास मन से सेवन करने योग्य है; क्योंकि वह समय उत्तम गुणों से युक्त है। दरिद्र, धनाढ्य, पंगु, अन्धा, नपुंसक, विधवा, साधारण स्त्री, पुरुष, बालक, युवा, वृद्ध तथा रोग से पीड़ित मनुष्य ही क्यों न हो, वैशाख मास का धर्म सबके लिये अत्यन्त सुखसाध्य है। परम पुण्यमय वैशाख मास में जब सूर्य मेष राशि में स्थित हो -है, तब पापनाशिनी अमावास्या कोटि गया के समान फल देने वाली होती है। राजन्! जब पृथ्वीपर राजर्षि सावर्णिका शासन था, उस समय तीसवें कलियुग के अन्त में सभी धर्मो का लोप हो चुका था। उसी समय आनर्त देश में धर्म वर्ण नाम से विख्यात एक ब्राह्मण थे। मुनिवर धर्मवर्ण ने उस कलियुग में ही किसी समय महात्मा मुनियों के सत्रयाग में सम्मिलित होने के लिये पुष्कर क्षेत्र की यात्रा की। वहाँ कुछ व्रतधारी महर्षियों ने कलियुग की प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा था-'सत्ययुग में भगवान् विष्णु को संतुष्ट करने वाला जो पुण्य एक वर्ष में साध्य है, वही त्रेता में एक मास में और द्वापर में पंद्रह दिनों में साध्य होता है; परंतु कलियुग में भगवान् विष्णु का स्मरण कर लेने से ही उससे दसगुना पुण्य होता है। कलि में बहुत थोड़ा पुण्य भी कोटिगुना होता है। जो एक बार भी भगवान् का नाम लेकर दयादान करता है और दुर्भिक्ष में अन्न देता है, वह निश्चय ही ऊर्ध्वलोक में गमन करता है। यह सुनकर देवर्षि नारद हँसते हुए उन्मत्त के समान नृत्य करने लगे। सभासदों ने पूछा- नारदजी यह क्या बात है?' तब बुद्धिमान् नारदजी ने हँसते हुए उन सबको उत्तर दिया- 'आप लोगों का कथन सत्य है। इसमें सन्देह नहीं कि कलियुग में स्वल्प कर्म से भी महान् पुण्य का साधन किया जाता है तथा क्लेशों का नाश करने वाले भगवान् केशव स्मरण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। तथापि मैं आप लोगों से यह कहता हूँ कि कलियुग में ये दो बातें दुर्घट हैं- शिश्नेन्द्रिय का निग्रह और जिह्वा को वश में रखना। ये दोनों कार्य जो सिद्ध कर ले, वही नारायणस्वरूप है। अत: कलियुग में आपको यहाँ नहीं ठहरना चाहिये।' नारदजी की यह बात सुनकर उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षि सहसा यज्ञ को समाप्त करके सुख पूर्वक चले गये धर्मवर्ण ने भी वह बात सुनकर भूलोक को त्याग देने का विचार किया। उन्होंने ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करके दण्ड और कमण्डलु हाथ में लिया और जटा-वर्कलधारी होकर वे कलियुग के अनाचारी पुरुषों को देखने के लिये घर छोड़कर चल दिये। उनके मन में बड़ा विस्मय हो रहा था। उन्होंने देखा, प्राय: मनुष्य पापाचार में प्रवृत्त हो बड़े भयंकर एवं दुष्ट हो गये हैं। ब्राह्मण पाखण्डी हो चले हैं। शुद्र संन्यास धारण करते हैं। पत्नी अपने पति से द्वेष रखती है। शिष्य गुरु से वैर करता है। सेवक स्वामी के और पुत्र पिता के घात में लगा हुआ है ब्राह्मण शूद्रवत् और गौएँ बकरियों के समान हो गयी हैं। वेदों में गाथा की ही प्रधानता रह गयी है। शुभ कर्म साधारण लौकिक कृत्यों के ही समान रह गये हैं, इनके प्रति किसी की महत्त्व बुद्धि नहीं है। भूत, प्रेत और पिशाच आदि की उपासना चल पड़ी है। सब लोग मैथुन में आसक्त हैं और उसके लिये अपने प्राण भी खो बैठते हैं। सब लोग झूठी गवाही देते हैं। मन में सदा छल और कपट भरा रहता है। कलियुग में सदा लोगों के मन में कुछ और, वाणी में कुछ और तथा क्रिया में कुछ और ही देखा जाता है। सबकी विद्या किसी-न-किसी स्वार्थ को लेकर ही होती है और केवल राज भवन में उसका आदर होता है। संगीत आदि कलात्मक विद्याएँ भी राजाओं को प्रिय हैं। कलि में अधम मनुष्य पूजे जाते हैं और श्रेष्ठ पुरुषों की अवहेलना होती है। कलि में वेदों के विद्वान् ब्राह्मण दरिद्र होते हैं। लोगों में प्रायः भगवान् की भक्ति नहीं होती। पुण्यक्षेत्र में पाखण्ड अधिक बढ़ जाता है। शूद्र लोग जटाधारी तपस्वी बनकर धर्म की व्याख्या करते हैं। सभी मनुष्य अल्पायु, दयाहीन और शठ होते हैं। कलि में प्राय: सभी धर्म के व्याख्याता बन जाते हैं और दूसरों से कुछ लेने में ही उत्सव मानते हैं अपनी पूजा कराना चाहते हैं और व्यर्थ ही दूसरों की निन्दा करते हैं। अपने घर आने पर सभी अपने स्वामी के दोषों की चर्चा में तत्पर रहते हैं। कलि में लोग साधुओं को नहीं जानते पापियों को ही बहुत आदर देते हैं। दुराग्रही लोग इतने दुराग्रही होते हैं कि साधु पुरुषों के एक दोष का भी ढिंढोरा पीटते हैं और पापात्माओं के दोष-समूहों को भी गुण बतलाते हैं। कलि में गुणहीन मनुष्य दूसरों के गुण न देखकर उनके दोष ही ग्रहण करते हैं। जैसे पानी में रह नेवाली जोंक प्राणियों के रक्त पीती है, जल नहीं पीती, उसी प्रकार जोंक के धर्म से संयुक्त हो मनुष्य दूसरे का रक्त चूसते हैं। औषधियाँ शक्तिहीन होती हैं। ऋतुओं में उलट-फेर हो जाता है। सब राष्ट्रो में अकाल पड़ता है। कन्या योग्य समय में सन्तानोत्पत्ति नहीं करती। लोग नट और नर्तकों की विद्याओं से विशेष प्रेम करते हैं। जो वेद-वेदान्त की विद्याओं में तत्पर और अधिक गुणवान् हैं, उन्हें अज्ञानी मनुष्य सेवक की दृष्टि से देखते हैं, वे सब-के सब भ्रष्ट होते हैं। कलि में प्राय: लोग श्राद्धकर्म का त्याग करते हैं। वैदिक कर्मो को छोड़ बैठते हैं। प्राय: जिह्वा पर भगवान् विष्णु के नाम कभी नहीं आते लोग श्रृंगार रस में आनन्द का अनुभव करते हैं और उसी के गीत गाते हैं। कलियुग के मनुष्यों में न कभी भगवान् विष्णु की सेवा देखी जाती है, न शास्त्रीय चर्चा होती है, न कहीं यज्ञ की दीक्षा है, न विचार का लेश है, न तीर्थ यात्रा है और न दान-धर्म ही होते देखे जाते हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है? उन सबको देखकर धर्म वर्ण को बड़ा भय लगा। पाप से कुल की हानि होती देख, अत्यन्त आश्चर्य से चकित हो वे दूसरे द्वीप में चले गये। सब द्वीपों और लोकों में विचरते हुए बुद्धिमान् धर्मवर्ण किसी समय कौतूहल वश पितृलोक में गये। वहाँ उन्होंने कर्म से कष्ट पाते हुए पितरों को बड़ी भयंकर दशा में देखा। वे दौड़ते, रोते और गिरते-पड़ते थे। उन्होंने अपने पितरों को भी नीचे अन्धकृप में पड़े हुए देखा। उनको देखकर आश्चर्यचकित हो दयालु धर्मवर्ण ने पूछा- 'आपलोग कौन हैं, किस दुस्तर कर्म के प्रभाव से इस अन्धकूप में पड़े हैं?' पितरोंने कहा- हम श्रीवत्स गोत्र वाले हैं। पृथ्वी पर हमारी कोई सन्तान नहीं रह गयी है, अत: हम श्राद्ध और पिण्ड से वंचित हैं, इसीलिये यहाँ हमें नरक का कष्ट भोगना पड़ता है। सन्तानहीन दुरात्माओं का अन्धकूप में पतन होता है। हमारे वंश में एक ही महायशस्वी पुरुष है, जो धर्मवर्ण के नाम से विख्यात है। किंतु वह विरक्त होकर अकेला घूमता-फिरता है। उसने गृहस्थ-धर्म को नहीं स्वीकार किया है। वह एक ही तन्तु हमारे कुल में अवशिष्ट है। उसकी भी आयु क्षीण हो जाने पर हमलोग घोर अन्धकूप में गिर पड़ेंगे, जहाँ से फिर निकलना कठिन होगा। इसलिये तुम पृथ्वी पर जाकर धर्मवर्ण को समझाओ। हम लोग दया के पात्र हैं, हमारे वचनों से उसको यह बताओ कि 'हमारी वंशरूपा दूर्वा को कालरूपी चूहा प्रतिदिन खा रहा है। क्रमश: सारे वंश का नाश हो गया है, एक तुम्हीं बचे हो। जब तुम भी मर जाओगे तब सन्तान-परम्परा न होने के कारण तुम्हें भी अन्धकूप में गिरना पड़ेगा। इसलिये गृहस्थ-धर्म को स्वीकार करके सन्तान की वृद्धि करो। इससे हमारी और तुम्हारी दोनों की ऊर्ध्वगति होगी। यदि एक भी पुत्र वैशाख, माघ अथवा कार्तिक मास में हमारे उद्देश्य से स्नान, श्राद्ध और दान करेगा तो उससे हमलोगों की ऊर्ध्वगति होगी और नरक से उद्धार हो जायगा। यदि एक पुत्र भी भगवान् विष्णु का भक्त हो जाय, एक भी एकादशी का व्रत रहने लगे अथवा यदि एक भी भगवान् विष्णु की पापनाशक कथा श्रवण करे तो उसकी सौ बीती हुई पीढ़ियों का तथा सौ भावी पीढ़ियों का उद्धार होता है। वे पीढ़ियाँ पाप से आवृत होने पर भी नरक का दर्शन नहीं करतीं। दया और धर्म से रहित उन बहुत-से पुत्रों के जन्म से क्या लाभ, जो कुल में उत्पन्न होकर सर्वव्यापी भगवान् नारायण की पूजा नहीं करते। इस प्रकार प्रिय वचनों द्वारा धर्मवर्ण को समझाकर तुम उसे विरक्तिपूर्ण ब्रह्मचर्य- आश्रम से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करनेकी सलाह दो। पितरों की यह बात सुनकर धर्मवर्ण अत्यन्त विस्मित हुआ और हाथ जोड़कर बोला- 'मैं ही धर्मवर्ण नाम से विख्यात आपके वंश का दुराग्रही बालक हूँ। यज्ञ में महात्मा नारदजी का यह वचन कि 'कलियुग में प्राय: कोई भी रसनेन्द्रिय सुनकर और शिश्नेन्द्रिय को दृढ़तापूर्वक संयम में नहीं रखता।' मैं दुर्जनों की संगति से भयभीत हो अब तक दूसरे-दूसरे द्वीपों में घूमता रहा। इस कलियुग के तीन चरण बीत गये, अन्तिम चरण में भी साढ़े तीन भाग व्यतीत हो चुके हैं। मेरा जन्म व्यर्थ बीता है; क्योंकि जिस कुल में मैंने जन्म लिया, उसमें माता-पिता के ऋण को भी मैंने नहीं चुकाया। पृथ्वी के भारभूत उस शत्रु तुल्य पुत्र के उत्पन्न होने से क्या लाभ जो पैदा होकर भगवान् विष्णु और देवताओं तथा पितरों की पूजा न करे मैं आप लोगों की आज्ञा का पालन करूँगा। बताइये, पृथ्वी पर किस प्रकार मुझे कलियुग से और संसार से भी बाधा नहीं प्राप्त होगी? धर्मवर्ण की बात सुनकर पितरों के मन को कुछ आश्वासन मिला, वे बोले-बेटा! तुम गृहस्थ-आश्रम स्वीकार करके सन्तानोत्पत्ति के द्वारा हमारा उद्धार करो। जो भगवान् विष्णु की कथा में अनुरक्त होते, निरन्तर श्रीहरि का स्मरण करते और सदाचार के पालन में तत्पर रहते हैं, उन्हें कलियुग बाधा नहीं पहुँचाता। मानद ! जिसके घर में शालिग्राम शिला अथवा महाभारत की पुस्तक हो, उसे भी कलियुग बाधा नहीं दे सकता। जो वैशाख मास के धर्मो का पालन करता, माघ-स्नान में तत्पर होता और कार्तिक में दीप देता है, उसे भी कलि की बाधा नहीं प्राप्त होती। जो प्रतिदिन महात्मा भगवान् विष्णु की पापनाशक एवं मोक्षदायिनी दिव्य कथा सुनता है, जिसके घर में बलि वैश्वदेव होता है, शुभकारिणी तुलसी स्थित होती हैं तथा जिसके आँगन में उत्तम गौ रहती हैं, उसे भी कलियुग बाधा नहीं देता। अतः इस पापात्मक युग में भी तुम्हें कोई भय नहीं है। बेटा! शीघ्र पृथ्वी पर जाओ। इस समय वैशाख मास चल रहा है, यह सबका उपकार करने वाला मास है। सूर्य के मेषराशि में स्थित होने पर तीसों तिथियाँ पुण्यदायिनी मानी गयी हैं। एक-एक तिथि में किया हुआ पुण्य कोटि-कोटि गुना अधिक होता है। उनमें भी जो वैशाख की अमावास्या तिथि है, वह मनुष्यों को मोक्ष देने वाली है, देवताओं और पितरों को वह बहुत प्रिय है, शीघ्र ही मोक्ष की प्राप्ति कराने वाली है। जो उस दिन पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करते और जल से भरा हुआ घड़ा एवं पिण्ड देते हैं, उन्हें अक्षय फल की प्राप्ति होती है। अत: महामते ! तुम शीघ्र जाओ और जब अमावास्या हो, तब कुम्भ सहित श्राद्ध एवं पिण्डदान करो। सबका उपकार करने के लिये गृहस्थ धर्म का आश्रय लो। धर्म, अर्थ और काम से सन्तुष्ट हो, उत्तम सन्तान पाकर फिर मुनिवृत्ति से रहते हुए सुखपूर्वक द्वीप-द्वीपान्तरों में विचरण करो। पितरों के इस प्रकार आदेश देने पर धर्मवर्ण मुनि शीघ्रता पूर्वक भूलोक में गये वहाँ मेषराशि में सूर्य के स्थित रहते हुए वैशाख मास में प्रात:काल स्नान करके देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण किया; फिर कुम्भदान सहित पापविनाशक श्राद्ध करके उसके द्वारा पितरों को पुनरावृत्ति रहित मुक्ति प्रदान की। तत्पश्चात् उन्होंने स्वयं विवाह करके उत्तम सन्तान को जन्म दिया और लोक में उस पापनाशिनी अमावास्या तिथि को प्रसिद्ध किया तदनन्तर वे भक्तिपूर्वक भगवान् की आराधना करने के लिये हर्ष के साथ गन्धमादन पर्वत पर चले गये। इसलिये वैशाख मास की यह अमावास्या तिथि परम पवित्र मानी गयी है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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. 🌞 *आज का हिन्दू पंचांग* 🌞 🌞 *11 मई 2021 (अंग्रेजी तिथि)* 🌞 ☀️ *सूर्य उदय/अस्त* - 05:35 से 19:14 तक 🌞 *विक्रमी संवत 2078* 🌞 *वैशाख मास, कृष्ण पक्ष* 1️⃣ *तिथि* - अमावस्या 24:29 तक, प्रतिपदा 2️⃣ *नक्षत्र* - भरणी 23:31 तक, कृत्तिका 3️⃣ *योग* - सौभाग्य 22:43 तक, शोभन 4️⃣ *करण* - चतुष्पाद 11:11 तक, नाग 24:29 तक, किंस्तुघ्न 5️⃣ *वार* - मंगलवार ♨️ _*शुभ मुहूर्त*_ ♨️ ✅ *ब्रह्म मुहूर्त* - 04:12 से 04:53 तक ✅ *सर्वार्थ सिद्धि योग* - 23:31 से 29:34 तक ✅ *अभिजीत मुहूर्त* - 11:57 से 12:52 तक ♨️ _*अशुभ मुहूर्त*_ ♨️ ❌ *राहुकाल* - 15:49 से 17:32 तक ❌ *दिशाशूल* - उत्तर दिशा में ♨️ _*व्रत / त्यौहार / विशेष*_ ♨️ 🚩 _वैशाख अमावस्या_ ♨️ _*आज का सुविचार*_ ♨️ *यथा धेनु सहस्त्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्।* *तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति।।* *भावार्थ* : _जैसे हजारों गायों में भी बछड़ा अपनी माता के पास ही पहुंच जाता है अथवा उसके पीछे-पीछे चलता है, उसी प्रकार किया हुआ कर्म भी सदा कर्त्ता के पीछे-पीछे चलता रहता है।।_ 🙏 *शुभ प्रभात* 🙏 🙏 *जय श्री राम* 🙏 🙏 *आपका दिन मंगलमय हो* 🙏

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 10 वैशाख मास के माहात्म्य-श्रवण से सर्प क उद्धार और एक वैशाख धर्म के पालन तथा रामनाम-जप से व्याध का वाल्मीकि होना - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - देव कहते हैं- तदनन्तर व्याध सहित शंख मुनि ने विस्मित होकर पूछा- ' तुम कौन हो? और तुम्हें यह दशा कैसे प्राप्त हुई थी? सर्प ने कहा- पूर्वजन्म में मैं प्रयाग का ब्राह्मण था। मेरे पिता का नाम कुशीद मुनि और मेरा नाम रोचन था मैं धनाढ्य, अनेक पुत्रों का पिता और सदैव अभिमान से दूषित था। बैठे-बैठे बहुत बकवाद किया करता था। बैठना, सोना, नींद लेना मैथुन करना, जुआ खेलना, लोगों की बातें करना और सूद लेना यही मेरे व्यापार थे। मैं लोकनिन्दा से डरकर नाम मात्र के शुभ कर्म करता था; सो भी दम्भ के साथ उन कर्मों में मेरी श्रद्धा नहीं थी। इस प्रकार मुझ दुष्ट और दुर्बुद्धि के कितने ही वर्ष बीत गये। तदनन्तर इसी वैशाख मास में जयन्त नामक ब्राह्मण प्रयाग क्षेत्र में निवास करने वाले पुण्यात्मा द्विजों को वैशाख मास के धर्म सुनाने लगे स्त्री, पुरुष, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- सहस्रों श्रोता प्रात:काल स्नान करके अविनाशी भगवान् विष्णु की पूजा के पश्चात् प्रतिदिन जयन्त की कही हुई कथा सुनते थे। वे सभी पवित्र एवं मौन होकर उस भगवत् कथा में अनुरक्त रहते थे एक दिन मैं भी कौतूहलवश देखने की इच्छा से श्रोताओं की उस मण्डली में जा बैठा। मेरे मस्तक पर पगड़ी बँधी थी। इसलिये मैंने नमस्कार तक नहीं किया और संसारी वार्तालाप में अनुरक्त हो कथा में विघ्न डालने लगा। कभी मैं कपड़े फैलाता, कभी किसी की निन्दा करता और कभी जोर से हँस पड़ता था। जब तक कथा समाप्त हुई, तब तक मैंने इसी प्रकार समय बिताया। तत्पश्चात् दूसरे दिन सन्निपात रोग से मेरी मृत्यु हो गयी। मैं तपाये हुए शीशे के जल से भरे हुए हलाहल नरक में डाल दिया गया और चौदह मन्वन्तरों तक वहाँ यातना भोगता रहा। उसके बाद चौरासी लाख योनियों में क्रमश: जन्म लेता और मरता हुआ में इस समय क्रूर तमोगुणी सर्प होकर इस वृक्ष के खोंखले में निवास करता था। मुने ! सौभाग्यवश आपके मुखारविन्द से निकली हुई अमृतमयी कथा को मैंने अपने दोनों नेत्रों से सुना, जिससे तत्काल मेरे सारे पाप नष्ट हो गये मुनिश्रेष्ठ ! मैं नहीं जानता कि आप किस जन्म के मेरे बन्धु हैं; क्योंकि मैंने कभी किसी का उपकार नहीं किया है तो भी मुझ पर आपकी कृपा हुई। जिनका चित्त समान है, जो सब प्राणियों पर दया करने वाले साधु पुरुष हैं, उनमें परोपकार की स्वाभाविक प्रवृति होती है। उनकी कभी किसी के प्रति विपरीत बुद्धि नहीं होती। आज आप मुझ पर कृपा कीजिये, जिससे मेरी बुद्धि धर्म में लगे। देवाधिदेव भगवान् विष्णु की मुझे कभी विस्मृति न हो और साधु चरित्र वाले महापुरुषों का सदा ही संग प्राप्त हो। जो लोग मद से अंधे हो रहे हों, उनके लिये एकमात्र दरिद्रता ही उत्तम अंजन है। इस प्रकार नाना भाँति से स्तुति करके रोचन ने बार-बार शंख को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर चुपचाप उनके आगे खड़ा हो गया। तब शंख ने कहा- ब्रह्मन्! तुमने वैशाख मास और भगवान् विष्णु का माहात्म्य सुना है, इससे उसी क्षण तुम्हारा सारा बन्धन नष्ट हो गया। द्विजश्रेष्ठ! परिहास भय, क्रोध, द्वेष, कामना अथवा स्नेह से भी एक बार भगवान् विष्णु के पापहारी नाम का उच्चारण करके बड़े भारी पापी भी रोग-शोक रहित वैकुण्ठधा में चले जाते हैं। फिर जो श्रद्धा से युक्त हो क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर सबके प्रति दया भाव रखते हुए भगवान् की कथा सुनते हैं, वे उनके लोकमें जाते हैं, इस विषय में तो कहना ही क्या है। कितने ही मनुष्य केवल भक्ति के बल से एकमात्र भगवान् की कथा-वार्ता में तत्पर हो अन्य सब धर्मों का त्याग कर देने पर भी भगवान् विष्णु के परम पद को पा लेते हैं। भक्ति से अथवा द्वेष आदि से भी जो कोई भगवान् की भक्ति करते हैं, वे भी प्राण हारिणी पूतना की भाँति परमपद को प्राप्त होते हैं। सदा महात्मा पुरुषों का संग और उन्हीं के विषय में वार्तालाप करना चाहिये। रचना शिथिल होने पर भी जिसके प्रत्येक श्लोक में भगवान् के सुयश सूचक नाम हैं, वही वाणी जनसमुदाय की पापराशि का नाश करने वाली होती है; क्योंकि साधु पुरुष उसी को सुनते, गाते और कहते हैं। जो भगवान् किसी से कष्ट साध्य सेवा नहीं चाहते, आसन आदि विशेष उपकरणों की इच्छा नहीं रखते तथा सुन्दर रूप और जवानी नहीं चाहते, अपितु एक बार भी स्मरण कर लेने पर अपना परम प्रकाशमय वैकुण्ठ धाम दे डालते हैं, उन दयालु भगवान् को छोड़कर मनुष्य किसकी शरण में जाय। उन्हीं रोग-शोक से रहित, चित्त द्वारा चिन्तन करने योग्य, अव्यक्त, दयानिधान, भक्तवत्सल भगवान् नारायण की शरण में जाओ। महामते ! वैशाख मास में कहे हुए इन सब धर्मों का पालन करो, उससे प्रसन्न होकर भगवान् जगन्नाथ तुम्हारा कल्याण करेंगे। ऐसा कहकर शंख मुनि व्याध की ओर देखकर चुप हो रहे। तब उस दिव्य पुरुष ने पुन: इस प्रकार कहा- 'मुने ! मैं धन्य हूँ, आप-जैसे दयालु महात्मा ने मुझपर अनुग्रह किया है। मेरी कुत्सित योनि दूर हो गयी और अब मैं परमगति को प्राप्त हो रहा हूँ, यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है।' यो कहकर दिव्य पुरुष ने शंख मुनि की परिक्रमा की तथा उनकी आज्ञा लेकर वह दिव्य लोक को चला गया। तदनन्तर सन्ध्या हो गयी। व्याध ने शंख को अपनी सेवा से सन्तुष्ट किया और उन्होंने सांयकाल की सन्ध्योपासना करके शेष रात्रि व्यतीत की। भगवान् के लीलावतारों की कथावार्ता द्वारा रात व्यतीत करके शंख मुनि ब्राह्ममुहूर्त में उठे और दोनों पैर धोकर मौनभाव से तारक ब्रह्म का ध्यान करने लगे। तत्पश्चात् शौचादि क्रिया से निवृत्त होकर वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान किया और सन्ध्या-तर्पण आदि सब कर्म समाप्त करके उन्होंने हर्षयुक्त हृदय से व्याध को बुलाया। बुलाकर उसे 'राम' इस दो अक्षर वाले नाम का उपदेश दिया, जो वेद से भी अधिक शुभकारक है। उपदेश देकर इस प्रकार कहा-'भगवान् विष्णु का एक-एक नाम भी सम्पूर्ण वेदों से अधिक महत्त्वशाली माना गया है। ऐसे अनन्त नामों से अधिक है भगवान् विष्णुका सहस्रनाम। उस सहस्रनाम के समान राम-नाम माना गया है। इसलिये व्याध! तुम निरन्तर रामनाम का जप करो और मृत्युपर्यन्त मेरे बताये हुए धर्मो का पालन करते रहो। इस धर्म के प्रभाव से तुम्हारा वल्मिक ऋषि के घर जन्म होगा और तुम इस पृथ्वी पर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध होओगे।' व्याध को ऐसा आदेश देकर मुनिवर शंख ने दक्षिण दिशा को प्रस्थान किया व्याध ने भी शंख मुनि की परिक्रमा करके बार-बार उनके चरणों में प्रणाम किया और जब तक वे दिखायी दिये, तब तक उन्हीं की ओर देखता रहा। फिर उसने अति योग्य वैशाखोक्त धर्मो का पालन किया। जंगली कैथ, कटहल, जामुन और आम आदि के फलों से राह चलने वाले थके-माँदे पथिकों को वह भोजन कराता था। जूता, चन्दन, छाता, पंखा आदि के द्वारा तथा बालू के बिछावन और छाया आदि की व्यवस्था से पथिकों के परिश्रम और पसीने का निवारण करता था। प्रात:काल स्नान करके दिन-रात राम-नामका जप करता था। इस प्रकार धर्मानुष्ठान करके वह दूसरे जन्म में बल्मिक का पुत्र हुआ। उस समय वह महायशस्वी बाल्मीकि के नामसे विख्यात हुआ। उन्हीं बाल्मीकिजी ने अपने मनोहर प्रबन्ध रचना द्वारा संसार में दिव्य राम-कथा को प्रकाशित किया, जो समस्त कर्म-बन्धनों का उच्छेद करने वाली है। मिथिलापते ! देखो, वैशाख का माहात्म्य कैसा ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है, जिससे एक व्याध भी परम दुर्लभ ऋषिभाव को प्राप्त हो गया यह सेमांचकारी उपाख्यान सब पापों का नाश करने वाला हैं। जो इसे सुनता और सुनाता है, वह पुनः माता के स्तनका दूध पीने वाला नहीं होता। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************

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. 🌞 *आज का हिन्दू पंचांग* 🌞 🌞 *10 मई 2021 (अंग्रेजी तिथि)* 🌞 ☀️ *सूर्य उदय/अस्त* - 05:35 से 19:13 तक 🌞 *विक्रमी संवत 2078* 🌞 *वैशाख मास, कृष्ण पक्ष* 1️⃣ *तिथि* - चतुर्दशी 21:55 तक, अमावस्या 2️⃣ *नक्षत्र* - अश्विनी 20:26 तक, भरणी 3️⃣ *योग* - आयुष्मान 21:40 तक, सौभाग्य 4️⃣ *करण* - भद्रा 08:41 तक, शकुनि 21:55 तक, चतुष्पाद 5️⃣ *वार* - सोमवार ♨️ _*शुभ मुहूर्त*_ ♨️ ✅ *ब्रह्म मुहूर्त* - 04:12 से 04:54 तक ✅ *अभिजीत मुहूर्त* - 11:57 से 12:52 तक ♨️ _*अशुभ मुहूर्त*_ ♨️ ❌ *राहुकाल* - 07:18 से 09:00 तक ❌ *दिशाशूल* - पूर्व दिशा में ♨️ _*व्रत / त्यौहार / विशेष*_ ♨️ 🚩 ♨️ _*आज का सुविचार*_ ♨️ *ईप्सितं मनसः सर्वं कस्य सम्पद्यते सुखम्।* *देवायत्तं यतः सर्वं तस्मात् सन्तोषमाश्रयेत्।।* *भावार्थ* : _मनचाहा सुख किसको प्राप्त होता है क्योंकि सब कुछ भाग्य के वश में है। इसलिए संतोष का सहारा लेना चाहिए।।_ 🙏 *शुभ प्रभात* 🙏 🙏 *जय श्री राम* 🙏 🙏 *आपका दिन मंगलमय हो* 🙏

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 09 भगवान् विष्णु के स्वरूप का विवेचन, प्राण की श्रेष्ठता, जीवों के विभिन्न स्वभावों और कर्मों का कारण तथा भागवत धर्म - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - व्याध ने पूछा- ब्रह्मन्! आपने पहले कहा था कि भगवान् विष्णु की प्रीति के लिये कल्याणकारी भागवतधर्मो का और उनमें भी वैशाख मास में कर्तव्यरूप से बताये हुए नियमों का विशेष रूप से पालन करना चाहिये। वे भगवान् विष्णु कैसे हैं? उनका क्या लक्षण है? उनकी सत्ता में क्या प्रमाण है तथा वे सर्वव्यापी भगवान् किनके द्वारा जानने योग्य हैं? वैष्णव धर्म कैसे हैं ? और किससे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं? महामते ! मैं आपका किंकर हूँ, मुझे ये सब बातें बताइये। व्याध के इस प्रकार पूछने पर शंख ने रोगशोक से रहित सम्पूर्ण जगत् के स्वामी भगवान् नारायण को प्रणाम करके कहा- व्याध! भगवान् विष्णु का स्वरूप कैसा है, यह सुनो। भगवान् समस्त शक्तियों के आश्रय, सम्पूर्ण गुणों की निधि तथा सबके ईश्वर बताये गये हैं। वे नि्गुण, निष्कल तथा अनन्त हैं। सत्-चित् और आनन्द-यही उनका स्वरूप है। यह जो अखिल चराचर जगत् है, अपने अधीश्वर और आश्रय के साथ नियत रूप से जिसके वश में स्थित है, जिससे इसकी उत्पत्ति, पालन, संहार, पुनरावृत्ति तथा नियमन आदि होते हैं, प्रकाश, बन्धन, मोक्ष और जीविका-इन सबकी प्रवृत्ति जहाँ से होती है, वे ही ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध भगवान् विष्णु हैं। वे ही विद्वानों के सम्मान्य सर्वव्यापी परमेश्वर हैं। ज्ञानी पुरूषों ने उन्हीं को साक्षात् परब्रह्म कहा है। वेद, शास्त्र स्मृति, पुराण, इतिहास पांचरात्र और महाभारत- सब विष्णु स्वरूप हैं-विष्णु के ही प्रतिपादक हैं। इन्हीं के द्वारा महाविष्णु जानने योग्य हैं। वेदवेद्य, सनातनदेव भगवान् नारायण को कोई इन्द्रियों से (प्रत्यक्ष प्रमाणद्वारा), अनुमान से और तर्क से भी नहीं जान सकता है। उन्हीं के दिव्य जन्म-कर्म तथा गुणों को अपनी बुद्धि के अनुसार जानकर उनके अधीन रहने वाले जीव-समूह सदा मुक्त होते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् प्राण से उत्पन्न हुआ है, प्राणस्वरूप है, प्राणरूपी सूत्र में पिरोया हुआ है तथा प्राणसे ही चेष्टा करता है। सबका आधारभूत यह सूत्रात्मा प्राण ही विष्णु है, - ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं। व्याध ने पूछा- ब्रह्मन् ! जीवों में यह सूत्रात्मा प्राण सबसे श्रेष्ठ किस प्रकार है ? शंख ने कहा- व्याध! पूर्वकाल में सनातन देव भगवान् नारायण ने ब्रह्मा आदि देवताओं की सृष्टि करके कहा- 'देवताओ! मैं तुम्हारे सम्राट् के पद पर ब्रह्माजी की स्थापना करता हूँ, यही तुम सबके स्वामी हैं। अब तुम लोगों में जो सबसे अधिक शक्तिशाली हो, उसे तुम स्वयं ही युवराज के पद पर प्रतिष्ठित करो।' भगवान् के इस प्रकार कहने पर इन्द्र आदि सब देवता आपस में विवाद करते हुए कहने लगे-'मैं युवराज होऊँगा, मैं होऊँगा।किसी ने सूर्य को श्रेष्ठ बताया और किसी ने इन्द्र को। किन्हीं की दृष्टि में कामदेव ही सबसे श्रेष्ठ थे। कुछ लोग मौन ही खड़े रहे। आपस में कोई निर्णय होता न देखकर वे भगवान् नारायण के पास पूछने के लिये गये और प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले- 'महाविष्णो! हम सबने अच्छी तरह विचार कर लिया, किंतु हम सबमें श्रेष्ठ कौन है, यह हम अभी तक किसी प्रकार निश्चय न कर सके। अब आप ही निर्णय कीजिये।' तब भगवान् विष्णु ने हँसते हुए कहा- 'इस विराट् ब्रह्माण्डरूपी शरीर से जिसके निकल जाने पर यह गिर जायगा और जिसके प्रवेश करने पर पुन: उठकर खड़ा हो जायगा, वही देवता सबसे श्रेष्ठ है। भगवान् के ऐसा कहने पर सब देवताओंने कहा- अच्छा ऐसा ही हो।' तब सबसे पहले देवेश्वर जयन्त विराट् शरीर के पैर से बाहर निकला। उसके निकलने से उस शरीर को लोग पंगु कहने लगे; परंतु शरीर गिर न सका। यद्यपि वह चल नहीं पाता था तो भी सुनता, पीता, बोलता, सूँघता और देखता हुआ पूर्ववत् स्थिर रहा। तत्पश्चात् गुह्यदेश से दक्ष प्रजापति निकलकर अलग हो गये। तब लोगों ने उसे नपुंसक कहा; किंतु उस समय भी वह शरीर गिर न सका। उसके बाद विराट् शरीर के हाथ से सब देवताओं के राजा इन्द्र बाहर निकले। उस समय भी शरीरपात नहीं हुआ। विराट् पुरुष को सब लोग हस्तहीन (लूला) कहने लगे। इसी प्रकार नेत्रों से सूर्य निकले। तब लोगों ने उसे अंधा और काना कहा। उस समय भी शरीर का पतन नहीं हुआ। तदनन्तर नासिका से अश्विनीकुमार निकले, किंतु शरीर नहीं गिर सका। केवल इतना ही कहा जाने लगा कि यह सूँघ नहीं सकता। कान से अधिष्ठातृ देवियाँ दिशाएँ निकलीं। उस समय लोग उसे बधिर कहने लगे; परंतु उसकी मृत्यु नहीं हुई। तत्पश्चात् जिह्वा से वरुणदेव निकले। तब लोगों ने यही कहा कि यह पुरुष रस का अनुभव नहीं कर सकता; किंतु देहपात नहीं हुआ। तदनन्तर वाक्-इन्द्रिय से उसके स्वामी अग्निदेव निकले। उस समय उसे गूँगा कहा गया; किंतु शरीर नहीं गिरा। फिर अन्तःकरण से बोधस्वरूप रुद्र देवता अलग हो गये। उस दशा में लोगों ने उसे जड कहा; किंतु शरीर पात नहीं हुआ। सबके अन्तर में उस शरीर से प्राण निकला; तब लोगों ने उसे मरा हुआ बतलाया। इससे देवताओं के में बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले-'हम लोगों में से जो भी इस शरीर में प्रवेश करके इसे पूर्ववत् उठा देगा, जीवित कर देगा, वही युवराज होगा।' ऐसी प्रतिज्ञा करके सब क्रमशः उस शरीर में प्रवेश करने लगे। जयन्त ने पैरों में प्रवेश किया; किंतु वह शरीर नहीं उठा। प्रजापति दक्ष ने गुह्य इन्द्रियों में प्रवेश किया; फिर भी शरीर नहीं उठा। इन्द्र ने हाथ में, सूर्य ने नेत्रों में, दिशाओं ने कान में, वरुणदेव ने जिह्वा में, अश्विनीकुमार ने नासिका में, अग्नि ने वाक्-इन्द्रिय में तथा रुद्र ने अन्त:करण में प्रवेश किया; किंतु वह शरीर नहीं उठा, नहीं उठा। सबके अन्त में प्राण ने प्रवेश किया, तब वह शरीर उठकर खड़ा हो गया। तब देवताओं ने प्राण को ही सब देवताओं में श्रेष्ठ निश्चित किया। बल, ज्ञान, धैर्य, वैराग्य और जीवन शक्ति में प्राण को ही सर्वाधिक मानकर देवताओं ने उसी को युवराज पद पर अभिषिक्त किया। इस उत्कृष्ट स्थिति के कारण प्राण को उक्थ कहा गया है। अंत: समस्त चराचर जगत् प्राणात्मक है। जगदीश्वर प्राण अपने पूर्ण एवं बलशाली अंशों द्वारा सर्वत्र परिपूर्ण है। प्राण हीन जगत् का अस्तित्व नहीं है। प्राण हीन कोई भी वस्तु वृद्धि को नहीं प्राप्त होती। इस जगत् में किसी भी प्राण हीन वस्तु की स्थिति नहीं हैं; इस कारण प्राण सब जीवों में श्रेष्ठ, सबका अन्तरात्मा और सर्वाधिक बलशाली सिद्ध हुआ। इसलिये प्राणोपासक प्राण को ही सर्वश्रेष्ठ कहते हैं। प्राण सर्वदेवात्मक है, सब देवता प्राणमय हैं। वह भगवान् वासुदेव का अनुगामी तथा सदा उन्हीं में स्थित है। मनीषी पुरुष प्राण को महाविष्णु का बल बतलाते हैं। महाविष्णु के माहात्म्य और लक्षण को इस प्रकार जानकर मनुष्य पूर्वबन्धन का अनुसरण करने वाले अज्ञानमय लिंग को उसी प्रकार त्याग देता है, जैसे सर्प पुरानी केंचुल को। लिंग देह का त्याग करके वह परम पुरुष अनामय भगवान् नारायणको प्राप्त होता है। शंख मुनि की कही हुई यह बात सुनकर व्याध ने पुन: पूछा- ब्रह्मन् ! यह प्राण जब इतना महान् प्रभावशाली और इस सम्पूर्ण जगत् का गुरु एवं ईश्वर है, तब लोक में इसकी महिमा क्यों नहीं प्रसिद्ध हुई? शंख ने कहा- पहले की बात है। प्राण अश्वमेध यज्ञों द्वारा अनामय भगवान् नारायण का यजन करने के लिये गंगा के तटपर प्रसन्नता पूर्वक गया। अनेक मुनिगणों के साथ उसने फलों के द्वारा पृथ्वी का शोधन किया। उस समय वहाँ समाधि में स्थित हुए महात्मा कण्व बाँबी की मिट्टी में छिपे हुए बैठे थे। हल जोतने पर बाँबी गिर जाने से वे बाहर निकल आये और क्रोध पूर्वक देखकर सामने खड़े हुए महाप्रभु प्राण को शाप देते हुए बोले-'देवेश्वर ! आज से लेकर आपकी महिमा तीनों लोकों में-विशेषत: भूलोक में प्रसिद्ध न होगी। हाँ, आपके अवतार तीनों लोकोंमें विख्यात होंगे। व्याध! तभी से संसार में महाप्रभु प्राण की महिमा प्रसिद्ध नहीं हुई। भूलोक में तो उसकी ख्याति विशेष रूप से नहीं। व्याध ने पूछा- महामते ! भगवान् विष्णु के रचे हुए करोड़ों एवं सहस्रों सनातन जीव नाना मार्ग पर चलने और भिन्न-भिन्न कर्म करने वाले क्यों दिखायी देते हैं? इन सबका एक-सा स्वभाव क्यों नहीं है? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये? शंख ने कहा- रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण के भेद से तीन प्रकार के जीवसमुदाय होते हैं। उनमें राजस स्वभाव वाले जीव राजस कर्म, तमोगुणी जीव तामस कर्म तथा सात्त्विक स्वभाव वाले जीव सात्त्विक कर्म करते हैं। कभी-कभी संसार में इनके गुणों में विषमता भी होती है, उसी से वे ऊँच और नीच कर्म करते हुए तदनुसार फल के भागी होते हैं। कभी सुख, कभी दु:ख और कभी दोनों को ही ये मनुष्य गुणों की विषमता से प्राप्त करते हैं। प्रकृति में स्थित होने पर जीव इन तीनों गुणों से बँधते हैं। गुण और कर्मो के अनुसार उनके कर्मो का भिन्न-भिन्न फल होता है। ये जीव फिर गुणों के अनुसार ही प्रकृति को प्राप्त होते हैं। प्रकृति में स्थित हुए प्राकृतिक प्राणी गुण और कर्म से व्याप्त होकर प्राकृतिक गति को प्राप्त होते हैं। तमोगुणी जीव तामसी वृत्ति से ही जीवन निर्वाह करते और सदा महान् दुःख में डूबे रहते हैं। उनमें दया नहीं होती, वे बड़े क्रूर होते हैं और लोक में सदा द्वेष से ही उनका जीवन चलता है। राक्षस और पिशाच आदि तमोगुणी जीव हैं, जो तामसी गति को प्राप्त होते हैं। राजसी लोगोंकी बुद्धि मिश्रित होती है। वे पुण्य तथा पाप दोनों करते हैं; पुण्य से स्वर्ग पाते और पाप से यातना भोगते हैं। इसी कारण ये मन्द भाग्य पुरुष बार-बार इस संसार में आते-जाते रहते हैं। जो सात्त्विक स्वभाव के मनुष्य हैं, वे धर्मशील, दयालु, श्रद्धालु, दूसरों के दोष न देखने वाले तथा सात्त्विक वृत्ति से जीवननिर्वाह करने वाले होते हैं। इसीलिये भिन्न-भिन्न कर्म करने वाले जीवों के एक-दूसरे से पृथक् अनेक प्रकार के भाव हैं; उनके गुण और कर्म के अनुसार महाप्रभु विष्णु अपने स्वरूप की प्राप्ति कराने के लिये उनसे कर्मो का अनुष्ठान करवाते हैं। भगवान् विष्णु पूर्ण काम हैं, उनमें विषमता और निर्दयता आदि दोष नहीं हैं। वे समभाव से ही सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। सब जीव अपने गुण से ही कर्म फल के भागी होते हैं। जैसे माली बगीचे में लगे हुए सब वृक्षों को समानरूप से सींचता है। और एक ही कुआँ के जल से सभी वृक्ष पलते हैं तथापि वे पृथक् पृथक् स्वभाव को प्राप्त होते हैं। बगीचा लगाने वाले में किसी प्रकार विषमता और निर्दयता का दोष नहीं होता। देवाधिदेव भगवान् विष्णु का एक निमेष ब्रह्माजी के एक कल्प के समान माना गया है। ब्रह्मकल्प के अन्त में देवाधिदेव शिरोमणि भगवान् विष्णु का उन्मेष होता है अर्थात् वे आँख खोलकर देखते हैं। जब तक निमेष रहता है तब तक प्रलय है। निमेष के अन्त में भगवान् अपने उदर में स्थित सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करने की इच्छा करते हैं। सृष्टि की इच्छा होने पर भगवान् अपने उदर में स्थित हुए अनेक प्रकार के जीव समूहों को देखते हैं। उनकी कुक्षि में रहते हुए भी सम्पूर्ण जीव उनके ध्यान में स्थित होते हैं। अर्थात् कौन जीव कहाँ किस रूप में है, इसकी स्मृति भगवान् को सदा बनी रहती है। भगवान् विष्णु चतुरव्यहस्वरूप हैं। वे उन्मेष काल के प्रथम भाग में ही चतुर्व्यह रूप में प्रकट हो, व्यूह गामी वासुदेव स्वरूप से महात्माओं मे से किसी को सायुज्य-साधक तत्त्वज्ञान, किसी को सारूप्य, किसी को सामीप्य और किसी को सालोक्य प्रदान करते हैं। फिर अनिरुद्ध मूर्ति के वश में स्थित हुए सम्पूर्ण लोकों को वे देखते हैं, देखकर उन्हें प्रद्युम्न मूर्ति के वश में देते हैं और सृष्टि करने का संकल्प करते हैं। भगवान् श्रीहरि ने पूर्ण गुण वाले वासुदेव आदि चार व्यूहों के द्वारा क्रमश: माया, जया, कृति और शान्ति को स्वयं स्वीकार किया है। उनसे संयुक्त चतुर्व्यूहात्मक महाविष्णु ने पूर्णकाम होकर भी भिन्न-भिन्न कर्म और वासना वाले लोकों की सृष्टि की है। उन्मेष काल का अन्त होने पर भगवान् विष्णु पुनः योग माया का आश्रय लेकर व्यूहगामी संकर्षण स्वरूप से इस चराचर जगत् का संहार करते हैं। इस प्रकार महात्मा विष्णु का यह सब चिन्तन करने योग्य कार्य बतलाया गया, जो ब्रह्मा आदि योग से सम्पन्न पुरुषों के लिये भी अचिन्त्य एवं दुर्विभाव्य है। व्याध ने पूछा- मुने! भागवत धर्म कौन-कौन-से हैं और किनके द्वारा भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं? शंख ने कहा- जिससे अन्तःकरण की शुद्धि होती है, जो साधु पुरुषों का उपकार करने वाला हैं तथा जिसकी किसी ने भी निन्दा नहीं की है, उसे तुम सात्त्विक धर्म समझो। वेदों और स्मृतियों में बताये हुए धर्म का यदि निष्काम भाव से पालन किया जाय तथा वह लोक से विरुद्ध न हो, तो उसे भी सात्त्विक धर्म जानना चाहिये। वर्ण और आश्रम विभाग के अनुसार जो चार-चार प्रकार के धर्म हैं, वे सभी नित्य, नैमित्तिक और काम्य भेद से तीन प्रकार के माने गये हैं। वे सभी अपने-अपने वर्ण और आश्रम के धर्म जब भगवान् विष्णु को समर्पित कर दिये जाते हैं, तब उन्हें सात्त्विक धर्म जानना चाहिये। वे सात्त्विक धर्म ही मंगलमय भागवतधर्म हैं। अन्यान्य देवताओं की प्रीति के लिये सकाम भाव से किये जाने वाले धर्म राजस माने गये हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि के उद्देश्य से किये जाने वाले लोकनिष्ठुर, हिंसात्मक निन्दित कर्मों को तामस धर्म कहा गया है। जो सत्त्वगुण में स्थित हो भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने वाले शुभ कारक सात्त्विक धर्मों का सदा निष्कामभाव से अनुष्ठान करते हैं, वे भागवत (विष्णुभक्त) माने गये हैं। जिनका चित्त सदा भगवान् विष्णु में लगा रहता है, जिनकी जिह्वा पर भगवान् का नाम है। और जिनके हृदय में भगवान् के चरण विराजमान हैं, वे भागवत कहे गये हैं। जो सदाचार परायण, सबका उपकार करने वाले और सदैव ममता से रहित हैं, वे भागवत माने गये हैं। जिनका शास्त्र में गुरु में और सत्कर्मों में विश्वास है तथा जो सदा भगवान् विष्णु के भजन में लगे रहते है, उन्हें भागवत कहा गया है। उन भगवद्भक्त महात्माओं को जो धर्म नित्य मान्य हैं, जो भगवान् विष्णु को प्रिय हैं तथा वेदों और स्मृतियों में जिनका प्रतिपादन किया गया है, वे ही सनातन धर्म माने गये हैं। जिनका चित्त विषयों में आसक्त है, उनका सब देशों में घूमना, सब कर्मो को देखना और सब धर्मो को सुनना कुछ भी लाभ कारक नहीं है। साधु-पुरुषों का मन साधु-महात्माओं के दर्शन से पिघल जाता है। निष्काम पुरुषों द्वारा श्रद्धा पूर्वक जिसका सेवन किया जाता है तथा जो भगवान् विष्णु को सदा ही प्रिय है, वह भागवत धर्म माना गया है। भगवान् विष्णु ने क्षीरसागर में सबके हित की कामना से भगवती लक्ष्मीजी को दही से निकाले हुए मक्खन की भाँति सब शास्त्रों के सारभूत वैशाख धर्म का उपदेश किया है। जो दम्भ रहित होकर वैशाख मास के व्रत का अनुष्ठान करता है, सब पापों से रहित हो सूर्यमण्डल को भेदकर भगवान् विष्णु के योगिदुर्लभ परम धाम में जाता है। इस प्रकार द्विजश्रेष्ठ शंख के द्वारा भगवान् विष्णु के प्रिय वैशाख मास के धर्मो का वर्णन होते समय वह पाँच शाखाओं वाला वटवृक्ष तुरंत ही भूमि पर गिर पड़ा। उसके खोंखले में एक विकराल अजगर रहता था, वह भी पापयोनिमय शरीर को त्यागकर तत्काल दिव्य स्वरूप हो मस्तक झुकाये शंख के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************

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