+224 प्रतिक्रिया 37 कॉमेंट्स • 71 शेयर

🌸'हिसाब चार आने का'🍁 •••●‼💖..प्रात:वंदन..💖‼●••• बहुत समय पहले की बात है, चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था, दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं होती थी, उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी, पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, बहुत से विद्वानो से मिला, किसी ने कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने यज्ञ कराए, पर फिर भी राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं मिली। एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते-घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा, तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी, किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था। किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन मे कुछ खुशियां आ पाये। राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला.. मैं एक राहगीर हूँ, मुझे तुम्हारे खेत में ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं, चूँकि यह खेत तुम्हारा है, इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो। किसान.. ना-ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं, इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें, मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं। किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी, वह बोला, धन की आवश्यकता किसे नहीं होती, भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं? किसान बोला..सेठ जी, मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ, और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ। क्या आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं, और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं..? यह कैसे संभव है? राजा ने अचरज से पूछा। सेठ जी, किसान बोला, प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है, प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है। तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो..? राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया। किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था, उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया, इन चार आनों में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ, दूसरे से कर्ज चुका देता हूँ, तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा मिट्टी में गाड़ देता हूँ। राजा सोचने लगा, उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था, पर वो जा चुका था। राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा। दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया, अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया। बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया। राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया। मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ, और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ; बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो, जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो ? राजा ने प्रश्न किया। किसान बोला, हुजूर, जैसा की मैंने बताया था, मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ, यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ, दूसरे से मैं कर्ज चुकाता हूँ, यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ, तीसरा मैं उधार दे देता हूँ, यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिटटी में गाड़ देता हूँ, यानि मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक, सामजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ। राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का समाधान हो चुका था, वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा। 🌷༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅༅🌷 मित्रों, देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है, पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है? पैसों के मामलों में हम कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं, जिन्दगी को संतुलित बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रूपये कमा लें पर फिर भी प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे!

+312 प्रतिक्रिया 63 कॉमेंट्स • 103 शेयर

--श्री हनुमान जी का अद्भुत पराक्रम-- 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 💚💚💚💚💚💚💚💚💚 -जब रावण ने देखा कि हमारी पराजय निश्चित है तो उसने १००० अमर राक्षसों को बुलाकर रणभूमि में भेजने का आदेश दिया | ये ऐसे थे जिनको काल भी नहीं खा सका था | विभीषण के गुप्तचरों से समाचार मिलने पर श्रीराम को चिंता हुई कि हम लोग इनसे कब तक लड़ेंगे ? सीता का उद्धार और विभीषण का राज तिलक कैसे होगा?क्योंकि युद्ध की समाप्ति असंभव है ।श्रीराम की इस स्थिति से वानरवाहिनी के साथ कपिराज सुग्रीव भी विचलित हो गए कि अब क्या होगा ? हम अनंत कल तक युद्ध तो कर सकते हैं पर विजयश्री का वरण नहीं | पूर्वोक्त दोनों कार्य असंभव हैं |अंजनानंदन हनुमान जी आकर वानरवाहिनी के साथ श्रीराम को चिंतित देखकर बोले –प्रभो ! क्या बात है ? श्रीराम के संकेत सेविभीषण जी ने सारी बात बतलाई | अब विजय असंभव है | पवन पुत्र ने कहा –असम्भव को संभव और संभव को असम्भव कर देने का नाम ही तो हनुमान है | प्रभो ! आप केवल मुझे आज्ञा दीजिए मैं अकेले ही जाकर रावण की अमर सेना को नष्ट कर दूँगा | कैसे ?? हनुमान ! वे तो अमर हैं |प्रभो ! इसकी चिंता आप न करें सेवक पर विश्वास करें | उधर रावण ने चलते समय राक्षसों से कहा था कि वहां हनुमान नाम का एक वानर है उससे जरा सावधान रहना | एकाकी हनुमान जी को रणभूमि में देखकर राक्षसों ने पूछा तुम कौन हो ? क्या हम लोगों को देखकर भय नहीं लगता ? जो अकेले रणभूमि में चले आये | मारुति –क्यों आते समय राक्षसराज रावण ने तुम लोगों को कुछ संकेत नहीं किया था जो मेरे समक्ष निर्भय खड़े हो | निशाचरोंको समझते देर न लगी कि ये महाबली हनुमान हैं | तो भी क्या ? हम अमर हैं हमारा ये क्या बिगाड़ लेंगे | भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ पवनपुत्र की मार से राक्षस रणभूमि में ढेर होने लगे, चौथाई सेना बची थी कि पीछे से आवाज आई हनुमान हम लोग अमर हैं, हमें जीतना असंभव है | अतः अपने स्वामी के साथ लंका से लौट जावो इसी में तुम सबका कल्याण है | आंजनेय ने कहा लौटूंगा अवश्य पर तुम्हारे कहने से नहीं अपितु अपनी इच्छा से | हाँ तुम सब मिलकर आक्रमण करो फिर मेरा बल देखो और रावण को जाकर बताना |राक्षसों ने जैसे ही एक साथ मिलकर हनुमान जी पर आक्रमण करना चाहा वैसे ही पवनपुत्र ने उन सबको अपनी पूंछ में लपेटकर ऊपर आकाश में फेंक दिया ! वे सब पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति जहाँ तक है वहां से भी ऊपर चले गए ! चले ही जा रहे हैं ---“चले मग जात सूखि गए गात”—गोस्वामी तुलसीदास | उनका शरीर सूख गया अमर होने के कारण मर तो सकते नहीं | अतः रावण कोगाली देते हुए और कष्ट के कारण अपनी अमरता को कोसते हुए अभी भी जा रहे हैं | इधर हनुमान जी ने आकर प्रभु के चरणों में शीश झुकाया | श्रीराम बोले –क्या हुआ हनुमान ? प्रभो ! उन्हें ऊपर भेजकर आ रहा हूँ | राघव –पर वे अमर थे हनुमान ! हाँ स्वामी इसलिए उन्हें जीवित ही ऊपर भेज आया हूँ अब वे कभी भी नीचे नहीं आ सकते | रावण को अब आप शीघ्रातिशीघ्र ऊपर भेजने की कृपा करें जिससे माता जानकी का आपसे मिलन और महाराज विभीषण का राजसिंहासन पर अभिषेक हो सके | पवनपुत्र को प्रभु ने उठाकर गले लगा लिया | वे धन्य हो गए अविरल भक्ति का वर पाकर | श्रीराम उनके ऋणी बन गए और बोले –हनुमान जी ! आपने जो उपकार किया है वह मेरे अंग अंग में ही जीर्ण शीर्ण हो जाय | मैं उसका बदला न चुका सकूँ ,क्योंकि उपकार का बदला विपत्तिकाल में ही चुकाया जाता है | पुत्र ! तुम पर कभी कोई विपत्ति आये—यह मैं नही चाहता | निहाल हो गए आंजनेय !हनुमान जी की वीरता के सामान साक्षात् काल देवराज इन्द्र महाराज कुबेर तथा भगवान विष्णु की भी वीरता नहीं सुनी गयी । ऐसा उद्घोष श्रीराम का है-- “न कालस्य न शक्रस्य न विष्णोर्वित्तपस्य च |कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः ||” ---«वाल्मीकि रामायण,उत्तरकांड»--- 🌸🍁जय श्री राम जय हनुमान🍁🌸 🙏🅺🆄🅽🅹🅰 🅹🅸🙏

+250 प्रतिक्रिया 41 कॉमेंट्स • 107 शेयर