कैसे हुआ हनुमान जी का जन्म 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 पुराणों की कथानुसार हनुमान की माता अंजना संतान सुख से वंचित थी। कई जतन करने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इस दुःख से पीड़ित अंजना मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा सरोवर के पूर्व में एक नरसिंहा आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहां जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करना पड़ेगा तब जाकर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी। अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु का ही भक्षण किया तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से खुश होकर उसे वरदान दिया जिसके परिणामस्वरूप चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा को अंजना को पुत्र की प्राप्ति हुई। वायु के द्वारा उत्पन्न इस पुत्र को ऋषियों ने वायु पुत्र नाम दिया।

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🌹🌹 उत्पन्ना एकादशी 🌹🌹 यथा पुण्यसमं मित्रं नास्ति शास्त्रसमो गुरु:। तथैवैकादशीतुल्यं व्रतं नास्ति जगत्त्रये।। (पद्मपुराणम्) जिस तरह पुण्य के समान कोई मित्र नहीं है और शास्त्र के समान कोई गुरु नहीं है उसी तरह एकादशी के समान तीनों लोकों में कोई व्रत नहीं है। एकादशी दो प्रकार की होती है। (1)सम्पूर्णा (2) विद्धा सम्पूर्णा:-जिस तिथि में केवल एकादशी तिथि होती है अन्य किसी तिथि का उसमे मिश्रण नही होता उसे सम्पूर्णा एकादशी कहते है। विद्धा एकादशी पुनः दो प्रकार की होती है (1) पूर्वविद्धा (2) परविद्धा पूर्वविद्धा:-दशमी मिश्रित एकादशी को पूर्वविद्धा एकादशी कहते हैं।यदि एकादशी के दिन अरुणोदय काल (सूरज निकलने से 1घंटा 36 मिनट का समय) में यदि दशमी का नाम मात्र अंश भी रह गया तो ऐसी एकादशी पूर्वविद्धा दोष से दोषयुक्त होने के कारण वर्जनीय है।यह पुण्यों का नाश करने वाली है। पद्मपुराण में वर्णित है। " वासरं दशमीविधं दैत्यानां पुष्टिवर्धनम। मदीयं नास्ति सन्देह: सत्यं सत्यं पितामहः।। "दशमी मिश्रित एकादशी दैत्यों के बल को बढ़ाने वाली है इसमें कोई भी संदेह नही है।" परविद्धा:-द्वादशी मिश्रित एकादशी को परविद्धा एकादशी कहते हैं! " द्वादशी मिश्रिता ग्राह्य सर्वत्र एकादशी तिथि: "द्वादशी मिश्रित एकादशी सर्वदा ही ग्रहण करने योग्य है।" इसलिए भक्तों को परविद्धा एकादशी ही रखनी चाहिए। ऐसी एकादशी का पालन करने से भक्ति में वृद्धि होती है।दशमी मिश्रित एकादशी से पुण्य क्षीण होते हैं।

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