*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *इस संसार में सुखी कौन रह सकता है ?* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *जो इन्द्रियों के वेगों को सहन करने तथा इच्छा एवं क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ है* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 23_* *शक्नोतीहैव य: सोढुं* *प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।* *कामक्रोधोद्भवं वेगं* *स युक्त: स सुखी नर: ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* शक्नोति - समर्थ है; इह एव - इसी शरीर में; य: - जो; सोढुम् - सहन करने के लिए; प्राक् - पूर्व; शरीर - शरीर; विमोक्षणात् - त्याग करने से; काम - इच्छा; क्रोध - तथा क्रोध से; उद्भवम् - उत्पन्न; वेगम् - वेग को; स: - वह; युक्त: - समाधि में; स: - वही; सुखी - सुखी; नर: - मनुष्य। *👉🏻 _अनुवाद_* *यदि इस शरीर को त्यागने के पूर्व कोई मनुष्य इन्द्रियों के वेगों को सहन करने तथा इच्छा एवं क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ होता है, तो वह इस संसार में सुखी रह सकता है।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 👌🏻 यदि कोई *आत्म-साक्षात्कार के पथ पर* अग्रसर होना चाहता है तो उसे भौतिक इन्द्रियों के वेग को रोकने का प्रयत्न करना चाहिए। ये वेग हैं - वाणीवेग, क्रोधवेग, मनोवेग, उदरवेग(पेट का वेग), उपस्थवेग(जननेन्द्रिय का वेग) तथा जिह्वावेग(जीभ का वेग)। *जो व्यक्ति इन विभिन्न इन्द्रियों के वेगों को तथा मन को वश में करने में समर्थ है वह गोस्वामी या स्वामी कहलाता है।* ऐसे गोस्वामी नितान्त संयत जीवन बिताते हैं और इन्द्रियों के वेगों का तिरस्कार करते हैं। *भौतिक इच्छाएँ पूर्ण न होने पर क्रोध उत्पन्न* होता है और इस प्रकार मन, नेत्र तथा वक्षस्थल(छाती) उत्तेजित होते हैं। अतः इस शरीर का परित्याग करने के पूर्व मनुष्य को इन्हें वश में करने का अभ्यास करना चाहिए। जो ऐसा कर सकता है वह स्वरूपसिद्ध माना जाता है और आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में वह सुखी रहता है। *योगी का कर्तव्य है कि वह इच्छा तथा क्रोध को वश में करने का भरसक प्रयत्न करे।* 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 23 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *मुक्तात्मा भौतिक (इन्द्रिय) सुख से आनन्दित क्यों नहीं होता है?* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *क्योंकि यह नाशवान और दुःख का कारण है* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 22_* *ये हि संस्पर्शजा भोगा* *दु:खयोनय एव ते ।* *आद्यन्तवन्त: कौन्तेय* *न तेषु रमते बुध: ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* ये - जो; हि - निश्चय ही; संस्पर्श-जा: - भौतिक इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न; भोगा: - भोग; दु:ख - दुःख; योनय: - स्रोत, कारण; एव - निश्चय ही; ते - वे; आदि - प्रारम्भ; अन्तवन्त: - अन्तवाले; कौन्तेय - हे कुन्तीपुत्र; न - कभी नहीं; तेषु - उनमें; रमते - आनन्द लेता है; बुध: - बुद्धिमान् मनुष्य। *👉🏻 _अनुवाद_* *बुद्धिमान् मनुष्य दुःख के कारणों में भाग नहीं लेता जो कि भौतिक इन्द्रियों के संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। हे कुन्तीपुत्र! ऐसे भोगों का आदि(आरम्भ) तथा अन्त होता है, अतः चतुर व्यक्ति उनमें आनन्द नहीं लेता।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 👉🏻 भौतिक इन्द्रियसुख उन इन्द्रियों के स्पर्श से उत्पन्न होता हैं जो नाशवान हैं क्योंकि शरीर स्वयं नाशवान है। मुक्तात्मा किसी नाशवान वस्तु में रुचि नहीं रखता। दिव्य आनन्द के सुखों से भलीभाँति अवगत वह भला मिथ्या सुख के लिए क्यों सहमत होगा?🤔 📖 पद्मपुराण में कहा गया है - रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि। इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥ *“योगीजन परम सत्य में रमण करते हुए अनन्त दिव्यसुख प्राप्त करते हैं इसीलिए परम सत्य को भी राम कहा जाता है।”* 📖 भागवत पुराण में (5.5.1) भी कहा गया है - नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये। तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद् यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् ॥ *“हे पुत्रो! इस मनुष्ययोनि में इन्द्रियसुख के लिए अधिक श्रम करना व्यर्थ है। ऐसा सुख तो सूकरों (सूअरों) को भी प्राप्य है। इसकी अपेक्षा तुम्हें इस जीवन में तप करना चाहिए, जिससे तुम्हारा जीवन पवित्र हो जाय और तुम असीम दिव्यसुख प्राप्त कर सको।”* अतः जो यथार्थ योगी या दिव्य ज्ञानी हैं वे इन्द्रियसुखों की ओर आकृष्ट नहीं होते क्योंकि ये *निरन्तर भवरोग के कारण* हैं। जो भौतिकसुख के प्रति जितना ही आसक्त होता है, उसे उतने ही अधिक भौतिक दुःख मिलते हैं। 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 22 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के लक्षणों का वर्णन...* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *इन्द्रिय सुख से अनासक्त, असीम दिव्य आनन्द में लीन* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 21_* *बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा* *विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।* *स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा* *सुखमक्षयमश्नुते ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* बाह्य-स्पर्शेषु - बाह्य इन्द्रिय सुख में; असक्त-आत्मा - अनासक्त व्यक्ति; विन्दति - भोग करता है; आत्मनि - आत्मा में; यत् - जो; सुखम् - सुख; स: - वह; ब्रह्म-योग - ब्रह्म में एकाग्रता द्वारा; युक्त-आत्मा - आत्म युक्त या समाहित; सुखम् - सुख; अक्षयम् - असीम; अश्नुते - भोगता है। *👉🏻 _अनुवाद_* *ऐसा मुक्त व्यक्ति भौतिक इन्द्रियसुख की ओर आकृष्ट नहीं होता, अपितु सदैव समाधि में रहकर अपने अन्तर(हृदय) में आनन्द का अनुभव करता है। इस प्रकार स्वरूपसिद्ध व्यक्ति परब्रह्म में एकाग्रचित्त होने के कारण असीम सुख भोगता है।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 👌🏻 कृष्णभावनामृत के महान् भक्त श्री यामुनाचार्य ने कहा है - यदवधि मम चेत: कृष्णपादारविन्दे नवनवरसधामन्युद्यतं रन्तुमासीत् तदवधि बत नारीसंगमे स्मर्यमाने भवति मुखविकार: सुष्ठु निष्ठीवनं च ॥ *“जब से मैं कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगकर उनमें नित्य नवीन आनन्द का अनुभव करने लगा हूँ तब से जब भी काम-सुख के बारे में सोचता हूँ तो इस विचार पर ही थूकता हूँ और मेरे होंठ अरुचि से सिमट जाते हैं।”* 👌🏻 ब्रह्मयोगी अथवा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् की प्रेमाभक्ति में इतना अधिक लीन रहता है कि *इन्द्रियसुख में उसकी तनिक भी रुचि नहीं* रह जाती। *भौतिकता की दृष्टि में कामसुख ही सर्वोपरि आनन्द* है। सारा संसार उसी के वशीभूत है और भौतिकतावादी लोग तो इस प्रोत्साहन के बिना कोई कार्य ही नहीं कर सकते। किन्तु *कृष्णभावनामृत में लीन व्यक्ति कामसुख के बिना ही उत्साहपूर्वक अपना कार्य* करता रहता है। यही *आत्म-साक्षात्कार की कसौटी* है। *आत्म-साक्षात्कार तथा कामसुख कभी साथ-साथ नहीं चलते*। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जीवन्मुक्त होने के कारण किसी प्रकार के इन्द्रियसुख द्वारा आकर्षित नहीं होता। 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 21 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के लक्षणों का वर्णन...* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *स्थिरबुद्धि, मोहरहित और भगवद्-विद्या को जानने वाला* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 20_* *न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य* *नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।* *स्थिरबुद्धिरसम्मूढो* *ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थित: ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* न - कभी नहीं; प्रहृष्येत् - हर्षित होता है; प्रियम् - प्रिय को; प्राप्य - प्राप्त करके; न - नहीं; उद्विजेत् - विचलित होता है; प्राप्य - प्राप्त करके; च - भी; अप्रियम् - अप्रिय को; स्थिर-बुद्धि: - आत्मबुद्धि, कृष्णचेतना; असम्मूढ: - मोहरहित, संशयरहित; ब्रह्म-वित् - परब्रह्म को जानने वाला; ब्रह्मणि - ब्रह्म में; स्थित: - स्थित। *👉🏻 _अनुवाद_* *जो न तो प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित होता है और न अप्रिय को पाकर विचलित होता है, जो स्थिरबुद्धि है, जो मोहरहित है और भगवद्-विद्या को जानने वाला है वह पहले से ही ब्रह्म में स्थित रहता है।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 👉🏻 यहाँ पर *स्वरूपसिद्ध व्यक्ति के लक्षण* दिये गए हैं। *पहला लक्षण* यह है कि उसमें शरीर और आत्मतत्त्व के तादात्म्य(एक होने का) का भ्रम नहीं रहता। वह यह भलीभाँति जानता है कि *मैं यह शरीर नहीं हूँ, अपितु श्रीभगवान् का एक अंश* हूँ। अतः कुछ प्राप्त होने पर न तो उसे प्रसन्नता होती है और न शरीर की कुछ हानि होने पर शोक होता है। *मन की यह स्थिरता स्थिरबुद्धि या आत्मबुद्धि* कहलाती है। 👉🏻 अतः वह न तो स्थूल शरीर को आत्मा मानने की भूल करके मोहग्रस्त होता है और न शरीर को स्थायी मानकर आत्मा के अस्तित्व को ठुकराता है। इस ज्ञान के कारण वह परम सत्य अर्थात् ब्रह्म, परमात्मा तथा श्रीभगवान् के ज्ञान को भलीभाँति जान लेता है। इस प्रकार वह अपने स्वरूप को जानता है और परब्रह्म से हर बात में तदाकार होने का कभी यत्न नहीं करता। इसे *ब्रह्म-साक्षात्कार या आत्म-साक्षात्कार* कहते हैं। ऐसी स्थिरबुद्धि कृष्णभावनामृत कहलाती है। 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 20 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *मानसिक समता किसका लक्षण है ?* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *आत्म-साक्षात्कार का* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 19_* *इहैव तैर्जित: सर्गो* *येषां साम्ये स्थितं मन: ।* *निर्दोषं हि समं ब्रह्म* *तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता: ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* इह - इस जीवन में; एव - निश्चय ही; तै: - उनके द्वारा; जित: - जीता हुआ; सर्ग: - जन्म तथा मृत्यु; येषाम् - जिनका; साम्ये - समता में; स्थितम् - स्थित; मन: - मन; निर्दोषम् - दोषरहित; हि - निश्चय ही; समम् - समान; ब्रह्म - ब्रह्म की तरह; तस्मात् - अतः; ब्रह्मणि - परमेश्वर में; ते - वे; स्थिता: - स्थित हैं। *👉🏻 _अनुवाद_* *जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बन्धनों को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 📖 जैसा कि ऊपर कहा गया है *मानसिक समता आत्म-साक्षात्कार का लक्षण* है। जिन्होंने ऐसी अवस्था प्राप्त कर ली है, उन्हें भौतिक बन्धनों पर, विशेषतया *जन्म तथा मृत्यु पर, विजय* प्राप्त किए हुए मानना चाहिए। 👉🏻 जब तक मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानता है, वह *बद्धजीव* माना जाता है, किन्तु ज्योंही वह आत्म-साक्षात्कार द्वारा समचित्तता की अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह *बद्धजीवन से मुक्त* हो जाता है। दूसरे शब्दों में, उसे इस भौतिक जगत् में जन्म नहीं लेना पड़ता, अपितु अपनी मृत्यु के बाद वह आध्यात्मिक लोक को जाता है। 👌🏻 *श्रीभगवान् निर्दोष हैं क्योंकि वे आसक्ति अथवा घृणा से रहित* हैं। इसी प्रकार जब जीव आसक्ति अथवा घृणा से रहित होता है तो वह भी निर्दोष बन जाता है और वैकुण्ठ जाने का अधिकारी हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को पहले से ही मुक्त मानना चाहिए। उनके लक्षण आगे बतलाये गए हैं। 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 19 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापी in हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *मानसिक समता किसका लक्षण है ?* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *आत्म-साक्षात्कार का* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 19_* *इहैव तैर्जित: सर्गो* *येषां साम्ये स्थितं मन: ।* *निर्दोषं हि समं ब्रह्म* *तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता: ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* इह - इस जीवन में; एव - निश्चय ही; तै: - उनके द्वारा; जित: - जीता हुआ; सर्ग: - जन्म तथा मृत्यु; येषाम् - जिनका; साम्ये - समता में; स्थितम् - स्थित; मन: - मन; निर्दोषम् - दोषरहित; हि - निश्चय ही; समम् - समान; ब्रह्म - ब्रह्म की तरह; तस्मात् - अतः; ब्रह्मणि - परमेश्वर में; ते - वे; स्थिता: - स्थित हैं। *👉🏻 _अनुवाद_* *जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बन्धनों को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 📖 जैसा कि ऊपर कहा गया है *मानसिक समता आत्म-साक्षात्कार का लक्षण* है। जिन्होंने ऐसी अवस्था प्राप्त कर ली है, उन्हें भौतिक बन्धनों पर, विशेषतया *जन्म तथा मृत्यु पर, विजय* प्राप्त किए हुए मानना चाहिए। 👉🏻 जब तक मनुष्य शरीर को आत्मस्वरूप मानता है, वह *बद्धजीव* माना जाता है, किन्तु ज्योंही वह आत्म-साक्षात्कार द्वारा समचित्तता की अवस्था को प्राप्त कर लेता है, वह *बद्धजीवन से मुक्त* हो जाता है। दूसरे शब्दों में, उसे इस भौतिक जगत् में जन्म नहीं लेना पड़ता, अपितु अपनी मृत्यु के बाद वह आध्यात्मिक लोक को जाता है। 👌🏻 *श्रीभगवान् निर्दोष हैं क्योंकि वे आसक्ति अथवा घृणा से रहित* हैं। इसी प्रकार जब जीव आसक्ति अथवा घृणा से रहित होता है तो वह भी निर्दोष बन जाता है और वैकुण्ठ जाने का अधिकारी हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों को पहले से ही मुक्त मानना चाहिए। उनके लक्षण आगे बतलाये गए हैं। 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 19 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापी in हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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*सु-प्रभात ☀️ जय श्री कृष्ण* 🚩 🙏 *📖 नित्य गीता-स्वाध्याय* _1⃣ प्रतिदिन एक श्लोक_ 🤔 _हमारा प्रश्न_ *विनम्र साधुपुरुष(पण्डित) सभी जीवों को किस दृष्टि से देखते हैं?* 👉 _श्रीभगवान् का भगवद्-गीता में उत्तर_ *समान दृष्टि से* 🙏 _अधिक जानने के लिए आज का श्लोक पढ़ें_ 📖 _अध्याय पाँच - कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म_ *👉🏻 _श्लोक संख्या - 18_* *विद्याविनयसम्पन्ने* *ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।* *शुनि चैव श्वपाके च* *पण्डिता: समदर्शिन: ॥* *👉🏻 _शब्दार्थ_* विद्या - शिक्षण; विनय - तथा विनम्रता से; सम्पन्ने - युक्त; ब्राह्मणे - ब्राह्मण में; गवि - गाय में; हस्तिनि - हाथी में; शुनि - कुत्ते में; च - तथा; एव - निश्चय ही; श्वपाके - कुत्ताभक्षी (चाण्डाल) में; च - क्रमश:; पण्डिता: - ज्ञानी; सम-दर्शिन: - समान दृष्टि से देखने वाले। *👉🏻 _अनुवाद_* *विनम्र साधुपुरुष(पण्डित) अपने वास्तविक ज्ञान के कारण एक विद्वान् तथा विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल को समान दृष्टि (समभाव) से देखते हैं।* *👉🏻 _तात्पर्य_* 👉🏻 *कृष्णभावनाभावित व्यक्ति योनि या जाति में भेद नहीं मानता।* सामाजिक दृष्टि से ब्राह्मण तथा चाण्डाल भिन्न-भिन्न हो सकते हैं अथवा योनि के अनुसार कुत्ता, गाय तथा हाथी भिन्न हो सकते हैं, किन्तु विद्वान् योगी की दृष्टि में ये शरीरगत भेद अर्थहीन होते हैं। 👌🏻 इसका कारण परमेश्वर से उनका सम्बन्ध है और *परमेश्वर परमात्मा रूप में हर एक के हृदय में स्थित* हैं। परम सत्य का ऐसा ज्ञान वास्तविक (यथार्थ) ज्ञान है। 👉🏻 जहाँ तक विभिन्न जातियों या विभिन्न योनियों में शरीर का सम्बन्ध है, *श्रीभगवान् सब पर समान रूप से दयालु* हैं क्योंकि वे प्रत्येक जीव को अपना मित्र मानते हैं फिर भी जीवों की समस्त परिस्थितियों में वे अपना परमात्मा स्वरूप बनाये रखते हैं। परमात्मा रूप में श्रीभगवान् चाण्डाल तथा ब्राह्मण दोनों में उपस्थित रहते हैं, यद्यपि इन दोनों के शरीर एक से नहीं होते। शरीर तो प्रकृति के गुणों के द्वारा उत्पन्न हुए हैं, किन्तु शरीर के भीतर *आत्मा तथा परमात्मा समान आध्यात्मिक गुण वाले* हैं। परन्तु आत्मा तथा परमात्मा की यह समानता उन्हें *मात्रात्मक दृष्टि से समान नहीं* बनाती क्योंकि व्यष्टि *आत्मा (जीवात्मा) किसी विशेष शरीर में उपस्थित होता है, किन्तु परमात्मा प्रत्येक शरीर में है।* कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को इसका पूर्णज्ञान होता है इसीलिए वह सचमुच ही विद्वान् तथा समदर्शी होता है। *आत्मा तथा परमात्मा* के लक्षण समान हैं क्योंकि *दोनों चेतन, शाश्वत तथा आनन्दमय* हैं। किन्तु अन्तर इतना ही है कि आत्मा शरीर की सीमा के भीतर सचेतन रहता है जबकि परमात्मा सभी शरीरों में सचेतन है। परमात्मा बिना किसी भेदभाव के सभी शरीरों में विद्यमान है। 😌📖📖📖📖📖📖📖🙂 _इस प्रकार भगवद्-गीता यथारूप के पाँचवें अध्याय “कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म ” के श्लोक संख्या 18 का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।_ ***************************** 📖 स्रोत "भगवद्-गीता यथारूप" सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण ✒ लेखक कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक *🙏🏻 प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्* "एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान *📱766 544 7565*

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