🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *🌸शुभरात्रि सुविचार🌸* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *_अगर रास्ते मेँ भोँकते हुये हर कुत्ते पर पत्थर फेँकना शुरु कर दोगे,तो अपनी मंजिल पर कभी नहीँ पहुँच पाओगे._* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *_क्रोध से भ्रम पैदा होता है. भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है. जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है. जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है._* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *_गलती उसी इंसान से होती है जो काम करता है, काम न करने वाले सिर्फ गलती ढूंढते है !_* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *_जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाइयों को मिटा नहीं सकते!_* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *_जरूरी नहीं की_* *_काम से ही इन्सान थक जाए.._* *_कुछ ख्यालों का_* *_बोझ भी... इन्सान को थका देता है_* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸 *🎍शुभरात्रि जी🎍* *🌸आपकी रात्रि खुशियों से भरी रहे🌸* 🌸🎍🍃🍀☘️☘️🍃🎍🌸

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मानव और महामारी ___________________ इस दुनिया का सबसे बड़ा खलनायक खुद इस दुनिया को बनाने वाला ही है,लिहाजा वो कोई देवपुरुष तो हो नही सकता।यकीनन अब दुनिया की स्टेयरिंग किसी सनकी दैत्य के हाथ मे आ गई है. मानव सभ्यता की तारीखों के जर्द में ना जाने कितनी ही विनाश की पटकथा लिखी गई है।मानव को युध्दों से कभी खतरा नही रहा।युद्ध के मैदान तो मानव के शौर्य प्रदर्शन हेतु रंगमंच मात्र रहे है।मानव को सबसे अधिक खतरा इंसान की इंसान से जंग से नही अपितु इंसान की ईश्वर से जंग से रहा है।मानव ने जब-जब ईश्वर से इतर ही अपनी श्रेष्ठ सभ्यता स्थापित करने की चेष्टा की है तब तब ईश्वर ने उसे अपनी देव शक्तियों से नेस्तनाबूद करने की ठानी है. कोरोना वायरस कालचक्र की एक अक्षुण्ण मर्यादा है।2020 में इस कालचक्र का एक बार ठहर जाना आज से ठीक एक सदी पहले यानी कि 1930 में ही चित्रगुप्त के चिठ्ठों में काली स्याही से रंग दिया गया था।ये सब कुछ ईश्वर की घड़ी में अलार्म की तरह सेट की गई घंटी है।भूल केवल यहां हुई मानव इस घंटी के बजने से थोड़ा पहले नही जाग सका,और यकीन मानिए आज से ठीक एक सदी बाद यह कालचक्र फिर से मानव पर प्रहार करेगा।इसलिए आज ही इस सूचना को एक शिलालेख में गुदवा कर चीन के वुहान शहर के सबसे ऊंचे भूमंडल पर आने वाली संतति को सावधान करने हेतु स्थापित करवा देगा चाइए. गौर करिये....! 1720-प्लेग से मानव पर प्रहार हुआ।एक लाख से ज्यादा लोग काल के ग्रास बने. ठीक सौ साल बाद... 1820- कॉलरा महामारी।पूरे दक्षिण एशिया को नेस्तनाबूद करने की कोशिश. फिर सौ साल बाद कालचक्र रुका. 1920-स्पेनिश फ्लू। यह ईश्वर और मानव का सबसे बड़ा मुकाबला था।मगर सामने मानव था।पांच करोड़ से ज्यादा लाशें गिरी।मानव गिरा,सम्भला और फिर रफ्तार भरी. हर बार मुँह की खाने के बाद इस बार छापामार पद्वति से हमला किया गया।कालचक्र पूरा होने से ग्यारह वर्ष पहले 2009 स्वाइन फ्लू।छः लाख लोग फिर कफ़न से ढके गए।मानव निश्चिंत था,कि इस सदी का मुकाबला हो चुका है।मगर अबके नियति भी छल और कपट सीख चुकी थी. 2020-कोरोना। डरिए मत।यह हमारी ईश्वर से परम्परागत जंग है।हम फिर जीतेंगे. मानव सभ्यता इतिहास ईश्वर प्रदत्त व्यवस्थाओं को चुनोती देना रहा है।अगर मानव है तो चुनोती दीजिए, चुनोती लीजिए,मुकाबला करिए. ईश्वर ने ही हमारे लिए धरती का सृजन किया है।हम आपस मे लड़ेंगे,मरेंगे,तबाह होंगे, तबाह करेंगे,धरती को बनाएंगे,बिगाड़ेंगे।मगर हमारी अपनी व्यवस्था में ईश्वर का हस्तक्षेप स्वीकर नही करेंगे. आज फिर आपकी सभ्यता को किसी ईश्वर ने ललकारने की चेष्टा की है।बताइये की कोई कोरोना आपको नकारात्मक नही बना सकता।मानव को मिटा नही सकता।इस कोरोना के नरभक्षी जबड़ो को भी कोई वैक्सीन बनाकर फ्लू और कोड की तरह नेस्तनाबूद करो. हे!धरती पुत्रो,धरती पर मनुष्य की सत्ता सर्वोच्च रहनी चाहिए।ये धरती हमारी है,केवल मनुष्यो की किसी ईश्वर की नही. सकारात्मक रहिए,स्वस्थ रहिए! ✍जी.आर.सुथार

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प्रभू का पत्र मेरे प्रिय... सुबह तुम जैसे ही सो कर उठे, मैं तुम्हारे बिस्तर के पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि तुम मुझसे कुछ बात करोगे। तुम कल या पिछले हफ्ते हुई किसी बात या घटना के लिये मुझे धन्यवाद कहोगे। लेकिन तुम फटाफट चाय पी कर तैयार होने चले गए और मेरी तरफ देखा भी नहीं!!! फिर मैंने सोचा कि तुम नहा के मुझे याद करोगे। पर तुम इस उधेड़बुन में लग गये कि तुम्हे आज कौन से कपड़े पहनने है!!! फिर जब तुम जल्दी से नाश्ता कर रहे थे और अपने ऑफिस के कागज़ इक्कठे करने के लिये घर में इधर से उधर दौड़ रहे थे...तो भी मुझे लगा कि शायद अब तुम्हे मेरा ध्यान आयेगा,लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब तुमने आफिस जाने के लिए ट्रेन पकड़ी तो मैं समझा कि इस खाली समय का उपयोग तुम मुझसे बातचीत करने में करोगे पर तुमने थोड़ी देर पेपर पढ़ा और फिर खेलने लग गए अपने मोबाइल में और मैं खड़ा का खड़ा ही रह गया। मैं तुम्हें बताना चाहता था कि दिन का कुछ हिस्सा मेरे साथ बिता कर तो देखो,तुम्हारे काम और भी अच्छी तरह से होने लगेंगे, लेकिन तुमनें मुझसे बात ही नहीं की... एक मौका ऐसा भी आया जब तुम बिलकुल खाली थे और कुर्सी पर पूरे 15 मिनट यूं ही बैठे रहे,लेकिन तब भी तुम्हें मेरा ध्यान नहीं आया। दोपहर के खाने के वक्त जब तुम इधर- उधर देख रहे थे,तो भी मुझे लगा कि खाना खाने से पहले तुम एक पल के लिये मेरे बारे में सोचोंगे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दिन का अब भी काफी समय बचा था। मुझे लगा कि शायद इस बचे समय में हमारी बात हो जायेगी,लेकिन घर पहुँचने के बाद तुम रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गये। जब वे काम निबट गये तो तुमनें टीवी खोल लिया और घंटो टीवी देखते रहे। देर रात थककर तुम बिस्तर पर आ लेटे। तुमनें अपनी पत्नी, बच्चों को शुभरात्रि कहा और चुपचाप चादर ओढ़कर सो गये। मेरा बड़ा मन था कि मैं भी तुम्हारी दिनचर्या का हिस्सा बनूं... तुम्हारे साथ कुछ वक्त बिताऊँ... तुम्हारी कुछ सुनूं... तुम्हे कुछ सुनाऊँ। कुछ मार्गदर्शन करूँ तुम्हारा ताकि तुम्हें समझ आए कि तुम किसलिए इस धरती पर आए हो और किन कामों में उलझ गए हो, लेकिन तुम्हें समय ही नहीं मिला और मैं मन मार कर ही रह गया। मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ। हर रोज़ मैं इस बात का इंतज़ार करता हूँ कि तुम मेरा ध्यान करोगे और अपनी छोटी छोटी खुशियों के लिए मेरा धन्यवाद करोगे। पर तुम तब ही आते हो जब तुम्हें कुछ चाहिए होता है। तुम जल्दी में आते हो और अपनी माँगें मेरे आगे रख के चले जाते हो।और मजे की बात तो ये है कि इस प्रक्रिया में तुम मेरी तरफ देखते भी नहीं। ध्यान तुम्हारा उस समय भी लोगों की तरफ ही लगा रहता है,और मैं इंतज़ार करता ही रह जाता हूँ। खैर कोई बात नहीं...हो सकता है कल तुम्हें मेरी याद आ जाये!!! ऐसा मुझे विश्वास है और मुझे तुम में आस्था है। आखिरकार मेरा दूसरा नाम...आस्था और विश्वास ही तो है। . . . तुम्हारा ईश्वर...👣

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एक आदमी ने दुकानदार से पूछा - केले और सेब क्या भाव लगाऐ हैं ? केले 20 रु.दर्जन और सेब 100 रु. किलो । उसी समय एक गरीब सी औरत दुकान में आयी और बोली मुझे एक किलो सेब और एक दर्जन केले चाहिये - क्या भाव है भैया ? दुकानदार: केले 5 रु दर्जन और सेब 25 रु किलो। औरत ने कहा जल्दी से दे दीजिये । दुकान में पहले से मौजूद ग्राहक ने खा जाने वाली निगाहों से घूरकर दुकानदार को देखा । इससे पहले कि वो कुछ कहता - दुकानदार ने ग्राहक को इशारा करते हुये थोड़ा सा इंतजार करने को कहा। औरत खुशी खुशी खरीदारी करके दुकान से निकलते हुये बड़बड़ाई - हे भगवान तेरा लाख- लाख शुक्र है , मेरे बच्चे फलों को खाकर बहुत खुश होंगे । औरत के जाने के बाद दुकानदार ने पहले से मौजूद ग्राहक की तरफ देखते हुये कहा : ईश्वर गवाह है भाई साहब ! मैंने आपको कोई धोखा देने की कोशिश नहीं की यह विधवा महिला है जो चार अनाथ बच्चों की मां है । किसी से भी किसी तरह की मदद लेने को तैयार नहीं है। मैंने कई बार कोशिश की है और हर बार नाकामी मिली है।तब मुझे यही तरीकीब सूझी है कि जब कभी ये आए तो मै उसे कम से कम दाम लगाकर चीज़े दे दूँ। मैं यह चाहता हूँ कि उसका भरम बना रहे और उसे लगे कि वह किसी की मोहताज नहीं है। मैं इस तरह भगवान के बन्दों की पूजा कर लेता हूँ । थोड़ा रूक कर दुकानदार बोला : यह औरत हफ्ते में एक बार आती है। भगवान गवाह है जिस दिन यह आ जाती है उस दिन मेरी बिक्री बढ़ जाती है और उस दिन परमात्मा मुझपर मेहरबान होजाता है । ग्राहक की आंखों में आंसू आ गए, उसने आगे बढकर दुकानदार को गले लगा लिया और बिना किसी शिकायत के अपना सौदा खरीदकर खुशी खुशी चला गया । कहानी का मर्म :- खुशी अगर बांटना चाहो तो तरीका भी मिल जाता है l पोस्ट कैसी लगी कमेन्ट करके जरूर बताएं....

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| वाणी का व्यवहार | वाणी से होती है आदमी की पहचान | कबीर दास जी कहते है स्वजो बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि। अर्थ : यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है. रहिमन जी भी कहते है स्वजनों दोनों रहिमन एक से, जौ लौं बोलत नाहिं जान परत हैं काक पिक, ऋतू बसंत के माहिं कविवर रहीम कहते हैं कि जब तक मुख से बोलें नहीं कौआ और कोयल एक ही समान प्रतीत होते हैं ऋतूराज बसंत की आने पर कोयल की मीठी वाणी कुहू-कुहू से और कौए की कर्कश आवाज से अंतर का आभास हो जाता है। इसका आशय यह है कि मनुष्य को अपनी वाणी मधुर और कोमल रखने का प्रयास करना चाहिए अन्यथा अपनी अयोग्यता का परिचय ही देना होगा। आदमी की काया कितनी भी सुन्दर क्यों न हो अगर उसके वाणी में माधुर्य और कोमलता नहीं है तो वह प्रभावहीन हो जाता है। स्वजनों आइये मधुरवाणी केबारे में एक प्रेरक कथा का अवलोकन करे एक राजा थे। बन-विहार को निकले। रास्ते में प्यास लगी। नजर दौड़ाई एक अन्धे की झोपड़ी दिखी। उसमें जल भरा घड़ा दूर से ही दीख रहा था। राजा ने सिपाही को भेजा और एक लोटा जल माँग लाने के लिए कहा। सिपाही वहाँ पहुँचा और बोला- ऐ अन्धे एक लोटा पानी दे दे। अन्धा अकड़ू था। उसने तुरन्त कहा- चल-चल तेरे जैसे सिपाहियों से मैं नहीं डरता। पानी तुझे नहीं दूँगा। सिपाही निराश लौट पड़ा। इसके बाद सेनापति को पानी लाने के लिए भेजा गया। सेनापति ने समीप जाकर कहा अन्धे। पैसा मिलेगा पानी दे। अन्धा फिर अकड़ पड़ा। उसने कहा, पहले वाले का यह सरदार मालूम पड़ता है। फिर भी चुपड़ी बातें बना कर दबाव डालता है, जा-जा यहाँ से पानी नहीं मिलेगा। सेनापति को भी खाली हाथ लौटता देखकर राजा स्वयं चल पड़े। समीप पहुँचकर वृद्ध जन को सर्वप्रथम नमस्कार किया और कहा- ‘प्यास से गला सूख रहा है। एक लोटा जल दे सकें तो बड़ी कृपा होगी।’ अंधे ने सत्कारपूर्वक उन्हें पास बिठाया और कहा- ‘आप जैसे श्रेष्ठ जनों का राजा जैसा आदर है। जल तो क्या मेरा शरीर भी स्वागत में हाजिर है। कोई और भी सेवा हो तो बतायें। राजा ने शीतल जल से अपनी प्यास बुझाई फिर नम्र वाणी में पूछा- ‘आपको तो दिखाई पड़ नहीं रहा है, फिर जल माँगने वालों को सिपाही, सरदार और राजा के रूप में कैसे पहचान पाये?’ अन्धे ने कहा- “वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के वास्तविक स्तर का पता चल जाता है।” दोस्तो वाणी उस तीर की तरह हाेती हैं, जाे एक बार कमान(धनुष) से निकलने के बाद वापस नहीं आती। इस लिए जब भी कुछ बाेलाे बहुँत सोच-समझ कर बाेलाे आपकी वाणी में ऐसा मिठास हाें की सुनने वाला गदगद़(खुश) हाे जायें। ऐसी वाणी कभी ना बाेलाे, जिससे किसी काे दुःख पहुँचे। 🌹श्री राधा कृष्णाय नमः 💔💔💔 श्री कृष्ण:शरणम् मम:!!🌹 🙏🙏

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