अपने इष्टदेव का निर्णय कैसे करें ??? ✥✥💛✥✥💜✥✥💖✥✥💚✥✥ किसी का चित्त भगवान के भोलेशंकर रूप में रमता है, तो किसी का शेषशायी विष्णु रूप पर मुग्ध होता है; किसी का मन श्रीकृष्ण के नटवर वेष में फंसता है, तो किसी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम आकर्षित करते हैं । किसी को श्रीकृष्ण की आराधिका श्रीराधा की करुणामयी रसिकता अपनी ओर खींचती है तो किसी को जगदम्बा का दुर्गारूप सुहाता है । अत: भगवान के जिस रूप में प्रीति हो उसी रूप की आराधना करनी चाहिए । सनातन हिन्दू धर्म में तैंतीस कोटि देवता माने गए हैं जिनमें पांच प्रमुख देवता—सूर्य, गणेश, गौरी, शिव और श्रीविष्णु (श्रीकृष्ण, श्रीराम) की उपासना प्रमुख रूप से बतायी गयी है । कोई किसी देवता को तो कोई किसी और देवता को बड़ा बतलाता है, ऐसी स्थिति में मन में यह व्याकुलता बनी रहती है कि किसको इष्ट माना जाए ? हृदय में जब परमात्मा के किसी रूप की लगन लग जाए, दिल में वह छवि धंस जाए, किसी की रूप माधुरी आंखों में समा जाए, किसी के लिए अत्यन्त अनुराग हो जाए, मन में उन्हें पाने की तड़फड़ाहट हो जाए तो वही हमारे आराध्य हैं—ऐसा जानना चाहिए । ⛳🕉 नमो नारायणा⛳ 16-06-2018

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एक चीटी अपने मुँह मे चावल ले कर जा रही थी, चलते - चलते उसको रास्ते में दाल मिल गई । उसे भी लेने की उसकी इच्छा हुई, लेकिन चावल मुँह में रखने पर दाल कैसे मिलेगी ? दाल लेने को जाती तो चावल नही मिलता । चीटी का दोनों को लेने का प्रयत्न था । कबीर जी कहते है, ---- "दो ना मिले इक ले " --- चावल हो या दाल । हमारी स्थिति भी उसी चींटी -- जैसी है, हम भी संसार के विषय -- भोगों में फँसकर अतृप्त ही रहते हैं, एक चीज मिलती है तो चाहते हैं कि दुसरी भी मिल जाय, दुसरी मिलती तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाय । यह परम्परा बंद नहीं होती और हमारे जाने का समय आ जाता है । वस्तुत: प्रारब्ध से जो कुछ प्राप्त है,उसी में संतोष करना चाहिए, मन के अनुसार न किसी को कभी वस्तु मिली है और न मिलने वाली है, क्योंकि तृष्णा का कामना का कोई अंत नहीं है । अत:" इक ले दूजी ड़ाल " अर्थात जो मिल जाय उसे प्रभू -- प्रसाद मान कर ग्रहण करें और अधिक की लालसा कदापि न करें ॥ ••••••••••●◆❁✿❁◆●••••••••••• जय श्री राम जय हनुमान शुभ शनिवार 15-06-2019

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कुबेर एक हिन्दू पौराणिक पात्र हैं जो धन के स्वामी (धनेश) व धनवानता के देवता माने जाते हैं। वे यक्षों के राजा भी हैं। वे उत्तर दिशा के दिक्पाल हैं और लोकपाल (संसार के रक्षक) भी हैं। रामायण में कुबेर भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए कुबेर ने हिमालय पर्वत पर तप किया। तप के अंतराल में शिव तथा पार्वती दिखायी पड़े। कुबेर ने अत्यंत सात्त्विक भाव से पार्वती की ओर बायें नेत्र से देखा। पार्वती के दिव्य तेज से वह नेत्र भस्म होकर पीला पड़ गया। कुबेर वहां से उठकर दूसरे स्थान पर चला गया। वह घोर तप या तो शिव ने किया था या फिर कुबेर ने किया, अन्य कोई भी देवता उसे पूर्ण रूप से संपन्न नहीं कर पाया था। कुबेर से प्रसन्न होकर शिव ने कहा-'तुमने मुझे तपस्या से जीत लिया है। तुम्हारा एक नेत्र पार्वती के तेज से नष्ट हो गया, अत: तुम एकाक्षीपिंगल कहलाओंगे। देवी भद्रा कुबेर की पत्नी थी । कुबेर ने रावण के अनेक अत्याचारों के विषय में जाना तो अपने एक दूत को रावण के पास भेजा। दूत ने कुबेर का संदेश दिया कि रावण अधर्म के क्रूर कार्यों को छोड़ दे। रावण के नंदनवन उजाड़ने के कारण सब देवता उसके शत्रु बन गये हैं। रावण ने क्रुद्ध होकर उस दूत को अपनी खड्ग से काटकर राक्षसों को भक्षणार्थ दे दिया। कुबेर का यह सब जानकर बहुत बुरा लगा। रावण तथा राक्षसों का कुबेर तथा यक्षों से युद्ध हुआ। यक्ष बल से लड़ते थे और राक्षस माया से, अत: राक्षस विजयी हुए। रावण ने माया से अनेक रूप धारण किये तथा कुबेर के सिर पर प्रहार करके उसे घायल कर दिया और बलात उसका पुष्पक विमान ले लिया। विश्वश्रवा की दो पत्नियां थीं। पुत्रों में कुबेर सबसे बड़े थे। शेष रावण, कुंभकर्ण और विभीषण सौतेले भाई थे। उन्होंने अपनी मां से प्रेरणा पाकर कुबेर का पुष्पक विमान लेकर लंका पुरी तथा समस्त संपत्ति छीन ली। कुबेर अपने पितामह के पास गये। उनकी प्रेरणा से कुबेर ने शिवाराधना की। फलस्वरूप उन्हें 'धनपाल' की पदवी, पत्नी और पुत्र का लाभ हुआ। गौतमी के तट का वह स्थल धनदतीर्थ नाम से विख्यात है।

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गंगा दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं... ╲\╭┓ ╭ 🌹 ╯ 💘💚💘💙💘💚💘 ┗╯\╲ हिंदू कैलेंडर के मुताबिक हर साल ज्‍येष्‍ठ माह की शुक्‍ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है । इस दिन लोग पवित्र गंगा नदी में स्नान करते हैं और दान-पुण्य के काम करते हैं । सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद पूजा-पाठ और व्रत रखते हैं । गंगा दशहरा के मौके पर हजारों श्रद्धालु हरिद्वार , ऋषिकेश और वाराणसी में गंगा जी में डुबकी लगाते हैं । नदी किनारे हवन और तप करते हैं । स्‍नान का शुभ मुहूर्त 11 जून रात 8:19 से शुरू 12 जून शाम 6:27 तक ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः' का जाप करें । मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन जिस भी चीज़ का दान करें उस की संख्या 10 होनी चाहिए ,साथ ही हिंदु पुराणों के अनुसार गंगा दशहरा के दिन गंगा का जन्म हुआ था, इसलिए गंगा नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है । श्री गंगा स्तोत्रम् - देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे। शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले॥ हर हर गंगे जय मां गंगे 🌸🍁🙏🙏🍁🌸 12-06-2019

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संगत से गुण ऊपजे,संगत से गुण जाए । लोहा लगा जहाज में ,पानी में उतराय ।। •••••••••🌺🌴❁❁🌴🌺••••••••• एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी ! एक दिन कीड़े ने भंवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिये मेरे यहाँ भोजन पर आओ । अगले दिन सुबह भंवरा तैयार होकर अपने बच्चों के साथ गोबरी कीड़े के यहाँ भोजन के लिये पहुँचा । कीड़ा उन को देखकर बहुत खुश हुआ, और सब का आदर करके भोजन परोसा । भोजन में गोबर की गोलियाँ परोसी, और कीड़े ने कहा - खाओ भाई । भंवरा भोजन खाने पहुँचा । बाद में भंवरा सोच में पड़ गया- कि मैंने बुरे का संग किया इसलिये मुझे गोबर खाना पड़ा ! अब भंवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया कि तुम कल मेरे यहाँ आओ । अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहाँ पहुँचा । भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया । कीड़े ने पराग रस पिया । मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया ,और राम जी के चरणों में चढ़ा दिया । कीड़े को राम जी के दर्शन हुये । चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला । संध्या में पुजारी ने सारे फूल इक्कठा किये और गंगा जी में छोड़़ दिए । कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था । इतने में भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा-मित्र , क्या हाल है ? कीड़े ने कहा-भाई जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति हो गयी । ये सब अच्छी संगत का फल है । संगत से गुण ऊपजे,संगत से गुण जाए । लोहा लगा जहाज में ,पानी में उतराय ।। कोई भी नही जानता कि हम इस जीवन की यात्रा में एक दूसरे से क्यों मिलते हैं , सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते परन्तु ईश्वर हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता हैं , हमें उन रिश्तों को हमेशा संजोकर रखना चाहिए । यही अद्भुत रिश्ता आप से है... भगवान आप को सदैव खुश और सुखी रखे । जय श्री राम जी जय हनुमान जी ✨✨✨✨✨✨✨✨✨

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🌿🌸 अति महत्वपूर्ण बातें 🌸🌿 ⭕⭕☘️☘️⭕⭕☘️☘️️⭕⭕ 🌀घर में सेवा पूजा करने वाले जन भगवान के एक से अधिक स्वरूप की सेवा पूजा कर सकते हैं । 🌀घर में दो शिवलिंग की पूजा ना करें तथा पूजा स्थान पर तीन गणेश जी नहीं रखें। 🌀शालिग्राम जी की बटिया जितनी छोटी हो उतनी ज्यादा फलदायक है। 🌀कुशा पवित्री के अभाव में स्वर्ण की अंगूठी धारण करके भी देव कार्य सम्पन्न किया जा सकता है। 🌀मंगल कार्यो में कुमकुम का तिलक प्रशस्त माना जाता हैं। 🌀पूजा में टूटे हुए अक्षत के टूकड़े नहीं चढ़ाना चाहिए। 🌀पानी, दूध, दही, घी आदि में अंगुली नही डालना चाहिए। इन्हें लोटा, चम्मच आदि से लेना चाहिए क्योंकि नख स्पर्श से वस्तु अपवित्र हो जाती है अतः यह वस्तुएँ देव पूजा के योग्य नहीं रहती हैं। 🌀तांबे के बरतन में दूध, दही या पंचामृत आदि नहीं डालना चाहिए क्योंकि वह मदिरा समान हो जाते हैं। 🌀आचमन तीन बार करने का विधान हैं। इससे त्रिदेव ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रसन्न होते हैं। 🌀दाहिने कान का स्पर्श करने पर भी आचमन के तुल्य माना जाता है। 🌀कुशा के अग्रभाग से दवताओं पर जल नहीं छिड़के। 🌀देवताओं को अंगूठे से नहीं मले। 🌀चकले पर से चंदन कभी नहीं लगावें। उसे छोटी कटोरी या बांयी हथेली पर रखकर लगावें। 🌀पुष्पों को बाल्टी, लोटा, जल में डालकर फिर निकालकर नहीं चढ़ाना चाहिए। 🌀श्री भगवान के चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार या तीन बार आरती उतारकर समस्त अंगों की सात बार आरती उतारें। 🌀श्री भगवान की आरती समयानुसार जो घंटा, नगारा, झांझर, थाली, घड़ावल, शंख इत्यादि बजते हैं उनकी ध्वनि से आसपास के वायुमण्डल के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। नाद ब्रह्मा होता हैं। नाद के समय एक स्वर से जो प्रतिध्वनि होती हैं उसमे असीम शक्ति होती हैं। 🌀लोहे के पात्र से श्री भगवान को नैवेद्य अपर्ण नहीं करें। 🌀हवन में अग्नि प्रज्वलित होने पर ही आहुति दें। 🌀समिधा अंगुठे से अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए तथा दस अंगुल लम्बी होनी चाहिए। 🌀छाल रहित या कीड़े लगी हुई समिधा यज्ञ-कार्य में वर्जित हैं। 🌀पंखे आदि से कभी हवन की अग्नि प्रज्वलित नहीं करें। 🌀मेरूहीन माला या मेरू का लंघन करके माला नहीं जपनी चाहिए। 🌀माला, रूद्राक्ष, तुलसी एवं चंदन की उत्तम मानी गई हैं। 🌀माला को अनामिका (तीसरी अंगुली) पर रखकर मध्यमा (दूसरी अंगुली) से चलाना चाहिए। 🌀जप करते समय सिर पर हाथ या वस्त्र नहीं रखें। 🌀तिलक कराते समय सिर पर हाथ या वस्त्र रखना चाहिए। 🌀माला का पूजन करके ही जप करना चाहिए। 🌀ब्राह्मण को या द्विजाती को स्नान करके तिलक अवश्य लगाना चाहिए। 🌀जप करते हुए जल में स्थित व्यक्ति, दौड़ते हुए, शमशान से लौटते हुए व्यक्ति को नमस्कार करना वर्जित हैं। 🌀बिना नमस्कार किए आशीर्वाद देना वर्जित हैं। 🌀एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए। 🌀सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। 🌀बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। 🌀जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। 🌀जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। 🌀जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। 🌀संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। 🌀दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए। 🌀यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। 🌀शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, किन्तु रविवार को परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। 🌀कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। 🌀भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। 🌀देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। 🌀किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। 🌀एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । 🌀बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। 🌀यदि शिखा नहीं हो तो स्थान को स्पर्श कर लेना चाहिए। 🌀शिवजी की जलहारी उत्तराभिमुख रखें । 🌀शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। 🌀शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुमकुम नहीं चढ़ती। 🌀शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। 🌀अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। 🌀नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। 🌀विष्णु भगवान को चांवल, गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। 🌀पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। 🌀किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। 🌀पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। 🌀सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे। 🌀गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। 🌀पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है। 🌀दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। 🌀सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। 🌀घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें। जय श्री राधे कृष्णा 🌸🍁🙏🙏🍁🌸 💫🌴ⓀⓊⓃⒿⒶ ⒿⒾ🌴💫 10-06-2019

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आज आप सभी श्रृद्धालुओं को बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि मैंने आज दिनांक 09-06-2019 को माय मंदिर में दो वर्ष पूर्ण कर लिए हैं । मैंने अपनी शुरुआत माँ कुँजापुरी जी के दर्शन के साथ शुरू की थी । मैं बहुत भाग्यशाली हूँ , इन दो वर्षों में मुझे माय मंदिर के द्वारा आप सभी से जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ , आपके द्वारा मुझे जो स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त हुआ उसका मैं हमेशा आभारी रहूंगा । माय मंदिर हम सबका है इसे स्वच्छ बनाये रखना हम सब का कर्त्तव्य है । माय मंदिर में हमेशा इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हम किसी भी प्रकार की अधार्मिक पोस्ट ना करें और ना ही किसी के प्रति द्वेश भाव रखते हुए अमर्यादित टिप्पणी करें । उक्त बातें करके हम मंदिर और देव संबंधी अपराध करते हैं। इसके दुष्परिणाम भी हमको ही झेलने होंगे। ऐसी परिस्थिति में हमारी पूजा, प्रार्थना आदि करने का कोई महत्व नहीं रह जाता है । जब हम मंदिर जाते हैं तो हम यह सिद्ध करते हैं ,कि हम देव शक्तियों में विश्‍वास रखते हैं तभी देव शक्तियां भी हम में विश्वास रखती हैं । यदि हम नहीं जाते हैं तो हम कैसे व्यक्त करेंगे की हम परमेश्वर या देवताओं की तरफ है ? यदि हम देवताओं की ओर देखेंगे तो देवता भी हमारी ओर देखेंगे। यदि नहीं तो नहीं । हमें अच्छे मनोभाव से मंदिर जाना चाहिए । ऐसा करने से सभी तरह की समस्याएं प्रतिदिन मंदिर जाने से समाप्त हो जाती है। मंदिर जाते रहने से मन में दृढ़ विश्वास और उम्मीद की ऊर्जा का संचार होता है। विश्‍वास की शक्ति से ही धन, समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है । ईश्वर के प्रति आस्था का स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है,अधूरे मन से अपने धर्म के प्रति आस्था हमारे कल्याण में बाधा बनती है । जब हम सहज, स्वाभाविक होते हैं ,तब पूजा का अनुभव होता है । हमारे मन में उठने वाले बेलगाम विचार दुःख को आमंत्रित करते हैं, जबकि, प्रत्येक संतुलित विचार हमें सुखद अहसास की अनुभूति कराते हैं । जिदंगी मे दो शब्द बहुत खास हैं प्रेम और ध्यान । क्योंकि अस्तित्व ही मंदिर के दो विराट दरवाजे हैं । एक का नाम प्रेम,एक का नाम ध्यान । चाहो तो प्रेम से प्रवेश कर जाओ,चाहो तो ध्यान से प्रवेश कर जाओ । शर्त एक ही है ,अहंकार दोनों में छोड़ना होता है । *मैं सबका सब मेरे* का भाव रखते हुऐ आपके अच्छे स्वास्थ्य और परिजनों की सुख समृद्धि की कामना करता हूँ । आपका स्नेही... गोपाल सजवान"कुँजा जी" 🚩जय माँ कुँजापुरी🚩 देवभूमि उत्तराखंड 🌸🍁🙏🙏🍁🌸 https://mymandir.page.link/YZiN5

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