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रक्षा बंधन 2019 के शुभ मुहूर्त यहां मिलेंगे आपको, शोभन, सिद्धि और सौभाग्य योग में मनेगा पर्व रक्षा बंधन का अत्यंत शुभ और सुंदर पर्व इस वर्ष 15 अगस्त को है। इस दिन सबसे ज्यादा शुभ मुहूर्त तलाशे जाते हैं। भाई और बहन दोनों एक दूसरे की सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं इसलिए सबसे अच्छे मुहूर्त में राखी बांधने की शुभेच्छा रहती है। आइए हम आपको बताते हैं इस साल कौन से बेहतरीन संयोग बन रहे हैं और किस समय राखी बांधना होगा सबसे श्रेष्ठ.... 1. इस बार सौभाग्य और सिद्धि योग में भाई की कलाई पर 15 अगस्त को बहनें रेशम की डोर बांधेंगी। 19 साल बाद यह ऐसा अवसर होगा जब स्वतंत्रता दिवस और राखी का त्योहार साथ मनाया जाएगा। 2. इस वर्ष रक्षाबंधन के एक दिन पहले भद्रा का दोष मिटने और 4 दिन पहले देव गुरु बृहस्पति के मार्गी होने से पर्व की शुभता बढ़ गई है। पर्व पर भद्रा का साया नहीं पड़ने से दिनभर राखी बांधी जा सकेगी।  3. पूर्णिमा तिथि 14 अगस्त बुधवार को दोपहर 3 बजकर 46 मिनट से शुरू होगी जो अगले दिन से 15 अगस्त गुरुवार को शाम 5 बजकर 58 मिनट तक रहेगी। 4. इस वर्ष भद्रा रक्षाबंधन के एक दिन पहले 14 अगस्त बुधवार की दोपहर 3 बजकर 45 मिनट से तड़के 4 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। शुभ श्रवण नक्षत्र भी 14 अगस्त की सुबह 5 बजकर 19 मिनट से दूसरे दिन 15 अगस्त की सुबह 8 बजकर 1 मिनट तक रहेगा। 14 अगस्त को ही सुबह 11 बजकर 14 मिनट पर सौभाग्य योग लगेगा जो दूसरे दिन 15 अगस्त को सुबह 11 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। इसके बाद शोभन योग लगेगा। 5. इस वर्ष 19 वर्ष बाद स्वतंत्रता दिवस और राखी एक ही दिन मनाए जाएंगे। रक्षाबंधन का पर्व गुरुवार को मनाया जाएगा। यह दिन देव गुरु बृहस्पति का दिन माना जाता है। मान्यता है कि देवगुरु बृहस्पति ने देवराज इंद्र की विजय प्राप्ति के लिए इंद्र की पत्नी को रक्षा सूत्र बांधने को कहा था। इसके बाद से पर्व की शुरुआत हुई थी।  चौघड़िया के अनुसार रक्षासूत्र बांधने के सबसे सही शुभ मुहूर्त शुभ : सुबह 06.04 से 07.40 और शाम 5.17 से 06.53 बजे तक। चर : सुबह 10.52 बजे से दोपहर 12.28 और रात 08.18 से 09.41 बजे तक। लाभ : दोपहर 12.29 से 02.04 बजे तक। अमृत : शाम 06.54 से रात 08.17 बजे तक। श्रवण कुमार पूजन का श्रेष्ठ मुहूर्त - दोपहर : 12. 04 बजे से 12.28 बजे तक (अभिजीत+चर) आप व आपके पूरे परिवार को आने वाले त्योहार रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं

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कभी ना लगाएं तुलसी को घर के इस कोने में | वास्तु और ज्योतिष हमारी भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के अनुसार जिस घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगा होता है, वहां पर कभी नकरात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करती. ऐसी मान्यता है तुलसी के पौधे में साक्षात मां लक्ष्मी का वास होता है. इसके घर में होने से कंगाली दूर होती है। अगर होती भी है तो यह उसे नष्ट कर घर में धन की वृद्धि करती है. लेकिन क्या आप जानते हैं घर का एक ऐसा कोना है जहां पर कभी तुलसी नहीं लगानी चाहिए, आइए जाने इसके बारे में… पूर्व या उत्तर दिशा : तुलसी के गमले में दूसरा कोई पौधा न लगाएं। तुलसी हमेशा घर के पूर्व या उत्तर दिशा में लगाएं। दक्षिण में लगना होगा नुक़सान : वास्तु के अनुसार, घर के दक्षिण भाग को छोड़कर कहीं भी तुलसी का पौधा लगाया जा सकता है क्योंकि दक्षिण में लगा पौधा फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा सकता है। शालिग्राम का पूजन : प्राचीन परम्परा से तुलसी का पूजन सद्गृहस्थ परिवार में होता आया है, जिनकी संतान नहीं होती, वे तुलसी विवाह भी कराते हैं। तुलसी पत्र चढ़ाए बिना शालिग्राम का पूजन नहीं होता। पंचामृत में तुलसी : विष्णु भगवान को चढ़ाए श्राद्ध भोजन में, देव प्रसाद, चरणामृत, पंचामृत में तुलसी पत्र होना आवश्यक है अन्यथा वह प्रसाद भोग देवताओं को नहीं चढ़ता। मरते हुए प्राणी के अंतिम समय में गंगाजल व तुलसी पत्र : मरते हुए प्राणी के अंतिम समय में गंगाजल व तुलसी पत्र दिया जाता है. तुलसी जितनी धार्मिक मान्यता किसी भी पेड़-पौधे की नहीं है। भारतीय आयुर्वेद के सबसे प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता में कहा गया है। (1). हिक्काज विश्वास पाश्र्वमूल विनाशिन:। पितकृतत्कफवातघ्नसुरसा: पूर्ति: गन्धहा।। अर्थात – सुरसा यानी तुलसी हिचकी, खांसी, जहर का प्रभाव व पसली का दर्द मिटाने वाली है। इससे पित्त की वृद्धि और दूषित वायु खत्म होती है। यह दूर्गंध भी दूर करती है। (2). तुलसी कटु कातिक्ता हद्योषणा दाहिपित्तकृत। दीपना कृष्टकृच्छ् स्त्रपाश्र्व रूककफवातजित।। अर्थात – तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली दिल के लिए लाभकारी, त्वचा रोगों में फायदेमंद, पाचन शक्ति बढ़ाने वाली और मूत्र से संबंधित बीमारियों को मिटाने वाली है। यह कफ और वात से संबंधित बीमारियों को भी ठीक करती है। शास्त्रों में भी कहा गया है (3). त्रिकाल बिनता पुत्र प्रयाश तुलसी यदि। विशिष्यते कायशुद्धिश्चान्द्रायण शतं बिना।। तुलसी गंधमादाय यत्र गच्छन्ति: मारुत:। दिशो दशश्च पूतास्तुर्भूत ग्रामश्चतुर्विध:।। अर्थात – यदि सुबह, दोपहर और शाम को तुलसी का सेवन किया जाए तो उससे शरीर इतना शुद्ध हो जाता है, जितना अनेक चांद्रायण व्रत के बाद भी नहीं होता। तुलसी की गंध जितनी दूर तक जाती है, वहां तक का वातारण और निवास करने वाले जीव निरोगी और पवित्र हो जाते हैं। (4). तुलसी तुरवातिक्ता तीक्ष्णोष्णा कटुपाकिनी। रुक्षा हृद्या लघु: कटुचौहिषिताग्रि वद्र्धिनी।। जयेद वात कफ श्वासा कारुहिध्मा बमिकृमनीन। दौरगन्ध्य पार्वरूक कुष्ट विषकृच्छन स्त्रादृग्गद:।। अर्थात – तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली कफ, खांसी, हिचकी, उल्टी, कृमि, दुर्गंध, हर तरह के दर्द, कोढ़ और आंखों की बीमारी में लाभकारी है। तुलसी को भगवान के प्रसाद में रखकर ग्रहण करने की भी परंपरा है, ताकि यह अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही शरीर के अंदर पहुंचे और शरीर में किसी तरह की आंतरिक समस्या पैदा हो रही हो तो उसे खत्म कर दे। शरीर में किसी भी तरह के दूषित तत्व के एकत्र हो जाने पर तुलसी सबसे बेहतरीन दवा के रूप में काम करती है। सबसे बड़ा फायदा ये कि इसे खाने से कोई रिएक्शन नहीं होता है। तुलसी की मुख्य जातियां तुलसी मुख्यत: पांच प्रकार की होती है लेकिन घरों में दो प्रकार की तुलसी लगाई जाती हैं, ये हैं इन्हें रामा और श्यामा। रामा तुलसी : रामा तुलसी को गौरी भी कहा जाता है क्योंकि इनके पत्तों का रंग हल्का होता है। श्यामा तुलसी : श्यामा तुलसी के पत्तों का रंग काला होता है। इसमें कफनाशक गुण होते हैं और इसलिए इसे दवा के रूप में अधिक उपयोग में लाया जाता है। वन तुलसी : वन तुलसी में जहरनाशक प्रभाव पाया जाता है, लेकिन इसे घरों में बहुत कम लगाया जाता है। आंखों के रोग, कोढ़ और प्रसव में परेशानी जैसी समस्याओं में यह कारगर दवा है। मरूवक तुलसी : एक अन्य जाति मरूवक है, जो बहुत कम पाई जाती है। राजमार्तण्ड ग्रंथ के अनुसार किसी भी तरह का घाव हो जाने पर इसका रस बेहतरीन दवा की तरह काम करता है। रात को एक चम्मच लेने से कब्ज और गैस खत्म पानी में शिलाजीत मिलाकर पीने के फायदे तुलसी के फायदे बुखार : जुकाम के कारण आने वाले बुखार में भी तुलसी के पत्तों के रस का सेवन करना चाहिए। त्वचा के रोगों : तुलसी के रस में पाए जाने थाइमोल तत्व से त्वचा के रोगों में लाभ होता है। संक्रमण : तुलसी के पत्तों को त्वचा पर रगड़ने से त्वचा के संक्रमण में फायदा मिलता है। थकान होने पर : ज्यादा थकान होने पर तुलसी की पत्तियों और मंजरी का सेवन करें, थकान दूर होगी। फ्लू संक्रमण : फ्लू के रोगियों को तुलसी के पत्तों का काढ़ा, सेंधा नमक मिलाकर पिलाने से काफी फायदा होता है। ह्रदय और कोलेस्ट्रॉल : दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए यह अमृत समान है। इससे खून में कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है। माइग्रेन : रोजाना 4- 5 बार तुलसी की पत्तियाँ चबाने से कुछ ही दिनों में माइग्रेन की समस्या में आराम मिलता है। मलेरिया : मलेरिया में तुलसी एक कारगर औषधि है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर पीने से मलेरिया जल्दी ठीक हो जाता है। कैन्सर व ख़ून की ख़राबी : तुलसी के पत्तों को तांबे के पानी से भरे बर्तन में एक घंटे तक भीगा रहने दें। यह पानी पीने से बहुत से कैन्सर, हार्ट अटैक, ख़ून की ख़राबी जैसी बीमारियाँ पास नहीं आतीं। पथरी : किडनी की पथरी होने पर रोगी को तुलसी की पत्तियों को उबालकर बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित 6 माह तक पिलाएं, पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाएगी। प्रतिरोधक क्षमता : शरीर टूट रहा हो या जब लग रहा हो कि बुखार आने वाला है तो पुदीने का रस और तुलसी का रस बराबर मात्रा में मिलाकर थोड़ा गुड़ डालकर सेवन करें, आराम मिलेगा। खांसी व ज़ुकाम : तुलसी के रस में मुलहटी व थोड़ा-सा शहद मिलाकर लेने से खांसी व ज़ुकाम की परेशानी दूर हो जाती है, आप चाहें तो चार-पांच लौंग भूनकर तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर भी पी सकते हैं। काली या सुखी खांसी : तुलसी के पत्तों और अडूसा के पत्तों को बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से काली या सुखी खांसी दूर होती है। इसके अलावा तुलसी व अदरक का रस बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी खांसी में बहुत जल्दी आराम मिलता है। TODAY IN HOME पेट कम करने का आयुर्वेदिक उपाय कैंसर की गाँठ गलाने का उपाय August 6, 2019 हमारे शरीर में अक्सर ऐसा होता है कि किसी वजह से गा... फटी एड़ियों का रामबाण उपाय | Crack Heels Remedies August 5, 2019 आपको अपनी फटी एड़ियों की वजह से दूसरों के सामने शर... प्याज के रस से बाल उगाने का रामबाण उपाय August 5, 2019 प्याज का रस नये बालो को उगाये  प्याज के रस में गंज... राशिफल : 06 अगस्त दिन मंगलवार 2019, कैसा रहेगा आपका आज का दिन August 5, 2019 Horoscope | Astrologer | Rashifal | Vastu | Jyotis... किडनी और लिवर शुध्द करने का उपाय | Kidney & Liver August 5, 2019 भुने हुए लहसुन शरीर के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं। खासतौर पर मर्दों के लिए ये किसी चमत्कारिक औषधि… Next Section Health & Fitness Classic version 3' AUGUST 6, 2019 पेट कम करने का आयुर्वेदिक उपाय भारत में लगभग बहुत से लोग मोटापे की वजह से परेशान है, मोटापा बढ़ने के साथ साथ पेट के आस पास की भी चर्बी बढ़ने लगतीं है, चर्बी जमा होने के कारण कमर और पेट दोनों का साइज़ भी बढ़ने लगता है, पेट और कमर की चर्बी आपके शारीर को बेडौल बना देती है और साथ साथ मोटे होने से अनेक बीमारियाँ भी होने लगती है, यहां पर कुछ लाभदायक टिप्‍स दिये हुए हैं जिसे आजमा कर आप अपने पेट की चर्बी से हमेशा के लिये छुटकारा पा सकते हैं। इन दिनों पेट पर बढ़ती चर्बी कॉमन प्रॉब्लम बन चुकी है। 20 से लेकर 50 साल तक के लोग इससे परेशान है। लंबी सिटिंग, फास्ट फूड, एक्सराइज न करना इन सबका असर टमी पर ही होता है और इस पर फैट बढ़ता जाता है। इस फैट को कम करना मुश्किल होता है। यहां हम आपको इस फैट को कम करने का बहुत आसान तरीका बता रहे हैं। जिससे आप पेट की चर्बी को कम कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक चूर्ण खाना होगा। इसकी खास बात है कि इसको आप घर में ही बना सकते हैं, वो भी बहुत ही कम खर्च में। इसके आपको 3 चीजों की जरूरत होगी जो घर पर आसानी से मिल जाएगी। पेट की चर्बी गलने के लिए 3 औषधियां अलसी : ये पेट की चर्बी को कम करने में मदद करता है क्योंकि इसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड और फाइबर भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इसका यूज करने के लिए बीज को4 मिनट तक गर्म करना होगा। जीरा : सूखा हुआ जीरा लें, अगर आपको लगता है कि उसमें नमी है तो उसे धूप में सुखा लें। जीरा मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है। जिससे चर्बी घटती है। अजवाइन : अजवाइन पेट के लिए बहुत फायदेमंद होती है। ये भी चर्बी घटाने में मदद करती है। 3 औषधियों का कारगर चूर्ण बनाने का तरीका इस चूरण को बनाने के लिए आपको 3 चम्मच असली के बीज, 2 चम्मच जीरे, 2 चम्मच अजवाइन को लेना है। अलसी का बीज सिके हुए होंगे। इन तीनों को अच्छे से मिलाकर पीस लें। अब चूर्ण तैयार हो जाएगा। ये चूरन पेट की चर्बी को तेजी से पिघलाएगा। चूर्ण सेवन करने का तरीका  इस चुर्ण को लेते वक्त ये ध्यान रखना है कि आपको खाना खाने के बाद और पहले गुनगुन पानी ही लेना है। इसके साथ ही पूरे दिन पर्याप्त पानी पीना होगा। एक चम्मच चूर्ण को गुनगुने पानी के साथ डेली नाश्ता करने से पहले लेना है। डेली यूज से पेट की चर्बी 10 दिनों में ही कई किलो तक कम हो जाएगी। अगर और जल्दी रिजल्ट चाहते हैं तो इसे दिन में दो बार ले सकते हैं। एक चम्मच सुबह नाश्ते के पहले और एक चम्मच रात को खाने से पहले ले सकते हैं। चूरन लेते वक्त ये रखें ध्यान की इस चूर्ण को लेते वक्त ये ठंडी चीजों का सेवन करना होगा क्योंकि अलसी खाने में गर्म होती है। मोटापे और पेट की चर्बी कम करने के 5 अन्य उपाए योग और एक्सरसाइज : योग और एक्सरसाइज मोटापा कम करने में सबसे ज्यादा सहायक होता है, करीबन 10-20 मिनट के लिये कार्डियो एक्‍सरसाइज करें, इससे वजन जल्‍दी कम होता है, यदि आप क्रंच नहीं कर पाते है तो ऐसे व्‍यायाम करें जिससे अधिक फैट बर्न होता है, विंडमिल, टर्किश सिटअप्‍स, रस्‍सी कूदना आदि करें और साथ ही साथ योग भी करें। कैलोरी वाली चीज़े न खाएं : मोटापा कम करने के लिए कैलोरी वाली चीजों का सेवन बिलकुल न करें, सब्जियों और फलो का सेवन करें क्यूंकि इसमें कैलोरी कम होती है और फल में केले और चीकू का सेवन न करें क्यूंकि इनमे ज्यादा मात्र में कैलोरी होती है। गाजर : गाजर शारीर में चर्बी बढ़ने से रोकता हैं और पेट की चर्बी कम करता है, रोजाना खाना खाने से पहले 1 या 2 गाजर खाएं इससे आपको ज्यादा भूक नहीं लगेगी और आप कम खाना कहेंगे, इससे शारीर को कैलोरी कम मिलेगी और मोटापा कम होने लगेगा। जंक फ़ूड ना खाएं : जंक फूड, शुगर उत्‍पाद और तला-भुना वाला आहार कम से कम खाएं, इससे मोटापा भी तेज़ी से बढ़ता है और उसके अलावा अन्य बीमारियाँ भी होती है। दही : रोजाना खाने के साथ दही भी खाएं, रोजाना दही खाने से पेट की चर्बी पिघलकर निकल जाएगी, और रोजाना पुदीने वाली चाय पियें इससे बहार निकला हुआ पेट अन्दर हो जाता है. 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वह जाप जिससे शिव जी ने रावण को यह नाम दिया था... कहते हैं कि देवों के देव महादेव की उपासना इंसान को जीवन-मृत्यु में के काल चक्र से मुक्ति दिला देती है. शिव की अराधना में तांडव स्तोत्र का पाठ करने से भोलेनाथ का आशीर्वाद आजीवन संकट से बचाने के लिए कवच का काम करता है.  तांडव स्तोत्र है आजीवन संकट को दूर रखने वाला कवच शिव ताण्डव स्तोत्र (शिवताण्डवस्तोत्रम्) परम शिवभक्त लंकापति रावण द्वारा गाया भगवान शिव का स्तोत्र है. इस स्तोत्र से जुड़ी कथा: मान्यता है कि एक बार रावण ने अपना बल दिखाने के लिए कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब वह पूरे पर्वत को ही लंका ले जाने लगा तो उसका अहंकार तोड़ने के लिए भोलेनाथ ने अपने पैर के अंगूठे मात्र से कैलाश को दबाकर उसे स्थिर कर दिया. इससे रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया और वह दर्द से चिल्ला उठा - 'शंकर शंकर' - जिसका मतलब था क्षमा करिए, क्षमा करिए और वह महादेव की स्तुति करने लगा. इस स्तुति को ही शिव तांडव स्तोत्र कहते हैं. कहा जाता है कि इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर ही शिव जी ने लंकापति को 'रावण' नाम दिया था. भगवान शंकर को खुश करने और उनकी कृपा पाने के लिए यह स्त्रोत अचूक है: जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्‌। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम्‌ ॥1॥ अर्थात- जिन शिव जी की सघन, वनरूपी जटा से प्रवाहित होकर गंगा जी की धाराएं उनके कंठ को प्रक्षालित होती हैं, जिनके गले में बड़े एवं लंबे सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्यान करें. जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥ अर्थात- जिन शिव जी के जटाओं में अतिवेग से विलास पूर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे उनके शिश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचण्ड ज्वालाएं धधक-धधक करके प्रज्जवलित हो रहीं हैं, उन बाल चंद्रमा से विभूषित शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिक्षण बढ़ता रहे.  धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥ अर्थात- जो पर्वतराजसुता (पार्वती जी) के विलासमय रमणिय कटाक्षों में परम आनंदित चित्त रहते हैं, जिनके मस्तक में सम्पूर्ण सृष्टि एवं प्राणीगण वास करते हैं, तथा जिनके कृपादृष्टि मात्र से भक्तों की समस्त विपत्तियां दूर हो जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश को वस्त्र समान धारण करने वाले) शिवजी की आराधना से मेरा चित्त सर्वदा आनंदित रहे. जटाभुजंगपिंगलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदांधसिंधुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूतभर्तरि ॥4॥ अर्थात- मैं उन शिव जी की भक्ति में आनंदित रहूं जो सभी प्राणियों के आधार एवं रक्षक हैं, जिनकी जाटाओं में लिपटे सर्पों के फन की मणियों का पीले वर्ण प्रभा-समुह रूप केसर प्रकाश सभी दिशाओं को प्रकाशित करता है और जो गजचर्म (हिरण की छाल) से विभुषित हैं. सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः। भुजंगराजमालयानिबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥5॥ अर्थात- जिन शिव जी के चरण इन्द्रादि देवताओं के मस्तक के फूलों की धूल से रंजित हैं (जिन्हें देवतागण अपने सर के फूल अर्पण करते हैं), जिनकी जटा पर लाल सर्प विराजमान है, वो चन्द्रशेखर हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें. ललाटचत्वरज्वलद्धनंजयस्फुलिङ्गभा निपीतपंचसायकंनमन्निलिंपनायकम्‌। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥6॥ अर्थात- जिन शिव जी ने इन्द्रादि देवताओं का गर्व दहन करते हुए, कामदेव को अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से भस्म कर दिया, तथा जो सभी देवों द्वारा पूज्य हैं, तथा चन्द्रमा और गंगा द्वारा सुशोभित हैं, वे मुझे सिद्धि प्रदान करें. करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके। धराधरेंद्रनंदिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥7॥ अर्थात- जिनके मस्तक से निकली प्रचण्ड ज्वाला ने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जो शिव, पार्वती जी के स्तन के अग्र भाग पर चित्रकारी करने में अति चतुर है (यहां पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है), उन शिव जी में मेरी प्रीति अटल हो. नवीनमेघमंडलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ अर्थात- जिनका कण्ठ नवीन मेघों की घटाओं से परिपूर्ण आमवस्या की रात्रि के समान काला है, जो कि गज-चर्म, गंगा एवं बाल-चन्द्र द्वारा शोभायमान हैं तथा जो कि जगत का बोझ धारण करने वाले हैं, वे शिव जी हमे सभी प्रकार की सम्पन्नता प्रदान करें. प्रफुल्लनीलपंकजप्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌। स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥ अर्थात- जिनका कण्ठ और कंधा पूर्ण खिले हुए नीलकमल की फैली हुई सुंदर श्याम प्रभा से विभूषित है, जो कामदेव और त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दु:खों को काटने वाले, दक्षयज्ञ विनाशक, गजासुर एवं अंधकासुर के संहारक हैं तथा जो मृत्यू को वश में करने वाले हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूं. अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌। स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥ अर्थात- जो कल्यानमय, अविनाशी, समस्त कलाओं के रस का अस्वादन करने वाले हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, त्रिपुरासुर, गजासुर, अंधकासुर के सहांरक, दक्ष यज्ञ विध्वंसक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप हैं, मैं उन शिव जी को भजता हूं. जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजंगमस्फुरद्धगद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदंगतुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥ अर्थात- अतयंत वेग से भ्रमण कर रहे सर्पों के फूफकार से क्रमश: ललाट में बढ़ी हूई प्रचण्ड अग्नि के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य में लीन शिव जी सर्व प्रकार सुशोभित हो रहे हैं. दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंगमौक्तिकमस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुह्रद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥ अर्थात- कठोर पत्थर एवं कोमल शय्या, सर्प एवं मोतियों की मालाओं, बहुमूल्य रत्न एवं मिट्टी के टुकडों, शत्रू एवं मित्रों, राजाओं तथा प्रजाओं, तिनकों तथा कमलों पर सामान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूं. कदा निलिंपनिर्झरी निकुञ्जकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌। विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥ अर्थात- कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करते हुए, निष्कपट हो, सिर पर अंजली धारण कर चंचल नेत्रों तथा ललाट वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूंगा. निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः। तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥ अर्थात- देवांगनाओं के सिर में गूंथे पुष्पों की मालाओं के झड़ते हुए सुगंधमय पराग से मनोहर, परम शोभा के धाम महादेवजी के अंगों की सुंदरताएं परमानंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें. प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना। विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥ अर्थात- प्रचण्ड बड़वानल की भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं से शिव विवाह समय में गान की गई मंगलध्वनि सब मंत्रों में परमश्रेष्ठ शिव मंत्र से पूरित, सांसारिक दुःखों को नष्ट कर विजय पाएं. इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥16॥ अर्थात- इस उत्त्मोत्त्म शिव ताण्डव स्त्रोत को नित्य पढ़ने या सुनने मात्र से प्राणी पवित्र हो, परमगुरू शिव में स्थापित हो जाता है तथा सभी प्रकार के भ्रमों से मुक्त हो जाता है. पूजावसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥ अर्थात- प्रात: शिवपुजन के अंत में इस रावणकृत शिव ताण्डव स्तोत्र के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती हैं तथा भक्त रथ, गज, घोड़ा आदि संपदा से सर्वदा युक्त रहता है. ॥ इति रावणकृतं शिव ताण्डव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥ आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें संबंधित खबरें इस स्तुति से जल्द प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ... 11 July, 2019 पढ़ाई में ध्‍यान लगने का आसान मंत्र 11 July, 2019 हर तरह के रोग व क्‍लेश दूर करने का आसान मंत्र 11 July, 2019 शिव के हर नाम की है महिमा अपार 11 July, 2019  अन्‍य ख़बरें गायत्री मंत्र की चमत्कारिक महिमा, छात्रों को ऐसे मिलेगा महावरदान 08 July, 2019 कुंडली और हाथ की रेखाएं देखे बिना जानें शनि की स्थिति, ये है तरीका 06 July, 2019 शनि की टेढ़ी नजर से रहें सतर्क, प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय 22 June, 2019 भगवान गणेश की उपासना से बरसेगा धन, 27 दिनों तक 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यहां किया था रावण ने स्वर्ग की सीढ़ी का निर्माण, जानें क्या है इसका रहस्य हिंदू धर्म में वैसे तो 33 कोटि देवी-देवता हैं परंतु देवों के देव एक ही हैं, जो हैं महादेव। ये एक मात्र ऐसे देवता है जिनका न तो किसी ने आरंभ जाना है न ही कोई इनका अंत जानता है। कहते हैं भोलेनाथ से ही सृष्टि है और संपूर्ण सृष्टि इनके द्वारा ही नष्ट होगी। इसीलिए कहा जाता है अंत का आरंभ शिव हैं और हर आरंभ का अंत भी शिव ही हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान शंकर आज भी यानि कलियुग में भी पृथ्वी पर विचरण करते हैं और अपने भक्तों की समस्याओं का निधान करते हैं। लेकिन हम जानते हैं बहुत कम लोग होंगे जो इस बात पर विश्वास करते होंगे। मगर आज हम आपको इनके एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे जिससे शायद आप भी इस बात पर विश्वास करना शुरू कर देंगे। जी हां एक ऐसे मंदिर के दर्शन करवाएंगे जहां साक्षात भगवान शिव निवास करते हैं। शास्त्रों के अनुसार भोलेनाथ की पूजा से हर तरह के सुख की प्राप्ति होती है, इनकी पूजा सबसे ज्यादा फलदायी मानी जाती है। यही कारण था कि प्राचीन समय देवी-देवताओं से लेकर सभी राक्षस गण तक इनकी ही वंदना करते थे। जिनमें से रावण भगवान शिव का परम भक्त था। वह भगवान को अपने आराध्य मानता था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रावण ने एक बार उन्हें यानि अपने ईष्ट को प्रसन्न करने के लिए अपने सर तक काटकर चढ़ा दिया। अपनी प्रति रावण की असीम भक्ति को देखकर भगवान शिव धरती पर उतर आए थे। कहते हैं जिस स्थान पर भगवान शिव ने उस समय निवास किया था कहां जाता है वहां से स्वर्ग जाने का रास्ता था। तो आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में साथ ही जानेंगे कि रावण को इस मंदिर का कैसे पता चला- हिमाचल प्रदेश को पावन स्थाली माना जाता है क्योंकि हिंदू धर्म से जुड़े कई मंदिर आज हैं जिसका संबंध देवी-देवता से जुड़ा हुआ है। बता दें इसे देवभूमि भी कहा जाता है। आज हम इन्ही प्राचीन मंदिरों में से एक के बारे में विस्तार से जानेंगे जो हिमाचल प्रदेश से 70 कि.मी से दूर सिरमौर नामक जिले में हैं। बता दें सिरमौर का मुख्यालय पोडिवाल है, जो नाहन से 6 कि.मी. दूर स्थित है। इसी जगह पर ही भगवान शिव का एक विचित्र चमत्कारिक मंदिर स्थापित है, जिसे पोडिवाल शिव मंदिर कहा जाता है। लोक मान्यता के अनुसार इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि एक ऐसे ही मंदिर का वर्णन रामायण काल के एक मंदिर से किया गया। इसलिए इस मंदिर की रावण के उसी स्वर्ग सीढ़ियों वाले मंदिर से तुलना की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था बदले में भगवान शिव ने रावण को वर दिया कि अगर रावण एक दिन के भीतर पांच पौड़ियों यानि 5 सीढियों का निर्माण कर देता है तो उसको अमरता मिल जाएगी। लेकिन यह सीढ़ियां बनाते-बनाते रावण की आंख लग गई। जिसके कारण रावण का स्वर्ग जाने का सपना पूरा नहीं हुआ और शरीर में अमृत रखे हुए भी उसे अपनी देह को त्यागना पड़ा। प्रचलित मान्यता के अनुसार रावण ने स्वर्ग के लिए प्रथम पौड़ी हरिद्वार में बनाई इसलिए इसे हर की पौड़ी कहा जाता है। दूसरी पौड़ी वाला में, तीसरी पौड़ी चुडेश्वर महादेव और चौथी पौड़ी किन्नर कैलाश में बनाई थी। पांचवी पौड़ी बनाने से पहले रावण की आंख लग गई और जब आंख खुली तो रावण ने देखा सुबह हो चुकी थी। कहा जाता है पोडिवाल यानि दूसरी पौड़ी में स्थापित शिवलिंग में भगवान शिव आज भी साक्षात विद्यामान हैं। मगर इनके दर्शन केवल इनके सच्चे भक्तों को ही होते हैं

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