🏵️🌹मेरी प्यारी मेरी पूज्य माँ तुम्हें शत शत नमन🌹🏵️ 💖मुझे समझ आते आते मेरी माँ मेरा साथ छोड़ गईं💜 🏵️🙏ये कोशिश करना कि कभी माता पिता का दिल तुम्हारे कारण ना दुखे इसे ईश्वर की पूजा ही समझें🙏🏵️ जय श्री कृष्णा।। आज का कथा पुष्प आपको अर्पित करने के पहले एक बात जरुर कहना चाहूंगा कि हमे अपने व्यवहार और आचरण पर तीखी नजर जरूर रखना चाहिए कि उसमे कोई दोष न आने पाए। 🌹🌹एक नगर में रहने वाले एक पंडित जी की ख्याति दूर-दूर तक थी। पास ही के गाँव में स्थित मंदिर के पुजारी का आकस्मिक निधन होने की वजह से, उन्हें वहाँ का पुजारी नियुक्त किया गया था। ♧♧ एक बार वे अपने गंतव्य की और जाने के लिए बस में चढ़े, उन्होंने कंडक्टर को किराए के रुपये दिए और सीट पर जाकर बैठ गए। ♧♧ कंडक्टर ने जब किराया काटकर उन्हें रुपये वापस दिए तो पंडित जी ने पाया कि कंडक्टर ने दस रुपये ज्यादा दे दिए हैं। पंडित जी ने सोचा कि थोड़ी देर बाद कंडक्टर को रुपये वापस कर दूंगा। ♧♧ कुछ देर बाद मन में विचार आया कि बेवजह दस रुपये जैसी मामूली रकम को लेकर परेशान हो रहे है, आखिर ये बस कंपनी वाले भी तो लाखों कमाते हैं, बेहतर है इन रूपयों को भगवान की भेंट समझकर अपने पास ही रख लिया जाए। वह इनका सदुपयोग ही करेंगे। ♧♧ मन में चल रहे विचारों के बीच उनका गंतव्य स्थल आ गया. बस से उतरते ही उनके कदम अचानक ठिठके,उन्होंने जेब मे हाथ डाला और दस का नोट निकाल कर कंडक्टर को देते हुए कहा,"भाई...! तुमने मुझे किराया काटने के बाद भी दस रुपये ज्यादा दे दिए थे।" ♧♧ कंडक्टर मुस्कराते हुए बोला, "क्या आप ही गाँव के मंदिर के नए पुजारी है?"पंडित जी के हामी भरने पर कंडक्टर बोला, "मेरे मन में कई दिनों से आपके प्रवचन सुनने की इच्छा थी, आपको बस में देखा तो ख्याल आया कि चलो देखते है कि मैं अगर ज्यादा पैसे दूँ तो आप क्या करते हो..! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपके प्रवचन जैसा ही आपका आचरण है। जिससे सभी को सीख लेनी चाहिए" बोलते हुए, कंडक्टर ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। ♧♧ पंडितजी बस से उतरकर पसीना-पसीना थे। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया, ♧♧ "प्रभु तेरा लाख-लाख शुक्र है जो तूने मुझे बचा लिया, मैने तो दस रुपये के लालच में तेरी शिक्षाओं की बोली लगा दी थी।पर तूने सही समय पर मुझे सम्हलने का अवसर दे दिया।" कभी कभी हम भी तुच्छ से प्रलोभन में, अपने जीवन भर की चरित्र पूँजी दाँव पर लगा देते हैं...॥ हमारे जीवन में भी ऐसे कई प्रसंग, स्थिति आती हैं, कि हम दुकानदार से या जिससे भी पैसे का लेनदेन करते है,उससे गलती से हमें ज्यादा पैसे आ जाते है,हमे पता लग जाता है कि सामने वाले ने गलती से ज्यादा दे दिया है, परन्तु ऐसे कितने लोग होते है,जो उसे वापिस कर देते है ,बहुत ही कम , अधिकांश ज्यादा रकम रख लेते है,और अपने आप को ही सच्चा साबित करते है, कि हमने तो मांगे नहीं थे सामने वाले ने खुद गलती की है। मित्रों ध्यान रखना कोई न कोई तो आपको देख रहा है एक ईश्वर और दूसरा आपका अंतर्मन। बेईमानी से कमाए धन के दंड में न पत्नी, न बच्चे ,न अन्य पारिवारिक सदस्य कोई सहभागी नहीं होता जिनके भविष्य के लिए व्यक्ति पाप के दलदल में डूबा रहना चाहता है। ये हमारे भारतीय संस्कार नहीं है,न होने चाहिए। हमे स्वयं सुधरना होगा तभी युग सुधरेगा। संकलन कर्ता *

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🏵️🌸हर हर महादेव🌻🏵️ 🏵️🌷🌹हर हर नर्मदे🌹हर हर नर्मदे🌷हर हर नर्मदे🌹🌷🏵️ 🌺🌺माँ नर्मदा का ड्रोन चित्रण🌸🌸 🌻🌷नर्मदा यात्रा🌹🌻 🏵️🙏माँ नर्मदा की स्तुति🙏🏵️ ईश्वर की लाठी में आवाज नही होती...... एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था,कि उसने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थीं। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया,शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था।साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते,साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकनें के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दे दीं। मलंग ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिए प्रार्थना की,फिर आगे चल दिया। साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह,वो फिर एक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। यह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहा है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी। बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई। इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो को पकड़ कर खींच कर कहने लगा -"अंधा है?तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं?" साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुज़र रहा था। महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा,लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई। राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने,एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया।बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ लड़खड़ाता हुआ कीचड़ में जा गिरा। युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया। बूढ़े साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला, “वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़!!!” “लेकिन तू अगर चाहे मुझे भी वही पसंद है।” यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया। दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुका। वे अपने घर पहुंच गए थे। वो युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी। अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से उसके सम्बन्धी और दूसरे लोग तुरंत सहायता के लिये युवक की ओर लपके और अस्पताल ले गए। युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर में ज्यादा खून बहने लगा।लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफूसी होने लगी कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है,तभी उसे चोट लगी। दूसरे युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया। एक युवक कहने लगा कि, -"आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे।भगवान के भक्त में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता।आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।" साधु बाबा कहने लगा -"भगवान की क़सम! मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया। "अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से कैसे गिरा कि उसे इतनी गंभीर चोट आई।” तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि -"आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है?" एक युवक ने आगे बढ़कर कहा -"हाँ! मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ।" साधु ने अगला सवाल किया-"मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़ों को दागी किया था?" युवा बोला- "नहीं। लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे।" मलंग ने पूछा- "फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?" युवक कहने लगा, - "क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे।इसलिए उस युवक ने आपको मारा।" युवक की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया..... *तो! भगवान की क़सम! मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझसे प्रेम रखता है।अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार ‘प्रभु’ को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे?और वो मेरा यार इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है। सच है।उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नहीं और आवाज भी नहीं करती लेकिन पड़ती है तो बहुत दर्द देती है। अपने धन,यौवन और पद का अहंकार दूसरे को चोट पहुंचाने का कारण बनता है किन्तु जब समय का चक्र हमारी तरफ घूमता है तो हमारा कष्टों का दौर शुरू हो जाता है। हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचाते हैं,बस कर्म अच्छे होने चाहिये।किसी को भी चोट पहुँचाना खुद चोट खाने की तैयारी करना है। हमें अपने गलत कर्मों से डरना चाहिए क्योंकि ईश्वर की लाठी में आवाज नही होती जय जय श्रीराधे जी

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🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🌷 🌻श्री लक्ष्मी नारायणाय नमः🌻 🏵️🌼प्रभु आपका कल्याण करें🌼🏵️ 🌼🌹शुभसंध्या वन्दन🌹🌼 एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी से बोले, “लोगो में कितनी भक्ति बढ़ गयी है …. सब “नारायण नारायण” करते हैं !” .. तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!, मुझे पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!” .. तो भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जाप थोड़े ही ना करते हैं !” .. तो माता लक्ष्मी बोली कि , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!” ..भगवान नारायण एक गाँव में ब्राह्मण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा , “क्या काम है भाई ?” तो …भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान की कथा-कीर्तन करना चाहते है…” .. यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहना…” … गाँव के कुछ लोग इकट्ठा हो गये और सब तैयारी कर दी….पहले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा कर रहे थे तो संगत बढ़ी ! दूसरे और तीसरे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..कि कितनी भक्ति है लोगो में….! लक्ष्मी माता ने सोचा अब देखा जाये कि क्या चल रहा है। .. लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया….और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी कि माता उसके द्वार पर पहुंची ! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!” तो वो महिला बोली,”माताजी , साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!” .. लक्ष्मी माता बोली..”पिला दे बेटी थोडा पानी…बहुत प्यास लगी है..” तो वो महिला लौटा भर के पानी लायी….माता ने पानी पिया और लौटा वापिस लौटाया तो सोने का हो गया था!! .. यह देख कर महिला अचंभित हो गयी कि लौटा दिया था तो स्टील का और वापस लिया तो सोने का ! कैसी चमत्कारिक माता जी हैं !..अब तो वो महिला हाथ-जोड़ कर कहने लगी कि, “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना खा लीजिये..!” ये सोचा कि खाना खाएगी तो थाली, कटोरी, चम्मच, गिलास आदि भी सोने के हो जायेंगे। माता लक्ष्मी बोली, “तुम जाओ बेटी, तुम्हारा प्रवचन का टाइम हो गया!” .. वह महिला प्रवचन में आई तो सही … लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी…. .. अब महिलायें यह बात सुनकर चालू सत्संग में से उठ कर चली गयी !! अगले दिन से कथा में लोगों की संख्या कम हो गयी….तो भगवान ने पूछा कि, “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी ?” …. किसी ने कहा, ‘एक चमत्कारिक माताजी आई हैं नगर में… जिस के घर दूध पीती हैं तो गिलास सोने का हो जाता है,…. थाली में रोटी सब्जी खाती हैं तो थाली सोने की हो जाती है !… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..” .. भगवान नारायण समझ गए कि लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है! इतनी बात सुनते ही देखा कि जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए! .. पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास ! बोले, “ माता, मैं तो भगवान की कथा का आयोजन कर रहा था और आप ने मेरे घर को ही छोड़ दिया !” माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहले आनेवाली थी ! लेकिन तुमने अपने घर में जिस कथा कार को ठहराया है ना , वो चला जाए तभी तो मैं आऊं !” सेठ जी बोले, “बस इतनी सी बात !… अभी उनको धर्मशाला में कमरा दिलवा देता हूँ !” .. जैसे ही महाराज (भगवान्) कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोले, “ " महाराज आप अपना बिस्तर बांधो ! आपकी व्यवस्था अबसे धर्मशाला में कर दी है !!” महाराज बोले, “ अभी तो 2/3 दिन बचे है कथा के…..यहीं रहने दो” सेठ बोले, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ ! मैं कुछ नहीं सुनने वाला ! किसी और मेहमान को ठहराना है। ” .. इतने में लक्ष्मी जी आई , कहा कि, “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन से निबट लूँ!” माता लक्ष्मी जी भगवान् से बोली, “ " प्रभु , अब तो मान गए?” भगवान नारायण बोले, “हां लक्ष्मी तुम्हारा प्रभाव तो है, लेकिन एक बात तुम को भी मेरी माननी पड़ेगी कि तुम तब आई, जब संत के रूप में मैं यहाँ आया!! संत जहां कथा करेंगे वहाँ लक्ष्मी तुम्हारा निवास जरुर होगा…!!” यह कह कर नारायण भगवान् ने वहां से बैकुंठ के लिए विदाई ली। अब प्रभु के जाने के बाद अगले दिन सेठ के घर सभी गाँव वालों की भीड़ हो गयी। सभी चाहते थे कि यह माता सभी के घरों में बारी बारी आये। पर यह क्या ? लक्ष्मी माता ने सेठ और बाकी सभी गाँव वालों को कहा कि, अब मैं भी जा रही हूँ। सभी कहने लगे कि, माता, ऐसा क्यों, क्या हमसे कोई भूल हुई है ? माता ने कहा, मैं वही रहती हूँ जहाँ नारायण का वास होता है। आपने नारायण को तो निकाल दिया, फिर मैं कैसे रह सकती हूँ ?’ और वे चली गयी। शिक्षा : जो लोग केवल माता लक्ष्मी को पूजते हैं, वे भगवान् नारायण से दूर हो जाते हैं। अगर हम नारायण की पूजा करें तो लक्ष्मी तो वैसे ही पीछे पीछे आ जाएँगी, क्योंकि वो उनके बिना रह ही नही सकती । ✅ 🅾जहाँ परमात्मा की याद है। वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। केवल लक्ष्मी के पीछे भागने वालों को न माया मिलती ना ही राम।🅾 सम्पूर्ण पढ़ने के लिए धन्यबाद . इसे सबके साथ बाँटकर आत्मसात् करें। ज्ञान बांटने से बढ़ता है और केवल अपने पास रखने से खत्म हो जाता है। "श्रीमननारायण नारायण नारायण" "भजिमन नारायण नारायण नारायण" "जयश्रीराधेकृष्णा" *🌻🌻श्री कृष्णं वन्दे🌻🌻*

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